আল-জামি` আল-কামিল
5361 - عن أنس بن مالك قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"العارية مؤداة، والمنحة مردودة".
صحيح: رواه ابن ماجه (2399) عن هشام بن عمار وعبد الرحمن بن إبراهيم الدمشقيان قالا: حدثنا محمد بن شعيب، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده صحيح.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ধার অবশ্যই পরিশোধযোগ্য এবং (নির্দিষ্ট সময়ের জন্য) দানস্বরূপ দেওয়া বস্তু ফেরতযোগ্য।"
5362 - عن أبي أمامة يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"العارية مؤداة، والمنحة مردودة".
حسن: رواه ابن ماجه (2398)، والترمذي (1265)، وأبو داود (3565)، وأحمد (22294) كلهم من حديث إسماعيل بن عباس قال: حدثني شرحبيل بن مسلم قال: سمعت أبا أمامة فذكره. واللفظ لابن ماجه.
ولفظ أبي داود"إن الله عز وجل قد أعطى كل ذي حق حقه، فلا وصية لوارث، ولا تنفق المرأة شيئا من بيتها إلا بإذن زوجها" فقيل: يا رسول الله، ولا الطعام؟ قال:"ذاك أفضل أموالنا" ثم قال:"العارية مؤداة، والمنحة مردودة، والدين مقضي، والزعيم غارم".
وقال الترمذي:"حسن غريب".
قلت: وهو كما قال؛ فإن إسماعيل بن عياش حسن في روايته عن أهل بلده الشاميين، وهذا منها، وفي غيرهم مخلط.
قال الترمذي:"وقد روي عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أيضا من غير هذا الوجه". وهو يقصد به الحديث المطول الذي روي من أوجه كثيرة، يأتي ذكر أجزائها المتفرقة في مواضعها.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ধার পরিশোধযোগ্য এবং সাময়িক দান (উপহার) অবশ্যই ফেরত দিতে হবে।"
5363 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"على اليد ما أخذت حتى تؤدي".
صحيح: رواه أبو داود (3561)، والترمذي (1266)، وابن ماجه (2400)، والحاكم (2/
47)، والبيهقي (6/ 90)، والقضاعي في مسند الشهاب (1/ 189) كلهم من حديث الحسن، عن سمرة فذكره. زاد البعض: ثم إن الحسن نسي، فقال: هو أمينك، لا ضمان عليه.
قال الترمذي:"حسن صحيح". وقال الحاكم:"صحيح الإسناد على شرط البخاري".
قلت: وهو كما قال؛ فإن الحسن ثبت سماعه من سمرة مطلقا، كما ذكرت في عدة مواضع. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (5/ 370 - 371).
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: হাত যা গ্রহণ করে, তা ফিরিয়ে না দেওয়া পর্যন্ত তার উপরই এর দায়িত্ব থাকে।
5364 - عن يعلى بن أمية قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أتتك رسلي فأعطهم ثلاثين درعا، وثلاثين بعيرا". قال: فقلت: يا رسول الله، أعارية مضمونة، أو عارية مؤداة؟ قال:" بل عارية مؤداة".
صحيح: رواه أبو داود (3566)، وأحمد (17950)، والدارقطني (3/ 39)، وصحّحه ابن حبان (4720) كلهم من حديث همام، عن قتادة، عن عطاء، عن صفوان بن يعلى بن أمية، عن أبيه فذكره. وإسناده صحيح. وهمام هو ابن يحيى بن دينار العوذي.
وفي الحديث دليل على أن العارية مؤداة ما دامت بقيت عينها. وهذا لا خلاف فيه بين أهل العلم.
وإنما الخلاف في تضمين العارية، فمن أخذ بهذه الأحاديث قال: لا ضمان في العارية، وإنما مؤداة. وهو رأي أبي حنيفة، وأصحابه، وإليه ذهب من الصحابة علي وابن مسعود.
ومن قال بضمان العارية فسر الحديث بأن العارية تكون مؤداة في حال قيام عينها، وقيمتها عند التلف. واستدلوا أيضا بحديث جابر بن عبد الله الآتي وغيره. وهو رأي الجمهور، منهم مالك، والشافعي، وأحمد. وبه قال من الصحابة ابن عباس، وأبو هريرة. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (5/ 372 - 373).
ইয়া'লা ইবনু উমাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "যখন আমার দূতগণ তোমার কাছে আসবে, তখন তাদের ত্রিশটি বর্ম এবং ত্রিশটি উট দেবে।" তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম: "হে আল্লাহর রাসূল! এটি কি ক্ষতিপূরণযোগ্য ধার, নাকি ফেরতযোগ্য ধার?" তিনি বললেন: "বরং এটি ফেরতযোগ্য ধার।"
5365 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سار إلى حنين. فذكر الحديث. وفيه: ثم بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى صفوان بن أمية فسأله أدرعا عنده مائة درع وما يصلحها من عدتها. فقال: أغصبا يا محمد؟ فقال:"بل عارية مضمونة حتى نُؤديها عليك".
حسن: رواه الحاكم (3/ 48 - 49)، وعنه البيهقي (6/ 89) من طريق ابن إسحاق قال: حدثني عاصم بن عمر بن قتادة، عن عبد الرحمن بن جابر، عن أبيه جابر بن عبد الله فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرّح بالتحديث.
ورواه أبو داود (3562) من طرق عن يزيد بن هارون، حدثنا شريك، عن عبد العزيز بن رفيع،
عن أمية بن صفوان بن أمية، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم استعار منه أدراعا يوم حنين، فقال: أغصب يا محمد؟ فقال:"لا بل عارية مضمونة".
وفيه أمية بن صفوان لا يعرف، ولم يذكر عنه ابن حجر في تهذيبه شيئا غير أنه روى عنه اثنان. وقال في التقريب:"مقبول". أي عند المتابعة. وقد توبع.
وشريك هو ابن عبد الله القاضي سيء الحفظ، ومن طريقه رواه أحمد (15302)، والدارقطني (3/ 39)، والحاكم (2/ 47)، وعنه البيهقي (6/ 89).
وسكت عليه الحاكم إلا أن شريكا توبع أيضا. رواه أبو داود (3563) من حديث جرير، عن عبد العزيز بن رفيع، عن أناس من آل عبد الله بن صفوان أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يا صفوان، هل عندك من سلاح؟" قال: عارية أم غصبا؟ قال:"لا، بل عارية" فأعاره ما بين الثلاثين إلى الأربعين درعا، وغزا رسول الله صلى الله عليه وسلم حنينا، فلما هزم المشركون جمعت دروع صفوان، ففقد منها أدراعا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لصفوان:"إنا قد فقدنا من أدراعك أدراعا، فهل نغرم لك؟" قال: لا يا رسول الله؛ لأن في قلبي اليوم ما لم يكن يومئذ. وفيه أناس مجهولون.
وله متابع آخر: وهو ما رواه أيضا أبو داود (3564) من طريق أبي الأحوص، حدثنا عبد العزيز ابن رفيع، عن عطاء، عن أناس من آل صفوان قال: استعار النبي صلى الله عليه وسلم. فذكر معناه.
وفيه أيضا أناس مجهولون.
وله إسناد آخر: وهو ما رواه البيهقي (6/ 89 - 90) من حديث ابن وهب قال: أخبرني أنس بن عياض الليثي، عن جعفر بن محمد، عن أبيه أن صفوان بن أمية أعار رسول الله صلى الله عليه وسلم سلاحا، هي ثمانون درعا. فذكر الحديث.
قال البيهقي:"بعض هذه الأخبار وإن كان مرسلا فإنه يقوي بشواهده مع ما تقدم من الموصول". وهو يقصد به حديث جابر.
وله شاهد أيضا عن ابن عباس، رواه الدارقطني، والحاكم، وعنه البيهقي، ولكن فيه إسحاق ابن عبد الله متروك الحديث.
وله شاهد آخر عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. وهو ضعيف أيضا. انظر تخريجه في"المنة الكبرى" (5/ 371).
وأما البخاري -رحمه الله تعالى- فلعله يرى أن فيه اضطرابا إذ أنه ذكر الأسانيد المختلفة، ولم يرجح كعادته. انظر"التاريخ الكبير" (2/ 8).
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইন অভিমুখে যাত্রা করেন। তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেন। তাতে আছে: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফওয়ান ইবনু উমাইয়্যার নিকট লোক পাঠান এবং তার কাছে থাকা একশত বর্ম এবং এর জন্য প্রয়োজনীয় অন্যান্য সরঞ্জামাদি চাইলেন। তখন সে বলল: হে মুহাম্মাদ, এটা কি জবরদখল (বলপূর্বক গ্রহণ)? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং এটি হলো জামিনসহ ধার (আরিয়্যাহ মাযমূনা), যা আমরা তোমাকে ফেরত না দেওয়া পর্যন্ত তোমার কাছে গচ্ছিত থাকবে।"
5366 - عن عمرو بن تغلب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن من أشراط الساعة أن
يفشو المال ويكثر، وتفشو التجارة، ويظهر العلم، ويبيع الرجل البيع، فيقول: لا حتى أستأمر تاجر بني فلان، ويلتمس في الحي العظيم الكاتب فلا يوجد".
صحيح: رواه النسائي (4456)، والحاكم (2/ 7)، والخطابي في"غريب الحديث" (1/ 405) كلهم من حديث وهب بن جرير قال: حدثني أبي، عن يونس، عن الحسن، عن عمرو بن تغلب فذكره. واللفظ للنسائي.
واقتصر الحاكم على قوله:"وتفشو التجارة". وأما الخطابي فجعل قوله:"ويبيع الرجل البيع" إلى آخره من قول عمرو بن تغلب. وإسناده صحيح.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وإسناده على شرطهما صحيح إلا أن عمرو بن تغلب ليس له راو غير الحسن".
ولكن قال ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (3/ 222) في ترجمة عمرو بن تغلب:"له صحبة، روى عنه الحسن البصري، والحكم بن الأعرج".
وقد جاء التصريح بالتحديث في حديث قتال الترك في صحيح البخاري (2927)، ومسند أحمد (20674)، وذلك أيضا من أشراط الساعة. فكأن عمرو بن تغلب يروي حديثين من أشراط الساعة سمعهما الحسن منه، وتصرف بعض الرواة في صيغة الأداء.
وللحسن في مسند أحمد أحاديث أخرى عن عمرو بن تغلب، صرح فيها بالتحديث منه. (انظر 20672 - 20673).
আমর ইবনে তাগলিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কিয়ামতের নিদর্শনাবলির মধ্যে অন্যতম হলো, সম্পদ প্রচুর পরিমাণে ছড়িয়ে পড়বে ও বৃদ্ধি পাবে, ব্যবসা-বাণিজ্য ব্যাপক হবে, এবং জ্ঞান (দীনী জ্ঞান) প্রকাশ পাবে। আর কোনো ব্যক্তি কিছু বিক্রি করলে সে বলবে: না (আমি এখন বিক্রি করব না), যতক্ষণ না আমি অমুক গোত্রের ব্যবসায়ীর সাথে পরামর্শ করি। আর বড় জনবসতিতে লিপিকারকে (লেখক/মুহুরি) খোঁজা হবে কিন্তু তাকে পাওয়া যাবে না।"
5367 - عن طارق بن شهاب قال: كنا عند عبد الله جلوسا، فجاء آذنه، فقال: قد قامت الصلاة، فقام وقمنا معه، فدخلنا المسجد، فرأى الناس ركوعا في مقدم المسجد، فكبر وركع، ومشينا وفعلنا مثل ما فعل، فمر رجل يسرع، فقال: عليكم السلام يا أبا عبد الرحمن، فقال: صدق الله، وبلغ رسوله. فلما صلينا رجع، فولج على أهله، وجلسنا في مكاننا ننتظره حتى يخرج، فقال بعضنا لبعض: أيكم يسأله؟ قال طارق: أنا أسأله، فسأله، فقال: عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"بين يدي الساعة تسليم الخاصة، وفشو التجارة حتى تعين المرأة زوجها على التجارة، وقطع الأرحام، وفشو القلم، وظهور الشهادة بالزور، وكتمان شهادة الحق".
حسن: رواه البخاري في الأدب المفرد (1049)، وأحمد (3982)، والطحاوي في مشكله (1590)، والحاكم (4/ 445) كلهم من طريق بشير بن سلمان، عن سيار أبي الحكم، عن طارق ابن شهاب فذكره.
وسيار أبو الحكم هو العنزي من رجال الصحيح، ثقة، ولكن الصواب أنه سيار أبو حمزة،
كما قال الإمام أحمد في حديث آخر رواه من هذا الطريق (4219)، ثم رواه عن عبد الرزاق قال: أخبرنا سفيان، عن بشير أبي إسماعيل، عن سيار أبي حمزة فذكره.
قال عبد الله:"قال أبي: وهو الصواب سيار أبو حمزة. وقال: سيار أبو الحكم لم يحدث عن طارق بن شهاب بشيء".
وكذلك قال أبو داود:"هو سيار أبو حمزة، لكن بشير كان يقول: سيار أبو الحكم، وهو خطأ". وهو رأي يحيى بن معين أيضا.
ولكن ذهب البخاري إلى أنه سيار أبو الحكم، فترجمه في"التاريخ الكبير" (4/ 161)، فقال:"سيار بن أبي سيار، وهو سيار بن وردان الواسطي عن طارق بن شهاب، روى عنه عبيد الله بن عمر، وبشير بن سلمان، وهشيم. وكنيته أبو الحكم".
وكذلك قال ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (4/ 254 - 255).
وخطأهم الدارقطني، فقال في علله (5/ 116): وقولهم:"سيار أبو الحكم" وهم. وإنما هو سيار أبو حمزة الكوفي، كذلك رواه عبد الرزاق عن الثوري، عن بشير، عن سيار أبي حمزة، وهو الصواب. وسيار أبو الحكم لم يسمع من طارق بن شهاب شيئا، ولم يرو عنه". انتهى.
وأقره الحافظ ابن حجر في تهذيبه (5/ 292).
وسيار أبو حمزة روى عنه جماعة، ووثّقه ابن حبان، ويبدو أنه كان معروفا عند أئمة الحديث، فهو لا ينزل عن درجة حسن الحديث.
وقد حسّن الحافظ ابن حجر حديثَه في مواضع من فتحه.
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারিক ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসা ছিলাম। এমন সময় তাঁর খাদেম এসে বলল: সালাতের সময় হয়েছে। তিনি দাঁড়ালেন এবং আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। আমরা মসজিদে প্রবেশ করে দেখলাম সামনের কাতারের লোকজন রুকুতে রয়েছে। তিনি তাকবীর বলে রুকু করলেন। আমরাও হাঁটতে হাঁটতে তাঁর মতো করলাম। দ্রুতগামী এক ব্যক্তি পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় বলল: "আসসালামু আলাইকুম ইয়া আবূ আব্দুর রহমান!" তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন: "আল্লাহ সত্য বলেছেন এবং তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পৌঁছে দিয়েছেন।" আমরা সালাত শেষ করার পর তিনি ফিরে গেলেন এবং নিজ পরিবারের কাছে প্রবেশ করলেন। আমরা আমাদের স্থানে বসে অপেক্ষা করতে লাগলাম যতক্ষণ না তিনি বেরিয়ে আসেন। আমাদের মধ্য থেকে কেউ কেউ বলল: তোমাদের মধ্যে কে তাঁকে জিজ্ঞেস করবে (তাঁর মন্তব্যের বিষয়ে)? তারিক বললেন: আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করব। অতঃপর তারিক তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামতের প্রাক্কালে কিছু নিদর্শন প্রকাশ পাবে: শুধু পরিচিত ব্যক্তিকে সালাম দেওয়া, ব্যবসা-বাণিজ্যের প্রসার ঘটবে এমনভাবে যে স্ত্রী তার স্বামীকে ব্যবসায় সাহায্য করবে, আত্মীয়তার বন্ধন ছিন্ন করা, কলমের (লেখার) ব্যাপক প্রসার হওয়া, মিথ্যা সাক্ষ্যের প্রকাশ পাওয়া এবং সত্য সাক্ষ্য গোপন করা।"
5368 - عن ابن عباس قال: قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة، وهم يسلفون في الثمار السنة والسنتين، فقال:"من أسلف في ثمر فليسلف في كيل معلوم، ووزن معلوم، إلى أجل معلوم".
متفق عليه: رواه البخاري في السلم (2240)، ومسلم في المساقاة (1604: 127) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، أخبرنا ابن أبي نجيح، عن عبد الله بن كثير، عن أبي المنهال، عن ابن عباس فذكره. واللفظ لمسلم.
قوله:"السلف" وهو لغة الحجاز، والسلم لغة العراق.
والسلف له معنيان في المعاملات:
أحدهما: القرض الذي لا منفعة فيه للمقرض، وعلى المستقرض رده، كما أخذه.
والثاني: هو السلم المعهود، وهو تسليم مال عاجل بمقابلة موصوف في الذمة. ويقال: سلفت، وأسلفت، وأسلمت بمعنى واحد.
قوله:"في تمر" قال النووي في شرحه (11/ 42 - 43):"هكذا هو في أكثر الأصول:"تمر" بالمثناة، وفي بعضها"ثمر" بالمثلثة، وهو أعم، وهكذا في جميع النسخ".
وفي الحديث دليل على جواز السلف في الطعام والشباب وغير ذلك من أنواع التجارة مما يعرف حده، وصفته.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় আগমন করলেন। তখন লোকেরা এক বছর বা দুই বছরের জন্য ফল-ফসলের অগ্রিম (সালাম) লেনদেন করত। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি কোনো ফলের অগ্রিম (সালাম) লেনদেন করবে, সে যেন নির্ধারিত পরিমাপ, নির্ধারিত ওজন এবং নির্ধারিত সময়ের জন্য তা করে।"
5369 - عن أبي البختري قال: سألت ابن عمر رضي الله عنهما عن السلم في النخل، فقال: نهي عن بيع النخل حتى يصلح، وعن بيع الورق نساء بناجز.
وسألت ابن عباس عن السلم في النخل، فقال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع النخل حتى يؤكل منه،
أو يأكل منه حتى يوزن.
متفق عليه: رواه البخاري في السلم (2247 - 2248)، ومسلم في البيوع (1537) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو، عن أبي البختري قال فذكره. واللفظ للبخاري، وعند مسلم"عن بيع" بدل"عن السلم".
আবু আল-বাখতারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খেজুরের ক্ষেত্রে 'সালাম' (অগ্রিম বেচা-কেনা) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: খেজুর (ফল) উপযুক্ত (পাকার) না হওয়া পর্যন্ত বিক্রি করতে নিষেধ করা হয়েছে, এবং নগদ অর্থের বিনিময়ে বাকি রৌপ্য (মুদ্রা) বিক্রি করতেও নিষেধ করা হয়েছে। আর আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খেজুরের ক্ষেত্রে 'সালাম' সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম, তিনি বললেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খেজুর (ফল) খাওয়া উপযোগী না হওয়া পর্যন্ত, অথবা খাওয়া উপযোগী (পরিমাণে) ওজনে দেওয়া না হওয়া পর্যন্ত বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।
5370 - عن محمد بن أبي المجالد قال: بعثني عبد الله بن شداد، وأبو بردة إلى عبد الله بن أبي أوفي، فقالا: سله هل كان أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم في عهد النبي صلى الله عليه وسلم يسلفون في الحنطة؟ قال عبد الله: كنا نسلف نبيط أهل الشام في الحنطة والشعير والزيت في كيل معلوم إلى أجل معلوم. قلت: إلى من كان أصله عنده؟ قال: ما كنا نسألهم عن ذلك، ثم بعثاني إلى عبد الرحمن بن أبزي، فسألته، فقال: كان أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يسلفون على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، ولم نسألهم ألهم حرث أم لا؟
صحيح: رواه البخاري في السلم (2244 - 2245) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا عبد الواحد، حدثنا الشيباني، حدثنا محمد بن أبي المجالد فذكره.
وفي رواية عنده:"على عهد النبي صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر في الحنطة والشعير والزبيب والتمر".
وفي مسند أحمد (19122) من طريق شعبة، عن عبد الله بن أبي المجالد: وما هو عندهم، أو ما نراه عندهم.
وقوله:"ما كنا نسألهم عن ذلك" يستفاد منه جواز بيع السلم في عموم التجارة من الزراعة والصناعة وغيرها بالشروط المذكورة من الوصف والنوع والمدة وغيرها قطعا للنزاع.
وبوّبتُ كما بوب البخاري -رحمه الله تعالى-: باب السلم إلى من ليس عنده أصل.
وقوله:"نبيط" ويقال لهم: النبط. وهم قوم من العرب دخلوا في العجم والروم، واختلطت أنسابهم، وفسدت ألسنتهم، فالذين اختلطوا بالروم نزلوا في بوادي الشام، وهم صاروا الزراع.
মুহাম্মাদ ইবনে আবী আল-মুজাল্লিদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে শাদ্দাদ এবং আবূ বুরদাহ আমাকে আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পাঠালেন। তারা উভয়ে বললেন: তাঁকে জিজ্ঞাসা করুন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সাহাবীগণ কি গম (খাদ্যশস্য) অগ্রিম (সালাম পদ্ধতিতে) ক্রয় করতেন? আব্দুল্লাহ (ইবনে আবী আওফা) বললেন: আমরা সিরিয়াবাসী নাবীত্ব গোত্রের লোকদের সাথে গম, বার্লি ও তেল নির্ধারিত পরিমাণে, নির্ধারিত সময়ের জন্য (সালাম পদ্ধতিতে) চুক্তি করতাম। আমি বললাম: যার কাছে মূল বস্তুটি মজুত ছিল, তার সাথে কি এই চুক্তি হতো? তিনি বললেন: আমরা তাদের এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করতাম না। এরপর তারা আমাকে আব্দুর রহমান ইবনে আবযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পাঠালেন। আমি তাকে জিজ্ঞাসা করলাম, তিনি বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সাহাবীগণ অগ্রিম চুক্তি (সালাম) করতেন এবং আমরা তাদের জিজ্ঞাসা করতাম না যে তাদের ক্ষেত আছে কি নেই।
5371 - عن الأعمش قال: تذاكرنا عند إبراهيم الرهن في السلف، فقال: حدثني الأسود، عن عائشة رضي الله عنها أن النبي صلى الله عليه وسلم اشترى من يهودي طعاما إلى أجل معلوم، وارتهن منه درعا من حديد.
متفق عليه: رواه البخاري في السلم (2252)، ومسلم في المساقاة (1603: 126) من طريق عبد الواحد بن زياد، حدثنا الأعمش قال فذكره.
واللّفظ للبخاريّ، وعند مسلم:"ذكرنا الرهن في السلم".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ইহুদীর কাছ থেকে নির্দিষ্ট মেয়াদের জন্য খাদ্যদ্রব্য ক্রয় করলেন এবং তার কাছে লোহার একটি বর্ম বন্ধক রাখলেন।
5372 - عن ابن عمر قال: كان أهل الجاهلية يتبايعون لحم الجزور إلى حبل الحبلة. -وحبل الحبلة أن تنتج الناقة، ثم تحمل التي نتجت- فنهاهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن ذلك.
متفق عليه: رواه البخاريّ في السلم (2256) من طريق جويرية، ومسلم في البيوع (1514: 6) من طريق عبيد اللَّه، كلاهما عن نافع، عن ابن عمر قال فذكره. واللّفظ لمسلم. ولفظ البخاري نحوه، وفيه التصريح بأن التفسير من نافع.
وفي أحاديث الأبواب المتقدمة دليل على جواز السلم في الطعام والثياب وغيرهما مما يمكن ضبطه بالصفة، وإن لم يكن ذلك موجودا عند العقد مثل السيارات والأجهزة الكهربائية والأثاث المنزلي وغيرها.
ويشترط في السلم تسليم رأس المال أو جزء منه عند العقد.
وفي الباب مسائل أخرى ذكرتها بالتفصيل في"المنة الكبرى" (5/ 234)، فراجعه إن شئت.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, জাহিলিয়াতের যুগের লোকেরা উটের গোশত ক্রয়-বিক্রয় করত 'হাবলুল হাবালা' পর্যন্ত। -আর হাবলুল হাবালা হলো এই যে, উটনী বাচ্চা প্রসব করবে, অতঃপর সেই প্রসূত বাচ্চাটি গর্ভধারণ করবে- অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে তা থেকে নিষেধ করলেন।
5373 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قضى النبي صلى الله عليه وسلم بالشفعة في كل ما لم يقسم، فإذا وقعت الحدود، وصرفت الطرق فلا شفعة.
صحيح: رواه البخاريّ في الشفعة (2257) عن مسدد، حدّثنا عبد الواحد، حدّثنا معمر، عن الزهريّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر قال فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক সেই সম্পত্তিতে শুফ’আর অধিকারের ফায়সালা দিয়েছেন যা বণ্টন করা হয়নি। কিন্তু যখন সীমানা নির্ধারণ করা হয় এবং রাস্তা নির্দিষ্ট করে দেওয়া হয়, তখন আর শুফ’আ থাকে না।
5374 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كان له شريك في ربعة، أو نخل، فليس له أن يبيع حتى يؤذن شريكهـ، فإن رضي أخذ، وإن كره ترك".
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1608) من طرق عن زهير أبي خيثمة، عن أبي الزبير، عن جابر. وزهير هو ابن معاوية الجعفي أبو خيثمة.
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কারও যদি কোনো জমিতে বা খেজুরের বাগানে অংশীদার থাকে, তবে সে যেন তার অংশীদারকে না জানিয়ে বিক্রি না করে। অতঃপর সে (অংশীদার) যদি সন্তুষ্ট হয় (এবং কিনতে চায়), তবে সে তা নিয়ে নেবে; আর যদি সে অপছন্দ করে (কিনতে না চায়), তবে সে তা ছেড়ে দেবে।"
5375 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الشفعة في كل شرك، في أرض، أو ربع، أو حائط. لا يصلح أن يبيع حتى يعرض على شريكهـ، فيأخذ، أو يدع، فإن أبي فشريكه أحق به حتى يؤذنه".
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1608: 135) عن أبي الطاهر، أخبرنا ابن وهب، عن ابن جريج، أن أبا الزبير أخبره أنه سمع جابرا يقول فذكره.
وفي رواية عنده عن عبد اللَّه بن إدريس، عن ابن جريج:"قضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بالشفعة في كل شركة لم تقسم، ربعة أو حائط، لا يحل له أن يبيع حتى يؤذن شريكهـ، فإن شاء أخذ، وإن شاء ترك. فإذا باع ولم يؤذنه فهو أحق به".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "শুফ‘আ (অগ্রক্রয়াধিকার) প্রযোজ্য সকল অংশীদারিত্বে—তা জমিতে হোক, বাসস্থানে হোক অথবা বাগানে হোক। অংশীদারের কাছে পেশ না করে বিক্রি করা জায়েয নয়। সে (অংশীদার) হয় গ্রহণ করবে, নতুবা ত্যাগ করবে। যদি সে (অংশীদার) অস্বীকার করে (এবং অংশীদারকে না জানিয়ে বিক্রি করে), তবে সে (অংশীদার) ওই বস্তুর অধিক হকদার হবে যতক্ষণ না বিক্রেতা তাকে অবহিত করে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম শুফ‘আ নির্ধারণ করেছেন এমন প্রতিটি অংশীদারিত্বে যা এখনও ভাগ করা হয়নি—তা বাসস্থান হোক বা বাগান হোক। তার জন্য এটা হালাল নয় যে, সে তার অংশীদারকে অবহিত না করে বিক্রি করবে। যদি সে চায়, তবে সে গ্রহণ করবে, আর যদি চায়, তবে ত্যাগ করবে। যদি সে বিক্রি করে দেয় এবং অংশীদারকে অবহিত না করে, তবে অংশীদারই তার অধিক হকদার।
5376 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كانت له نخل، أو أرض فلا يبعها حتى يعرضها على شريكهـ".
صحيح: رواه النسائي (4700)، وابن ماجه (2492)، وأحمد (14292) كلّهم من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره. وإسناده صحيح.
ولكن رواه عبد الرزاق (14403) عن سفيان الثوري، وابن جريج كلاهما عن أبي الزبير، وزاد فيه:"فإن شاء أخذه، وإن شاء تركهـ".
ولعل الحديث جاء من وجهن: سفيان بن عيينة، وسفيان الثوري. وإن كان ليس في جميع
طرقه منسوبا إلى ابن عيينة، أو إلى الثوري.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার কোনো খেজুর বাগান অথবা জমি আছে, সে যেন তা বিক্রি না করে, যতক্ষণ না সে তা তার শরিকের কাছে পেশ করে।"
5377 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قضى بالشفعة فيما لم يقسم، فإذا وقعت الحدود فلا شفعة.
صحيح: رواه ابن ماجه (2497) عن محمد بن يحيى، وعبد الرحمن بن عمر، حدّثنا أبو عاصم قال: حدّثنا مالك بن أنس، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، وأبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وكذلك رواه البيهقي (6/ 104) عن أبي عاصم، عن مالك موصولا.
وتابعه على ذلك عبد اللَّه بن عبد العزيز الماجشون، ومن طريقه رواه ابن حبان في صحيحه (5185)، والبيهقي. وكذلك يحيى بن عبد الرحمن بن أبي قتيلة، والضحاك بن مخلد الشياني عند البيهقي.
قال ابن حبان:"رفع هذا الخبر عن مالك أربعة أنفس: الماجشون، وأبو عاصم، ويحيى بن أبي قتيلة، وأشهب بن عبد العزيز".
ولم يذكر فيهم الضحاك بن مخلد، فصار العدد خمسا.
وقال:"وأرسله عن مالك سائر أصحابه، وهذه كانت عادة لمالك، يرفع في الأحايين الأخبار، ويوقفها مرارا، ويرسلها مرة، ويسندها أخرى على حسب نشاطه، فالحكم أبدا لمن رفع عنه، وأسند بعد أن يكون ثقة حافظا متقنا على السبيل الذي وصفناه في أول الكتاب". انتهى
قال ابن عبد البر في"التمهيد" (7/ 36):"هكذا روى هذا الحديث عن مالك أكثر الرواة للموطأ وغيره مرسلا إلا عبد الملك بن عبد العزيز الماجشون، وأبا عاصم النبيل، ويحيى بن إبراهيم بن داود بن أبي قتيلة المدني، وأبا يوسف القاضي، وسعيدا الزبيري، فإنهم رووه عن مالك بهذا الإسناد متصلا عن أبي هريرة مسندا".
وممن أسند هذا الحديث عن أبي هريرة أبو داود (3515) من حديث محمد بن إدريس الشافعي، عن ابن جريج، عن ابن شهاب الزهريّ، عن أبي سلمة أو سعيد بن المسيب، أو عنهما جميعا، عن أبي هريرة فذكر الحديث بطوله.
وأما ممن روى عن مالك مرسلا، فمنهم وكيع، عنه، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، وأبي سلمة قالا فذكر الحديث. ومن هذا الطريق رواه ابن أبي شيبة (7/ 171).
ومنهم يحيى عنه بإسناده، وهو الذي في موطئه في كتاب الشفعة (1)، وكذلك في موطأ القعنبي وغيره.
قال البيهقي:"رواه مالك في الموطأ مرسلا، وقد روي ذلك عنه من أوجه أخر موصولا بذكر أبي هريرة فيه".
قلت: وممن رواه أيضًا مرسلا: معمر عن الزهريّ، عن أبي سلمة. ومن طريقه رواه النسائي. ووصله مسلم بذكر جابر بن عبد اللَّه، كما مضى.
والخلاصة فيه أن الحكم لمن أسنده، كما قال ابن حبان.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবিভক্ত সম্পত্তিতে 'শুফআ' বা অগ্রক্রয়াধিকারের বিধান দিয়েছেন। কিন্তু যখন (সম্পত্তির) সীমা নির্ধারণ হয়ে যায়, তখন আর শুফআ থাকে না।
5378 - عن عمرو بن الشريد قال: وقفت على سعد بن أبي وقاص، فجاء المسور بن مخرمة، فوضع يده على إحدى منكبي إذ جاء أبو رافع مولى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا سعد، ابتع مني بيتيَّ في دارك، فقال سعد: واللَّه ما أبتاعهما. فقال المسور: واللَّه، لتبنا عنهما. فقال سعد: واللَّه لا أزيدك على أربعة آلاف منجمة أو مقطعة. قال أبو رافع: لقد أعطيت بها خمس مائة دينار، ولولا أني سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"الجار أحق بسقبه" ما أعطيتكها بأربعة آلاف، وأنا أعطى بها خمس مائة دينار، فأعطاها إياه.
صحيح: رواه البخاريّ في الشفعة (2258) عن المكي بن إبراهيم، أخبرنا ابن جريج، أخبرني إبراهيم بن ميسرة، عن عمرو بن الشريد قال فذكره.
قوله:"منجمة أو مقطعة" شك من الراوي، والمراد مؤجلة على أقسام معلومة.
আমর ইবন শারীদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে দাঁড়ালাম। তখন মিসওয়ার ইবন মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং তিনি আমার কাঁধের ওপর হাত রাখলেন। এমন সময় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর আযাদকৃত গোলাম আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং বললেন, হে সা'দ! তোমার বাড়িতে অবস্থিত আমার দুটি ঘর আমার কাছ থেকে কিনে নাও। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! আমি ঘর দুটি কিনব না। মিসওয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! তুমি ঘর দুটি কিনবেই। তখন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! আমি তোমাকে চার হাজার (মুদ্রার) বেশি দেব না, যা কিস্তি কিস্তি করে বা ভিন্ন ভিন্ন সময়ে পরিশোধ করা হবে। আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এর জন্য আমাকে পাঁচশত দীনার দেওয়ার প্রস্তাব দেওয়া হয়েছে। তবে আমি যদি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে না শুনতাম যে, "প্রতিবেশীই তার সম্পত্তির নিকটবর্তী অংশ পাওয়ার বেশি হকদার," তাহলে আমি তোমাকে চার হাজারে দিতাম না, অথচ আমাকে পাঁচশত দীনার দেওয়া হচ্ছে। এরপর তিনি (সা'দ) আবূ রাফি’কে তা কিনে দিলেন।
5379 - عن الشريد بن سويد قال: يا رسول اللَّه، أرض ليس فيها لأحد قسم، ولا شرك إلا الجوار؟ قال:"الجار أحق بسقبه".
حسن: رواه النسائي (4703)، وابن ماجه (2496)، وأحمد (19461) كلّهم من حديث حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن عمرو بن الشريد بن سويد، عن أبيه الشريد بن سويد فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، وقد اختلف على عمرو بن شعيب، وحسين المعلم ثقة، وروايته عنه صحيحة، وما يخالفه لا يعلله.
ثم عمرو بن شعيب أيضًا قد توبع، رواه أحمد (19469)، وابن الجارود في"المنتقى" (645)، وعبد الرزاق (14380) كلّهم من حديث عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن يعلى بن كعب الثقفي، عن عمرو بن الشريد، عن أبيه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الجار أحق بسقبه".
قال أبو نعيم كما عند ابن الجارود: قلت لعمرو: ما سقبه؟ قال: الشفعة. قلت: زعم النّاس أنه الجوار. قال: إن النّاس يقولون ذلك.
عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن يعلى تكلم في حفظه إلا أنه لا بأس به في المتابعات.
قال الترمذيّ (3/ 642):"حديث عبد اللَّه بن عبد الرحمن الطائفي، عن عمرو بن الشريد، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم في هذا الباب هو حديث حسن. وروى إبراهيم بن ميسرة عن عمرو بن الشريد عن أبي رافع عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: سمعت محمدا يقول: كلا الحديثين عندي صحيح". انتهى.
শারীদ ইবনু সুওয়াইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হে আল্লাহর রাসূল! (যদি এমন) কোনো ভূমি থাকে যা কারো মধ্যে বণ্টন করা হয়নি এবং যাতে কোনো অংশীদারিত্ব নেই, তবে কেবল প্রতিবেশীত্ব আছে (সেই ক্ষেত্রে কী বিধান)? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: প্রতিবেশীর জন্য তার নিকটবর্তী বস্তুর (শাফা’আর) অধিকার অধিক।
5380 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"جار الدار أحق بدار الجار أو الأرض".
صحيح: رواه أبو داود (3517)، والترمذي (1368)، وابن الجارود (644)، وأحمد (20088) كلّهم من طريق قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
وأما ما رواه سعيد، عن قتادة، عن أنس فهو وهم، كما أشار إليه الترمذيّ، ومن طريقه رواه ابن حبان (5182).
وقوله:"السقب" القرب. يقال بالسين والصاد جميعا.
قال الشافعي: قوله:"الجار أحق بسقبه" لا يحتمل إلا معنيين لا ثالث لهما:
إما أن يكون أراد أن الشفعة لكل جار، أو أراد بعض الجيران دون بعض، وقد ثبت عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه لا شفعة فيما قسم، فدل على أن الشفعة للجار الذي لم يقاسم دون الجار المقاسم".
وبه قال جمهور أهل العلم بأن الشفعة ليست لكل جار، بل للجار الذي لم يقاسم، وطريقهما واحد لرفع الضرر عن الجار القريب جمعا بين الأحاديث. وبه قال من الصحابة عمر بن الخطاب، وعثمان.
وبه قال أهل المدينة منهم يحيى بن سعيد الأنصاري، وربيعة بن أبي عبد الرحمن، ومالك. وبه قال الشافعي، وأحمد، وإسحاق.
فإن هؤلاء لا يرون الشفعة إلا للخليط، ولا يرون للجار شفعة إذا لم يكن خليطا.
وأما بمجرد الجوار فلا تثبت الشفعة عندهم، فالحديث العام مؤول، كما قال أهل المدينة، والشافعي، وغيرهم. وأخرج المحدثون هذا الحديث في كتبهم على هذا التأويل. أو أن المقصود من الحديث العام البر والإحسان إلى الجيران دون الشفعة، وإلا فيكون فيه تعطيل لمصالح النّاس في البيع والشراء.
وذهب الثوري، وابن المبارك، وأهل الكوفة إلى ظاهر الحديث، فقالوا بثبوت الشفعة للجار مستدلين بقوله:"جار الدار أحق بالدار"، و"الجار أحق بسقبه".
الحديث".
وقال:"وعبد الملك هو ثقة مأمون عند أهل الحديث، ولا نعلم أحدا تكلم فيه غير شعبة من أجل هذا الحديث.
وروي عن ابن المبارك، عن سفيان الثوري قال: عبد الملك بن أبي سليمان ميزان يعني في العلم". انتهى.
قال الشافعي:"سمعنا بعض أهل العلم بالحديث يقول: نخاف أن لا يكون هذا الحديث محفوظا".
وقال أحمد بن حنبل:"ليس العمل على هذا. لا شفعة إلا للخليط"."مسائل ابن هانئ" (2/ 26).
وقال البيهقي:"هذا حديث أنكره على عبد الملك: شعبة بن الحجاج، ويحيى بن سعيد القطّان، وأحمد بن حنبل، وسائر الحفاظ، حتى قال شعبة: لو روى عبد الملك بن أبي سليمان حديثا آخر مثل حديث الشفعة لتركت حديثه".
وقال الترمذيّ:"قلت لمحمد بن إسماعيل في هذا، فقال: تفرّد به عبد الملك، وروي عن جابر خلاف هذا".
وقد تأول بعض أهل العلم هذا الحديث بأنه المشاع؛ لأن الطريق إنما يكون واحدا على الحقيقة في المشاع دون المقسوم. وفي الحديث ما يدل على ذلك، وهو قوله:"إذا كان طريقهما واحدا".
وعلى هذا فلا يحتاج إلى تضعيف الحديث، وبالتالي لا منافاة بينه وبين رواية جابر المشهورة.
هذا اختيار ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 175)، وأطال الكلام في تصحيح الحديث.
وأما شفعة الغائب فقال الترمذيّ:"والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم أن الرجل أحق بشفعته، وإن كان غائبا، فإذا قدم فله الشفعة، وإن تطاول ذلك".
وقال ابن عبد البر:"وأما شفعة الغائب فإن أهل العلم مجمعون على أنه إذا لم يعلم ببيع الحصة التي هو فيها شريك من الدور والأرضين، ثم قدم، فعلم، فله الشفعة مع طول مدة غيبته"."الاستذكار" (21/ 276).
وأما ما روي عن ابن عمر مرفوعا:"الشفعة كحل العقال". فهو ضعيف. رواه ابن ماجه (2500)، والبيهقي (6/ 108) كلاهما من طريق محمد بن الحارث، عن محمد بن عبد الرحمن البيلماني، عن أبيه، عن ابن عمر فذكره. واللّفظ لابن ماجه.
وزاد البيهقي في أول الحديث:"لا شفعة لغائب، ولا صغير، ولا شريك على شريك إذا سبقه بالشراء". وفي لفظ:"الشفعة لا ترث، ولا تورث".
قال البيهقي:"محمد بن الحارث البصري متروك، ومحمد بن عبد الرحمن البيلماني ضعيف، ضعفها يحيى بن معين، وغيره من أئمة الحديث".
وقال:"وقد روي في معارضة الحديث الأول حديث ضعيف عن جابر مرفوعا:"الصبي على شفعته حتى يدرك". وكلاهما منكران".
وقال أبو زرعة:"هذا حديث منكر، ولم يقرأ علينا في كتاب الشفعة، وضربنا عليه".
وقد سئل عن حديث"لا شفعة لغائب، ولا صغير". فقال:"هذا حديث منكر، لا أعلم أحدا قال بهذا، الغائب له شفعة، والصغير حتى يكبر، فلم يقرأ علينا هذا الحديث"."العلل لابن أبي حاتم" (1/ 479).
قلت: وقد سبق نقل الإجماع على أن الشريك الغائب له شفعة.
সمرة ইবন জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘরের প্রতিবেশী প্রতিবেশীর ঘর বা ভূমির অধিক হকদার।"