হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5348)


5348 - عن عبد الله بن مسعود، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا اختلف البيعان، وليس بينهما بينة فهو ما يقول رب السلعة، أو يتتاركان".

حسن: رواه أبو داود (3511)، والنسائي (4652)، والحاكم (2/ 45)، والبيهقي (5/ 332) كلهم من طريق أبي عميس، عن عبد الرحمن بن قيس بن محمد بن الأشعث، عن أبيه، عن جده أن عبد الله بن مسعود باع للأشعث بن قيس رقيقا من رقيق الخمس بعشرين ألف درهم، فأرسل عبد الله في ثمنهم، فقال: إنما أخذتهم بعشرة آلاف، فقال عبد الله: إن شئت حدثتك بحديث سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، سمعته يقول. فذكر الحديث.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وقال البيهقي:"هذا إسناد حسن موصول، وقد روي من أوجه بأسانيد مراسيل، إذا جمع بينها صار الحديث بذلك قويا". ثم ذكر هذه المراسيل.

قال في"المعرفة" (8/ 140):"وأصح إسناد روي في هذا الباب رواية أبي العميس عن عبد الرحمن بن قيس بن محمد بن الأشعث، عن أبيه، عن جده". ثم ذكر بقية الإسناد.
قلت: ولكن فيه عبد الرحمن بن قيس لم يرو عنه إلا أبو عميس، ولذا قيل فيه إنه"مجهول". وقال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة.

وقد توبع متابعة قاصرة، رواه الترمذي (1270) عن قتيبة، حدثنا سفيان، عن ابن عجلان، عن عون بن عبد الله، عن ابن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا اختلف البيعان فالقول فول البائع، والمبتاع بالخيار".

قال الترمذي:"هذا حديث مرسل، عون بن عبد الله لم يدرك ابن مسعود".

قلت: وللحديث أسانيد أخرى ذكرتها في"المنة الكبرى" (5/ 150).

والخلاصة فيه أن حديث ابن مسعود لا يثبت بوجه من الوجوه، ولكن ضعفه ليس بشديد، فإن بعض طرقه يقوي البعض، ولذا يصح الاستدلال به؛ لأنه أولى من أقوال الرجال.

قال الخطابي في معالمه:"هذا الحديث قد اصطلح عليه الفقهاء على قبوله، وذلك يدل على أن له أصلا، وإن كان في إسناده مقالا، كما اصطلحوا على قبول:"لا وصية لوارث". وإسناده فيه ما فيه".

وقال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 75) بعد أن أخرجه من وجوه كثيرة هو وابن الجوزي:

"والذي يظهر أن حديث ابن مسعود في هذا الباب بمجموع طرقه له أصل، بل هو حديث حسن يحتج به، لكن في لفظه اختلاف، كما ترى".

وظاهر الحديث يدل على أن البائع والمشتري إذا اختلفا في أمر من الأمور المتعلقة بالعقد، فالقول قول البائع، أو يخير المشتري بين أخذ السلعة بالثمن الذي يقوله البائع وبين تركهـ. وأما الفقهاء فاختلفوا فيه اختلافا كثيرا، ذكرت ذلك بالتفصيل في"المنة الكبرى"، فراجعه.



رواه أبو داود (1641) -واللفظ له-، والترمذي (1218)، والنسائي (1412)، وابن ماجه (2198) كلهم من طريق الأخضر بن عجلان، عن أبي بكر الحنفي، عن أنس بن مالك فذكره، واختصره النسائي، ورواه الإمام أحمد (11968)، (12134) مختصرا ومطولا من هذا الوجه، وحسنه الترمذي.

وإسناده ضعيف؛ فيه أبو بكر وهو عبد الله الحنفي، نقل الحافظ ابن حجر في تهذيبه عن البخاري أنه قال:"لا يصح حديثه". وقال ابن القطان الفاسي في"الوهم والإيهام" (5/ 57): إن عبد الله الحنفي لا أعرف أحدا نقل عدالته فهي لم تثبت. وأما تحسين الترمذي له فباعتبار اختلافهم في قبول رواية المساتير، والحنفي المذكور منهم، وقد روت عنه جماعة ليسوا من مشاهير أهل العلم. انتهى مختصرا.

وأما بيع المزايدة فقال الترمذي:"العمل على هذا عند بعض أهل العلم لم يروا بأسا ببيع من يزيد في الغنائم والمواريث". وسيأتي ذكر بعض الأحاديث في"الميراث".



ذهبوا إلى أنه منقطع.

وفي الحديث علة أخرى، وهي أن عبيد الله بن حميد مجهول. سئل عنه ابن معين، فقال:"لا أعرفه". ذكره ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (5/ 311). وأما ابن حبان فذكره في الثقات (7/ 144) على قاعدته في توثيق المجاهيل.

وقال بظاهر الحديث أحمد بن حنبل، وإسحاق. وأما أكثر الفقهاء فقالوا: إن ملكها لم يزل عن صاحبها بالعجز عنها، وسبيلها سبيل اللقطة، فإذا جاء ربها وجب على واجدها رد ذلك عليه. أفاده الخطابي.

وقوله:"حسيرا" هو الدابة العاجزة عن المشي.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: যখন বিক্রেতা ও ক্রেতা (মূল্য নির্ধারণে) মতবিরোধ করে এবং তাদের কারো কাছেই কোনো সুস্পষ্ট প্রমাণ (দলিল) না থাকে, তখন পণ্যের মালিক (বিক্রেতা) যা বলে তাই গণ্য হবে, অথবা তারা উভয়ে (ক্রয়-বিক্রয়) বাতিল করে দেবে।









আল-জামি` আল-কামিল (5349)


5349 - عن عائشة أن هند بنت عتبة قالت: يا رسول الله، إن أبا سفيان رجل شحيح، وليس يعطيني ما يكفيني وولدي إلا ما أخذت منه، وهو لا يعلم. فقال:"خذي ما يكفيك وولدك بالمعروف".

متفق عليه: رواه البخاري في النفقات (5364)، ومسلم في الأقضية (1714) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হিন্দ বিনত উতবা বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! নিশ্চয় আবু সুফিয়ান একজন কৃপণ লোক, তিনি আমাকে ও আমার সন্তানকে যথেষ্ট হয় এমন পরিমাণ (খরচ) দেন না, তবে যা আমি তার অগোচরে তার থেকে নিয়ে থাকি। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি তোমার ও তোমার সন্তানের জন্য যথেষ্ট পরিমাণ সঙ্গতভাবে (প্রচলিত প্রথা অনুযায়ী) নাও।









আল-জামি` আল-কামিল (5350)


5350 - عن سمرة بن جندب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أيما امرأة زوجها وليان فهي للأول منهما. ومن باع بيعا من رجلين فهو للأول منهما".

صحيح: رواه الترمذي (1110) عن قتيبة، حدثنا غندر، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب. فذكره.

قال الترمذي:"حديث حسن".

قلت: وهو كما قال؛ فإن فيه سعيد بن أبي عروبة مختلط، ولم يظهر لي متي روي عنه محمد بن جعفر، وهو المعروف بغندر، لكنه توبع.

ومن هذا الوجه رواه أيضا أحمد (20085) إلا أن قال فيه: عن عقبة أو سمرة. الشك من سعيد بن أبي عروبة، فلعله رواه في حالة اختلاطه.

وكذلك رواه ابن ماجه (2190) من حديث خالد بن الحارث عن سعيد بالشك.

والصحيح أنه من حديث سمرة بن جندب، فقد رواه جماعة عن سعيد بن أبي عروبة بدون شك، منهم عبد الوهاب بن عطاء، ومن طريقه رواه الحاكم (2/ 175)، وعنه البيهقي (7/ 140)،
وقد اختلف عليه أيضا، فرواه يحيى بن أبي طالب هكذا بدون شك. ورواه محمد بن إسحاق، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء عنه بالشك، ومن هذا الوجه رواه البيهقي.

وممن رواه أيضا بالشك أبو عاصم، عن سعيد بن أبي عروبة عند البيهقي.

وقال:"هذا الاختلاف وقع من ابن أبي عروبة في إسناد هذا الحديث، وقد تابعه أبان العطار عن قتادة في قوله: عن عقبة بن عامر. والصحيح رواية من رواه عن سمرة بن جندب". انتهى.

قلت: هكذا جاء الحديث من غير سعيد بن أبي عروبة، منهم هشام، وهمام، وحماد كلهم عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب، وهؤلاء روايتهم عند أبي داود.

وكذلك رواه ابن ماجه (2191) من حديث وكيع، عن سعيد بن بشر، عن قتادة. وإسناده صحيح، وقد صحّحه أبو زرعة، وأبو حاتم.

قال الحافظ في التلخيص:"وصحته متوقفة على ثبوت سماع الحسن من سمرة؛ فإن رجاله ثقات".

قلت: هؤلاء وغيرهم أثبتوا سماع الحسن من سمرة مطلقا. وهو الذي أقول به، كما ذكرته مرارا.




সمرة ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো নারীকে যদি দুই অভিভাবক বিবাহ পড়িয়ে দেয়, তবে সে তাদের মধ্যে প্রথমজনের জন্য (বিবাহিতা হবে)। আর যে ব্যক্তি দুই ব্যক্তির কাছে কোনো জিনিস বিক্রি করে, তবে সে তাদের মধ্যে প্রথমজনের জন্য (বিক্রি সম্পন্ন হবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5351)


5351 - عن أبي بكر -في قصة الهجرة- أنه رضي الله عنه مرَّ على راعي غنم يسوق غنمه إلى الصخرة، فسأله: لمن أنت يا غلام؟ قال: لرجل من قريش سماه، فعرفه، فقال: هل في غنمك لبن؟ قال: نعم. فقال: هل أنت حالب لنا؟ قال: نعم. فحلب له، فأتي به رسول الله صلى الله عليه وسلم، فشرب منه.

صحيح: رواه البخاري في الفضائل (3652) عن عبد الله بن رجاء، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن البراء، عن أبي بكر في أثناء قصة الهجرة.




আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—হিজরতের ঘটনার সময় তিনি এক মেষপালকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে তার মেষগুলো একটি পাথরের দিকে হাঁকিয়ে নিয়ে যাচ্ছিল। তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন, "হে বালক, তুমি কার লোক?" সে বলল, কুরাইশের এক ব্যক্তির, যার নাম সে উল্লেখ করল। আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে চিনতে পারলেন। এরপর তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "তোমার মেষগুলোর মধ্যে কি দুধ আছে?" সে বলল, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "তুমি কি আমাদের জন্য দুধ দোহন করে দেবে?" সে বলল, "হ্যাঁ।" অতঃপর সে তার জন্য দুধ দোহন করল। সেই দুধ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আনা হলো, আর তিনি তা পান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5352)


5352 - عن سمرة بن جندب أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أتي أحدكم على ماشية، فإن كان فيها صاحبها فليستأذنه، فإن أذن له فليحتلب وليشرب. وإن لم يكن فيها أحد فليصوت ثلاثا فإن أجابه أحد فليستأذنه، فإن لم يجبه أحد فليحتلب وليشرب، ولا يحمل".

صحيح: رواه أبو داود (2619)، والترمذي (1296) كلاهما من حديث عبد الأعلى، عن سعيد، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب. فذكره.

قال الترمذي:"حديث سمرة حديث حسن غريب. والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، وبه يقول أحمد، وإسحاق". وفي بعض النسخ: حسن صحيح غريب.

قلت: وسماع الحسن من سمرة صحيح، كما قال علي بن المديني، وغيره.




সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ কোনো পশুর পালের পাশ দিয়ে যায়, যদি সেখানে তার মালিক উপস্থিত থাকে, তবে সে যেন তার কাছে অনুমতি চায়। যদি সে তাকে অনুমতি দেয়, তবে সে যেন দুধ দোহন করে এবং পান করে। আর যদি সেখানে কেউ না থাকে, তবে সে যেন তিনবার উচ্চস্বরে ডাকে। যদি কেউ তার ডাকে সাড়া দেয়, তবে সে যেন তার কাছে অনুমতি চায়। আর যদি কেউ সাড়া না দেয়, তবে সে যেন দুধ দোহন করে এবং পান করে, কিন্তু সে যেন (সাথে) নিয়ে না যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5353)


5353 - عن عباد بن شرحبيل قال: أصابني سنة، فدخلت حائطا من حيطان المدينة،
ففركت سنبلا، فأكلت، وحملت في ثوبي، فجاء صاحبه، فضربني، وأخذ ثوبي، فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له:"ما علمت إذ كان جاهلا، ولا أطعمت إذ كان جائعا أو قال: ساغبا". وأمره فرد على ثوبي، وأعطاني وسقا، أو نصف وسق من طعام.

صحيح: رواه أبو داود (2630)، والنسائي (5409)، وابن ماجه (2298)، وأحمد (17521)، وصحّحه الحاكم (4/ 133) كلهم من طريق أبي بشر جعفر بن إياس أبي وحشية قال: سمعت عباد بن شرحبيل. فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله:"ساغبا" أي جائعا.




আব্বাদ ইবনে শুরাহবীল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার উপর একবার দুর্ভিক্ষ আপতিত হলো। তখন আমি মদীনার একটি বাগানে প্রবেশ করলাম। আমি কয়েকটি শীষ ডলে (দানা বের করে) খেলাম এবং কিছু আমার কাপড়ে ভরে নিলাম। এরপর তার মালিক এসে আমাকে মারলো এবং আমার কাপড়টি কেড়ে নিল। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। তিনি (মালিককে) বললেন: "তুমি তো তাকে শিক্ষা দাওনি যখন সে অজ্ঞ ছিল, আর না তাকে খাইয়েছো যখন সে ক্ষুধার্ত ছিল, কিংবা (রাবী বললেন:) যখন সে সাগিব (ক্ষুধার্ত) ছিল।" এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নির্দেশ দিলেন, ফলে সে আমার কাপড়টি ফিরিয়ে দিল এবং আমাকে এক ওয়াসাক কিংবা অর্ধ ওয়াসাক খাবার দিল।









আল-জামি` আল-কামিল (5354)


5354 - عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أتيت على راع فناد ثلاث مرات، فإن أجابك وإلا فاشرب في غير أن تفسد، وإذا أتيت على حائط بستان فناد صاحب البستان ثلاث مرات، فإن أجابك وإلا فكل في أن لا تفسد".

صحيح: رواه ابن ماجه (2300) -واللفظ له-، وأحمد (11159)، وصحّحه ابن حبان (5281)، والحاكم (4/ 132) كلهم من طريق يزيد بن هارون قال: أنبأنا الجريري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد فذكره. وزادوا:"الضيافة ثلاثة أيام، فما زاد فهو صدقة".

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كما قال إلا أن الجريري وهو سعيد بن إياس اختلط في أخرة. ويزيد بن هارون روى عنه في حالة اختلاطه، وتابعه حماد بن سلمة، وهو روى عنه قبل اختلاطه، ومن طريقه رواه أحمد (11045) عن مؤمل بن إسماعيل، عنه، عن الجريري بإسناده نحوه.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন তুমি কোনো রাখালের কাছে যাও, তখন তাকে তিনবার ডাকো। যদি সে জবাব দেয় (তবে ভালো), অন্যথায় তুমি পান করো, তবে কোনো ক্ষতি না করে। আর যখন তুমি কোনো বাগান বা ফলবাগানের দেওয়ালের কাছে যাও, তখন বাগানের মালিককে তিনবার ডাকো। যদি সে জবাব দেয়, অন্যথায় তুমি খাও, তবে কোনো ক্ষতি না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (5355)


5355 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن التمر المعلق، فقال:"من أصاب منه من ذي حاجة غير متخذ خبنة فلا شيء عليه".

حسن: رواه أبو داود (1710)، والنسائي (4958)، والترمذي (1289) كلهم عن قتيبة، حدثنا الليث، عن ابن عجلان، عن عمرو بن شعيب بإسناده. واللفظ للترمذي.

قال الترمذي:"حديث حسن".

قلت: وهو كما قال؛ فإن عمرو بن شعيب حسن الحديث.

قال الترمذي عقب حديث سمرة بن جندب:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، وبه يقول أحمد، وإسحاق".

وذلك لغير المضطر. وأما المضطر فلا خلاف بين أهل العلم أنه يجوز له أن يحلب بغير إذن صاحبه. واختلفوا هل عليه ضمان، أم لا؟ .

وفي الباب ما روي عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من دخل حائطا فليأكل، ولا يتخذ خبنة".
رواه الترمذي (1278)، وابن ماجه (2301) كلاهما عن يحيى بن سُليم الطائفي، عن عبيد الله ابن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ويحيى بن سليم الطائفي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إلا في روايته عن عبيد الله بن عمر، فإنه أخطأ فيه، كما قال الساجي، وقال النسائي: هو منكر الحديث عن عبيد الله بن عمر. ولذا غرَّبه الترمذي، وقال: لا نعرفه من هذا الوجه إلا من حديث يحيي بن سليم.

وقال في"العلل الكبير" (1/ 516):"سألت محمدا عن هذا الحديث، فقال: يحيى بن سليم يروي أحاديث عن عبيد الله بهم فيها. كأنه لم يعرف هذا الحديث إلا من حديث يحيي بن سليم".

وقوله:"خبنة" أي لا يجعل شيئا في ثوبه.

وفي الباب روي أيضا عن رافع بن عمرو قال: كنت أرمي نخل الأنصار، فأخذوني، فذهبوا بي إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"يا رافع، لم ترمي نخلهم؟". قال: قلت: يا رسول الله، الجوع. قال:"لا ترم، وكل ما وقع، أشبعك الله وأرواك".

رواه الترمذي (1288)، والحاكم (3/ 444) كلاهما من حديث الفضل بن موسى، عن صالح ابن أبي جبير، عن أبيه، عن رافع بن عمرو فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب".

وصالح بن أبي جبير وأبوه لم يوثّقهما غير ابن حبان، وجهلهما الآخرون.

قال الترمذي:"سألت محمدا عن هذا الحديث، فقال: لا أعرف هذا إلا من حديث الفضل ابن موسي. وصالح بن أبي جبير لا أعرف اسم أبيه". (العلل 1/ 517).

قلت: وله إسناد آخر، وهو ما رواه أبو داود (2622)، وابن ماجه (2299)، وأحمد (20343)، والحاكم كلهم من حديث معتمر بن سليمان قال: سمعت ابن أبي الحكم الغفاري قال: حدثتني جدتي، عن عم أبيها رافع بن عمرو فذكر نحوه. وزادوا: ومسح رأسي، وقال:"اللَّهم اشبع بطنه". وفيه ابن أبي الحكم وجدته لا يعرفان.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে গাছে ঝুলে থাকা খেজুর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "যে অভাবগ্রস্ত ব্যক্তি নিজের প্রয়োজনমতো এর থেকে গ্রহণ করে এবং (কাপড়ের) আঁচলে লুকিয়ে বা থলে বানিয়ে নিয়ে যায় না, তার উপর কোনো পাপ নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (5356)


5356 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحتلبن أحد ماشية أحد بغير إذنه، أيحب أحدكم أن تؤتي مشربته فتكسر خزانته، فينتقل طعامه، وإنما تخزن لهم ضروع مواشيهم أطعمتهم، فلا يحتلبن أحد ماشية أحد إلا بإذنه".

متفق عليه: رواه مالك في الاستئذان (17) عن نافع، عن عبد الله بن عمر قال: فذكره.

ورواه البخاري في اللقطة (2435)، ومسلم في اللقطة (1726) كلاهما من حديث مالك به مثله.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কেউ যেন কারো অনুমতি ছাড়া অন্যের গৃহপালিত পশুর দুধ দোহন না করে। তোমাদের কেউ কি এটা পছন্দ করে যে, তার ভাণ্ডার কক্ষে প্রবেশ করে তার সিন্দুক ভেঙে দেওয়া হবে এবং তার খাদ্যসামগ্রী নিয়ে যাওয়া হবে? নিশ্চয় তাদের গৃহপালিত পশুর স্তনগুলো তাদের জন্য খাদ্য সঞ্চয় করে রাখে। অতএব, কেউ যেন কারো গৃহপালিত পশুর দুধ তার অনুমতি ছাড়া দোহন না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (5357)


5357 - عن أم هانئ، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لها:"اتخذي غنما؛ فإن فيها بركة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2304)، وأحمد (23781) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه عروة بن الزبير، عن أم هانئ فذكرته، وإسناده صحيح.

قال الدارقطني في"العلل" (15/ 368):"والصحيح قول من قال: عن هشام، عن أبيه، عن أم هانئ".

وهو يشير إلى رواية من رواه عن هشام، عن أبيه، عن عائشة. وكذا من رواه عن هشام، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء إلى أم هانئ، فقال لها ذلك. فيكون مرسلا؛ لأن عروة لم يحضر القصة.

وللحديث إسناد آخر: رواه الإمام أحمد (26902) عن إبراهيم بن خالد قال: حدثني رباح، عن معمر، عن أبي عثمان الجحشي، عن موسى -أو فلان- بن عبد الرحمن بن أبي ربيعة، عن أم هانئ قال لها النبي صلى الله عليه وسلم:"اتخذي غنما يا أم هانئ؛ فإنها تروح بخير، وتغدو بخير".

إلا أن فيه مجاهيل، وكذا أعله أيضا الهيثمي في"المجمع" (4/ 66).




উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: "তোমরা ভেড়া/ছাগল পালন করো; কেননা এর মধ্যে বরকত রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5358)


5358 - عن عروة البارقي يرفعه قال:"الإبل عز لأهلها، والغنم بركة، والخير معقود في نواصي الخيل إلى يوم القيامة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2305) عن محمد بن عبد الله بن نمير قال: حدثنا عبد الله بن إدريس، عن حصين، عن عامر، عن عروة البارقي فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أيضا ابن أبي عاصم في"الآحاد والمثاني" (4/ 362)، والطبراني في"الكبير" (17/ 156) كلاهما من وجه آخر، عن عبد الله بن إدريس به مثله.

وعبد الله بن إدريس هو الأودي أبو محمد الكوفي ثقة ضابط.

ولكن رواه مسلم (1872: 99) عنه بدون زيادة الإبل والغنم، فلعله كان يحدث مرة بحديث الفرس وحده، وأخرى بزيادة الإبل والغنم، وكلاهما صحيح.

قال ابن مفلح في"الآداب الشرعية" (2/ 417): ولابن ماجه بإسناد جيد من حديث عروة البارقي"الإبل عز لأهلها، والغنم بركة، والخير معقود في نواصي الخيل إلى يوم القيامة". أخرجه بتمامه ابن ماجه، وأبو يعلى، وإسناده صحيح، ورواه البرقاني على شرط الصحيحين. اهـ.

وأما ما روي عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الشاة من دواب الجنة" فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (2306) عن عصمة بن الفضل النيسابوري ومحمد بن فراس أبي هريرة الصيرفي قالا: حدثنا حرمي بن عمارة قال: حدثنا زربي إمام مسجد هشام بن حسان قال: حدثنا محمد بن سيرين، عن ابن عمر فذكره.
وزربي -بفتح الزاي، وسكون الراء- هو ابن عبد الله الأزدي مولاهم أبو يحيي البصري ضعيف. قال البخاري:"فيه نظر". وقال الترمذي:"له أحاديث مناكير".

قلت: وهذا منها؛ فإنه لم يعرف هذا الحديث عن محمد بن سيرين إلا من طريقه.




উরওয়াহ আল-বারিকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উট তার মালিকের জন্য ইজ্জত, আর ছাগল হলো বরকত; এবং কিয়ামত পর্যন্ত ঘোড়ার কপালে কল্যাণ (মঙ্গল) বাঁধা রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (5359)


5359 - عن عائشة قالت: كان على رسول الله صلى الله عليه وسلم ثوبان قطريان غليظان، فكان إذا قعد فعرق ثقلا عليه، فقدم بَزٌّ من الشام لفلان اليهودي، فقلت: لو بعثت إليه، فاشتريت منه ثوبين إلى الميسرة، فأرسل إليه، فقال: قد علمت ما يريد، إنما يريد أن يذهب بمالي أو بدراهمي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كذب، قد علم أني من أتقاهم الله وآداهم للأمانة".

صحيح: رواه الترمذي (1213)، والنسائي (4628)، وصحّحه الحاكم (2/ 23 - 24)، كلهم من حديث يزيد بن زريع، عن عمارة بن أبي حفصة، عن عكرمة، عن عائشة فذكرته.

قال الترمذي:"حسن غريب صحيح".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري".

قال الترمذي، والحاكم:"وقد رواه شعبة أيضا عن عمارة بن أبي حفصة".

قلت: ومن طريق شعبة رواه الإمام أحمد (25141)، والحاكم مثله.

قال الترمذي:"وسمعت محمد بن فراس البصري يقول: سمعت أبا داود يقول: سئل شعبة يوما عن هذا الحديث، فقال: لست أحدثكم حتى تقوموا إلى حرمي بن عمارة بن أبي حفصة، فتقبلوا رأسه. قال: وحرمي في القوم".

قال الترمذي:"أي إعجابا بهذا الحديث".

وقوله:"إلى الميسرة" أي أجل معلوم، يكون فيه يسر، وإلا فجهالة الأجل مفسدة للبيع.

وفي معناه ما روي عن أنس بن مالك قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى حليق النصراني ليبعث إليه بأثواب إلى الميسرة، فأتيته، فقلت: بعثني إليك رسول الله صلى الله عليه وسلم لتبعث إليه بأثواب إلى الميسرة، فقال: وما الميسرة؟ ومتى الميسرة؟ والله ما لمحمد تاغية، ولا راغية، فرجعت، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فلما رآني قال:"كذب عدو الله، أنا خير من بايع، لأن يلبس أحدكم ثوبا من رقاع شتي خير له من أن يأخذ بأمانته -أو في أمانته- ما ليس عنده".

رواه أحمد (13559) عن محمد بن يزيد، حدثنا أبو سلمة صاحب الطعام قال: أخبرني جابر ابن يزيد -وليس بجابر الجعفي- عن الربيع بن أنس، عن أنس فذكره. وأبو سلمة، وجابر بن يزيد مجهولان.
وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 125):"جابر بن يزيد لم أجد من ترجمه".

ورواه البزار -كشف الأستار (1305) - من وجه آخر، وفيه أسيد بن زيد ضعيف.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিধানে দুটি মোটা কাতরি (ইয়েমেনের এক প্রকার কাপড়) চাদর ছিল। তিনি বসলে এবং ঘামলে চাদর দুটি তাঁর উপর ভারী লাগত। অতঃপর জনৈক ইহুদীর জন্য সিরিয়া থেকে কিছু কাপড় (বা পণ্যদ্রব্য) আগমন করল। আমি বললাম, যদি আপনি তার কাছে লোক পাঠান এবং সহজলভ্য হওয়া পর্যন্ত (বা নির্দিষ্ট সময় পর্যন্ত) তার কাছ থেকে দুটি কাপড় কিনে নেন। অতঃপর তিনি তার কাছে লোক পাঠালেন। সে (ইহুদীর লোক) বলল: আমি জানি, তিনি কী চান। তিনি কেবল আমার সম্পদ বা আমার দিরহামগুলো নিয়ে যেতে চান। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে মিথ্যা বলেছে। সে অবশ্যই জানে যে আমি আল্লাহকে তাদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি ভয় করি এবং আমানত রক্ষায় তাদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি বিশ্বস্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (5360)


5360 - عن أنس بن مالك قال: كان بالمدينة فزع، فاستعار النبي صلى الله عليه وسلم فرسا من أبي طلحة يقال له: المندوب، فركب، فلما رجع قال:"ما رأينا من شيء، وإن وجدناه لبحرا".

متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2627)، ومسلم في الرؤيا (2307) كلاهما من حديث شعبة، عن قتادة قال: سمعت أنسا يقول فذكره.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মদীনায় একবার আতঙ্কের সৃষ্টি হলো। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে 'আল-মানদূব' নামক একটি ঘোড়া ধার নিলেন এবং তাতে আরোহণ করলেন। অতঃপর যখন তিনি ফিরে আসলেন, তখন বললেন: "আমরা (ভয় পাওয়ার মতো) কিছুই দেখিনি, বরং আমরা তো এই ঘোড়াকে সাগরের মতো (দ্রুতগামী) পেয়েছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (5361)


5361 - عن أنس بن مالك قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"العارية مؤداة، والمنحة مردودة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2399) عن هشام بن عمار وعبد الرحمن بن إبراهيم الدمشقيان قالا: حدثنا محمد بن شعيب، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده صحيح.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ধার অবশ্যই পরিশোধযোগ্য এবং (নির্দিষ্ট সময়ের জন্য) দানস্বরূপ দেওয়া বস্তু ফেরতযোগ্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (5362)


5362 - عن أبي أمامة يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"العارية مؤداة، والمنحة مردودة".

حسن: رواه ابن ماجه (2398)، والترمذي (1265)، وأبو داود (3565)، وأحمد (22294) كلهم من حديث إسماعيل بن عباس قال: حدثني شرحبيل بن مسلم قال: سمعت أبا أمامة فذكره. واللفظ لابن ماجه.

ولفظ أبي داود"إن الله عز وجل قد أعطى كل ذي حق حقه، فلا وصية لوارث، ولا تنفق المرأة شيئا من بيتها إلا بإذن زوجها" فقيل: يا رسول الله، ولا الطعام؟ قال:"ذاك أفضل أموالنا" ثم قال:"العارية مؤداة، والمنحة مردودة، والدين مقضي، والزعيم غارم".

وقال الترمذي:"حسن غريب".

قلت: وهو كما قال؛ فإن إسماعيل بن عياش حسن في روايته عن أهل بلده الشاميين، وهذا منها، وفي غيرهم مخلط.

قال الترمذي:"وقد روي عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أيضا من غير هذا الوجه". وهو يقصد به الحديث المطول الذي روي من أوجه كثيرة، يأتي ذكر أجزائها المتفرقة في مواضعها.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ধার পরিশোধযোগ্য এবং সাময়িক দান (উপহার) অবশ্যই ফেরত দিতে হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5363)


5363 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"على اليد ما أخذت حتى تؤدي".

صحيح: رواه أبو داود (3561)، والترمذي (1266)، وابن ماجه (2400)، والحاكم (2/
47)، والبيهقي (6/ 90)، والقضاعي في مسند الشهاب (1/ 189) كلهم من حديث الحسن، عن سمرة فذكره. زاد البعض: ثم إن الحسن نسي، فقال: هو أمينك، لا ضمان عليه.

قال الترمذي:"حسن صحيح". وقال الحاكم:"صحيح الإسناد على شرط البخاري".

قلت: وهو كما قال؛ فإن الحسن ثبت سماعه من سمرة مطلقا، كما ذكرت في عدة مواضع. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (5/ 370 - 371).




সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: হাত যা গ্রহণ করে, তা ফিরিয়ে না দেওয়া পর্যন্ত তার উপরই এর দায়িত্ব থাকে।









আল-জামি` আল-কামিল (5364)


5364 - عن يعلى بن أمية قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أتتك رسلي فأعطهم ثلاثين درعا، وثلاثين بعيرا". قال: فقلت: يا رسول الله، أعارية مضمونة، أو عارية مؤداة؟ قال:" بل عارية مؤداة".

صحيح: رواه أبو داود (3566)، وأحمد (17950)، والدارقطني (3/ 39)، وصحّحه ابن حبان (4720) كلهم من حديث همام، عن قتادة، عن عطاء، عن صفوان بن يعلى بن أمية، عن أبيه فذكره. وإسناده صحيح. وهمام هو ابن يحيى بن دينار العوذي.

وفي الحديث دليل على أن العارية مؤداة ما دامت بقيت عينها. وهذا لا خلاف فيه بين أهل العلم.

وإنما الخلاف في تضمين العارية، فمن أخذ بهذه الأحاديث قال: لا ضمان في العارية، وإنما مؤداة. وهو رأي أبي حنيفة، وأصحابه، وإليه ذهب من الصحابة علي وابن مسعود.

ومن قال بضمان العارية فسر الحديث بأن العارية تكون مؤداة في حال قيام عينها، وقيمتها عند التلف. واستدلوا أيضا بحديث جابر بن عبد الله الآتي وغيره. وهو رأي الجمهور، منهم مالك، والشافعي، وأحمد. وبه قال من الصحابة ابن عباس، وأبو هريرة. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (5/ 372 - 373).




ইয়া'লা ইবনু উমাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "যখন আমার দূতগণ তোমার কাছে আসবে, তখন তাদের ত্রিশটি বর্ম এবং ত্রিশটি উট দেবে।" তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম: "হে আল্লাহর রাসূল! এটি কি ক্ষতিপূরণযোগ্য ধার, নাকি ফেরতযোগ্য ধার?" তিনি বললেন: "বরং এটি ফেরতযোগ্য ধার।"









আল-জামি` আল-কামিল (5365)


5365 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سار إلى حنين. فذكر الحديث. وفيه: ثم بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى صفوان بن أمية فسأله أدرعا عنده مائة درع وما يصلحها من عدتها. فقال: أغصبا يا محمد؟ فقال:"بل عارية مضمونة حتى نُؤديها عليك".

حسن: رواه الحاكم (3/ 48 - 49)، وعنه البيهقي (6/ 89) من طريق ابن إسحاق قال: حدثني عاصم بن عمر بن قتادة، عن عبد الرحمن بن جابر، عن أبيه جابر بن عبد الله فذكره.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرّح بالتحديث.

ورواه أبو داود (3562) من طرق عن يزيد بن هارون، حدثنا شريك، عن عبد العزيز بن رفيع،
عن أمية بن صفوان بن أمية، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم استعار منه أدراعا يوم حنين، فقال: أغصب يا محمد؟ فقال:"لا بل عارية مضمونة".

وفيه أمية بن صفوان لا يعرف، ولم يذكر عنه ابن حجر في تهذيبه شيئا غير أنه روى عنه اثنان. وقال في التقريب:"مقبول". أي عند المتابعة. وقد توبع.

وشريك هو ابن عبد الله القاضي سيء الحفظ، ومن طريقه رواه أحمد (15302)، والدارقطني (3/ 39)، والحاكم (2/ 47)، وعنه البيهقي (6/ 89).

وسكت عليه الحاكم إلا أن شريكا توبع أيضا. رواه أبو داود (3563) من حديث جرير، عن عبد العزيز بن رفيع، عن أناس من آل عبد الله بن صفوان أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يا صفوان، هل عندك من سلاح؟" قال: عارية أم غصبا؟ قال:"لا، بل عارية" فأعاره ما بين الثلاثين إلى الأربعين درعا، وغزا رسول الله صلى الله عليه وسلم حنينا، فلما هزم المشركون جمعت دروع صفوان، ففقد منها أدراعا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لصفوان:"إنا قد فقدنا من أدراعك أدراعا، فهل نغرم لك؟" قال: لا يا رسول الله؛ لأن في قلبي اليوم ما لم يكن يومئذ. وفيه أناس مجهولون.

وله متابع آخر: وهو ما رواه أيضا أبو داود (3564) من طريق أبي الأحوص، حدثنا عبد العزيز ابن رفيع، عن عطاء، عن أناس من آل صفوان قال: استعار النبي صلى الله عليه وسلم. فذكر معناه.

وفيه أيضا أناس مجهولون.

وله إسناد آخر: وهو ما رواه البيهقي (6/ 89 - 90) من حديث ابن وهب قال: أخبرني أنس بن عياض الليثي، عن جعفر بن محمد، عن أبيه أن صفوان بن أمية أعار رسول الله صلى الله عليه وسلم سلاحا، هي ثمانون درعا. فذكر الحديث.

قال البيهقي:"بعض هذه الأخبار وإن كان مرسلا فإنه يقوي بشواهده مع ما تقدم من الموصول". وهو يقصد به حديث جابر.

وله شاهد أيضا عن ابن عباس، رواه الدارقطني، والحاكم، وعنه البيهقي، ولكن فيه إسحاق ابن عبد الله متروك الحديث.

وله شاهد آخر عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. وهو ضعيف أيضا. انظر تخريجه في"المنة الكبرى" (5/ 371).

وأما البخاري -رحمه الله تعالى- فلعله يرى أن فيه اضطرابا إذ أنه ذكر الأسانيد المختلفة، ولم يرجح كعادته. انظر"التاريخ الكبير" (2/ 8).




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইন অভিমুখে যাত্রা করেন। তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেন। তাতে আছে: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফওয়ান ইবনু উমাইয়্যার নিকট লোক পাঠান এবং তার কাছে থাকা একশত বর্ম এবং এর জন্য প্রয়োজনীয় অন্যান্য সরঞ্জামাদি চাইলেন। তখন সে বলল: হে মুহাম্মাদ, এটা কি জবরদখল (বলপূর্বক গ্রহণ)? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং এটি হলো জামিনসহ ধার (আরিয়্যাহ মাযমূনা), যা আমরা তোমাকে ফেরত না দেওয়া পর্যন্ত তোমার কাছে গচ্ছিত থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5366)


5366 - عن عمرو بن تغلب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن من أشراط الساعة أن
يفشو المال ويكثر، وتفشو التجارة، ويظهر العلم، ويبيع الرجل البيع، فيقول: لا حتى أستأمر تاجر بني فلان، ويلتمس في الحي العظيم الكاتب فلا يوجد".

صحيح: رواه النسائي (4456)، والحاكم (2/ 7)، والخطابي في"غريب الحديث" (1/ 405) كلهم من حديث وهب بن جرير قال: حدثني أبي، عن يونس، عن الحسن، عن عمرو بن تغلب فذكره. واللفظ للنسائي.

واقتصر الحاكم على قوله:"وتفشو التجارة". وأما الخطابي فجعل قوله:"ويبيع الرجل البيع" إلى آخره من قول عمرو بن تغلب. وإسناده صحيح.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وإسناده على شرطهما صحيح إلا أن عمرو بن تغلب ليس له راو غير الحسن".

ولكن قال ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (3/ 222) في ترجمة عمرو بن تغلب:"له صحبة، روى عنه الحسن البصري، والحكم بن الأعرج".

وقد جاء التصريح بالتحديث في حديث قتال الترك في صحيح البخاري (2927)، ومسند أحمد (20674)، وذلك أيضا من أشراط الساعة. فكأن عمرو بن تغلب يروي حديثين من أشراط الساعة سمعهما الحسن منه، وتصرف بعض الرواة في صيغة الأداء.

وللحسن في مسند أحمد أحاديث أخرى عن عمرو بن تغلب، صرح فيها بالتحديث منه. (انظر 20672 - 20673).




আমর ইবনে তাগলিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কিয়ামতের নিদর্শনাবলির মধ্যে অন্যতম হলো, সম্পদ প্রচুর পরিমাণে ছড়িয়ে পড়বে ও বৃদ্ধি পাবে, ব্যবসা-বাণিজ্য ব্যাপক হবে, এবং জ্ঞান (দীনী জ্ঞান) প্রকাশ পাবে। আর কোনো ব্যক্তি কিছু বিক্রি করলে সে বলবে: না (আমি এখন বিক্রি করব না), যতক্ষণ না আমি অমুক গোত্রের ব্যবসায়ীর সাথে পরামর্শ করি। আর বড় জনবসতিতে লিপিকারকে (লেখক/মুহুরি) খোঁজা হবে কিন্তু তাকে পাওয়া যাবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (5367)


5367 - عن طارق بن شهاب قال: كنا عند عبد الله جلوسا، فجاء آذنه، فقال: قد قامت الصلاة، فقام وقمنا معه، فدخلنا المسجد، فرأى الناس ركوعا في مقدم المسجد، فكبر وركع، ومشينا وفعلنا مثل ما فعل، فمر رجل يسرع، فقال: عليكم السلام يا أبا عبد الرحمن، فقال: صدق الله، وبلغ رسوله. فلما صلينا رجع، فولج على أهله، وجلسنا في مكاننا ننتظره حتى يخرج، فقال بعضنا لبعض: أيكم يسأله؟ قال طارق: أنا أسأله، فسأله، فقال: عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"بين يدي الساعة تسليم الخاصة، وفشو التجارة حتى تعين المرأة زوجها على التجارة، وقطع الأرحام، وفشو القلم، وظهور الشهادة بالزور، وكتمان شهادة الحق".

حسن: رواه البخاري في الأدب المفرد (1049)، وأحمد (3982)، والطحاوي في مشكله (1590)، والحاكم (4/ 445) كلهم من طريق بشير بن سلمان، عن سيار أبي الحكم، عن طارق ابن شهاب فذكره.

وسيار أبو الحكم هو العنزي من رجال الصحيح، ثقة، ولكن الصواب أنه سيار أبو حمزة،
كما قال الإمام أحمد في حديث آخر رواه من هذا الطريق (4219)، ثم رواه عن عبد الرزاق قال: أخبرنا سفيان، عن بشير أبي إسماعيل، عن سيار أبي حمزة فذكره.

قال عبد الله:"قال أبي: وهو الصواب سيار أبو حمزة. وقال: سيار أبو الحكم لم يحدث عن طارق بن شهاب بشيء".

وكذلك قال أبو داود:"هو سيار أبو حمزة، لكن بشير كان يقول: سيار أبو الحكم، وهو خطأ". وهو رأي يحيى بن معين أيضا.

ولكن ذهب البخاري إلى أنه سيار أبو الحكم، فترجمه في"التاريخ الكبير" (4/ 161)، فقال:"سيار بن أبي سيار، وهو سيار بن وردان الواسطي عن طارق بن شهاب، روى عنه عبيد الله بن عمر، وبشير بن سلمان، وهشيم. وكنيته أبو الحكم".

وكذلك قال ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (4/ 254 - 255).

وخطأهم الدارقطني، فقال في علله (5/ 116): وقولهم:"سيار أبو الحكم" وهم. وإنما هو سيار أبو حمزة الكوفي، كذلك رواه عبد الرزاق عن الثوري، عن بشير، عن سيار أبي حمزة، وهو الصواب. وسيار أبو الحكم لم يسمع من طارق بن شهاب شيئا، ولم يرو عنه". انتهى.

وأقره الحافظ ابن حجر في تهذيبه (5/ 292).

وسيار أبو حمزة روى عنه جماعة، ووثّقه ابن حبان، ويبدو أنه كان معروفا عند أئمة الحديث، فهو لا ينزل عن درجة حسن الحديث.

وقد حسّن الحافظ ابن حجر حديثَه في مواضع من فتحه.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারিক ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসা ছিলাম। এমন সময় তাঁর খাদেম এসে বলল: সালাতের সময় হয়েছে। তিনি দাঁড়ালেন এবং আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। আমরা মসজিদে প্রবেশ করে দেখলাম সামনের কাতারের লোকজন রুকুতে রয়েছে। তিনি তাকবীর বলে রুকু করলেন। আমরাও হাঁটতে হাঁটতে তাঁর মতো করলাম। দ্রুতগামী এক ব্যক্তি পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় বলল: "আসসালামু আলাইকুম ইয়া আবূ আব্দুর রহমান!" তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন: "আল্লাহ সত্য বলেছেন এবং তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পৌঁছে দিয়েছেন।" আমরা সালাত শেষ করার পর তিনি ফিরে গেলেন এবং নিজ পরিবারের কাছে প্রবেশ করলেন। আমরা আমাদের স্থানে বসে অপেক্ষা করতে লাগলাম যতক্ষণ না তিনি বেরিয়ে আসেন। আমাদের মধ্য থেকে কেউ কেউ বলল: তোমাদের মধ্যে কে তাঁকে জিজ্ঞেস করবে (তাঁর মন্তব্যের বিষয়ে)? তারিক বললেন: আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করব। অতঃপর তারিক তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামতের প্রাক্কালে কিছু নিদর্শন প্রকাশ পাবে: শুধু পরিচিত ব্যক্তিকে সালাম দেওয়া, ব্যবসা-বাণিজ্যের প্রসার ঘটবে এমনভাবে যে স্ত্রী তার স্বামীকে ব্যবসায় সাহায্য করবে, আত্মীয়তার বন্ধন ছিন্ন করা, কলমের (লেখার) ব্যাপক প্রসার হওয়া, মিথ্যা সাক্ষ্যের প্রকাশ পাওয়া এবং সত্য সাক্ষ্য গোপন করা।"