আল-জামি` আল-কামিল
5368 - عن ابن عباس قال: قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة، وهم يسلفون في الثمار السنة والسنتين، فقال:"من أسلف في ثمر فليسلف في كيل معلوم، ووزن معلوم، إلى أجل معلوم".
متفق عليه: رواه البخاري في السلم (2240)، ومسلم في المساقاة (1604: 127) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، أخبرنا ابن أبي نجيح، عن عبد الله بن كثير، عن أبي المنهال، عن ابن عباس فذكره. واللفظ لمسلم.
قوله:"السلف" وهو لغة الحجاز، والسلم لغة العراق.
والسلف له معنيان في المعاملات:
أحدهما: القرض الذي لا منفعة فيه للمقرض، وعلى المستقرض رده، كما أخذه.
والثاني: هو السلم المعهود، وهو تسليم مال عاجل بمقابلة موصوف في الذمة. ويقال: سلفت، وأسلفت، وأسلمت بمعنى واحد.
قوله:"في تمر" قال النووي في شرحه (11/ 42 - 43):"هكذا هو في أكثر الأصول:"تمر" بالمثناة، وفي بعضها"ثمر" بالمثلثة، وهو أعم، وهكذا في جميع النسخ".
وفي الحديث دليل على جواز السلف في الطعام والشباب وغير ذلك من أنواع التجارة مما يعرف حده، وصفته.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় আগমন করলেন। তখন লোকেরা এক বছর বা দুই বছরের জন্য ফল-ফসলের অগ্রিম (সালাম) লেনদেন করত। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি কোনো ফলের অগ্রিম (সালাম) লেনদেন করবে, সে যেন নির্ধারিত পরিমাপ, নির্ধারিত ওজন এবং নির্ধারিত সময়ের জন্য তা করে।"
5369 - عن أبي البختري قال: سألت ابن عمر رضي الله عنهما عن السلم في النخل، فقال: نهي عن بيع النخل حتى يصلح، وعن بيع الورق نساء بناجز.
وسألت ابن عباس عن السلم في النخل، فقال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع النخل حتى يؤكل منه،
أو يأكل منه حتى يوزن.
متفق عليه: رواه البخاري في السلم (2247 - 2248)، ومسلم في البيوع (1537) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو، عن أبي البختري قال فذكره. واللفظ للبخاري، وعند مسلم"عن بيع" بدل"عن السلم".
আবু আল-বাখতারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খেজুরের ক্ষেত্রে 'সালাম' (অগ্রিম বেচা-কেনা) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: খেজুর (ফল) উপযুক্ত (পাকার) না হওয়া পর্যন্ত বিক্রি করতে নিষেধ করা হয়েছে, এবং নগদ অর্থের বিনিময়ে বাকি রৌপ্য (মুদ্রা) বিক্রি করতেও নিষেধ করা হয়েছে। আর আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খেজুরের ক্ষেত্রে 'সালাম' সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম, তিনি বললেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খেজুর (ফল) খাওয়া উপযোগী না হওয়া পর্যন্ত, অথবা খাওয়া উপযোগী (পরিমাণে) ওজনে দেওয়া না হওয়া পর্যন্ত বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।
5370 - عن محمد بن أبي المجالد قال: بعثني عبد الله بن شداد، وأبو بردة إلى عبد الله بن أبي أوفي، فقالا: سله هل كان أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم في عهد النبي صلى الله عليه وسلم يسلفون في الحنطة؟ قال عبد الله: كنا نسلف نبيط أهل الشام في الحنطة والشعير والزيت في كيل معلوم إلى أجل معلوم. قلت: إلى من كان أصله عنده؟ قال: ما كنا نسألهم عن ذلك، ثم بعثاني إلى عبد الرحمن بن أبزي، فسألته، فقال: كان أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يسلفون على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، ولم نسألهم ألهم حرث أم لا؟
صحيح: رواه البخاري في السلم (2244 - 2245) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا عبد الواحد، حدثنا الشيباني، حدثنا محمد بن أبي المجالد فذكره.
وفي رواية عنده:"على عهد النبي صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر في الحنطة والشعير والزبيب والتمر".
وفي مسند أحمد (19122) من طريق شعبة، عن عبد الله بن أبي المجالد: وما هو عندهم، أو ما نراه عندهم.
وقوله:"ما كنا نسألهم عن ذلك" يستفاد منه جواز بيع السلم في عموم التجارة من الزراعة والصناعة وغيرها بالشروط المذكورة من الوصف والنوع والمدة وغيرها قطعا للنزاع.
وبوّبتُ كما بوب البخاري -رحمه الله تعالى-: باب السلم إلى من ليس عنده أصل.
وقوله:"نبيط" ويقال لهم: النبط. وهم قوم من العرب دخلوا في العجم والروم، واختلطت أنسابهم، وفسدت ألسنتهم، فالذين اختلطوا بالروم نزلوا في بوادي الشام، وهم صاروا الزراع.
মুহাম্মাদ ইবনে আবী আল-মুজাল্লিদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে শাদ্দাদ এবং আবূ বুরদাহ আমাকে আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পাঠালেন। তারা উভয়ে বললেন: তাঁকে জিজ্ঞাসা করুন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সাহাবীগণ কি গম (খাদ্যশস্য) অগ্রিম (সালাম পদ্ধতিতে) ক্রয় করতেন? আব্দুল্লাহ (ইবনে আবী আওফা) বললেন: আমরা সিরিয়াবাসী নাবীত্ব গোত্রের লোকদের সাথে গম, বার্লি ও তেল নির্ধারিত পরিমাণে, নির্ধারিত সময়ের জন্য (সালাম পদ্ধতিতে) চুক্তি করতাম। আমি বললাম: যার কাছে মূল বস্তুটি মজুত ছিল, তার সাথে কি এই চুক্তি হতো? তিনি বললেন: আমরা তাদের এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করতাম না। এরপর তারা আমাকে আব্দুর রহমান ইবনে আবযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট পাঠালেন। আমি তাকে জিজ্ঞাসা করলাম, তিনি বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সাহাবীগণ অগ্রিম চুক্তি (সালাম) করতেন এবং আমরা তাদের জিজ্ঞাসা করতাম না যে তাদের ক্ষেত আছে কি নেই।
5371 - عن الأعمش قال: تذاكرنا عند إبراهيم الرهن في السلف، فقال: حدثني الأسود، عن عائشة رضي الله عنها أن النبي صلى الله عليه وسلم اشترى من يهودي طعاما إلى أجل معلوم، وارتهن منه درعا من حديد.
متفق عليه: رواه البخاري في السلم (2252)، ومسلم في المساقاة (1603: 126) من طريق عبد الواحد بن زياد، حدثنا الأعمش قال فذكره.
واللّفظ للبخاريّ، وعند مسلم:"ذكرنا الرهن في السلم".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ইহুদীর কাছ থেকে নির্দিষ্ট মেয়াদের জন্য খাদ্যদ্রব্য ক্রয় করলেন এবং তার কাছে লোহার একটি বর্ম বন্ধক রাখলেন।
5372 - عن ابن عمر قال: كان أهل الجاهلية يتبايعون لحم الجزور إلى حبل الحبلة. -وحبل الحبلة أن تنتج الناقة، ثم تحمل التي نتجت- فنهاهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن ذلك.
متفق عليه: رواه البخاريّ في السلم (2256) من طريق جويرية، ومسلم في البيوع (1514: 6) من طريق عبيد اللَّه، كلاهما عن نافع، عن ابن عمر قال فذكره. واللّفظ لمسلم. ولفظ البخاري نحوه، وفيه التصريح بأن التفسير من نافع.
وفي أحاديث الأبواب المتقدمة دليل على جواز السلم في الطعام والثياب وغيرهما مما يمكن ضبطه بالصفة، وإن لم يكن ذلك موجودا عند العقد مثل السيارات والأجهزة الكهربائية والأثاث المنزلي وغيرها.
ويشترط في السلم تسليم رأس المال أو جزء منه عند العقد.
وفي الباب مسائل أخرى ذكرتها بالتفصيل في"المنة الكبرى" (5/ 234)، فراجعه إن شئت.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, জাহিলিয়াতের যুগের লোকেরা উটের গোশত ক্রয়-বিক্রয় করত 'হাবলুল হাবালা' পর্যন্ত। -আর হাবলুল হাবালা হলো এই যে, উটনী বাচ্চা প্রসব করবে, অতঃপর সেই প্রসূত বাচ্চাটি গর্ভধারণ করবে- অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে তা থেকে নিষেধ করলেন।
5373 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قضى النبي صلى الله عليه وسلم بالشفعة في كل ما لم يقسم، فإذا وقعت الحدود، وصرفت الطرق فلا شفعة.
صحيح: رواه البخاريّ في الشفعة (2257) عن مسدد، حدّثنا عبد الواحد، حدّثنا معمر، عن الزهريّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر قال فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক সেই সম্পত্তিতে শুফ’আর অধিকারের ফায়সালা দিয়েছেন যা বণ্টন করা হয়নি। কিন্তু যখন সীমানা নির্ধারণ করা হয় এবং রাস্তা নির্দিষ্ট করে দেওয়া হয়, তখন আর শুফ’আ থাকে না।
5374 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كان له شريك في ربعة، أو نخل، فليس له أن يبيع حتى يؤذن شريكهـ، فإن رضي أخذ، وإن كره ترك".
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1608) من طرق عن زهير أبي خيثمة، عن أبي الزبير، عن جابر. وزهير هو ابن معاوية الجعفي أبو خيثمة.
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কারও যদি কোনো জমিতে বা খেজুরের বাগানে অংশীদার থাকে, তবে সে যেন তার অংশীদারকে না জানিয়ে বিক্রি না করে। অতঃপর সে (অংশীদার) যদি সন্তুষ্ট হয় (এবং কিনতে চায়), তবে সে তা নিয়ে নেবে; আর যদি সে অপছন্দ করে (কিনতে না চায়), তবে সে তা ছেড়ে দেবে।"
5375 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الشفعة في كل شرك، في أرض، أو ربع، أو حائط. لا يصلح أن يبيع حتى يعرض على شريكهـ، فيأخذ، أو يدع، فإن أبي فشريكه أحق به حتى يؤذنه".
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1608: 135) عن أبي الطاهر، أخبرنا ابن وهب، عن ابن جريج، أن أبا الزبير أخبره أنه سمع جابرا يقول فذكره.
وفي رواية عنده عن عبد اللَّه بن إدريس، عن ابن جريج:"قضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بالشفعة في كل شركة لم تقسم، ربعة أو حائط، لا يحل له أن يبيع حتى يؤذن شريكهـ، فإن شاء أخذ، وإن شاء ترك. فإذا باع ولم يؤذنه فهو أحق به".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "শুফ‘আ (অগ্রক্রয়াধিকার) প্রযোজ্য সকল অংশীদারিত্বে—তা জমিতে হোক, বাসস্থানে হোক অথবা বাগানে হোক। অংশীদারের কাছে পেশ না করে বিক্রি করা জায়েয নয়। সে (অংশীদার) হয় গ্রহণ করবে, নতুবা ত্যাগ করবে। যদি সে (অংশীদার) অস্বীকার করে (এবং অংশীদারকে না জানিয়ে বিক্রি করে), তবে সে (অংশীদার) ওই বস্তুর অধিক হকদার হবে যতক্ষণ না বিক্রেতা তাকে অবহিত করে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম শুফ‘আ নির্ধারণ করেছেন এমন প্রতিটি অংশীদারিত্বে যা এখনও ভাগ করা হয়নি—তা বাসস্থান হোক বা বাগান হোক। তার জন্য এটা হালাল নয় যে, সে তার অংশীদারকে অবহিত না করে বিক্রি করবে। যদি সে চায়, তবে সে গ্রহণ করবে, আর যদি চায়, তবে ত্যাগ করবে। যদি সে বিক্রি করে দেয় এবং অংশীদারকে অবহিত না করে, তবে অংশীদারই তার অধিক হকদার।
5376 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كانت له نخل، أو أرض فلا يبعها حتى يعرضها على شريكهـ".
صحيح: رواه النسائي (4700)، وابن ماجه (2492)، وأحمد (14292) كلّهم من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره. وإسناده صحيح.
ولكن رواه عبد الرزاق (14403) عن سفيان الثوري، وابن جريج كلاهما عن أبي الزبير، وزاد فيه:"فإن شاء أخذه، وإن شاء تركهـ".
ولعل الحديث جاء من وجهن: سفيان بن عيينة، وسفيان الثوري. وإن كان ليس في جميع
طرقه منسوبا إلى ابن عيينة، أو إلى الثوري.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার কোনো খেজুর বাগান অথবা জমি আছে, সে যেন তা বিক্রি না করে, যতক্ষণ না সে তা তার শরিকের কাছে পেশ করে।"
5377 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قضى بالشفعة فيما لم يقسم، فإذا وقعت الحدود فلا شفعة.
صحيح: رواه ابن ماجه (2497) عن محمد بن يحيى، وعبد الرحمن بن عمر، حدّثنا أبو عاصم قال: حدّثنا مالك بن أنس، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، وأبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وكذلك رواه البيهقي (6/ 104) عن أبي عاصم، عن مالك موصولا.
وتابعه على ذلك عبد اللَّه بن عبد العزيز الماجشون، ومن طريقه رواه ابن حبان في صحيحه (5185)، والبيهقي. وكذلك يحيى بن عبد الرحمن بن أبي قتيلة، والضحاك بن مخلد الشياني عند البيهقي.
قال ابن حبان:"رفع هذا الخبر عن مالك أربعة أنفس: الماجشون، وأبو عاصم، ويحيى بن أبي قتيلة، وأشهب بن عبد العزيز".
ولم يذكر فيهم الضحاك بن مخلد، فصار العدد خمسا.
وقال:"وأرسله عن مالك سائر أصحابه، وهذه كانت عادة لمالك، يرفع في الأحايين الأخبار، ويوقفها مرارا، ويرسلها مرة، ويسندها أخرى على حسب نشاطه، فالحكم أبدا لمن رفع عنه، وأسند بعد أن يكون ثقة حافظا متقنا على السبيل الذي وصفناه في أول الكتاب". انتهى
قال ابن عبد البر في"التمهيد" (7/ 36):"هكذا روى هذا الحديث عن مالك أكثر الرواة للموطأ وغيره مرسلا إلا عبد الملك بن عبد العزيز الماجشون، وأبا عاصم النبيل، ويحيى بن إبراهيم بن داود بن أبي قتيلة المدني، وأبا يوسف القاضي، وسعيدا الزبيري، فإنهم رووه عن مالك بهذا الإسناد متصلا عن أبي هريرة مسندا".
وممن أسند هذا الحديث عن أبي هريرة أبو داود (3515) من حديث محمد بن إدريس الشافعي، عن ابن جريج، عن ابن شهاب الزهريّ، عن أبي سلمة أو سعيد بن المسيب، أو عنهما جميعا، عن أبي هريرة فذكر الحديث بطوله.
وأما ممن روى عن مالك مرسلا، فمنهم وكيع، عنه، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، وأبي سلمة قالا فذكر الحديث. ومن هذا الطريق رواه ابن أبي شيبة (7/ 171).
ومنهم يحيى عنه بإسناده، وهو الذي في موطئه في كتاب الشفعة (1)، وكذلك في موطأ القعنبي وغيره.
قال البيهقي:"رواه مالك في الموطأ مرسلا، وقد روي ذلك عنه من أوجه أخر موصولا بذكر أبي هريرة فيه".
قلت: وممن رواه أيضًا مرسلا: معمر عن الزهريّ، عن أبي سلمة. ومن طريقه رواه النسائي. ووصله مسلم بذكر جابر بن عبد اللَّه، كما مضى.
والخلاصة فيه أن الحكم لمن أسنده، كما قال ابن حبان.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবিভক্ত সম্পত্তিতে 'শুফআ' বা অগ্রক্রয়াধিকারের বিধান দিয়েছেন। কিন্তু যখন (সম্পত্তির) সীমা নির্ধারণ হয়ে যায়, তখন আর শুফআ থাকে না।
5378 - عن عمرو بن الشريد قال: وقفت على سعد بن أبي وقاص، فجاء المسور بن مخرمة، فوضع يده على إحدى منكبي إذ جاء أبو رافع مولى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا سعد، ابتع مني بيتيَّ في دارك، فقال سعد: واللَّه ما أبتاعهما. فقال المسور: واللَّه، لتبنا عنهما. فقال سعد: واللَّه لا أزيدك على أربعة آلاف منجمة أو مقطعة. قال أبو رافع: لقد أعطيت بها خمس مائة دينار، ولولا أني سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"الجار أحق بسقبه" ما أعطيتكها بأربعة آلاف، وأنا أعطى بها خمس مائة دينار، فأعطاها إياه.
صحيح: رواه البخاريّ في الشفعة (2258) عن المكي بن إبراهيم، أخبرنا ابن جريج، أخبرني إبراهيم بن ميسرة، عن عمرو بن الشريد قال فذكره.
قوله:"منجمة أو مقطعة" شك من الراوي، والمراد مؤجلة على أقسام معلومة.
আমর ইবন শারীদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে দাঁড়ালাম। তখন মিসওয়ার ইবন মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং তিনি আমার কাঁধের ওপর হাত রাখলেন। এমন সময় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর আযাদকৃত গোলাম আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং বললেন, হে সা'দ! তোমার বাড়িতে অবস্থিত আমার দুটি ঘর আমার কাছ থেকে কিনে নাও। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! আমি ঘর দুটি কিনব না। মিসওয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! তুমি ঘর দুটি কিনবেই। তখন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! আমি তোমাকে চার হাজার (মুদ্রার) বেশি দেব না, যা কিস্তি কিস্তি করে বা ভিন্ন ভিন্ন সময়ে পরিশোধ করা হবে। আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এর জন্য আমাকে পাঁচশত দীনার দেওয়ার প্রস্তাব দেওয়া হয়েছে। তবে আমি যদি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে না শুনতাম যে, "প্রতিবেশীই তার সম্পত্তির নিকটবর্তী অংশ পাওয়ার বেশি হকদার," তাহলে আমি তোমাকে চার হাজারে দিতাম না, অথচ আমাকে পাঁচশত দীনার দেওয়া হচ্ছে। এরপর তিনি (সা'দ) আবূ রাফি’কে তা কিনে দিলেন।
5379 - عن الشريد بن سويد قال: يا رسول اللَّه، أرض ليس فيها لأحد قسم، ولا شرك إلا الجوار؟ قال:"الجار أحق بسقبه".
حسن: رواه النسائي (4703)، وابن ماجه (2496)، وأحمد (19461) كلّهم من حديث حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن عمرو بن الشريد بن سويد، عن أبيه الشريد بن سويد فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، وقد اختلف على عمرو بن شعيب، وحسين المعلم ثقة، وروايته عنه صحيحة، وما يخالفه لا يعلله.
ثم عمرو بن شعيب أيضًا قد توبع، رواه أحمد (19469)، وابن الجارود في"المنتقى" (645)، وعبد الرزاق (14380) كلّهم من حديث عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن يعلى بن كعب الثقفي، عن عمرو بن الشريد، عن أبيه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الجار أحق بسقبه".
قال أبو نعيم كما عند ابن الجارود: قلت لعمرو: ما سقبه؟ قال: الشفعة. قلت: زعم النّاس أنه الجوار. قال: إن النّاس يقولون ذلك.
عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن يعلى تكلم في حفظه إلا أنه لا بأس به في المتابعات.
قال الترمذيّ (3/ 642):"حديث عبد اللَّه بن عبد الرحمن الطائفي، عن عمرو بن الشريد، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم في هذا الباب هو حديث حسن. وروى إبراهيم بن ميسرة عن عمرو بن الشريد عن أبي رافع عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: سمعت محمدا يقول: كلا الحديثين عندي صحيح". انتهى.
শারীদ ইবনু সুওয়াইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হে আল্লাহর রাসূল! (যদি এমন) কোনো ভূমি থাকে যা কারো মধ্যে বণ্টন করা হয়নি এবং যাতে কোনো অংশীদারিত্ব নেই, তবে কেবল প্রতিবেশীত্ব আছে (সেই ক্ষেত্রে কী বিধান)? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: প্রতিবেশীর জন্য তার নিকটবর্তী বস্তুর (শাফা’আর) অধিকার অধিক।
5380 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"جار الدار أحق بدار الجار أو الأرض".
صحيح: رواه أبو داود (3517)، والترمذي (1368)، وابن الجارود (644)، وأحمد (20088) كلّهم من طريق قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
وأما ما رواه سعيد، عن قتادة، عن أنس فهو وهم، كما أشار إليه الترمذيّ، ومن طريقه رواه ابن حبان (5182).
وقوله:"السقب" القرب. يقال بالسين والصاد جميعا.
قال الشافعي: قوله:"الجار أحق بسقبه" لا يحتمل إلا معنيين لا ثالث لهما:
إما أن يكون أراد أن الشفعة لكل جار، أو أراد بعض الجيران دون بعض، وقد ثبت عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه لا شفعة فيما قسم، فدل على أن الشفعة للجار الذي لم يقاسم دون الجار المقاسم".
وبه قال جمهور أهل العلم بأن الشفعة ليست لكل جار، بل للجار الذي لم يقاسم، وطريقهما واحد لرفع الضرر عن الجار القريب جمعا بين الأحاديث. وبه قال من الصحابة عمر بن الخطاب، وعثمان.
وبه قال أهل المدينة منهم يحيى بن سعيد الأنصاري، وربيعة بن أبي عبد الرحمن، ومالك. وبه قال الشافعي، وأحمد، وإسحاق.
فإن هؤلاء لا يرون الشفعة إلا للخليط، ولا يرون للجار شفعة إذا لم يكن خليطا.
وأما بمجرد الجوار فلا تثبت الشفعة عندهم، فالحديث العام مؤول، كما قال أهل المدينة، والشافعي، وغيرهم. وأخرج المحدثون هذا الحديث في كتبهم على هذا التأويل. أو أن المقصود من الحديث العام البر والإحسان إلى الجيران دون الشفعة، وإلا فيكون فيه تعطيل لمصالح النّاس في البيع والشراء.
وذهب الثوري، وابن المبارك، وأهل الكوفة إلى ظاهر الحديث، فقالوا بثبوت الشفعة للجار مستدلين بقوله:"جار الدار أحق بالدار"، و"الجار أحق بسقبه".
الحديث".
وقال:"وعبد الملك هو ثقة مأمون عند أهل الحديث، ولا نعلم أحدا تكلم فيه غير شعبة من أجل هذا الحديث.
وروي عن ابن المبارك، عن سفيان الثوري قال: عبد الملك بن أبي سليمان ميزان يعني في العلم". انتهى.
قال الشافعي:"سمعنا بعض أهل العلم بالحديث يقول: نخاف أن لا يكون هذا الحديث محفوظا".
وقال أحمد بن حنبل:"ليس العمل على هذا. لا شفعة إلا للخليط"."مسائل ابن هانئ" (2/ 26).
وقال البيهقي:"هذا حديث أنكره على عبد الملك: شعبة بن الحجاج، ويحيى بن سعيد القطّان، وأحمد بن حنبل، وسائر الحفاظ، حتى قال شعبة: لو روى عبد الملك بن أبي سليمان حديثا آخر مثل حديث الشفعة لتركت حديثه".
وقال الترمذيّ:"قلت لمحمد بن إسماعيل في هذا، فقال: تفرّد به عبد الملك، وروي عن جابر خلاف هذا".
وقد تأول بعض أهل العلم هذا الحديث بأنه المشاع؛ لأن الطريق إنما يكون واحدا على الحقيقة في المشاع دون المقسوم. وفي الحديث ما يدل على ذلك، وهو قوله:"إذا كان طريقهما واحدا".
وعلى هذا فلا يحتاج إلى تضعيف الحديث، وبالتالي لا منافاة بينه وبين رواية جابر المشهورة.
هذا اختيار ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 175)، وأطال الكلام في تصحيح الحديث.
وأما شفعة الغائب فقال الترمذيّ:"والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم أن الرجل أحق بشفعته، وإن كان غائبا، فإذا قدم فله الشفعة، وإن تطاول ذلك".
وقال ابن عبد البر:"وأما شفعة الغائب فإن أهل العلم مجمعون على أنه إذا لم يعلم ببيع الحصة التي هو فيها شريك من الدور والأرضين، ثم قدم، فعلم، فله الشفعة مع طول مدة غيبته"."الاستذكار" (21/ 276).
وأما ما روي عن ابن عمر مرفوعا:"الشفعة كحل العقال". فهو ضعيف. رواه ابن ماجه (2500)، والبيهقي (6/ 108) كلاهما من طريق محمد بن الحارث، عن محمد بن عبد الرحمن البيلماني، عن أبيه، عن ابن عمر فذكره. واللّفظ لابن ماجه.
وزاد البيهقي في أول الحديث:"لا شفعة لغائب، ولا صغير، ولا شريك على شريك إذا سبقه بالشراء". وفي لفظ:"الشفعة لا ترث، ولا تورث".
قال البيهقي:"محمد بن الحارث البصري متروك، ومحمد بن عبد الرحمن البيلماني ضعيف، ضعفها يحيى بن معين، وغيره من أئمة الحديث".
وقال:"وقد روي في معارضة الحديث الأول حديث ضعيف عن جابر مرفوعا:"الصبي على شفعته حتى يدرك". وكلاهما منكران".
وقال أبو زرعة:"هذا حديث منكر، ولم يقرأ علينا في كتاب الشفعة، وضربنا عليه".
وقد سئل عن حديث"لا شفعة لغائب، ولا صغير". فقال:"هذا حديث منكر، لا أعلم أحدا قال بهذا، الغائب له شفعة، والصغير حتى يكبر، فلم يقرأ علينا هذا الحديث"."العلل لابن أبي حاتم" (1/ 479).
قلت: وقد سبق نقل الإجماع على أن الشريك الغائب له شفعة.
সمرة ইবন জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঘরের প্রতিবেশী প্রতিবেশীর ঘর বা ভূমির অধিক হকদার।"
5381 - عن * *
৫৩৮১ - থেকে ** **
5382 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"الخازن الأمين الذي يؤدي ما أمر به طيبةً نفسه أحد المتصدقين".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإجارة (2260)، ومسلم في الزّكاة (1023) من طريق بُريد أبي بردة قال: أخبرني أبو بردة، عن أبيه أبي موسى الأشعري قال فذكره.
فائدة: قال الكرماني: دخول هذا الحديث في باب الإجارة للإشارة إلى أن خازن مال الغير كالأجير لصاحب المال.
আবূ মূসা আল-আশ’আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে বিশ্বস্ত কোষাধ্যক্ষ যা তাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে, তা সানন্দচিত্তে প্রদান করে, সেও (সওয়াবের দিক থেকে) সাদকা প্রদানকারীদের মধ্যে একজন।"
5383 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما بعث اللَّه نبيا إلا رعى الغنم". فقال أصحابه: وأنت؟ فقال:"نعم، كنت أرعاها على قراريط لأهل مكة".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2262) عن أحمد بن محمد المكي، حدّثنا عمرو بن يحيى، عن جده (وهو سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص الأموي) عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ এমন কোনো নবী প্রেরণ করেননি, যিনি বকরী চরাননি।” তখন তাঁর সাহাবীগণ বললেন, আপনিও? তিনি বললেন, “হ্যাঁ, আমি মক্কার অধিবাসীদের কিছু ক্বীরাতের (মুদ্রার) বিনিময়ে বকরী চরাতাম।”
5384 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قال اللَّه تعالى: ثلاثة أنا خصمهم يوم القيامة: رجل أعطى بي ثم غدر، ورجل باع حرًا فأكل ثمنه، ورجل استأجر أجيرا فاستوفى منه ولم يعطه أجره".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2270) عن يوسف بن محمد قال: حدثني يحيى بن سليم، عن إسماعيل بن أمية، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: কিয়ামতের দিন তিন প্রকার লোকের সাথে আমি নিজেই বাদী (বিপক্ষ) হবো: যে ব্যক্তি আমার নামে (শপথ বা চুক্তি) দিয়ে তা ভঙ্গ করে (বিশ্বাসঘাতকতা করে), আর যে ব্যক্তি একজন স্বাধীন মানুষকে বিক্রি করে তার মূল্য ভক্ষণ করে, আর যে ব্যক্তি কোনো শ্রমিককে মজুরি দিয়ে কাজে লাগালো, অতঃপর তার থেকে পূর্ণ কাজ আদায় করে নিল, কিন্তু তাকে তার মজুরি দিল না।
5385 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعط الأجير أجره قبل أن يجف عرقه".
حسن: رواه الطحاوي في مشكله (4/ 142)، وابن عدي في"الكامل" (6/ 2235) والبيهقي في"الكبرى" (6/ 121)، و"الصغرى" (2133) بتحقيقي كلّهم من طريق محمد بن عمار المؤذن، عن المقبري، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل كلام يسير في محمد بن عمار، وقد وثّقه ابن المديني. وقال ابن معين: لم يكن به بأس. ووثّقه ابن حبان، وابن شاهين.
وللحديث طرق أخرى، كلها ضعيفة عند أبي يعلى (6682)، وأبي نعيم في"الحلية" (7/ 142)، والذي ذكرته أصحها.
وفي الباب عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطوا الأجير أجره قبل أن يجف عرقه".
رواه ابن ماجه (2443)، والقضاعي في مسند الشهاب (744) كلاهما من حديث عبد الرحمن ابن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره.
وعبد الرحمن بن زيد بن أسلم ضعيف.
ثم هو خولف، فقد رواه حميد بن زنجويه في الأموال من طريق عثمان بن عثمان الغطفاني، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار مرسلا. وهو أشبه بالصواب؛ فإن عثمان بن عثمان الغطفاني أحسن حالا من عبد الرحمن بن زيد، فقد وثقه ابن معين، وغيره. وقال ابن عدي: لم أر له حديثا منكرا.
وفي الباب ما روي أيضًا عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطوا الأجير أجره قبل أن يجف عرقه".
رواه الطبراني في"الصغير" (1/ 20 - 21)، وعنه الخطيب في تاريخه (5/ 33) عن أحمد بن محمد بن الصلت البغدادي بمصر، حدّثنا محمد بن زياد بن زُبّار الكلبي، حدّثنا شرقي بن قطامي، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
قال الطبراني: لم يروه عن أبي الزبير إلا شرقي، تفرّد به محمد بن زياد.
وقال الخطيب: ولم يرو عن محمد بن زياد إلا ابن الصلت.
وفيه محمد بن زياد بن زبار الكلبي ضعيف. نقل الخطيب في تاريخه (5/ 282) عن يحيى بن معين: لا شيء. وقال أبو علي: وكان ببغداد يروي الشعر وأيام النّاس، ليس بذاك.
وأورده الهيثمي في"المجمع" (4/ 98)، وأعله بشرقي بن قطامي بأنه ضعيف.
وفي الباب أيضًا ما روي عن أنس بن مالك، رواه الحكيم الترمذيّ في نوادر الأصول، كما قال الزيلعي في"نصب الراية" (4/ 130)، وفيه بشر بن الحسين قال البخاري: فيه نظر. وقال
الدارقطني: متروك. انظر"اللسان" (2/ 21).
وجملة القول إنه لم يثبت في هذا الباب إلا حديث أبي هريرة، وهو حسن، كما سبق، وهذه الشواهد تقويه. وفيه دليل على أن هذا الحديث وهو"أعطوا الأجير أجره قبل أن يجف عرقه" له أصل ثابت.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শ্রমিককে তার মজুরি দাও তার ঘাম শুকিয়ে যাওয়ার আগে।"
5386 - عن عبد اللَّه بن عمر بن الخطاب رضي الله عنهما أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنما مثلكم واليهود والنصارى كرجل استعمل عمالا، فقال: من يعمل لي إلى نصف النهار على قيراط قيراط؟ فعملت اليهود على قيراط قيراط، ثم عملت النصارى على قيراط قيراط، ثم أنتم الذين تعملون من صلاة العصر إلى مغارب الشمس على قيراطين قيراطين، فغضبت اليهود والنصارى، وقالوا: نحن أكثر عملا وأقل عطاء. قال: هل ظلمتكم من حقكم شيئا؟ قالوا: لا. فقال: فذلك فضلي أوتيه من أشاء".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2269) عن إسماعيل بن أبي أويس قال: حدثني مالك، عن عبد اللَّه بن دينار مولى عبد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه بن عمر بن الخطاب فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনু উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের এবং ইহুদি ও খ্রিস্টানদের উদাহরণ হলো এমন এক ব্যক্তির মতো, যে কিছু শ্রমিক নিয়োগ করল। সে বলল: দুপুর পর্যন্ত প্রতি কীরাত কীরাত (মজুরি) হিসেবে কে আমার জন্য কাজ করবে? ফলে ইহুদিরা প্রতি কীরাত কীরাত (মজুরির) বিনিময়ে কাজ করল। এরপর খ্রিস্টানরা প্রতি কীরাত কীরাত (মজুরির) বিনিময়ে কাজ করল। এরপর তোমরা (মুসলিমরা) যারা আসরের সালাতের পর থেকে সূর্যাস্ত পর্যন্ত কাজ কর, তারা দুই কীরাত দুই কীরাত (মজুরি) পাবে। এতে ইহুদি ও খ্রিস্টানরা অসন্তুষ্ট হয়ে বলল: আমরা কাজ করেছি বেশি, আর মজুরি পেলাম কম। সে (মালিক) বলল: তোমাদের প্রাপ্য অধিকার থেকে কি আমি কিছু কম দিয়েছি? তারা বলল: না। তখন সে বলল: এটা আমার অনুগ্রহ, যাকে ইচ্ছা আমি তা দান করি।"
5387 - عن أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"مثل المسلمين واليهود والنصارى كمثل رجل استأجر قوما يعملون له عملا يوما إلى الليل على أجر معلوم، فعملوا له نصف النهار، فقالوا: لا حاجة لنا إلى أجرك الذي شرطت لنا، وما عملنا باطل. فقال لهم: لا تفعلوا، أكملوا بقية عملكم، وخذوا أجركم كاملا. فأبوا، وتركوا. واستأجر آخرين بعدهم، فقال لهم: أكملوا بقية يومكم هذا، ولكم الذي شرطت لهم من الأجر، فعملوا حتى إذا كان حين صلاة العصر قالوا: لك ما عملنا باطل، ولك الأجر الذي جعلت لنا فيه، فقال لهم: أكملوا بقية عملكم؛ فإن ما بقي من النهار شيء يسير. فأبوا، فاستأجر قوما أن يعملوا له بقية يومهم، فعملوا بقية يومهم حتى غابت الشمس، واستكملوا أجر الفريقين كليهما، فذلك مثلهم ومثل ما قبلوا من هذا النور".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2271) عن محمد بن العلاء، حدّثنا أبو أسامة، عن بُريد، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره.
وأما ما روي عن أبي سعيد الخدري"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن استئجار الأجير حتى يبين أجره، وعن النجش، واللمس، وإلقاء الحجر". فهو منقطع.
رواه الإمام أحمد (11565)، وأبو داود في مراسيله (169)، وعنه البيهقي (6/ 120) كلهم من طريق حماد (ابن سلمة)، عن حماد (ابن أبي سليمان)، عن إبراهيم، عن أبي سعيد فذكره. واللّفظ لأحمد. وأما أبو داود فاقتصر على النهي عن استئجار الأجير.
قال البيهقي: وهو مرسل بين إبراهيم وأبي سعيد.
قلت: إبراهيم هو ابن يزيد النخعي لم يسمع من أبي سعيد الخدري. وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 97)، وابن حجر في"التلخيص" (3/ 60).
وحماد بن أبي سليمان رمي بكثرة الوهم، وقد وهم في هذا الحديث، فمرة رواه هكذا، وأخرى عن إبراهيم، عن أبي هريرة، وثالثة عن إبراهيم، عن أبي سعيد من قوله، كما هو عند النسائي (7/ 31 - 32)، وهو الذي رجحه أبو زرعة، كما في"علل ابن أبي حاتم" (2/ 443)، وله طرق أخرى وهم فيها، ذكرها البيهقي في"الكبرى"، وفي"الصغرى" (5/ 416). ولذا قال الإمام أحمد: عند حماد بن سلمة عنه تخليط كثير.
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুসলিম, ইহুদি ও খ্রিস্টানদের উদাহরণ হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে কিছু লোককে নির্দিষ্ট পারিশ্রমিকের বিনিময়ে দিন থেকে রাত পর্যন্ত কাজ করার জন্য ভাড়া করল। তারা অর্ধদিবস পর্যন্ত কাজ করার পর বলল: আপনি আমাদের জন্য যে পারিশ্রমিক নির্ধারণ করেছেন, তার আমাদের প্রয়োজন নেই, আর আমরা যে কাজ করেছি তা বাতিল। তখন সে তাদের বলল: তোমরা এমন করো না। তোমাদের বাকি কাজগুলো সম্পূর্ণ করো এবং তোমাদের পূর্ণ পারিশ্রমিক নাও। কিন্তু তারা অস্বীকার করল এবং কাজ ছেড়ে দিল। অতঃপর সে তাদের পরে অন্যদের ভাড়া করল এবং তাদের বলল: তোমরা এই দিনের বাকি অংশ সম্পূর্ণ করো, আর তাদের জন্য আমি যে পারিশ্রমিক নির্ধারণ করেছিলাম, তা তোমাদের জন্য থাকবে। তারা আসরের সালাতের সময় হওয়া পর্যন্ত কাজ করল। এরপর তারা বলল: আমরা যে কাজ করেছি তা বাতিল, আর এর মধ্যে আপনি আমাদের জন্য যে পারিশ্রমিক নির্ধারণ করেছেন তাও আপনার জন্য। তখন সে তাদের বলল: তোমরা তোমাদের বাকি কাজগুলো সম্পূর্ণ করো; দিনের সামান্য অংশই তো বাকি আছে। কিন্তু তারা অস্বীকার করল। এরপর সে অন্য একদল লোককে ভাড়া করল যেন তারা দিনের বাকি অংশ কাজ করে। তারা দিনের বাকি অংশ সূর্যাস্ত পর্যন্ত কাজ করল এবং উভয় দলের পারিশ্রমিকই সম্পূর্ণরূপে গ্রহণ করল। আর এটাই হলো তাদের উদাহরণ এবং এই নূরের (ইসলামের) উদাহরণ, যা তারা গ্রহণ করেছে।
