আল-জামি` আল-কামিল
5381 - عن * *
৫৩৮১ - থেকে ** **
5382 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"الخازن الأمين الذي يؤدي ما أمر به طيبةً نفسه أحد المتصدقين".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإجارة (2260)، ومسلم في الزّكاة (1023) من طريق بُريد أبي بردة قال: أخبرني أبو بردة، عن أبيه أبي موسى الأشعري قال فذكره.
فائدة: قال الكرماني: دخول هذا الحديث في باب الإجارة للإشارة إلى أن خازن مال الغير كالأجير لصاحب المال.
আবূ মূসা আল-আশ’আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে বিশ্বস্ত কোষাধ্যক্ষ যা তাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে, তা সানন্দচিত্তে প্রদান করে, সেও (সওয়াবের দিক থেকে) সাদকা প্রদানকারীদের মধ্যে একজন।"
5383 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما بعث اللَّه نبيا إلا رعى الغنم". فقال أصحابه: وأنت؟ فقال:"نعم، كنت أرعاها على قراريط لأهل مكة".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2262) عن أحمد بن محمد المكي، حدّثنا عمرو بن يحيى، عن جده (وهو سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص الأموي) عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ এমন কোনো নবী প্রেরণ করেননি, যিনি বকরী চরাননি।” তখন তাঁর সাহাবীগণ বললেন, আপনিও? তিনি বললেন, “হ্যাঁ, আমি মক্কার অধিবাসীদের কিছু ক্বীরাতের (মুদ্রার) বিনিময়ে বকরী চরাতাম।”
5384 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قال اللَّه تعالى: ثلاثة أنا خصمهم يوم القيامة: رجل أعطى بي ثم غدر، ورجل باع حرًا فأكل ثمنه، ورجل استأجر أجيرا فاستوفى منه ولم يعطه أجره".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2270) عن يوسف بن محمد قال: حدثني يحيى بن سليم، عن إسماعيل بن أمية، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: কিয়ামতের দিন তিন প্রকার লোকের সাথে আমি নিজেই বাদী (বিপক্ষ) হবো: যে ব্যক্তি আমার নামে (শপথ বা চুক্তি) দিয়ে তা ভঙ্গ করে (বিশ্বাসঘাতকতা করে), আর যে ব্যক্তি একজন স্বাধীন মানুষকে বিক্রি করে তার মূল্য ভক্ষণ করে, আর যে ব্যক্তি কোনো শ্রমিককে মজুরি দিয়ে কাজে লাগালো, অতঃপর তার থেকে পূর্ণ কাজ আদায় করে নিল, কিন্তু তাকে তার মজুরি দিল না।
5385 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعط الأجير أجره قبل أن يجف عرقه".
حسن: رواه الطحاوي في مشكله (4/ 142)، وابن عدي في"الكامل" (6/ 2235) والبيهقي في"الكبرى" (6/ 121)، و"الصغرى" (2133) بتحقيقي كلّهم من طريق محمد بن عمار المؤذن، عن المقبري، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل كلام يسير في محمد بن عمار، وقد وثّقه ابن المديني. وقال ابن معين: لم يكن به بأس. ووثّقه ابن حبان، وابن شاهين.
وللحديث طرق أخرى، كلها ضعيفة عند أبي يعلى (6682)، وأبي نعيم في"الحلية" (7/ 142)، والذي ذكرته أصحها.
وفي الباب عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطوا الأجير أجره قبل أن يجف عرقه".
رواه ابن ماجه (2443)، والقضاعي في مسند الشهاب (744) كلاهما من حديث عبد الرحمن ابن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره.
وعبد الرحمن بن زيد بن أسلم ضعيف.
ثم هو خولف، فقد رواه حميد بن زنجويه في الأموال من طريق عثمان بن عثمان الغطفاني، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار مرسلا. وهو أشبه بالصواب؛ فإن عثمان بن عثمان الغطفاني أحسن حالا من عبد الرحمن بن زيد، فقد وثقه ابن معين، وغيره. وقال ابن عدي: لم أر له حديثا منكرا.
وفي الباب ما روي أيضًا عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطوا الأجير أجره قبل أن يجف عرقه".
رواه الطبراني في"الصغير" (1/ 20 - 21)، وعنه الخطيب في تاريخه (5/ 33) عن أحمد بن محمد بن الصلت البغدادي بمصر، حدّثنا محمد بن زياد بن زُبّار الكلبي، حدّثنا شرقي بن قطامي، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
قال الطبراني: لم يروه عن أبي الزبير إلا شرقي، تفرّد به محمد بن زياد.
وقال الخطيب: ولم يرو عن محمد بن زياد إلا ابن الصلت.
وفيه محمد بن زياد بن زبار الكلبي ضعيف. نقل الخطيب في تاريخه (5/ 282) عن يحيى بن معين: لا شيء. وقال أبو علي: وكان ببغداد يروي الشعر وأيام النّاس، ليس بذاك.
وأورده الهيثمي في"المجمع" (4/ 98)، وأعله بشرقي بن قطامي بأنه ضعيف.
وفي الباب أيضًا ما روي عن أنس بن مالك، رواه الحكيم الترمذيّ في نوادر الأصول، كما قال الزيلعي في"نصب الراية" (4/ 130)، وفيه بشر بن الحسين قال البخاري: فيه نظر. وقال
الدارقطني: متروك. انظر"اللسان" (2/ 21).
وجملة القول إنه لم يثبت في هذا الباب إلا حديث أبي هريرة، وهو حسن، كما سبق، وهذه الشواهد تقويه. وفيه دليل على أن هذا الحديث وهو"أعطوا الأجير أجره قبل أن يجف عرقه" له أصل ثابت.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শ্রমিককে তার মজুরি দাও তার ঘাম শুকিয়ে যাওয়ার আগে।"
5386 - عن عبد اللَّه بن عمر بن الخطاب رضي الله عنهما أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنما مثلكم واليهود والنصارى كرجل استعمل عمالا، فقال: من يعمل لي إلى نصف النهار على قيراط قيراط؟ فعملت اليهود على قيراط قيراط، ثم عملت النصارى على قيراط قيراط، ثم أنتم الذين تعملون من صلاة العصر إلى مغارب الشمس على قيراطين قيراطين، فغضبت اليهود والنصارى، وقالوا: نحن أكثر عملا وأقل عطاء. قال: هل ظلمتكم من حقكم شيئا؟ قالوا: لا. فقال: فذلك فضلي أوتيه من أشاء".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2269) عن إسماعيل بن أبي أويس قال: حدثني مالك، عن عبد اللَّه بن دينار مولى عبد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه بن عمر بن الخطاب فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনু উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের এবং ইহুদি ও খ্রিস্টানদের উদাহরণ হলো এমন এক ব্যক্তির মতো, যে কিছু শ্রমিক নিয়োগ করল। সে বলল: দুপুর পর্যন্ত প্রতি কীরাত কীরাত (মজুরি) হিসেবে কে আমার জন্য কাজ করবে? ফলে ইহুদিরা প্রতি কীরাত কীরাত (মজুরির) বিনিময়ে কাজ করল। এরপর খ্রিস্টানরা প্রতি কীরাত কীরাত (মজুরির) বিনিময়ে কাজ করল। এরপর তোমরা (মুসলিমরা) যারা আসরের সালাতের পর থেকে সূর্যাস্ত পর্যন্ত কাজ কর, তারা দুই কীরাত দুই কীরাত (মজুরি) পাবে। এতে ইহুদি ও খ্রিস্টানরা অসন্তুষ্ট হয়ে বলল: আমরা কাজ করেছি বেশি, আর মজুরি পেলাম কম। সে (মালিক) বলল: তোমাদের প্রাপ্য অধিকার থেকে কি আমি কিছু কম দিয়েছি? তারা বলল: না। তখন সে বলল: এটা আমার অনুগ্রহ, যাকে ইচ্ছা আমি তা দান করি।"
5387 - عن أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"مثل المسلمين واليهود والنصارى كمثل رجل استأجر قوما يعملون له عملا يوما إلى الليل على أجر معلوم، فعملوا له نصف النهار، فقالوا: لا حاجة لنا إلى أجرك الذي شرطت لنا، وما عملنا باطل. فقال لهم: لا تفعلوا، أكملوا بقية عملكم، وخذوا أجركم كاملا. فأبوا، وتركوا. واستأجر آخرين بعدهم، فقال لهم: أكملوا بقية يومكم هذا، ولكم الذي شرطت لهم من الأجر، فعملوا حتى إذا كان حين صلاة العصر قالوا: لك ما عملنا باطل، ولك الأجر الذي جعلت لنا فيه، فقال لهم: أكملوا بقية عملكم؛ فإن ما بقي من النهار شيء يسير. فأبوا، فاستأجر قوما أن يعملوا له بقية يومهم، فعملوا بقية يومهم حتى غابت الشمس، واستكملوا أجر الفريقين كليهما، فذلك مثلهم ومثل ما قبلوا من هذا النور".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2271) عن محمد بن العلاء، حدّثنا أبو أسامة، عن بُريد، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره.
وأما ما روي عن أبي سعيد الخدري"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن استئجار الأجير حتى يبين أجره، وعن النجش، واللمس، وإلقاء الحجر". فهو منقطع.
رواه الإمام أحمد (11565)، وأبو داود في مراسيله (169)، وعنه البيهقي (6/ 120) كلهم من طريق حماد (ابن سلمة)، عن حماد (ابن أبي سليمان)، عن إبراهيم، عن أبي سعيد فذكره. واللّفظ لأحمد. وأما أبو داود فاقتصر على النهي عن استئجار الأجير.
قال البيهقي: وهو مرسل بين إبراهيم وأبي سعيد.
قلت: إبراهيم هو ابن يزيد النخعي لم يسمع من أبي سعيد الخدري. وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 97)، وابن حجر في"التلخيص" (3/ 60).
وحماد بن أبي سليمان رمي بكثرة الوهم، وقد وهم في هذا الحديث، فمرة رواه هكذا، وأخرى عن إبراهيم، عن أبي هريرة، وثالثة عن إبراهيم، عن أبي سعيد من قوله، كما هو عند النسائي (7/ 31 - 32)، وهو الذي رجحه أبو زرعة، كما في"علل ابن أبي حاتم" (2/ 443)، وله طرق أخرى وهم فيها، ذكرها البيهقي في"الكبرى"، وفي"الصغرى" (5/ 416). ولذا قال الإمام أحمد: عند حماد بن سلمة عنه تخليط كثير.
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুসলিম, ইহুদি ও খ্রিস্টানদের উদাহরণ হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে কিছু লোককে নির্দিষ্ট পারিশ্রমিকের বিনিময়ে দিন থেকে রাত পর্যন্ত কাজ করার জন্য ভাড়া করল। তারা অর্ধদিবস পর্যন্ত কাজ করার পর বলল: আপনি আমাদের জন্য যে পারিশ্রমিক নির্ধারণ করেছেন, তার আমাদের প্রয়োজন নেই, আর আমরা যে কাজ করেছি তা বাতিল। তখন সে তাদের বলল: তোমরা এমন করো না। তোমাদের বাকি কাজগুলো সম্পূর্ণ করো এবং তোমাদের পূর্ণ পারিশ্রমিক নাও। কিন্তু তারা অস্বীকার করল এবং কাজ ছেড়ে দিল। অতঃপর সে তাদের পরে অন্যদের ভাড়া করল এবং তাদের বলল: তোমরা এই দিনের বাকি অংশ সম্পূর্ণ করো, আর তাদের জন্য আমি যে পারিশ্রমিক নির্ধারণ করেছিলাম, তা তোমাদের জন্য থাকবে। তারা আসরের সালাতের সময় হওয়া পর্যন্ত কাজ করল। এরপর তারা বলল: আমরা যে কাজ করেছি তা বাতিল, আর এর মধ্যে আপনি আমাদের জন্য যে পারিশ্রমিক নির্ধারণ করেছেন তাও আপনার জন্য। তখন সে তাদের বলল: তোমরা তোমাদের বাকি কাজগুলো সম্পূর্ণ করো; দিনের সামান্য অংশই তো বাকি আছে। কিন্তু তারা অস্বীকার করল। এরপর সে অন্য একদল লোককে ভাড়া করল যেন তারা দিনের বাকি অংশ কাজ করে। তারা দিনের বাকি অংশ সূর্যাস্ত পর্যন্ত কাজ করল এবং উভয় দলের পারিশ্রমিকই সম্পূর্ণরূপে গ্রহণ করল। আর এটাই হলো তাদের উদাহরণ এবং এই নূরের (ইসলামের) উদাহরণ, যা তারা গ্রহণ করেছে।
5388 - عن يعلى بن أمية قال: غزوت مع النبي صلى الله عليه وسلم جيش العسرة، فكان من أوثق أعمالي في نفسي، فكان لي أجير، فقاتل إنسانا، فعض أحدهما إصبع صاحبه، فانتزع إصبعه، فأندر ثنيته، فسقطت، فانطلق إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فأهدر ثنيته، وقال:"أفيدع إصبعه في فيك تَقْضَمها -قال: أحسبه قال: - كما يقضم الفحل".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإجارة (2265)، ومسلم في القيامة (1674: 23) كلاهما من طريق ابن جريج قال: أخبرني عطاء، أخبرني صفوان بن يعلى بن أمية، عن أبيه. واللّفظ للبخاريّ.
ইয়া'লা ইবনে উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জাইশুল উসরাহতে (তাবুক যুদ্ধে) অংশ নিয়েছিলাম। এটি আমার কাছে আমার শ্রেষ্ঠতম কাজগুলোর মধ্যে একটি ছিল। আমার একজন মজুর (শ্রমিক) ছিল, সে এক ব্যক্তির সাথে লড়াইয়ে লিপ্ত হলো। তাদের একজন অন্যজনের আঙুলে কামড় দিয়েছিল। লোকটি তখন দ্রুত তার আঙুলটি টেনে সরায় নেয়, ফলে (কামড় দেওয়া ব্যক্তির) একটি সামনের দাঁত উপড়ে পড়ে গেল। লোকটি তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেল। তিনি তার দাঁত উপড়ে যাওয়াকে বাতিল (ক্ষতিপূরণবিহীন) ঘোষণা করলেন এবং বললেন: "তোমার জন্য কি উচিত ছিল যে, সে তার আঙুল তোমার মুখের মধ্যে ফেলে রাখবে আর তুমি তা চিবুতে থাকবে—" (রাবী বলেন, আমার ধারণা তিনি বলেছেন:) "যেমন উট (কোনো কিছু) চিবিয়ে খায়।"
5389 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت:"واستأجر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وأبو بكر رجلا من بني الديل هاديا خريتا، وهو على دين كفار قريش، فدفعا إليه راحلتيهما، وواعداه غار ثور بعد ثلاث ليال، فأتاهما براحلتيهما صبح ثلاث".
صحيح: رواه البخاريّ في الإجارة (2264) عن يحيى بن بكير، حدّثنا الليث، عن عقيل، قال ابن شهاب: فأخبرني عروة بن الزبير أن عائشة قالت فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বানু দীল গোত্রের একজন দক্ষ পথপ্রদর্শককে (হাদিয়ান খাররীত) ভাড়া করলেন। সে তখন কুরাইশ কাফিরদের ধর্মে ছিল। তাঁরা দুজন তাদের সওয়ারী উট দুটি তার হাতে তুলে দিলেন এবং তার সাথে তিন রাত পরে সাওরের গুহায় সাক্ষাৎ করার ওয়াদা করলেন। এরপর সে তৃতীয় দিনের সকালে তাদের সওয়ারী নিয়ে তাঁদের কাছে এল।
5390 - عن أبي سعيد رضي الله عنه قال: انطلق نفر من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم في سفرة سافروها حتى نزلوا على حي من أحياء العرب، فاستضافوهم، فأبوا أن يضيفوهم، فلدغ سيد ذلك الحي، فسعوا له بكل شيء، لا ينفعه شيء. فقال بعضهم: لو أتيتم هؤلاء الرهط الذين نزلوا لعله أن يكون عند بعضهم شيء، فأتوهم، فقالوا: يا أيها الرهط، إن سيدنا لُدغ، وسعينا له بكل شيء لا ينفعه، فهل عند أحد منكم من شيء؟ فقال بعضهم: نعم، واللَّه إني لأرقي، ولكن واللَّه لقد استضفناكم فلم تضيفونا، فما أنا براقٍ لكم حتى تجعلوا لنا جُعلا. فصالحوهم على قطيع من الغنم، فانطلق يتفل عليه ويقرأ: {الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ} فكأنما نشط من عقال، فانطلق يمشي وما به قَلَبَة. قال: فأوفوهم جعلهم الذي صالحوهم عليه. فقال بعضهم: اقسموا، فقال الذي رقي: لا تفعلوا حتى نأتي النبي صلى الله عليه وسلم، فنذكر له الذي كان، فننظر ما يأمرنا، فقدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكروا له، فقال:"وما يدريك أنها رقية". ثم قال:"قد أصبتم، اقسموا، واضربوا لي معكم سهما" فضحك النبي صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإجارة (2276)، ومسلم في السلام (2201: 65) من طريق أبي بحر (هو جعفر بن أبي وحشية)، عن أبي المتوكل (هو الناجي)، عن أبي سعيد الخدري قال فذكره. واللّفظ للبخاريّ.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একদল সাহাবী এক সফরে বের হলেন। তাঁরা আরবের এক গোত্রের কাছে পৌঁছে তাদের আতিথেয়তা চাইলেন। কিন্তু তারা তাঁদের আতিথেয়তা করতে অস্বীকার করল। এরপর সেই গোত্রের সর্দারকে সাপ বা বিচ্ছু দংশন করল। তারা তার জন্য সম্ভাব্য সবরকম চিকিৎসা করল, কিন্তু তাতে কোনো উপকার হলো না। তখন তাদের কেউ কেউ বলল: তোমরা যদি এই লোকগুলোর কাছে যেতে, যারা তোমাদের এখানে আশ্রয় নিয়েছে, তাহলে হয়তো তাদের কারো কাছে কোনো চিকিৎসা থাকতে পারে। অতঃপর তারা সাহাবীদের কাছে এসে বলল: হে দল! আমাদের সর্দারকে দংশন করেছে এবং আমরা তার জন্য সব রকম চেষ্টা করেছি, কিন্তু তাতে কোনো উপকার হচ্ছে না। তোমাদের কারো কাছে কি কোনো চিকিৎসা আছে? তখন সাহাবীদের একজন বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর কসম! আমি ঝাড়ফুঁক করতে পারি। কিন্তু আল্লাহর কসম! আমরা তোমাদের কাছে আতিথেয়তা চেয়েছিলাম, আর তোমরা তা দাওনি। তাই তোমরা যতক্ষণ আমাদের জন্য কিছু পারিশ্রমিক নির্ধারণ না করবে, ততক্ষণ আমি তোমাদের জন্য ঝাড়ফুঁক করব না। তারা তখন এক পাল ছাগলের বিনিময়ে তাদের সাথে চুক্তি করল। অতঃপর সেই সাহাবী তার উপর ফুঁ দিতে লাগলেন এবং পাঠ করতে লাগলেন: {আলহামদু লিল্লাহি রব্বিল আলামীন} (সকল প্রশংসা জগতসমূহের প্রতিপালক আল্লাহর জন্য)। ফলে সে যেন বাঁধনমুক্ত হওয়ার পর উঠে দাঁড়াল এবং হাঁটতে শুরু করল, তার মধ্যে আর কোনো অসুস্থতার চিহ্ন রইল না। বর্ণনাকারী বলেন: তারা চুক্তি অনুযায়ী তাদের পারিশ্রমিক পুরোপুরি দিয়ে দিল। তখন তাদের কেউ কেউ বলল: এগুলো ভাগ করে নাও। যিনি ঝাড়ফুঁক করেছিলেন, তিনি বললেন: তোমরা ভাগ করো না, বরং আমরা নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গিয়ে বিষয়টি জানাব এবং তিনি কী নির্দেশ দেন, তা দেখব। অতঃপর তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উপস্থিত হলেন এবং ঘটনাটি তাঁকে জানালেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাকে কে জানাল যে এটা (সূরা ফাতিহা) একটি রুকইয়াহ (ঝাড়ফুঁক)?" এরপর তিনি বললেন: "তোমরা ঠিকই করেছ। তোমরা ভাগ করে নাও এবং আমার জন্য তোমাদের সাথে একটি অংশ রাখো।" এ কথা শুনে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হেসে দিলেন।
5391 - عن ابن عباس أن نفرا من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مروا بماء فيهم لديغ -أو سليم-، فعرض لهم رجل من أهل الماء، فقال: هل فيكم من راق؛ إن في الماء رجلا لديغا -أو سليما-؟ فانطلق رجل منهم، فقرأ بفاتحة الكتاب على شاء، فبرأ، فجاء بالشاء إلى أصحابه، فكرهوا ذلك، وقالوا: أخذت على كتاب اللَّه أجرا حتى قدموا المدينة، فقالوا: يا رسول اللَّه، أخذ على كتاب اللَّه أجرا؟ فقال عليه السلام:"إن أحق ما أخذتم عليه أجرا كتاب اللَّه".
صحيح: رواه البخاريّ في الطب (5737) عن سيدان بن مضارب أبي محمد الباهلي، حدّثنا أبو معشر البصري -هو صدوق- يوسف بن يزيد البراء قال: حدثني عبيد اللَّه بن الأخنس أبو مالك، عن ابن أبي مليكة، عن ابن عباس فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের একটি দল একটি পানির উৎসের পাশ দিয়ে অতিক্রম করছিলেন, যেখানে একজন সাপে কাটা (বা অসুস্থ) লোক ছিল। তখন সেখানকার অধিবাসীদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি তাদের সামনে এসে বলল: তোমাদের মধ্যে কেউ কি ঝাড়-ফুঁককারী (রাক্বী) আছ? কেননা, এখানে একজন সাপে কাটা (বা অসুস্থ) ব্যক্তি আছে। তখন তাদের মধ্য থেকে একজন লোক গেল এবং কয়েকটি ভেড়ার বিনিময়ে (আর্থিক চুক্তিতে) সূরা ফাতিহা পড়ে ঝাড়-ফুঁক করল। ফলে লোকটি সুস্থ হয়ে গেল। লোকটি ভেড়াগুলো নিয়ে তার সঙ্গীদের কাছে ফিরে এল। তারা এটিকে অপছন্দ করল এবং বলল: তুমি আল্লাহর কিতাবের বিনিময়ে পারিশ্রমিক গ্রহণ করেছ? অবশেষে যখন তারা মদীনায় পৌঁছালেন, তখন তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সে আল্লাহর কিতাবের বিনিময়ে পারিশ্রমিক গ্রহণ করেছে? তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা যে জিনিসের বিনিময়ে পারিশ্রমিক গ্রহণ করো, তার মধ্যে আল্লাহর কিতাবই হলো সবচেয়ে বেশি হকদার।"
5392 - عن خارجة بن الصلت، عن عمه أنه مر بقوم، فأتوه، فقالوا: إنك جئت من
عند هذا الرجل بخير، فارق لنا هذا الرجل. فأتوه برجل معتوه في القيود، فرقاه بأم القرآن ثلاثة أيام غدوة وعشية، وكلما ختمها جمع بزاقه، ثم تفل فكأنما أنشط من عقال، فأعطوه شيئا، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره له، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"كل، فلعمري لمن أكل برقية باطل لقد أكلت برقية حق".
وفي رواية: فأعطوه مائة شاة.
حسين: رواه أبو داود (3420، 3896، 3897، 3901)، وابن ماجه (6111)، وأحمد (21835)، وصحّحه ابن حبان (6110)، والحاكم (1/ 559 - 560) كلّهم من طرق عن عامر الشعبي، عن خارجة بن الصلت، عن عمه فذكره.
واسم عمه عِلاقة بن صُحار. وقيل: عبد اللَّه بن عِثير.
قال الحاكم: صحيح الإسناد.
قلت: إسناده حسن من أجل خارجة بن الصلت؛ فإنه لم يوثّقه أحد غير ابن حبان، وروى له اثنان، ونقل المزي في تهذيبه في ترجمة عامر الشعبي الراوي عن خارجة بن الصلت: عن أبي بكر بن أبي خيثمة قال: سمعت يحيى بن معين يقول: إذا حدث الشعبي عن رجل، فسماه فهو ثقة يحتج بحديثه.
واختصره ابن حجر في ترجمة الشعبي، فأصاب، وفي ترجمة خارجة بن الصلت فأخطأ، فنسب هذا القول إلى ابن أبي خيثمة نفسه.
ثم قول ابن معين هذا قد لا يكون مطردا في كل من روى عنه الشعبي، إلا ما يطمئن به القلب من القرائن، وقد تكلمت بإسهاب في هذا الموضوع في كتابي"دراسات في الجرح والتعديل" فراجعه لزاما.
فقه هذا الباب: أحاديث هذا الباب تدل على جواز أخذ الأجرة على تعليم القرآن وجواز شرطه.
وكان بالمدينة ثلاثة معلمين يعلمون الصبيان، وكان عمر بن الخطاب يرزق كل واحد منهم خمسة عشر درهما كل شهر.
رواه أبو بكر بن أبي شيبة (4/ 346 رقم 2028) عن وكيع، عن صدقة بن موسى الدمشقي -وفي رواية: الدقيقي-، عن الوضين بن عطاء قال فذكره. ورواه البيهقي (6/ 124) من وجه آخر عن وكيع، وقال: وكذلك رواه أبو بكر بن أبي شيبة عن وكيع.
إلا أن الوضين بن عطاء لم يدرك زمان عمر بن الخطاب.
وذكر البخاري في ترجمة الباب (4/ 452):"وقال الشعبي: لا يشترط المعلم، إلا أن يعطي شيئا فليقبله. وقال الحكم: لم أسمع أحدا كره أجر المعلم. وأعطى الحسن دراهم عشرة. ولم ير ابن سيرين بأجر القسام بأسا".
وفيه دليل على جواز الرقية بالقرآن؛ لأن القراءة والرقية من الأعمال المباحة، وقد أباح له أخذ الأجرة، فكذلك ما يفعله الطبيب من قول أو فعل.
وذهب جماعة من أهل العلم إلى أن أخذ الأجرة على تعليم القرآن غير مباح. ولهم في ذلك أحاديث، كما في الباب الآتي.
ইলাক্বাহ ইবনু সুহার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একদল লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তারা তাঁর কাছে এসে বললো: "আপনি এই লোকটির (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এর) কাছ থেকে কল্যাণ নিয়ে এসেছেন। আমাদের এই লোকটির জন্য ঝাড়ফুঁক করুন।" অতঃপর তারা শৃঙ্খলিত এক উন্মাদকে তাঁর কাছে আনলো। তিনি (ঐ উন্মাদকে) তিনদিন সকাল-সন্ধ্যায় উম্মুল কুরআন (সূরা আল-ফাতিহা) দ্বারা ঝাড়ফুঁক করলেন। যখনই তিনি (ফাতিহা) শেষ করতেন, তখন থুথু জমা করতেন, তারপর ফুঁ দিতেন (হালকা থুথু ছিটিয়ে দিতেন)। ফলে লোকটি এমনভাবে সুস্থ হয়ে গেলো যেনো তাকে রশি দিয়ে বাঁধা অবস্থা থেকে খুলে দেওয়া হয়েছে। তারা তাঁকে কিছু পারিশ্রমিক দিলো। এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে ঘটনাটি তাঁকে জানালেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তা ভক্ষণ করো (গ্রহণ করো)। আমার জীবনের শপথ! যারা বাতিলের (অবৈধ বা শির্কযুক্ত) ঝাড়ফুঁকের মাধ্যমে পারিশ্রমিক গ্রহণ করে, (তাদের বিপরীতে) তুমি তো সত্যের (হকের) ঝাড়ফুঁকের মাধ্যমে উপার্জন করেছো।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তারা তাঁকে একশ’টি বকরী দিয়েছিলো।
5393 - عن عبادة بن الصامت قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يُشْغَلُ، فإذا قدم رجل مهاجر على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم دفعه إلى رجل منا يعلمه القرآن، فدفع إلي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رجلا، فكان معي في البيت، أعشيه عشاء أهل البيت، فكنت أقرئه القرآن، فانصرف انصرافة إلى أهله، فرأى أن عليه حقا، فأهدى إلي قوسا لم أر أجود منها عودا، ولا أحسن منها عِطفا، فأتيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقلت: ما ترى يا رسول اللَّه فيها؟ قال:"جمرة بين كتفيك تقلدتها، أو تعلقتها".
حسن: رواه أبو داود (3417)، وأحمد (22766)، والحاكم (3/ 356) كلّهم من طريق بشر ابن عبد اللَّه يعني ابن بشار السلمي قال: حدثني عبادة بن نسي، عن جنادة بن أبي أمية، عن عبادة ابن الصامت قال. فذكره. واللّفظ لأحمد وأبو داود أحال على الإسناد الذي يأتي.
قال الحاكم: صحيح الإسناد.
قلت: فيه بشر بن عبد اللَّه السلمي لم يوثّقه غير ابن حبان إلا أنه توبع. رواه أبو داود (3416)، ومن طريقه البيهقي (6/ 125)، وابن ماجه (2157)، وأحمد (22689)، والحاكم (2/ 41) كلّهم من حديث المغيرة بن زياد، عن عبادة بن نسي، عن الأسود بن ثعلبة، عن عبادة بن الصامت قال: علمت ناسا من أهل الصفة الكتاب والقرآن، فأهدى إلي رجل قوسا، فقلت: لآتين رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فلأسألنه، فأتيته، فقلت: يا رسول اللَّه، رجل أهدى إلى قوسا ممن كنت أعلمه الكتاب والقرآن، وليست بمال وأرمي عنها في سبيل اللَّه. قال:"إن كنت تحب أن تطوق طوقا من نار فاقبلها".
وفيه المغيرة بن زياد وهو أبو هاشم الموصلي، وثّقه وكيع ويحيى بن معين والعجلي وغيره. وتكلم فيه الإمام أحمد والبخاري وأبو حاتم وغيرهم. ولكنه توبع، كما رأيت.
قال علي بن المديني:"إسناده كله معروف إلا الأسود بن ثعلية، فإنا لا نحفظ عنه إلا هذا الحديث". ذكره البيهقي.
قلت: والأسود بن ثعلبة مجهول، كما في التقريب، إلا أنه توبع في الإسناد الأول، والحديث حسن بمجموع طريقيه.
وقول البيهقي:"هذا حديث مختلف فيه على عبادة بن نسي، كما ترى". فيه نظر؛ لأن هذا
الاختلاف لا يضر؛ فإن إحدى طريقيه تقوي الثانية.
قال ابن عبد البر:"هذا حديث معروف عند أهل العلم؛ لأنه روي عن عبادة من وجهين".
উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যস্ত থাকতেন। যখনই কোনো মুহাজির ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করত, তখন তিনি তাকে আমাদের মধ্যেকার কোনো এক ব্যক্তির হাতে সোপর্দ করতেন, যে তাকে কুরআন শিক্ষা দিত। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার হাতেও একজন লোককে সোপর্দ করলেন। সে আমার সাথেই ঘরে থাকত। আমি তাকে পরিবারের লোকদের মতো রাতের খাবার খাওয়াতাম। আর আমি তাকে কুরআন শিক্ষা দিতাম। এরপর সে তার পরিবারের কাছে ফিরে গেল এবং সে মনে করল যে, আমার উপর তার কোনো হক বা অধিকার রয়েছে। ফলে সে আমাকে একটি ধনুক উপহার দিল। আমি এর চেয়ে উৎকৃষ্ট কাষ্ঠের তৈরি এবং এর চেয়ে সুন্দর বক্রতা বিশিষ্ট কোনো ধনুক দেখিনি। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এ ব্যাপারে আপনার কী অভিমত? তিনি বললেন: "এটি তোমার দুই কাঁধের মাঝখানে ঝুলানো বা পরিধান করা (জাহান্নামের) একটি জ্বলন্ত অঙ্গার।"
5394 - عن عبد الرحمن بن شبل قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"اقرؤوا القرآن، ولا تغلوا فيه، ولا تجفوا عنه، ولا تأكلوا به، ولا تستكثروا به".
صحيح: رواه الإمام أحمد (15529) عن إسماعيل بن إبراهيم، عن هشام -يعني الدستوائي- قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، عن أبي راشد الحبراني قال: قال عبد الرحمن بن شبل فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا المستغفري في فضائل القرآن (5).
وإسناده صحيح. وصحّحه أيضًا الدارقطني في"العلل" (9/ 278).
وتابعه أيوب السختياني، عن يحيى بإسناده. رواه وهيب بن خالد عنه. أخرجه الطبراني في المعجم الأوسط" (2595) إلا أنه زاد في لفظ الحديث.
"إن النساء هم أهل النّار"، فقال رجل: يا رسول اللَّه، ألسن أمهاتنا وأخواتنا وبناتنا؟ فذكر كفر من لحق الزوج، وتضييعهن لحقه.
وقد صح سماع يحيى بن أبي كثير عن أبي راشد. وما جاء في بعض الروايات أنه روي عن زيد ابن سلام، عن جده أبي سلام ممطور قال: كتب معاوية إلى عبد الرحمن بن شبل أن علِّم النّاس ما سمعت من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فجمعهم، فقال. فذكره.
رواه الإمام أحمد (15666/ 1) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (19444) -، ومن طريق همام (15668)، وأبان (15669) كلّهم -أعني معمر، وهمام، وأبان-، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بإسناده، فلا يضر؛ فإن كليهما صحيح، كما قال أبو حاتم في"العلل" (2/ 63) إلا أنه قال: إن أيوب ترك من الإسناد رجلين.
قلت: وكذلك فعل أيضًا هشام الدستوائي، كما سبق، فلا يلام أيوب.
আবদুর রহমান ইবনে শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “তোমরা কুরআন তিলাওয়াত করো, এর ব্যাপারে বাড়াবাড়ি করো না, এটিকে উপেক্ষা করো না, এর বিনিময়ে (দুনিয়ার) উপার্জন করো না এবং এর দ্বারা বেশি সম্পদ বৃদ্ধি করো না।”
5395 - عن أبي الدرداء أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أخذ قوسا على تعليم القرآن قلده اللَّه قوسا من نار".
حسن: رواه البيهقي (6/ 126) من حديث عثمان بن سعيد الدارمي، ثنا عبد الرحمن بن يحيى ابن إسماعيل بن عبيد اللَّه، ثنا الوليد بن مسلم، ثنا سعيد بن عبد العزيز، عن إسماعيل بن عبيد اللَّه، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء فذكره.
ضعفه البيهقي، ونقل عن دحيم أنه قال: ليس له أصل.
وقال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 186):"ورواه سمويه في فوائده عن عبد الرحمن. وقد روى مسلم في صحيحه حديثا عن داود بن رشيد، عن الوليد بن مسلم بهذا الإسناد عن أبي الدرداء
في الصوم في السفر (1122).
وعبد الرحمن هذا قال ابن أبي حاتم:"روى عنه أبي، وسمع منه في الرحلة الأولى، وسألته عنه، فقال: ما بحديثه بأس، صدوق". انتهى.
وقال ابن التركماني في الجوهر النقي:"أخرجه البيهقي بسند جيد، فلا أدري ما وجه ضعفه، وكونه لا أصل له".
وفي الباب ما روي عن أبي بن كعب قال: علمت رجلا القرآن، فأهدى إلي قوسا، فذكرت ذلك لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"إن أخذتها أخذت قوسا من نار"، فرددتها.
رواه ابن ماجه (2158) عن سهل بن أبي سهل قال: حدّثنا يحيى بن سعيد، عن ثور بن يزيد قال: حدّثنا خالد بن معدان قال: حدثني عبد الرحمن بن سلم، عن عطية الكلاعي، عن أبي بن كعب فذكره.
ورواه البيهقي (6/ 125 - 126) من وجه آخر، عن يحيى بن سعيد بإسناده، إلا أنه أسقط خالد ابن معدان بين ثور وعبد الرحمن.
وفي الإسناد عبد الرحمن بن سلم، وهو شامي، قال المزي في تهذيبه:"روى عنه ثور بن يزيد، وفي إسناد حديثه اختلاف كثير". وكذا في تهذيب التهذيب، وأنهما عزيا حديثه إلى ابن ماجه. قال المزي:"روى له ابن ماجه هذا الحديث الواحد".
وفي النسخة المطبوعة لسنن بن ماجه بتحقيق فؤاد عبد الباقي بإثبات خالد بن معدان. وكذا في تحفة الأشراف (1/ 35) أيضًا. ولكن في نسخة السنن بتحقيق الدكتور محمد مصطفى الأعظمي بدونه. فالظاهر أنه وقع خلاف بين نسخ ابن ماجه من القديم.
وعلى كل، فإن عبد الرحمن بن سلم مجهول.
وفي الإسناد أيضًا عطية وهو ابن قيس الكلاعي، ذكر العلائي في جامع التحصيل (527) عن أبي بن كعب، وأبي الدرداء مرسلا قاله في التهذيب.
كذا قال! ولم يذكر في التهذيب، ولا في تهذيب التهذيب أن روايته عن أبي بن كعب، وأبي الدرداء مرسلة. بل في التهذيب: قال أبو مسهر: كان مولد عطية بن قيس في حياة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في سنة سبع، وغزا في خلافة معاوية، وتوفي سنة عشر ومائة. وقال ابنه:"مات أبي وهو ابن أربع ومائه". فلقاؤه ممكن. ثم عطية هذا قد توبع في بعض الروايات، تابعه أبان عن أبي بن كعب.
فانحصرت العلة في جهالة عبد الرحمن بن سلم.
فقه هذا الباب: أحاديث هذا الباب تدل على كراهة أخذ الأجرة على تعليم القرآن، وبه قال أبو حنيفة، وإسحاق. ثم اختلف أهل العلم في بعض الصور دون الأخرى: فمنهم من جعل الكراهة إذا اشترط بذلك.
ومنهم من جعل الكراهة إذا كان عمل حسبة للَّه، فليس له أن يأخذ عليه أجرا؛ لأن الأجر مناف للحسبة. وأما إذا لم يحتسب ولم يطلب عليه الأجرة فجائز كما في حديث ابن عباس في الباب السابق.
ومنهم من قال: إذا لا يوجد في المسلمين من يعلم القرآن إلا شخص واحد فعليه أن يعلمهم، ولا يأخذ عليه أجرا؛ لأن تعليمه إياهم صار عليه فرض عين بخلاف إذا كان فيهم غيره، فجاز له أخذ الأجرة.
أما إذا كان هذا الأجر من الحاكم الذي هو الراعي لمصلحة الأمة فلا كراهة في ذلك بالاتفاق؛ لأن تحديد الأجر منه يساعد على إدارة شؤون البلاد، وهذا الذي جرى عليه العمل منذ الخلفاء الراشدين إلى يومنا هذا.
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কুরআন শিক্ষার বিনিময়ে ধনুক গ্রহণ করে, আল্লাহ তাকে আগুনের একটি ধনুক পরিয়ে দেবেন।"
5396 - عن ابن عمر أن عمر بن الخطاب أجلى اليهود والنصارى من أرض الحجاز، وأن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما ظهر على خيبر أراد إخراج اليهود منها. وكانت الأرض حين ظهر عليها للَّه ولرسوله وللمسلمين، فأراد إخراج اليهود منها، فسألت اليهود رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يقرهم بها على أن يكفوا عملها، ولهم نصف الثمر. فقال لهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"نقركم بها على ذلك ما شئنا" فقروا بها حتى أجلاهم عمر إلى تيماء، وأريحاء.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2338) ومسلم في المساقاة (1551/ 6) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، حدثني موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره، ولفظهما سواء.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইহুদী ও খ্রিস্টানদেরকে হেজাজ ভূমি থেকে নির্বাসিত করেছিলেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন খায়বার জয় করেন, তখন তিনি সেখান থেকে ইহুদীদেরকে বের করে দিতে চেয়েছিলেন। কেননা যখন তিনি তা জয় করেছিলেন, তখন সেই ভূমি আল্লাহ, তাঁর রাসূল এবং মুসলমানদের সম্পত্তি হয়েছিল। তাই তিনি ইহুদীদেরকে সেখান থেকে বের করে দিতে চাইলেন। তখন ইহুদীরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আবেদন জানালো যে, তাদেরকে সেখানে থাকতে দেওয়া হোক এই শর্তে যে, তারা এর কাজ চালিয়ে যাবে এবং উৎপন্ন ফসলের অর্ধেক তাদের থাকবে। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে বললেন: "আমরা যতক্ষণ চাইব, ততক্ষণ তোমাদেরকে এই শর্তে সেখানে থাকতে দেব।" অতঃপর তারা সেখানে থাকল, যতক্ষণ না উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের তায়মা এবং আরীহা-তে নির্বাসিত করলেন।
5397 - عن * *
৫৩৯৭ - থেকে বর্ণিত * *
5398 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه ذكر رجلا من بني إسرائيل، سأل بعض بني إسرائيل أن يسلفه ألف دينار، فقال: ائتني بالشهداء أشهدهم. فقال: كفى باللَّه شهيدا. قال: فأتني بالكفيل. قال: كفى باللَّه كفيلا. قال: صدقت. فدفعها إليه على أجل مسمى، فخرج في البحر، فقضى حاجته، ثم التمس مركبا يركبها يقدم عليه للأجل الذي أجله، فلم يجد مركبا، فأخذ خشبة، فنقرها، فأدخل فيها ألف دينار وصحيفة منه إلى صاحبه، ثم زجج موضعها، ثم أتى بها إلى البحر، فقال: اللهمّ إنك تعلم أني كنت تسلفت فلانا ألف دينار، فسألني كفيلا، فقلت: كفى باللَّه كفيلا. فرضي بك. وسألني شهيدا، فقلت: كفى باللَّه شهيدا. فرضي بذلك. وأني جهدت أن أجد مركبا أبعث إليه الذي له فلم أقدر، وإني أستودعكها، فرمى بها في البحر حتى ولجت فيه، ثم انصرف، وهو في ذلك يلتمس مركبا يخرج إلى بلده، فخرج الرجل الذي كان أسلفه ينظر لعل مركبا قد جاء بماله، فإذا بالخشبة التي فيها المال، فأخذها لأهله حطبا، فلما نشرها وجد المال والصحيفة، ثم قدم الذي كان أسلفه، فأتى بالألف دينار، فقال: واللَّه ما زلت جاهدا في طلب مركب لآتيك بمالك، فما وجدت مركبا قبل الذي أتيت فيه. قال: هل كنت بعثت إلي بشيء؟ قال: أخبرك أني لم أجد مركبا قبل الذي جئت فيه. قال: فإن اللَّه قد أدى عنك الذي بعثت في الخشبة، فانصرف بالألف الدينار راشدا".
صحيح: رواه البخاريّ في الكفالة (2291) معلقا مجزوما، فقال: وقال الليث، حدثني جعفر ابن ربيعة، عن عبد الرحمن بن هرمز، عن أبي هريرة فذكره. هذا علقه البخاري، ووصله في آخره في رواية أبي ذر، وأبي الوقت، فقال: حدثني عبد اللَّه بن صالح، حدثني الليث به.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনী ইসরাঈলের এক ব্যক্তির কথা উল্লেখ করলেন, যে বনী ইসরাঈলের আরেক ব্যক্তির কাছে এক হাজার দীনার কর্জ চেয়েছিল। সে (ঋণদাতা) বলল: তুমি আমার কাছে সাক্ষী উপস্থিত করো, যাতে তারা সাক্ষী থাকে। সে (ঋণগ্রহীতা) বলল: সাক্ষী হিসেবে আল্লাহই যথেষ্ট। সে (ঋণদাতা) বলল: তবে আমার কাছে জামিনদার নিয়ে এসো। সে (ঋণগ্রহীতা) বলল: জামিনদার হিসেবে আল্লাহই যথেষ্ট। সে (ঋণদাতা) বলল: তুমি সত্য বলেছ। অতঃপর সে নির্দিষ্ট মেয়াদের জন্য তাকে তা (দীনার) দিয়ে দিল।
লোকটি সমুদ্রে বেরিয়ে পড়ল এবং তার প্রয়োজন পূরণ করল। এরপর সে একটি নৌকার সন্ধান করতে লাগল, যাতে সে তার নির্দিষ্ট মেয়াদের মধ্যে তার কাছে ফিরে আসতে পারে। কিন্তু সে কোনো নৌকা পেল না। অতঃপর সে একখণ্ড কাঠ নিল এবং তা ছিদ্র করে তার মধ্যে এক হাজার দীনার এবং তার পাওনাদারের জন্য নিজের একটি পত্র ঢুকিয়ে দিল। তারপর সে স্থানটি বন্ধ করে দিল। এরপর তা নিয়ে সে সমুদ্রের কাছে এসে বলল: হে আল্লাহ! তুমি জানো, আমি অমুক ব্যক্তির কাছ থেকে এক হাজার দীনার কর্জ নিয়েছিলাম। সে আমার কাছে জামিন চেয়েছিল, তখন আমি বলেছিলাম: জামিন হিসেবে আল্লাহই যথেষ্ট। আর সে তোমার ওপর সন্তুষ্ট হয়েছিল। সে আমার কাছে সাক্ষী চেয়েছিল, তখন আমি বলেছিলাম: সাক্ষী হিসেবে আল্লাহই যথেষ্ট। আর সে তাতেই সন্তুষ্ট হয়েছিল। আর আমি যথাসাধ্য চেষ্টা করেছি, যাতে একটি নৌকা খুঁজে পাই এবং তার প্রাপ্য (অর্থ) তার কাছে পৌঁছে দিতে পারি, কিন্তু আমি সক্ষম হইনি। আর আমি এটি তোমার কাছে গচ্ছিত রাখছি।
এরপর সে কাঠটি সমুদ্রে নিক্ষেপ করল, যতক্ষণ না সেটি ভেতরে প্রবেশ করল। তারপর সে ফিরে গেল। সে তখনও এমন একটি নৌকার সন্ধান করছিল, যা তাকে তার শহরে পৌঁছে দেবে। ইতোমধ্যে সেই লোকটি (ঋণদাতা) বেরিয়ে এল, যে কর্জ দিয়েছিল—এই আশায় যে, হয়তো কোনো নৌকা তার মাল নিয়ে এসেছে। হঠাৎ সে দেখতে পেল সেই কাঠখণ্ড, যার মধ্যে মাল ছিল। সে কাঠটি তার পরিবারের জ্বালানি হিসেবে গ্রহণ করল। যখন সে কাঠটি ফালা ফালা করল, তখন সে তার মধ্যে অর্থ ও পত্রটি পেল।
এরপর সেই লোকটি (ঋণগ্রহীতা) ফিরে এল, যে কর্জ নিয়েছিল। সে এক হাজার দীনার নিয়ে এসে বলল: আল্লাহর কসম! আমি তোমার মাল নিয়ে আসার জন্য নৌকার সন্ধানে নিরন্তর চেষ্টা করেছি, কিন্তু আমি যে নৌকায় এসেছি, তার আগে কোনো নৌকা পাইনি। সে (ঋণদাতা) বলল: তুমি কি আমার কাছে কিছু পাঠিয়েছিলে? সে বলল: আমি তো আপনাকে বলছি যে, আমি যে নৌকায় এসেছি তার আগে কোনো নৌকা পাইনি। সে (ঋণদাতা) বলল: আল্লাহ তাআলা তোমার পক্ষ থেকে সেই অর্থ পরিশোধ করে দিয়েছেন, যা তুমি কাঠের মধ্যে করে পাঠিয়েছিলে। তুমি এক হাজার দীনার নিয়ে সঠিক পথে ফিরে যাও।
5399 - عن ابن عباس أن رجلا لزم غريما له بعشرة دنانير، فقال: واللَّه لا أفارقك حتى تقضيني، أو تأتيني بحميل، فتحمل بها النبي صلى الله عليه وسلم، فأتاه بقدر ما وعده، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"من أين أصبت هذا الذهب؟" قال: من معدن. قال:"لا حاجة لنا
فيها، وليس فيها خير". فقضاها عنه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أبو داود (3328)، وابن ماجه (3406)، وعبد بن حميد (596)، والحاكم (2/ 10 - 11)، والبيهقي (6/ 74) كلّهم من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن عمرو بن أبي عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. واللّفظ لأبي داود. وفي لفظ غيره: فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"كم تستنظره؟" فقال: شهرا. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فأنا أحمل له".
وإسناده حسن من أجل الدراوردي؛ فإنه حسن الحديث. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.
قال البيهقي:"وفي هذا الدلالة على أن الحق بقي في ذمته بعد التحمل حتى أكد عليه مقدار الاستنظار، ثم أنه صلى الله عليه وسلم تطوع بالقضاء عنه، وتنزه عن التصرف في مال المعدن".
وقوله:"لا حاجة لنا فيها" لأنه تحمل عنه دنانير مضروبة كانت تحمل إليهم من بلاد الروم؛ لأن أول من وضع السكة في الإسلام، وضرب الدنانير عبد اللَّه بن مروان، كما هو معروف.
والذي جاء به ذهبٌ غير مضروب، فتنزه النبي صلى الله عليه وسلم عن القبول.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার দশ দীনারের ঋণগ্রস্তকে আঁকড়ে ধরল এবং বলল: আল্লাহর কসম! তুমি যতক্ষণ না আমাকে পাওনা পরিশোধ করবে, অথবা একজন জামিন নিয়ে আসবে, আমি তোমাকে ছাড়ব না। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই ঋণের জামিন হলেন। এরপর (ঋণগ্রস্ত লোকটি) তিনি যা ওয়াদা করেছিলেন সেই পরিমাণ (স্বর্ণ) নিয়ে আসলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "এই স্বর্ণ তুমি কোথা থেকে পেলে?" সে বলল: খনি থেকে। তিনি বললেন: "এতে আমাদের কোনো প্রয়োজন নেই, এবং এতে কোনো কল্যাণও নেই।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার পক্ষ থেকে ঋণটি পরিশোধ করে দিলেন। অন্য এক বর্ণনায় আছে: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি তাকে কতদিন অবকাশ দেবে?" সে বলল: এক মাস। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাহলে আমি তার জামিন হচ্ছি।"
5400 - عن سلمة بن الأكوع أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي بجنازة ليصلي عليها، فقال:"هل عليه من دين؟ قالوا: لا. فصلى عليه، ثم أتي بجنازة أخرى، فقال:"هل عليه من دين؟" قالوا: نعم. قال:"صلوا على صاحبكم" قال أبو قتادة: علي دينه يا رسول اللَّه، فصلى عليه.
صحيح: رواه البخاريّ في الكفالة (2295) عن أبي عاصم، عن يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة ابن الأكوع فذكره. سبق ذكره وما في معناه في الجنائز.
সালামা ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একটি জানাযা আনা হলো যেন তিনি সেটির উপর সালাত আদায় করেন। তিনি বললেন, "তার কি কোনো ঋণ আছে?" লোকেরা বলল, "না।" তখন তিনি তার উপর সালাত আদায় করলেন। এরপর আরেকটি জানাযা আনা হলো। তিনি বললেন, "তার কি কোনো ঋণ আছে?" লোকেরা বলল, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "তোমরা তোমাদের সাথীর জানাযার সালাত আদায় করো।" আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তার ঋণের দায়িত্ব আমার উপর।" তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার (মৃত ব্যক্তির) উপর সালাত আদায় করলেন।