হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5401)


5401 - عن أبي أمامة الباهلي قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"الزعيم غارم، والدين مقضي".

حسن: رواه أبو داود (3565)، والترمذي (1265)، وابن ماجه (2405)، والبيهقي (6/ 72)، وأحمد (22294) كلّهم من حديث إسماعيل بن عياش قال: حدثني شرحبيل بن مسلم الخولاني قال: سمعت أبا أمامة يقول فذكره.

وهو حديث طويل ذُكرت أجزاؤه مفرقة في كتب السنة، وكامله -كما ذكر أحمد وغيره- أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب عام حجة الوداع، فقال:"إن اللَّه قد أعطى كل ذي حق حقه؛ فلا وصية لوارث،
والولد للفراش وللعاهر الحجر، وحسابهم على اللَّه، ومن ادعى إلى غير أبيه أو انتمى إلى غير مواليه فعليه لعنة اللَّه التابعة إلى يوم القيامة. لا تنفق المرأة شيئًا من بيتها إلا بإذن زوجها" قيل: يا رسول اللَّه، ولا الطعام؟ قال:"ذلك أفضل أموالنا" ثم قال:"العارية مؤداة، والمنحة مردودة، والدين مقضي، والزعيم غارم". قال الترمذيّ: حسن غريب.

قلت: وهو كما قال؛ فإن إسماعيل بن عياش حسن في روايته عن أهل بلده الشاميين، وهذا منها، ولا يروى إلا من طريقه.

وشرحبيل بن مسلم مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

ولبعض فقراته شواهد من الصحابة الآخرين، تم تخريجها في مواضعها.




আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “জামিনদার ক্ষতিপূরণ দিতে বাধ্য, আর ঋণ অবশ্যই পরিশোধযোগ্য।”

আর তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই দীর্ঘ হাদীসটি (হজ্জাতুল বিদাআর খুতবা) সম্পর্কে ইমাম আহমাদ এবং অন্যান্যরা উল্লেখ করেছেন যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের বছর খুতবা দিয়েছিলেন এবং বলেছিলেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা প্রত্যেক হকদারকে তার হক দিয়ে দিয়েছেন; সুতরাং কোনো ওয়ারিশের জন্য কোনো অসিয়ত নেই। আর সন্তান বিছানার (মালিকের), আর ব্যভিচারীর জন্য পাথর (রয়েছে), তাদের (ভিতরের) হিসাব আল্লাহর উপর ন্যস্ত। যে ব্যক্তি নিজের পিতাকে ব্যতীত অন্য কারো দিকে নিজেকে দাবি করে অথবা নিজের মাওলাগণ ব্যতীত অন্য কারো সাথে নিজেকে সম্পর্কিত করে, তার উপর কিয়ামত দিবস পর্যন্ত আল্লাহর লাগাতার লা’নত বর্ষিত হতে থাকে। কোনো মহিলা তার স্বামীর ঘরের কোনো জিনিস তার অনুমতি ব্যতীত খরচ করবে না।” জিজ্ঞেস করা হলো: “হে আল্লাহর রাসূল! খাবারও না?” তিনি বললেন: “তা তো আমাদের উত্তম সম্পদ।” অতঃপর তিনি বললেন: “ধারকৃত জিনিস অবশ্যই ফেরত দিতে হবে, দানস্বরূপ নেওয়া বস্তু ফিরিয়ে দিতে হবে, ঋণ অবশ্যই পরিশোধ করতে হবে, আর জামিনদার ক্ষতিপূরণ দিতে বাধ্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (5402)


5402 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"مطل الغني ظلم، وإذا أتبع أحدكم على مليء فليتبع".

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (84) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة به. ورواه البخاري في الحوالة (2287)، ومسلم في المساقاة (1514) كلاهما من طريق مالك به مثله.

قوله:"مطل الغني" أصل المطل المد، يقال: مطلت الحديدة إذا مددتها لتطول. والمراد تأخير ما استحق أداؤه بغير عذر.

ومعناه إذا أحيل أحدكم على مليء فليتبع، فقال بعض أهل العلم: إذا أحيل الرجل على مليء، فاحتاله، فقد برئ المحيل، وليس له أن يرجع على المحيل، وهو قول الشافعي، وأحمد، وإسحاق. ذكره الترمذيّ (1308).

قلت: وهو الذي يدل عليه الحديث. ولأهل العلم أقوال أخرى ذكرها الترمذيّ.

أما ما روي عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مطل الغني ظلم، وإن أحلت على مليء فاتبعه، ولا تبع بيعتين في بيعة" ففيه انقطاع.

رواه الترمذيّ (1309)، وابن ماجه (2404)، وأحمد (5395)، والطحاوي في مشكله (2754)، وابن الجارود (599) كلّهم من طرق عن هشيم بن بشير، حدّثنا يونس بن عبيد، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ويونس بن عبيد لم يسمع من نافع أول الحديث، كما صرح به ابن معين.

انظر تخريجه في جموع أبواب ما ينهى عنه من البيوع، باب فيمن باع بيعتين في بيعة. وانظر فقه الحديث في"المنة الكبرى" (5/ 330).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ধনী ব্যক্তির (ঋণ পরিশোধে) টালবাহানা করা জুলুম (অন্যায়)। আর যখন তোমাদের কাউকে কোনো সচ্ছল ব্যক্তির উপর হাওলা (স্থানান্তরিত) করা হয়, তখন তার উচিত তা অনুসরণ করা (অর্থাৎ হাওলা মেনে নেওয়া)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5403)


5403 - عن أبي هريرة قال: وكّلني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بحفظ زكاة رمضان، فأتاني آت، فجعل يحثو من الطعام، فأخذته، وقلت: واللَّه لأرفعنك إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. قال: إني محتاج، وعلي عيال، ولي حاجة شديدة. قال: فخليت عنه، فأصبحت، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا أبا هريرة، ما فعل أسيرك البارحة" قال: قلت: يا رسول اللَّه، شكاحاجة شديدة وعيالا، فرحمته، فخليت سبيله. قال:"أما إنه قد كذبك، وسيعود" فعرفت أنه سيعود لقول رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: إنه سيعود، فرصدته، فجاء يحثو من الطعام، فأخذته، فقلت لأرفعنك إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: دعني؛ فإني محتاج، وعلي عيال، لا أعود. فرحمته، فخليت سبيله، فأصبحت، فقال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا أبا هريرة، ما فعل أسيرك؟" قلت: يا رسول اللَّه، شكا حاجة شديدة وعيالا، فرحمته، فخليت سبيله. قال:"أما إنه قد كذبك، وسيعود" فرصدته الثالثة، فجاء يحثو من الطعام، فأخذته، فقلت: لأرفعنك إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وهذا آخر ثلاث مرات أنك تزعم لا تعود، ثم تعود. قال: دعني أعلمك كلمات ينفعك اللَّه بها. قلت: ما هو؟ قال: إذا أويت إلى فراشك فاقرأ آية الكرسي: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ. . . .} حتى تختم الآية، فإنك لن يزال عليك من اللَّه حافظ، ولا يقربنك شيطان حتى تصبح، فخليت سبيله، فأصبحت، فقال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما فعل أسيرك البارحة" قلت: يا رسول اللَّه، زعم أنه يعلمني كلمات ينفعني اللَّه بها، فخليت سبيله. قال:"ما هي؟" قلت: قال لي: إذا أويت إلى فراشك فاقرأ آية الكرسي من أولها حتى تختم الآية: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ. . .} وقال لي: لن يزال عليك من اللَّه حافظ، ولا يقربك شيطان حتى تصبح، وكانوا أحرص شيء على الخير، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أما إنه قد صدقك وهو كذوب، تعلم من تخاطب منذ ثلاث ليال يا أبا هريرة". قال: لا. قال:"ذاك شيطان".

صحيح: رواه البخاريّ في الوكالة (2311) تعليقا قال: وقال عثمان بن الهيثم أبو عمرو،
حدّثنا عوف، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة فذكره.

ووصله النسائي في"الكبرى" (10729) عن إبراهيم بن يعقوب، وابن خزيمة (2424) عن هلال بن بشر، كلاهما عن عثمان بن الهيثم به.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে রমযানের যাকাতের খাদ্যদ্রব্য (রক্ষার) দায়িত্বে নিযুক্ত করলেন। তখন এক আগন্তুক এসে খাদ্য থেকে মুঠি ভরে নিতে লাগল। আমি তাকে ধরে ফেললাম এবং বললাম: আল্লাহর কসম, আমি তোমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে নিয়ে যাব। সে বলল: আমি খুব অভাবী, আমার পরিবার-পরিজন আছে এবং আমার তীব্র প্রয়োজন। (আবূ হুরায়রা) বলেন: তখন আমি তাকে ছেড়ে দিলাম।

পরদিন সকালে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “হে আবূ হুরায়রা, গত রাতে তোমার বন্দি কী করল?” আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! সে তীব্র অভাব ও পরিবারের কষ্টের কথা বলেছিল, তাই আমি তার প্রতি দয়া করে তাকে ছেড়ে দিয়েছিলাম। তিনি বললেন: "সাবধান! সে তোমাকে মিথ্যা বলেছে এবং সে আবার আসবে।"

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কথা যে, সে আবার আসবে - এর কারণে আমি নিশ্চিত হলাম যে সে আবার আসবে। আমি তার জন্য ওত পেতে রইলাম। সে এসে আবার খাদ্য থেকে মুঠি ভরে নিতে লাগল। আমি তাকে ধরে ফেললাম এবং বললাম: আমি তোমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে অবশ্যই নিয়ে যাব। সে বলল: আমাকে ছেড়ে দিন; আমি অভাবী, আমার পরিবার-পরিজন আছে। আর আমি আর কখনও ফিরে আসব না। আমি তার প্রতি দয়া করে তাকে ছেড়ে দিলাম।

পরদিন সকালে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: “হে আবূ হুরায়রা, তোমার বন্দি কী করল?” আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! সে তীব্র অভাব ও পরিবারের কষ্টের কথা বলেছিল, তাই আমি তার প্রতি দয়া করে তাকে ছেড়ে দিয়েছিলাম। তিনি বললেন: "সাবধান! সে তোমাকে মিথ্যা বলেছে এবং সে আবার আসবে।"

আমি তৃতীয়বারের মতো তার জন্য ওত পেতে রইলাম। সে এসে আবার খাদ্য থেকে মুঠি ভরে নিতে লাগল। আমি তাকে ধরে ফেললাম এবং বললাম: আমি তোমাকে অবশ্যই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে নিয়ে যাব। আর এটি তিনবারের শেষবার, যেখানে তুমি দাবি করছ যে আর আসবে না, অথচ আবার ফিরে এলে।

সে বলল: আমাকে ছেড়ে দিন, আমি আপনাকে এমন কয়েকটি বাক্য শিখিয়ে দেব, যার দ্বারা আল্লাহ আপনাকে উপকৃত করবেন। আমি বললাম: সেগুলো কী? সে বলল: যখন তুমি তোমার বিছানায় যাবে, তখন আয়াতুল কুরসী পাঠ করবে: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ. . . } আয়াতটি শেষ করা পর্যন্ত। তুমি যদি তা পড়ো, তবে আল্লাহর পক্ষ থেকে তোমার জন্য একজন রক্ষক নিযুক্ত থাকবে এবং সকাল হওয়া পর্যন্ত কোনো শয়তান তোমার নিকটবর্তী হবে না।

আমি তাকে ছেড়ে দিলাম। সকালে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "গত রাতে তোমার বন্দি কী করল?” আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! সে দাবি করেছিল যে সে আমাকে এমন কয়েকটি বাক্য শিখিয়ে দেবে, যার দ্বারা আল্লাহ আমাকে উপকৃত করবেন। তাই আমি তাকে ছেড়ে দিয়েছিলাম। তিনি বললেন: "সেগুলো কী?" আমি বললাম: সে আমাকে বলেছে: যখন তুমি তোমার বিছানায় যাবে, তখন আয়াতুল কুরসী প্রথম থেকে শুরু করে আয়াতটি শেষ করা পর্যন্ত পাঠ করবে: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ. . . } আর সে আমাকে বলেছে: তোমার ওপর সর্বদা আল্লাহর পক্ষ থেকে একজন রক্ষক নিযুক্ত থাকবে এবং সকাল হওয়া পর্যন্ত কোনো শয়তান তোমার নিকটবর্তী হবে না।

(আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, সাহাবীরা) ভালোর ব্যাপারে সবচেয়ে বেশি আগ্রহী ছিলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সাবধান! সে তোমাকে সত্য বলেছে, যদিও সে মহা মিথ্যাবাদী। হে আবূ হুরায়রা, তুমি কি জানো, তিন রাত ধরে তুমি কার সাথে কথা বলছ?" তিনি (আবূ হুরায়রা) বললেন: না। তিনি বললেন: "সে হলো শয়তান।"









আল-জামি` আল-কামিল (5404)


5404 - عن عروة البارقي أن النبي صلى الله عليه وسلم أعطاه دينارا يشتري له به شاة، فاشترى له به شاتين، فباع إحداهما بدينار، وجاءه بدينار وشاة، فدعا له بالبركة في بيعه، وكان لو اشترى التراب لربح فيه.

صحيح: رواه البخاريّ في المناقب (3642) عن علي بن عبد اللَّه، أخبرنا سفيان، حدّثنا شبيب بن غرقدة قال: سمعت الحي يحدثون عن عروة فذكره.

قال سفيان: كان الحسن بن عمارة جاءنا بهذا الحديث عنه قال: سمعه شبيب من عروة، فأتيته، فقال شبيب: إني لم أسمعه من عروة، قال: سمعت الحي يخبرونه عنه، ولكن سمعته يقول: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"الخير معقود بنواصي الخيل إلى يوم القيامة" قال: وقد رأيت في داره سبعين فرسا. قال سفيان: يشتري له شاة كأنها أضحية.

أراد البخاري بذلك بيان ضعف رواية الحسن بن عمارة، وأن شبيبا لم يسمع هذا الجزء من عروة، وإنما سمعه من الحي، عن عروة، ولكن سمع منه:"الخير معقود بنواصي الخيل".

ولكن ذهب بعض المحدثين، وكثير من الفقهاء إلى قبول حديث يرويه جماعة، وإن لم يسموا؛ لأن الجماعة أولى بالضبط من الواحد.

ومع ذلك له إسناد آخر: رواه أبو لبيد عن عروة البارقي قال: دفع إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم دينارا لأشتري له شاة. فذكر الحديث.

وقال: فكان يخرج بعد ذلك إلى كناسة الكوفة، فيربح الربح العظيم، فكان من أكثر أهل الكوفة مالا.

رواه الترمذيّ (1258) -واللّفظ له-، وأبو داود (3385) إلا أنه لم يسق لفظه، بل قال:"ولفظه مختلف". وابن ماجه (2402) -وأحال على لفظ سفيان، كما عند البخاري- كلّهم من طريق سعيد بن زيد، عن الزبير بن الخِرِّيت، عن أبي لبيد لُمازة بن زَبّارة، عن عروة بن أبي الجعد البارقي. . . . فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل الكلام في سعيد بن زيد، وهو أخو حماد بن زيد غير أنه حسن الحديث، وقد تابعه هارون الأعور المقرئ عند الترمذيّ. وأبو لبيد صدوق، كما في التقريب.
نقل الحافظ في"التلخيص" (3/ 5) عن المنذري والنووي أن إسناده حسن صحيح لمجيئه من وجهين.

وقال ابن كثير: سنده جيد إلا أن الشافعي قال: هذا الحديث ليس بثابت.

وقد ذهب إليه بعض أهل العلم، منهم أحمد، وإسحاق، كما قال الترمذيّ.

وبمعناه ما روي عن حكيم بن حزام أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعث معه بدينار يشتري له أضحية، فاشتراها بدينار، وباعها بدينارين، فرجع، فاشترى له أضحية بدينار، وجاء بدينار إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فتصدق به النبي صلى الله عليه وسلم، ودعا له أن يبارك له في تجارته.

رواه أبو داود (3386) عن محمد بن كثير العبدي، أخبرنا سفيان، حدثني أبو حصين، عن شيخ من أهل المدينة، عن حكيم بن حزام فذكره.

وفي إسناده رجل مجهول.

ولكن خالف أبو بكر بن عياش سفيان، فروى عن أبي حصين، عن حبيب بن أبي ثابت، عن حكيم بن حزام. فذكر الحديث. رواه الترمذيّ (1257) عن أبي كريب، عن أبي بكر بن عياش.

فجعل الرجل المجهول هو حبيب بن أبي ثابت إلا أنه لم يسمع من حكيم بن حزام، كما قال الترمذيّ. ففيه انقطاع. وكذا قال أيضًا ابن كثير في"إرشاد الفقيه" (2/ 64).




উরওয়াহ আল-বারিকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে একটি দীনার দিয়েছিলেন যেন তিনি তা দ্বারা তাঁর জন্য একটি ছাগল ক্রয় করেন। অতঃপর তিনি তা দ্বারা দুটি ছাগল কিনলেন। এরপর তিনি সেগুলোর মধ্যে একটি এক দীনারের বিনিময়ে বিক্রি করে দিলেন এবং (নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট) একটি দীনার ও একটি ছাগল নিয়ে আসলেন। তখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ব্যবসার মধ্যে বরকতের জন্য দু'আ করলেন। এর ফলে তিনি এমন ব্যক্তি হয়ে গেলেন যে, যদি তিনি মাটিও কিনতেন, তবে তাতেও লাভবান হতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5405)


5405 - عن جابر بن عبد اللَّه أنه قال: أردت الخروج إلى خيبر، فأتيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فسلمت عليه، وقلت له: إني أردت الخروج إلى خيبر، فقال:"إذا أتيت وكيلي فخذ منه خمسة عشر وسقا، فإن ابتغى منك آية فضع يدك على ترقوته".

صحيح: رواه أبو داود (3632)، وعنه البيهقي (6/ 80)، والدارقطني (4/ 154) عن عبيد اللَّه ابن سعد بن إبراهيم، ثنا عمي، ثنا أبي، عن أبي إسحاق، عن أبي نعيم وهب بن كيسان، عن جابر ابن عبد اللَّه فذكره.

وإسناده صحيح، وعم عبيد اللَّه بن سعد هو يعقوب بن إبراهيم، وأبوه هو إبراهيم بن سعد بن إبراهيم، وكلاهما ثقة.

وقوله:"على ترقوته" بفتح التاء، العظم الذي بين ثغرة النحر والعاتق. وهما ترقوتان من الجانبين.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি খাইবারের উদ্দেশ্যে বের হতে চাইলাম। তাই আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁকে সালাম দিলাম। আমি তাঁকে বললাম: আমি খাইবারের উদ্দেশ্যে বের হতে চাই। তখন তিনি বললেন: "যখন তুমি আমার উকিল (প্রতিনিধি)-এর কাছে পৌঁছবে, তখন তার কাছ থেকে পনেরো ওয়াসাক (খেজুর) গ্রহণ করবে। যদি সে তোমার কাছে কোনো নিদর্শন চায়, তাহলে তোমার হাত তার কাঁধ ও গলার মাঝখানের হাড়ের (তারকুয়ার) উপর রাখবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5406)


5406 - عن عبد اللَّه الهوزني قال: لقيت بلالا مؤذن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بحلب، فقلت: يا بلال، حدثني كيف كانت نفقة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قال: ما كان له شيء. كنت أنا الذي ألي ذلك منه منذ بعثه اللَّه إلى أن توفي، وكان إذا أتاه الانسان مسلما فرآه عاريا يأمرني، فأنطلق فأستقرض، فأشتري له البردة، فأكسوه، وأطعمه حتى اعترضني
رجل من المشركين، فقال: يا بلال، إن عندي سعة فلا تستقرض من أحد إلا مني، ففعلت، فلما أن كان ذات يوم توضأت، ثم قمت لأؤذن بالصلاة، فإذا المشرك قد أقبل في عصابة من التجار، فلما أن رآني قال: يا حبشي. قلت: يالبَّاه. فتجهمني، وقال لي قولا غليظا، وقال لي: أتدري كم بينك وبين الشهر؟ قال: قلت: قريب. قال: إنما بينك وبينه أربع، فآخذك بالذي عليك، فأردك ترعى الغنم كما كنت قبل ذلك، فأخذ في نفسي ما يأخذ في أنفس النّاس حتى إذا صليت العتمة رجع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى أهله، فاستأذنت عليه، فأذن لي، فقلت: يا رسول اللَّه، بأبي أنت وأمي إن المشرك الذي كنت أتدين منه قال لي كذا وكذا، وليس عندك ما تقضي عني ولا عندي، وهو فاضحِي، فأذن لي أن آبق إلى بعض هؤلاء الأحياء الذين قد أسلموا حتى يرزق اللَّه رسول صلى الله عليه وسلم ما يقضي عني، فخرجت حتى إذا أتيت منزلي، فجعلت سيفي وجرابي ونعلي ومجنِّي عند رأسي، حتى إذا انشق عمود الصبح الأول أردت أن أنطلق، فإذا إنسان يسعى يدعو: يا بلال، أجب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فانطلقت حتى أتيته، فإذا أربع ركائب مناخات عليهن أحمالهن، فاستأذنت، فقال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أبشر، فقد جاءك اللَّه بقضائك". ثم قال:"ألم تر الركائب المناخات الأربع؟" فقلت: بلى. فقال:"إن لك رقابهن وما عليهن، فإن عليهن كسوة وطعاما أهداهن إلي عظيم فدك، فاقبضهن، واقض دينك". ففعلت. فذكر الحديث. ثم انطلقت إلى المسجد، فإذا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قاعد في المسجد، فسلمت عليه، فقال:"ما فعل ما قِبلك؟" قلت: قد قضى اللَّه كل شيء كان على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فلم يبق شيء. قال:"أفضل شيء؟" قلت: نعم. قال:"انظر أن تريحني منه، فإني لست بداخل على أحد من أهلي حتى تريحني منه". فلما صلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم العتمة دعاني، فقال: ما فعل الذي قبلك؟" قال: قلت: هو معي لم يأتنا أحد، فبات رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في المسجد، وقص الحديث. قال: حتى إذا صلى العتمة -يعني من الغد- دعاني قال:"ما فعل الذي قِبلك؟" قال: قلت: قد أراحك اللَّه منه يا رسول اللَّه، فكبر، وحمد اللَّه شفقا من أن يدركه الموت، وعنده ذلك. ثم اتبعته حتى إذا جاء أزواجه فسلم على امرأة امرأة، حتى أتى مبيته. فهذا الذي سألتني عنه.

صحيح: رواه أبو داود (3055) عن أبي توبة الربيع بن نافع، حدّثنا معاوية -يعني ابن سلام-، عن زيد أنه سمع أبا سلام قال: حدثني عبد اللَّه الهوزني فذكره. وصحّحه ابن حبان (6351)،
ورواه أيضًا البيهقي (6/ 80) كلهم من حديث معاوية بن سلام به. وإسناده صحيح.

وقوله:"يالباه" يريد لبيك.

وقوله:"تجهمني" أي تلقاني بوجه كريه.

وقوله:"مجني" من المجن -بكسر الميم، وفتح الجيم، وتشديد النون- الترس.

وقوله:"شفقاء -بفتح الشين والفاء- الخوف.




বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আব্দুল্লাহ আল-হাওযানী (রহ.) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুয়াযযিন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে হালাব-এ (আলেপ্পো) সাক্ষাৎ করলাম। আমি বললাম: হে বিলাল, আমাকে বলুন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খরচ কেমন ছিল?

তিনি বললেন: তাঁর কাছে কোনো কিছুই ছিল না। আল্লাহ তাঁকে [নবী হিসেবে] প্রেরণের পর থেকে তাঁর ইন্তেকাল পর্যন্ত আমিই তাঁর সকল কিছুর দায়িত্বশীল ছিলাম। যখন কোনো ব্যক্তি মুসলিম হয়ে তাঁর কাছে আসত এবং তিনি তাকে বিবস্ত্র বা দরিদ্র দেখতেন, তখন আমাকে আদেশ করতেন। আমি তখন যেতাম, ঋণ নিতাম, তার জন্য একটি চাদর ক্রয় করতাম, তাকে পরিধান করাতাম এবং তাকে আহার করাতাম।

একবার মুশরিকদের (মূর্তিপূজকদের) একজন আমাকে বাধা দিয়ে বলল: হে বিলাল! আমার কাছে প্রাচুর্য আছে, সুতরাং অন্য কারো কাছ থেকে ঋণ নিও না, কেবল আমার কাছ থেকেই নিও। আমি তাই করলাম।

এরপর একদিন আমি ওযু করে সালাতের জন্য আযান দেওয়ার উদ্দেশ্যে দাঁড়ালাম। হঠাৎ দেখি, ওই মুশরিক কিছু বণিকের একটি দল নিয়ে উপস্থিত হয়েছে। সে আমাকে দেখেই বলল: ওহে হাবশী! আমি বললাম: লাব্বাইক (আমি উপস্থিত)! সে আমার দিকে কঠিন মুখে তাকাল এবং আমাকে কড়া কথা শোনাল। সে আমাকে বলল: তুমি কি জানো, মাসের [নির্দিষ্ট সময়ের] শেষ হতে আর কত দিন বাকি?

আমি বললাম: অল্পই বাকি। সে বলল: তোমার আর তার মাঝে মাত্র চার দিন বাকি আছে। এরপর আমি তোমার কাছে আমার পাওনা বুঝে নেব এবং তোমাকে আবার ছাগল চরানোর জন্য ফিরিয়ে দেব, যেমন তুমি আগে ছিলে।

মানুষের মনে যেমনটি হয়, আমার মনেও তেমন দুশ্চিন্তা জন্ম নিল। যখন আমি এশার সালাত (‘আতামাহ) আদায় করলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিবারের কাছে ফিরে গেলেন। আমি তাঁর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলাম এবং তিনি আমাকে অনুমতি দিলেন।

আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার প্রতি উৎসর্গিত হোন! যে মুশরিকের কাছ থেকে আমি ঋণ নিতাম, সে আমাকে এই এই কথা বলেছে। আপনার কাছেও এমন কিছু নেই যা দিয়ে আপনি আমার ঋণ পরিশোধ করবেন, আর আমার কাছেও কিছু নেই। সে আমাকে অপমান করবে। সুতরাং আমাকে অনুমতি দিন, আমি যেন এসব ইসলাম গ্রহণকারী গোত্রের কোনো এক গোত্রের কাছে পালিয়ে যাই, যতক্ষণ না আল্লাহ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কিছু দান করেন যা দ্বারা তিনি আমার ঋণ পরিশোধ করতে পারেন।

আমি বেরিয়ে পড়লাম। যখন আমি আমার ঘরে পৌঁছালাম, তখন আমার তরবারি, আমার ঝোলা (সফরের ব্যাগ), আমার জুতো এবং আমার ঢাল আমার মাথার কাছে রাখলাম। যখন প্রথম ঊষার আলোকরেখা (সুবহে সাদিক) দেখা দিল, আমি তখন রওনা হতে চাইলাম।

হঠাৎ দেখলাম, একজন লোক ছুটে এসে ডাকছে: হে বিলাল! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ডাকে সাড়া দাও। আমি রওনা হলাম এবং তাঁর কাছে পৌঁছালাম।

সেখানে চারটি উট বসে ছিল, সেগুলোর পিঠে মালপত্র বোঝাই করা ছিল। আমি প্রবেশের অনুমতি চাইলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "সুসংবাদ গ্রহণ করো! আল্লাহ তোমার ঋণ পরিশোধের ব্যবস্থা করেছেন।"

এরপর তিনি বললেন: "তুমি কি চারটি বসা উটকে দেখনি?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সেগুলোর দেহ এবং তাদের পিঠে যা কিছু আছে, সব তোমার জন্য। সেগুলোতে পোশাক ও খাদ্যসামগ্রী রয়েছে, যা ফাদাক-এর প্রধান আমাকে উপহার হিসেবে পাঠিয়েছে। তুমি এগুলো কব্জা করো এবং তোমার ঋণ পরিশোধ করো।" আমি তাই করলাম।

এরপর আমি মসজিদে গেলাম। দেখলাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে বসে আছেন। আমি তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: "তোমার কাছে যা ছিল, সেটির কী হলো?" আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যা কিছু ঋণ ছিল, আল্লাহ সব পরিশোধ করে দিয়েছেন, কিছুই বাকি নেই।

তিনি বললেন: "কিছু উদ্বৃত্ত আছে কি?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "খেয়াল রেখো, তুমি যেন আমাকে ওটা থেকে মুক্ত করে দাও। তুমি আমাকে মুক্ত না করা পর্যন্ত আমি আমার পরিবারের কারো কাছে প্রবেশ করব না।"

এরপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এশার সালাত (‘আতামাহ) আদায় করলেন, তিনি আমাকে ডাকলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার কাছে যা ছিল, তার কী হলো?" বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: ওটা আমার কাছেই আছে, কেউ আসেনি। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে রাত কাটালেন।

পরদিন যখন তিনি এশার সালাত আদায় করলেন, তিনি আমাকে ডাকলেন এবং বললেন: "তোমার কাছে যা ছিল, তার কী হলো?" বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ, আল্লাহ আপনাকে ওটা থেকে মুক্ত করে দিয়েছেন।

এরপর তিনি তাকবীর (আল্লাহু আকবার) পাঠ করলেন এবং আল্লাহর প্রশংসা করলেন। কারণ তাঁর ভয় হচ্ছিল যে, ওই সামগ্রী তাঁর কাছে থাকা অবস্থায় যেন তাঁর মৃত্যু না হয়।

এরপর আমি তাঁর অনুসরণ করলাম। তিনি তাঁর স্ত্রীদের কাছে গেলেন এবং একজন একজন করে সবার কাছে সালাম দিলেন, অবশেষে তিনি তাঁর শয়নকক্ষে প্রবেশ করলেন। আপনি আমাকে এই বিষয়েই জিজ্ঞেস করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5407)


5407 - عن * *




৫৪০৭ - ... থেকে ...









আল-জামি` আল-কামিল (5408)


5408 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من مسلم يغرس غرسا أو يزرع زرعا، فيأكل منه طير أو إنسان أو بهيمة إلا كان له به صدقة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2320)، ومسلم في المساقاة (1553: 12) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن قتادة، عن أنس فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে কোনো মুসলিম কোনো চারা রোপণ করে অথবা কোনো ফসল বোনে, অতঃপর তা থেকে কোনো পাখি, মানুষ অথবা চতুষ্পদ প্রাণী ভক্ষণ করে, অবশ্যই এর বিনিময়ে তার জন্য সদকা (দান) হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5409)


5409 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل نخلا لأم مبشر امرأة من الأنصار، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من غرس هذا النخل؟ أمسلم أم كافر؟". قالوا: مسلم. فقال:"لا يغرس مسلم غرسا، فأكل منه إنسان أو طير أو دابة إلا كانت صدقة".

متفق عليه: رواه مسلم في المساقاة (1553: 13) عن عبد بن حميد، حدّثنا مسلم بن إبراهيم، حدّثنا أبان بن يزيد، حدّثنا قتادة، حدّثنا أنس بن مالك فذكره. ورواه البخاري (2330)، وقال: قال لنا مسلم حدّثنا أبان، حدّثنا قتادة، حدّثنا أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসার গোত্রের এক মহিলা উম্মে মুবাশ্‌শিরের খেজুর বাগানে প্রবেশ করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই খেজুর গাছগুলো কে লাগিয়েছে? মুসলিম নাকি কাফির?" তারা বলল: মুসলিম। তখন তিনি বললেন: "কোনো মুসলিম যখনই কোনো চারা রোপণ করে, আর তা থেকে কোনো মানুষ, পাখি বা চতুষ্পদ জন্তু ভক্ষণ করে, তবে তা তার জন্য সাদকা (দান) হিসেবে গণ্য হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5410)


5410 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن قامت على أحدكم القيامة، في يده فسيلة فليغرسها".

حسن: رواه الإمام أحمد (12902) والبزار -كشف الأستار- (1251) والبخاري في الأدب المفرد (479) كلّهم من حديث حماد بن سلمة، عن هشام بن زيد بن أنس، عن أنس، فذكره. وإسناده صحيح.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমাদের কারো উপর কিয়ামত এসে যায়, আর তার হাতে একটি চারাগাছ থাকে, তবে সে যেন তা রোপণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5411)


5411 - عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل على أم مبشر الأنصارية في نخل لها، فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم:"من غرس هذا النخل؟ أمسلم أم كافر؟" فقالت: بل مسلم. فقال:"لا يغرس مسلم غرسا، ولا يزرع زرعا، فيأكل منه إنسان ولا دابة ولا شيء إلا كانت له صدقة".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1552: 8) من طرق عن الليث، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وفي رواية عنده: عن ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابرا يقول فذكر الحديث.

وابن جريج لم يذكر في روايته دخول النبي صلى الله عليه وسلم على أم مبشر.

وقد روى بعضهم عن جابر، عن أم مبشر كما عند عبد بن حميد في مسنده (1572) والصحيح
أنه من مسند جابر، وهو الذي رجحه الدارقطني في علله (15/ 418). وام مبشر هي امرأة زيد بن حارثة، كما ترجم له الإمام أحمد في مسنده، وهي بنت البراء بن المعرور الأنصاري.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মু মুবাশশির আনসারীয়ার খেজুর বাগানে প্রবেশ করলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "কে এই খেজুর গাছ রোপণ করেছে? মুসলিম, নাকি কাফির?" তিনি বললেন, "বরং একজন মুসলিম।" অতঃপর তিনি বললেন, "কোন মুসলিম যদি কোনো গাছ রোপণ করে অথবা কোনো ফসল ফলায়, আর তা থেকে কোনো মানুষ, প্রাণী বা অন্য কোনো কিছু খায়, তবে সেটা তার জন্য সাদকা (দান) হিসেবে গণ্য হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5412)


5412 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: دخل النبي صلى الله عليه وسلم على أم معبد حائطا، فقال:"يا أم معبد، من غرس هذا النخل؟ أمسلم، أم كافر؟" فقالت: بل مسلم. قال:"فلا يغرس المسلم غرسا، فيأكل منه إنسان، ولا دابة، ولا طير إلا كان له صدقة إلى يوم القيامة".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1553: 10) عن أحمد بن سعيد بن إبراهيم، حدّثنا روح بن عبادة، حدّثنا زكريا بن إسحاق، أخبرني عمرو بن دينار، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول فذكره.

وأم معبد هذه لعلها هي أم مبشر، ولها لقبان، أو هي بنت عبد اللَّه بن عمرو بن حزام الأنصارية، أخت جابر بن عبد اللَّه، وتكررت القصة لهما.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মে মা'বাদের একটি বাগানে প্রবেশ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "হে উম্মে মা'বাদ, এই খেজুর গাছ কে লাগিয়েছে? মুসলিম, নাকি কাফির?" তিনি (উম্মে মা'বাদ) বললেন, "বরং মুসলিম।" তিনি বললেন, "কোনো মুসলিম যদি কোনো চারা রোপণ করে আর তা থেকে মানুষ, প্রাণী বা পাখি কিছু খায়, তাহলে কিয়ামত দিবস পর্যন্ত তা তার জন্য সাদকা হিসেবে গণ্য হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5413)


5413 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من مسلم يغرس غرسا إلا كان ما أكل منه له صدقة، وما سرق منه له صدقة، وما أكل السبع منه فهو له صدقة، وما أكلت الطير فهو له صدقة، ولا يرزؤه أحد إلا كان له صدقة".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1252: 7) عن ابن نمير، حدّثنا أبي، حدّثنا عبد الملك، عن عطاء، عن جابر قال فذكره.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে কোনো মুসলিম কোনো বৃক্ষ রোপণ করে, যা কিছু তা থেকে খাওয়া হয়, তা তার জন্য সাদকা (দান)। যা তা থেকে চুরি হয়ে যায়, তাও তার জন্য সাদকা। হিংস্র প্রাণী যা খায়, তাও তার জন্য সাদকা। পাখি যা খায়, তাও তার জন্য সাদকা। আর যে কেউই তা থেকে কিছু নষ্ট করে বা কমিয়ে দেয়, তাও তার জন্য সাদকা হিসেবে গণ্য হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5414)


5414 - عن السائب بن خلاد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من زرع زرعا، فأكل منه الطير أو العافية كان له به صدقة".

حسن: رواه الإمام أحمد (16558) عن وكيع قال: حدّثنا أسامة بن زيد، عن المطلب بن عبد اللَّه بن حنطب، عن خلاد بن السائب، عن أبيه فذكره.

وإسناده حسن من أجل أسامة بن زيد، وهو الليثي فإنه حسن الحديث.

ورواه الطبراني في"الكبير" (4134) من طريق سلْم بن جنادة، عن وكيع بإسناده إلا أنه لم يذكر فيه: عن أبيه.

ولعل ذلك يعود إلى سلم بن جنادة أبي الساب الكوفي، قال فيه أبو أحمد الحاكم:"يخالف في بعض حديثه". وهذا منها.

وقوله:"العافية" هو كل طالب للرزق.




সা'ইব ইবনু খাল্লাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো শস্য রোপণ করে, আর সেই শস্য থেকে কোনো পাখি অথবা কোনো প্রাণী (খাদ্য গ্রহণকারী) খায়, তবে এর বিনিময়ে তার জন্য সাদাকাহ (দান) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5415)


5415 - عن أبي الدرداء أن رجلا مر به وهو يغرس غرسا بدمشق، فقال له: أتفعل هذا وأنت صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ فقال: لا تعجل عليَّ، سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من غرس غرسا لم يأكل منه آدمي ولا خلق من خلق اللَّه عز وجل إلا كان له صدقة".
حسن: رواه أحمد (27506) عن علي بن بحر حدّثنا بقية قال: حدّثنا ثابت بن عجلان قال: حدثني القاسم مولى بني يزيد، عن أبي الدرداء فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في بقية، وهو ابن الوليد، بدلس تدليس التسوية إلا أنه صرح بالتحديث في الطبقتين. والجمهور على أنه لو صرح في الطبقة تنتفي عنه تهمة التدليس.

وفي الباب عن معاذ بن أنس، ورجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، وأبي أيوب إلا أنها كلها ضعيفة، والصحيح منها ما ذكرته.




আবুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর কাছ দিয়ে অতিক্রম করছিল যখন তিনি দামেস্কে একটি চারা রোপণ করছিলেন। লোকটি তাঁকে বলল: আপনি কি এই কাজটি করছেন, অথচ আপনি আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবী? তিনি বললেন: আমার উপর তাড়াহুড়ো করো না। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি কোনো চারা রোপণ করে, আর তা থেকে কোনো মানুষ বা আল্লাহ তাআলার সৃষ্টিকুলের কোনো প্রাণী ভক্ষণ করে, তবে তা তার জন্য সদকা হিসেবে গণ্য হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5416)


5416 - عن أبي أمامة الباهلي قال -ورأى سكة وشيئا من آلة الحرث- فقال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يدخل هذا بيت قوم إلا أدخله اللَّه الذل".

صحيح: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2321) عن عبد اللَّه بن يوسف، حدّثنا عبد اللَّه ابن سالم الحمصي، حدّثنا محمد بن زياد الألهاني، عن أبي أمامة الباهلي قال فذكره.

وليس فيه ذم للزراعة، فإنها محمودة، ولكن المذموم هو المبالغة فيها، وترك الصناعة، والتقنية الحديثة، وإعداد العدة للدفاع وغير ذلك، بل المطلوب الاقتصاد في الزراعة.

وفي الباب ما روي عن ابن مسعود أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تتخذوا الضيعة فترغبوا في الدنيا". رواه الترمذيّ (2328)، وأحمد (3579)، وصحّحه ابن حبان (710)، والحاكم (4/ 322) كلّهم عن الأعمش، عن شِمْر، عن مغيرة بن سعد بن الأخرم، عن أبيه، عن ابن مسعود فذكره. قال الترمذيّ: حسن. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.

قلت: فيه مغيرة بن سعد بن الأخرم لم يوثّقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا؛ فهو لين الحديث.

وأبوه سعد بن الأخرم مختلف في صحبته، ذكره ابن حبان في الصحابة، ثم في التابعين. وذكره البخاري وأبو حاتم في التابعين، ولم يرو عنه سوى ولده مغيرة فهو أيضًا"مقبول" عند المتابعة.




আবু উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি একটি লাঙলের ফলা এবং চাষাবাদের কিছু সরঞ্জাম দেখতে পেয়ে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যখনই এই জিনিস (চাষাবাদের সরঞ্জাম) কোনো সম্প্রদায়ের ঘরে প্রবেশ করে, আল্লাহ অবশ্যই সেখানে হীনতা প্রবেশ করান।”









আল-জামি` আল-কামিল (5417)


5417 - عن زيد بن أسلم، عن أبيه قال: قال عمر:"لولا آخر المسلمين ما فتحت قرية إلا قسمتها بين أهلها، كما قسم النبي صلى الله عليه وسلم خيبر".

صحيح: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2334) عن صدقة، أخبرنا عبد الرحمن (هو ابن مهدي)، عن مالك، عن زيد بن أسلم به.

قد اختلف العلماء في قسمة الأرض المفتوحة على أقوال، أشهرها ثلاثة:

1 - أنها تصير وقفا بنفس الفتح، وهو مذهب مالك.
2 - أن الأمام يخير بين قسمتها، ووقفيتها. وهو مذهب أبي حنيفة.

3 - أنه يلزمه قسمتها إلا أن يرضى بوقفيتها من غنمها.

راجع للمزيد"الفتح" (5/ 18).




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: 'যদি শেষ যুগের (ভবিষ্যতের) মুসলমানেরা না থাকত, তবে আমি বিজয়ী কোনো জনপদকে তার অধিবাসীদের মাঝে বণ্টন না করে ছাড়তাম না, যেভাবে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খায়বার (এর জমি) বণ্টন করেছিলেন।'









আল-জামি` আল-কামিল (5418)


5418 - عن جابر قال: كانت لرجال منا فضول أرضين، فقالوا: نؤاجرها بالثلث والربع والنصف. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"من كانت له أرض فليزرعها أو ليمنحها أخاه، فإن أبى فليمسك أرضه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الهبة (2340، 2623)، ومسلم في البيوع (1536: 89) كلاهما من حديث الأوزاعيّ قال: حدثني عطاء، عن جابر فذكره. واللّفظ للبخاريّ.

ولفظ مسلم:"من كانت له فضل أرض فليزرعها أو ليمنحها أخاه، فإن أبي فليمسك أرضه". ولم يذكر فيه:"بالثلث، والربع، والنصف".

ثم اعلم أن حديث جابر بن عبد اللَّه قد روي بألوان مختلفة، ولذا اختلفت ألفاظه من طرق متعددة، وإليكم هذه الطرق بألفاظها التي رواه مسلم في صحيحه علاوة على ما ذكر.

2 - رواه أبو عوانة، عن سليمان، عن أبي سفيان، عن جابر مرفوعا:"من كانت له أرض فليهبها، أو ليعرها".

3 - ورواه يونس، عن زهير، عن أبي الزبير، عن جابر قال: كنا نخابر على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فنصيب من القصري ومن كذا، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كانت له أرض فليزرعها أو فليحرثها أخاه، وإلا فليدعها".

4 - ورواه هشام بن سعد، عن أبي الزبير قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه يقول: كنا في زمان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نأخذ الأرض بالثلث أو الربع بالماذيانات، فقام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في ذلك، فقال:"من كانت له أرض فليزرعها، فإن لم يزرعها فليمنحها أخاه، فإن لم يمنحها أخاه فليمسكها".

والماذيانات هي مسائل المياه، ما ينبت على حافتي مسيل الماء.

5 - ورواه أبو خيثمة، عن أبي الزبير، عن جابر قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع البيضاء سنتين أو ثلاثا".

6 - ورواه حماد بن زيد قال: حدّثنا أيوب، عن أبي الزبير، وسعيد بن ميناء، عن جابر بن عبد اللَّه قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة، والمزاينة، والمعاومة، والمخابرة، وعن الثنيا، ورخص في العرايا".

7 - ورواه همام قال: سأل سليمان بن موسى عطاء، فقال: أحدثك جابر بن عبد اللَّه أن النبي
-صلى الله عليه وسلم قال:"من كانت له أرض فليزرعها، أو ليزرعها أخاه، ولا يكرها"؟ قال: نعم.

8 - ورواه عبد اللَّه بن نمير، عن عبد الملك، عن عطاء، عن جابر مرفوعا:"من كانت له أرض فليزرعها، فإن لم يستطع أن يزرعها، وعجز عنها فليمنحها أخاه المسلم، ولا يؤاجرها إياه".

9 - ورواه محمد بن الفضل (لقبه عارم، وهو أبو النعمان السدوسي)، عن مهدي بن ميمون، عن مطر، عن عطاء، عن جابر مرفوعا:"من كانت له أرض فليزرعها، فإن لم يزرعها فليزرعها أخاه".

10 - ورواه معلى بن منصور، عن خالد، عن الشيباني، عن بكير بن الأخنس، عن عطاء، عن جابر قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يؤخذ للأرض أجر أو حظ".

11 - ورواه حماد (يعني ابن زيد) عن مطر الوراق، عن عطاء، عن جابر:"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن كراء الأرض".

12 - ورواه ابن وهب قال: أخبرني عمرو (وهو ابن الحارث) أن بكيرا حدثه أن عبد اللَّه بن أبي سلمة حدثه، عن النعمان بن أبي عياش، عن جابر بن عبد اللَّه قال:"إن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن كراء الأرض".

قال بكير: وحدثنا نافع أنه سمع ابن عمر يقول: كنا نكري أرضنا، ثم تركنا ذلك حين سمعنا حديث رافع بن خديج.

13 - ورواه سفيان بن عيينة، عن حميد الأعرج، عن سليمان بن عتيق، عن جابر قال:"نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع السنين".

14 - ورواه أبو توبة، عن معاوية، عن يحيى بن أبي كثير، عن يزيد بن نعيم أخبره أن جابر بن عبد اللَّه قال:"إنه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهى عن المزابنة والحقول".

فقال جابر: المزابنة الثمر بالتمر. والحقول كراء الأرض.

15 - ورواه أبو الجواب، عن عمار بن زريق، عن الأعمش، حدّثنا أبو سفيان، عن جابر مرفوعا:"من كانت له أرض فليزرعها أو فليُزْرِعها رجلا".

16 - ورواه سفيان، عن عمرو، عن جابر"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن المخابرة".

17 - ورواه عبيد اللَّه بن عبد الحميد، عن سليم بن حبان، عن سعيد بن ميناء سمعت جابرا يقول. فذكر مرفوعا:"من كان له فضل أرض فليزرعها، أو يزرعها أخاه، ولا تبيعوها".

فقلت لسعيد: ما قوله:"ولا تبيعوها" يعني الكراء؟ . قال: نعم.

ولحديث جابر طرق أخرى غيرها.

وخلاصة القول أن حديث جابر بن عبد اللَّه في النهي عن كراء الأرض محمول على التنزيه، وليس على التحريم؛ لأن الهبة والإعارة والمنحة ليست بواجبة، ولكن تصرف بعض الرواة، فرووه
بالمعنى، فاختلفت ألفاظهم حتى أن بعض النّاس ظنوا فيه التحريم، فرووه بلفظ:"من لم يذر المخابرة فليأذن بحرب من اللَّه ورسوله". رواه أبو داود (3406)، ومن طريقه البيهقي (6/ 128)، وأبو نعيم في"الحلية" (9/ 236)، والحاكم (2/ 285 - 286) كلّهم من حديث عبد اللَّه بن رجاء، أخبرني عبد اللَّه بن عثمان بن خثيم، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.

قال أبو نعيم:"غريب من حديث أبي الزبير، تفرّد به ابن خثيم بهذا اللفظ. وعبد اللَّه بن رجاء هو المكي، ليس بالعراقي البصري".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كذلك إلا أن ابن خثيم تُكِلم فيه من ناحية حفظه، فلا يقبل تفرده.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের কিছু লোকের অতিরিক্ত জমি ছিল। তারা বলল: আমরা তা এক-তৃতীয়াংশ, এক-চতুর্থাংশ বা অর্ধাংশের বিনিময়ে ভাড়া দেব। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার জমি আছে, সে যেন তা চাষ করে অথবা সে যেন তার ভাইকে ব্যবহারের জন্য দেয়। আর যদি সে (এ দুটির কোনটি) না চায়, তবে সে যেন তার জমি আটকে রাখে (নিজে রেখে দেয়)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5419)


5419 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كانت له أرض فليزرعها، أو ليمنحها أخاه، فإن أبي فليمسك أرضه".

متفق عليه: رواه البخاري في الحرث والمزارعة (2341)، ومسلم في البيوع (1544) كلاهما من طريق أبي توبة الربيع بن نافع، حدّثنا معاوية، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যার কোনো জমি আছে, সে যেন তাতে চাষ করে, অথবা সে যেন তা তার ভাইকে (চাষ করার জন্য) দান করে দেয়। কিন্তু যদি সে (অন্যকে দিতে) অস্বীকার করে, তবে সে যেন তার জমি চাষ না করে (বা চাষ থেকে বিরত রাখে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5420)


5420 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة والمزابنة.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1545) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا يعقوب (يعني ابن عبد الرحمن القاري)، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাক্বালা ও মুযাবানা করতে নিষেধ করেছেন।