হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5408)


5408 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من مسلم يغرس غرسا أو يزرع زرعا، فيأكل منه طير أو إنسان أو بهيمة إلا كان له به صدقة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2320)، ومسلم في المساقاة (1553: 12) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن قتادة، عن أنس فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে কোনো মুসলিম কোনো চারা রোপণ করে অথবা কোনো ফসল বোনে, অতঃপর তা থেকে কোনো পাখি, মানুষ অথবা চতুষ্পদ প্রাণী ভক্ষণ করে, অবশ্যই এর বিনিময়ে তার জন্য সদকা (দান) হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5409)


5409 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل نخلا لأم مبشر امرأة من الأنصار، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من غرس هذا النخل؟ أمسلم أم كافر؟". قالوا: مسلم. فقال:"لا يغرس مسلم غرسا، فأكل منه إنسان أو طير أو دابة إلا كانت صدقة".

متفق عليه: رواه مسلم في المساقاة (1553: 13) عن عبد بن حميد، حدّثنا مسلم بن إبراهيم، حدّثنا أبان بن يزيد، حدّثنا قتادة، حدّثنا أنس بن مالك فذكره. ورواه البخاري (2330)، وقال: قال لنا مسلم حدّثنا أبان، حدّثنا قتادة، حدّثنا أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসার গোত্রের এক মহিলা উম্মে মুবাশ্‌শিরের খেজুর বাগানে প্রবেশ করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই খেজুর গাছগুলো কে লাগিয়েছে? মুসলিম নাকি কাফির?" তারা বলল: মুসলিম। তখন তিনি বললেন: "কোনো মুসলিম যখনই কোনো চারা রোপণ করে, আর তা থেকে কোনো মানুষ, পাখি বা চতুষ্পদ জন্তু ভক্ষণ করে, তবে তা তার জন্য সাদকা (দান) হিসেবে গণ্য হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5410)


5410 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن قامت على أحدكم القيامة، في يده فسيلة فليغرسها".

حسن: رواه الإمام أحمد (12902) والبزار -كشف الأستار- (1251) والبخاري في الأدب المفرد (479) كلّهم من حديث حماد بن سلمة، عن هشام بن زيد بن أنس، عن أنس، فذكره. وإسناده صحيح.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমাদের কারো উপর কিয়ামত এসে যায়, আর তার হাতে একটি চারাগাছ থাকে, তবে সে যেন তা রোপণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5411)


5411 - عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل على أم مبشر الأنصارية في نخل لها، فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم:"من غرس هذا النخل؟ أمسلم أم كافر؟" فقالت: بل مسلم. فقال:"لا يغرس مسلم غرسا، ولا يزرع زرعا، فيأكل منه إنسان ولا دابة ولا شيء إلا كانت له صدقة".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1552: 8) من طرق عن الليث، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وفي رواية عنده: عن ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابرا يقول فذكر الحديث.

وابن جريج لم يذكر في روايته دخول النبي صلى الله عليه وسلم على أم مبشر.

وقد روى بعضهم عن جابر، عن أم مبشر كما عند عبد بن حميد في مسنده (1572) والصحيح
أنه من مسند جابر، وهو الذي رجحه الدارقطني في علله (15/ 418). وام مبشر هي امرأة زيد بن حارثة، كما ترجم له الإمام أحمد في مسنده، وهي بنت البراء بن المعرور الأنصاري.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মু মুবাশশির আনসারীয়ার খেজুর বাগানে প্রবেশ করলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "কে এই খেজুর গাছ রোপণ করেছে? মুসলিম, নাকি কাফির?" তিনি বললেন, "বরং একজন মুসলিম।" অতঃপর তিনি বললেন, "কোন মুসলিম যদি কোনো গাছ রোপণ করে অথবা কোনো ফসল ফলায়, আর তা থেকে কোনো মানুষ, প্রাণী বা অন্য কোনো কিছু খায়, তবে সেটা তার জন্য সাদকা (দান) হিসেবে গণ্য হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5412)


5412 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: دخل النبي صلى الله عليه وسلم على أم معبد حائطا، فقال:"يا أم معبد، من غرس هذا النخل؟ أمسلم، أم كافر؟" فقالت: بل مسلم. قال:"فلا يغرس المسلم غرسا، فيأكل منه إنسان، ولا دابة، ولا طير إلا كان له صدقة إلى يوم القيامة".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1553: 10) عن أحمد بن سعيد بن إبراهيم، حدّثنا روح بن عبادة، حدّثنا زكريا بن إسحاق، أخبرني عمرو بن دينار، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول فذكره.

وأم معبد هذه لعلها هي أم مبشر، ولها لقبان، أو هي بنت عبد اللَّه بن عمرو بن حزام الأنصارية، أخت جابر بن عبد اللَّه، وتكررت القصة لهما.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মে মা'বাদের একটি বাগানে প্রবেশ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "হে উম্মে মা'বাদ, এই খেজুর গাছ কে লাগিয়েছে? মুসলিম, নাকি কাফির?" তিনি (উম্মে মা'বাদ) বললেন, "বরং মুসলিম।" তিনি বললেন, "কোনো মুসলিম যদি কোনো চারা রোপণ করে আর তা থেকে মানুষ, প্রাণী বা পাখি কিছু খায়, তাহলে কিয়ামত দিবস পর্যন্ত তা তার জন্য সাদকা হিসেবে গণ্য হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5413)


5413 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من مسلم يغرس غرسا إلا كان ما أكل منه له صدقة، وما سرق منه له صدقة، وما أكل السبع منه فهو له صدقة، وما أكلت الطير فهو له صدقة، ولا يرزؤه أحد إلا كان له صدقة".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1252: 7) عن ابن نمير، حدّثنا أبي، حدّثنا عبد الملك، عن عطاء، عن جابر قال فذكره.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে কোনো মুসলিম কোনো বৃক্ষ রোপণ করে, যা কিছু তা থেকে খাওয়া হয়, তা তার জন্য সাদকা (দান)। যা তা থেকে চুরি হয়ে যায়, তাও তার জন্য সাদকা। হিংস্র প্রাণী যা খায়, তাও তার জন্য সাদকা। পাখি যা খায়, তাও তার জন্য সাদকা। আর যে কেউই তা থেকে কিছু নষ্ট করে বা কমিয়ে দেয়, তাও তার জন্য সাদকা হিসেবে গণ্য হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5414)


5414 - عن السائب بن خلاد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من زرع زرعا، فأكل منه الطير أو العافية كان له به صدقة".

حسن: رواه الإمام أحمد (16558) عن وكيع قال: حدّثنا أسامة بن زيد، عن المطلب بن عبد اللَّه بن حنطب، عن خلاد بن السائب، عن أبيه فذكره.

وإسناده حسن من أجل أسامة بن زيد، وهو الليثي فإنه حسن الحديث.

ورواه الطبراني في"الكبير" (4134) من طريق سلْم بن جنادة، عن وكيع بإسناده إلا أنه لم يذكر فيه: عن أبيه.

ولعل ذلك يعود إلى سلم بن جنادة أبي الساب الكوفي، قال فيه أبو أحمد الحاكم:"يخالف في بعض حديثه". وهذا منها.

وقوله:"العافية" هو كل طالب للرزق.




সা'ইব ইবনু খাল্লাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো শস্য রোপণ করে, আর সেই শস্য থেকে কোনো পাখি অথবা কোনো প্রাণী (খাদ্য গ্রহণকারী) খায়, তবে এর বিনিময়ে তার জন্য সাদাকাহ (দান) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5415)


5415 - عن أبي الدرداء أن رجلا مر به وهو يغرس غرسا بدمشق، فقال له: أتفعل هذا وأنت صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ فقال: لا تعجل عليَّ، سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من غرس غرسا لم يأكل منه آدمي ولا خلق من خلق اللَّه عز وجل إلا كان له صدقة".
حسن: رواه أحمد (27506) عن علي بن بحر حدّثنا بقية قال: حدّثنا ثابت بن عجلان قال: حدثني القاسم مولى بني يزيد، عن أبي الدرداء فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في بقية، وهو ابن الوليد، بدلس تدليس التسوية إلا أنه صرح بالتحديث في الطبقتين. والجمهور على أنه لو صرح في الطبقة تنتفي عنه تهمة التدليس.

وفي الباب عن معاذ بن أنس، ورجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، وأبي أيوب إلا أنها كلها ضعيفة، والصحيح منها ما ذكرته.




আবুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর কাছ দিয়ে অতিক্রম করছিল যখন তিনি দামেস্কে একটি চারা রোপণ করছিলেন। লোকটি তাঁকে বলল: আপনি কি এই কাজটি করছেন, অথচ আপনি আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবী? তিনি বললেন: আমার উপর তাড়াহুড়ো করো না। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি কোনো চারা রোপণ করে, আর তা থেকে কোনো মানুষ বা আল্লাহ তাআলার সৃষ্টিকুলের কোনো প্রাণী ভক্ষণ করে, তবে তা তার জন্য সদকা হিসেবে গণ্য হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5416)


5416 - عن أبي أمامة الباهلي قال -ورأى سكة وشيئا من آلة الحرث- فقال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يدخل هذا بيت قوم إلا أدخله اللَّه الذل".

صحيح: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2321) عن عبد اللَّه بن يوسف، حدّثنا عبد اللَّه ابن سالم الحمصي، حدّثنا محمد بن زياد الألهاني، عن أبي أمامة الباهلي قال فذكره.

وليس فيه ذم للزراعة، فإنها محمودة، ولكن المذموم هو المبالغة فيها، وترك الصناعة، والتقنية الحديثة، وإعداد العدة للدفاع وغير ذلك، بل المطلوب الاقتصاد في الزراعة.

وفي الباب ما روي عن ابن مسعود أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تتخذوا الضيعة فترغبوا في الدنيا". رواه الترمذيّ (2328)، وأحمد (3579)، وصحّحه ابن حبان (710)، والحاكم (4/ 322) كلّهم عن الأعمش، عن شِمْر، عن مغيرة بن سعد بن الأخرم، عن أبيه، عن ابن مسعود فذكره. قال الترمذيّ: حسن. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.

قلت: فيه مغيرة بن سعد بن الأخرم لم يوثّقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا؛ فهو لين الحديث.

وأبوه سعد بن الأخرم مختلف في صحبته، ذكره ابن حبان في الصحابة، ثم في التابعين. وذكره البخاري وأبو حاتم في التابعين، ولم يرو عنه سوى ولده مغيرة فهو أيضًا"مقبول" عند المتابعة.




আবু উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি একটি লাঙলের ফলা এবং চাষাবাদের কিছু সরঞ্জাম দেখতে পেয়ে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যখনই এই জিনিস (চাষাবাদের সরঞ্জাম) কোনো সম্প্রদায়ের ঘরে প্রবেশ করে, আল্লাহ অবশ্যই সেখানে হীনতা প্রবেশ করান।”









আল-জামি` আল-কামিল (5417)


5417 - عن زيد بن أسلم، عن أبيه قال: قال عمر:"لولا آخر المسلمين ما فتحت قرية إلا قسمتها بين أهلها، كما قسم النبي صلى الله عليه وسلم خيبر".

صحيح: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2334) عن صدقة، أخبرنا عبد الرحمن (هو ابن مهدي)، عن مالك، عن زيد بن أسلم به.

قد اختلف العلماء في قسمة الأرض المفتوحة على أقوال، أشهرها ثلاثة:

1 - أنها تصير وقفا بنفس الفتح، وهو مذهب مالك.
2 - أن الأمام يخير بين قسمتها، ووقفيتها. وهو مذهب أبي حنيفة.

3 - أنه يلزمه قسمتها إلا أن يرضى بوقفيتها من غنمها.

راجع للمزيد"الفتح" (5/ 18).




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: 'যদি শেষ যুগের (ভবিষ্যতের) মুসলমানেরা না থাকত, তবে আমি বিজয়ী কোনো জনপদকে তার অধিবাসীদের মাঝে বণ্টন না করে ছাড়তাম না, যেভাবে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খায়বার (এর জমি) বণ্টন করেছিলেন।'









আল-জামি` আল-কামিল (5418)


5418 - عن جابر قال: كانت لرجال منا فضول أرضين، فقالوا: نؤاجرها بالثلث والربع والنصف. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"من كانت له أرض فليزرعها أو ليمنحها أخاه، فإن أبى فليمسك أرضه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الهبة (2340، 2623)، ومسلم في البيوع (1536: 89) كلاهما من حديث الأوزاعيّ قال: حدثني عطاء، عن جابر فذكره. واللّفظ للبخاريّ.

ولفظ مسلم:"من كانت له فضل أرض فليزرعها أو ليمنحها أخاه، فإن أبي فليمسك أرضه". ولم يذكر فيه:"بالثلث، والربع، والنصف".

ثم اعلم أن حديث جابر بن عبد اللَّه قد روي بألوان مختلفة، ولذا اختلفت ألفاظه من طرق متعددة، وإليكم هذه الطرق بألفاظها التي رواه مسلم في صحيحه علاوة على ما ذكر.

2 - رواه أبو عوانة، عن سليمان، عن أبي سفيان، عن جابر مرفوعا:"من كانت له أرض فليهبها، أو ليعرها".

3 - ورواه يونس، عن زهير، عن أبي الزبير، عن جابر قال: كنا نخابر على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فنصيب من القصري ومن كذا، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كانت له أرض فليزرعها أو فليحرثها أخاه، وإلا فليدعها".

4 - ورواه هشام بن سعد، عن أبي الزبير قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه يقول: كنا في زمان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نأخذ الأرض بالثلث أو الربع بالماذيانات، فقام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في ذلك، فقال:"من كانت له أرض فليزرعها، فإن لم يزرعها فليمنحها أخاه، فإن لم يمنحها أخاه فليمسكها".

والماذيانات هي مسائل المياه، ما ينبت على حافتي مسيل الماء.

5 - ورواه أبو خيثمة، عن أبي الزبير، عن جابر قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع البيضاء سنتين أو ثلاثا".

6 - ورواه حماد بن زيد قال: حدّثنا أيوب، عن أبي الزبير، وسعيد بن ميناء، عن جابر بن عبد اللَّه قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة، والمزاينة، والمعاومة، والمخابرة، وعن الثنيا، ورخص في العرايا".

7 - ورواه همام قال: سأل سليمان بن موسى عطاء، فقال: أحدثك جابر بن عبد اللَّه أن النبي
-صلى الله عليه وسلم قال:"من كانت له أرض فليزرعها، أو ليزرعها أخاه، ولا يكرها"؟ قال: نعم.

8 - ورواه عبد اللَّه بن نمير، عن عبد الملك، عن عطاء، عن جابر مرفوعا:"من كانت له أرض فليزرعها، فإن لم يستطع أن يزرعها، وعجز عنها فليمنحها أخاه المسلم، ولا يؤاجرها إياه".

9 - ورواه محمد بن الفضل (لقبه عارم، وهو أبو النعمان السدوسي)، عن مهدي بن ميمون، عن مطر، عن عطاء، عن جابر مرفوعا:"من كانت له أرض فليزرعها، فإن لم يزرعها فليزرعها أخاه".

10 - ورواه معلى بن منصور، عن خالد، عن الشيباني، عن بكير بن الأخنس، عن عطاء، عن جابر قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يؤخذ للأرض أجر أو حظ".

11 - ورواه حماد (يعني ابن زيد) عن مطر الوراق، عن عطاء، عن جابر:"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن كراء الأرض".

12 - ورواه ابن وهب قال: أخبرني عمرو (وهو ابن الحارث) أن بكيرا حدثه أن عبد اللَّه بن أبي سلمة حدثه، عن النعمان بن أبي عياش، عن جابر بن عبد اللَّه قال:"إن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن كراء الأرض".

قال بكير: وحدثنا نافع أنه سمع ابن عمر يقول: كنا نكري أرضنا، ثم تركنا ذلك حين سمعنا حديث رافع بن خديج.

13 - ورواه سفيان بن عيينة، عن حميد الأعرج، عن سليمان بن عتيق، عن جابر قال:"نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع السنين".

14 - ورواه أبو توبة، عن معاوية، عن يحيى بن أبي كثير، عن يزيد بن نعيم أخبره أن جابر بن عبد اللَّه قال:"إنه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهى عن المزابنة والحقول".

فقال جابر: المزابنة الثمر بالتمر. والحقول كراء الأرض.

15 - ورواه أبو الجواب، عن عمار بن زريق، عن الأعمش، حدّثنا أبو سفيان، عن جابر مرفوعا:"من كانت له أرض فليزرعها أو فليُزْرِعها رجلا".

16 - ورواه سفيان، عن عمرو، عن جابر"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن المخابرة".

17 - ورواه عبيد اللَّه بن عبد الحميد، عن سليم بن حبان، عن سعيد بن ميناء سمعت جابرا يقول. فذكر مرفوعا:"من كان له فضل أرض فليزرعها، أو يزرعها أخاه، ولا تبيعوها".

فقلت لسعيد: ما قوله:"ولا تبيعوها" يعني الكراء؟ . قال: نعم.

ولحديث جابر طرق أخرى غيرها.

وخلاصة القول أن حديث جابر بن عبد اللَّه في النهي عن كراء الأرض محمول على التنزيه، وليس على التحريم؛ لأن الهبة والإعارة والمنحة ليست بواجبة، ولكن تصرف بعض الرواة، فرووه
بالمعنى، فاختلفت ألفاظهم حتى أن بعض النّاس ظنوا فيه التحريم، فرووه بلفظ:"من لم يذر المخابرة فليأذن بحرب من اللَّه ورسوله". رواه أبو داود (3406)، ومن طريقه البيهقي (6/ 128)، وأبو نعيم في"الحلية" (9/ 236)، والحاكم (2/ 285 - 286) كلّهم من حديث عبد اللَّه بن رجاء، أخبرني عبد اللَّه بن عثمان بن خثيم، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.

قال أبو نعيم:"غريب من حديث أبي الزبير، تفرّد به ابن خثيم بهذا اللفظ. وعبد اللَّه بن رجاء هو المكي، ليس بالعراقي البصري".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كذلك إلا أن ابن خثيم تُكِلم فيه من ناحية حفظه، فلا يقبل تفرده.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের কিছু লোকের অতিরিক্ত জমি ছিল। তারা বলল: আমরা তা এক-তৃতীয়াংশ, এক-চতুর্থাংশ বা অর্ধাংশের বিনিময়ে ভাড়া দেব। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার জমি আছে, সে যেন তা চাষ করে অথবা সে যেন তার ভাইকে ব্যবহারের জন্য দেয়। আর যদি সে (এ দুটির কোনটি) না চায়, তবে সে যেন তার জমি আটকে রাখে (নিজে রেখে দেয়)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5419)


5419 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كانت له أرض فليزرعها، أو ليمنحها أخاه، فإن أبي فليمسك أرضه".

متفق عليه: رواه البخاري في الحرث والمزارعة (2341)، ومسلم في البيوع (1544) كلاهما من طريق أبي توبة الربيع بن نافع، حدّثنا معاوية، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যার কোনো জমি আছে, সে যেন তাতে চাষ করে, অথবা সে যেন তা তার ভাইকে (চাষ করার জন্য) দান করে দেয়। কিন্তু যদি সে (অন্যকে দিতে) অস্বীকার করে, তবে সে যেন তার জমি চাষ না করে (বা চাষ থেকে বিরত রাখে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5420)


5420 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة والمزابنة.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1545) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا يعقوب (يعني ابن عبد الرحمن القاري)، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাক্বালা ও মুযাবানা করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5421)


5421 - عن نافع أن ابن عمر كان يكري مزارعه على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وفي إمارة أبي بكر وعمر وعثمان وصدرًا من خلافة معاوية، حتى بلغه في آخر خلافة معاوية أن رافع بن خديج يحدث فيها بنهي عن النبي صلى الله عليه وسلم، فدخل عليه -وأنا معه-، فسأله، فقال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهى عن كراء المزارع، فتركها ابن عمر بعد.

وكان إذا سئل عنها بعد قال: زعم رافع بن خديج أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عنها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (3343 - 3344)، ومسلم في البيوع (1547: 109) كلاهما من طريق أيوب، عن نافع به. واللّفظ لمسلم.

ولم يذكر البخاري: وكان إذا سئل. . . إلخ. وعنده: فقال ابن عمر: قد علمت أنا كنا نكري مزارعنا على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بما على الأربعاء، وبشيء من التبن".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে, এবং আবূ বাকর, উমর ও উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতের সময় ও মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতের প্রথম অংশ পর্যন্ত তাঁর কৃষি জমি ভাড়া দিতেন। অবশেষে মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতের শেষ দিকে তাঁর কাছে এই খবর পৌঁছাল যে, রাফি' ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই বিষয়ে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে নিষেধের কথা বর্ণনা করছেন। [বর্ণনাকারী নাফি' বলেন,] তখন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে গেলেন—আমিও তাঁর সাথে ছিলাম—এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন। রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কৃষি জমি ভাড়া দেওয়া থেকে নিষেধ করতেন। এরপর ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই কাজ ছেড়ে দিলেন। এরপর যখনই তাঁকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করা হতো, তিনি বলতেন: রাফি' ইবনু খাদীজ মনে করেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এই বিষয়ে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5422)


5422 - عن نافع أن ابن عمر كان يأجر الأرض قال: فنبئ حديثا عن رافع بن خديج. قال: فانطلق بي معه إليه. قال: فذكر عن بعض عمومته ذكر فيه عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن كراء الأرض. قال: فتركه ابن عمر، ولم يأجره.
صحيح: رواه مسلم (1547: 111) عن محمد بن المثنى، حدّثنا حسين (يعني ابن حسن بن يسار)، حدّثنا ابن عون، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

قلت: تركهـ كان تنزيها، لا تحريما، وعليه قول ابن عباس، كما سيأتي.




ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: তিনি জমি বর্গা দিতেন। (রাবী নাফি’ বলেন,) অতঃপর তাঁকে রাফি’ ইবন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর একটি হাদীস সম্পর্কে অবহিত করা হলো। তিনি (ইবন উমার) আমাকে সাথে নিয়ে তাঁর (রাফি’র) নিকট গেলেন। রাফি’ ইবন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর চাচাদের কারো সূত্রে বর্ণনা করলেন, যেখানে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে উল্লেখ করা হয়েছে যে, তিনি জমি ভাড়া দিতে নিষেধ করেছেন। (নাফি’ বলেন,) এরপর ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা (জমি বর্গা দেওয়া) ছেড়ে দিলেন এবং তিনি আর কখনও তা বর্গা দেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (5423)


5423 - عن سالم بن عبد اللَّه أن عبد اللَّه بن عمر كان يكري أَرَضِيه، حتى بلغه أن رافع بن خديج الأنصاري كان ينهى عن كراء الأرض، فلقيه عبد اللَّه، فقال: يا ابن خديج، ماذا تحدث عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في كراء الأرض؟ قال رافع بن خديج لعبد اللَّه: سمعت عَميَّ -وكانا قد شهدا بدرا- يحدثان أهل الدار: أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهي عن كراء الأرض.

قال عبد اللَّه: لقد كنت أعلم في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن الأرض تكرى، ثم خشي عبد اللَّه أن يكون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أحدث في ذلك شيئًا لم يكن علمه، فترك كراء الأرض.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2345)، ومسلم (1547: 12) كلاهما من حديث الليث قال: حدثني عقيل بن خالد، عن ابن شهاب أنه قال: أخبرني سالم بن عبد اللَّه فذكره. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاري مختصر.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর জমি ভাড়া দিতেন। অবশেষে তাঁর কাছে এই সংবাদ পৌঁছাল যে, রাফি' ইবনে খাদীজ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জমি ভাড়া দিতে নিষেধ করেন। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করলেন এবং বললেন: "হে ইবনে খাদীজ! আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে জমি ভাড়া দেওয়া সম্পর্কে কী হাদীস বর্ণনা করেন?" রাফি' ইবনে খাদীজ আব্দুল্লাহ (ইবনে উমর) কে বললেন: "আমি আমার দুই চাচাকে (যাঁরা উভয়েই বদরের যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলেন) ঘরের লোকদের কাছে বলতে শুনেছি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জমি ভাড়া দিতে নিষেধ করেছেন।" আব্দুল্লাহ (ইবনে উমর) বললেন: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগেও আমি জানতাম যে জমি ভাড়া দেওয়া হয়।" এরপর আব্দুল্লাহ (ইবনে উমর) ভয় পেলেন যে, সম্ভবত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ বিষয়ে এমন কোনো নতুন বিধান দিয়েছেন যা তিনি জানতে পারেননি। তাই তিনি জমি ভাড়া দেওয়া ছেড়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5424)


5424 - عن نافع قال: ذهبت مع ابن عمر إلى رافع بن خديج حتى أتاه بالبلاط، فأخبره أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن كراء المزارع.

صحيح: رواه مسلم (1546: 110) عن ابن نمير، حدّثنا أبي، حدّثنا عبيد اللَّه، عن نافع قال فذكره.

ورواه أحمد (15818) عن يحيى بن سعيد، وابن نمير، كلاهما عن عبيد اللَّه قال: أخبرني نافع قال: كان ابن عمر يكري المزارع، فبلغه أن رافعا يأثر فيه حديثا عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فخرج إليه ابن عمر إلى البلاط، فسأله، فأخبره أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن كراء المزارع، فترك عبد اللَّه كراءها.

والبلاط مكان معروف بالمدينة مبلط بالحجارة، وهو بقرب مسجد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.




রাফে ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাফে (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি ইবনে উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে রাফে ইবনে খাদীজের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট গেলাম। অবশেষে ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বালাত নামক স্থানে তাঁর কাছে পৌঁছলেন। তখন তিনি (রাফে) তাকে অবহিত করলেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কৃষিজমি ভাড়া দেওয়া থেকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5425)


5425 - عن ظُهير بن رافع قال: لقد نهانا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن أمر كان بنا رافقا. قلت: ما قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فهو حق. قال: دعاني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ما تصنعون بمحاقلكم؟". قلت: نؤاجرها على الربيع، وعلى الأوسق من التمر والشعير. قال:"لا تفعلوا، ازرعوها، أو أزرعوها، أو أمسكوها". قال رافع: قلت: سمعا وطاعة.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحرث والمزارعة (2339)، ومسلم في البيوع (1548: 114)
كلاهما من طريق الأوزاعيّ، عن أبي النجاشي مولى رافع بن خديج، قال: سمعت رافع بن خديج ابن رافع، عن عمه ظهير بن رافع، قال ظهير فذكره.

واللّفظ للبخاريّ، ولم يذكر مسلم:"قال رافع: قلت: سمعا وطاعة".

وأبو النجاشي هو عطاء بن صهيب الأنصاري.




যুহাইর ইবনে রাফি' থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন একটি কাজ থেকে আমাদের নিষেধ করেছেন, যা আমাদের জন্য উপকারী ছিল। আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা বলেছেন, তাই সত্য। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ডাকলেন এবং বললেন: “তোমরা তোমাদের জমিতে কী করো?” আমি বললাম: আমরা বসন্তকালে (নির্ধারিত সময়ের জন্য) খেজুর বা বার্লির নির্দিষ্ট পরিমাণ ‘ওসাক’-এর বিনিময়ে এটি ভাড়া দেই। তিনি বললেন: “তোমরা তা করো না। হয় তোমরা নিজেরাই চাষ করো, নয়তো অন্যকে দিয়ে চাষ করাও, অথবা (চাষ না করে) জমি ধরে রাখো।” রাফি' বললেন: আমি বললাম: আমরা শুনলাম এবং মেনে নিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (5426)


5426 - عن رافع بن خديج قال: كنا نحائل الأرض على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فكريها بالثلث والربع والطعام المسمى، فجاءنا ذات يوم رجل من عمومتي، فقال: نهانا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن أمر كان لنا نافعا، وطواعية اللَّه ورسوله أنفع لنا، نهانا أن نحافل بالأرض، فنكريها على الثلث والربع والطعام المسمى، وأمر رب الأرض أن يزرعها، أو يُزرعها، وكره كراءها وما سوى ذلك.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1548: 113) من طريق إسماعيل بن علية، عن أيوب، عن يعلى بن حكيم، عن سليمان بن يسار، عن رافع بن خديج قال فذكره.




রাফে' ইবন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে (জমির) অংশীদারিত্ব করতাম। আমরা এক-তৃতীয়াংশ, এক-চতুর্থাংশ অথবা নির্দিষ্ট খাদ্যশস্যের বিনিময়ে তা ভাড়া দিতাম। একদিন আমার চাচাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি আমাদের কাছে এসে বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের এমন একটি কাজ থেকে বারণ করেছেন, যা আমাদের জন্য উপকারী ছিল। তবে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য আমাদের জন্য আরও বেশি কল্যাণকর। তিনি আমাদেরকে জমিতে অংশীদারিত্ব করতে নিষেধ করেছেন, ফলে আমরা এটিকে এক-তৃতীয়াংশ, এক-চতুর্থাংশ বা নির্দিষ্ট খাদ্যশস্যের বিনিময়ে ভাড়া দিতে পারব না। তিনি জমির মালিককে নির্দেশ দিয়েছেন যেন সে নিজেই তাতে চাষ করে, অথবা (অন্যের মাধ্যমে) চাষ করিয়ে নেয়। আর তিনি অন্য কোনো প্রকার ভাড়ার মাধ্যমে জমি দেওয়া অপছন্দ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5427)


5427 - عن أسيد بن ظهير ابن أخي رافع بن خديج قال: كان أحدنا إذا استغنى عن أرضه أعطاها بالثلث والربع والنصف، ويشترط ثلاث جداول والقصارة وما يسقى الربيع، وكان العيش إذ ذاك شديدا، وكان يُعمل فيها بالحديد وما شاء اللَّه، ويصيب منها منفعة، فأتانا رافع بن خديج فقال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهاكم عن أمر كان لكم نافعا، وطاعة اللَّه وطاعة رسوله صلى الله عليه وسلم أنفع لكم. إن النبي صلى الله عليه وسلم ينهاكم عن الحقل، ويقول:"من استغنى عن أرضه فليمنحها أخاه، أو ليدع". وينهاكم عن المزابنة. والمزابنة أن يكون الرجل له المال العظيم من النخل، فيأتيه الرجل، فيقول: قد أخذته بكذا وكذا وسقا من تمر.

صحيح: رواه أحمد (15815) عن عبد الرزاق وهو في مصنفه (14463) - عن سفيان، عن منصور، عن مجاهد، عن أبيه، عن ظهر فذكره.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا ابن ماجه (2460)، ولم يذكر فيه: المزابنة.

ورواه أبو داود (3398) من وجه آخر عن سفيان، والنسائي (3863، و 3864، و 3865) من أوجه عن منصور، إلا أنهما اختصرا.

وقوله:"ثلاث جداول" أي ثلاث حصص من الجداول.

والجدول: النهر الصغير، أي ما يخرج على أطرافها.

وقوله:"القُصارة" بالضم، ما يبقى من الحب في السنبل مما لا يتخلص به بعد ما يداس.

وقوله:"وما يسقي الربيع" هو النهر الصغير كأنهم يجعلون قطعة من الأرض، يسقيها الربيع.




রাফি' বিন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঁর ভাতিজা উসাইদ বিন যুহায়র বর্ণনা করেন): আমাদের মধ্যে কেউ যখন তার জমি থেকে অভাবমুক্ত হতো, তখন সে তা এক-তৃতীয়াংশ, এক-চতুর্থাংশ বা অর্ধাংশের বিনিময়ে [অন্যকে] দিয়ে দিত। এবং সে (জমির মালিক) তিন সারি পানি (জداول), শস্য মাড়াইয়ের পর অবশিষ্ট অংশ (আল-কুসারাহ) এবং বসন্তকালে যে জমিতে পানি সেচ করা হতো, তা শর্ত করত। তখন জীবনযাত্রা খুব কঠিন ছিল। আর তাতে লোহা (যন্ত্রপাতি) দ্বারা এবং আল্লাহ যা চাইতেন, তা দ্বারা কাজ করা হতো এবং এর থেকে উপকার পাওয়া যেত। তখন রাফি’ বিন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের কাছে এসে বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তোমাদেরকে এমন একটি বিষয় থেকে নিষেধ করেছেন, যা তোমাদের জন্য উপকারী ছিল। তবে আল্লাহ্‌র আনুগত্য এবং তাঁর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আনুগত্য তোমাদের জন্য অধিক উপকারী। নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তোমাদেরকে [নির্দিষ্ট অংশ বা শর্তে] জমি বর্গা দিতে নিষেধ করেছেন এবং তিনি বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার জমি থেকে অভাবমুক্ত হয়, সে যেন তা তার ভাইকে দান করে দেয়, অথবা ছেড়ে দেয়।" আর তিনি তোমাদেরকে মুজাবানা থেকেও নিষেধ করেছেন। মুজাবানা হলো: যখন কোনো ব্যক্তির প্রচুর খেজুরের সম্পদ (বাগান) থাকে, তখন অন্য এক ব্যক্তি তার কাছে এসে বলে, 'আমি এত এত ওসাক (নির্দিষ্ট পরিমাণ) খেজুরের বিনিময়ে এটি (সম্পূর্ণ ফসল) গ্রহণ করলাম।'