হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5481)


5481 - عن ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها استدانت، فقيل لها: يا أم المؤمنين، تستدين وليس عندك وفاء. قالت: إني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من أخذ دينا وهو يريد أن يؤديه أعانه اللَّه عز وجل".

حسن: رواه النسائي (4687) عن محمد بن المثنى قال: حدّثنا وهب بن جرير قال: حدّثنا أبي، عن الأعمش، عن حصين بن عبد الرحمن، عن عبيد اللَّه بن عتبة أن ميمونة استدانت فذكره.

وقد اختلف في سماع عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة بن مسعود من ميمونة، لأنه أرسل عن جماعة من الصحابة، ولم تذكر فيهم ميمونة.

ولكن قال الدارقطني في"العلل" (15/ 267):"وقد قيل: عن أبي بكر بن عياش، عن الأعمش، عن حصين، عن عبد اللَّه بن عتبة، والصحيح عن عبيد اللَّه (بن عبد اللَّه بن عتبة)؛ فقد رواه أبو حمزة السكري، وأبو عبيدة بن معن، وجرير بن حازم، عن الأعمش، عن حصين، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه مرسلا، والمرسل أشبه".

وللحديث طريقان آخران:

أحدهما ما رواه عمران بن حذيفة، عن أم المؤمنين ميمونة نحوه.

رواه النسائي (4686)، وابن ماجه (2408)، وعبد بن حميد (1549)، وابن حبان (5041)، والحاكم (2/ 23) كلهم من طريق زياد بن عمرو بن هند، عن عمران بن حذيفة.

وزياد بن عمرو، وشيخه مجهولان.

والثاني ما رواه منصور بن معتمر قال: حسبته عن سالم بن أبي الجعد، عن ميمونة أم المؤمنين نحوه.

رواه أحمد (26816) من طريق جعفر بن زياد، عن منصور بن معتمر.

ورواه أيضًا (26840) من طريق جعفر بن زياد، عن منصور بن معتمر، عن رجل، عن ميمونة.

وسالم بن أبي الجعد لم يذكر له السماع عن ميمونة.

وللحديث طرق أخرى، إذا ضم بعضها إلى بعض يكون حسنا لغيره.




মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি ছিলেন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সহধর্মিণী। তিনি একবার ঋণ নিলেন। তখন তাঁকে বলা হলো: হে উম্মুল মু’মিনীন, আপনি এমন অবস্থায় ঋণ নিচ্ছেন যখন তা পরিশোধ করার সামর্থ্য আপনার নেই। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঋণ গ্রহণ করে এবং তা পরিশোধ করার ইচ্ছা রাখে, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তাকে সাহায্য করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5482)


5482 - عن عبد اللَّه بن جعفر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه مع الدائن حتى يقضي دينه ما لم يكن فيما يكره اللَّه".

حسن: رواه ابن ماجه (2409)، والدارمي (2637)، والحاكم (2/ 23)، والبيهقي (5/ 355) كلهم من طريق محمد بن إسماعيل بن أبي فديك، حدّثنا سعيد بن سفيان مولى الأسلميين، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن جعفر فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
وإسناده حسن من أجل سعيد بن سفيان الأسلمي مولاهم المدني، روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في الثقات، حسن إسناده أيضًا الحافظ ابن حجر في"الفتح" (5/ 54).

وفي الباب عن عائشة أنها كانت تدّان، فقيل لها: ما لك وللدين؟ قالت: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من عبد كانت له نية في أداء دينه إلا كان له عز وجل عون".

رواه أحمد (24439)، والحاكم (2/ 22)، والبيهقي (5/ 354) كلهم من طريق القاسم بن الفضل، حدّثنا محمد بن علي قال: كانت عائشة تدّان فذكره.

ومحمد بن علي هو أبو جعفر الباقر لم يسمع من عائشة.

وأما ما رواه الحاكم والبيهقي من طريق محمد بن عبد الرحمن بن المجبر، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه عن عائشة نحوه، وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

فتعقبه الذهبي، فقال:"ابن مجبر وهاه أبو زرعة، وقال النسائي: متروك. لكن وثّقه أحمد".

قلت: هو محمد بن عبد الرحمن بن المجبَّر العمري البصري، ذكر الذهبي في"الميزان" (3/ 621) جماعة من أهل العلم تكلموا فيه من غير هؤلاء، منهم يحيى بن معين، والفلاس، والبخاري، ولكنه لم يذكر توثيق الإمام أحمد، فتأكد من ذلك.

وفي الباب أيضًا عن صهيب الخير، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أيما رجل تدين دينا وهو مجمع أن لا يوفيه إياه لقي اللَّه سارقا".

رواه ابن ماجه (2410) عن هشام بن عمار قال: حدّثنا يوسف بن محمد بن صيفي بن صهيب الخير قال: حدثني عبد الحميد بن زياد بن صيفي بن صهيب، عن شعيب بن عمرو قال: حدّثنا صهيب الخير فذكره.

وفيه يوسف بن محمد بن صيفي قال البخاري:"فيه نظر". وقال أبو حاتم:"لا بأس به". وذكره ابن حبان في ثقاته، وقد روى عنه عدد، وجعله الحافظ في مرتبة"مقبول".

وشيخه عبد الحميد بن زياد بن صيفي، وهو عمه، قال أبو حاتم: شيخ. وذكره ابن حبان في ثقاته، وفي التقريب:"لين الحديث".

وللحديث إسناد آخر: رواه ابن ماجه (2410) عن إبراهيم بن المنذر الحزامي قال: حدّثنا يوسف ابن محمد بن صيفي، عن عبد الحميد بن زياد، عن أبيه، عن جده صهيب، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه.

قال البخاري:"لا يصح سماع بعضهم من بعض".

وللحديث إسناد آخر: وهو ما رواه أحمد (1832) عن هشيم، أخبرنا عبد الحميد بن جعفر، عن الحسن بن محمد الأنصاري قال: حدثني رجل من النمر بن قاسط قال: سمعت صهيب بن سنان يحدث قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أيما رجل أصدق امرأة صداقا واللَّه يعلم أنه لا يريد أداءه إليها فغرَّها باللَّه، واستحل فرجها بالباطل لقي اللَّه يوم يلقاه وهو زان. وأيما رجل ادَّان من رجل
دينا واللَّه يعلم أنه لا يريد أداءه إليه فغرَّه باللَّه، واستحل ماله بالباطل لقي اللَّه عز وجل يوم يلقاه وهو سارق". وفيه رجل لم يسم.

وفيه أيضًا الحسن بن محمد الأنصاري، لم يذكر البخاري في"التاريخ الكبير" (2/ 306)، وابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (3/ 35)، وابن حبان في"الثقات" (6/ 166) من الرواة عنه غير عبد الحميد بن جعفر؛ فهو مجهول، ومع ذلك ذكره ابن حبان.

وللحديث طرق أخرى، ولا يصح منها شيء.




আব্দুল্লাহ ইবনে জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা ঋণগ্রহীতার সাথে থাকেন যতক্ষণ পর্যন্ত না সে তার ঋণ পরিশোধ করে দেয়, তবে যদি সেই ঋণ আল্লাহর অপছন্দনীয় কোনো বিষয়ে না হয়ে থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5483)


5483 - عن أبي هريرة أن رجلا أتى النبي صلى الله عليه وسلم يتقاضاه بعيرا، قال: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطوه". فقالوا: لا نجد إلا سنا أفضل من سنه. فقال الرجل: أوفيتني أوفاك اللَّه. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطوه؛ فإن من خيار النّاس أحسنهم قضاء".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الاستقراض (2392)، ومسلم في المساقاة (1601: 122) من طريق سفيان، حدثني سلمة بن كهيل، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره. واللّفظ للبخاريّ.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁর কাছে পাওনা একটি উট চাইল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে দিয়ে দাও।" তারা (উপস্থিত লোকেরা) বলল: "আমরা তো তার উটের বয়সের চেয়ে উত্তম বয়সের উট ছাড়া আর কিছু পাচ্ছি না।" তখন লোকটি বলল: "আপনি আমার পাওনা পূর্ণ করে দিয়েছেন, আল্লাহ আপনাকে উত্তম প্রতিদান দিন।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে (উত্তম বয়সের উটটি) দিয়ে দাও। কারণ মানুষের মধ্যে তারাই উত্তম যারা উত্তমরূপে ঋণ পরিশোধ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5484)


5484 - عن أبي هريرة قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم رجل يتقاضاه قد استسلف منه شطر وسق. فأعطاه وسقا. فقال:"نصف وسق لك، ونصف وسق لك من عندي". ثم جاء صاحب الوسق يتقاضاه فأعطاه وسقين، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"وسق لك، ووسق من عندي".

حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1306) - عن محمد بن أبي غالب، ثنا أبو صالح الفراء، ثنا عبد اللَّه بن المبارك، عن حمزة الزيات، عن حبيب بن أبي ثابت، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (4/ 141):"فيه أبو صالح الفراء ولم أعرفه، وبقية رجاله رجال الصحيح".

كذا قال، وأبو صالح الفراء اسمه محبوب بن موسى، كما جاء مصرحا به في رواية البيهقي (5/ 351).

ومحبوب بن موسى أبو صالح الفراء هذا مختلف فيه، فوثّقه أبو داود، وقال العجلي: ثقة صاحب سنة، وذكره ابن حبان في الثقات، وقال الدارقطني: ليس بالقوي.

والخلاصة فيه أنه حسن الحديث، وليس في حديثه هذا ما ينكر عليه، وحَسَّنه أيضًا المنذري في"الترغيب والترهيب" (2728).

وتعقب الحافظ ابن حجر أيضًا الهيثمي فقال: هو محبوب بن موسى ثقة صالح. مختصر زوائد
البزار (923).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো এবং তিনি যার থেকে এক 'ওসক'-এর অর্ধেক ধার নিয়েছিলেন, তার পরিশোধ চাইল। অতঃপর তিনি (নবী) তাকে এক 'ওসক' দিলেন। তিনি বললেন: “অর্ধেক 'ওসক' তোমার প্রাপ্য, আর অর্ধেক 'ওসক' আমার পক্ষ থেকে তোমাকে দেওয়া হলো।" এরপর ঐ 'ওসক'-এর (ধার প্রদানকারী) ব্যক্তি আবার এলো এবং তার পরিশোধ চাইল, তখন তিনি তাকে দুই 'ওসক' দিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এক 'ওসক' তোমার প্রাপ্য, আর এক 'ওসক' আমার পক্ষ থেকে তোমাকে দেওয়া হলো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5485)


5485 - عن أبي رافع مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال: استسلف رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بكرا فجاءته إبل من الصدقة. قال أبو رافع: فأمرني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن أقضي الرجل بكره، فقلت: لم أجد في الإبل إلا جملا خيارا رباعيا، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أعطه إياه؛ فإن خيار النّاس أحسنهم قضاء".

صحيح: رواه مالك في البيوع (89) عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي رافع مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال فذكره.

ورواه مسلم في المساقاة (1600: 118) من طريق مالك به مثله.

قال مالك:"لا بأس بأن يقبض من أسلف شيئًا من الذهب أو الورق أو الطعام أو الحيوان ممن أسلفه ذلك أفضل مما أسلفه إذا لم يكن ذلك على شرط منهما أو عادة، فإن كان ذلك على شرط أو وأي أو عادة فذلك مكروه، ولا خير فيه".

وقوله:"أو وأي" أي وعد.




আবূ রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি যুবক উট ধার নিয়েছিলেন। এরপর তাঁর কাছে সাদাকার উট আসলো। আবূ রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আদেশ করলেন যেন আমি লোকটিকে তার ধার নেওয়া উটটি পরিশোধ করে দেই। আমি বললাম: আমি উটগুলোর মধ্যে উত্তম ও শক্তিশালী ‘রুবাই’ (চার বছর বয়সী) উট ছাড়া অন্য কিছু পেলাম না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সেটিই তাকে দিয়ে দাও; কারণ উত্তম লোকেরা পরিশোধের ক্ষেত্রেও উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (5486)


5486 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كان لي على النبي صلى الله عليه وسلم دين، فقضاني، وزادني، ودخلت عليه المسجد، فقال لي:"صل ركعتين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الاستقراض (2394)، ومسلم في صلاة المسافرين (715: 71) كلاهما من طريق محارب بن دثار، عن جابر فذكره. واللّفظ لمسلم.




জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাওনা ছিল। অতঃপর তিনি তা পরিশোধ করলেন এবং আমাকে অতিরিক্তও দিলেন। আমি তাঁর নিকট মসজিদে প্রবেশ করলাম, তখন তিনি আমাকে বললেন: "তুমি দু'রাকাত সালাত (নামাজ) আদায় কর।"









আল-জামি` আল-কামিল (5487)


5487 - عن إسماعيل بن إبراهيم بن عبد اللَّه بن أبي ربيعة المخزومي، عن أبيه، عن جده أن النبي صلى الله عليه وسلم استلف منه حين غزا حنينا ثلاثين أو أربعين ألفا، فلما قدم قضاها إياه. ثم قال له النبي صلى الله عليه وسلم:"بارك اللَّه لك في أهلك ومالك. إنما جزاء السلف الوفاء والحمد".

حسن: رواه النسائي (4683)، وابن ماجه (2424)، وأحمد (16410)، والبيهقي (5/ 355) كلهم من حديث إسماعيل بن إبراهيم بن عبد اللَّه بن أبي ربيعة المخزومي بإسناده مثله. ولكن انقلب في مسند أحمد إلى إبراهيم بن إسماعيل، والصواب ما ذكرناه.

وإبراهيم بن عبد اللَّه هو إبراهيم بن عبد الرحمن بن عبد اللَّه، ينسب إلى جده، روى عنه جماعة، ووثّقه ابن حبان، وأخرج له البخاري في صحيحه، فأقل أحواله أنه حسن الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবী রাবী'আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন হুনাইন যুদ্ধে গমন করেন, তখন তিনি তার কাছ থেকে ত্রিশ বা চল্লিশ হাজার (মুদ্রা) ঋণ নিয়েছিলেন। অতঃপর যখন তিনি (যুদ্ধ থেকে) ফিরে এলেন, তখন তিনি তাকে তা পরিশোধ করে দিলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "আল্লাহ তোমার পরিবার ও সম্পদে বরকত দান করুন। নিশ্চয়ই ঋণের প্রতিদান হলো পরিশোধ করা এবং কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (5488)


5488 - عن العرباض بن سارية يقول: كنت عند النبي صلى الله عليه وسلم، فقال أعرابي: اقضني بكري، فأعطاه بعيرا مسنا، فقال الأعرابي: يا رسول اللَّه، هذا أسن من بعيري، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"خير النّاس خيرهم قضاء".
حسن: رواه النسائي (4619)، وابن ماجه (2286)، وأحمد (17149)، والحاكم (2/ 30)، والبيهقي (5/ 351) كلهم من طريق معاوية بن صالح قال: حدثني سعيد بن هانئ قال: سمعت العرباض بن سارية فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السياقة".

قلت: إسناده حسن من أجل معاوية بن صالح، وهو ابن حُدير -مصغرا- فإنه حسن الحديث.




ইরবায ইবনু সারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তখন এক বেদুঈন (আরব) এসে বলল: আমার অল্পবয়সী উটটির ঋণ পরিশোধ করুন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে একটি বয়স্ক উট দিলেন। বেদুঈনটি বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! এটি তো আমার উটটির চেয়েও বয়স্ক। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “মানুষের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সে, যে তার ঋণ পরিশোধের ক্ষেত্রেও শ্রেষ্ঠ।”









আল-জামি` আল-কামিল (5489)


5489 - عن عائشة قالت ابتاع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من رجل من الأعراب جزورا -أو جزائر- بوسق من تمر الذُخرة، -وتمر الذخرة العجوة- فرجع به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى بيته، فالتمس له التمر، فلم يجده، فخرج إليه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال له:"يا عبد اللَّه، إنا قد ابتعنا منك جزورا -أو جزائر- بوسق من تمر الذخرة، فالتمسناه، فلم نجده". قال: فقال الأعرابي: واغدراه! قالت: فنهمه النّاس، وقالوا: قاتلك اللَّه، أيغدر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قالت: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"دعوه؛ فإن لصاحب الحق مقالا".

ثم عاد له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"يا عبد اللَّه، إنا ابتعنا منك جزائرك، ونحن نظن أن عندنا ما سمينا لك، فالتمسناه، فلم نجده". فقال الأعرابي: واغدراه! فنهمه النّاس، وقالوا: قاتلك اللَّه، أيغدر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"دعوه؛ فإن لصاحب الحق مقالا" فردد ذلك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مرتين أو ثلاثا، فلما رآه لا يفقه عنه قال لرجل من أصحابه:"اذهب إلى خويلة بنت حكيم بن أمية، فقل لها: رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول لك: إن كان عندك وسق من تمر الذخرة فأسلفيناه حتى نؤديه إليك إن شاء اللَّه"، فذهب إليها الرجل، ثم رجع الرجل، فقال: قالت: نعم، هو عندي يا رسول اللَّه، فابعث من يقبضه، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للرجل:"اذهب به، فأوفه الذي له". قال: فذهب به، فأوفاه الذي له. قالت: فمر الأعرابي برسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو جالس في أصحابه- فقال: جزاك اللَّه خيرا؛ فقد أوفيت وأطيبت. قالت: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أولئك خيار عباد اللَّه عند اللَّه يوم القيامة الموفون المطيبون".

حسن: رواه أحمد (26312) عن يعقوب قال: حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق قال: حدثني هشام ابن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

ورواه البزار -كشف الأستار (1309) - عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن جعفر بن الزبير، عن عروة، عن عائشة.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق؛ فإنه حسن الحديث إذا صرح بالتحديث، وقد صرح
به، ثم أنه لم ينفرد به، بل تابعه يحيى بن عمير.

ومن طريقه رواه عبد بن حميد (1499)، والبيهقي (6/ 20)، والبزار -كشف الأستار (1310) - مختصرا جدا.

وقال البزار:"لا نعلم أحدا رواه عن هشام إلا يحيى".

كذا قال! وقد رأينا أنه رواه عنه أيضًا محمد بن إسحاق، كما رواه عنه أيضًا حماد بن سلمة، عن هشام. رواه الحاكم (2/ 32) من حديث يحيى بن سلام، عن حماد بن سلمة. وقال: صحيح الإسناد.

وتعقبه الذهبي، فقال:"يحيى ضعيف، ولم يخرج له أحد".

قلت: يحيى بن سلام هو البصري ضعفه الدارقطني، وقال ابن عدي: يكتب حديثه مع ضعفه. ترجمه الذهبي في الميزان.

وهذه المتابعات لمحمد بن إسحاق تقوي ما رواه، وأنه لم ينفرد به، ويحسن حديثه إذا صرح بالتحديث، فكيف إذا توبع عليه. ولذا صحح الهيثمي في"المجمع" (4/ 139 - 140) حديث أحمد، فقال:"رواه أحمد والبزار، وإسناد أحمد صحيح".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এক বেদুঈন ব্যক্তির কাছ থেকে ‘ওয়াসক’ পরিমাণ যুখরা খেজুরের (এবং যুখরা খেজুর হলো আজওয়া) বিনিময়ে একটি উট—বা একাধিক উটনী—ক্রয় করেছিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেটি নিয়ে তাঁর বাড়িতে ফিরে গেলেন এবং তার জন্য খেজুর খুঁজতে লাগলেন, কিন্তু তা খুঁজে পেলেন না। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার (বেদুঈনের) কাছে বের হলেন এবং বললেন: “হে আব্দুল্লাহ! আমরা তোমার কাছ থেকে এক ওয়াসক যুখরা খেজুরের বিনিময়ে একটি উট—বা একাধিক উটনী—ক্রয় করেছিলাম, আমরা তা খুঁজলাম কিন্তু পেলাম না।” বর্ণনাকারী বলেন: তখন বেদুঈন লোকটি বলল: ‘হায়রে বিশ্বাসঘাতকতা!’ আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন লোকজন তাকে ধমকাল এবং বলল: আল্লাহ তোমাকে ধ্বংস করুন! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কি বিশ্বাসঘাতকতা করেন? তিনি (আয়িশা) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “তাকে ছেড়ে দাও; কেননা হকদারের (অধিকারীর) কিছু বলার অধিকার আছে।”

এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার কাছে পুনরায় এলেন এবং বললেন: “হে আব্দুল্লাহ! আমরা তোমার উটনীগুলো ক্রয় করেছিলাম এবং আমাদের ধারণা ছিল যে, তোমার জন্য যা নাম উল্লেখ করেছি তা আমাদের কাছে আছে। আমরা তা খুঁজলাম, কিন্তু পেলাম না।” তখন বেদুঈন লোকটি বলল: ‘হায়রে বিশ্বাসঘাতকতা!’ তখন লোকজন তাকে ধমকাল এবং বলল: আল্লাহ তোমাকে ধ্বংস করুন! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কি বিশ্বাসঘাতকতা করেন? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “তাকে ছেড়ে দাও; কেননা হকদারের (অধিকারীর) কিছু বলার অধিকার আছে।” রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দু’বার অথবা তিনবার এমন পুনরাবৃত্তি করলেন। যখন তিনি দেখলেন যে লোকটি বিষয়টি বুঝতে পারছে না (বা সন্তুষ্ট হচ্ছে না), তখন তিনি তাঁর একজন সাহাবীকে বললেন: “তুমি খুওয়াইলা বিনত হাকীম ইবনে উমাইয়ার কাছে যাও এবং তাকে বলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আপনাকে বলেছেন, আপনার কাছে যদি এক ওয়াসক যুখরা খেজুর থাকে, তবে আপনি যেন তা আমাদের ঋণ দেন, যতক্ষণ না আমরা ইনশাআল্লাহ তা আপনাকে পরিশোধ করে দিই।”

লোকটি তার (খুওয়াইলার) কাছে গেলেন। এরপর লোকটি ফিরে এসে বললেন: তিনি (খুওয়াইলা) বলেছেন, “হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল! তা আমার কাছে আছে। আপনি কাউকে পাঠান, যাতে সে তা গ্রহণ করে।” তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সেই লোকটিকে বললেন: “তাকে নিয়ে যাও এবং তার পাওনা পরিশোধ করে দাও।” বর্ণনাকারী বলেন: লোকটি তা নিয়ে গেলেন এবং তার পাওনা পরিশোধ করে দিলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর বেদুঈন লোকটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের পাশ দিয়ে যাচ্ছিল, যখন তিনি তাঁর সাহাবীদের সাথে বসা ছিলেন—তখন সে বলল: আল্লাহ আপনাকে উত্তম প্রতিদান দিন; আপনি পুরোপুরি পরিশোধ করেছেন এবং উত্তম আচরণ করেছেন। তিনি (আয়িশা) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “এরাই হলো আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে সর্বোত্তম, যারা কিয়ামতের দিন আল্লাহর কাছে উত্তম প্রতিদান পাবে, যারা পরিশোধ করে এবং উত্তম আচরণ করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (5490)


5490 - عن ابن عمر، وعائشة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من طلب حقا فليطلب في عفاف واف، أو غير واف".

حسن: رواه ابن ماجه (2421)، وصحّحه ابن حبان (5080)، والحاكم (2/ 32)، والبيهقي (5/ 358) كلهم من طرق عن ابن أبي مريم قال: حدّثنا يحيى بن أيوب، عن عبيد اللَّه بن أبي جعفر، عن نافع، عن ابن عمر، وعائشة فذكراه.

وإسناده حسن من أجل الكلام في يحيى بن أيوب، وهو الغافقي، غير أنه حسن الحديث.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো অধিকার (হক) চায়, সে যেন তা সচ্চরিত্রতা ও সংযমশীলতার সাথে চায়, তা পূর্ণ হোক বা না হোক।”









আল-জামি` আল-কামিল (5491)


5491 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال لصاحب الحق:"خذ حقك في عفاف واف، أو غير وافٍ".

حسن: رواه ابن ماجه (2422) عن محمد بن المؤمل بن الصباح القيسي قال: حدّثنا محمد بن محبَّب القرشي قال: حدّثنا سعيد بن السائب الطائفي، عن عبد اللَّه بن يامين، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن يامين الطائفي.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাওনাদারের উদ্দেশ্যে বললেন: "তুমি তোমার পাওনা সংযমের সাথে (সীমা অতিক্রম না করে) নাও, অথবা অতিরিক্ত দাবি সহকারে (সীমা অতিক্রম করেও) নাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (5492)


5492 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"مطل الغني ظلم، وإذا أتبع أحدكم على مليء فليتبع".
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (84) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاريّ في الحوالة (2287)، ومسلم في المساقاة (1564) كلاهما من طريق مالك به.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সম্পদশালী ব্যক্তির (ঋণ পরিশোধে) টালবাহানা করা যুলুম। আর যখন তোমাদের কাউকে কোনো সামর্থ্যবান ব্যক্তির উপর (ঋণ স্থানান্তরের জন্য) হাওয়ালা করা হয়, তখন সে যেন তা মেনে নেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5493)


5493 - عن جابر بن عبد اللَّه أن أباه قتل يوم أحد شهيدا وعليه دين، فاشتد الغرماء في حقوقهم، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فسألهم أن يقبلوا تمر حائطي، ويحللوا أبي فأبوا، فلم يعطهم صلى الله عليه وسلم حائطي، وقال:"سنغدو عليك"، فغدا علينا حين أصبح، فطاف في النخل، ودعا في ثمرها بالبركة، فجددتها، فقضيتهم، وبقي لنا من تمرها.

صحيح: رواه البخاري في الاستقراض (2395) عن عبدان، أخبرنا عبد اللَّه، أخبرنا يونس، عن الزهريّ، حدثني ابن كعب بن مالك أن جابر بن عبد اللَّه أخبره أن أباه فذكره.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা উহুদের দিন শহীদ হন এবং তাঁর উপর ঋণ ছিল। ফলে পাওনাদাররা তাদের হক আদায়ের ব্যাপারে কঠোরতা শুরু করল। তখন আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তিনি তাদের নিকট অনুরোধ করলেন যেন তারা আমার বাগানের খেজুর গ্রহণ করে আমার পিতাকে দায়মুক্ত করে দেয়। কিন্তু তারা প্রত্যাখ্যান করল। ফলে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের আমার বাগান থেকে কিছু দিলেন না এবং বললেন: "আমরা তোমার কাছে ভোরে আসব।" অতঃপর ভোর হলে তিনি আমাদের কাছে আসলেন এবং খেজুর গাছের চারপাশে প্রদক্ষিণ করলেন এবং এর ফলের মধ্যে বরকতের জন্য দু’আ করলেন। এরপর আমি তা মেপে নিলাম। আমি তাদের (পাওনাদারদের) ঋণ পরিশোধ করলাম, এরপরও আমাদের জন্য কিছু খেজুর অবশিষ্ট রইল।









আল-জামি` আল-কামিল (5494)


5494 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: غزوت مع النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"كيف ترى بعيرك؟ أتبيعه?" قلت: نعم، فبعته إياه، فلما قدم المدينة غدوت إليه بالبعير، فأعطاني ثمنه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الاستقراض (2385)، ومسلم في صلاة المسافرين (715: 11) كلاهما من طريق جرير، عن المغيرة، عن الشعبي، عن جابر فذكره.

واللّفظ للبخاري، وهو عند مسلم مطولا، وزاد في آخره:"ورده علي".




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলাম। তিনি বললেন, "তোমার উটটি কেমন দেখছ? তুমি কি এটি বিক্রি করবে?" আমি বললাম, হ্যাঁ। এরপর আমি তাঁর কাছে এটি বিক্রি করে দিলাম। যখন আমরা মদিনায় পৌঁছলাম, আমি উটটি নিয়ে তাঁর নিকট গেলাম। তখন তিনি আমাকে তার মূল্য পরিশোধ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5495)


5495 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه ذكر"أن رجلا من بني إسرائيل سأل بعض بني إسرائيل أن يسلفه ألف دينار، قال: ائتني بشهداء أشهدهم. قال: كفى باللَّه شهيدا. قال: ائتني بالكفيل. قال: كفى باللَّه كفيلا. قال: صدقت. فدفعها إليه إلى أجل مسمى". الحديث.

صحيح: رواه أحمد (8578) عن يونس بن محمد، حدّثنا ليث بن سعد، عن جعفر بن ربيعة، عن عبد الرحمن بن هرمز، عن أبي هريرة، فذكره بطوله.

ورواه البخاريّ في الاستقراض (2404) تعليقا عن الليث قال: حدثني جعفر بن ربيعة به، فذكر هذا القدر من الحديث، وذكره بتمامه في كتاب الكفالة (2291).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উল্লেখ করেছেন যে, বনী ইসরাঈলের এক ব্যক্তি বনী ইসরাঈলের অপর এক ব্যক্তির নিকট এক হাজার দীনার কর্জ (ঋণ) চাইল। সে (ঋণদাতা) বলল: তুমি আমার কাছে সাক্ষী নিয়ে আসো, যাদেরকে আমি সাক্ষী বানাবো। সে (ঋণগ্রহীতা) বলল: আল্লাহই যথেষ্ট সাক্ষী। সে বলল: তুমি আমার কাছে জামিনদার নিয়ে আসো। সে বলল: আল্লাহই যথেষ্ট জামিনদার। সে বলল: তুমি সত্য বলেছ। অতঃপর সে তাকে নির্দিষ্ট সময়ের জন্য তা (দীনারগুলো) দিয়ে দিল।









আল-জামি` আল-কামিল (5496)


5496 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"كان تاجر يداين النّاس، فإذا رأى معسرا قال لفتيانه: تجاوزوا عنه، لعل اللَّه أن يتجاوز عنا، فتجاوز اللَّه عنه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2078)، ومسلم في المساقاة (1562) كلاهما من حديث ابن شهاب الزهريّ، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: একজন ব্যবসায়ী ছিলেন যিনি লোকদেরকে ঋণ দিতেন। যখন তিনি কোনো অভাবগ্রস্তকে দেখতেন, তখন তিনি তাঁর কর্মচারীদের বলতেন: তোমরা তাকে ছাড় দাও, সম্ভবত আল্লাহ আমাদের ক্ষমা করে দেবেন। ফলে আল্লাহ তাঁকে ক্ষমা করে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5497)


5497 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من نفس عن مؤمن كربة من كرب الدنيا نفس اللَّه عنه كربة من كرب يوم القيامة، ومن يسر على معسر يسر اللَّه عليه في الدنيا والآخرة".

صحيح: رواه مسلم في العلم (2699) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة في حديث طويل ذكر في موضعه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মুমিনের পার্থিব কষ্টসমূহের মধ্যে থেকে একটি কষ্ট দূর করবে, আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিনের কষ্টসমূহের মধ্যে থেকে তার একটি কষ্ট দূর করে দিবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো অভাবগ্রস্তের উপর সহজ করবে, আল্লাহ তাআলা দুনিয়া ও আখিরাতে তার জন্য সহজ করে দিবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5498)


5498 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أنظر معسرا أو وضع له أظله اللَّه في ظل عرشه يوم القيامة".

صحيح: رواه الترمذيّ (1306)، وأحمد (8711) كلاهما من حديث إسحاق بن سليمان الرازي، حدّثنا داود بن قيس، عن زيد بن أسلم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح.

وقال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه".

قلت: وله وجه آخر رواه البغوي في"شرح السنة" (2141) من طريق أبي جعفر الرياني، نا حميد بن زنجويه، نا يعلى، نا يحيى بن عبيد اللَّه، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر مثله.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো অভাবগ্রস্তকে (ঋণ পরিশোধের জন্য) অবকাশ দেয় অথবা তার (ঋণের) বোঝা লাঘব করে দেয়, কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাকে তাঁর আরশের ছায়ায় স্থান দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5499)


5499 - عن حذيفة بن اليمان قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تلقت الملائكة روح رجل ممن كان قبلكم، فقالوا: أعملت من الخير شيئًا؟ قال: لا. قالوا: تذكر. قال: كنت أداين النّاس، فآمر فتياني أن يُنظروا المعسر، ويتجوزوا عن الموسر، قال: قال اللَّه عز وجل: تجوزوا عنه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2077)، ومسلم في المساقاة (1560) كلاهما من حديث زهير، حدّثنا منصور، عن ربعي بن حراش أن حذيفة حدثهم فذكره، واللّفظ لمسلم.

وقال البخاري: وقال أبو مالك (هر سعد بن طارق) عن ربعي:"كنت أُيَسِّر على الموسر، وأنظر المعسر". وتابعه شعبة عن عبد الملك عن ربعي.

وقال أبو عوانة عن عبد الملك عن ربعي:"أنظر الموسر، وأتجاوز عن المعسر". وقال نعيم بن أبي
هند عن ربعي:"فأقبل من الموسر، وأتجاوز عن المعسر". انتهى. ووصل مسلم معظم هذه الروايات.

وقوله:"يتجوزوا" من التجاوز، والتجوز معناه المسامحة في الاقتضاء والاستيفاء، وقبول ما فيه نقص يسير.




হুযাইফাহ ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের পূর্ববর্তী উম্মতের এক ব্যক্তির রূহ ফেরেশতারা গ্রহণ করলেন। তখন তারা (ফেরেশতারা) জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি কি কোনো নেক কাজ করেছ? সে বলল: না। তারা বললেন: স্মরণ কর। সে বলল: আমি লোকদের ঋণ দিতাম, আর আমার কর্মচারীদেরকে নির্দেশ দিতাম যেন তারা অভাবীকে অবকাশ দেয় এবং সচ্ছল ব্যক্তির কাছ থেকে (ঋণ আদায়ের ক্ষেত্রে) ছাড় দেয়। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বললেন: তোমরা তার ওপর সহজতা অবলম্বন কর (বা তাকে ক্ষমা করে দাও)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5500)


5500 - عن أبي مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حوسب رجل ممن كان قبلكم، فلم يوجد له من الخير شيء إلا أنه كان يخالط النّاس، وكان موسرا، فكان يأمر غلمانه أن يتجاوزوا عن المعسر. قال: قال اللَّه عز وجل نحن أحق بذلك منه، تجاوزوا عنه".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1561: 30) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن شقيق، عن أبي مسعود فذكره.




আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের পূর্ববর্তী উম্মতের এক ব্যক্তিকে হিসাব করা হয়েছিল, কিন্তু তার মাঝে কোনো নেক কাজ পাওয়া যায়নি, শুধু এই ছাড়া যে সে মানুষের সাথে ওঠাবসা করত এবং সম্পদশালী ছিল। সে তার কর্মচারীদেরকে নির্দেশ দিত যে তারা যেন অভাবী (ঋণগ্রহীতাদের) প্রতি উদারতা দেখায়। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল বললেন: আমরা তার চেয়ে (উদারতা দেখানোর) অধিক হকদার। তোমরা তাকে ক্ষমা করে দাও।"