হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5508)


5508 - عن سمرة بن جندب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من وجد عين ماله عند رجل فهو أحق به".

صحيح: رواه أبو داود في"السنن" (3531)، وفي المراسيل (181)، والنسائي (4681)، وأحمد (20148)، وابن الجارود (1026)، والبيهقي (6/ 51) كلهم من حديث هشيم، عن موسى ابن السائب، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة فذكره.

قال أبو داود:"والعمل على هذا".

وإسناده صحيح، والحسن -وهو البصري- سمع من سمرة مطلقا، كما مرَّ مرارا، ثم إنه توبع.

والحديث محمول على ما إذا كان مال الرجل قد سرق أو ضاع، ثم وجده كما جاء في رواية زيد بن عقبة عن سمرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا سرق من الرجل متاع، أو ضاع له متاع فوجده بيد رجل بعينه فهو أحق به، ويرجع المشتري على البائع بالثمن".

رواه ابن ماجه (2331)، وأحمد (20146)، والبيهقي (6/ 51) كلهم من حديث حجاج، عن سعيد بن عبيد بن زيد بن عقبة، عن أبيه، عن سمرة فذكره.

وحجاج هو بن أرطاة ضعيف إلا أنه توبع.

وقوله:"سعيد بن عبيد بن زيد بن عقبة" هكذا في ابن ماجه، وأحمد. وفي البيهقي:"سعيد بن زيد بن عقبة" بحذف عبيد، وهو أشبه، كما قال الترمذيّ وغيره.

وأما ما روي عن عمر بن إبراهيم، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة مرفوعا:"من وجد متاعه عند مفلس بعينه فهو أحق به" فهو ضعيف.
رواه أحمد (20109) عن عبد الصمد، حدّثنا عمر بن إبراهيم فذكره.

وعمر بن إبراهيم هو أبو حفص العبدي مضطرب في روايته عن قتادة، وكان يروي عنه أشياء مناكير لم يوافق عليها، وهذا منها؛ لأنه خالف موسى بن السائب عن قتادة، فرواه بمعنى آخر، كما سبق.




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি তার নিজস্ব পণ্য (আসল সম্পদ) কোনো লোকের কাছে খুঁজে পায়, সে তার জন্য অধিক হকদার।”









আল-জামি` আল-কামিল (5509)


5509 - عن أسيد بن ظهير الأنصاري أنه كان عاملا على اليمامة، وأن مروان كتب إليه أن معاوية كتب إلي: أيما رجل سرق منه سرقة فهو أحق بها حيث وجدها. قال: وكتب بذلك مروان إلي، فكتبت إلى مروان: أن النبي صلى الله عليه وسلم قضى بأنه إذا كان الذي ابتاعها من الذي سرقها غير منهم يخير سيدها، فإن شاء أخذ الذي سرق منه بثمنه، وإن شاء اتبع سارقه. ثم قضى بذلك بعد أبو بكر وعمر وعثمان. قال: فبعث مروان بكتابي إلى معاوية. قال: فكتب معاوية إلى مروان: إنك لست أنت ولا أسيد ابن ظهير بقاضيين علي، ولكني أقضي فيما ولِّيت عليكما، فأنفذ لما أمرتك به، فبعث مروان إلي بكتاب معاوية، فقلت: لا أقضي به ما وليت يعني بقول معاوية.

صحيح: أخرجه عبد الرزاق (18829) عن ابن جريج قال: لقد أخبرني عكرمة بن خالد أن أسيد بن ظهير الأنصاري أخبره فذكره. وأخرجه أحمد (17987) عن عبد الرزاق به مختصرا.

ثم أخرجه هو (17986)، وأبو داود في المراسيل (180)، والنسائي (4680)، والحاكم (2/ 35 - 36) كلهم من أوجه أخرى عن ابن جريج، إلا أنهم قالوا: عن أسيد بن حضير الأنصاري. فذكر نحوه.

والصواب أنه أسيد بن ظهير، كما قال أبو داود في المراسيل، والمزي في"التحفة" (1/ 72)؛ فإن أسيد بن حضير مات سنة عشرين أو بعدها بقليل، ووقعت القصة في عهد معاوية. وإسناده صحيح.

وفي مصنف عبد الرزاق:"سأل ابن جريج عطاء: سرق رجل مالي، فوجدته قد باعه. قال: فخذه حيث وجدته. قلت: وائتمنته، فخانه، فباعه. قال: خذه حيث وجدته، سبحان اللَّه! ما هو إلا ذلك. قلت: فاستعارنيه، فباعه. قال: وكذلك فخذه. قال: قلت: فسرق رجل عبدا لي، فمهره امرأة وأصابها. قال: سمعنا أنه يقال: خذ مالك حيث وجدته، فخذ عبدك منها".

وذكره أحمد (17987) مختصرا.




আসীদ ইবনু যুহায়র আল-আনসারী থেকে বর্ণিত, তিনি ইয়ামামার গভর্ণর ছিলেন। মারওয়ান তাঁর কাছে লিখে পাঠালেন যে, মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে চিঠি লিখে জানিয়েছেন: কোনো ব্যক্তি যদি চুরি হওয়া কোনো জিনিস পায়, তবে সে যেখানেই তা পাক না কেন, সে সেটির বেশি হকদার।

তিনি (আসীদ) বলেন: মারওয়ান আমাকে এ বিষয়ে লিখলেন। আমি মারওয়ানের কাছে লিখে পাঠালাম যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এ মর্মে ফায়সালা দিয়েছিলেন যে, যখন যে ব্যক্তি চোরাই মালটি ক্রয় করেছে, সে যদি চোরের সঙ্গে সংশ্লিষ্ট (অভিযুক্ত) না হয়, তবে এর মালিককে এখতিয়ার দেওয়া হবে। সে চাইলে চুরিকৃত জিনিসের মূল্য নেবে, আর না চাইলে তার চোরকে অনুসরণ করবে (ধরে আনবে)। এরপর আবূ বাকর, উমার এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও এই মর্মে ফায়সালা দিয়েছেন।

তিনি বলেন: তখন মারওয়ান আমার চিঠি মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠিয়ে দিলেন। তিনি বলেন: মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারওয়ানের কাছে লিখে পাঠালেন: "তুমি কিংবা আসীদ ইবনু যুহায়র কেউই আমার উপর কর্তৃত্বকারী বিচারক নও। বরং আমি তোমাদের উপর কর্তৃত্ব করি এবং ফায়সালা দেই। অতএব, আমি তোমাকে যা আদেশ করেছি, তা বাস্তবায়ন করো।" এরপর মারওয়ান মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চিঠি আমার কাছে পাঠালেন। আমি বললাম: "যতদিন আমি দায়িত্বে থাকব, ততদিন আমি এই ফায়সালা দেবো না।" (অর্থাৎ মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা অনুযায়ী ফায়সালা দেবো না)।









আল-জামি` আল-কামিল (5510)


5510 - عن الشريد بن سويد الثقفي قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لي الواجدِ يحلُّ عرضه وعقوبته".

حسن: رواه أبو داود (3628)، والنسائي (4689، 4690)، وابن ماجه (2427)، وأحمد (17946)،
وصحّحه ابن حبان (5089)، والحاكم (4/ 104) كلهم من حديث وبر بن أبي دُلَيلة شيخ من أهل الطائف، عن محمد بن ميمون بن مسيكة، عن عمرو بن الشريد، عن أبيه فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن ميمون بن مسيكة، فقد أثنى عليه راويه وبر بن أبي مليكة في مسند أحمد، وقال أبو حاتم: روى عنه الطائفيون. وذكره ابن حبان في الثقات.

وقوله:"لي الواجد" بفتح اللام وتشديد الياء، التأخر. والواجد القادر على أداء ما عليه من الدين.

وقوله:"عرضه" أي شكايته.

وقوله:"وعقوبته" سجنه. قاله علي الطنافسي شيخ ابن ماجه.

وفي الباب ما روي عن الهرماس بن حبيب، عن أبيه، عن جده قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم بغريم لي، فقال لي:"الزمه"، ثم مر بي آخر النهار، فقال:"ما فعل أسيرك يا أخا بني تميم?".

رواه أبو داود (3629)، وابن ماجه (2428) كلاهما من حديث النضر بن شميل قال: حدّثنا الهرماس بن حبيب بإسناده.

والهرماس بن حبيب، وأبوه التميمي العنبري مجهولان؛ فإن حبيبا لم يرو عنه إلا ابنه، وابنه الهرماس لم يرو عنه إلا النضر بن شميل، ولم أقفْ على من وثّقهما.




শরীদ ইবনে সুওয়াইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ঋণ পরিশোধে সক্ষম ব্যক্তির টালবাহানা তার সম্মানহানি এবং শাস্তিযোগ্যতাকে বৈধ করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5511)


5511 - عن ابن أذنان قال: أسلفت علقمة ألفي درهم، فلما خرج عطاؤه قلت له: اقضني. قال: أخِّرني إلى قابلٍ، فأبيت عليه فأخذتها. قال: فأتيته بعد قال: بَرَّحْتَ بي وقد منعتني. فقلت: نعم، هو عملك. قال: وما شأني؟ قلت: إنك حدثتني عن ابن مسعود أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن السلف يجري مجرى شطر الصدقة" قال: نعم، فهو كذاك. قال: فخذ الآن.

حسن: رواه أحمد (3911) وأبو يعلى (5366) كلاهما من حديث عفان، حدّثنا حماد، أخبرنا عطاء بن السائب، عن ابن أذنان، قال: فذكره.

وعطاء بن السائب مختلط، ولكن سمع منه حماد قبل اختلاطه.

كما أنه توبع عند ابن ماجه (2430) وفيه قصة.

وابن أذنان اختلف في اسمه، فقيل: اسمه سليم، وقيل: عبد الرحمن، وقيل غير ذلك، وأطال الحافظ ابن حجر في التعجيل (1435) ترجمته، ولم يوثّقه غير ابن حبان، ولكنه توبع في طرق أخرى.

منها ما رواه ابن حبان في صحيحه (5040) والبيهقي (5/ 353 - 354) كلاهما من حديث يحيى ابن معين، قال: حدّثنا معتمر بن سليمان، قال: قرأت على الفضيل أبي معاذ، عن أبي حريز، أن إبراهيم حدثه، أن الأسود بن يزيد كان يستقرض من تاجر، فإذا خرج عطاؤه قضاه. فقال الأسود:
إن شئتَ أَخَّرْتُ عنك، فإنه قد كانت علينا حقوق في هذا العطاء، فقال له التاجر: لست فاعلا فنقده الأسود خمس مئة درهم، حتى إذا قبضها، قال له التاجر: دونكها، فخذ بها. فقال له الأسود: قد سألتك هذا فأبيت، فقال له التاجر: إني سمعتك تحدثنا عن عبد اللَّه بن مسعود أن نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يقول:"من أقرض اللَّه مرتين كان له مثل أجر أحدهما لو تصدق به". واللّفظ لابن حبان.

قال البيهقي: تفرّد به عبد اللَّه بن الحسين أبو حريز قاضي سجستان، وليس بالقوي.

ولكنه لا بأس به في المتابعة في أصل الحديث.




ইবনে উযনান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আলক্বামাকে দুই হাজার দিরহাম কর্জ (ঋণ) দিয়েছিলাম। যখন তার ভাতা বের হলো, আমি তাকে বললাম: আমার ঋণ পরিশোধ করে দিন। তিনি বললেন: আমাকে আগামী বছর পর্যন্ত অবকাশ দিন। কিন্তু আমি তা প্রত্যাখ্যান করে তার কাছ থেকে নিয়ে নিলাম। ইবনে উযনান বললেন: পরে আমি তার কাছে গেলাম। তিনি বললেন: আপনি আমাকে কষ্ট দিয়েছেন এবং (সময় দিতে) নিষেধ করেছেন। আমি বললাম: হ্যাঁ, এটাই আপনার কাজ (বা আপনার শিক্ষা)। তিনি বললেন: এর সাথে আমার কী সম্পর্ক? আমি বললাম: আপনিই তো আমাকে ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বলেছেন যে, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই কর্জ (ঋণ) অর্ধ সাদাকার সমতুল্য।” তিনি বললেন: হ্যাঁ, তা তো এমনই। তিনি বললেন: তাহলে এখন নিন।









আল-জামি` আল-কামিল (5512)


5512 - عن * *




৫৫০২ - ... থেকে ...









আল-জামি` আল-কামিল (5513)


5513 - عن ابن عمر قال: عُرِضتُ على النبي صلى الله عليه وسلم يوم أُحُد وأنا ابن أربع عشرة سنة فلم يجزني، وعُرضتُ عليه يوم الخندق وأنا ابن خمس عشرة سنة فأجازني.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2664)، ومسلم في الإمارة (1868) كلاهما من حديث عبيد اللَّه قال: حدثني نافع قال: حدثني ابن عمر فذكره.

قال نافع: فقدمت على عمر بن عبد العزيز -وهو خليفة-، فحدثته هذا الحديث، فقال: إن هذا لحدٌّ بين الصغير والكبير. وكتب إلى عمّاله أن يفرضوا لمن بلغ خمس عشرة.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উহুদ যুদ্ধের দিন আমাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পেশ করা হয়েছিল, তখন আমার বয়স ছিল চৌদ্দ বছর। কিন্তু তিনি আমাকে (যুদ্ধে অংশগ্রহণের) অনুমতি দেননি। আর খন্দকের যুদ্ধের দিন যখন আমাকে তাঁর নিকট পেশ করা হলো, তখন আমার বয়স ছিল পনেরো বছর, তখন তিনি আমাকে অনুমতি দিলেন।

নাফে' (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, অতঃপর আমি উমার ইবন আব্দুল আযীযের (যিনি তখন খলীফা ছিলেন) কাছে গেলাম এবং তাঁকে এই হাদীসটি শোনালাম। তিনি বললেন: এটিই হলো ছোট ও বড় (প্রাপ্তবয়স্ক)-এর মধ্যে পার্থক্যকারী সীমা। আর তিনি তাঁর প্রশাসকদের কাছে লিখে পাঠালেন যে, পনেরো বছর বয়স হয়েছে এমন ব্যক্তিদের জন্য যেন ভাতা বা দায়িত্ব বরাদ্দ করা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5514)


5514 - عن عطية القرظي قال: عُرضنا على النبي صلى الله عليه وسلم يوم قريظة، فكان من أنبت قتل، ومن لم ينبت خلي سبيله، فكنت فيمن لم ينبت، فخلي سبيلي.

صحيح: رواه أبو داود (4405)، والترمذي (1584)، والنسائي (4981)، وابن ماجه (2541)، وأحمد (18776)، وصحّحه ابن حبان (4781)، والحاكم (2/ 123) كلهم من طرق عن عبد الملك بن عمير قال: سمعت عطية القرظي فذكره.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح، والعمل على هذا عند بعض أهل العلم أنهم يرون الإنبات بلوغا إن لم يعرف احتلامه ولا سنه، وهو قول أحمد وإسحاق".




আতিয়্যাহ আল-কুরাযী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা কুরাইযা গোত্রের (যুদ্ধের) দিন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে উপস্থিত হয়েছিলাম। তখন যার (গুপ্তস্থানে) লোম গজিয়েছে (অর্থাৎ সাবালক হয়েছে), তাকে হত্যা করা হয়েছিল এবং যার লোম গজায়নি (অর্থাৎ সাবালক হয়নি), তাকে ছেড়ে দেওয়া হয়েছিল। আমি ছিলাম তাদের মধ্যে যারা সাবালক হয়নি, তাই আমাকে ছেড়ে দেওয়া হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (5515)


5515 - عن سمرة بن جندب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اقتلوا شيوخ المشركين واستبقوا شرخهم".

حسن: رواه أبو داود (2670) عن سعيد بن منصور، وهو في سننه (2624): حدّثنا هشيم، حدّثنا حجاج، حدّثنا قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل حجاج -وهو ابن أرطاة-؛ فإنه حسن الحديث إذا صرح بالتحديث، لأنه مدلس.

ورواه أحمد (20230) عن هشيم بإسناده، وليس فيه التصريح من حجاج، وذلك يعود إلى هشيم؛ فإنه ضبط مرة بالتصريح، وأخرى بدونه، والتصريح فيه زيادة علم.

وكذلك رواه (20145) عن أبي معاوية، عن حجاج بدون التصريح.
ورواه الترمذيّ (1583) من وجه آخر عن الوليد بن مسلم، عن سعيد بن بشير، عن قتادة به مثله.

والوليد بن مسلم مدلس، وقد عنعن، وسعيد بن بشير ضعيف بإتفاق أهل العلم، ومع ذلك قال الترمذيّ:"حسن غريب". وفي نسخة:"حسن صحيح غريب". وقال: رواه الحجاج بن أرطاة عن قتادة نحوه. فلعله صحح أو حسن طريقه بمتابعة الحجاج له.

وأما الحسن فسبق مرارا أنه سمع مطلقا من سمرة بن جندب، وإليه يميل الترمذيّ أيضًا. وقال:"والشرخ الغلمان الذين لم ينبتوا".




সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মুশরিকদের বৃদ্ধদের হত্যা করো এবং তাদের অল্পবয়স্কদের (শিশুদের) বাঁচিয়ে রাখো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5516)


5516 - عن عائشة أم المؤمنين، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقبل اللَّه صلاة حائض إلا بخمار".

صحيح: رواه أبو داود (641)، والترمذي (377)، وابن ماجه (655) وصحّحه ابن خزيمة (775) وعنه ابن حبان (1712)، والحاكم (1/ 251) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن قتادة، عن محمد بن سيرين، عن صفية بنت الحارث، عن عائشة فذكرتِ الحديث.

وإسناده صحيح، كما تقدم في كتاب الصلاة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ ঋতুমতী নারীর সালাত (নামাজ) ওড়না (খিমার) ছাড়া কবুল করেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (5517)


5517 - عن عوف بن مالك بن الطفيل -وهو ابن الحارث، وهو ابن أخي عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم لأمها- أن عائشة حُدثت أن عبد اللَّه بن الزبير قال في بيع أو عطاء أعطته عائشة: واللَّه لتنتهين عائشة أو لأحجرن عليها. فقالت: أهو قال هذا؟ قالوا: نعم. قالت: هو اللَّه على نذر أن لا أكلم ابن الزبير أبدا، فاستشفع ابن الزبير إليها حين طالت الهجرة، فقالت: لا واللَّه، لا أشفع فيه أبدا، ولا أتحنث إلى نذري. فلما طال ذلك على ابن الزبير كلم المسور بن مخرمة وعبد الرحمن بن الأسود بن عبد يغوث -وهما من بني زهرة-، وقال لهما: أنشدكما باللَّه لما أدخلتماني على عائشة؛
فإنها لا يحل لها أن تنذر قطيعتي، فأقبل به المسور وعبد الرحمن مشتملين بأرديتهما حتى استأذنا على عائشة، فقالا: السلام عليك ورحمة اللَّه وبركاته، أندخل؟ قالت عائشة: ادخلوا. قالوا: كلنا. قالت: نعم، ادخلوا كلكم، ولا تعلم أن معهما ابن الزبير، فلما دخلوا دخل ابن الزبير الحجاب، فاعتنق عائشة، وطفق يناشدها، ويبكي، وطفق المسور وعبد الرحمن يناشدانها إلا ما كلمته، وقبلت منه، ويقولان: إن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عما قد علمت من الهجرة، فإنه لا يحل لمسلم أن يهجر أخاه فوق ثلاث ليال. فلما أكثروا على عائشة من التذكرة والتحريج طفقت تذكرهما، وتبكي، وتقول: إني نذرت والنذر شديد. فلم يزالا بها حتى كلمت ابن الزبير، وأعتقت في نذرها ذلك أربعين رقبة، وكانت تذكر نذرها بعد ذلك، فتبكي حتى تبل دموعها خمارها.

صحيح: رواه البخاريّ في الأدب (6073، 6074، 6075) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري قال: حدثني عوف بن مالك فذكره.

وفي رواية عنده (3505) عن عروة بن الزبير قال: كان عبد اللَّه بن الزبير أحب البشر إلى عائشة بعد النبي صلى الله عليه وسلم وأبي بكر، وكان أبرَّ النّاس بها، وكانت لا تمسك شيئًا مما جاءها من رزق اللَّه إلا تصدقت. فقال ابن الزبير: ينبغي أن يؤخذ على يديها، فقالت: أيؤخذ على يدي، علي نذر إن كلمته. فذكر بقية الحديث.

وهذا الحجر على عائشة لم يكن في محله؛ لأنها لم تكن سفيهة؛ فإن تصرفها كان صحيحا، ولذا لم ترض بحجر ابن الزبير، بل شدت عليه بأن لا تكلمه أبدا.




আওফ ইবনু মালিক ইবনু তুফায়ল—তিনি হারিসের পুত্র এবং তিনি হচ্ছেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বৈমাত্রেয় ভগ্নীপুত্র—থেকে বর্ণিত যে, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জানানো হলো যে আবদুল্লাহ ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কোনো দান বা উপহার দেওয়ার পর এ কথা বলেছিলেন: "আল্লাহর কসম! আয়েশাকে হয় ক্ষান্ত হতে হবে, না হয় আমি তার ওপর নিষেধাজ্ঞা জারি করব (সম্পদ ব্যবহারে অবরোধ দেব)।"

তিনি (আয়েশা) জিজ্ঞাসা করলেন: "সে কি সত্যিই এমন কথা বলেছে?" লোকেরা বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম! আমি কসম করলাম যে, আমি আর কখনো ইবনু যুবাইরের সাথে কথা বলব না।" যখন এই সম্পর্কচ্ছেদ (বিচ্ছেদ) দীর্ঘ হলো, তখন ইবনু যুবাইর তাঁর কাছে মধ্যস্থতা চাইলেন। তিনি বললেন: "না, আল্লাহর কসম! আমি তার জন্য কখনোই সুপারিশ করব না এবং আমি আমার কসম ভঙ্গ করব না।"

যখন ইবনু যুবাইরের জন্য বিষয়টি দীর্ঘায়িত হলো, তখন তিনি মিসওয়ার ইবনু মাখরামা এবং আবদুর রহমান ইবনু আসওয়াদ ইবনু আবদ ইয়াগুসের (তারা দু’জনই বানু যুহরার লোক ছিলেন) সাথে কথা বললেন এবং তাদের বললেন: "আমি তোমাদের আল্লাহর নামে কসম দিয়ে বলছি, তোমরা অবশ্যই আমাকে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে নিয়ে যাবে; কারণ আমার সাথে সম্পর্কচ্ছেদ করার মানত করা তার জন্য বৈধ নয়।"

এরপর মিসওয়ার ও আবদুর রহমান তাদের চাদর জড়িয়ে তাকে (ইবনু যুবাইরকে) নিয়ে আসলেন, এমনকি তারা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। তারা বললেন: "আসসালামু আলাইকুম ওয়া রহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু, আমরা কি প্রবেশ করব?" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "প্রবেশ করো।" তারা জিজ্ঞাসা করলেন: "আমরা সবাই?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তোমরা সবাই প্রবেশ করো।" তিনি জানতে পারেননি যে ইবনু যুবাইরও তাদের সাথে আছেন। যখন তারা প্রবেশ করলেন, তখন ইবনু যুবাইর পর্দার ভেতরে গেলেন এবং আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জড়িয়ে ধরলেন। তিনি অনুনয় বিনয় করতে লাগলেন এবং কাঁদতে শুরু করলেন। মিসওয়ার ও আবদুর রহমানও তাঁর কাছে অনুনয় করতে লাগলেন যাতে তিনি ইবনু যুবাইরের সাথে কথা বলেন এবং তাকে ক্ষমা করে দেন। তারা দু’জন বললেন: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কচ্ছেদের যে বিষয়ে অবগত আছেন, তা থেকে নিষেধ করেছেন। কেননা কোনো মুসলমানের জন্য তার ভাইকে তিন দিনের বেশি সময় সম্পর্ক ছিন্ন করে থাকা বৈধ নয়।"

যখন তারা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এভাবে বারবার স্মরণ করিয়ে দিলেন এবং চাপ দিলেন, তখন তিনিও তাদের কথা স্মরণ করতে লাগলেন এবং কাঁদতে শুরু করলেন, আর বললেন: "আমি মানত (নযর) করেছি, আর মানত পূরণ করা কঠিন।" তারা দু’জন ক্রমাগত তাকে বোঝাতে থাকলেন, শেষ পর্যন্ত তিনি ইবনু যুবাইরের সাথে কথা বললেন এবং সেই মানতের কাফফারা হিসেবে চল্লিশজন দাস মুক্ত করলেন। এরপরও তিনি যখনই তার সেই মানতের কথা স্মরণ করতেন, তখনই কাঁদতেন, এমনকি তাঁর চোখের পানিতে তাঁর ওড়না ভিজে যেত।









আল-জামি` আল-কামিল (5518)


5518 - عن حنظلة يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يتم بعد احتلام، ولا يتم على جارية إذا هي حاضت".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (4/ 16) عن محمد بن عبد اللَّه الحضرمي، ثنا محمد بن أبي بكر المقدمي، ثنا سلم بن قتيبة، ثنا ذيال بن عبيد قال: سمعت جدي حنظلة يقول فذكره.

وإسناده حسن من أجل ذيال بن عبيد وهو ابن حنظلة بن حذيم الحنفي، وثّقه ابن معين.

وقال ابن أبي حاتم:"سألت أبي عنه، فقال: تابعي. قلت: يحتج بحديثه؟ فقال: شيخ أعرابي". الجرح والتعديل (3/ 452). وذكره ابن حبان في ثقاته (4/ 222)، فمثله يحسن حديثه، فإن قول أبي حاتم:"شيخ أعرابي" ليس بجرح مفسر، ولا توثيق مطلق، بل هو بين هاتين الدرجتين، وهو الذي عبر عنه ابن حجر في التقريب:"صدوق". وقال في التلخيص:"إسناده لا
بأس به".

وأما الهيثمي في"مجمع الزوائد" (4/ 226) فقال:"رجاله ثقات" اعتمادا على توثيق ابن حبان.

وفي الباب ما روي عن علي بن أبي طالب قال: حفظت عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يتم بعد احتلام، ولا صُمات يوم إلى الليل".

رواه أبو داود (2872) عن أحمد بن صالح، حدّثنا يحيى بن محمد المديني، حدّثنا عبد اللَّه بن خالد بن سعيد بن أبي مريم، عن أبيه، عن سعيد بن عبد الرحمن بن يزيد بن رُقَيش أنه سمع شيوخا من بني عمرو بن عوف ومن خاله عبد اللَّه بن أبي أحمد قال: قال علي بن أبي طالب. فذكر الحديث.

ورواه العقيلي في"الضعفاء الكبير" (4/ 428 - 429) من طريق يحيى بن محمد بإسناده، وزاد فيه:"ولا طلاق إلا بعد نكاح، ولا عتاق إلا بعد ملك، ولا وفاء في ذمة في معصية اللَّه، ولا وصال في الصيام".

قال العقيلي:"وهذا الحديث لا يتابع عليه يحيى، وهذا يرويه معمر، عن جويبر، عن الضحاك، عن النزال بن سبرة، عن علي مرفوعا. ورواه الثوري وغيره عن جويبر موقوفا، وهو الصواب". انتهى كلامه.

وأعله أيضًا المنذري بيحيى بن المدني، فقال:"قال الخطابي: يتكلمون فيه. وقال ابن حبان: يجب التنكب عما انفرد به من الروايات". وذكر كلام العقيلي. انتهى كلام المنذري.

وحديث معمر بن راشد رواه عبد الرزاق في مصنفه (11450) عنه عن جويبر بإسناده.

ورواه ابن ماجه (2049)، والبيهقي (7/ 461) كلاهما من حديث عبد الرزاق إلا أن ابن ماجه اقتصر على قوله:"لا طلاق قبل النكاح".

قال عبد الرزاق:"قال سفيان لمعمر: إن جويبرا حدّثنا بهذا الحديث، ولم يرفعه. قال معمر: وحدثنا به مرارا، ورفعه".

وجويبر -تصغير جابر- ابن سعيد الأزدي أبو القاسم البلخي، ضعيف جدا، ضعفه ابن معين، والنسائي، والدارقطني، والحاكم، وغيرهم.

فالإسناد ضعيف موقوفا ومرفوعا، وصحّح وقفه الدارقطني أيضًا. انظر"العلل" (4/ 142). وممن ضعّفه أيضًا ابن القطّان في"الوهم والإيهام" (3/ 536)، وفي الإسناد علل أخرى.

وفي الباب ما روي أيضًا عن أنس بن مالك مرفوعا:"لا يتم بعد حلم".

رواه البزار (12/ 350) عن إبراهيم بن سعيد الجوهري، نا يحيى بن يزيد بن عبد اللَّه بن المغيرة، عن أبيه، عن محمد بن المنكدر، عن أنس فذكره.

قال البزار:"وهذا الحديث لا نعلمه يروى عن أنس إلا بهذا الإسناد، ويزيد بن عبد الملك لين الحديث، وقد روى عنه جماعة من أهل العلم، واحتملوا حديثه على لينه".
قلت: خفف البزار القول في يزيد بن عبد الملك، وهو ضعيف باتفاق أهل العلم. قال الذهبي في"المغني في الضعفاء" (2/ 751):"مجمع على ضعفه". وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 226). وفي الباب أيضًا عن جابر بن عبد اللَّه، قال المنذري بعد أن ذكر حديث أنس وجابر: ليس فيها شيء يثبت.

قلت: وحديث جابر رواه أبو داود الطيالسي، وعنه البيهقي (7/ 319)، وفيه حرام بن عثمان، ونقل عن الشافعي وابن معين أنهما قالا: الحديث عن حرام بن عثمان حرام. وفيه أيضًا خارجة بن مصعب متروك.

والخلاصة أن حديث الباب حسن، وتقوّيه هذه الشواهد، ولذا أخذ الفقهاء بهذا الحديث، وفرعوا عليه تفريعات في حكم الأيتام.

قال الخطابي:"ظاهر هذا الحديث يوجب انقطاع أحكام اليتم عنه بالاحتلام، وحدوث أحكام البالغين له، فيكون للمحتلم أن يبيع ويشتري ويتصرف في ماله ويعقد النكاح لنفسه، وإن كانت امرأة فلا تزوج إلّا بإذنها. ولكن المحتلم إذا لم يكن رشيدًا لم يفك الحجر عنه، وقد يحظر الشيء بسببين، فلا يرتفع بارتفاع أحدهما مع بقاء السبب الآخر، وقد أمر اللَّه تعالى بالحجر على السفيه، فقال: {وَلَا تُؤْتُوا السُّفَهَاءَ أَمْوَالَكُمُ الَّتِي جَعَلَ اللَّهُ لَكُمْ قِيَامًا} [سورة النساء: 5].




হানযালা থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "স্বপ্নদোষের (বালেগ হওয়ার) পর ইয়াতীম অবস্থা থাকে না, এবং কোনো বালিকা যখন ঋতুমতী হয়, তখন তার উপরও ইয়াতীম অবস্থা থাকে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (5519)


5519 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم اشترى من يهودي طعاما إلى أجل ورهنه درعه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرهن (2509)، ومسلم في المساقاة (162: 126) كلاهما من طريق عبد الواحد بن زياد، حدّثنا الأعمش قال: تذاكرنا عند إبراهيم الرهن والقبيل في السلف، فقال إبراهيم: حدّثنا الأسود، عن عائشة فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন ইহুদির কাছ থেকে নির্দিষ্ট মেয়াদের জন্য খাদ্য ক্রয় করেছিলেন এবং তার কাছে নিজের লৌহবর্ম বন্ধক রেখেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5520)


5520 - عن أنس قال: ولقد رهن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم درعه بشعير، ومشيت إلى النبي صلى الله عليه وسلم بخبز شعير وإهالة سَنِحةٍ، ولقد سمعته يقول:"ما أصبح لآل محمد صلى الله عليه وسلم إلا صاع، ولا أمسي، وإنهم لتسعة أبيات".

صحيح: رواه البخاريّ في الرهن (2508) عن مسلم بن إبراهيم، حدّثنا هشام حدّثنا قتادة عن أنس قال فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর লৌহবর্ম যবের বিনিময়ে বন্ধক রেখেছিলেন। আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যবের রুটি এবং বাসি বা গলিত চর্বি নিয়ে গিয়েছিলাম। আর আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: "মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের জন্য সকালে এক সা’ পরিমাণ খাদ্যদ্রব্য ছাড়া কিছুই থাকত না, সন্ধ্যায়ও না, অথচ তারা ছিল নয়টি ঘর।"









আল-জামি` আল-কামিল (5521)


5521 - عن ابن عباس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مات ودرعه رهن عند يهودي بثلاثين صاعا من شعير، أخذها رزقا لعياله.

صحيح: رواه الترمذيّ (1214)، والنسائي (4651)، وأحمد (2109، 3409)، والبيهقي (6/ 36) كلهم من حديث هشام بن حسان، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره إلا أن الترمذيّ قال:"عشرين صاعا".

وقال:"هذا حديث حسن صحيح".

ورواه ابن ماجه (2439)، وأحمد (2724) كلاهما من حديث هلال بن خباب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكر مثله.

وزاد أحمد في أول الحديث: أن النبي صلى الله عليه وسلم التفت إلى أحد، فقال:"والذي نفس محمد بيده ما يسرني أن أحدا يحول لآل محمد ذهبا، أنفقه في سبيل اللَّه، أموت يوم أموت أدع منه دينارين إلا دينارين أعدهما لدين إن كان" فمات وما ترك دينارا ولا درهما، ولا عبدا ولا وليدة، وترك درعه مرهونة عند يهودي، فذكر مثله.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন। তখন তাঁর লৌহবর্মটি ত্রিশ সা' (Saa') যবের বিনিময়ে একজন ইহুদীর নিকট বন্ধক রাখা ছিল, যা তিনি তাঁর পরিবারের ভরণপোষণের জন্য গ্রহণ করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5522)


5522 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من لكعب بن الأشرف؛ فإنه
قد آذى اللَّه ورسوله صلى الله عليه وسلم؟" قال محمد بن مسلمة: أنا. فأتاه، فقال: أردنا أن تسلفنا وسقا أو وسقين. فقال: ارهنوني نساءكم. قالوا: كيف نرهنك نساءنا وأنت أجمل العرب؟ قال: فارهنوني أبناءكم. قالوا: كيف نرهن أبناءنا؛ فيسب أحدهم، فيقال: رهن بوسق أو وسقين، هذا عار علينا، ولكنا نرهنك اللأمة. -قال سفيان: يعني السلاح- فوعده أن يأتيه، فقتلوه، ثم أتوا النبي صلى الله عليه وسلم، فأخبروه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرهن (2510)، ومسلم في الجهاد والسير (1801) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار) قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه فذكره. والسياق للبخاريّ، ومسلم ذكره بتمامه، وهو بتمامه عند البخاري في المغازي (4037).




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কা'ব ইবনুল আশরাফের (বিপদ দূর করতে) কে আছো? কারণ সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কষ্ট দিয়েছে।" মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামা বললেন: আমি আছি। অতঃপর তিনি তার কাছে গেলেন এবং বললেন: আমরা চাই তুমি আমাদের এক ওয়াসাক বা দুই ওয়াসাক (পরিমাণ খাদ্যশস্য) কর্জ দাও। সে বলল: তোমাদের নারীদের আমার কাছে বন্ধক রাখো। তারা বললেন: আমরা কিভাবে আমাদের নারীদের আপনার কাছে বন্ধক রাখব, অথচ আপনি আরবদের মধ্যে সবচেয়ে সুদর্শন? সে বলল: তাহলে তোমাদের সন্তানদের আমার কাছে বন্ধক রাখো। তারা বললেন: আমরা কিভাবে আমাদের সন্তানদের বন্ধক রাখব? (যদি এমন হয় যে) তাদের কাউকে গালমন্দ করা হতে পারে এবং বলা হবে: তাকে এক ওয়াসাক বা দুই ওয়াসাক (শস্যের বিনিময়ে) বন্ধক রাখা হয়েছে, এটা আমাদের জন্য লজ্জাজনক। কিন্তু আমরা আপনাকে 'আল-লা'ম্মা' (অস্ত্রশস্ত্র) বন্ধক রাখতে পারি। (সুফিয়ান বলেছেন: এর অর্থ হলো অস্ত্র।) এরপর তিনি তার কাছে আসার প্রতিশ্রুতি দিলেন। অতঃপর তারা তাকে হত্যা করলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে জানালেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5523)


5523 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الظهر يركب بنفقته إذا كان مرهونا، ولبن الدر يشرب بنفقته إذا كان مرهونا، وعلى الذي يركب ويشرب النفقة".

صحيح: رواه البخاريّ في الرهن (2512) عن محمد بن مقاتل، أخبرنا عبد اللَّه (هو ابن المبارك)، أخبرنا زكريا (هو ابن أبي زائدة)، عن الشعبي، عن أبي هريرة فذكره.

قال الترمذيّ بعد أن أخرج هذا الحديث من طريق زكريا: هذا حديث حسن صحيح، لا نعرفه مرفوعا إلا من حديث عامر الشعبي، عن أبي هريرة. وقد روى غير واحد هذا الحديث عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة موقوفا. والعمل على هذا الحديث عند بعض أهل العلم، وهو قول أحمد وإسحاق. وقال بعض أهل العلم: ليس له أن ينتفع من الرهن بشيء". انتهى.

قلت: حديث الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة رواه الدارقطني (3/ 34) من طريق أبي عوانة مرفوعا بلفظ"الرهن مركوب ومحلوب".

واختلف على الأعمش، فرواه عنه أبو عوانة مرفوعا. وتابعه على ذلك أبو معاوية عن الأعمش، رواه البيهقي (6/ 38) من حديث إبراهيم بن مجشر، عن أبي معاوية، وقال البيهقي: ورواه الجماعة عن الأعمش موقوفا على أبي هريرة، ثم ذكر رواية وكيع، وشعبة، وسفيان بن عيينة كلهم عن الأعمش موقوفا، وهو الصواب" إلا أنه لا يعل ما رواه الشعبي عن أبي هريرة مرفوعا، كما مضى، وهو مخرج في الصحيح.

وقد قال أبو داود بعد ما أخرج الحديث من الطريق المشار إليه:"وهو عندنا صحيح".

وقد قيل: إنه مجمل لم يبين فيه من الذي يركب ويشرب اللبن?

قلت: بين ذلك هشيم عن زكريا، عن الشعبي، عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كانت الدابة مرهونة فعلى المرتهن علفها، ولبن الدر يشرب، وعلى الذي يشربه نفقته، ويركب". رواه
أحمد (7125)، والطحاوي في"شرح المعاني" (5754) كلاهما عن هشيم به.

وبهذا صح أن المرتهن هو الذي ينتفع من الرهن، وهو قول الإمام أحمد.

ولكن ادعى الطحاوي نسخ الحديث المذكور بلا حجة.

وأوَّل الشافعي بقوله:"يشبه قول أبي هريرة -واللَّه أعلم- أن من رهن ذات در وظهر لم يمنع الراهن درعها وظهرها؛ لأن له رقبتها، وهي محلوبة ومركوبة، كما كانت قبل الرهن. وقال: ومنافع الرهن للراهن، ليس للمرتهن منها شيء. انتهى. انظر الأم (3/ 164)، ونقل عنه البيهقي (6/ 38، 39).

وهذا التأويل من الشافعي يُفَوت مصلحة الرهن، وقد لا يستطيع الراهن الإنفاق عليها لبعد المكان، ثم ليس هو مثل القرض يجر نفعا؛ لأن الظهر يحتاج إلى النفقة، فعلى المرتهن أن ينتفع بقدر النفقة.

هذا إذا كان الرهن ذات الروح، وأما إن كان الرهن مثل الحلي والثياب فليس للمرتهن الانتفاع به؛ لأنه لا يحتاج إلى النفقة.

وقد فصّلتُ قول أهل العلم مع أدلتهم في"المنة الكبرى" (5/ 271 - 273)، فراجعه لمعرفة المزيد.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন কোনো বাহন (আরোহণের পশু) বন্ধক রাখা হয়, তখন তার পিঠে আরোহণ করা যাবে তার (রক্ষণাবেক্ষণের) খরচের বিনিময়ে। আর যখন দুধের প্রাণী বন্ধক রাখা হয়, তখন তার দুধ পান করা যাবে তার (রক্ষণাবেক্ষণের) খরচের বিনিময়ে। আর যে আরোহণ করবে ও দুধ পান করবে, রক্ষণাবেক্ষণের খরচ তার উপরই বর্তাবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (5524)


5524 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يغلق الرهن، له غنمه، وعليه غرمه".

حسن: رواه الدارقطني (3/ 34) عن أبي محمد بن صاعد، نا عبد اللَّه بن عمران العابدي، نا سفيان بن عيينة، عن زياد بن سعد، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.

وهذا الحديث اختلف أصحاب الزهري عليه:

فرواه ابن أبي ذئب، ومالك، ويونس، ومعمر كلهم عن الزهري مرسلا، إلا أن بعض هؤلاء وغيرهم روى عنه متصلا، وإليكم تفصيل ذلك:

رواه الشافعي في الأم (3/ 167) عن محمد بن إسماعيل بن أبي فديك، عن ابن أبي ذئب، عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يغلق الرهنُ الرهن من صاحبه الذي رهنه، له غنمه، وعليه غرمه". ومن طريق الشافعي رواه البيهقي (6/ 39).

وقد اختلف علي ابن أبي ذئب، فرواه محمد بن إسماعيل مرسلا، ورواه إسماعيل بن عياش، عنه، وعن الزبيدي كلاهما عن الزهري متصلا. وإسماعيل بن عياش ضعيف في غير الشاميين، وابن أبي ذئب من المدنيين، ولكن متابعة الزبيدي -وهو محمد بن الوليد الحمصي- تقويه، فدل على أنه لم يخطئ فيه. وهذان الطريقان رواهما الدارقطني (3/ 33).

وأما مالك فرواه مرسلا، كما في رواية يحيى في كتاب الأقضية (13)، وكذلك رواه سائر رواة الموطأ إلا معن بن عيسى فوصله، كما قال ابن عبد البر، وقد أشار الحاكم إلى الرواية المتصلة لمالك.
وأما معمر فرواه الدارقطني (3/ 33) من طريق أبي يحيى عنه عن الزهري متصلا، ولفظه:"لا يغلق الرهن، لك غنمه، وعليك غرمه".

قال الدارقطني: وأرسله عبد الرزاق - وهو في المصنف (15033) عن معمر، عن الزهريّ، عن ابن المسيب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يغلق الرهن ممن رهنه". كذا في لفظ المصنف، ولفظ الدارقطني:"لا يغلق الرهن، له غنمه، وعليه غرمه".

وفي المصنف: قلت (القائل هو معمر) للزهري: أرأيت قوله:"لا يغلق الرهن" أهو الرجل يقول: إن لم آتك بمالك فهذا الرهن لك؟ قال: نعم. قال معمر: ثم بلغني عنه أنه قال: إن هلك لم يذهب حق هذا، إنما هلك من رب الرهن له غنمه، وعليه غرمه.

وأما الذين وصلوه عن الزهري فمنهم:

زياد بن سعد، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يغلق الرهن، له غنمه، وعليه غرمه".

رواه الدارقطني (3/ 32)، وابن حبان (5934)، والحاكم (2/ 51)، والبيهقي (6/ 39) كلهم من هذا الوجه.

قال الدارقطني:"زياد بن سعد من الحفاظ الثقات، وهذا إسناد حسن متصل".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه لخلاف فيه على أصحاب الزهريّ، وقد تابع زياد بن سعد: مالكٌ، وابن أبي ذئب، وسليمان بن أبي داود الحراني، ومحمد بن الوليد الزبيدي، ومعمر بن راشد على هذه الرواية". ثم أخرج أحاديثهم.

وأحاديث هؤلاء الذين ذكرهم الحاكم أخرج حديثهم الدارقطني، والبيهقي وغيرهما.

وممن تابعه أيضًا على وصله إسحاق بن راشد عن الزهري بإسناده بلفظ:"لا يغلق الرهن". رواه ابن ماجه (2441) عن محمد بن حميد قال: حدّثنا إبراهيم بن المختار، عن إسحاق بن راشد بإسناده.

وإسحاق بن راشد ثقة إلا أنه كان يهم في أحاديث الزهريّ، ومتابعة هؤلاء تؤكد أنه لم يهم فيه، ولكن آفته محمد بن حميد الرازي؛ فإنه ضعيف عند جمهور أهل العلم، وكان ابن معين حسن الرأي فيه، ومن وصله أيضًا يحيى بن أبي أنيسة، عن ابن شهاب بإسناده، وقال: مثله أو مثل معناه لا يخالفه. ويحيى بن أبي أنيسة ضعيف، وهو من رجال التهذيب.

ووصله أيضًا عبد اللَّه بن نصر الأصم، نا شبابة، نا ابن أبي ذئب، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة بلفظ:"لا يغلق الرهن، والرهن لمن رهنه، له غنمه، وعليه غرمه". ومن هذا الطريق رواه الدارقطني، والحاكم.

وعبد اللَّه بن نصر الأصم منكر الحديث، كما في الميزان.

وممن وصله سليمان بن أبي داود عن الزهري بإسناده، ولفظه:"لا يغلق الرهن حتى يكون لك
غنمه، وعليك غرمه". رواه الحاكم (2/ 51) من طريقه.

وخلاصة القول في هذا أنه اختلف في وصله وإرساله، فصحح وصله ابن حبان، والدارقطني، والحاكم، وابن عبد البر، وعبد الحق، والذهبي في"تلخيص المستدرك"، وغيرهم. وهو الصحيح إن شاء اللَّه تعالى؛ لأن قواعد التخريج تقتضي أن تقبل هذه الزيادة لكثرتها؛ لأن هذا هو سبيل الحديث الحسن الذي يروى من غير وجه. وأما الذين أرسلوه فاختلف عليهم أيضًا، كما رأيت، وهذا ما يبرر أيضًا قبول الزيادة.

قال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 119):"وقد ذكرنا هذا الحديث والاختلاف فيه وكلام الأئمة عليه في غير هذا الموضع، وقد صحح اتصاله ابن عبد البر وعبد الحق. واللَّه أعلم". انتهى.

وقوله:"لا يغلق الرهن" معناه لا يستغلق بحيث لا يعود إلى الراهن، بل متى أدى الحق المرهون به وعاد إلى الراهن.

وقوله:"له غنمه" أي الزوائد التي تحصل منه تكون للراهن.

وقوله:"وعليه غرمه" إذا هلك في يد المرتهن يكون من ضمان الراهن.

وفي الحديث دليل على أن الرهن يكون مضمونا لصاحبه، والشرط باطل، وهو قوله: إن لم أجئ بالحق الذي علي فالرهن لك.

وحكي عن إبراهيم في تفسيره هو أن يقول الراهن للمرتهن: إن جئتك بحقك إلى كذا وكذا، وإلا فالرهن لك.

قال إبراهيم: قوله:"لا يغلق الرهن" أي لا يستحقه المرتهن.

وروي مثل هذا التفسير عن طاوس، وسفيان الثوري، ومالك، وغيرهم.

أخرج عبد الرزاق (15035) عن معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين، عن شريح قال: رهن رجل داره بخمس مائة درهم، فقال صاحب الدراهم: إن لم تأتي بمالي إلى كذا وكذا فدارك لي. فلم يجئ يومئذ، وجاء بعد ذلك، فاختصما إلى شريح، فقال شريح: إن أخطأت يده رجله ذهبت داره، اردد إليه داره، وخذ مالك.

وكذلك فسره مالك يقول: أن يرهن الرجل الرهن عند الرجل بالشيء، وفي الرهن فضل عما رهن به، فيقول الراهن للمرتهن: إن جئتك بحقك إلى أجل يسميه له، وإلا فالرهن لك بما رهن فيه. فهذا لا يصلح، ولا يحل. وهذا الذي نهي عنه وإن جاء صاحبه بالذي رهن به بعد الأجل فهو له. وأرى هذا الشرط منفسخا. انتهى.

وفي الحديث دليل أيضًا على أن الرهن إذا هلك في يد المرتهن يكون من ضمان الراهن، ولا يسقط بهلاكهـ شيء من حق المرتهن، وبه قال جماعة من أهل العلم، منهم مالك، والشافعي، وأحمد.

وذهب قوم إلى أن الرهن مضمون، إذا هلك في يد المرتهن ذهب حق المرتهن من القرض،
وفي المسألة تفصيل، وهو أن قيمة الرهن إذا كانت قدر الحق يسقط بهلاكهـ الحق، وإن كانت قيمته أقل من الحق فبقدر قيمته من الحق يسقط، والباقي واجب على الراهن. وإن كانت أكثر من الحق يسقط الحق، ولا يجب ضمان الزيادة على المرتهن. وبه قال أصحاب الرأي.

ولعل من مستدلهم حديث أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الرهن بما فيه".

رواه الدارقطني (3/ 32) عن محمد بن مخلد، نا أحمد بن محمد بن غالب، نا عبد الكريم بن روح، عن هشام بن زياد، عن حميد، عن أنس، فذكره.

قال الدارقطني:"لا يثبت هذا عن حميد، وكل من بينه وبين شيخنا ضعفاء".

ورواه أيضًا بإسناد آخر، فقال: حدّثنا عبد الباقي بن قانع، نا عبد الرزاق بن إبراهيم، نا إسماعيل ابن أبي أمية، نا سعيد بن راشد، نا حميد الطويل، عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث مثله.

قال الدارقطني:"إسماعيل هذا يضع الحديث، وهذا باطل عن قتادة، وعن حماد بن سلمة".

وقال ابن الجوزي في"التحقيق" (4/ 120) مع"التنقيح":"وفي الإسناد سعيد بن راشد، قال يحيى بن معين: ليس بشيء. وقال النسائي: متروك الحديث. وقال ابن حبان: ينفرد عن الثقات بالمعضلات.

وفي الإسناد الأول هشام بن زياد، قال يحيى: ليس بشيء. وقال النسائي: متروك الحديث. وقال ابن حبان: لا يجوز الاحتجاج به.

وفيه عبد الكريم ضعفه الدارقطني. وقال أبو حاتم الرازي: مجهول.

وفيه أحمد بن محمد بن غالب وهو غلام الخليل كان كذابا يضع الحديث. وقال ابن عدي: كان غلام الخليل يقول: وضعنا أحاديث نرقق بها قلوب العامة. وقال الدارقطني: هو متروك". انتهى.

وفي معناه أيضًا ما روي عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الرهن بما فيه". رواه البيهقي (6/ 40) من طريق حسان بن إبراهيم، عن يزيد بن إبراهيم التستري، عن عمرو بن دينار قال: قال أبو هريرة فذكره.

قال البيهقي:"أبو حازم تفرّد به حسان بن إبراهيم الكرماني، وهو منقطع بين عمرو بن دينار، وأبي هريرة".

ثم ذكر البيهقي حديث أنس، ونقل قول الدارقطني بأن فيه إسماعيل يضع الحديث. ثم قال:"والأصل في هذا الباب حديث مرسل، وفيه من الوهن ما فيه. ثم أسند عن مصعب بن ثابت قال: سمعت عطاء يحدث أن رجلا رهن فرسا، فنفق في يده، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للمرتهن:"ذهب حقه". قال البيهقي: وقد كفانا الشافعي بيان وهن هذا الحديث". انتهى.

وهذا المرسل رواه أبو داود في مراسيله (176) ومن طريقه البيهقي، وفيه أيضًا مصعب بن ثابت، وهو ضعيف.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বন্ধক বাজেয়াপ্ত হয় না। এর লাভ (বৃদ্ধি) বন্ধকদাতার জন্য এবং এর ক্ষতি (ধ্বংসের ঝুঁকি) তার উপর বর্তাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5525)


5525 - عن جابر بن عبد اللَّه أنه قال: بعث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعثا قبل الساحل، فأمر عليهم أبا عبيدة بن الجراح، وهم ثلاثمائة. قال: وأنا فيهم. فخرجنا حتى إذا كنا ببعض الطريق فني الزادُ، فأمر أبو عبيدة بأزواد ذلك الجيش، فجمع ذلك كله، فكان مزودي تمر. قال: فكان يقوتناه كل يوم قليلا قليلا حتى فني، فلم يكن يصيبنا إلا تمرة تمرة. فقلت: وما يغني تمرة؟ فقال: لقد وجدنا فقدَها حين فنيت. قال: ثم انتهينا إلى البحر فإذا حوت مثل الظرب، فأكل منه ذلك الجيش ثماني عشرة ليلة، ثم أمر أبو عبيدة بضلعين من أضلاعه، فنصبا، ثم أمر براحلة فرحلت، ثم مرت تحتهما، فلم تصبهما.

متفق عليه: رواه مالك في صفة النبي صلى الله عليه وسلم (24) عن وهب بن كيسان، عن جابر بن عبد اللَّه أنه قال فذكره.

ورواه البخاريّ في الشركة (2483) عن عبد اللَّه بن يوسف، أخبرنا مالك به مثله. ومسلم في الصيد والذبائح (1935: 21) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن مالك به مختصرا، وساقه من طريق أبي الزبير، عن جابر بتمامه.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উপকূলের দিকে একটি বাহিনী প্রেরণ করেন এবং তাদের উপর আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহকে নেতা নিযুক্ত করেন। তাদের সংখ্যা ছিল তিনশো জন। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমিও তাদের মধ্যে ছিলাম। আমরা বের হলাম। যখন আমরা পথের কিছু অংশে পৌঁছলাম, তখন আমাদের রসদ শেষ হয়ে গেল। আবূ উবাইদাহ সেই বাহিনীর সমস্ত রসদ একত্রিত করার নির্দেশ দিলেন। তা ছিল মাত্র এক ঝুড়ি খেজুর। তিনি বলেন: তিনি তা থেকে প্রতিদিন অল্প অল্প করে আমাদের খাবার দিতেন যতক্ষণ না তা শেষ হয়ে যায়। তারপর আমাদের প্রত্যেকের ভাগে একটি করে খেজুর ব্যতীত আর কিছুই জুটত না। আমি (জাবির) বললাম: একটি খেজুর কী আর কাজে দেবে? আবূ উবাইদাহ বললেন: যখন সেটিও শেষ হয়ে গেল, তখন আমরা এর অভাব তীব্রভাবে অনুভব করলাম। তিনি বলেন: এরপর আমরা সমুদ্রের নিকট পৌঁছলাম। সেখানে আমরা একটি টিলার মতো (বিশাল) মাছ দেখতে পেলাম। সেই বাহিনী আঠারো রাত ধরে তা থেকে আহার করল। তারপর আবূ উবাইদাহ মাছটির দুটি পাঁজরের হাড় বের করে সোজা করে দাঁড় করানোর নির্দেশ দিলেন। এরপর একটি সওয়ারী উট এনে তাতে হাওদা বাঁধা হলো। তারপর সেটিকে সেই হাড় দুটির নিচ দিয়ে অতিক্রম করানো হলো, কিন্তু তা হাড় দুটিকে স্পর্শ করল না।









আল-জামি` আল-কামিল (5526)


5526 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الأشعريين إذا أرملوا في الغزو، أو قل طعام عيالهم بالمدينة جمعوا ما كان عندهم في ثوب واحد، ثم اقتسموه بينهم في إناء واحد بالسوية فهم مني، وأنا منهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الشركة (2486)، ومسلم في فضائل الصحابة (2500) كلاهما من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، حدثني بُريد بن عبد اللَّه بن أبي بردة، عن جده أبي بردة، عن أبي موسى قال فذكره.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আশআরী গোত্রের লোকেরা যখন কোনো সামরিক অভিযানে তাদের রসদ ফুরিয়ে যায়, অথবা মদীনাতে তাদের পরিবারের খাবার কম হয়ে যায়, তখন তারা তাদের কাছে যা কিছু থাকে তা একটি কাপড়ে জমা করে, অতঃপর একটি পাত্রে তা সমানভাবে নিজেদের মধ্যে ভাগ করে নেয়। তারা আমার, আর আমি তাদের।"









আল-জামি` আল-কামিল (5527)


5527 - عن جبلة قال: كنا بالمدينة، فأصابتنا سنة، فكان ابن الزبير يرزقنا التمر، وكان ابن عمر يمر بنا، فيقول: لا تقرنوا؛ فإن النبي صلى الله عليه وسلم عن القران إلا أن
يستأذن الرجل منكم أخاه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الشركة (2490)، ومسلم في الأشربة (2045: 150) كلاهما من طريق شعبة قال: سمعت جبلة بن سحيم قال فذكره. والسياق للبخاريّ، وزاد مسلم: قال شعبة: لا أرى هذه الكلمة إلا من كلمة ابن عمر، يعني الاستئذان.

ورواه البخاري (2489) من طريق سفيان، عن جبلة بن سحيم بلفظ:"نهى النبي صلى الله عليه وسلم أن يقرن الرجل بين التمرتين جميعا حتى يستأذن أصحابه".




জাবালা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মদীনায় ছিলাম। তখন আমাদের উপর দুর্ভিক্ষ জেঁকে বসেছিল (বা একটি কঠিন বছর এসেছিল)। ইবন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের খেজুর দিয়ে সাহায্য করতেন (বা খাবার দিতেন)। ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় বলতেন: তোমরা জোড়ায় জোড়ায় (খেজুর) খেও না (‘ক্বিরান’ করো না); কারণ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জোড়ায় খাওয়া থেকে নিষেধ করেছেন, তবে তোমাদের কেউ যদি তার ভাইয়ের কাছে অনুমতি চেয়ে নেয় (তবে তা ভিন্ন)।

অন্য এক বর্ণনায় (বুখারী শরীফে) এসেছে: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিষেধ করেছেন যে, কোনো ব্যক্তি তার সাথীদের অনুমতি না নিয়ে দুটি খেজুর একসাথে খাবে।