আল-জামি` আল-কামিল
5521 - عن ابن عباس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مات ودرعه رهن عند يهودي بثلاثين صاعا من شعير، أخذها رزقا لعياله.
صحيح: رواه الترمذيّ (1214)، والنسائي (4651)، وأحمد (2109، 3409)، والبيهقي (6/ 36) كلهم من حديث هشام بن حسان، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره إلا أن الترمذيّ قال:"عشرين صاعا".
وقال:"هذا حديث حسن صحيح".
ورواه ابن ماجه (2439)، وأحمد (2724) كلاهما من حديث هلال بن خباب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكر مثله.
وزاد أحمد في أول الحديث: أن النبي صلى الله عليه وسلم التفت إلى أحد، فقال:"والذي نفس محمد بيده ما يسرني أن أحدا يحول لآل محمد ذهبا، أنفقه في سبيل اللَّه، أموت يوم أموت أدع منه دينارين إلا دينارين أعدهما لدين إن كان" فمات وما ترك دينارا ولا درهما، ولا عبدا ولا وليدة، وترك درعه مرهونة عند يهودي، فذكر مثله.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন। তখন তাঁর লৌহবর্মটি ত্রিশ সা' (Saa') যবের বিনিময়ে একজন ইহুদীর নিকট বন্ধক রাখা ছিল, যা তিনি তাঁর পরিবারের ভরণপোষণের জন্য গ্রহণ করেছিলেন।
5522 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من لكعب بن الأشرف؛ فإنه
قد آذى اللَّه ورسوله صلى الله عليه وسلم؟" قال محمد بن مسلمة: أنا. فأتاه، فقال: أردنا أن تسلفنا وسقا أو وسقين. فقال: ارهنوني نساءكم. قالوا: كيف نرهنك نساءنا وأنت أجمل العرب؟ قال: فارهنوني أبناءكم. قالوا: كيف نرهن أبناءنا؛ فيسب أحدهم، فيقال: رهن بوسق أو وسقين، هذا عار علينا، ولكنا نرهنك اللأمة. -قال سفيان: يعني السلاح- فوعده أن يأتيه، فقتلوه، ثم أتوا النبي صلى الله عليه وسلم، فأخبروه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الرهن (2510)، ومسلم في الجهاد والسير (1801) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار) قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه فذكره. والسياق للبخاريّ، ومسلم ذكره بتمامه، وهو بتمامه عند البخاري في المغازي (4037).
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কা'ব ইবনুল আশরাফের (বিপদ দূর করতে) কে আছো? কারণ সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কষ্ট দিয়েছে।" মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামা বললেন: আমি আছি। অতঃপর তিনি তার কাছে গেলেন এবং বললেন: আমরা চাই তুমি আমাদের এক ওয়াসাক বা দুই ওয়াসাক (পরিমাণ খাদ্যশস্য) কর্জ দাও। সে বলল: তোমাদের নারীদের আমার কাছে বন্ধক রাখো। তারা বললেন: আমরা কিভাবে আমাদের নারীদের আপনার কাছে বন্ধক রাখব, অথচ আপনি আরবদের মধ্যে সবচেয়ে সুদর্শন? সে বলল: তাহলে তোমাদের সন্তানদের আমার কাছে বন্ধক রাখো। তারা বললেন: আমরা কিভাবে আমাদের সন্তানদের বন্ধক রাখব? (যদি এমন হয় যে) তাদের কাউকে গালমন্দ করা হতে পারে এবং বলা হবে: তাকে এক ওয়াসাক বা দুই ওয়াসাক (শস্যের বিনিময়ে) বন্ধক রাখা হয়েছে, এটা আমাদের জন্য লজ্জাজনক। কিন্তু আমরা আপনাকে 'আল-লা'ম্মা' (অস্ত্রশস্ত্র) বন্ধক রাখতে পারি। (সুফিয়ান বলেছেন: এর অর্থ হলো অস্ত্র।) এরপর তিনি তার কাছে আসার প্রতিশ্রুতি দিলেন। অতঃপর তারা তাকে হত্যা করলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে জানালেন।
5523 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الظهر يركب بنفقته إذا كان مرهونا، ولبن الدر يشرب بنفقته إذا كان مرهونا، وعلى الذي يركب ويشرب النفقة".
صحيح: رواه البخاريّ في الرهن (2512) عن محمد بن مقاتل، أخبرنا عبد اللَّه (هو ابن المبارك)، أخبرنا زكريا (هو ابن أبي زائدة)، عن الشعبي، عن أبي هريرة فذكره.
قال الترمذيّ بعد أن أخرج هذا الحديث من طريق زكريا: هذا حديث حسن صحيح، لا نعرفه مرفوعا إلا من حديث عامر الشعبي، عن أبي هريرة. وقد روى غير واحد هذا الحديث عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة موقوفا. والعمل على هذا الحديث عند بعض أهل العلم، وهو قول أحمد وإسحاق. وقال بعض أهل العلم: ليس له أن ينتفع من الرهن بشيء". انتهى.
قلت: حديث الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة رواه الدارقطني (3/ 34) من طريق أبي عوانة مرفوعا بلفظ"الرهن مركوب ومحلوب".
واختلف على الأعمش، فرواه عنه أبو عوانة مرفوعا. وتابعه على ذلك أبو معاوية عن الأعمش، رواه البيهقي (6/ 38) من حديث إبراهيم بن مجشر، عن أبي معاوية، وقال البيهقي: ورواه الجماعة عن الأعمش موقوفا على أبي هريرة، ثم ذكر رواية وكيع، وشعبة، وسفيان بن عيينة كلهم عن الأعمش موقوفا، وهو الصواب" إلا أنه لا يعل ما رواه الشعبي عن أبي هريرة مرفوعا، كما مضى، وهو مخرج في الصحيح.
وقد قال أبو داود بعد ما أخرج الحديث من الطريق المشار إليه:"وهو عندنا صحيح".
وقد قيل: إنه مجمل لم يبين فيه من الذي يركب ويشرب اللبن?
قلت: بين ذلك هشيم عن زكريا، عن الشعبي، عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كانت الدابة مرهونة فعلى المرتهن علفها، ولبن الدر يشرب، وعلى الذي يشربه نفقته، ويركب". رواه
أحمد (7125)، والطحاوي في"شرح المعاني" (5754) كلاهما عن هشيم به.
وبهذا صح أن المرتهن هو الذي ينتفع من الرهن، وهو قول الإمام أحمد.
ولكن ادعى الطحاوي نسخ الحديث المذكور بلا حجة.
وأوَّل الشافعي بقوله:"يشبه قول أبي هريرة -واللَّه أعلم- أن من رهن ذات در وظهر لم يمنع الراهن درعها وظهرها؛ لأن له رقبتها، وهي محلوبة ومركوبة، كما كانت قبل الرهن. وقال: ومنافع الرهن للراهن، ليس للمرتهن منها شيء. انتهى. انظر الأم (3/ 164)، ونقل عنه البيهقي (6/ 38، 39).
وهذا التأويل من الشافعي يُفَوت مصلحة الرهن، وقد لا يستطيع الراهن الإنفاق عليها لبعد المكان، ثم ليس هو مثل القرض يجر نفعا؛ لأن الظهر يحتاج إلى النفقة، فعلى المرتهن أن ينتفع بقدر النفقة.
هذا إذا كان الرهن ذات الروح، وأما إن كان الرهن مثل الحلي والثياب فليس للمرتهن الانتفاع به؛ لأنه لا يحتاج إلى النفقة.
وقد فصّلتُ قول أهل العلم مع أدلتهم في"المنة الكبرى" (5/ 271 - 273)، فراجعه لمعرفة المزيد.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন কোনো বাহন (আরোহণের পশু) বন্ধক রাখা হয়, তখন তার পিঠে আরোহণ করা যাবে তার (রক্ষণাবেক্ষণের) খরচের বিনিময়ে। আর যখন দুধের প্রাণী বন্ধক রাখা হয়, তখন তার দুধ পান করা যাবে তার (রক্ষণাবেক্ষণের) খরচের বিনিময়ে। আর যে আরোহণ করবে ও দুধ পান করবে, রক্ষণাবেক্ষণের খরচ তার উপরই বর্তাবে।”
5524 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يغلق الرهن، له غنمه، وعليه غرمه".
حسن: رواه الدارقطني (3/ 34) عن أبي محمد بن صاعد، نا عبد اللَّه بن عمران العابدي، نا سفيان بن عيينة، عن زياد بن سعد، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.
وهذا الحديث اختلف أصحاب الزهري عليه:
فرواه ابن أبي ذئب، ومالك، ويونس، ومعمر كلهم عن الزهري مرسلا، إلا أن بعض هؤلاء وغيرهم روى عنه متصلا، وإليكم تفصيل ذلك:
رواه الشافعي في الأم (3/ 167) عن محمد بن إسماعيل بن أبي فديك، عن ابن أبي ذئب، عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يغلق الرهنُ الرهن من صاحبه الذي رهنه، له غنمه، وعليه غرمه". ومن طريق الشافعي رواه البيهقي (6/ 39).
وقد اختلف علي ابن أبي ذئب، فرواه محمد بن إسماعيل مرسلا، ورواه إسماعيل بن عياش، عنه، وعن الزبيدي كلاهما عن الزهري متصلا. وإسماعيل بن عياش ضعيف في غير الشاميين، وابن أبي ذئب من المدنيين، ولكن متابعة الزبيدي -وهو محمد بن الوليد الحمصي- تقويه، فدل على أنه لم يخطئ فيه. وهذان الطريقان رواهما الدارقطني (3/ 33).
وأما مالك فرواه مرسلا، كما في رواية يحيى في كتاب الأقضية (13)، وكذلك رواه سائر رواة الموطأ إلا معن بن عيسى فوصله، كما قال ابن عبد البر، وقد أشار الحاكم إلى الرواية المتصلة لمالك.
وأما معمر فرواه الدارقطني (3/ 33) من طريق أبي يحيى عنه عن الزهري متصلا، ولفظه:"لا يغلق الرهن، لك غنمه، وعليك غرمه".
قال الدارقطني: وأرسله عبد الرزاق - وهو في المصنف (15033) عن معمر، عن الزهريّ، عن ابن المسيب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يغلق الرهن ممن رهنه". كذا في لفظ المصنف، ولفظ الدارقطني:"لا يغلق الرهن، له غنمه، وعليه غرمه".
وفي المصنف: قلت (القائل هو معمر) للزهري: أرأيت قوله:"لا يغلق الرهن" أهو الرجل يقول: إن لم آتك بمالك فهذا الرهن لك؟ قال: نعم. قال معمر: ثم بلغني عنه أنه قال: إن هلك لم يذهب حق هذا، إنما هلك من رب الرهن له غنمه، وعليه غرمه.
وأما الذين وصلوه عن الزهري فمنهم:
زياد بن سعد، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يغلق الرهن، له غنمه، وعليه غرمه".
رواه الدارقطني (3/ 32)، وابن حبان (5934)، والحاكم (2/ 51)، والبيهقي (6/ 39) كلهم من هذا الوجه.
قال الدارقطني:"زياد بن سعد من الحفاظ الثقات، وهذا إسناد حسن متصل".
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه لخلاف فيه على أصحاب الزهريّ، وقد تابع زياد بن سعد: مالكٌ، وابن أبي ذئب، وسليمان بن أبي داود الحراني، ومحمد بن الوليد الزبيدي، ومعمر بن راشد على هذه الرواية". ثم أخرج أحاديثهم.
وأحاديث هؤلاء الذين ذكرهم الحاكم أخرج حديثهم الدارقطني، والبيهقي وغيرهما.
وممن تابعه أيضًا على وصله إسحاق بن راشد عن الزهري بإسناده بلفظ:"لا يغلق الرهن". رواه ابن ماجه (2441) عن محمد بن حميد قال: حدّثنا إبراهيم بن المختار، عن إسحاق بن راشد بإسناده.
وإسحاق بن راشد ثقة إلا أنه كان يهم في أحاديث الزهريّ، ومتابعة هؤلاء تؤكد أنه لم يهم فيه، ولكن آفته محمد بن حميد الرازي؛ فإنه ضعيف عند جمهور أهل العلم، وكان ابن معين حسن الرأي فيه، ومن وصله أيضًا يحيى بن أبي أنيسة، عن ابن شهاب بإسناده، وقال: مثله أو مثل معناه لا يخالفه. ويحيى بن أبي أنيسة ضعيف، وهو من رجال التهذيب.
ووصله أيضًا عبد اللَّه بن نصر الأصم، نا شبابة، نا ابن أبي ذئب، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة بلفظ:"لا يغلق الرهن، والرهن لمن رهنه، له غنمه، وعليه غرمه". ومن هذا الطريق رواه الدارقطني، والحاكم.
وعبد اللَّه بن نصر الأصم منكر الحديث، كما في الميزان.
وممن وصله سليمان بن أبي داود عن الزهري بإسناده، ولفظه:"لا يغلق الرهن حتى يكون لك
غنمه، وعليك غرمه". رواه الحاكم (2/ 51) من طريقه.
وخلاصة القول في هذا أنه اختلف في وصله وإرساله، فصحح وصله ابن حبان، والدارقطني، والحاكم، وابن عبد البر، وعبد الحق، والذهبي في"تلخيص المستدرك"، وغيرهم. وهو الصحيح إن شاء اللَّه تعالى؛ لأن قواعد التخريج تقتضي أن تقبل هذه الزيادة لكثرتها؛ لأن هذا هو سبيل الحديث الحسن الذي يروى من غير وجه. وأما الذين أرسلوه فاختلف عليهم أيضًا، كما رأيت، وهذا ما يبرر أيضًا قبول الزيادة.
قال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 119):"وقد ذكرنا هذا الحديث والاختلاف فيه وكلام الأئمة عليه في غير هذا الموضع، وقد صحح اتصاله ابن عبد البر وعبد الحق. واللَّه أعلم". انتهى.
وقوله:"لا يغلق الرهن" معناه لا يستغلق بحيث لا يعود إلى الراهن، بل متى أدى الحق المرهون به وعاد إلى الراهن.
وقوله:"له غنمه" أي الزوائد التي تحصل منه تكون للراهن.
وقوله:"وعليه غرمه" إذا هلك في يد المرتهن يكون من ضمان الراهن.
وفي الحديث دليل على أن الرهن يكون مضمونا لصاحبه، والشرط باطل، وهو قوله: إن لم أجئ بالحق الذي علي فالرهن لك.
وحكي عن إبراهيم في تفسيره هو أن يقول الراهن للمرتهن: إن جئتك بحقك إلى كذا وكذا، وإلا فالرهن لك.
قال إبراهيم: قوله:"لا يغلق الرهن" أي لا يستحقه المرتهن.
وروي مثل هذا التفسير عن طاوس، وسفيان الثوري، ومالك، وغيرهم.
أخرج عبد الرزاق (15035) عن معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين، عن شريح قال: رهن رجل داره بخمس مائة درهم، فقال صاحب الدراهم: إن لم تأتي بمالي إلى كذا وكذا فدارك لي. فلم يجئ يومئذ، وجاء بعد ذلك، فاختصما إلى شريح، فقال شريح: إن أخطأت يده رجله ذهبت داره، اردد إليه داره، وخذ مالك.
وكذلك فسره مالك يقول: أن يرهن الرجل الرهن عند الرجل بالشيء، وفي الرهن فضل عما رهن به، فيقول الراهن للمرتهن: إن جئتك بحقك إلى أجل يسميه له، وإلا فالرهن لك بما رهن فيه. فهذا لا يصلح، ولا يحل. وهذا الذي نهي عنه وإن جاء صاحبه بالذي رهن به بعد الأجل فهو له. وأرى هذا الشرط منفسخا. انتهى.
وفي الحديث دليل أيضًا على أن الرهن إذا هلك في يد المرتهن يكون من ضمان الراهن، ولا يسقط بهلاكهـ شيء من حق المرتهن، وبه قال جماعة من أهل العلم، منهم مالك، والشافعي، وأحمد.
وذهب قوم إلى أن الرهن مضمون، إذا هلك في يد المرتهن ذهب حق المرتهن من القرض،
وفي المسألة تفصيل، وهو أن قيمة الرهن إذا كانت قدر الحق يسقط بهلاكهـ الحق، وإن كانت قيمته أقل من الحق فبقدر قيمته من الحق يسقط، والباقي واجب على الراهن. وإن كانت أكثر من الحق يسقط الحق، ولا يجب ضمان الزيادة على المرتهن. وبه قال أصحاب الرأي.
ولعل من مستدلهم حديث أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الرهن بما فيه".
رواه الدارقطني (3/ 32) عن محمد بن مخلد، نا أحمد بن محمد بن غالب، نا عبد الكريم بن روح، عن هشام بن زياد، عن حميد، عن أنس، فذكره.
قال الدارقطني:"لا يثبت هذا عن حميد، وكل من بينه وبين شيخنا ضعفاء".
ورواه أيضًا بإسناد آخر، فقال: حدّثنا عبد الباقي بن قانع، نا عبد الرزاق بن إبراهيم، نا إسماعيل ابن أبي أمية، نا سعيد بن راشد، نا حميد الطويل، عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث مثله.
قال الدارقطني:"إسماعيل هذا يضع الحديث، وهذا باطل عن قتادة، وعن حماد بن سلمة".
وقال ابن الجوزي في"التحقيق" (4/ 120) مع"التنقيح":"وفي الإسناد سعيد بن راشد، قال يحيى بن معين: ليس بشيء. وقال النسائي: متروك الحديث. وقال ابن حبان: ينفرد عن الثقات بالمعضلات.
وفي الإسناد الأول هشام بن زياد، قال يحيى: ليس بشيء. وقال النسائي: متروك الحديث. وقال ابن حبان: لا يجوز الاحتجاج به.
وفيه عبد الكريم ضعفه الدارقطني. وقال أبو حاتم الرازي: مجهول.
وفيه أحمد بن محمد بن غالب وهو غلام الخليل كان كذابا يضع الحديث. وقال ابن عدي: كان غلام الخليل يقول: وضعنا أحاديث نرقق بها قلوب العامة. وقال الدارقطني: هو متروك". انتهى.
وفي معناه أيضًا ما روي عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الرهن بما فيه". رواه البيهقي (6/ 40) من طريق حسان بن إبراهيم، عن يزيد بن إبراهيم التستري، عن عمرو بن دينار قال: قال أبو هريرة فذكره.
قال البيهقي:"أبو حازم تفرّد به حسان بن إبراهيم الكرماني، وهو منقطع بين عمرو بن دينار، وأبي هريرة".
ثم ذكر البيهقي حديث أنس، ونقل قول الدارقطني بأن فيه إسماعيل يضع الحديث. ثم قال:"والأصل في هذا الباب حديث مرسل، وفيه من الوهن ما فيه. ثم أسند عن مصعب بن ثابت قال: سمعت عطاء يحدث أن رجلا رهن فرسا، فنفق في يده، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للمرتهن:"ذهب حقه". قال البيهقي: وقد كفانا الشافعي بيان وهن هذا الحديث". انتهى.
وهذا المرسل رواه أبو داود في مراسيله (176) ومن طريقه البيهقي، وفيه أيضًا مصعب بن ثابت، وهو ضعيف.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বন্ধক বাজেয়াপ্ত হয় না। এর লাভ (বৃদ্ধি) বন্ধকদাতার জন্য এবং এর ক্ষতি (ধ্বংসের ঝুঁকি) তার উপর বর্তাবে।"
5525 - عن جابر بن عبد اللَّه أنه قال: بعث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعثا قبل الساحل، فأمر عليهم أبا عبيدة بن الجراح، وهم ثلاثمائة. قال: وأنا فيهم. فخرجنا حتى إذا كنا ببعض الطريق فني الزادُ، فأمر أبو عبيدة بأزواد ذلك الجيش، فجمع ذلك كله، فكان مزودي تمر. قال: فكان يقوتناه كل يوم قليلا قليلا حتى فني، فلم يكن يصيبنا إلا تمرة تمرة. فقلت: وما يغني تمرة؟ فقال: لقد وجدنا فقدَها حين فنيت. قال: ثم انتهينا إلى البحر فإذا حوت مثل الظرب، فأكل منه ذلك الجيش ثماني عشرة ليلة، ثم أمر أبو عبيدة بضلعين من أضلاعه، فنصبا، ثم أمر براحلة فرحلت، ثم مرت تحتهما، فلم تصبهما.
متفق عليه: رواه مالك في صفة النبي صلى الله عليه وسلم (24) عن وهب بن كيسان، عن جابر بن عبد اللَّه أنه قال فذكره.
ورواه البخاريّ في الشركة (2483) عن عبد اللَّه بن يوسف، أخبرنا مالك به مثله. ومسلم في الصيد والذبائح (1935: 21) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن مالك به مختصرا، وساقه من طريق أبي الزبير، عن جابر بتمامه.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উপকূলের দিকে একটি বাহিনী প্রেরণ করেন এবং তাদের উপর আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহকে নেতা নিযুক্ত করেন। তাদের সংখ্যা ছিল তিনশো জন। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমিও তাদের মধ্যে ছিলাম। আমরা বের হলাম। যখন আমরা পথের কিছু অংশে পৌঁছলাম, তখন আমাদের রসদ শেষ হয়ে গেল। আবূ উবাইদাহ সেই বাহিনীর সমস্ত রসদ একত্রিত করার নির্দেশ দিলেন। তা ছিল মাত্র এক ঝুড়ি খেজুর। তিনি বলেন: তিনি তা থেকে প্রতিদিন অল্প অল্প করে আমাদের খাবার দিতেন যতক্ষণ না তা শেষ হয়ে যায়। তারপর আমাদের প্রত্যেকের ভাগে একটি করে খেজুর ব্যতীত আর কিছুই জুটত না। আমি (জাবির) বললাম: একটি খেজুর কী আর কাজে দেবে? আবূ উবাইদাহ বললেন: যখন সেটিও শেষ হয়ে গেল, তখন আমরা এর অভাব তীব্রভাবে অনুভব করলাম। তিনি বলেন: এরপর আমরা সমুদ্রের নিকট পৌঁছলাম। সেখানে আমরা একটি টিলার মতো (বিশাল) মাছ দেখতে পেলাম। সেই বাহিনী আঠারো রাত ধরে তা থেকে আহার করল। তারপর আবূ উবাইদাহ মাছটির দুটি পাঁজরের হাড় বের করে সোজা করে দাঁড় করানোর নির্দেশ দিলেন। এরপর একটি সওয়ারী উট এনে তাতে হাওদা বাঁধা হলো। তারপর সেটিকে সেই হাড় দুটির নিচ দিয়ে অতিক্রম করানো হলো, কিন্তু তা হাড় দুটিকে স্পর্শ করল না।
5526 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الأشعريين إذا أرملوا في الغزو، أو قل طعام عيالهم بالمدينة جمعوا ما كان عندهم في ثوب واحد، ثم اقتسموه بينهم في إناء واحد بالسوية فهم مني، وأنا منهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشركة (2486)، ومسلم في فضائل الصحابة (2500) كلاهما من طريق أبي أسامة حماد بن أسامة، حدثني بُريد بن عبد اللَّه بن أبي بردة، عن جده أبي بردة، عن أبي موسى قال فذكره.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আশআরী গোত্রের লোকেরা যখন কোনো সামরিক অভিযানে তাদের রসদ ফুরিয়ে যায়, অথবা মদীনাতে তাদের পরিবারের খাবার কম হয়ে যায়, তখন তারা তাদের কাছে যা কিছু থাকে তা একটি কাপড়ে জমা করে, অতঃপর একটি পাত্রে তা সমানভাবে নিজেদের মধ্যে ভাগ করে নেয়। তারা আমার, আর আমি তাদের।"
5527 - عن جبلة قال: كنا بالمدينة، فأصابتنا سنة، فكان ابن الزبير يرزقنا التمر، وكان ابن عمر يمر بنا، فيقول: لا تقرنوا؛ فإن النبي صلى الله عليه وسلم عن القران إلا أن
يستأذن الرجل منكم أخاه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشركة (2490)، ومسلم في الأشربة (2045: 150) كلاهما من طريق شعبة قال: سمعت جبلة بن سحيم قال فذكره. والسياق للبخاريّ، وزاد مسلم: قال شعبة: لا أرى هذه الكلمة إلا من كلمة ابن عمر، يعني الاستئذان.
ورواه البخاري (2489) من طريق سفيان، عن جبلة بن سحيم بلفظ:"نهى النبي صلى الله عليه وسلم أن يقرن الرجل بين التمرتين جميعا حتى يستأذن أصحابه".
জাবালা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মদীনায় ছিলাম। তখন আমাদের উপর দুর্ভিক্ষ জেঁকে বসেছিল (বা একটি কঠিন বছর এসেছিল)। ইবন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের খেজুর দিয়ে সাহায্য করতেন (বা খাবার দিতেন)। ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় বলতেন: তোমরা জোড়ায় জোড়ায় (খেজুর) খেও না (‘ক্বিরান’ করো না); কারণ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জোড়ায় খাওয়া থেকে নিষেধ করেছেন, তবে তোমাদের কেউ যদি তার ভাইয়ের কাছে অনুমতি চেয়ে নেয় (তবে তা ভিন্ন)।
অন্য এক বর্ণনায় (বুখারী শরীফে) এসেছে: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিষেধ করেছেন যে, কোনো ব্যক্তি তার সাথীদের অনুমতি না নিয়ে দুটি খেজুর একসাথে খাবে।
5528 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق شركا له في عبد، فكان له مال يبلغ ثمن العبد قُوِّم عليه قيمة العدل، فأعطى شركاءه حصصهم، وعتق عليه العبد، وإلا فقد عتق منه ما عتق".
متفق عليه: رواه مالك في العتق والولاء (1) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر قال: فذكره. ورواه البخاري في العتق (2522)، ومسلم في العتق (1501: 1) كلاهما من طريق مالك به مثله.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো গোলামের (দাস/ক্রীতদাসের) অংশবিশেষ মুক্ত করে দেয়, অতঃপর যদি তার এমন সম্পদ থাকে যা গোলামটির পূর্ণ মূল্যের সমান হয়, তবে তার ওপর ন্যায়সঙ্গত মূল্য নির্ধারণ করা হবে (গোলামটির), এবং সে তার অংশীদারদের তাদের প্রাপ্য অংশ দিয়ে দেবে, তাহলে গোলামটি সম্পূর্ণ মুক্ত হয়ে যাবে। আর যদি তা না থাকে (পূর্ণ মূল্য দিতে সক্ষম না হয়), তবে গোলামটির যে অংশটুকু মুক্ত হয়েছে, ততটুকুই মুক্ত হবে।"
5529 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق شقيصا من مملوكه فعليه خلاصه في ماله، فإن لم يكن له مال قوم المملوك قيمة عدل، ثم استسعي غير مشقوق عليه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشركة (2492)، ومسلم في العتق (1503) كلاهما من حديث سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة فذكره.
ورواه مسلم في العتق (1502) من طرق عن محمد بن جعفر قال: حدّثنا شعبة، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال في المملوك بين الرجلين، فيعتق أحدهما قال:"يضمن". وسيأتي مزيد من التفصيل في كتاب العتق.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার ক্রীতদাসের কোনো আংশিক অংশ মুক্ত করে দেবে, তার উপর তার (ক্রীতদাসের) পূর্ণ মুক্তির দায়িত্ব বর্তাবে তার নিজের সম্পদ থেকে। যদি তার সম্পদ না থাকে, তাহলে ক্রীতদাসটির ন্যায্য মূল্য নির্ধারণ করা হবে, অতঃপর তাকে এমনভাবে শ্রমের মাধ্যমে (ঐ মূল্য পরিশোধের জন্য) উপার্জন করতে বলা হবে, যাতে তার উপর কষ্ট না হয়।"
5530 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: نحرنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عام الحديبية عن سبعة، والبقرة عن سبعة.
صحيح: رواه مالك في الضحايا (9) عن أبي الزبير المكي، عن جابر بن عبد اللَّه به. ورواه مسلم في الحج (1318: 350) من طريق مالك به مثله.
জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুদায়বিয়ার বছরে সাতজনের পক্ষ থেকে উট কুরবানি করেছিলাম এবং গরুও সাতজনের পক্ষ থেকে (কুরবানি করা হয়)।
5531 - عن جابر قال: خرجنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مهلين بالحج، فأمرنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن نشترك في الإبل والبقر، كل سبعة منا في بدنة.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1318: 351) من طرق عن زهير أبي خيثمة، حدّثنا أبو الزبير،
عن جابر فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হজ্জের ইহরাম বেঁধে বের হলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নির্দেশ দিলেন যে আমরা যেন উট ও গরুতে শরীক হই, আমাদের মধ্য থেকে সাতজন মিলে একটি পশুর (বদনা) মধ্যে শরীক হবে।
5532 - عن أنس بن مالك أن أبا بكر رضي الله عنه كتب له فريضة الصدقة التي فرض رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"وما كان من خليطين فإنهما يتراجعان بينهما بالسوية".
صحيح: رواه البخاريّ في الشركة (2487) عن محمد بن عبد اللَّه بن المثنى قال: حدثني ثمامة ابن عبد اللَّه بن أنس، أن أنسا حدثه، فذكره هكذا مختصرا. وقد تقدم في الزّكاة بتمامه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সাদাকার সেই ফরযগুলো লিখে দিয়েছিলেন যা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফরয করেছিলেন। তিনি [আবূ বাকর] বলেন: ‘আর যদি দুই শরিকের (খালীতাইন-এর) ব্যাপার হয়, তবে তারা নিজেদের মধ্যে সমতার ভিত্তিতে তা মীমাংসা করে নেবে’।
5533 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كان له شريك في رَبْعة أو نخل فليس له أن يبيع حتى يؤذن شريكهـ، فإن رضي أخذ، وإن كره ترك".
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1608: 133) من حديث زهير أبي خيثمة، وابن جريج، كلاهما عن أبي الزبير، عن جابر. هذا لفظ زهير أبي خيثمة.
ولفظ ابن جريج:"قضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بالشفعة في كل شركة لم تقسم ربعة أو حائط، لا يحل له أن يبيع حتى يؤذن شريكهـ، فإن شاء أخذ، وإن شاء ترك، فإذا باع ولم يؤذنه فهو أحق به".
وزهير أبو خيثمة هو ابن معاوية الجعفي.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যার কোনো ঘর বা খেজুর বাগানে অংশীদারিত্ব আছে, সে তার অংশীদারের অনুমতি না নিয়ে তা বিক্রি করতে পারবে না। যদি সে (অংশীদার) রাজি হয়, তবে সে তা নিতে পারবে, আর যদি অপছন্দ করে, তবে সে তা ছেড়ে দিতে পারবে।"
ইবনু জুরাইজের শব্দে (অন্য বর্ণনায়) এসেছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শুফ'আ (অগ্রক্রয়ের অধিকার) এর ফয়সালা দিয়েছেন এমন প্রতিটি অংশীদারিত্বের ক্ষেত্রে যা এখনও বন্টন করা হয়নি—তা ঘর হোক বা বাগানই হোক। তার জন্য এটি বিক্রি করা বৈধ নয়, যতক্ষণ না সে তার অংশীদারকে অবহিত করে। এরপর সে (অংশীদার) চাইলে তা গ্রহণ করতে পারে, আর চাইলে ছেড়ে দিতে পারে। আর যদি সে (অংশীদারকে) অবহিত না করেই বিক্রি করে দেয়, তবে সেই অংশীদারই তা পাওয়ার অধিক হকদার।
5534 - عن رويفع بن ثابت الأنصاري أنه غزا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: وكان أحدنا يأخذ الناقة على النصف مما يغنم حتى أن لأحدنا القِدح، وللآخر النصل والريش.
حسن: رواه الإمام أحمد (16994) عن يحيى بن إسحاق من كتابه قال: أخبرنا ابن لهيعة، عن عياش بن عباس، عن شييم بن بيتان، عن أبي سالم، عن شيبان بن أمية، عن رويفع بن ثابت فذكره.
وإسناده حسن. وسبق تخريجه في الطهارة، باب لا يستنجي بروث ولا عظم.
وفي الباب أيضًا عن عبد اللَّه بن مسعود قال:"اشتركت أنا وعمار وسعد فيما نصيب يوم بدر، فجاء سعد برجلين، ولم أجئ أنا وعمار بشيء".
رواه أبو داود (3388)، والنسائي (3937)، وابن ماجه (2288)، والبيهقي (6/ 89) كلهم من حديث سفيان، عن أبي إسحاق، عن أبي عبيدة، عن أبيه عبد اللَّه بن مسعود فذكره.
وأبو عبيدة لم يسمع من أبيه.
كما هو عادته في التقريب، والعجلي معروف بالتساهل في التوثيق، ولذا لم يقبل ابن القطّان توثيقه، فقال: لا يعرف حاله.
العلة الثانية: الاختلاف في الوصل والإرسال، فقال الدارقطني:"لم يسند أحد إلا أبو همام وحده". ثم روى من جرير، عن أبي حيان التيمي، عن أبيه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فذكر الحديث.
قلت: وجرير هذا ثقة فاضل صحيح الكتاب، وأبو همام هو محمد بن الزبرقان، صدوق ربما أخطأ، كما في التقريب، ولذا صوب الدارقطني إرساله. انظر"التلخيص" (3/ 49).
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس قال: كان العباس بن عبد المطلب إذا دفع مالا مضاربة اشترط على صاحبه أن لا يسلك به بحرا، ولا ينزل به واديا، ولا يشتري به ذا كبد رطبة، فإن فعله فهو ضامن. فرفع شرطه إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأجازه.
رواه الدارقطني (3/ 78)، وقال:"فيه أبو الجارود ضعيف".
রুইফা' ইবনে সাবিত আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। তিনি বলেন: আমাদের মধ্যে কেউ কেউ গণীমতের অর্ধেক অংশের বিনিময়ে উট গ্রহণ করতো। এমনকি এমনও হতো যে, আমাদের একজনের ভাগে পড়তো (তীরের) কাণ্ড, আর অন্যজনের ভাগে পড়তো তীরের ফলা এবং পালক।
5535 - عن * *
৫৫০৫ - ...থেকে বর্ণিত **
5536 - عن النعمان بن بشير قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (وأهوى النعمان بإصبعيه إلى أذنيه):"إن الحلال بين، وإن الحرام بين، وبينهما مشتبهات لا يعلمهن كثير من النّاس، فمن اتقى الشبهات استبرأ لدينه وعرضه، ومن وقع في الشبهات وقع في الحرام، كالراعي يرعى حول الحمى يوشك أن يرتع فيه. ألا وإن لكل ملك حمى، ألا وإن حمى اللَّه محارمه، ألا وإن في الجسد مضغة إذا صلحت صلح الجسد كله، وإذا فسدت فسد الجسد كله ألا وهي القلب".
متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2051)، ومسلم في المساقاة (1599: 107) كلاهما من طريق الشعبي قال: سمعت النعمان بن بشير يقول فذكره. واللّفظ لمسلم.
নু'মান ইবন বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি (আর নু'মান তাঁর উভয় আঙুল দিয়ে তাঁর কানের দিকে ইঙ্গিত করলেন): "নিশ্চয় হালাল সুস্পষ্ট এবং হারামও সুস্পষ্ট। আর এ দু'য়ের মাঝে রয়েছে সন্দেহজনক বিষয়াদি, যা অধিকাংশ মানুষই জানে না। সুতরাং যে ব্যক্তি সন্দেহজনক বিষয়াদি থেকে বেঁচে রইল, সে তার দ্বীন ও মান-সম্মানকে রক্ষা করল। আর যে ব্যক্তি সন্দেহজনক বিষয়ে পতিত হলো, সে হারামে পতিত হলো, যেমন কোনো রাখাল সংরক্ষিত চারণভূমির চারপাশে পশু চরায়, সে প্রায় তাতে প্রবেশ করার উপক্রম হয়। সাবধান! নিশ্চয়ই প্রত্যেক বাদশাহর একটি সংরক্ষিত এলাকা থাকে। সাবধান! আর আল্লাহর সংরক্ষিত এলাকা হলো তাঁর নিষিদ্ধ বিষয়াদি। সাবধান! নিশ্চয়ই শরীরের মধ্যে একটি মাংসপিণ্ড রয়েছে, যখন তা শুদ্ধ হয়, তখন পুরো শরীর শুদ্ধ হয়ে যায়; আর যখন তা দূষিত হয়, তখন পুরো শরীর দূষিত হয়ে যায়। সাবধান! তা হলো ক্বালব (হৃদয়)।"
5537 - عن ابن عباس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"الحلال بيّنٌ، والحرامُ بيّنٌ، وبين ذلك شبهات، فمن أوقع بهن فهو قَمِنٌ أن يأثم، ومن اجتنبهن فهو أوفر لدينه كمرتع إلى جنب حمى أوشك أن يقع فيه، ولكل ملك حمى، وحمى اللَّه الحرام".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (10/ 404)، وابن عساكر في تاريخ دمشق (7/ 1) كلاهما من طرقٍ عن الوليد بن شجاع بن الوليد، حدثني أبي، حدّثنا سابق الجزري، أن عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل سابق الجزري هو ابن عبد اللَّه الرقّي، ذكره ابن حبان في الثقات، وقال: روى عنه الأوزاعيّ، وأهل الجزيرة، وقال عنه ابن عساكر: كان إمام مسجد الرقة وقاضي أهلها.
فالرجل كان معروفا مشهورا، ومثله يحسّن حديثه ولحديثه أصل ثابت.
وانظر ما يستفاد من الحديث في"المنة الكبرى" (5/ 11 - 12).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: হালাল স্পষ্ট এবং হারামও স্পষ্ট। আর এ দু’য়ের মাঝে রয়েছে সন্দেহজনক বিষয়াদি (শুহুবাহাত), সুতরাং যে ব্যক্তি সেগুলোর মধ্যে জড়িয়ে পড়ে, সে গুনাহে পতিত হওয়ার যোগ্য, আর যে ব্যক্তি সেগুলো বর্জন করে, সে তার দ্বীনের জন্য অধিকতর কল্যাণকর (বা দ্বীনকে অধিক নিরাপদে রাখে)। (এটি) এমন চারণভূমির মতো যা কোনো সংরক্ষিত এলাকার পাশে থাকে এবং সেখানে (পশুর) প্রবেশ করার আশঙ্কা থাকে। আর প্রত্যেক রাজারই একটি সংরক্ষিত এলাকা আছে। আল্লাহর সংরক্ষিত এলাকা হলো হারাম (নিষেধ) জিনিসগুলো।
5538 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليأتين على النّاس زمان لا يبالي المرء بما أخذ المال، أمن الحلال، أم من الحرام?".
صحيح: رواه البخاريّ في البيوع (2083) عن آدم، حدّثنا ابن أبي ذئب، حدّثنا سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষের উপর এমন এক সময় অবশ্যই আসবে যখন মানুষ কোনো পরোয়া করবে না যে, সে কোন্ উপায়ে সম্পদ গ্রহণ করল— হালাল থেকে নাকি হারাম থেকে।"
5539 - عن كاتب المغيرة بن شعبة قال: كتب معاوية إلى المغيرة بن شعبة أن اكتب إلي بشيء سمعته من النبي صلى الله عليه وسلم، فكتب إليه: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن اللَّه كره لكم ثلاثا: قيل وقال، وإضاعة المال، وكثرة السؤال".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1477)، ومسلم في الأقضية (593: 13) كلاهما من طريق إسماعيل بن علية، عن خالد الحذاء، حدثني ابن أشوع، عن الشعبي، حدثني كاتب المغيرة ابن شعبة فذكره.
وفي رواية:"إن اللَّه حرم ثلاثا، ونهى عن ثلاث: حرم عقوق الوالدين، ووأد البنات، ولا وهات. ونهى عن ثلاث: قيل وقال، وكثرة السؤال، وإضاعة المال". وفي رواية"ومنعا وهات".
وقوله:"ولا وهات" أي حرم لا، يعني الامتناع عن أداء ما تجب عليه من الحقوق، يقول في الحقوق الواجبة: لا أعطي. ويقول فيما ليس له فيه حق: أعط.
মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লিখলেন যে, আপনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে যা শুনেছেন, তা আমার কাছে লিখে পাঠান। তখন তিনি (মুগীরাহ) তাঁকে লিখলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের জন্য তিনটি জিনিস অপছন্দ করেছেন (ঘৃণা করেন): অনর্থক কথা বলা (গুজব/কিল ও কাল), সম্পদ নষ্ট করা এবং বেশি প্রশ্ন করা।"
5540 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه يرضى لكم ثلاثا، ويكره لكم ثلاثا، فيرضى لكم أن تعبدوه، ولا تشركوا به شيئًا، وأن تعتصموا بحبل اللَّه جميعا، ولا تفرقوا. ويكره لكم قيل وقال، وكثرة السؤال، وإضاعة المال".
صحيح: رواه مسلم في الأقضية (1715) عن زهير بن حرب، حدّثنا جرير، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের জন্য তিনটি বিষয় পছন্দ করেন এবং তিনটি বিষয় অপছন্দ করেন। তিনি তোমাদের জন্য পছন্দ করেন যে, তোমরা তাঁরই ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না, আর তোমরা সকলে মিলে আল্লাহর রজ্জুকে (দ্বীনকে) মজবুতভাবে ধারণ করবে এবং বিভক্ত হবে না। আর তিনি তোমাদের জন্য অপছন্দ করেন: বাজে কথা (ক্বীলা ওয়া ক্বাল), বেশি প্রশ্ন করা, এবং সম্পদ নষ্ট করা।"