হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5541)


5541 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه مر على صبرة طعام، فأدخل يده فيها، فنالت أصابعه بللا، فقال:"ما هذا يا صاحب الطعام؟". قال: أصابته السماء، يا رسول اللَّه. قال:"أفلا جعلته فوق الطعام كي يراه النّاس. من غش فليس مني".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (102) من طرق عن إسماعيل بن جعفر قال: أخبرني العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر مثله.

ومن هذا الطريق رواه الترمذيّ (1315)، وقال: حسن صحيح.

ورواه الإمام أحمد (7292)، وعنه أبو داود (3492) عن سفيان، عن العلاء، وجاء فيه: فأوحي إليه أدخل يدك فيه، فأدخل يده، فإذا هو مبلول، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليس منا من غش".

ورواه ابن ماجه (2224) من وجه آخر عن سفيان. ولم يذكر قصة الوحي.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাদ্যের একটি স্তূপের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি তার হাত এর মধ্যে প্রবেশ করালেন, ফলে তাঁর আঙ্গুল কিছু ভেজা অনুভব করল। তিনি বললেন, "হে খাদ্যের মালিক, এটা কী?" সে বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! বৃষ্টি এটিকে ভিজিয়ে দিয়েছে। তিনি বললেন, "তবে কেন তুমি এটিকে খাবারের উপরে রাখলে না, যাতে লোকেরা তা দেখতে পেত? যে ধোঁকা দেয়, সে আমার অন্তর্ভুক্ত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5542)


5542 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من حمل علينا السلاح فليس منا،
ومن غشنا فليس منا".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (101) من طريق يعقوب بن عبد الرحمن القاري، وابن أبي حازم، كلاهما عن سهيل بن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমাদের বিরুদ্ধে অস্ত্র ধারণ করে, সে আমাদের দলভুক্ত নয়, এবং যে ব্যক্তি আমাদের সাথে প্রতারণা করে (বা ভেজাল দেয়), সেও আমাদের দলভুক্ত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5543)


5543 - عن عبد اللَّه بن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من غشنا فليس منا، ومن رمانا فليس منا".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (11/ 221) عن علي بن عبد العزيز، ثنا سعيد بن منصور، عن الدراوردي، عن ثور بن زيد، عن عكرمة، عن عبد اللَّه بن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل الدراوردي، وهو عبد العزيز بن محمد، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وحديثه عن عبيد اللَّه العمري منكر، كما قال النسائي، وهذا ليس منه.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে প্রতারণা করে (বা ভেজাল দেয়), সে আমাদের দলভুক্ত নয়। আর যে ব্যক্তি আমাদের বিরুদ্ধে অস্ত্রধারণ করে/আক্রমণ করে, সেও আমাদের দলভুক্ত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5544)


5544 - عن عقبة بن عامر قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"المسلم أخو المسلم، ولا يحل لمسلم باع من أخيه بيعا فيه عيب إلا بينه له".

حسن: رواه ابن ماجه (2246) عن محمد بن بشار قال: حدّثنا وهب بن جرير قال: حدّثنا أبي قال: سمعت يحيى بن أيوب يحدث عن يزيد بن أبي حبيب، عن عبد الرحمن بن شماسة، عن عقبة ابن عامر فذكره.

وفيه يحيى بن أيوب وهو الغافقي، مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث. ومن طريقه رواه الحاكم (2/ 8)، والبيهقي (5/ 320).

وتابعه ابن لهيعة، ومن طريقه رواه أحمد (17451) عنه عن يزيد بن حبيب بإسناده، ولفظه:"المسلم أخو المسلم، لا يحل لامرئ مسلم أن يغيب ما بسلعة عن أخيه إن علم بها تركها".

وابن لهيعة فيه كلام معروف، لكنه توبع.




উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "মুসলিম মুসলিমের ভাই, আর কোনো মুসলমানের জন্য এটা বৈধ নয় যে, সে তার ভাইয়ের কাছে কোনো ত্রুটিপূর্ণ জিনিস বিক্রি করবে, যদি না সে তা তার কাছে সুস্পষ্টভাবে বলে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5545)


5545 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من غشنا فليس منا".

حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1256) - عن عمرو بن علي وبشر بن آدم قالا: ثنا أبو علي الحنفي، ثنا هارون الشامي، عن الحكم، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة فذكره.

وإسناده حسن من أجل هارون الشامي، فلم أستطع تعيينه، ولكن قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 87):"رواه البزار، ورجاله ثقات" فلعله عرفه وقال أيضًا الحافظ ابن حجر في"مختصر زوائد البزار" (879):"ورجاله ثقات".

وفي الباب عن ابن عمر قال: مر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بطعام، وقد حسنه صاحبه، فأدخل يده فيه، فإذا طعام رديء، فقال:"بع هذا على حدة، وهذا على حدة. فمن غشنا فليس منا".

رواه أحمد (5113)، والبزار -كشف الأستار (1255) -، والطبراني في الأوسط (2511)
كلهم من حديث أبي معشر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وأبو معشر اسمه نجيح بن عبد الرحمن السندي ضعيف.

وفي الباب ما روي أيضًا عن أبي الحمراء قال: رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مر بجنبات رجل عنده طعام في وعاء، فأدخل يده فيه، فقال:"لعلك غششت، من غشنا فليس منا".

رواه ابن ماجه (2225) عن أبي بكر بن أبي شيبة قال: حدّثنا أبو نعيم قال: حدّثنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبي داود، عن أبي الحمراء فذكره.

ورواه القضاعي في"مسند الشهاب" (353) من وجه آخر عن أبي نعيم.

وأبو داود هو نفيع بن الحارث الأعمى المشهور بكنيته، كذبه ابن معين، وقال النسائي:"متروك". وقال ابن حبان:"يروي عن الثقات الموضوعات توهما، لا يجوز الاحتجاج به ولا الرواية عنه إلا على سبيل الاعتبار به". المجروحين (1116). وذكره أيضًا في الثقات (5/ 284).

قال البخاري:"أبو الحمراء له صحبة، ولا يصح حديثه هذا، وهذا الحديث انفرد به".

وفيه أيضًا ما روي عن أبي بردة بن نيار قال: انطلقت مع النبي صلى الله عليه وسلم إلى بقيع المصلى، فأدخل يده في طعام، ثم أخرجها، فإذا هو مغشوش أو مختلف، فقال:"من غشنا فليس منا".

رواه أحمد (15833)، والبزار -كشف الأستار (99) -، والطبراني في الكبير (22/ 521) كلهم من طريق شريك، عن عبد اللَّه بن عيسى، عن جميع بن عمير، عن خاله أبي بردة بن نيار فذكره.

وإسناه ضعيف من أجل جميع بن عمير التميمي أبو الأسود، قال البخاري:"فيه نظر". وقال ابن حبان:"كان رافضيا يضع الحديث". وأما أبو حاتم فقال:"محله الصدق".

والصواب أنه ضعيف جدا؛ فإنه شيعي رافضي محترق، وشريك هو ابن عبد اللَّه النخعي سيء الحفظ، إلا أنه توبع، رواه الطبراني في الأوسط (4/ 293)، والدارقطني في"العلل" (6/ 24 - 25) عن قيس بن الربيع، عن عبد اللَّه بن عيسى، عن سعيد بن أبي بردة، عن عمه أبي بردة، فخالفه في موضعين: أحدهما في قوله: جميع بن عمير. والثاني في قوله: عن خاله.

وقد رجح ابن حجر في"الإصابة" أن أبا بردة بن نيار عم لسعيد بن عمير بن نبار، فالخطأ من شريك؛ فإنه سيء الحفظ، كما مضى.

وفي الباب أيضًا عن عبد اللَّه بن مسعود مرفوعا:"من غشنا فليس منا، والمكر والخداع في النّار".

رواه الطبراني في الكبير (10/ 138)، والصغير (1/ 261)، وأبو نعيم في"الحلية" (4/ 189)، وابن حبان في صحيحه (567)، والقضاعي في مسند الشهاب (253، 354) كلهم من طريق الفضل بن الحباب قال: حدّثنا عثمان بن الهيثم بن الجهم قال: حدّثنا أبي، عن عاصم، عن زر، عن عبد اللَّه فذكره.

قال أبو نعيم:"غريب من حديث عاصم، تفرّد به عثمان، ولم نكتبه إلا من حديث الفضل بن الحباب".
قلت: وعلته عثمان بن الهيثم، فإنه مع صدقه تغير فصار يتلقن. والراوي عنه الفضل بن الحباب سمع منه بعد ما تغير، وأبوه الهيثم بن الجهم لم يرو عنه إلا ابنه عثمان، ولم يوثّقه أحد فهو مجهول.

وأما قول أبي حاتم فيه كما في"الجرح والتعديل" (9/ 83):"لم أر في حديثه مكروها" فليس توثيقا له، وإنما فيه الإشارة إلى أن ما يرويه يوافق حديث غيره. وليس كل من يروي حديثا موافقا لغيره ثقة، فقد يخطئ في عزو الحديث إلى غير صاحبه.

وفي الباب أحاديث أخرى لا تصح، إنما الصحيح ما ذكرناه.

وأما قوله صلى الله عليه وسلم:"من غشنا فليس منا" فمعناه أنه ليس على سيرتنا وهدينا، وهي الصدق والوفاء.

وأما من حمله على أنه خرج من ملتنا فهو خطأ.

وأما ما جاء عن سفيان الثوري أنه كان يكره تفسير"ليس منا" ليس مثلنا، كما ذكره أبو داود (3/ 732)، فكان مراده أن يترك ذلك ليكون أوقع في النفوس، وأبلغ في الزجر، لا أنه كان يكفره، ويخرجه عن الملة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে প্রতারণা করে, সে আমাদের দলভুক্ত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5546)


5546 - عن أبي هريرة قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"الحلف منفقة للسلعة ممحقة للبركة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2087)، ومسلم في المساقاة (1606) من طريق يونس، عن ابن شهاب، عن ابن المسيب أن أبا هريرة قال فذكره. واللّفظ للبخاريّ. ولفظ مسلم"ممحقة للربح".

قوله:"منفقة" بفتح الميم والفاء، بينهما نون ساكنة، مفعلة من النفاق -بفتح النون- وهو الرواج ضد الكساد.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: কসম (শপথ) পণ্যের কাটতি বাড়ায়, কিন্তু তা বরকতকে নষ্ট করে দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5547)


5547 - عن أبي هريرة يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ثلاثة لا ينظر اللَّه إليهم يوم القيامة ولا يزكيهم ولهم عذاب أليم: رجل كان له فضل ماء بالطريق فمنعه من ابن السبيل، ورجل بايع إماما لا يبايعه إلا لدنيا، فإن أعطاه منها رضي، وإن لم يعطه منها سخط، ورجل أقام سلعته بعد العصر، فقال: واللَّه الذي لا إله غيره لقد أعطيت بها كذا وكذا فصدقه رجل" ثم قرأ هذه الآية {إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا} [سورة آل عمران: 77].

متفق عليه: رواه البخاريّ في المساقاة (2358) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا عبد الواحد بن زياد، عن الأعمش قال: سمعت أبا صالح يقول: سمعت أبا هريرة فذكر الحديث.

ورواه مسلم في الإيمان (108) من وجه آخر عن الأعمش، فذكر نحوه، ولم يذكر في حديثه آية سورة آل عمران.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তিন শ্রেণীর লোক আছে, যাদের প্রতি আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিন (দয়ার) দৃষ্টি দেবেন না এবং তাদেরকে পবিত্রও করবেন না। আর তাদের জন্য রয়েছে যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি:
১. যে ব্যক্তি পথের পাশে অতিরিক্ত পানির মালিক ছিল, কিন্তু মুসাফিরকে তা ব্যবহার করতে দেয়নি।
২. আর যে ব্যক্তি কোনো শাসকের নিকট কেবল পার্থিব স্বার্থের জন্য বাইয়াত গ্রহণ করে; যদি শাসক তাকে কিছু দেন, তবে সে সন্তুষ্ট থাকে, আর যদি না দেন, তবে সে অসন্তুষ্ট হয়।
৩. আর যে ব্যক্তি আসরের পরে তার পণ্য দাঁড় করিয়ে (বিক্রির জন্য পেশ করে) বলল, 'আল্লাহর শপথ, যিনি ছাড়া অন্য কোনো উপাস্য নেই, আমি এটি এত এত মূল্যে কেনার প্রস্তাব পেয়েছি।' আর একজন লোক তাকে বিশ্বাস করল (এবং সেটি কিনে নিল)।"
অতঃপর তিনি এই আয়াতটি পাঠ করলেন: "নিশ্চয় যারা আল্লাহর অঙ্গীকার এবং তাদের শপথের বিনিময়ে সামান্য মূল্য ক্রয় করে..." [সূরা আলে ইমরান: ৭৭]।









আল-জামি` আল-কামিল (5548)


5548 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أربعة يبغضهم اللَّه عز وجل: البياع الحلاف، والفقير المختال، والشيخ الزاني، والإمام الجائر".

صحيح: رواه النسائي (2576) عن أبي داود قال: حدّثنا عارم قال: حدّثنا حماد قال: حدّثنا عبيد اللَّه بن عمر، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “চার ব্যক্তিকে আল্লাহ তা‘আলা (আযযা ওয়া জাল্লা) ঘৃণা করেন: খুব বেশি কসমকারী বিক্রেতা, অহংকারী দরিদ্র ব্যক্তি, ব্যভিচারী বৃদ্ধ এবং অত্যাচারী শাসক।”









আল-জামি` আল-কামিল (5549)


5549 - عن أبي ذر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ثلاثة لا يكلمهم اللَّه يوم القيامة ولا ينظر إليهم ولا يزكيهم ولهم عذاب أليم" قال: فقرأها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ثلاث مرار. قال أبو ذر: خابوا وخسروا، من هم يا رسول اللَّه؟ قال:"المسبل، والمنان، والمنفق سلعته بالحلف الكاذب".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (106) من طرق عن محمد بن جعفر، عن شعبة، عن علي بن مدرك، عن أبي زرعة، عن خرشة بن الحر، عن أبي ذر فذكره.

وفي رواية:"والمنفق سلعته بالحلف الفاجر، والمسبل إزاره".

والمنفِّق بالتشديد من النفاق، وهو ضد الكساد.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তিন শ্রেণির লোক, যাদের সাথে আল্লাহ কিয়ামতের দিন কথা বলবেন না, তাদের দিকে তাকাবেন না এবং তাদেরকে পবিত্র করবেন না; আর তাদের জন্য রয়েছে যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি।” বর্ণনাকারী বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কথাটি তিনবার পাঠ করলেন। আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তারা তো ব্যর্থ ও ক্ষতিগ্রস্ত! হে আল্লাহর রাসূল, তারা কারা? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি (অহংকারবশত) পায়ের গোড়ালির নিচে কাপড় টেনে পরে (আল-মুসবিল), যে ব্যক্তি (দান বা অনুগ্রহ করে) খোটা দেয় (আল-মান্নান) এবং যে মিথ্যা কসম খেয়ে নিজের পণ্য বিক্রি করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (5550)


5550 - عن مطرف بن عبد اللَّه بن الشخير قال: بلغني عن أبي ذر حديث، فكنت أحب أن ألقاه، فلقيته، فقلت له: يا أبا ذر، بلغني عنك حديث، فكنت أحب أن ألقاك فأسألك عنه، فقال: قد لقيت فاسأل. قال: قلت: بلغني أنك تقول: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ثلاثة يحبهم اللَّه، وثلاثة يبغضهم اللَّه" قال: نعم، فما إخالُني أكذب على خليلي محمد صلى الله عليه وسلم. -ثلاثا يقولها-

قال: قلت: من الثلاثة الذين يحبهم اللَّه عز وجل؟ قال:"رجل غزا في سبيل اللَّه، فلقي العدو مجاهدا محتسبا، فقاتل حتى قتل، وأنتم تجدون في كتاب اللَّه عز وجل {إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الَّذِينَ يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِهِ صَفًّا} [سورة الصف: 4]، ورجل له جار يؤذيه، فيصبر على أذاه، ويحتسبه حتى يكفيه اللَّه إياه بموت أو حياة، ورجل يكون مع قوم فيسيرون حتى يشق عليهم الكرى أو النعاس، فينزلون في آخر الليل، فيقوم إلى وضوئه وصلاته".

قال: قلت: من الثلاثة الذين يبغضهم اللَّه؟ قال:"الفخور المختال، وأنتم تجدون في كتاب اللَّه عز وجل {إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍ فَخُورٍ} [سورة لقمان: 18]، والبخيل المنان، والتاجر -أو البياع- الحلاف".

قال: قلت: يا أبا ذر، ما المال؟ قال: فِرقٌ لنا وذودٌ -يعني بالفِرق غنمًا يسيرة-. قال: قلت: لست عن هذا أسأل، إنما أسألك عن صامت المال. قال: ما
أصبح لا أمسى، وما أمسى لا أصبح. قال: قلت: يا أبا ذر، ما لك ولإخوتك قريش؟ قال: واللَّه لا أسألهم دنيا، ولا أستفتيهم عن دين اللَّه حتى ألقى اللَّه ورسوله. ثلاثا يقولها.

صحيح: رواه أحمد (21530)، والطبراني في الكبير (2/ 161)، والحاكم (2/ 88 - 89)، والبيهقي (9/ 160) كلهم من طريق الأسود بن شيبان، عن يزيد بن أبي العلاء، عن مطرف بن عبد اللَّه بن الشخير فذكره. واللّفظ لأحمد.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم". وهو كما قال.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুতাররিফ ইবনু আবদুল্লাহ ইবনুশ শিখখীর বলেন: আমার নিকট তাঁর থেকে একটি হাদীস পৌঁছেছিল। তাই আমি তাঁর সঙ্গে সাক্ষাৎ করার আকাঙ্ক্ষা করতাম। আমি তাঁর সঙ্গে সাক্ষাৎ করে বললাম: হে আবু যর! আপনার থেকে আমার নিকট একটি হাদীস পৌঁছেছে। আমি আপনার সঙ্গে সাক্ষাৎ করে তা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে চেয়েছিলাম। তিনি বললেন: আপনি সাক্ষাৎ করেছেন, এখন জিজ্ঞাসা করুন। আমি বললাম: আমার নিকট পৌঁছেছে যে, আপনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তিন ধরনের মানুষকে আল্লাহ ভালোবাসেন এবং তিন ধরনের মানুষকে আল্লাহ ঘৃণা করেন।" তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমার বন্ধু মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর আমি মিথ্যা আরোপ করি বলে মনে করি না। – তিনি এ কথাটি তিনবার বললেন।

আমি বললাম: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল যেসব মানুষকে ভালোবাসেন, তারা কারা? তিনি বললেন: "১. সেই ব্যক্তি যে আল্লাহর রাস্তায় যুদ্ধ করেছে, অতঃপর সে শত্রু বাহিনীর মুখোমুখি হয়েছে, জিহাদকারী ও সাওয়াবের আশায় যুদ্ধ করেছে, পরিশেষে সে শহীদ হয়েছে। তোমরা তো আল্লাহর কিতাবে পাও: {নিশ্চয়ই আল্লাহ তাদেরকে ভালোবাসেন, যারা তাঁর পথে সারিবদ্ধ হয়ে যুদ্ধ করে} [সূরা আস-সাফ: ৪]। ২. সেই ব্যক্তি যার একজন প্রতিবেশী আছে যে তাকে কষ্ট দেয়, আর সে তার কষ্টের উপর ধৈর্য ধারণ করে এবং সাওয়াবের আশা রাখে, যতক্ষণ না আল্লাহ তার জন্য মৃত্যু বা জীবনের মাধ্যমে এর সমাধান করে দেন। ৩. সেই ব্যক্তি যে একদল লোকের সঙ্গে থাকে এবং তারা পথ চলতে থাকে, এমনকি তাদের ওপর ঘুম বা তন্দ্রা কঠিন হয়ে যায়। এরপর তারা রাতের শেষভাগে বিশ্রাম গ্রহণ করে, অতঃপর সে উঠে ওযু করে এবং সালাত (নামাজ) আদায় করে।"

আমি বললাম: আল্লাহ যেসব মানুষকে ঘৃণা করেন, তারা কারা? তিনি বললেন: "১. অহংকারী, আত্ম-গর্বিত ব্যক্তি (আল-ফাখূর আল-মুখতাল)। তোমরা তো আল্লাহর কিতাবে পাও: {নিশ্চয়ই আল্লাহ কোনো দাম্ভিক, অহংকারীকে পছন্দ করেন না} [সূরা লুকমান: ১৮]। ২. কৃপণ, খোঁটা দানকারী ব্যক্তি (আল-বাখীল আল-মান্নান)। ৩. সেই ব্যবসায়ী—অথবা বিক্রেতা—যে (মিথ্যা) কসমকারী।"

আমি বললাম: হে আবু যর! সম্পদ কী? তিনি বললেন: 'আমাদের জন্য কিছু মেষ ও কিছু উট।' আমি বললাম: আমি এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করছি না, আমি তো স্থির সম্পদ (নগদ অর্থ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করছি। তিনি বললেন: 'যা সকালে থাকে, তা সন্ধ্যায় থাকে না; আর যা সন্ধ্যায় থাকে না, তা সকালে থাকে না।' আমি বললাম: হে আবু যর! আপনার ও আপনার কুরাইশী ভাইদের মধ্যে কী হয়েছে? তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! আমি তাদের নিকট দুনিয়া চাইব না এবং আল্লাহর দ্বীন সম্পর্কে তাদের কাছে কোনো ফতোয়াও জিজ্ঞেস করব না, যতক্ষণ না আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের সঙ্গে মিলিত হই। তিনি এ কথাটি তিনবার বললেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5551)


5551 - عن عبد اللَّه بن أبي أوفى أن رجلا أقام سلعة وهو في السوق، فحلف باللَّه لقد أعطى بها ما لم يعط؛ ليوقع فيها رجلا من المسلمين فنزلت: {إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا} [سورة آل عمران: 77].

صحيح: رواه البخاريّ في البيوع (2088) عن عمرو بن محمد، حدّثنا هشيم، أخبرنا العوام، عن إبراهيم بن عبد الرحمن، عن عبد اللَّه بن أبي أوفى.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একবার এক ব্যক্তি বাজারে একটি পণ্য দাঁড় করালো (বিক্রির জন্য রাখলো) এবং আল্লাহর নামে কসম করে বলল যে তাকে এর জন্য এমন দাম দেওয়া হয়েছে যা আসলে দেওয়া হয়নি— (সে এমনটি করেছিল) যাতে সে একজন মুসলিমকে প্ররোচিত করতে পারে। তখন এই আয়াতটি নাযিল হয়: {নিশ্চয় যারা আল্লাহর অঙ্গীকার এবং তাদের কসমের বিনিময়ে সামান্য মূল্য গ্রহণ করে} [সূরা আলে ইমরান: ৭৭]।









আল-জামি` আল-কামিল (5552)


5552 - عن أبي قتادة الأنصاري أنه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إياكم وكثرة الحلف في البيع؛ فإنه يُنَفِّق، ثم يمحق".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1607) من طريق أبي أسامة (وهو حماد بن أسامة)، عن الوليد بن كثير، عن معبد بن كعب بن مالك، عن أبي قتادة الأنصاري فذكره.




আবূ কাতাদাহ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "তোমরা বেচা-কেনায় অতিরিক্ত কসম করা থেকে সাবধান থাকো। কেননা তা বিক্রয়কে সচল করে (মাল চালিয়ে দেয়), কিন্তু পরে বরকত নষ্ট করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5553)


5553 - عن عبد الرحمن بن شبل قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن التجار هم الفجار". قيل: يا رسول اللَّه، أو ليس قد أحل اللَّه البيع؟ قال:"بلى، ولكنهم يحدثون فيكذبون، ويحلفون فيأثمون".

صحيح: رواه أحمد (15530)، والحاكم (2/ 6 - 7)، وعنه البيهقي في كتاب الآداب (1100)، وشعب الإيمان (4/ 218) من طريق هشام الدستوائي قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، عن أبي راشد الحبراني قال: قال عبد الرحمن بن شبل فذكره.

وقد صرّح يحيى بن أبي كثير سماعه من أبي راشد الحبراني عند الحاكم.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح".

وهو كما قال. ولكن رواه أبان (وهو ابن يزيد العطار) عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد، عن أبي سلام، عن أبي راشد الحبراني بإسناده.

ومن هذا الطريق رواه أحمد (15669)، والبيهقي في شعب الإيمان.
وكذلك رواه علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلام، عن أبي سلّام، عن أبي راشد فذكره. ومن طريقه رواه البيهقي في شعب الإيمان، وذكره في كتاب الآداب.

وقال في شعب الإيمان: وخالفهما هشام الدستوائي، فرواه عن يحيى، عن أبي راشد، وذكر فيه سماعه من أبي راشد. انتهى.

وقال في كتاب الآداب:"هشام أحفظ".

قلت: اختلف في سماع يحيى بن أبي كثير عن أبي راشد، فأثبته أبو حاتم، وصحح هذا الإسناد في"كتاب العلل" (2/ 63) في متن حديث آخر.

وهو الحديث الذي رواه وهيب، عن أيوب، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي راشد، عن عبد الرحمن بن شبل، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اقرؤوا القرآن". قال أبو حاتم:"رواه بعضهم، فقال: عن يحيى، عن زيد بن سلام، عن أبي سلام، عن أبي راشد الحبراني، عن عبد الرحمن بن شبل، عن النبي صلى الله عليه وسلم. كلاهما صحيح، غير أن أيوب ترك من الإسناد رجلين". انتهى.

قلت: يحيى بن أبي كثير اليمامي أحد الأعلام، وقد روى عن جماعة من الصحابة، منهم جابر، وأنس، وأبو أمامة، وحديثه عنهم في صحيح مسلم، انظر"جامع التحصيل" (880) إلا أنه كثير التدليس، لكنه صرح بسماعه من أبي راشد في مستدرك الحاكم، كما مضى.

ولا خلاف في سماعه من زيد بن سلام، فإن كان في الإسناد الأول انقطاع فقد ثبت بالإسناد الثاني. والحمد للَّه.




আব্দুর রহমান ইবনু শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই ব্যবসায়ীরা হলো পাপাচারী (ফুঁজ্জার)।" জিজ্ঞেস করা হলো, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহ কি বেচাকেনা হালাল করেননি?" তিনি বললেন: "অবশ্যই করেছেন, কিন্তু তারা (কথাবার্তা বলার সময়) মিথ্যা বলে এবং কসম করার সময় পাপাচারে লিপ্ত হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5554)


5554 - عن سلمان قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ثلاثة لا ينظر اللَّه إليهم يوم القيامة: أشيمط زان، وعائل مستكبر، ورجل جعل اللَّه له بضاعة لا يشتري إلا بيمينه، ولا يبيع إلا بيمينه".

صحيح: رواه الطبراني في المعجم الكبير (6/ 301) عن محمد بن عبد اللَّه الحضرمي، ثنا سعيد بن عمرو الأشعثي، ثنا حفص بن غياث، عن عاصم الأحول، عن أبي عثمان (النهدي)، عن سلمان فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه الطبراني أيضًا في الصغير والأوسط إلا أنه قال فيه:"ثلاثة لا يكلهم اللَّه، ولا يزكيهم، ولهم عذاب أليم".

وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 78):"رجاله رجال الصحيح".

وقوله:"أشيمط" تصغير أشمط، وهو بياض شعر الرأس، ومعناه شيخ زان.




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন শ্রেণির মানুষের দিকে আল্লাহ্ কিয়ামতের দিন দৃষ্টিপাত করবেন না: ব্যভিচারী বৃদ্ধ, দরিদ্র হওয়া সত্ত্বেও অহংকারী ব্যক্তি এবং সেই ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ্ সম্পদ দিয়েছেন, অথচ সে কসম করে ছাড়া কেনে না এবং কসম করে ছাড়া বেচে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (5555)


5555 - عن أبي سعيد قال: مَرَّ أعرابي بشاة، فقلت: تبيعنيها بثلاثة دراهم؟ قال: لا واللَّه، ثم باعنيها، فذكرت ذلك لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"باع آخرته بدنياه".
حسن: رواه ابن حبان (4909) عن عبد اللَّه بن صالح البخاري ببغداد، قال: حدّثنا يعقوب بن حُميد بن كاسب، قال: حدّثنا ابن أبي فديك، عن ربيعة بن عثمان، عن محمد بن المنكدر، عن ربيعة بن عبد اللَّه بن الهدير، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن أبي فديك، وهو محمد بن إسماعيل بن مسلم بن أبي فديك -مصغرا- الديلي، حسن الحديث.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন বেদুঈন একটি ছাগল নিয়ে যাচ্ছিল। আমি বললাম: তুমি কি এটি আমার কাছে তিন দিরহামে বিক্রি করবে? সে বলল: না, আল্লাহর শপথ। এরপর সে সেটি আমার কাছে বিক্রি করে দিল। অতঃপর আমি বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলাম। তখন তিনি বললেন: "সে তার দুনিয়ার বিনিময়ে তার আখিরাত বিক্রি করে দিয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5556)


5556 - عن قيس بن أبي غرزة قال: كنا في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نسمى السماسرة، فمر بنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فسمانا باسم هو أحسن، فقال:"يا معشر التجار، إن البيع يحضره اللغو والحلف فشوبوه بالصدقة".

صحيح: رواه أبو داود (3326)، والترمذي (1208)، والنسائي (3797)، وابن ماجه (2145)، وأحمد (16134) كلهم من طرق عن أبي وائل شقيق بن سلمة، عن قيس بن أبي غرزة فذكره.

وإسناده صحيح، وصحّحه أيضًا الحاكم (2/ 5)، وقال:"ولم يخرجاه لما قدمت ذكره من تفرّد أبي وائل بالرواية عن قيس بن أبي غرزة، وهكذا رواه منصور بن المعتمر، والمغيرة بن مقسم، وحبيب بن أبي ثابت، عن أبي وائل". ثم أخرج أحاديثهم نحوه.

وقال الترمذيّ:"حسن صحيح". وقال:"ولا نعرف لقيس عن النبي صلى الله عليه وسلم غير هذا". ثم رواه من وجه آخر عن الأعمش، عن شقيق بن أبي سلمة، عن قيس بن أبي برزة، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه بمعناه، وقال:"حديث صحيح".

وقوله:"كنا نسمى السماسرة" جمع سمسار بكسر السين. قال الخطابي:"هو اسم أعجمي، وكان كثير ممن يعالج البيع والشراء فيهم العجم، فتلقوا هذا الاسم عنهم، فغيره النبي صلى الله عليه وسلم بالتجار الذي هو من الأسماء العربية".

وقوله:"فشوبوه" بضم الشين، أمر من الشوب بمعنى الخلط، أمرهم بذلك ليكون كفارة لما يجري بينهم الكذب وغيره.




কাইস ইবন আবী গারজাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সামাসিরাহ (দালাল/মধ্যস্থতাকারী) নামে পরিচিত ছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন এবং আমাদেরকে এমন একটি নাম দিলেন যা আরও উত্তম। অতঃপর তিনি বললেন: "হে বণিক সম্প্রদায়, নিশ্চয়ই বেচা-কেনার সময় (অপ্রয়োজনীয়) বাজে কথা ও কসম এসে যায়। সুতরাং তোমরা এর সাথে সাদাকা মিশিয়ে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (5557)


5557 - عن البراء بن عازب قال: قال أتانا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى البقيع، فقال:"يا معشر التجار" حتى إذا اشرأبوا قال:"إن التجار يحشرون يوم القيامة فُجَّارا إلا من اتقى وبر وصدق".

حسن: رواه البيهقي في شعب الإيمان (4507) عن أبي عبد اللَّه الحافظ، حدثني مكرم بن أحمد ابن مكرم القاضي، حدّثنا أبو العباس أحمد بن سعيد الجمال، حدّثنا عبد اللَّه بن بكر السهمي، حدّثنا حاتم بن أبي صغيرة، عن عمرو بن دينار، عن البراء، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي العباس أحمد بن سعيد الجمال، فإنه حسن الحديث، ترجم له الخطيب في تاريخه (4/ 170) وقال:"وكان ثقة حسن الحديث" مات سنة (278 هـ).

وحاتم بن أبي صغيرة - أبو صغيرة اسمه مسلم، وهو جده لأمه، وقيل: زوج أمه.

وفي معناه ما روي عن إسماعيل بن عبيد بن رفاعة، عن أبيه، عن جده قال: خرجنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى المصلى، فرأى النّاس يبتاعون، فقال:"يا معشر التجارة" فاستجابوا لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ورفعوا أعناقهم وأبصارهم إليه، فقال:"إن التجار يبعثون يوم القيامة فجارا إلا من اتقى، وبرّ، وصدق".

رواه الترمذيّ (1210)، وابن ماجه (2146)، والدارمي (2580)، وصحّحه ابن حبان (4910)، والحاكم (2/ 6) كلهم من حديث عبد اللَّه بن عثمان بن خثيم، عن إسماعيل بن عبيد بن رفاعة بإسناده، فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح". وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: لكن فيه إسماعيل بن عبيد بن رفاعة، لم يرو عنه غير ابن خثيم، كما قال البخاري في التاريخ، ولم يوثّقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في ثقاته (6/ 28)، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد متابعا، ويشهد له ما سبق.

وفي الباب أيضًا ما روي عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"التاجر الصدوق الأمين مع النبيين والصديقين والشهداء".

رواه الترمذيّ (1209)، والدارقطني (2813)، والدارمي (2851)، والحاكم (2/ 6) كلهم من طريق سفيان، عن أبي حمزة، عن الحسن، عن أبي سعيد فذكره.

قال الترمذيّ:"حديث حسن، لا نعرفه إلا من هذا الوجه من حديث الثوري، عن أبي حمزة، وأبو حمزة اسمه عبد اللَّه بن جابر، وهو شيخ بصري".

قلت: والحسن -وهو البصري- كثير التدليس والإرسال، وقد ذكر علي بن المديني أن أبا سعيد الخدري ممن لم يسمع منه الحسن، ففيه انقطاع.

وفي الباب أيضًا ما روي عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"التاجر الأمين الصدوق المسلم مع الشهداء يوم القيامة".

رواه ابن ماجه (2139)، والدارقطني (2812)، والحاكم (2/ 6) كلهم من حديث كلثوم بن جوشن القشيري، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

قال ابن أبي حاتم (1156): سألت أبي عن هذا الحديث، فقال:"هذا حديث لا أصل له، وكلثوم ضعيف الحديث".

قلت: كلثوم بن جوشن مختلف فيه، فوثّقه البخاري، وقال ابن معين:"لا بأس به". وضعفه أبو داود، فقال:"منكر الحديث". وذكره ابن حبان في الثقات، وأعاده في المجروحين، فقال:
"ممن يروي عن الثقات المقلوبات، وعن الأثبات الموضوعات". فالغالب على حديثه ضعف، وقال عنه الحافظ:"ضعيف".




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট বাকী' (কবরস্থান)-এ এলেন, অতঃপর বললেন: "হে বণিক সমাজ!" অতঃপর যখন তারা (মনোযোগের সাথে) কান খাড়া করল, তিনি বললেন: "নিশ্চয় ব্যবসায়ীরা কিয়ামতের দিন ফাসিক (পাপী/দুষ্কৃতিকারী) রূপে উত্থিত হবে। তবে যারা আল্লাহকে ভয় করে (তাকওয়া অবলম্বন করে), সৎ কাজ করে এবং সত্যবাদী হয়, তারা ব্যতীত।"









আল-জামি` আল-কামিল (5558)


5558 - عن عطاء بن يسار قال: لقيت عبد اللَّه بن عمرو بن العاص رضي الله عنهما قلت: أخبرني عن صفة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في التوراة. قال:"أجل، واللَّه إنه لموصوف في التوراة ببعض صفته في القرآن {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذِيرًا} [سورة الأحزاب: 45] وحِرزا للأميين، أنت عبدي ورسولي، سميتك المتوكل، ليس بفظ، ولا غليظ، ولا سحاب في الأسواق، ولا يدفع بالسيئة السيئة، ولكن يعفو، ويغفر، ولن يقبضه اللَّه حتى يقيم به الملة العوجاء بأن يقولوا لا إله إلا اللَّه، ويفتح بها أعين عمي، وآذان صم، وقلوب غلف.

صحيح: رواه البخاريّ في البيوع (2125) عن محمد بن سنان، حدّثنا فليح، حدّثنا هلال، عن عطاء بن يسار قال فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আতা ইবনু ইয়াসার তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিলেন): রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তাওরাতে বর্ণিত গুণাবলী সম্পর্কে আমাকে অবহিত করুন। তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু আমর) বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর শপথ! তাওরাতে তাঁর কিছু গুণাবলীর বর্ণনা আছে, যা কুরআনেও বর্ণিত হয়েছে: "হে নবী! আমি আপনাকে সাক্ষী, সুসংবাদদাতা ও সতর্ককারী রূপে প্রেরণ করেছি।" (সূরা আহযাব: ৪৫) এবং উম্মীদের (নিরক্ষর জাতিদের) জন্য রক্ষক। আপনি আমার বান্দা ও আমার রাসূল। আমি আপনার নাম দিয়েছি আল-মুতাওয়াক্কিল (আল্লাহর উপর নির্ভরশীল)। তিনি কঠোর নন, রুক্ষ মেজাজের নন এবং বাজারে চেঁচামেচি করেন না। তিনি মন্দ দ্বারা মন্দকে প্রতিহত করেন না; বরং ক্ষমা করে দেন এবং মার্জনা করেন। আল্লাহ্ তাঁকে মৃত্যু দেবেন না যতক্ষণ না তিনি তাঁর দ্বারা বক্র ধর্মকে প্রতিষ্ঠিত করেন, যাতে তারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' (আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ্ নেই) বলে। আর এর দ্বারা তিনি অন্ধ চোখ, বধির কান এবং আবৃত হৃদয় উন্মোচন (মুক্ত) করবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5559)


5559 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن الشراء والبيع في المسجد، وأن تنشد فيه ضالة، وأن ينشد فيه شعر، ونهى عن التحلق قبل الصلاة يوم الجمعة.

حسن: رواه أبو داود (1079)، والترمذي (322)، والنسائي (716)، وابن ماجه (749)، وصحّحه ابن خزيمة (1306) كلهم من طرق عن محمد بن عجلان، عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.

وفي الباب ما روي عن أبي هريرة مرفوعا:"إذا رأيتم من يبيع أو يبتاع في المسجد فقولوا: لا أربح اللَّه تجارتك، وإذا رأيتم من ينشد فيه ضالة فقولوا: لا رد اللَّه عليك".

رواه الترمذيّ (1321)، وابن خزيمة (1305)، وابن حبان (1650)، والحاكم (2/ 56) كلهم من طرق عن عبد العزيز بن محمد، أخبرنا يزيد بن خصيفة، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبي هريرة. فذكره. قال الترمذيّ:"حسن غريب".

قلت: وهو كما قال؛ فإن عبد العزيز بن محمد -وهو الدراوردي- مختلف فيه، غير أنه صدوق، وقد اختلف عليه في وصله وإرساله:

فرواه عارم -وهو محمد بن الفضل-، وسعيد بن سليمان، عن الدراوردي، عن يزيد بن
خصيفة، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبي هريرة موصولا.

ورواه يعقوب الدورقي، وابن أبي مذعور، عن الدراوردي، عن يزيد بن خصيفة، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان قال: لا أعلمه إلا عن أبي هريرة. هكذا بالشك عن أبي هريرة.

ورواه سعيد بن منصور، وعبد الأعلى بن حماد، عن الدراوردي مرسلا.

ورواه الثوري عن يزيد بن خصيفة، واختلف عليه: فرواه سيف بن محمد، عن الثوري، عن يزيد بن خصيفة، عن ابن ثوبان، عن أبيه موصولا.

وخالفه عبد الرحمن بن مهدي، فرواه عن الثوري، عن يزيد بن خصيفة، عن ابن ثوبان مرسلا. والحق معه لقوته، ولاختلافه على الدراوردي. ولذا رجح الدارقطني الإرسال. انظر"العلل" (10/ 65).

قال الترمذيّ:"وقد كره قوم من أهل العلم البيع والشراء في المسجد، وبه يقول أحمد، وإسحاق.

وقد روي عن بعض أهل العلم من التابعين رخصة في البيع والشراء في المسجد". انتهى.

إلا أنه وقع الإجماع على أن من باع في المسجد شيئًا فبيعه صحيح لتوفر شروط البيوع، ولكن ترفع عنه البركة لدعاء النبي صلى الله عليه وسلم عليه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে ক্রয়-বিক্রয় করতে, তাতে হারানো বস্তুর ঘোষণা দিতে এবং কবিতা আবৃত্তি করতে নিষেধ করেছেন। আর তিনি জুমুআর দিন সালাতের পূর্বে (গোল হয়ে) বসতেও নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5560)


5560 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أد الأمانة إلى من ائتمنك، ولا تخن من خانك".

حسن: رواه أبو داود (3535)، والترمذي (1264)، والدارقطني (3/ 35)، والحاكم (2/ 46) كلهم من طريق شريك وقيس، كلاهما عن أبي حصين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

قال الترمذيّ:"حسن غريب".

وقال الحاكم:"حديث شريك عن أبي حصين صحيح على شرط مسلم".

قلت: شريك سيء الحفظ، وتابعه قيس، وهو ابن الربيع، وهو ضعيف أيضًا، ولكن متابعة بعضهم لبعض تقويه إذ ليس أحد منهما متهما، وإنما أخذ عليهما سوء حفظهما.

وفي الباب ما روي عن يوسف بن ماهك قال: كنت أنا ورجل من قريش نلي مال أيتام. قال: وكان رجل قد ذهب مني بألف درهم. قال: فوقعت له في يدي ألف درهم. قال: فقلت للقرشي: إنه قد ذهب لي بألف درهم، وقد أصبت له ألف درهم. قال: فقال القرشي: حدثني أبي أنه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"أد الأمانة إلى من ائتمنك، ولا تخن من خانك".

رواه أحمد (15424) عن محمد بن أبي عدي، عن حميد، عن رجل من أهل مكة يقال له يوسف، قال فذكره.

ورواه أبو داود (3534) عن أبي كامل أن يزيد بن زريع حدثهم، حدّثنا حميد -يعني الطويل-،
عن يوسف بن ماهك المكي قال: كنت أكتب لفلان نفقة أيتام كان وليهم، فغالطوه بألف درهم، فأداها إليهم، فأدركت لهم من مالهم مثليها. قال: قلت: أقبض الألف الذي ذهبوا به منك. قال: لا، حدثني أبي أنه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول فذكر الحديث.

وفيه جهالة ابن الصحابي الذي روى عنه يوسف بن ماهك.

ورواه الدارقطني (3/ 35) من طريق حميد الطويل، عن يوسف بن يعقوب، عن رجل من قريش، عن أبي بن كعب قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول فذكر الحديث.

وللحديث شواهد أخرى عن أنس، وغيره، وفي كله كلام.

ومن قال بظاهر الحديث نهى أن يأخذ أحد شيئًا مما وقع في يده من مال الخائن. ومن لم يأخذ به رخص أن يأخذ ما وقع في يده من مال الخائن بقدر حقه، وحملوا النهي على الزيادة من حقه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে তোমাকে বিশ্বাস করে আমানত রেখেছে, তুমি তার আমানত আদায় করো। আর যে তোমার সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করেছে, তুমি তার সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করো না।"