হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5561)


5561 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اجتنبوا السبع الموبقات". قالوا: يا رسول اللَّه، وما هن؟ قال:"الشرك باللَّه، والسحر، وقتل النفس التي حرم اللَّه إلا بالحق، وأكل الربا، وأكل مال اليتيم، والتولي يوم الزحف، وقذف المحصنات المؤمنات الغافلات".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الوصايا (2766)، ومسلم في الإيمان (89) من طريق سليمان بن بلال، عن ثور بن زيد، عن أبي الغيث (هو سالم مولى ابن مطيع)، عن أبي هريرة قال فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা সাতটি ধ্বংসকারী বিষয় থেকে দূরে থাকো।" সাহাবীরা বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! সেগুলো কী কী? তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, যাদু করা, আল্লাহ্ যার হত্যা নিষেধ করেছেন, যথার্থ কারণ (হক) ছাড়া তাকে হত্যা করা, সুদ খাওয়া, ইয়াতীমের মাল ভক্ষণ করা, যুদ্ধের দিন (শত্রুর দিকে পিঠ দেখিয়ে) পলায়ন করা এবং সতী-সাধ্বী, সরলমনা মুমিন মহিলাদের প্রতি অপবাদ আরোপ করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (5562)


5562 - عن عون بن أبي جحيفة قال: رأيت أبي اشترى عبدا حجاما، فأمر بمحاجمه، فكُسِرَتْ، فسألته، فقال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن ثمن الكلب، وثمن الدم، ونهى عن الواشمة، والموشومة، وآكل الربا، ومؤكله، ولعن المصور.

صحيح: رواه البخاريّ في البيوع (2238) عن حجاج بن منهال، حدّثنا شعبة، قال: أخبرني
عون بن أبي جحيفة، قال: فذكره.




আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তাঁর পুত্র আউন ইবনে আবী জুহাইফা বলেন, আমি আমার পিতাকে দেখলাম, তিনি রক্তমোক্ষণকারী একজন ক্রীতদাস কিনলেন এবং তার রক্তমোক্ষণের সরঞ্জামগুলো ভেঙে ফেলার নির্দেশ দিলেন। আমি তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুকুরের মূল্য এবং রক্তের মূল্য (গ্রহণ করতে) নিষেধ করেছেন। তিনি উলকি অঙ্কনকারী ও যার জন্য উলকি অঙ্কন করা হয়— তাদেরকে নিষেধ করেছেন। আর তিনি সূদখোর ও সূদ প্রদানকারীকে নিষেধ করেছেন এবং তিনি ছবি অঙ্কনকারীকে লা'নত করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5563)


5563 - عن سمرة بن جندب قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"رأيت الليلة رجلين أتياني، فأخرجاني إلى أرض مقدسة، فانطلقنا حتى أتينا على نهر من دم، فيه رجل قائم، وعلى وسط النهر رجل بين يديه حجارة، فأقبل الرجل الذي في النهر، فإذا أراد الرجل أن يخرج رمي الرجل بحجر في فيه، فرده حيث كان، فجعل كلما جاء ليخرج رمي في فيه بحجر، فيرجع كما كان. فقلت: ما هذا؟ فقال: الذي رأيته في النهر آكل الربا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2085) ومسلم في الفضائل (2275) كلاهما من حديث جرير بن حازم، حدّثنا أبو رجاء العطاردي، عن سمرة بن جندب، فذكره، واللّفظ للبخاريّ، واختصره مسلم.




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আজ রাতে আমি দু’জন লোককে দেখলাম, তারা আমার কাছে আসল এবং আমাকে একটি পবিত্র ভূমিতে নিয়ে গেল। আমরা চলতে লাগলাম, অবশেষে আমরা একটি রক্তের নদীর কাছে পৌঁছলাম, যার মধ্যে একজন লোক দাঁড়িয়ে ছিল। আর নদীর মাঝখানে তার সামনে আরেকজন লোক ছিল, যার সামনে কিছু পাথর রাখা ছিল। যে লোকটি নদীতে ছিল, সে এগিয়ে এল। যখনই লোকটি বাইরে আসার ইচ্ছা করত, তখনই অন্য লোকটি তার মুখে একটি পাথর নিক্ষেপ করত এবং তাকে তার পূর্বের জায়গায় ফিরিয়ে দিত। আর যখনই সে বের হওয়ার জন্য আসত, তখনই তার মুখে একটি পাথর নিক্ষেপ করা হতো এবং সে আগের মতো ফিরে যেত। আমি জিজ্ঞেস করলাম: এ কী? সে বলল: যাকে আপনি নদীতে দেখলেন, সে হলো সুদখোর।"









আল-জামি` আল-কামিল (5564)


5564 - عن جابر قال: لعن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم آكل الربا، وموكله، وكاتبه، وشاهديه. وقال:"هم سواء".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1598) من طريق هشيم، أخبرنا أبو الزبير، عن جابر قال فذكره.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুদ গ্রহণকারী, সুদ প্রদানকারী, এর লেখক এবং এর দুই সাক্ষীর ওপর লানত (অভিশাপ) করেছেন। তিনি বলেছেন: "তারা (পাপের ক্ষেত্রে) সকলে সমান।"









আল-জামি` আল-কামিল (5565)


5565 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: لعن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم آكل الربا، وموكله. قال: قلت: وكاتبه، وشاهديه؟ قال: إنا نحدث بما سمعنا.

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1597: 105) من طريق جرير، عن مغيرة قال: سأل شِباكٌ إبراهيمَ، فحدثنا عن علقمة، عن عبد اللَّه قال فذكره. وشِباكٌ -بكسر أوله- الضبي الكوفي الأعمى.

وزاد في السنن:"وكاتبه وشاهديه" من رواية عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن مسعود، عن أبيه.

والتحقيق أن عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن مسعود مدلس، وقد عنعن، ولم يصرح بالسماع من أبيه، وجمهور أهل العلم أنه لم يسمع من أبيه إلا أربعة أحاديث، ليس هذا منها.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুদ গ্রহণকারী এবং সুদ প্রদানকারীকে অভিশাপ দিয়েছেন। (রাবী) বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম: আর এর লেখক ও এর দুই সাক্ষী? তিনি বললেন: আমরা কেবল যা শুনেছি তাই বর্ণনা করি।









আল-জামি` আল-কামিল (5566)


5566 - عن ابن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما أحد أكثر من الربا إلا كان عاقبة أمره إلى قلة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2279)، عن العباس بن جعفر قال: حدّثنا عمرو بن عون، حدّثنا يحيى بن أبي زائدة، عن إسرائيل، عن رُكين بن الربيع بن عميلة، عن أبيه، عن ابن مسعود فذكره.

وصحّحه الحاكم (2/ 37)، ورواه من وجه آخر عن عمرو بن عون به.

وإسرائيل هو ابن يونس بن أبي إسحاق ثقة.
ورواه الإمام أحمد (3754)، وعنه الحاكم (2/ 37)، وأبو يعلى (5042)، والطبراني في الكبير (10538)، كلهم من أوجه أخرى عن شريك، عن الركين بن الربيع بإسناده مثله.

وشريك هو ابن عبد اللَّه النخعي سيء الحفظ إلا أنه توبع في الإسناد الأول.




ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে কেউ সুদের পরিমাণ বৃদ্ধি করে, তার কাজের শেষ পরিণতি স্বল্পতা বা অভাব ছাড়া আর কিছুই হয় না।









আল-জামি` আল-কামিল (5567)


5567 - عن ابن عباس قال: آخر آية نزلت على النبي صلى الله عليه وسلم آية الربا.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4544) عن قبيصة بن عقبة، حدّثنا سفيان، عن عاصم عن الشعبي، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর নাযিলকৃত সর্বশেষ আয়াত হলো রিবার (সুদের) আয়াত।









আল-জামি` আল-কামিল (5568)


5568 - عن عمر بن الخطاب قال: إن آخر ما نزل من القرآن آية الربا، وإن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قبض، ولم يفسرها، فدعوا الربا والريبة.

حسن: رواه ابن ماجه (2276) عن الخالد بن الحارث، والإمام أحمد (246) عن يحيى بن سعيد، والأصبهاني في"الترغيب والترهيب" (1405) عن عبد الوهاب بن عطاء، كلهم عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن سعيد بن المسيب، عن عمر بن الخطاب فذكره. وإسناده حسن من أجل عبد الوهاب بن عطاء الخفاف فإنه حسن الحديث إذا لم يأت بما يُنكر عليه.

وسعيد بن أبي عروبة اختلط في آخر عمره لكن عبد الوهاب بن عطاء الخفاف سمع منه قبل اختلاطه، فأثبته أحمد وغيره، ونفاه الآخرون.

وفي الباب ما روي عن علي بن أبي طالب أن النبي صلى الله عليه وسلم لعن آكل الربا، وموكله، وكاتبه، ومانع الصدقة، وكان ينهى عن النوح.

رواه النسائي (5103) -واللّفظ له-، وأبو داود (2077)، والترمذي (1119)، وابن ماجه (1935)، وأحمد (635، 660) كلهم من طرق عن الشعبي، عن الحارث، عن علي بن أبي طالب، يزيد بعضهم على بعض، وبعضهم ذكره مختصرا.

وإسناده ضعيف من أجل الحارث، وهو الأعور.

ثم اختلف على الشعبي:

فرواه جماعة عنه، عن الحارث، عن علي بن أبي طالب.

ورواه الآخرون عنه، عن الحارث، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يذكروا عليا.

قال الدارقطني في"العلل" (3/ 155):"المحفوظ عن علي. وقال: ورواه أشعث بن عبد الرحمن بن زبيد، فجوده، فقال: عن مجالد، عن الشعبي، عن جابر، وعن الحارث، عن علي قالا: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لعن.

وقال: ورواه الأعمش عن عبد اللَّه بن مرة، فخالف رواية الشعبي، رواه عن الحارث، عن عبد اللَّه بن مسعود".
قلت: ومن هذا الطريق رواه أحمد (3881)، وابن حبان (3252).

والخلاصة أن إسناد هذا الحديث يدور على الحارث الأعور، وهو ضعيف عند جمهور أهل العلم، ومنهم من كذبه، ولا يبعد أن يكون هذا مما أخطأ فيه؛ لأنه مرة يرويه عن علي، وثانية عن ابن مسعود وثالثة مرسلًا.

ولكن له أسانيد أخرى ذكرتها في كتاب الزّكاة.

وفي الباب أيضًا ما روي عن عمرو بن العاص قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من قوم يظهر فيهم الربا إلا أخذوا بالسنة، وما من قوم يظهر فيهم الرشا إلا أخذوا بالرعب".

رواه أحمد (17822) عن موسى بن داود، أخبرنا ابن لهيعة، عن عبد اللَّه بن سليمان، عن محمد بن راشد المرادي، عن عمرو بن العاص، فذكره.

وفيه ابن لهيعة سيء الحفظ، ومحمد بن راشد المرادي هو الكلابي من رجال"التعجيل" (933) قال فيه:"مجهول غير معروف".

قال الحافظ:"في السند ابن لهيعة، رواه عن عبد اللَّه بن سليمان وهو الطويل، عن محمد بن راشد، عن عمرو، رفعه: فذكر الحديث. وقال: وقد سقط رجل بين محمد وعمرو، فقد ذكر ابن يونس في المصريين محمد بن راشد المرادي، روى عن رجل، عن عبد اللَّه بن عمرو. وذكر البخاري وابن أبي حاتم وابن حبان في"الثقات" محمد بن راشد بن أبي سكنة، عن أبيه، وعن حرملة بن عمران المصري. قال البخاري: حديثه في المصريين. وأنا أظن أنه هذا. واللَّه أعلم".

وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 118):"وفيه من لم أعرفه".

وفي الباب أيضًا ما روي عن أبي هريرة مرفوعا:"أربع حق على اللَّه أن لا يدخلهم الجنّة، ولا يذيقهم نعيمها: مدمن الخمر، وآكل الربا، وآكل مال اليتيم بغير حق، والعاق لوالديه".

رواه الحاكم (2/ 37) من حديث إبراهيم بن خثيم بن عراك بن مالك، عن أبيه، عن جده، عن أبي هريرة فذكره.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وقد اتفقا على خُثيم".

وتعقبه الذهبي، فقال:"إبراهيم قال النسائي: متروك".

وبه أعله المنذري في"الترغيب والترهيب" (2871).

وفي الباب أيضًا ما روي عن أبي هريرة مرفوعا:"ليأتين على النّاس زمان لا يبقى أحد إلا آكل الربا، فإن لم يأكله أصابه من بخاره". قال ابن عيسى:"أصابه من غباره".

رواه أبو داود (3331) من طريقين:

عن محمد بن عيسى، حدّثنا هشيم، أخبرنا عباد بن راشد قال: سمعت سعيد بن أبي خيرة يقول: حدّثنا الحسن منذ أربعين سنة، عن أبي هريرة فذكره.
ح وحدثنا وهب بن بقية، أخبرنا خالد، عن داود، يعني ابن أبي هند -وهذا لفظه-، عن سعيد ابن أبي خيرة، عن الحسن، عن أبي هريرة فذكره.

رواه الإمام أحمد (10410) عن هشيم بإسناده مثله.

ورواه الحاكم (2/ 11) من طريق وهب بن بقية، والبيهقي (5/ 276) من طريق أبي داود عنه مثله.

ورواه النسائي (4455)، وابن ماجه (2278) كلاهما من وجهين آخرين عن داود بن أبي هند.

وفي الإسناد علتان:

إحداهما: مداره على سعيد بن أبي خيرة، روى عنه ثلاثة، كما ذكر المزي، وذكره ابن حبان في"الثقات" (6/ 360)، ولم يذكر من الرواة عنه إلا داود بن أبي هند، ولم يوثّقه غيره، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول". أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعة.

والثانية: الحسن وهو البصري، الإمام المعروف كثير التدليس والإرسال، وقد نص جمهور أهل العلم أنه لم يسمع من أبي هريرة، ففيه انقطاع.

ولذا قال الحاكم:"قد اختلف أئمتنا في سماع الحسن عن أبي هريرة، فإن صح سماعه منه فهذا حديث صحيح".

وقد أعل المنذري في"الترغيب والترهيب" (2892) بأن الجمهور على أنه لم يسمع منه. وذكر أبو حيان الأصبهاني في"طبقات المحدثين" موعظة طويلة للحسن البصري، منها هذا الحديث من قوله.

وفي الباب عن أبي هريرة أيضًا قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أتيت ليلة أسري بي على قوم بطونهم كالبيوت، فيها الحيات ترى من خارج بطونهم. فقلت: من هؤلاء يا جبريل؟ قال: هؤلاء أكلة الربا".

رواه ابن ماجه (2273) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا الحسن بن موسى، عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أبي الصلت، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه الإمام أحمد (8640) من حديث حماد بن سلمة بأطول من هذا.

وإسناده ضعيف من أجل علي بن زيد -وهو ابن جدعان-، وجهالة أبي الصلت.

ثم حديث الإسراء ثابت في الصحيحين، وليس فيه ذكر هذا الجزء من الحديث بأن النبي صلى الله عليه وسلم رأى آكل الربا بطونهم كالبيوت، لذا هذا الجزء من الحديث منكر جدا.

وفي الباب ما روي أيضًا عن أبي هريرة أيضًا قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الربا سبعون حوبا، أيسرها أن ينكح الرجل أمه".

رواه ابن ماجه (2274) عن عبد اللَّه بن سعيد قال: حدّثنا عبد اللَّه بن إدريس، عن أبي معشر، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.

وأبو معشر هو نجيح بن عبد الرحمن السندي المدني ضعيف باتفاق أهل العلم. حتى قال ابن المديني:"كان ضعيفا ضعيفا. . .، وروى عن المقبري بأحاديث منكرة".
ومن طريقه رواه البيهقي في"شعب الإيمان" (4/ 395)، وقال:"أبو معشر وابنه غير قويين، رواه أيضًا عبد اللَّه بن سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة. وقال: عن جده، عن أبي هريرة. وعبد اللَّه ضعيف".

قلت: ومن هذا الوجه رواه الأصبهاني في"الترغيب والترهيب" (1409).

وللحديث طريق آخر، وهو ما رواه العقيلي في الضعفاء (808)، ومن طريقه ابن الجوزي في الموضوعات (1224) من طريق عبد اللَّه بن زياد قال: حدّثنا عكرمة بن عمار، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة مرفوعا:"الربا سبعون بابا، أصغرها كالذي ينكح أمه".

قال العقيلي: قال البخاري: عبد اللَّه بن زياد عن عكرمة بن عمار منكر الحديث.

ورواه البيهقي في"شعب الإيمان" (4/ 394) من طريق عفيف بن سالم، ثنا عكرمة بن عمار بإسناده، وقال:

"غريب بهذا الإسناد، وإنما يعرف بعبد اللَّه بن زياد، عن عكرمة. وعبد اللَّه بن زياد منكر الحديث".

وفي معناه ما روي عن كعب:"لأن أزني ثلاثا وثلاثين زنية أحب إلي من آكل درهم ربا يعلم اللَّه أني أكلته حين أكلته ربا".

رواه أحمد (21958) عن وكيع، والدارقطني (2844) عن الفريابي، والبيهقي في"شعب الإيمان" (4/ 393) عن حماد بن أسامة، كلهم عن سفيان الثوري، عن عبد العزيز بن رفيع، عن ابن أبي مليكة، عن ابن حنظلة، عن كعب فذكره.

قال الدارقطني:"هذا أصح من المرفوع".

وهو يقصد بالمرفوع ما رواه هو (2843)، والإمام أحمد (21957) كلاهما من حديث حسين ابن محمد، حدّثنا جرير -يعني ابن حازم-، عن أيوب، عن ابن أبي مليكة، عن عبد اللَّه بن حنظلة غسيل الملائكة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكر نحوه.

وأورد ابن الجوزي هذا الحديث في كتابه"الموضوعات" (1229)، وأعله بحسين بن محمد، فقال:"هو المروزي، قال أبو حاتم: رأيته ولم أسمع منه. وسئل أبو حاتم عن حديث يرويه حسين، فقال: خطأ. فقيل له: الوهم من من؟ فقال: من حسين ينبغي أن يكون".

وتعقبه ابن حجر في القول المسدد (الحديث الثاني عشر): حسين هذا احتج به الشيخان، وقال أحمد: اكتبوا عنه. ووثّقه العجلي، وابن سعد، والنسائي، وابن قانع، ومحمد بن مسعود اللخمي، وآخرون. . . .، ثم إنه لم ينفرد، بل توبع، رواه الدارقطني (2845) عن البغوي، عن هاشم بن الحارث، عن عبيد اللَّه بن عمرو الرقي، عن ليث بن أبي سليم، عن ابن أبي مليكة به.

وقال: وليث -وإن كان ضعيفا- فإنما ضعف من قبل حفظه، فهو متابع قوي. انتهى. وذكر له
شاهدا من حديث ابن عباس، وهو الآتي.

وفي معناه ما روي عن ابن عباس مرفوعا:"من أكل درهما ربة فهو مثل ستة وثلاثين زنية، ومن نبت لحمه من السحت فالنار أولى به".

رواه ابن الجوزي في"الموضوعات" (1226) عن الدارقطني، عن أبي حاتم بن حبان بإسناده عن محمد بن حمير قال: حدّثنا إسماعيل، عن حنش، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

ورواه البيهقي في"شعب الإيمان" (4/ 393 - 394) من وجه آخر، عن الفضل بن جابر، ثنا يحيى بن إسماعيل بن عباس، عن حسين بن قيس الرحبي، عن عكرمة، عن ابن عباس نحوه. وقال: روي في الربا من وجه آخر عن ابن عباس.

وحسين بن قيس الرحبي الملقب بـ"حنش" متروك.

وأورده ابن حجر في القول المسدد من جهة ابن عدي من طريق علي بن الحسن بن شقيق، أخبرني ليث، عن مجاهد، عن ابن عباس نحوه.

وقال: وأخرجه الطبراني من وجه آخر عن ابن عباس في أثناء حديث.

وقال: وأخرجه الطبراني أيضًا من طريق عطاء الخراساني، عن عبد اللَّه بن سلام. وعطاء لم يسمع من ابن سلام، وهو شاهد قوي.

وفي معناه ما روي أيضًا عن أنس بن مالك قال: خطبنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر الربا، وعظم شأنه، وقال:"إن الدرهم يصيبه الرجل من الربا أعظم عند اللَّه في الخطيئة من ستة وثلاثين زنية يزنيها الرجل، وإن أربى الربا عرض الرجل المسلم".

رواه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1548)، ومن طريقه ابن الجوزي في"الموضوعات" (1227)، والأصبهاني في"الترغيب والترهيب" (1410) كلهم عن عبد اللَّه بن كيسان أبي مجاهد، عن ثابت، عن أنس فذكره.

ونقل ابن عدي عن البخاري أنه قال: عبد اللَّه بن كيسان أبو مجاهد منكر الحديث.

وقال:"ولعبد اللَّه بن كيسان عن عكرمة، عن ابن عباس غير ما أمليت غير محفوظة، وثابت عن أنس كذلك".

ثم رواه ابن الجوزي (1228) من وجه آخر عن طلحة بن زيد، عن الأوزاعيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن أنس مرفوعا:"الربا سبعون بابا، أهون باب منه الذي يأتي أمه في الإسلام وهو يعرفها، وإن أربا الربا خرق المرء عرض أخيه المسلم، وخرق عرضه أن يقول فيه ما يكره من مساويه، والبهتان أن يقول فيه ما ليس فيه".

وقال:"تفرّد به طلحة بن زيد، قال البخاري: منكر الحديث. وقال النسائي: متروك. واتهمه أيضًا ابن المديني. وقال أحمد، وأبو داود: منكر الحديث".
وفي معناه ما روي عن عائشة مرفوعا:"إن الربا بضع وسبعون بابا، أصغرها كالواقع على أمه، والدرهم الواحد من الربا أعظم عند اللَّه من ستة وثلاثين زنية".

رواه أبو نعيم في"الحلية" (5/ 74)، ومن طريقه ابن الجوزي في"الموضوعات" (1231) من طريق سوار بن مصعب، عن ليث، وخلف بن حوشب، عن مجاهد، عن عائشة فذكرته.

قال أبو نعيم:"غريب من حديث خلف، لم نكتبه إلا من هذا الوجه".

قلت: وفيه سوار بن مصعب، وهو الهمداني، قال أحمد، وأبو حاتم، والنسائي:"متروك الحديث". وقال البخاري:"منكر الحديث".

وله طريق آخر، أخرجه العقيلي في"الضعفاء" (1302) في ترجمة عمران بن أنس أبي أنس، عن ابن أبي مليكة، عن عائشة مرفوعا:"الدرهم ربا أعظم عند اللَّه من سبعة وثلاثين زنية".

ومن طريقه أخرجه ابن الجوزي في"الموضوعات" (1232).

قال العقيلي:"عن ابن أبي مليكة، ولا يتابع على حديثه".

وقال:"وهذا يروى من غير هذا الوجه مرسلا، والإسناد فيه من طريق لين".

وفي الباب أيضًا ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الربا ثلاثة وسبعون بابا" وفي رواية:"الربا بضعة وسبعون بابا، أهونها كمن أتى أمه في الإسلام".

رواه ابن ماجه (2275)، والحاكم (2/ 37) كلاهما عن عمرو بن علي الصيرفي أبي حفص قال: حدّثنا ابن أبي عدي، عن شعبة، عن زبيد، عن إبراهيم، عن مسروق، عن عبد اللَّه فذكره. واللّفظ لابن ماجه.

وزاد الحاكم:"وإن أربى الربا عرض الرجل المسلم". ورواه عن محمد بن غالب، عن عمرو ابن علي الصيرفي الفلاس.

وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وهو كما قال؛ وزبيد -مصغرا- هو ابن الحارث اليمامي. وإبراهيم هو ابن يزيد النخعي.

ولكن اختلف على زبيد بن الحارث.

فرواه ابن أبي عدي، عن شعبة، عن زبيد مرفوعا.

ورواه النضر بن شميل، عن شعبة، عنه موقوفا. انظر"السنة لمحمد بن نصر" (ص 59).

وكذلك رواه الثوري عن زبيد موقوفا على ابن مسعود.

رواه عبد الرزاق في مصنفه (8/ 315)، وعبد الرحمن بن مهدي كلاهما عن الثوري، عن زبيد موقوفا من قول ابن مسعود.

وهذا أشبه بالصواب، وكذا قال البيهقي في"شعب الإيمان" (4/ 394) بعد أن رواه عن الحاكم بإسناده ومتنه:"هذا إسناد صحيح، والمتن منكر بهذا الإسناد، ولا أعلمه إلا وهما، وكأنه دخل
لبعض رواة الإسناد في إسناده".

وهو كما قال؛ فإن محمد بن غالب تمتام وهم في أحاديث، كما قال الدارقطني، فلعله وهم في المتن، فزاد فيه ما لم يذكره غيره، وجعل الحديث من مسند ابن مسعود، والصحيح أنه من مسند أبي هريرة، والصواب من ابن مسعود موقوفا عليه.

والخلاصة أنه لم يثبت في هذا المعنى شيء. وإنما الصحيح هو قول ابن مسعود. قال ابن الجوزي:"ليس في هذه الأحاديث شيء صحيح".

وقال:"واعلم أن مما يرد صحة هذه الأحاديث أن المعاصي إنما تعلم مقاديرها بتأثيراتها، والزنى يفسد الأنساب، ويصرف الميراث إلى غير مستحقه، ويؤثر في القبائح ما لا يؤثر أكل لقمة لا يتعدى ارتكاب نهي؛ فلا وجه لصحة هذا". انتهى.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরআনের সর্বশেষ যা নাযিল হয়েছে তা হলো সুদের আয়াত। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মৃত্যুবরণ করেন, অথচ তিনি এর ব্যাখ্যা করেননি। সুতরাং তোমরা সুদ এবং (সুদ সংক্রান্ত) সন্দেহপূর্ণ বিষয়গুলো ত্যাগ করো।









আল-জামি` আল-কামিল (5569)


5569 - عن مالك بن أوس بن الحدثان النصري: أنه التمس صرفا بمائة دينار. قال: فدعاني طلحة بن عبيد اللَّه، فتراوضنا حتى اصطرف مني، وأخذ الذهب يقلبها في يده، ثم قال: حتى يأتيني خازني من الغابة، وعمر بن الخطاب يسمع، فقال عمر: واللَّه لا تفارقه حتى تأخذ منه، ثم قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الذهب بالورق ربا إلا هاء وهاء، والبر بالبر ربا إلا هاء وهاء، والتمر بالتمر ربا إلا هاء وهاء، والشعير بالشعير ربا إلا هاء وهاء".

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (38) عن ابن شهاب، عن مالك بن أوس فذكره. ورواه البخاري في البيوع (2174) من طريق مالك به مثله.

ورواه مسلم في المساقاة (1586) من وجه آخر عن الزهري به نحوه.

قوله:"فتراوضنا" أي تجارينا الكلام في قدر العوض بالزيادة والنقص، كأن كلا منهما كان يروض صاحبه، ويسهل خلقه. وقيل: المراوضة هنا المواصفة بالسلعة، وهي أن يصف كل منهما سلعته لرفيقه.

وقوله:"إلا هاء وهاء" أي خذ، وهات، والمعنى إلا يدا بيد، يعني مقابضة في المجلس.




মালিক ইবনে আওস ইবনুল হাদসান আন-নাসরি থেকে বর্ণিত, তিনি একশো দীনারের বিনিময়ে রৌপ্য (মুদ্রা) পরিবর্তন করতে চাইলেন। তিনি বলেন: তখন আমাকে তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ডাকলেন। আমরা দর কষাকষি করলাম, অবশেষে তিনি আমার কাছ থেকে মুদ্রা পরিবর্তন করলেন। তিনি সোনাগুলো হাতে নিয়ে নাড়াচাড়া করতে লাগলেন এবং বললেন: আমার খাজাঞ্চি (কোষাধ্যক্ষ) গাবাহ্ থেকে না আসা পর্যন্ত (দাও)। তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা শুনতে পেলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম, তুমি তাকে ছাড়বে না, যতক্ষণ না তুমি তার কাছ থেকে (বিনিময়) গ্রহণ করো। অতঃপর তিনি (উমার) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “স্বর্ণের বিনিময়ে রৌপ্য (বিক্রি) সুদ, যদি না 'হাআ' (নাও) এবং 'হাআ' (দাও) হয়। গমের বিনিময়ে গম (বিক্রি) সুদ, যদি না 'হাআ' (নাও) এবং 'হাআ' (দাও) হয়। খেজুরের বিনিময়ে খেজুর (বিক্রি) সুদ, যদি না 'হাআ' (নাও) এবং 'হাআ' (দাও) হয়। যবের বিনিময়ে যব (বিক্রি) সুদ, যদি না 'হাআ' (নাও) এবং 'হাআ' (দাও) হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (5570)


5570 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تبيعوا الذهب بالذهب إلا مثلا بمثل، ولا تُشفوا بعضها على بعض، ولا تبيعوا الورق بالورق إلا مثلا بمثل، ولا تشفوا بعضها على بعض، ولا تبيعوا منها شيئًا غائبا بناجز".

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (30) عن نافع، عن أبي سعيد به.

ورواه البخاريّ في البيوع (2177)، ومسلم في المساقاة (1584: 75) كلاهما من طريق مالك
به مثله.

ورواه مسلم من وجه آخر عن نافع به مثله، وزاد"إلا يدا بيد".

قوله:"ولا تشفوا" أي لا تفضلوا، وهو رباعي من أشف، والشف -بالكسر- الزيادة، وتطلق على النقص.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা স্বর্ণের বিনিময়ে স্বর্ণ বিক্রি করো না, তবে তা সমান সমান হতে হবে এবং এর (পরিমাণ) কিছুকে অন্য কিছুর উপর বেশি-কম করো না। আর তোমরা রৌপ্যের বিনিময়ে রৌপ্য বিক্রি করো না, তবে তা সমান সমান হতে হবে এবং এর (পরিমাণ) কিছুকে অন্য কিছুর উপর বেশি-কম করো না। এবং এই (স্বর্ণ বা রৌপ্যের) মধ্য থেকে কোনো অনুপস্থিত (ধার করা বা বাকি) জিনিসকে নগদ উপস্থিত (হাজির) জিনিসের বিনিময়ে বিক্রি করো না।”









আল-জামি` আল-কামিল (5571)


5571 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الذهب بالذهب، والفضة بالفضة، والبر بالبر، والشعير بالشعير، والتمر بالتمر، والملح بالملح مثلا بمثل، يدا بيد، فمن زاد أو استزاد فقد أربى، الآخذ والمعطي فيه سواء".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1584) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا وكيع، حدّثنا إسماعيل بن مسلم العبدي، حدّثنا أبو المتوكل الناجي، عن أبي سعيد الخدري فذكره.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সোনা সোনার বিনিময়ে, রূপা রূপার বিনিময়ে, গম গমের বিনিময়ে, যব যবের বিনিময়ে, খেজুর খেজুরের বিনিময়ে, আর লবণ লবণের বিনিময়ে—বিক্রি হবে সমানে সমান এবং হাতে হাতে (নগদ)। সুতরাং যে ব্যক্তি বেশি দিল অথবা বেশি চাইল, সে সুদ নিল। এই (সুদের) ক্ষেত্রে গ্রহণকারী ও প্রদানকারী উভয়েই সমান।"









আল-জামি` আল-কামিল (5572)


5572 - عن أبي بكرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تبيعوا الذهب بالذهب إلا سواء بسواء، والفضة بالفضة إلا سواء بسواء، وبيعوا الذهب بالفضة، والفضة بالذهب كيف شئتم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2175)، ومسلم في المساقاة (1590) من طريق يحيى بن أبي إسحاق، حدّثنا عبد الرحمن بن أبي بكرة قال: قال أبو بكرة فذكره.




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সোনাকে সোনার বিনিময়ে বিক্রি করবে না, তবে সমান সমান হতে হবে। আর রূপাকে রূপার বিনিময়ে বিক্রি করবে না, তবে সমান সমান হতে হবে। আর সোনাকে রূপার বিনিময়ে এবং রূপাকে সোনার বিনিময়ে যেভাবে ইচ্ছা বিক্রি করতে পারো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5573)


5573 - عن أبي المنهال قال: باع شريك لى وَرِقا بنسيئة إلى الموسم، أو إلى الحج، فجاء إلي، فأخبرني، فقلت: هذا أمر لا يصلح. قال: قد بعته في السوق، فلم ينكر ذلك علي أحد. فأتيت البراء بن عازب، فسألته، فقال: قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة ونحن نبيع هذا البيع، فقال:"ما كان يدا بيد فلا بأس به، وما كان نسيئة فهو ربا". وائتِ زيد بن أرقم؛ فإنه أعظم تجارة مني. فأتيته، فسألته، فقال مثل ذلك.

متفق عليه: رواه مسلم في المساقاة (1589: 86) عن محمد بن حاتم بن ميمون، حدّثنا سفيان ابن عيينة، عن عمرو (وهو ابن دينار) عن أبي المنهال به.

ورواه البخاريّ في البيوع (2180، 2181) ومسلم (87) كلاهما من طريق شعبة، أخبرني حبيب بن أبي ثابت قال: سمعت أبا المنهال يقول: سألت البراء بن عازب عن الصرف، فقال: سل زيد بن أرقم فهو أعلم. فسألت زيدا، فقال: سل البراء؛ فإنه أعلم، ثم قالا:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الورق بالذهب دينا".




আল-বারা' ইবনু 'আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু আল-মিনহাল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমার এক অংশীদার হজ্বের মৌসুম অথবা হজ্জ পর্যন্ত ঋণ হিসেবে রূপা বিক্রি করলো। সে আমার কাছে এসে আমাকে সে কথা জানালো। আমি বললাম: এ কাজটি ঠিক নয়। সে বললো: আমি তো তা বাজারে বিক্রি করেছি, আর কেউ তাতে আপত্তি জানায়নি। এরপর আমি আল-বারা’ ইবনু ‘আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মদীনায় এলেন, তখন আমরা এভাবে বেচাকেনা করতাম। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যা হাতে হাতে (নগদ) হয়, তাতে কোনো অসুবিধা নেই, কিন্তু যা বাকিতে (ঋণ হিসেবে) হয়, তা হলো রিবা (সুদ)।” তিনি আরো বললেন: তুমি যায়দ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যাও; কারণ তিনি আমার চেয়ে বড় ব্যবসায়ী। আমি তাঁর কাছে গেলাম এবং তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম। তিনিও একই কথা বললেন।

আর (বারা’ ইবনু ‘আযিব ও যায়দ ইবনু আরকাম) উভয়েই বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাকিতে রূপার বিনিময়ে সোনা বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5574)


5574 - عن عبادة بن الصامت قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الذهب بالذهب، والفضة بالفضة، والبر بالبر، والشعير بالشعير، والتمر بالتمر، والملح بالملح مثلا بمثل، سواء بسواء، يدا بيد، فإذا اختلفت هذه الأصناف فبيعوا كيف شئتم إذا كان يدا بيد".
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1587: 81) من طريق وكيع، حدّثنا سفيان، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن أبي الأشعث، عن عبادة بن الصامت فذكره.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: স্বর্ণের বিনিময়ে স্বর্ণ, রূপার বিনিময়ে রূপা, গমের বিনিময়ে গম, যবের বিনিময়ে যব, খেজুরের বিনিময়ে খেজুর এবং লবণের বিনিময়ে লবণ - হতে হবে সমান সমান, বরাবর এবং হাতে হাতে (নগদ)। কিন্তু যখন এই প্রকারগুলো ভিন্ন ভিন্ন হয়, তখন তোমরা যেভাবে ইচ্ছা বিক্রি করো, যদি তা হাতে হাতে (নগদ) হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5575)


5575 - عن أبي قلابة قال: كنت بالشام في حلقة فيها مسلم بن يسار، فجاء أبو الأشعث، قال: قالوا: أبو الأشعث، أبو الأشعث. فجلس، فقلت له: حدِّث أخانا حديث عبادة بن الصامت. قال: نعم، غزونا غزاة وعلى النّاس معاوية، فغنمنا غنائم كثيرة، فكان فيما غنمنا آنية من فضة، فأمر معاوية رجلا أن يبيعها في أعطيات النّاس، فتسارع النّاس في ذلك، فبلغ عبادة بن الصامت، فقام، فقال: إني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهى عن بيع الذهب بالذهب، والفضة بالفضة، والبر بالبر، والشعير بالشعير، والتمر بالتمر، والملح بالملح إلا سواء بسواء، عينا بعين. فمن زاد أو ازداد فقد أربى. فرد النّاس ما أخذوا، فبلغ ذلك معاوية، فقام خطيبا، فقال: ألا ما بال رجال يتحدثون عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أحاديث قد كنا نشهده ونصحبه، فلم نسمعها منه. فقام عبادة بن الصامت، فأعاد القصة، ثم قال: لنحدثن بما سمعنا من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وإن كره معاوية -أو قال: وإن رغم-، ما أبالي أن لا أصحبه في جنده ليلة سوداء.

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1587: 80) عن عبيد اللَّه بن عمر القواريري، حدّثنا حماد ابن زيد، عن أيوب، عن أبي قلابة فذكره.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবু কিলাবাহ (র) বলেন, আমি শামে মুসলিম ইবনু ইয়াসার-এর একটি মজলিসে ছিলাম। তখন আবুল আশ‘আস সেখানে এলেন। লোকেরা বলাবলি করতে লাগল, আবুল আশ‘আস, আবুল আশ‘আস। এরপর তিনি বসলেন। আমি তাকে বললাম, আমাদের ভাইকে উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি বর্ণনা করুন। তিনি বললেন, হ্যাঁ। (উবাদাহ ইবনুস সামিত বর্ণনা করেন): আমরা এক যুদ্ধে গেলাম, যার সেনাপতি ছিলেন মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমরা প্রচুর গনীমত লাভ করলাম। প্রাপ্ত গনীমতের মধ্যে রূপার কিছু পাত্র ছিল। মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক ব্যক্তিকে আদেশ করলেন যেন সে তা মানুষের প্রাপ্য (বেতন/ভাতা) হিসেবে বিক্রি করে দেয়। লোকেরা দ্রুত তা কেনার জন্য ভিড় করল। এই খবর উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছাল। তিনি দাঁড়িয়ে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে স্বর্ণের বিনিময়ে স্বর্ণ, রৌপ্যের বিনিময়ে রৌপ্য, গমের বিনিময়ে গম, যবের বিনিময়ে যব, খেজুরের বিনিময়ে খেজুর এবং লবণের বিনিময়ে লবণ সমান সমান ও হাতে হাতে (একই স্থানে) ব্যতীত বিক্রয় করতে নিষেধ করতে শুনেছি। যে ব্যক্তি কম-বেশি করল বা বেশি চাইল, সে সুদের কাজ করল। এরপর লোকেরা যা কিছু নিয়েছিল, তা ফেরত দিল। এই খবর মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছাল। তখন তিনি দাঁড়িয়ে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: কী ব্যাপার! কিছু লোক রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নামে এমন সব হাদীস বর্ণনা করছে, যখন আমরা তাঁর সাথে উপস্থিত থাকতাম এবং তাঁর সাহচর্য করতাম, তখন আমরা তাঁর থেকে তা শুনিনি। তখন উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে গেলেন এবং পুনরায় ঘটনাটি বললেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমরা অবশ্যই রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর থেকে যা শুনেছি, তা বর্ণনা করতে থাকব, মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অপছন্দ করুন কিংবা (বর্ণনাকারী বললেন) তিনি ঘৃণা করুন। আমি পরোয়া করি না যে আমি যেন তার সৈন্যদের সাথে কোনো কালো রাতে না থাকি।









আল-জামি` আল-কামিল (5576)


5576 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"الدينار بالدينار، والدرهم بالدرهم لا فضل بينهما".

صحيح: رواه مالك في البيوع (29) عن موسى بن إبراهيم، عن أبي الحُباب سعيد بن يسار، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه مسلم في المساقاة (1588: 85) من طريق مالك به.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দিনার দিনারের বিনিময়ে (সমান) এবং দিরহাম দিরহামের বিনিময়ে (সমান)। এগুলোর মধ্যে কোনো অতিরিক্ততা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (5577)


5577 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"التمر بالتمر، والحنطة بالحنطة، والشعير بالشعير، والملح بالملح مثلا بمثل، يدا بيد. فمن زاد أو استزاد فقد أربي إلا ما اختلفت ألوانه".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1588: 83) من طريق ابن فضيل بن غزوان، عن أبيه، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة فذكره.

قوله:"ألوانه" يعني أجناسه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: খেজুরের বিনিময়ে খেজুর, গমের বিনিময়ে গম, যবের বিনিময়ে যব, লবণের বিনিময়ে লবণ—সমান সমান এবং হাতে হাতে (আদান-প্রদান করতে হবে)। সুতরাং যে ব্যক্তি অতিরিক্ত দিল অথবা অতিরিক্ত চাইলো, সে সুদী কারবার করলো। তবে যদি তাদের প্রকারভেদ ভিন্ন হয় (তাহলে ভিন্ন)।









আল-জামি` আল-কামিল (5578)


5578 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الذهب بالذهب وزنا بوزن، مثلا بمثل، والفضة بالفضة وزنا بوزن، مثلا بمثل، فمن زاد أو استزاد فهو ربا".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1588: 84) من طريق ابن فضيل بن غزوان، عن أبيه، عن ابن أبي نعم (هو عبد الرحمن)، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "স্বর্ণের বিনিময়ে স্বর্ণ (বিক্রি করতে হবে) ওজনে ওজনে, সমানে সমানে; আর রূপার বিনিময়ে রূপা (বিক্রি করতে হবে) ওজনে ওজনে, সমানে সমানে। অতএব, যে ব্যক্তি বেশি দেবে অথবা বেশি চাইবে, তা সুদ (রিবা) হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5579)


5579 - عن عثمان بن عفان أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تبيعوا الدينار بالدينارين، ولا الدرهم بالدرهمين".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1585) من طريق ابن وهب، أخبرني مخرمة، عن أبيه قال: سمعت سليمان بن يسار يقول: إنه سمع مالك بن أبي عامر يحدث عن عثمان بن عفان فذكره.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা এক দীনারকে দুই দীনারের বিনিময়ে বিক্রি করো না এবং এক দিরহামকে দুই দিরহামের বিনিময়েও বিক্রি করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (5580)


5580 - عن مجاهد أنه قال: كنت مع عبد اللَّه بن عمر، فجاءه صائغ، فقال له: يا أبا عبد الرحمن، إني أصوغ الذهب، ثم أبيع الشيء من ذلك بأكثر من وزنه، فاستفضل من ذلك قدر عمل يدي، فنهاه عبد اللَّه عن ذلك، فجعل الصائغ يردد عليه المسألة، اللَّه بن عمر: الدينار بالدينار والدرهم بالدرهم لا فضل بينهما، هذا عهد نبينا إلينا، وعهدنا إليكم.

صحيح: رواه مالك في البيوع (31) عن حميد بن قيس المكي، عن مجاهد أنه قال فذكره.

والصائغ اسمه: وردان الرومي كما جاء ذكره في"السنن المأثورة" للشافعي.

وقول ابن عمر:"هذا عهد نبينا إلينا" وهو يريد أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم بعد ما ثبت له ذلك عن النبي صلى الله عليه وسلم في حديث أبي سعيد الخدري وغيره كما قال البيهقي في"معرفة السنن والآثار" (8/ 38)؛ لأنه ثبت أن ابن عمر كان يقول مثل كلام ابن عباس في الصرف حتى حدثه أبو سعيد الخدري"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الذهب بالذهب إلا مثلا بمثل" فأخذ به ورجع إليه.

وفي الباب ما روي عن عطاء بن يسار أن معاوية اشترى سقاية من فضة بأقل من ثمنها، أو أكثر، قال: فقال أبو الدرداء:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن مثل هذا إلا مثلا بمثل". رواه مالك عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار فذكره.

ومن طريقه رواه النسائي (4567)، وأحمد (27531)، والبيهقي (5/ 280)، وفيه انقطاع؛ فإن عطاء بن يسار لم يسمع من أبي الدرداء.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুজাহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। তখন তাঁর কাছে একজন স্বর্ণকার এসে বলল: হে আবূ আব্দুর রহমান! আমি স্বর্ণ তৈরি করি। এরপর আমি সেই জিনিসটি তার ওজনের চেয়ে বেশি মূল্যে বিক্রি করি এবং আমার হাতের কাজের সমপরিমাণ লাভ রাখি। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে তা থেকে নিষেধ করলেন। স্বর্ণকার বারবার প্রশ্ন করতে থাকলে আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: দীনারের (স্বর্ণমুদ্রা) বিনিময় দীনার এবং দিরহামের (রৌপ্যমুদ্রা) বিনিময় দিরহাম— এদের মধ্যে কোনো কম-বেশি (আধিক্য) নেই। এটা আমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে আমাদের কাছে দেওয়া অঙ্গীকার, আর আমাদের পক্ষ থেকে তোমাদের কাছে দেওয়া অঙ্গীকার।