হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5601)


5601 - عن عمرو بن الأحوص قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع يقول:"ألا أن كل ربا من ربا الجاهلية موضوع، لكم رؤوس أموالكم لا تظلمون، ولا تظلمون".

حسن: رواه أبو داود (3334)، والترمذي (3087)، وابن ماجه (1851)، وأحمد (15507) كلهم من طريق شبيب بن غرقدة البارقي، عن سليمان بن عمرو بن الأحوص، عن أبيه فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".

قلت: إسناده حسن من سليمان بن عمرو بن الأحوص فقد روى عنه جمعٌ، ووثّقه ابن حبان، ولم يذكر فيه جرحٌ، وحديثه هذا له أصل ثابت.



رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وهو في بيت حفصة، فقلت: يا رسول اللَّه، رويدك أسألك: إني أبيع الابل بالبقيع، فأبيع بالدنانير، وآخذ الدراهم، وأبيع بالدراهم، وآخذ الدنانير، آخذ هذه من هذه، وأعطي هذه من هذه. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا بأس أن تأخذها بسعر يومها ما لم تفترقا وبينكما شيء".

رواه أبو داود (3354)، والترمذي (1242)، والنسائي (4583)، وابن ماجه (2262)، والحاكم (2/ 44)، والبيهقي (5/ 284)، وأحمد (4883) كلهم من طرق عن سماك بن حرب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث لا نعرفه إلا من حديث سماك بن حرب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر. وروى داود بن أبي هند هذا الحديث عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر موقوفا".

وأما الحاكم، فقال:"صحيح على شرط مسلم".

والصواب أنه حديث ضعيف؛ فإن سماك بن حرب وهم في رفع هذا الحديث، وغيره رووه موقوفا. وقد أشار ابن معين إلى أن سماك بن حرب أسند أحاديث لم يسدها غيره، وهو ثقة.

وقال النسائي:"كان ربما لقن، فإذا انفرد بأصل لم يكن حجة؛ لأنه كان يلقن فيتلقن". وقد أشار الترمذيّ إلى أنه تفرّد برفع هذا الحديث، وداود بن أبي هند رواه موقوفا.

قلت: وهو ما رواه ابن أبي شيبة (1/ 332)، وأبو يعلى (5604) كلاهما من طريق ابن أبي زائدة، عن داود بن أبي هند، عن سعيد بن جبير قال: رأيت ابن عمر يكون عليه الورق، فيعطي بقيمته دنانير إذا قامت على سعر، ويكون عليه الدنانير فيعطي الورق بقيمتها.

وكذلك رواه النسائي (4585) عن محمد بن بشار قال: أنبأنا مؤمل قال: حدّثنا سفيان، عن أبي هاشم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر أنه كان لا يرى بأسا يعني في قبض الدراهم من الدنانير، والدنانير من الدراهم. انتهى.

وقال البيهقي:"والحديث ينفرد برفعه سماك بن حرب، عن سعيد بن جبير بين أصحاب ابن عمر". وهو كما قالوا.

قال الترمذيّ عقب تخريج الحديث:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم أن لا بأس أن يقضي الذهب من الورق، والورق من الذهب. وهو قول أحمد، وإسحاق. وقد كره بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، وغيرهم ذلك". اهـ.




আমর ইবনুল আহওয়াস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বিদায় হজ্জে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "সাবধান! জাহিলিয়াতের যুগের সকল প্রকার সুদ বাতিল করা হলো। তোমরা তোমাদের মূলধন ফিরে পাবে। তোমরা জুলুমও করবে না, আর তোমাদের উপর জুলুমও করা হবে না।"

ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে ছিলেন, তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! একটু থামুন, আমি আপনাকে জিজ্ঞেস করতে চাই। আমি বাকী নামক স্থানে উট বিক্রি করি। আমি দীনারের বিনিময়ে বিক্রি করি এবং দিরহাম গ্রহণ করি, আবার দিরহামের বিনিময়ে বিক্রি করি এবং দীনার গ্রহণ করি। আমি এটির বিনিময়ে ওটা নিই, আর ওটির বিনিময়ে এটা দিই। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "একই দিনের বাজারদরে তা গ্রহণ করতে কোনো অসুবিধা নেই, যতক্ষণ না তোমরা এমনভাবে পৃথক হও যে তোমাদের উভয়ের মাঝে (লেনদেনের) কিছু বাকি থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5602)


5602 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن المزابنة. والمزابنة بيع الثمر بالتمر كيلا، وبيع الكرم بالزبيب كيلا.
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (23) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في البيوع (2185)، ومسلم في البيوع (1542) كلاهما من طريق مالك به مثله.

ورواه مسلم من وجه آخر عن عبيد اللَّه، عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المزابنة. والمزابنة بيع ثمر النخل بالتمر كيلا، وبيع الزبيب بالعنب كيلا، وعلى كل ثمر بخرصه".

ورواه أيوب عن نافع، عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى المزابنة. والمزابنة أن يباع ما في رؤوس النخل بتمر كيلا مسمى، إن زاد فلي، وإن نقص فعلي.

ورواه الترمذيّ (1300) من طريق محمد بن إسحاق، عن نافع، عن ابن عمر، عن زيد بن ثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن المحاقلة والمزابنة إلا أنه قد أذن لأهل العرايا أن يبيعوها بمثل خرصها.

قال الترمذيّ:"حديث زيد بن ثابت هكذا روى محمد بن إسحاق هذا الحديث. وروى أيوب، وعبيد اللَّه بن عمر، ومالك بن أنس، عن نافع، عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن المحاقلة والمزابنة".

وبهذا الإسناد عن ابن عمر، عن زيد بن ثابت، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه رخص في العرايا، وهذا أصح من حديث محمد بن إسحاق. انتهى.

مراد الترمذي أن ابن إسحاق أخطأ، فأدخل حديثا في حديث؛ فإن الذي رواه ابن عمر عن زيد ابن ثابت هو الاستثناء في العرية فقط، كما سيأتي. وأما النهي عن المزابنة فرواه عن النبي صلى الله عليه وسلم بدون واسطة زيد بن ثابت، فخالف محمد بن إسحاق أيوبَ، وعبيد اللَّه بن عمر، ومالكا في ذلك.

وأما تفسير المزابنة فظاهره أنه مرفوع؛ لأنه اصطلاح شرعي، لم يكن معروفا قبل الإسلام، فكون تفسيره من النبي صلى الله عليه وسلم أقرب إلى الصواب.

ولكن رواه الإمام أحمد (5320) عن عبد الوهاب بن عبد المجيد، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن المزابنة.

قال: فكان نافع يفسرها: الثمرة تشترى بخرصها تمرا بكيل مسمى، إن زاد فلي، وإن نقصت فعلي.

وهذا مشعر بأن التفسير من نافع، والصحيح هو الأول، ولعل نافعا أراد بذلك تأكيد هذا التفسير المأثور، لا أنه فسره من عند نفسه.

وقد رواه الإمام أحمد (4490) عن إسماعيل (وهو ابن علية)، عن أيوب مثل رواية مسلم وغيره بأن التفسير من النبي صلى الله عليه وسلم، وسيأتي مثل ذلك عن أبي سعيد الخدري أيضًا.

وقد رجح الحافظ ابن حجر أيضًا أن التفسير مرفوع إلى النبي صلى الله عليه وسلم.

قوله:"المزابنة" مفاعلة من الزّبْن -بفتح الزاي، وسكون الموحدة-، وهو الدفع الشديد، ومنه سميت الحرب الزبون لشدة الدفع فيها. وقيل للبيع المخصوص المزابنة؛ لأن كل واحد من المتبايعين يدفع صاحبه عن حقه.
والعمل على هذا عند عامة أهل العلم أن المزابية والمحاقلة باطلة، وبه قال مالك، والأوزاعيّ، والشافعي، وأحمد، وإسحاق بن راهوية، وغيرهم.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযাবানা করতে নিষেধ করেছেন। আর মুযাবানা হলো: পরিমাপ করে তাজা ফল শুকনো খেজুরের বিনিময়ে বিক্রি করা এবং পরিমাপ করে আঙ্গুর কিসমিসের বিনিময়ে বিক্রি করা।









আল-জামি` আল-কামিল (5603)


5603 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن المزابنة والمحاقلة. والمزابنة اشتراء الثمر بالتمر في رؤوس النخل. والمحاقلة كراء الأرض بالحنطة.

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (24) عن داود بن الحصين، عن أبي سفيان مولى ابن أبي أحمد، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

ورواه البخاريّ في البيوع (2168)، ومسلم في البيوع (1546) كلاهما من طريق مالك به مثله. إلا أن البخاري لم يذكر تفسير المحاقلة، وأما مسلم ففسرها بكراء الأرض، ولم يقل: بالحنطة.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযাবানা এবং মুহাক্বালা থেকে নিষেধ করেছেন। আর মুযাবানা হলো: গাছের মাথায় থাকা ফল দ্বারা (শুকনো) খেজুর ক্রয় করা। আর মুহাক্বালা হলো: শস্য (গম) এর বিনিময়ে জমি ভাড়া দেওয়া।









আল-জামি` আল-কামিল (5604)


5604 - عن ابن عباس قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة، والمزابنة.

صحيح: رواه البخاري في البيوع (2187) عن مسدد، حدّثنا أبو معاوية، عن الشيباني، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাকালাহ ও মুজাবানাহ করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5605)


5605 - عن جابر بن عبد اللَّه أنه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهى عن المزابنة والحقول، فقال جابر بن عبد اللَّه: المزابنة الثمر بالتمر. والحقول كراء الأرض.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1536/ 103) عن الحسن الحلواني، حدّثنا أبو توبة، حدّثنا معاوية، عن يحيى بن أبي كثير، أن يزيد بن نُعيم أخبره أن جابر بن عبد اللَّه أخبره فذكره.

قال ابن شهاب: وحدثني سالم بن عبد اللَّه بن عمر، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم مثله سواء.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুযাবানা ও হুকূল থেকে নিষেধ করতে শুনেছেন। জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: মুযাবানা হলো ফলের বিনিময়ে খেজুর বিক্রি করা। আর হুকূল হলো জমি ভাড়া দেওয়া।









আল-জামি` আল-কামিল (5606)


5606 - عن جابر بن عبد اللَّه أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن المحاقلة، والمزابنة، والمخابرة، وأن تشترى النخل حتى تشقه -والإشقاه أن يحمر، أو يصفر، أو يؤكل منه شيء-. والمحاقلة أن يباع الحقل بكيل من الطعام معلوم. والمزابنة أن يباع النخل بأوساق من التمر. والمخابرة الثلث والربع وأشباه ذلك.

صحيح: رواه مسلم (1536: 83) من طرق عن زكريا بن عدي، أخبرنا عبيد اللَّه، عن زيد بن أبي أنيسة، حدّثنا أبو الوليد المكي -وهو جالس عند عطاء بن أبي رباح- عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.

قال زيد: قلت لعطاء بن أبي رباح: أسمعت جابر بن عبد اللَّه يذكر هذا عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ . قال: نعم.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাাক্বালা, মুযাবানা ও মুখাবারা থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি খেজুর (বা খেজুর গাছ) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন যতক্ষণ না তাতে রং আসে। আর তাতে রং আসা হলো— যখন তা লাল হয়, বা হলুদ হয়, অথবা তার কিছু অংশ খাওয়া হয়। আর মুহাক্বালা হলো— মাঠের ফসল কোনো নির্দিষ্ট পরিমাণের খাদ্যশস্যের বিনিময়ে বিক্রি করা। আর মুযাবানা হলো— খেজুর গাছ নির্দিষ্ট পরিমাণ শুকনো খেজুরের বিনিময়ে বিক্রি করা। আর মুখাবারা হলো— (জমির ফলনের) এক-তৃতীয়াংশ বা এক-চতুর্থাংশ বা অনুরূপ (অংশীদারিত্ব ভিত্তিক) চুক্তি।









আল-জামি` আল-কামিল (5607)


5607 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة والمزابنة.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1545) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا يعقوب (يعني ابن عبد الرحمن القاري)، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহা-কালাহ ও মুযা-বানাহ করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5608)


5608 - عن رافع بن خديج قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة والمزابنة.

حسن: رواه أبو داود (3400)، وابن ماجه (2267)، والنسائي (3890) كلهم من حديث أبي الأحوص، عن طارق بن عبد الرحمن، عن سعيد بن المسيب، عن رافع بن خديج فذكره.

وإسناده حسن من أجل طارق بن عبد الرحمن، وهو البجلي الأحمسي الكوفي، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وهو من رجال الصحيح.




রাফে' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাকালাহ ও মুযাবানাহ্ নিষিদ্ধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5609)


5609 - عن زيد بن ثابت أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أرخص لصاحب العرية أن يبيعها بخرصها.

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (14) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر، عن زيد بن ثابت فذكره.

ورواه البخاريّ في البيوع (2188) ومسلم في البيوع (1539: 60) كلاهما من طريق مالك به مثله، وزاد مسلم:"من التمر".

ورواه البخاري (2192) من وجه آخر عن موسى بن عقبة، عن نافع به بلفظ:"أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رخص في العرايا أن تباع بخرصها كيلا".

قال موسى بن عقبة:"والعرايا نخلات معلومات، تأتيها، فتشتريها".




যায়েদ ইবন ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘আরিয়্যাহ’-এর মালিককে তা অনুমান করে (শুকনো খেজুরের বিনিময়ে) বিক্রি করার অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5610)


5610 - عن زيد بن ثابت أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رخص في بيع العرايا أن تباع بخرصها، ولم يرخص في غير ذلك.

صحيح: رواه الإمام أحمد (21581)، والدارمي (2600)، وابن حبان (5009) كلهم من حديث الأوزاعيّ، عن الزهريّ، عن سالم، عن أبيه، عن زيد بن ثابت فذكره.

وفي الصحيحين -البخاري (2184)، ومسلم (1539) -: وقال سالم: أخبرني عبد اللَّه، عن زيد بن ثابت، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه رخص بعد ذلك في بيع العرية بالرطب، أو بالتمر، ولم يرخص في غيره.

وذلك عطفا على رواية عقيل، عن ابن شهاب قال: أخبرني سالم بن عبد اللَّه، عن عبد اللَّه أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تبيعوا التمر حتى يبدو صلاحه، ولا تبيعوا الثمر بالتمر". هذا ما سمعه عبد اللَّه بن عمر من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وسمع من زيد بن ثابت جواز بيع العرية.




যায়িদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'আরায়া' (Araya) খেজুর আনুমানিক অনুমান (খরছ) অনুসারে বিক্রি করার অনুমতি দিয়েছেন, তবে এছাড়া অন্য কিছুতে অনুমতি দেননি। (সহীহাইন-এর অন্য এক বর্ণনায় এসেছে যে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরপর আরায়া কাঁচা খেজুরের (রুতাব) বা শুকনো খেজুরের (তামর) বিনিময়ে বিক্রি করার অনুমতি দেন, তবে এছাড়া অন্য কিছুর অনুমতি দেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (5611)


5611 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة، والمزابنة، والمعاومة، والمخابرة، وعن الثنيا، ورخص في العرايا.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1536: 85) من طرق عن حماد بن زيد، حدّثنا أيوب، عن أبي الزبير، وسعيد بن ميناء، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
وقال أحدهما:"بيع السنين هي المعاومة".

وأخرج مسلم، وأحمد (14358) عن إسماعيل ابن علية، عن أيوب بإسناده، فذكر مثله. وأحال مسلم على اللفظ السابق، وقال: ولم يذكر فيه:"بيع السنين هي المعاومة".

فعرفنا من قوله هذا أن تفسير المعاومة من سعيد بن ميناء.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাক্কালা, মুযাবানা, মু'আওয়ামা, মুখাবারা এবং সা-নিয়া (বিক্রিতে ব্যতিক্রম রাখা) থেকে নিষেধ করেছেন, তবে 'আরায়ার ক্ষেত্রে অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5612)


5612 - عن سهل بن أبي حثمة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الثمر بالتمر، وقال:"ذلك الربا، تلك المزابنة". إلا أنه رخص في بيع العرية، النخلة والنخلتين يأخذها أهل البيت بخرصها تمرا، يأكلونها رطبا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2191)، ومسلم في البيوع (1540: 67) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد (هو الأنصاري)، عن بُشير بن يسار، عن بعض أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من أهل دارهم، منهم سهل بن أبي حثمة فذكره. واللّفظ لمسلم.




সাহল ইবনু আবী হাছমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুরের বিনিময়ে ফল (যা তখনও গাছে) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। এবং তিনি বললেন: "এটা হল সুদ, এটা হল মুযাবানা।" তবে তিনি আরিয়্যা (ʿAriyyah) ধরনের বিক্রয় লেনদেনে অনুমতি দিয়েছেন। (যেমন) কোনো পরিবার এক বা দুটি খেজুর গাছ আন্দাজ করে শুকনা খেজুরের বিনিময়ে গ্রহণ করে, যাতে তারা তা তাজা (কাঁচা) অবস্থায় খেতে পারে।









আল-জামি` আল-কামিল (5613)


5613 - عن رافع بن خديج، وسهل بن أبي حثمة حدثا أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن المزابنة، بيع الثمر بالتمر إلا أصحاب العرايا، فإنه أذن لهم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المساقاة (2383، 2384)، ومسلم في البيوع (1540: 70) كلاهما من حديث أبي أسامة قال: أخبرني الوليد بن كثير قال: أخبرني بُشير بن يسار مولى بني حارئة أن رافع بن خديج وسهل بن أبي حثمة حدثاه فذكر الحديث.

وقال البخاري: وقال ابن إسحاق: حدثني بشير مثله.

قلت: ذكر البخاري متابعة محمد بن إسحاق للوليد بن كثير، وهو المخزومي، أبو محمد المدني، فإنه مختلف فيه، فضعفه ابن سعد، ووثّقه ابن معين، وأبو داود، غير أنه حسن الحديث.

وقوله:"العرية"، و"العرايا" هي بيع ثمر نخلات معلومات بعد بدو الصلاح فيها خرصا بالتمر الموضوع على وجه الأرض كيلا، استثناه الشارع من المزابنة لحاجة النّاس إلى ذلك.

وسميت عرية؛ لأنها عريت من جملة التحريم، أي خرجت. فعيلة بمعنى فاعلة. ثم إن صور العرية كثيرة، وإليكم بعض ما ذكره الحافظ ابن حجر في الفتح: منها أن يقول الرجل لصاحب حائط: بعني ثمر نخلات بأعيانها بخرصها من التمر. فيخرصها، ويبيعه، ويقبض منه التمر، ويسلم إليه النخلات بالتخلية.

ومنها أن يهب صاحب الحائط لرجل نخلات أو ثمر نخلات معلومة من حائطه، ثم يتضرر بدخوله عليه، فيخرصها، ويشتري منه رطبها بقدر خرصه بتمر يعجله له.

ومنها أن يبيع الرجل تمر حائطه بعد بدو صلاحه، ويستثني منه نخلات معلومة يبقيها لنفسه ولعياله، وهي التي عفي له عن خرصها في الصدقة، فرخص لأهل الحاجة الذين لا نقد لهم،
وعندهم فضول من تمر قوتهم أن يبتاعوا بذلك التمر من رطب تلك النخلات بخرصها.

وقد ذهب أكثر الفقهاء إلى جواز هذه الصور، منهم الأوزاعيّ، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، وأبو عبيد، وغيرهم.

وقد فصّلت القول فيه في"المنة الكبرى" (5/ 98 - 107)، فراجعه لمعرفة المزيد.




রাফে' ইবনে খাদীজ ও সাহল ইবনে আবী হাছমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা দু’জন বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযাবানা পদ্ধতি অর্থাৎ ফলকে শুকনো খেজুরের বিনিময়ে বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। তবে 'আরায়া' (عرية)-এর মালিকেরা ছাড়া। কেননা তিনি তাদেরকে (তা করার) অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5614)


5614 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أرخص في بيع العرايا بخرصها فيما دون خمسة أوسق، أو في خمسة أوسق.

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (14) عن داود بن الحصين، عن أبي سفيان مولى ابن أبي أحمد، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاريّ في البيوع (2190)، ومسلم في البيوع (1541) كلاهما من طريق مالك به مثله.

زاد مسلم: يشك داود قال: خمسة، أو دون خمسة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঁচ ওয়াসাক অথবা পাঁচ ওয়াসাকের কম পরিমাণে আনুমানিক (খারস) মূল্যে ‘আরায়া’ বিক্রি করার অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5615)


5615 - عن جابر بن عبد اللَّه الأنصاري قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حين أذن لأصحاب العرايا أن يبيعوها بخرصها يقول:"الوسق، والوسقين، والثلاثة، والأربعة".

حسن: رواه الإمام أحمد (14868)، وأبو يعلى (1780)، وصحّحه ابن حبان (5008)، وابن خزيمة (2469) كلهم من حديث محمد بن إسحاق قال: حدثني محمد بن يحيى بن حبان، عن عمه واسع بن حَبان، عن جابر فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وهو مدلس إلا أنه صرّح بالتحديث.

"والأوسق" جمع وسق، وهو ستون صاعا، والصاع خمسة أرطال وثلث، والمجموع ثلاث مائة صاع، وهي تساوي اليوم (700) كيلو جرام تقريبا.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, যখন তিনি 'আরায়্যা'র অধিকারীদেরকে তাদের ফল অনুমান (خرص) করে বিক্রি করার অনুমতি দিলেন, তখন তিনি বলেছিলেন: এক ওয়াসাক, দুই ওয়াসাক, তিন ওয়াসাক এবং চার ওয়াসাক।









আল-জামি` আল-কামিল (5616)


5616 - عن زيد أبي عياش أنه سأل سعد بن أبي وقاص عن البيضاء بالسلت، فقال له سعد: أيتهما أفضل؟ قال: البيضاء. فنهاه عن ذلك. وقال سعد: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يسأل عن اشتراء التمر بالرطب، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أينقص الرطب إذا يبس؟" فقالوا: نعم، فنهى عن ذلك.

حسن: رواه مالك في البيوع (22) عن عبد اللَّه بن يزيد أن زيدا أبا عياش أخبره فذكره.

ومن طريق مالك رواه أبو داود (3359)، والترمذي (1225)، والنسائي (4549)، وابن ماجه (2264)، وأحمد (1515)، وابن حبان (4997)، والحاكم (2/ 38)، والبيهقي (5/ 294) كلهم
من هذا الطريق.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، والعمل على هذا عند أهل العلم".

وتابع مالكا إسماعيل بن أمية، والضحاك بن عثمان، وأسامة بن زيد.

وخالفهم جميعا يحيى بن أبي كثير، ومن طريقه رواه أبو داود (3360)، والدارقطني (3/ 49)، والحاكم (2/ 38 - 39)، والبيهقي (5/ 294)، فزاد في آخر الحديث:"نسيئة".

قال الدارقطني:"واجتماع هؤلاء الأربعة على خلاف ما رواه يحيى يدل على ضبطهم للحديث، وفيهم إمام حافظ، وهو مالك بن أنس".

وقال البيهقي بعد أن نقل كلام الدارقطني:"والعلة المنقولة في هذا الخبر تدل على خطأ هذه اللفظة، وقد رواه عمران بن أبي أنس، عن أبي عياش نحو رواية الجماعة".

والخلاصة أن ذكر"نسيئة" في هذا الحديث شاذ.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح إجماع أئمة النقل على إمامة مالك بن أنس، وأنه محكم في كل ما يرويه من الحديث إذ لم يوجد في رواياته إلا الصحيح، خصوصا في حديث أهل المدينة، ثم لمتابعة هؤلاء الأئمة إياه في روايته عن عبد اللَّه بن يزيد، والشيخان لم يخرجاه لما خشياه من جهالة زيد أبي عياش".

قلت: زيد أبو عياش هو زيد بن عياش المدني، وثّقه الدارقطني، وذكره ابن حبان في الثقات (6/ 311).

وقوله هذا يدل على أنه لو لم تكن هذه العلة عندهما لأخرجاه، والأمر ليس كما قال؛ فإنهما لم يلتزما إخراج جميع ما صح.

قوله:"البيضاء" نوع من البر أبيض اللون.

و"السلت" نوع آخر غير البر، وهو أدق حبا منه.

وقال بعضهم: البيضاء هو الرطب من السُلت، وهذا أليق بمعنى الحديث بدليل أنه شبهه بالرطب مع التمر، ولو اختلف الجنس لم يصح التشبيه.

وقال الخطابي:"وهذا الحديث أصل في أبواب كثيرة من مسائل الربا، وذلك أن كل شيء من المطعوم مما له نداوة ولجفافه نهاية فإنه لا يجوز رطبه بيابسه، كالعنب والزبيب، واللحم النيء بالقديد ونحوهما".

وقال:"وقد ذهب أكثر الفقهاء إلى أن بيع الرطب بالتمر غير جائز، وهو قول مالك، والشافعي، وأحمد بن حنبل. وبه قال أبو يوسف، ومحمد بن الحسن. وعن أبي حنيفة جواز بيع الرطب بالتمر نقدا، ويشبه أن يكون تأويل الحديث عنده على النسيئة دون النقد". انتهى.

وذلك أن الرطب والتمر إما أن يكونا جنسين مختلفين، فيجوز بيعهما ولو متفاضلين إذا كان يدا
بيد، وإما أن يكونا جنسا واحدا فيجوز بيعهما بشرط التماثل وأن يكون يدا بيد، وعلى التقديرين فلا يمنع بيع أحدهما بالآخر. انظر البناية (7/ 369 - 370).

وعلى هذا حملوا النهي على النسيئة دون النقد.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যায়দ আবূ আইয়াশ তাঁকে ‘আল-বায়দা’ এর বিনিময়ে ‘আস-সালত’ ক্রয়-বিক্রয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। সা’দ তাকে জিজ্ঞেস করলেন: “এই দুটির মধ্যে কোনটি উত্তম?” তিনি (যায়দ) বললেন: ‘আল-বায়দা’। তখন সা’দ তাকে তা করতে নিষেধ করলেন।
সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খেজুরের বিনিময়ে তাজা (আর্দ্র) খেজুর ক্রয় করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে শুনেছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাজা খেজুর শুকিয়ে গেলে কি কমে যায়?” তারা বললেন: “হ্যাঁ।” এরপর তিনি তা করতে নিষেধ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5617)


5617 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الثمار حتى يبدو صلاحها، نهى البائع والمشتري.

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (10) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ورواه البخاريّ في البيوع (2194)، ومسلم في البيوع (1534: 49) كلاهما من طريق مالك به مثله.

ورواه البخاري (1486) من طريق عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر نحوه، وزاد:"وكان إذا سئل عن صلاحها قال:"حتى تذهب عاهته".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল পাকার (উপযোগিতা) স্পষ্ট না হওয়া পর্যন্ত তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। তিনি বিক্রেতা ও ক্রেতা উভয়কেই নিষেধ করেছেন।

আর তাঁকে যখন এর উপযোগিতা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হত, তখন তিনি বলতেন: "যতক্ষণ না তার ত্রুটি দূর হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5618)


5618 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع النخل حتى يزهو، وعن السنبل حتى يبيض ويأمن العاهة، نهى البائع والمشتري.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1535) من طرق عن إسماعيل، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ومن هذا الوجه رواه كل من أبي داود (3368)، والترمذي (1226)، والنسائي (4551).

قال البيهقي (5/ 303): وذكر السنبل في هذا الحديث مما تفرّد به أيوب السختياني، عن نافع من بين أصحاب نافع، وأيوب ثقة حجة، والزيادة من مثله مقبولة، وهذا الحديث مما اختلف البخاري ومسلم في إخراجه في الصحيح، فأخرجه مسلم، وتركه البخاري، فقد روى حديث النهي عن بيع الثمرة حتى يبدو صلاحها: يحيى بن سعيد الأنصاري، وموسى بن عقبة، ومالك بن أنس، وعبيد اللَّه بن عمر، والضحاك بن عثمان، وغيرهم، عن نافع، لم يذكر واحد منهم فيه النهي عن بيع السنبل حتى يبيض غير أيوب، ورواه سالم بن عبد اللَّه، وعبد اللَّه بن دينار، وغيرهما عن ابن عمر، لم يذكر واحد منهم فيه ما ذكر أيوب، ورواه جابر بن عبد اللَّه الأنصاري، وزيد بن ثابت، وعبد اللَّه بن عباس، وأبو هريرة، وغيرهم عن النبي صلى الله عليه وسلم، لم يذكر واحد منهم فيه ما ذكر أيوب إلا ما رواه حماد بن سلمة، عن حميد الطويل، عن أنس بن مالك قال:"نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع الحب حتى يشتد، وعن بيع العنب حتى يسود، وعن بيع الثمر حتى يزهو". انتهى.

والزهو في التمر أن يحمر، أو يصفر، وذلك إمارة الصلاح فيها، ودليل سلامتها من الآفة.

وقوله:"عن السنبل حتى يبيض" ظاهره بيع الحب في السبل إذا اشتد، وأبيض، وبه قال جمهور العلماء: أبو حنيفة، ومالك، وأهل المدينة والكوفة، ومنعه الشافعي بحجة الغرر
والجهالة. ولكن نقل ابن التركماني عن الشافعي أنه لما وصلته هذه الزيادة رجع عن قوله، وذلك أنه لا يجوز عنده قياس مع وجود الحديث.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুর (গাছের ফল) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তা লাল বা হলুদ (পাকা শুরু) হয়, এবং শীষ (শস্য) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তা সাদা হয় এবং বিপদ (ক্ষতি) থেকে নিরাপদ হয়। তিনি ক্রেতা ও বিক্রেতা উভয়কেই নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5619)


5619 - عن عثمان بن عبد اللَّه بن سراقة قال: كنا في سفر، ومعنا ابن عمر، فسألته، فقال: رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لا يُسبح في السفر قبل الصلاة، ولا بعدها. قال: وسألت ابن عمر عن بيع الثمار، فقال نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الثمار حتى تذهب العاهة. قلت: يا أبا عبد الرحمن، وما تذهب العاهة؟ وما العاهة؟ قال: طلوع الثريا.

صحيح: رواه الإمام أحمد (5012، 5015)، والطبراني في الكبير (13287)، والبيهقي (5/ 300) كلهم من طريق ابن أبي ذئب، عن عثمان بن عبد اللَّه بن سراقة فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله:"طلوع الثريا" هو علامة ذهاب عاهة الثمار، وسيأتي مثله عن زيد بن ثابت.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসমান ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে সুরাকাহ বলেন: আমরা এক সফরে ছিলাম এবং ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের সাথে ছিলেন। আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে তিনি সফরে নামাজের পূর্বে বা পরে কোনো (নফল) সালাত আদায় করতেন না। উসমান বলেন: আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ফল বিক্রি করা সম্পর্কেও জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তার ক্ষতি (আ-আহা) দূর হয়। আমি বললাম: হে আবু আবদুর রহমান, ক্ষতি দূর হওয়া মানে কী? আর ক্ষতি (আ-আহা)-ই বা কী? তিনি বললেন: (আকাশে) সুরাইয়া তারকার উদয় হওয়া।









আল-জামি` আল-কামিল (5620)


5620 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع ثمر النخل حتى تزهو. فقلنا لأنس: ما زهوها؟ قال: تحمر، وتصفر، أرأيت إن منع اللَّه الثمرة بم تستحل مال أخيك.

متفق عليه: رواه البخاريّ في البيوع (2208)، ومسلم في المساقاة (1555) كلاهما عن قتيبة، حدّثنا إسماعيل بن جعفر، عن حميد، عن أنس فذكره. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুরের ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তা 'যাহ্ওয়া' প্রাপ্ত হয়। আমরা আনাসকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলাম: ‘যাহ্ওয়া’ কী? তিনি বললেন: যখন তা লাল বা হলুদ হতে শুরু করে। (তারপর তিনি বললেন,) তুমি কি ভেবে দেখেছ, যদি আল্লাহ ফল পাকানো থেকে বিরত রাখেন (বা ফল নষ্ট করে দেন), তবে তুমি তোমার ভাইয়ের সম্পদ কিভাবে হালাল মনে করবে?