হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5621)


5621 - عن أنس بن مالك أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الثمار حتى تُزهِيَ. فقيل له: يا رسول اللَّه، وما تزهي؟ فقال:"حين تحمر". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أرأيت إذا منع اللَّه الثمرة فبم يأخذ أحدكم مال أخيه".

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (11) عن حميد الطويل، عن أنس بن مالك فذكره. ورواه البخاري في البيوع (2198)، ومسلم في المساقاة (1555) كلاهما من طريق مالك به.

وأكد مسلم بروايته عن محمد بن عباد، عن عبد العزيز بن محمد، عن حميد، عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن لم يثمرها اللَّه فبم يستحل أحدكم مال أخيه" بأن قوله:"أرأيت إذا منع اللَّه. . ." مرفوع.

ولكن قال أبو حاتم، وأبو زرعة بعد أن سألهما عبد الرحمن عن حديث رواه محمد بن عباد، عن عبد العزيز الدراوردي، عن حميد، عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن لم يثمرها اللَّه فبم يستحل أحدكم مال أخيه" فقالا: هذا خطأ، إنما هو كلام أنس.

قال أبو زرعة:"كذا يرويه الدراوردي، ومالك بن أنس مرفوعا. والناس يروونه موقوفة من كلام أنس". انتهى."العلل" (1/ 378 - 379).

وكذلك قال الدارقطني في"التتبع" (ص 475 - 478):"وقد خالف مالكا جماعة منهم إسماعيل بن جعفر، وابن المبارك، وهشيم، ومروان، ويزيد بن هارون، وغيرهم، قالوا فيه: قال أنس:"أرأيت إن منع اللَّه الثمرة". وأخرج أيضًا حديث إسماعيل بن جعفر، عَن حميد. وقد فصل
كلام أنس من كلام النبي صلى الله عليه وسلم.

وأما عن رواية ابن عباد فقال: إنه أسقط كلام النبي صلى الله عليه وسلم، وأتى بكلام أنس ورفعه عَن النبي صلى الله عليه وسلم. وهذا خطأ قبيح". انتهى.

وذكر البيهقي (5/ 300) سفيان الثوري ممن وقفه على أنس، وقال:"ومالك بن أنس جعله من قول النبي صلى الله عليه وسلم، وتابعه على ذلك الدراوردي من رواية محمد بن عباد عنه". انتهى.

ورد على هؤلاء جميعًا الحافظ ابن عبد البر في التمهيد (2/ 190 - 191)، فقال:"يزعم قوم أنه من قول أنس بن مالك، وهذا باطل بما رواه مالك وغيره من الحفاظ في هذا الحديث إذ جعلوه مرفوعًا من قول النبي صلى الله عليه وسلم. وقد روى أبو الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم مثله". انتهى.

وأما الحافظ ابن حجر فقال في التلخيص (3/ 28):"وقد بينت في المدرج أن هذه الجملة موقوفة من قول أنس، وأن رفعها وهم، وبيانها عند مسلم".

ولكن قال في"الفتح" (4/ 398 - 399) بعد أن نقل تعقب أبي حاتم، وأبي زرعة، والدارقطني:"وليس في جميع ما تقدم ما يمنع أن يكون التفسير مرفوعًا؛ لأن مع الذي رفعه زيادة على ما عند الذي وقفه، وليس في رواية الذي وقفه ما ينفي قول من رفعه. وقد روى مسلم من طريق أبي الزبير عن جابر ما يقوي رواية الرفع في حديث أنس، ولفظه: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو بعت من أخيك ثمرا، فأصابته جائحة، فلا يحل لك أن تأخذ منه شيئًا، بم تأخذ مال أخيك بغير حق؟". انتهى.

وأما حديث جابر بن عبد اللَّه فهو الآتي.

وللحديث طريق آخر: رواه أبو داود (3371)، والترمذي (1228)، وابن ماجه (2217)، وصحّحه ابن حبّان (4993)، والحاكم (2/ 19) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن حميد الطويل، ولفظه:"نهى عن بيع العنب حتى يسود، وبيع الحب حتى يشتد".

وزاد البعض:"وبيع الثمر حتى يزهو".

قال الترمذي:"حسن غريب".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

ولكن أعله البيهقي (5/ 303) بما ليس بعلة، فقال: هذا الحديث تفرد به حماد بن سلمة عن حميد من بين أصحاب حميد. . .".

قلت: حماد بن سلمة ثقة، فلا يضر تفرده، وقد قال الإمام أحمد: حماد بن سلمة أعلم الناس بحديث حميد، وأصح حديثًا. وقال أيضًا: هو أثبت الناس في حميد الطويل، سمع منه قديمًا، يخالف الناس في حديثه.

فمثل هذا لو تفرد فلا يضر تفرده، ويشهد له حديث ابن عمر على هذه الزيادة. انظر للمزيد
"المنة الكبرى" (4/ 87 - 88).




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল পাকার আগে তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তাতে উজ্জ্বলতা আসে। তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! 'উজ্জ্বলতা আসা' মানে কী? তিনি বললেন: যখন তা লাল বর্ণ ধারণ করে। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা বলো তো, যদি আল্লাহ ফল না দেন (অর্থাৎ কোনো বিপর্যয় ঘটে), তবে তোমাদের কেউ কিভাবে তার ভাইয়ের সম্পদ গ্রহণ করবে?









আল-জামি` আল-কামিল (5622)


5622 - عن جابر بن عبد اللَّه يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو بعت من أخيه تمرا، فأصابته جائحة، فلا يحل لك أن تأخذ منه شيئًا، بم تأخذ مال أخيك بغير حق؟".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1554) عن أبي الطاهر، أخبرنا ابن وهب، عن ابن جريج، أن أبا الزبير أخبره عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.

ورواه أيضًا من وجه آخر عن ابن جريج، عن أبي الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول فذكر الحديث.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি তুমি তোমার ভাইয়ের কাছে খেজুর বিক্রি করো, অতঃপর তাতে কোনো বিপদ (বা আপদ) আঘাত হানে, তবে তোমার জন্য তার থেকে কিছুই গ্রহণ করা হালাল হবে না। কী কারণে তুমি তোমার ভাইয়ের সম্পদ অন্যায়ভাবে গ্রহণ করবে?”









আল-জামি` আল-কামিল (5623)


5623 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم أن تباع الثمرة حتى تُشقح. قال: فقلت لسعيد: وما تُشقح؟ قال: تحمار، وتصفار، ويؤكل منها.

متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2196)، ومسلم في البيوع (4536: 84) من طريق سليم ابن حيان، حدّثنا سعيد بن ميناء قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه قال فذكره.




জাবের ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন যতক্ষণ না তা 'তুশাক্কাহ' হয়। তিনি বলেন, আমি (বর্ণনাকারী) সাঈদকে জিজ্ঞেস করলাম: 'তুশাক্কাহ' মানে কী? তিনি বললেন: (এর অর্থ হলো) তা লাল হয়, হলুদ হয় এবং তা থেকে খাওয়া যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (5624)


5624 - عن جابر قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع الثمر حتى يطيب، ولا يباع شيء منه إِلَّا بالدينار والدرهم إِلَّا العرايا.

متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2189) من طريق ابن جريج، عن عطاء، وأبي الزبير، عن جابر فذكره.

ورواه مسلم في البيوع (1536: 53) عن رجلين آخرين، عن أبي الزبير به الشطر الأول منه فقط، ولم يقل:"ولا يباع شيء منه. . . .".

ورواه من طريق عمرو بن دينار، عن جابر بلفظ:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الثمر حتى يبدو صلاحه".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফল পেকে সুস্বাদু না হওয়া পর্যন্ত তা বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। আর আরায়া (Araya) ব্যতীত তার কোনো কিছুই দিনার ও দিরহাম ছাড়া বিক্রি করা যাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (5625)


5625 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تبتاعوا الثمار حتى يبدو صلاحها".

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1538) عن أبي كريب محمد بن العلاء، حدّثنا محمد بن فضيل، عن أبيه، عن ابن أبي نُعم، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه من وجه آخر عن ابن شهاب، حدّثني سعيد بن المسيب، وأبو سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، وزاد فيه:"ولا تبتاعوا الثمر بالتمر".

وأما ما روي عنه بلفظ:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الغنائم حتى تقسم، وعن بيع النخل حتى تحرز من كل عارض، وأن يصلي الرجل بغير حزام". فهو ضعيف.

رواه أبو داود (3369) من حديث شعبة، عن يزيد بن خمير، عن مولى لقريش، عن أبي هريرة فذكره. ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا البيهقي (2/ 240) مختصرًا. وفيه رجل لم يسم.




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা ফল ক্রয় করবে না, যতক্ষণ না সেগুলোর পরিপক্বতা প্রকাশ পায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (5626)


5626 - عن أبي البختري قال: سألت ابن عباس عن بيع النخل، فقال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع النخل حتى يأكل منه أو يؤكل، وحتى يوزن. قال: فقلت: ما يوزن؟ فقال رجل عنده: حتى يُحزَر.

متفق عليه: رواه البخاري في السلم (2246)، ومسلم في البيوع (1537) كلاهما من طريق شعبة، أخبرنا عمرو بن مرة قال: سمعت أبا البختري الطائي فذكره. واللفظ لمسلم.

ولفظ البخاري نحوه إِلَّا أنه قال: سألت ابن عباس عن السلم في النخل. ووقع عنده:"حتى يُحرز" بدل"يحزر".

قال الحافظ في الفتح (4/ 432):"وقوله:"حتى يحرز" بتقديم الراء على الزاي، أي يحفظ، ويصان. وفي رواية الكشميهني: بتقديم الزاي على الراء، أي يوزن أو يخرص. قال: وصوب عياض الأول، ولكن الثاني أليق بذكر الوزن".




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু আল-বাখতারি বলেন: আমি ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খেজুর (ফল) বিক্রয় করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুর বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন যতক্ষণ না তা খাওয়া হয় বা খাওয়ার উপযুক্ত হয়, এবং যতক্ষণ না তা ওজন করা হয়। আবু আল-বাখতারি বলেন, আমি বললাম: ‘ওজন করা হয়’ (ইউযান) বলতে কী বোঝানো হয়েছে? তখন তাঁর কাছে বসা এক ব্যক্তি বললেন: যতক্ষণ না তা অনুমান করা হয় (ইউহযার)।









আল-জামি` আল-কামিল (5627)


5627 - عن ابن عباس كان يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يباع الثمر حتى يُطعم".

صحيح: رواه أحمد (2247)، والطبراني في الكبير (1187، 1188)، وصحّحه ابن حبان (4988) كلهم من طريق عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.

وأما الحاكم (2/ 37) فرواه من طريق سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس. وصحّحه.

وفيه سماك بن حرب، وهو مضطرب في حديث عكرمة، فكان من الأولى أن يخرج الطريق الأول.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ফল খাওয়ার উপযোগী না হওয়া পর্যন্ত তা বিক্রি করা যাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (5628)


5628 - عن زيد بن ثابت قال: كان الناس في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يتبايعون الثمار، فإذا جذ الناس وحضر تقاضيهم قال المبتاع: إنه أصاب الثمر الدُمان، أصابه مرض، أصابه قشام -عاهات يحتجون بها-، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما كثرت عنده الخصومة في ذلك:"فإما لا فلا تتبايعوا حتى يبدو صلاح الثمر" كالمشورة يشير بها لكثرة خصومتهم.

صحيح: رواه أبو داود (3372)، وأحمد (216662)، والبيهقي (5/ 301 - 302) كلهم من حديث يونس بن محمد قال: سألت أبا الزناد عن بيع الثمر قبل أن يبدو صلاحه، وما ذكر في ذلك، فقال: كان عروة بن الزبير يحدث عن سهل بن أبي حثمة، عن زيد بن ثابت قال فذكر الحديث نحوه. هكذا قال أبو داود.

وعلقه البخاري في صحيحه (2193) قال: قال الليث عن أبي الزناد، عن عروة، عن سهل بن أبي حثمة، عن زيد بن ثابت قال فذكره.

قال (أي أبو الزناد): وأخبرني خارجة بن زيد بن ثابت أن زيد بن ثابت لم يكن يبيع ثمار أرضه حتى تطلع الثريا، فيتبين الأصفر من الأحمر.
قال أبو عبد اللَّه (أي البخاري): رواه علي بن بحر، حدثنا حكام، حدثنا عنبسة، عن زكريا، عن أبي الزناد، عن سهل، عن زيد.

وأما أحمد فرواه عن يونس بن محمد، حدثنا عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن أبي الزناد، عن أبيه، عن خارجة بن زيد قال: قال زيد بن ثابت: قدم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم المدينة، ونحن نبتاع الثمار قبل أن يبدو صلاحها. فذكر نحوه.

وإسناده صحيح، وعبد الرحمن بن أبي الزناد فيه كلام يسير، إِلَّا أنه توبع.

وأبو الزناد هو عبد اللَّه بن ذكوان والد عبد الرحمن.

قوله:"جذ الناس" بالجيم والذال المعجمة الثقيلة، أي قطعوا ثمر النخل. والجذاذ صرام النخل، وهو قطع ثمرتها وأخذها من الشجر.

وقوله:"الدمان" فسر بفساد الطلع، وتعفنه، وسواده.

وقوله:"قُشام" فسر في رواية بأنه شيء يصيبه حتى لا يرطب. وقيل: أن ينتقص ثمر النخل قبل أن يصير بلحا.

وقوله:"فإما لا" أصلها"إن" الشرطية، و"ما" زائدة، فأدغمت، والمعنى: إن لم تفعل كذا فافعل كذا.

وقوله:"حتى تطلع الثريا" أي مع الفجر في أول فصل الصيف، وذلك عند اشتداد الحر في بلاد الحجاز، فالمعتبر في الحقيقة النضج، وطلوع الثريا علامة له.

وقول البخاري:"رواه ابن بحر". هو شيخه القطان الرازي. وحكام هو ابن سلم الرازي أيضًا. وعنبسة -بسكون النون- هو ابن سعيد الكوفي، عرف بالرازي أيضًا.

وهذا الحديث أخرجه أبو داود -كما سبق- عن أحمد بن صالح، حدثنا عنبسة بن خالد، عن يونس بن محمد فهو غير عنبسة بن سعيد الذي ذكره البخاري، كما نبه عليه الحافظ ابن حجر في الفتح (4/ 395 - 396)، فهما اثنان، ومن ظن أنهما واحد فقد وهم.

وقال:"وليس لعنبسة بن سعيد في البخاري سوى هذا الموضع الموقوف بخلاف عنبسة بن خالد".




যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে লোকেরা ফল কেনা-বেচা করত। অতঃপর যখন লোকেরা (ফল) কেটে নিত এবং তাদের পাওনা পরিশোধের সময় উপস্থিত হতো, তখন ক্রেতা বলত: ফলকে ‘দুম্মান’ ধরেছে, এতে রোগ লেগেছে, কিংবা ‘কুশাম’ হয়েছে—এগুলো ছিল এমন কিছু ত্রুটি যা দিয়ে তারা (মূল্য হ্রাস করার) যুক্তি দিত। এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট যখন ঝগড়া-বিবাদ বেশি হতে শুরু করল, তখন তিনি বললেন: "যদি তোমরা (এই ঝগড়া এড়াতে) না পারো, তবে ফল পরিপক্বতা স্পষ্ট না হওয়া পর্যন্ত তোমরা ফল বিক্রি করো না।" (এ কথা ছিল) যেন তিনি তাদের অধিক ঝগড়ার কারণে পরামর্শ দিচ্ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5629)


5629 - عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تبيعوا ثماركم حتى يبدو صلاحها، وتنجو من العاهة".

حسن: رواه الإمام أحمد (24407) والحارث في مسنده -بغية الباحث- (ص 470) من حديث عبد الرحمن بن أبي الرجال، عن أبيه، عن عمرة، عن عائشة فذكرته.

ورواه أيضًا (25268) عن أبي عامر قال: حدثنا خارجة بن عبد اللَّه، عن أبي الرجال، عن أمه عمرة، عن عائشة فذكرته.

قال عبد اللَّه: قال أبي:"خارجة ضعيف الحديث".
قلت: خارجة بن عبد اللَّه هو ابن سلمان بن زيد بن ثابت، قال ابن معين:"ليس به بأس". وقال أبو حاتم:"شيخ حديثه صالح". ومن هذا الطريق رواه أيضًا الطحاوي في شرحه (4/ 23)، وابن عبد البر في التمهيد (13/ 134).

ثم هو لم ينفرد به، بل تابعه عبد الرحمن بن أبي الرجال، عن أبيه، كما سبق. ولكن أرسله مالك في البيوع (12) عن أبي الرجال، فلم يذكر فيه عائشة. والحكم لمن وصله.

قال الدارقطني في العلل (14/ 425):"يرويه أبو الرجال، واختلف عنه: فرواه خارجة بن عبد اللَّه بن سليمان، عن أبي الرجال، عن عمرة، عن عائشة، وتابعه ابن أبي الرحال عن أبيه.

ورواه مالك عن أبي الرحال، عن عمرة مرسلًا. ومن عادة مالك أن يرسل أحاديث". انتهى.

فلم ير إرسال مالك علة قادحة في الحديث؛ لأنه جعل الإرسال من عادة مالك احتياطا، وغيره يرويه موصولًا.

وقال ابن عبد البر بعد أن أسند الحديث من طريق خارجة بن عبد اللَّه، وذكر من شواهده حديث ابن عمر، وأبي سعيد:

"وروي عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من وجوه كثيرة كلها صحاح ثابتة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الثمار حتى يبدو صلاحها، وحتى تزهي، وحتى تحمر، وحتى تُطعم، وحتى تخرج من العاهة. ألفاظ كلها محفوظة، ومعناها واحد". انتهى.

وفي معناه ما روي عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تبيعوا الثمر حتى يبدو صلاحها". قيل: وما صلاحها؟ قال:"تذهب عاهتها، ويخلص صلاحها".

رواه البزار -كشف الأستار (1291) - من طريق ابن أبي يعلى، عن عطية، عن أبي سعيد فذكره.

وذكره الهيثمي في"المجمع" (4/ 102)، وعزاه أيضًا إلى الطبراني في الأوسط، وقال:"وفي إسناد البزار عطية، وهو ضعيف، وقد وثق. وفي إسناد الطبراني جابر الجعفي، وهو ضعيف، وقد وثق". انتهى.

وفي الباب أيضًا عن أبي أمامة، وسعد بن أبي وقاص، وعلي بن أبي طالب، وكلها ضعيفة.

فقه هذا الباب:

1 - العمل على هذا عند أهل العلم، لا يرون بيع الثمار قبل بدو الصلاح للعلة التي ذكرت في الحديث.

2 - ولكن لو باع، واشترط القطع لجاز باتفاق أهل العلم؛ لأنه يأمن بالقطع من الهلاك بالآفة والعاهة. وفيه انتفاء العلة التي جاء النهي من أجلها.

3 - وبدو الصلاح يختلف باختلاف أنواع الثمرة، ففي الرطب حتى يصير بسرا، وهو أن يرى فيه نقط الحمرة، والسواد. وفي الكوخ والكمثرى والمشمش والتفاح بأن يطيب بحيث يستطاع
أكله. وفي البطيخ بأن يرى فيه أثر النضج، وفي القثاء والباذنجان بأن يجتنى في الغالب.

4 - وطلوع النجم -هو الثريا- علامة بداية فصل الصيف، وهو ابتداء نضج الثمار، فالمعتبر في الحقيقة هو النضج، وطلوع النجم علامة له، كما جاء في الحديث:"حتى يتبين الأصفر من الأحمر".

5 - إذا بدا الصلاح في بعضه جاز بيع الكل إذا اتفق الجنس، فإن اختلف فالعبرة ببدء الصلاح في كل جنس، إِلَّا إذا اشترط القطع فيما لم يبد فيه الصلاح، فجاز بيع الجميع.

6 - وكذلك لا يجوز بيع الزرع قبل اشتداد الحب في السنبل، كما جاء في حديث ابن عمر. وكان الشافعي يمنع أولا عن بيع الحب في السنبل، ولكن لما وصل إليه حديث ابن عمر رجع، وقال بما يدل عليه الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের ফল বিক্রি করো না, যতক্ষণ না সেগুলোর পরিপক্বতা প্রকাশ পায় এবং তা বিপদ বা রোগমুক্ত হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5630)


5630 - عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم أمر بوضع الجوائح.

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1554: 17) من طريق سفيان بن عينة، عن حميد الأعرج، عن سليمان بن عتيق، عن جابر فذكره.

ورواه الشافعي في الأم (3/ 56) عن سفيان بإسناده، وفيه:"أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع السنين، وأمر بوضع الجوائح".

قال الشافعي:"سمعت سفيان يحدث هذا الحديث كثيرًا في طول مجالستي له، لا أحصي ما سمعته يحدثه من كثرته لا يذكر فيه"أمر بوضع الجوائح" لا يزيد على أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع السنين، ثم زاد بعد ذلك،"وأمر بوضع الجوائح".

قال الشافعي:"قال سفيان: وكان حميد يذكر بعد بيع السنين كلاما قبل وضع الجوائح لا أحفظه، فكنت أكف عن ذكر وضع الجوائح؛ لأني لا أدري كيف كان الكلام. وفي الحديث"أمر بوضع الجوائح".

إلى أن قال: فقد يجوز أن يكون الكلام الذي لم يحفظه سفيان من حديث حميد عن حميد يدل على أن أمره بوضعها على مثل أمره بالصلح على النصف، وعلى مثل أمره بالصدقة تطوعا حضا على الخير لا حتما، وما أشبه ذلك. ويجوز غيره، فلما احتمل الحديث المعنيين معا، ولم تكن فيه دلالة على أيهما أولى به لم يجز عندنا -واللَّه أعلم- أن يحكم على الناس في أموالهم بوضع ما وجب لهم بلا خبر عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يثبت بوضعه". انتهى.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'জাওয়াইহ' (প্রাকৃতিক দুর্যোগে ফসলের ক্ষতি) মাফ করার নির্দেশ দিয়েছেন।

সহীহ: এটি মুসলিম তার মুসাকাত অধ্যায়ে (১৫৫৪: ১৭) সুফিয়ান ইবনে উয়াইনা থেকে, তিনি হুমাইদ আল-আ'রাজ থেকে, তিনি সুলাইমান ইবনে আতিক থেকে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

শাফিঈ এটি আল-উম্ম (৩/৫৬) গ্রন্থে সুফিয়ান থেকে তার সনদ সহ বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছে: "নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কয়েক বছরের জন্য ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন এবং 'জাওয়াইহ' মাফ করার নির্দেশ দিয়েছেন।"

শাফিঈ বলেন: আমি সুফিয়ানকে দীর্ঘ সময় তার মজলিসে এই হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি। আমি গণনা করতে পারব না কতবার তাকে এটি বর্ণনা করতে শুনেছি। তিনি তাতে "আদেশ দিয়েছেন 'জাওয়াইহ' মাফ করার" এই অংশটি উল্লেখ করতেন না। তিনি কেবল এতটুকু বলতেন যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কয়েক বছরের জন্য ফল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। এরপর তিনি অতিরিক্ত যোগ করেন, "এবং 'জাওয়াইহ' মাফ করার নির্দেশ দিয়েছেন।"

শাফিঈ বলেন: সুফিয়ান বলেছেন, হুমাইদ আল-আ'রাজ ফল বিক্রির নিষেধাজ্ঞার পরে 'জাওয়াইহ' মাফ করার কথার আগে কিছু কথা বলতেন, যা আমার মুখস্থ নেই। ফলে আমি 'জাওয়াইহ' মাফ করার অংশটি উল্লেখ করা থেকে বিরত থাকতাম, কারণ আমি জানতাম না কথাটি কেমন ছিল। হাদীসটিতে "আদেশ দিয়েছেন 'জাওয়াইহ' মাফ করার" কথাটি রয়েছে।

তিনি (শাফিঈ) এ পর্যন্ত বলেন: অতএব, এটা হতে পারে যে হুমাইদ আল-আ'রাজ থেকে সুফিয়ান যে কথাটি মুখস্থ রাখতে পারেননি, তা এই বিষয়ে ইঙ্গিত করে যে তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাফ করার আদেশটি ছিল অর্ধেক ফল দিয়ে সন্ধি করার আদেশের মতো, কিংবা নফল সদকা করার মাধ্যমে ভালো কাজের প্রতি উৎসাহিত করার মতো—যা আবশ্যিক (ফরয) নয়, বরং উৎসাহমূলক। অথবা এর বিপরীতও হতে পারে। যেহেতু হাদীসটি উভয় অর্থই বহন করে এবং কোনটি প্রাধান্য পাবে তার কোনো প্রমাণ নেই, তাই আমাদের কাছে—আল্লাহই ভালো জানেন—তাদের সম্পদ থেকে তাদের প্রাপ্য অংশ মাফ করে দেওয়ার জন্য মানুষের উপর হুকুম জারি করা জায়েয নয়, যদি না রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এর আবশ্যকতা প্রমাণকারী কোনো খবর সাব্যস্ত হয়। [কথাটি এখানে শেষ হলো।]









আল-জামি` আল-কামিল (5631)


5631 - عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع السنين، وَوَضَعَ الجوائح.

صحيح: رواه أبو داود (3374) عن أحمد بن حنبل ويحيى بن معين قالا: حدثنا سفيان، عن حميد الأعرج، عن سليمان بن عتيق، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
ورواه النسائي (4529) عن محمد بن عبد اللَّه بن يزيد قال: حدثنا سفيان بإسناده، وفيه:"أن النبي صلى الله عليه وسلم وضع الجوائح".

ورواه ابن حبان (5031) من حديث يحيى بن معين، عن ابن عيينة بإسناده، وفيه:"أن النبي صلى الله عليه وسلم أمر بوضع الجوائح".

ورواه البيهقي (5/ 306) بعد أن ذكر قول الشافعي، كما مضى، قال:"وقد روي ذلك عن أبي الزبير، عن جابر. ثم رواه من طريق علي بن عبد اللَّه، عن سفيان، عن حميد بن قيس، عن سليمان بن عتيق، عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم أمر بوضع الجوائح.

قال علي (ابن عبد اللَّه المديني): وقد كان سفيان حدثنا عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه وضع الجوائح. كذا أتى به سفيان". انتهى.

وبهذه الطرق تبين أن ما رواه سفيان في وضع الجوائح لا يشك فيه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বহু বছরের (আগাম) ফসল বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন এবং দৈব-দুর্বিপাকের (ক্ষতিপূরণ) মওকুফ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5632)


5632 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو بعت من أخيك ثمرا فأصابته جائحة، فلا يحل لك أن تأخذ منه شيئًا، بم تأخذ مال أخيك بغير حق؟".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1554: 14) عن أبي الطاهر، أخبرنا ابن وهب، عن ابن جريج أن أبا الزبير أخبره عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তুমি তোমার কোনো ভাইয়ের কাছে ফল বিক্রি করো, অতঃপর তাতে কোনো দুর্যোগ (যা ফসল ধ্বংস করে) আঘাত হানে, তাহলে তোমার জন্য তার কাছ থেকে কিছু নেওয়া হালাল নয়। বিনা অধিকারে তোমার ভাইয়ের সম্পদ তুমি কেন নেবে?"









আল-জামি` আল-কামিল (5633)


5633 - عن أبي سعيد الخدري قال: أصيب رجل في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في ثمار ابتاعها، فكثر دينه، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تصدقوا عليه". فتصدق الناس عليه، فلم يبلغ ذلك وفاء دينه، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لغرمائه:"خذوا ما وجدتم، وليس لكم إِلَّا ذلك".

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1556) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن بكير، عن عياض بن عبد اللَّه، عن أبي سعيد الخدري فذكره. لعله ابتاع الثمر قبل بدو صلاحها، فأصابته الجائحة.

وقد أخذ بهذه الأحاديث أحمد بن حنبل، وأبو عبيد، وجماعة من أصحاب الحديث، فقالوا: وضع الجائحة لازم للبيع.

قال الخطابي:"وأمره بوضع الجوائح عند أكثر الفقهاء أمر ندب واستحباب من طريق المعروف والإحسان، لا على طريق الوجوب والإلزام".

وقال:"واستدل من تأول الحديث على معنى الندب والاستحباب دون الإيجاب بأنه أمر حدث بعد استقرار ملك المشتري عليها، فلو أراد أن بيعها أو يهبها لمح ذلك منه فيها، وقد نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن"ربح ما لم يضمن" فإذا صح بيعها ثبت أنها من ضمانه، وقد نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الثمرة قبل بدو صلاحها، فلو كانت الجائحة بعد بدو الصلاح من مال البائع لم يكن لهذا النهي فائدة". انتهى.




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি ফল ক্রয় করার কারণে ক্ষতিগ্রস্ত হন এবং তার ঋণ বেড়ে যায়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা তাকে দান করো।” ফলে লোকেরা তাকে দান করল, কিন্তু তা তার ঋণ পরিশোধের জন্য যথেষ্ট হলো না। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পাওনাদারদের বললেন: “তোমরা যা পাও, তাই নিয়ে নাও। তোমাদের জন্য এছাড়া আর কিছুই নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (5634)


5634 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه عن بيع الحصاة، وعن بيع الغرر.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1513) من طرق عن عبيد اللَّه، حدثني أبو الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة قال فذكره.

قال النووي في شرح مسلم (10/ 155 - 156):"بيع الحصاة فيه ثلاث تأويلات:

أحدها أن يقول: بعتك من هذه الأثواب ما وقعت عليه الحصاة التي أرميها، أو بعتك من هذه الأرض من هنا إلى ما انتهت إليه هذه الحصاة.

والثاني: أن يقول: بعتك على أنك بالخيار إلى أن أرمى بهذه الحصاة.

والثالث: أن يجعلا نفس الرمي بالحصاة بيعا فيقول إذا رميت هذا الثوب بالحصاة فهو مبيع منك بكذا.

وأما النهي عن بيع الغرر فهو أصل عظيم من أصول كتاب البيوع، ولهذا قدمه مسلم، ويدخل فيه مسائل كثيرة غير منحصرة، كبيع الآبق، والمعدوم، والمجهول، وما لا يقدر على تسليمه، وما لم يتم ملك البائع عليه، وبيع السمك في الماء الكثير، واللبن في الضرع، وبيع الحمل في البطن، وبيع بعض الصبرة مبهما، وبيع ثوب من أثواب، وشاة من شياه، ونظائر ذلك. وكل هذا بيعه باطل؛ لأنه غرر من غير حاجة. وقد يحتمل بعض الغرر يعا إذا دعت إليه حاجة، كالجهل بأساس الدار، وكما إذا باع الشاة الحامل، والتي في ضرعها لبن، فإنه يصح للبيع؛ لأن الأساس تابع للظاهر من الدار، ولأن الحاجة تدعو إليه، فإنه لا يمكن رؤيته. وكذا القول في حمل الشاة ولبنها". انتهى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বায়উল হাসাহ (পাথর নিক্ষেপের মাধ্যমে বিক্রয়) এবং বায়উল গারার (অনিশ্চিত বা ঝুঁকিপূর্ণ বিক্রয়) থেকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5635)


5635 - عن ابن عمر قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الغرر.

حسن: رواه الإمام أحمد (6307) عن يعلى ومحمد قالا: حدثنا محمد -يعني ابن إسحاق-، حدثني نافع، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق؛ فإنه مدلس، ولكنه صرّح بالتحديث.

ورواه ابن حبان في صحيحه (4972) من طريق محمد بن عبد الأعلى قال: حدثنا معتمر، عن أبيه، عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله.

ومعتمر هو ابن سليمان التيمي، وقد قيل: إن بين سليمان التيمي وبين نافع رجلا، وقد مشى على ظاهره ابن حبان، فأخرجه في صحيحه، وكذا أخرجه غيره أيضًا، وصحح إسناده.

وحسنه ابن حجر في التلخيص (3/ 6)، ولم يعزُ الحديث إلى أحمد، فلعله لم يقف عليه. ثم إنه جمع بين ابن حبان والبيهقي في الإسناد المذكور مع أن البيهقي رواه من طريق أخرى من طريق
سفيان، عن ابن أبي يعلى، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وابن أبي يعلى سيء الحفظ إِلَّا أنه توبع في إسناد أحمد.

وفي الباب ما روي عن شيخ من بني تميم قال: خطبنا علي بن أبي طالب، -أو قال- قال علي:"سيأتي على الناس زمان عضوض يعضُّ الموسر على ما في يديه، ولم يؤمر بذلك. قال اللَّه تعالى: {وَلَا تَنْسَوُا الْفَضْلَ بَيْنَكُمْ} [سورة البقرة: 237] ويبايع المضطرون، وقد نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع المضطر، وبيع الغرر، وبيع الثمرة قبل أن تدرك.

رواه أبو داود (3382) عن محمد بن عيسى، حدثنا هشيم، أخبرنا صالح بن عمر، حدثنا شيخ من بني تميم فذكره.

ورواه الإمام أحمد (937) عن هشيم قال: أخبرنا أبو عامر المزني، حدثنا شيخ من بني تميم فذكره. وفي الإسناد رجل لم يسم.

و"العضوض" الكلب، فيه عسف وظلم.

وفي الباب أيضًا عن ابن عباس قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الغرر.

رواه ابن ماجه (2195) من طريق الأسود بن عامر، وعنه الإمام أحمد (2752) عن أيوب بن عتبة، عن يحيى بن أبي كثير، عن عطاء، عن عبد اللَّه بن عباس فذكره.

وأيوب بن عتبة هو اليمامي، أبو يحيى القاضي، وهو من رجال ابن ماجه وحده، ضعيف عند جمهور أهل العلم.

ورواه الطبراني في الكبير (11655) من وجه آخر، ولكن فيه النضر أبو عمر، متروك، كما قال الهيثمي في المجمع (4/ 80).

وذكر أحمد: قال أيوب: وفسَّر يحيى بيع الغرر قال: إن من الغرر ضربة الغائص، وبيع الغرر العبد الآبق، وبيع البعير الشارد، وبيع الغرر ما في بطون الأنعام، وبيع الغرر تراب المعادن، وبيع الغرر ما في ضروع الأنعام إِلَّا بكيل. اهـ.

وفي الباب أيضًا ما رواه مالك في البيوع (75) عن أبي حازم بن دينار، عن سعيد بن المسيب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الغرر.

هذا مرسل باتفاق رواة الموطأ.

ورواه عبد العزيز بن أبي حازم عن أبيه، عن سهل بن سعد، أخرجه الطبراني في الكبير (6/ 212)، وابن عبد البر في التمهيد (21/ 135)، وقال:"هذا خطأ، ولم يرو هذا الحديث أبو حازم عن سهل، وإنما رواه عن سعيد بن المسيب، كما قال مالك، وليس ابن أبي حازم في الحديث ممن يحتج به فيما خالف غيره، وهو عندهم لين الحديث، ليس بحافظ، والحديث محفوظ من حديث أبي هريرة، ومعلوم أن سعيد بن المسيب من كبار رواة أبي هريرة". انتهى.
ورجح البيهقي إرساله، وقال:"وقد روينا موصولا من حديث الأعرج، عن أبي هريرة، ومن حديث نافع، عن ابن عمر"، السنن الكبرى (5/ 338).

إِلَّا أن بعض أهل العلم يرون أن عبد العزيز بن أبي حازم احتج به الشيخان، فزيادته مقبولة، ولكن الصحيح ما قاله ابن عبد البر؛ فإن مخالفة ابن أبي حازم لمثل مالك لا تقبل.

والغرر هو كل شيء يغر المشتري ظاهره، وباطنه مجهول وهو لا يدري.

ذكر مالك رحمه الله عدة صور من الغرر والمخاطرة، منها أن يعمل الرجل قد ضلت دابته، أو أبق غلامه، وثمن الشيء من ذلك خمسون دينارا، فيقول رجل: أنا آخذه منك بعشرين دينارا، فإن وجده المبتاع ذهب من البائع ثلاثون دينارًا، وإن لم يجده ذهب البائع من المباتع بعشرين دينارًا.

قال مالك: وفي ذلك عيب آخر: إن تلك الضالة إن وجدت لم يدر أزادت أم نقصت، أم حدث بها من العيوب، فهذا أعظم المخاطرة". انتهى.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'বায়‘ আল-গারার' (অনিশ্চিত ও ঝুঁকিপূর্ণ ক্রয়-বিক্রয়) করতে নিষেধ করেছেন।

এ অধ্যায়ে বনু তামিম গোত্রের জনৈক শায়খের সূত্রে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের উদ্দেশ্যে খুৎবা প্রদান করেন – অথবা তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: মানুষের উপর এমন এক কঠিন সময় আসবে, যখন সম্পদশালী ব্যক্তি তার হাতে যা আছে তা আঁকড়ে ধরে রাখবে, অথচ তাকে এর নির্দেশ দেওয়া হয়নি। আল্লাহ তা‘আলা বলেন: “তোমরা নিজেদের মধ্যে অনুগ্রহের কথা ভুলে যেও না।” [সূরাহ আল-বাক্বারাহ: ২৩৭]। (সেই সময়ে) অভাবগ্রস্ত লোকেরা (বাধ্য হয়ে) ক্রয়-বিক্রয় করবে। অথচ নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বাধ্য ব্যক্তির ক্রয়-বিক্রয়, অনিশ্চিত ও ঝুঁকিপূর্ণ ক্রয়-বিক্রয় (বায়‘ আল-গারার) এবং ফল পাকার পূর্বে তা ক্রয়-বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন।

এ অধ্যায়ে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত আছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ‘বায়‘ আল-গারার’ (অনিশ্চিত ও ঝুঁকিপূর্ণ ক্রয়-বিক্রয়) করতে নিষেধ করেছেন।

আল-গারার হলো এমন প্রতিটি জিনিস, যার বাহ্যিক রূপ ক্রেতাকে প্রলুব্ধ করে, কিন্তু তার অভ্যন্তরীণ অবস্থা অজানা এবং ক্রেতা তা সম্পর্কে অবগত নয়।

মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) গারার ও ঝুঁকির বেশ কয়েকটি দৃষ্টান্ত উল্লেখ করেছেন। তার মধ্যে রয়েছে, যখন কোনো ব্যক্তির পশু হারিয়ে যায় অথবা গোলাম পালিয়ে যায়, আর জিনিসটির দাম পঞ্চাশ দীনার। তখন অন্য এক ব্যক্তি বলে, আমি তোমার কাছ থেকে বিশ দীনার দিয়ে এটি কিনে নেব। যদি ক্রেতা এটিকে খুঁজে পায়, তবে বিক্রেতার ত্রিশ দীনার ক্ষতি হবে। আর যদি না খুঁজে পায়, তবে ক্রেতার বিশ দীনার ক্ষতি হবে।

মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এতে আরেকটি ত্রুটি রয়েছে: যদি হারানো বস্তুটি পাওয়া যায়, তবে তা বেড়েছে নাকি কমেছে, নাকি তাতে কোনো ত্রুটি দেখা দিয়েছে—তা জানা যাবে না। এটাই হলো সবচেয়ে বড় ঝুঁকি।









আল-জামি` আল-কামিল (5636)


5636 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع حبل الحبلة، وكان بيعا يتابيعه أهل الجاهلية، كان الرجل يبتاع الجزور إلى أن تنتج الناقة، ثم تنتج التي في بطنها.

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (62) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في البيوع (2143) من طريق مالك به مثله.

ورواه مسلم في البيوع (1514) من وجهين آخرين عن نافع به مختصرًا، ومطولًا.

وقوله:"وكان بيعا يتبايعه أهل الجاهلية" رواه أبو داود (3380)، وغيره عن مالك، ولم يذكروا هذه الزيادة، فلعلهم اقتصروا على المرفوع؛ لأن هذا الكلام مدرج في الحديث، والصحيح أنه من تفسير ابن عمر، كما هو ظاهر من رواية يحيى القطان، عن عبيد اللَّه، أخبرني نافع، عن ابن عمر قال:"كان أهل الجاهلية يتبايعون لحوم الجزور إلى حبل الحبلة. قال: وحبل الحبلة أن تتج الناقة ما في بطنها، ثم تحمل التي نتجت، فنهاهم النبي صلى الله عليه وسلم عن ذلك". رواه البخاري (3843) عن مسدد، ومسلم عن جماعة، كلهم عن يحيى القطان. فمن قال: إنه من تفسير نافع فلعله لم يقف على هذه الرواية.

وأما المراد بحبل الحبلة فقال النووي في شرح مسلم:"اختلف العلماء في المراد بالنهي عن بيع حبل الحبلة، فقال جماعة: هو البيع بثمن مؤجل إلى أن تلد الناقة، ويلد ولدها. وقال آخرون: هو بيع ولد الناقة الحامل في الحال، وهذا أقرب إلى اللغة". انتهى.

وقال ابن الأثير في النهاية:"الحبل الأول يراد به ما في بطون النوق من الحمل، والثاني حبل الذي في بطون النوق. وإنما نهي عنه لمعنيين: أحدهما أنه غرر، وبيع شيء لم يخلق بعد، وهو أن
يبيع ما سوف يحمله الجنين الذي في بطن الناقة على تقدير أن تكون أنثى، فهو بيع نتاج النتاج. وقيل: أراد بحبل الحبلة أن يبيعه إلى أجل ينتج فيه الحمل الذي في بطن الناقة، فهو أجل مجهول، ولا يصح". انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'হাবলুল হাবালা' (গর্ভের গর্ভজাতের) ক্রয়-বিক্রয় করতে নিষেধ করেছেন। আর এটি এমন এক ধরনের বেচাকেনা ছিল যা জাহিলিয়াতের লোকেরা করত। (এর ধরন ছিল এই যে,) কোনো ব্যক্তি একটি উট কিনত এই শর্তে যে, যখন উটনী বাচ্চা প্রসব করবে, আর তারপর সেই বাচ্চার পেটের বাচ্চাও বাচ্চা প্রসব করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (5637)


5637 - عن عبد اللَّه بن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"في السلف في حبل الحبل ربا".

صحيح: رواه النسائي (4662)، وأحمد (2145) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أيوب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أيضًا النسائي (4623)، وأحمد (2645) كلاهما من وجهين آخرين عن أيوب بإسناده أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع حبل الحبلة.

وقوله:"السلف" هو أن يسلم المشتري الثمن إلى رجل عنده ناقة حبلى، ويقول: إذا ولدت هذه الناقة، ثم ولدت التي في بطنها، فقد اشتريت منك ولدها بهذا الثمن، فهذه المعاملة شبيهة بالربا، لكونها حراما كالربا من حيث إنه يبيع ما ليس عند البائع، وهو لا يقدر على تسليمه، ففيه غرر. أفاده السندي.

وقد روي في بعض طرقه بزيادة"المضامين، والملاقيح". رواه البزار -كشف الأستار- (1268)، والطبراني في الكبير كلاهما من طريق إبراهيم بن إسماعيل، عن داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم نهي عن الملاقيح، والمضامين، وحبل الحبلة.

قال البزار:"لا نعلمه عن ابن عباس إِلَّا بهذا الإسناد".

وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 104):"رواه الطبراني في الكبير، والبزار، وفيه إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة، وثّقه أحمد، وضعفه جمهور الأئمة".

وهو كما قال؛ فقد ضعفه ابن معين، والبخاري، وأبو حاتم، والدارقطني، وغيرهم، وهو من رجال التهذيب، وفي التقريب:"ضعيف".

وروى مالك في البيوع (63) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب أنه قال:"لا ربا في الحيوان، وإنما نهى من الحيوان عن ثلاثة: عن المضامين، والملاقبح، وحبل الحبلة. والمضامين بيع ما في بطون إناث الإبل، والملاقيح ما في ظهور الجمال". انتهى.

ورواه البزار -كشف الأستار- (1267) من حديث صالح بن أبي الأخضر، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى بيع الملاقيح والمضامين.

قال البزار:"لا نعلم أحدًا رواه كذا إِلَّا صالح، ولم يكن بالحافظ". وبه أعله الهيثمي في المجمع".

وصالح بن أبي الأخضر هو اليمامي ضعفه جمهور أهل العلم، وهو من رجال التهذيب.

فالصحيح أنه من قول سعيد بن المسيب، ولا يصح مرفوعًا.
قال الدرقطني في"العلل" (9/ 183):"والصحيح غير مرفوع من قول سعيد غير متصل، وكذلك قال الزبيدي، والأوزاعي عن الزهري". اهـ.

قوله:"المضامين، والملاقيح" قال البيهقي (5/ 341):"وفي رواية المزني، عن الشافعي أنه قال: المضامين ما في بطون ظهور الجمال، والملاقيح ما في بطون إناث الإبل".

قال البيهقي:"وكذلك فسره أبو عبيد".




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "অগ্রিম (সালাম) চুক্তিতে 'হাবলুল হাবলাহ' (গর্ভের গর্ভজাত সন্তান) এর ক্ষেত্রে সুদ (রিবা) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5638)


5638 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة والمزابنة والمعاومة والمخابرة -قال أحدهما: بيع السنين هي المعاومة- وعن الثنيا، ورخص في العرايا.

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1536: 85) من طريق حماد بن زيد، حدثنا أيوب، عن أبي الزبير وسعيد بن ميناء، عن جابر بن عبد اللَّه قال فذكره.

ورواه من طريق عطاء، عن جابر (86) بلفظ: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن كراء الأرض، وعن بيعها السنين، وعن بيع التمر حتى يرطب".

وفي الباب ما روي عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع النخل سنتين أو ثلاثة، أو تشترى في رؤوس النخل بكيل، أو تباع الثمرة حتى يبدو صلاحها.

رواه البزار -كشف الأستار (1281) - عن محمد بن معاوية بن صالح، ثنا عباد بن العوام، ثنا الحجاج بن أرطاة، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.

قال البزار:"لا نعلمه يروى بإسناد أحسن من هذا".

قلت: وفيه الحجاج بن أرطاة مدلس وكان يخطئ كثيرًا.

وفي الباب أيضًا ما روي عن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع السنين.

رواه الطبراني في الكبير (7/ 253) عن أبي الزنباع روح بن الفرج، ومحمد بن عمرو بن خالد الحراني قالا: ثنا سعيد بن عفير، ثنا كهمس بن المنهال، ثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة فذكره.

وسعيد بن أبي عروبة اختلط بأخرة، وكهمس بن المنهال ممن سمع منه بعد الاختلاط.

و"بيع السنين" هو بيع ثمرة النخلة لمدة سنتين، أو ثلاثة، وهو باطل بالاجماع؛ لأنه بيع شيء لا وجود له عند العقد، وفيه غرر وجهالة وعدم القدرة على التسليم عند الجوائح.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহা-কালা, মুযা-বানা, মু'আ-ওয়ামা এবং মুখা-বারা থেকে নিষেধ করেছেন। (বর্ণনাকারীদের) তাদের একজনের মতে: 'বিউ আস-সিনীন' (কয়েক বছরের জন্য ফল বিক্রি) হলো মু'আ-ওয়ামা। আর তিনি ছুনইয়া থেকেও নিষেধ করেছেন, তবে 'আরায়া'-এর ক্ষেত্রে অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5639)


5639 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهي عن الملامسة والمنابذة.
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (76) عن محمد بن يحيى بن حَبان، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة. ورواه البخاري في البيوع (2146)، ومسلم في البيوع (1511) كلاهما من طريق مالك به مثله.

ورواه البخاري في الصلاة (368)، ومسلم من طريق سفيان، عن أبي الزناد به بلفظ:"نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيعتين: عن اللِّماس، والنِّباذ، وأن يشتمل الصماء، وأن يحتبي الرجل في ثوب واحد". واللفظ للبخاري، ولم يسق مسلم لفظه، وإنما أحال فيه على لفظ مالك، وقال: مثله.

ورواه من طريق عطاء بن ميناء، عن أبي هريرة بلفظ:"نهى عن بيعتين: الملامسة، والمنابذة. أما الملامسة فأن يلمس كل واحد منهما ثوب صاحبه بغير تأمل. والمنابذة أن ينبذ كل واحد منهما ثوبه إلى الآخر، ولم ينظر واحد منهما إلى ثوب صاحبه.

وهذا التفسير مدرج، والأقرب أنه من كلام الصحابي، كما قال ذلك الحافظ ابن حجر في الفتح (4/ 360).

وورد تفسير الملامسة والمنابذة بنحو هذا عن مالك في الموطأ. ولهما تفسيرات أخرى ذكرتها في"المنة الكبرى" (5/ 163).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুলামাসা ও মুনাবাযা (বিক্রয়) নিষিদ্ধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5640)


5640 - عن أبي سعيد الخدري قال: نهانا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيعتين ولبستين: نهى عن الملامسة والمنابذة في البيع.

والملامسة: لمس الرجل ثوب الآخر بيده بالليل أو بالنهار، ولا يقلبه إِلَّا بذلك.

والمنابذة: أن ينبذ الرجل إلى الرجل بثوبه، وينبذ الآخر إليه ثوبه، ويكون ذلك بيعهما من غير نظر ولا تراض.

متفق عليه: رواه البخاري في اللباس (5820)، ومسلم في البيوع (1512) كلاهما من طريق يونس، عن ابن شهاب (الزهري)، أخبرني عامر بن سعد بن أبي وقاص، أن أبا سعيد الخدري قال فذكره. واللفظ لمسلم.

ورواه البخاري في البيوع (2147) من طريق معمر، عن الزهري، عن عطاء بن يزيد، عن أبي سعيد الخدري به مختصرًا، وليس فيه تفسير الملامسة والمنابذة.

ورواه أبو داود (3377) وغيره من حديث سفيان، عن الزهري. وفيه تفسير لبستين، وهما اشتمال الصماء، وأن يحتبي الرجل في ثوب واحد كاشفا عن فرجه، أو ليس على فرجه منه شيء.

وفي نهيه عن الملامسة مستدل لمن أبطل بيع الأعمى وشراءه؛ لأنه إنّما يستدل ويتأمل باللمس فيما سبيله أن يستدرك بالعيان ومن البصيرة. قاله الخطابي.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে দু’ প্রকারের বেচাকেনা এবং দু’ প্রকারের পোশাক পরিধান করতে নিষেধ করেছেন। তিনি বেচাকেনার ক্ষেত্রে মুলামাসা ও মুনাবাযা থেকে নিষেধ করেছেন। আর মুলামাসা হলো: দিনে বা রাতে কোনো ব্যক্তির অন্যজনের কাপড় হাত দিয়ে স্পর্শ করা, কিন্তু সে স্পর্শ করা ব্যতীত অন্য কোনোভাবে তা উল্টিয়ে-পাল্টিয়ে দেখবে না (এবং স্পর্শের মাধ্যমেই বেচাকেনা সম্পন্ন হবে)। আর মুনাবাযা হলো: এক ব্যক্তি অন্য ব্যক্তির দিকে তার পোশাক নিক্ষেপ করবে, এবং অন্যজনও তার দিকে তার পোশাক নিক্ষেপ করবে, আর এটাই হবে তাদের বেচাকেনা— কোনো প্রকার দেখা বা (আগে থেকে) সম্মতি ছাড়া।