আল-জামি` আল-কামিল
5708 - عن ابن عمر قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن عسب الفحل.
صحيح: رواه البخاري في الإجارة (2284) عن مسدد، حدثنا عبد الوارث وإسماعيل بن إبراهيم، عن علي بن الحكم، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه أحمد (4630) عن إسماعيل، عن علي بن الحكم. وفيه:"نهى عن ثمن عسب الفحل".
قوله:"عسب الفحل" الفحل الذكر من كل حيوان، فرسا كان، أو جملا، أو تيسا، أو غير ذلك. وعسبه ماؤه. وعسبه أيضًا ضرابه.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসবুল ফাহল (পশুর প্রজনন সেবার মূল্য/উপার্জন) গ্রহণ করতে নিষেধ করেছেন।
5709 - عن جابر قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع ضراب الجمل، وعن بيع الماء والأرض لتُحرث. فعن ذلك نهى النبي صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1565: 35) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا روح بن عبادة، حدثنا ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উটের প্রজনন সেবার বিনিময় (মূল্য গ্রহণ), এবং চাষাবাদের জন্য পানি ও জমিন বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসব বিষয়ে নিষেধ করেছেন।
5710 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن كسب الحجام، وكسب البغي، وثمن الكلب، وعسب الفحل.
حسن: رواه النسائي (4673)، وأحمد (7976) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن المغيرة (وهو ابن مقسم الضبي)، قال: سمعت عبد الرحمن بن أبي نُعم قال: سمعت أبا هريرة يقول فذكره. واللفظ لأحمد. والنسائي لم يذكر"كسب البغي".
وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي نُعم -بضم النون، وسكون المهملة-، ضعفه ابن معين، ووثّقه النسائي، وابن حبان، وابن سعد، وهو حسن الحديث. قال ابن حبان: كان من عباد أهل الكوفة ممن يصبر على الجوع الدائم.
وذكر أحمد في آخر الحديث قون أبي هريرة قال:"وعسب الفحل". قال: قال أبو هريرة:"هذه من كيسي". وقد استشكل قوله هذا كثير من أهل العلم مع أنه ثبت عنه مرفوعًا في رواية أخرى، فلعله كان يزيد أولا في الحديث عنده قياسا على كسب البغي، ثم وقف على روايات بعض الصحابة، فتراجع عن قوله، ورواه مرفوعًا.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিঙাদাতার (কাপিং থেরাপিস্টের) উপার্জন, ব্যভিচারিণীর উপার্জন, কুকুরের মূল্য এবং (প্রজননের জন্য) পুরুষ পশুর ভাড়া (গ্রহণ করতে) নিষেধ করেছেন।
5711 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن ثمن الكلب، وعسب الفحل.
صحيح: رواه ابن ماجه (2160)، والنسائي (4675)، والدارمي (2665) كلهم من طريق ابن فضيل، عن الأعمش، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره، إلا أنه سقط"أبو هريرة" في سنن النسائي المطبوعة، وثبت ذلك في الكبرى (6226)، وكذا ذكره أيضًا المزي في التحفة (10/ 84 ح 13407)، وهو كذلك في المصادر الأخرى. ولفظ النسائي:"عسب التيس".
وإسناده صحيح. وأبو حازم هو سلمان الأشجعي.
ولحديث أبي هريرة أسانيد أخرى، وزاد في بعضها:"وكسب المومسة". رواه أحمد (8389)، والدارمي (2624) كلاهما من حديث القاسم بن الفضل، عن أبيه، عن معاوية المهري قال: قال لي أبو هريرة فذكر الحديث.
وأبو القاسم هو الفضل بن معدان الحدانيّ، ذكره ابن حبان في الثقات (7/ 317)، وله ترجمة في التاريخ الكبير، والجرح والتعديل بدون توثيق أو تجريح، فهو في عداد المجهولين.
وكذلك شيخه معاوية المهري لم يرو عنه إلا الفضل بن معدان، وله ترجمة في التاريخ الكبير، وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 414)، ولم يوثّقه غيره، فهو أيضًا في عداد المجهولين.
عن أبي سعيد الخدري قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن عسب الفحل.
حسن: رواه النسائي (4674)، والدارقطني (4713)، والبيهقي (5/ 339)، كلهم من طريق سفيان، عن هشام، عن ابن أبي نُعم، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
وإسناده حسن من أجل هشام، وهو ابن عائذ الأسدي، أبو كليب الكوفي، وثّقه أحمد، وابن معين، وأبو داود، والعجلي، ولكن قال أبو حاتم: شيخ. ولذا جعله الحافظ في مرتبة"صدوق".
وظن الذهبي أنه هشام أبو كليب غير ابن عائذ، فأدخله في الميزان، وقال:"حديثه منكر، وراويه لا يعرف". مع أنه ذكر من شيوخه ابن أبي نعم، ومن الرواة عنه سفيان الثوري، وقال في الكاشف:"ثقة". وتبعه الحافظ ابن حجر، فأدخله في لسان الميزان، ولم يعقب على الذهبي، مع أنه من رجال التهذيب، وقال في التقريب:"صدوق".
وفي الباب ما روي عن علي بن أبي طالب، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن عسب الفحل في حديث طويل.
رواه أحمد (1254)، وأبو يعلى (357) كلاهما من حديث حسن بن ذكوان، عن حبيب بن أبي ثابت، عن عاصم بن ضمرة، عن علي فذكره.
وحسن بن ذكوان أبو سلمة البصري ضعيف، ضعفه ابن معين، وأبو حاتم، والنسائي، وغيرهم.
ثم إن حسن بن ذكوان لم يسمع هذا الحديث من حبيب بن أبي ثابت، بينهما عمرو بن خالد، وهو متروك الحديث، كما قال ابن عدي في الكامل (5/ 1776)، إلا أن الحسن بن ذكوان أسقطه من شدة ضعفه.
قوله:"عسب الفحل" هو ماؤه فرسا كان، أو بعيرا، أو تيسا. فأخذ الأجرة عليه حرام لدناءته، وبه قال جماعة من الصحابة، وأكثر الفقهاء.
وقيل: إن سبب النهي عن ثمن ماء الفحل -وهو أجرة على الجماع- فيه جهالة وغرر؛ لأن الفحل قد يضرب، وقد لا يضرب، وقد تلقح الأنثى، وقد لا تلقح.
وأما إعارة الفحل فهي مندوبة، وقد ثبت في الصحيح:"من حق الإبل إعارة فحلها". وفي لفظ:"إطراق فحلها". رواه مسلم (988).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুকুরের মূল্য এবং নর পশুর প্রজনন ফি (বীর্যের মূল্য) গ্রহণ করতে নিষেধ করেছেন।
5712 - عن أنس بن مالك أن رجلًا من كلاب سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن عسب الفحل، فنهاه، فقال: يا رسول اللَّه، إنا نطرق الفحل فنكرم، فرخص له في الكرامة.
صحيح: رواه الترمذي (1274)، والنسائي (4672)، والبيهقي (5/ 339) كلهم من حديث إبراهيم بن حميد الرؤاسي، حدثنا هشام بن عروة، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أنس بن مالك فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث إبراهيم بن حميد، عن هشام ابن عروة".
قلت: بل روى من أوجه أخرى أيضًا غير إبراهيم بن حميد إلا أن هذا الإسناد أصح ما روي به هذا الحديث. وإسناده صحيح.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গোত্র ক্বিলাবের এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উটের বীর্যের মূল্য (বা মেটিং ফি) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি তাকে তা থেকে নিষেধ করলেন। লোকটি বলল, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা যখন উটকে কাজে লাগাই, তখন আমরা সম্মাননা (উপহার) পাই।' অতঃপর তিনি তাকে সেই সম্মাননা বা উপহার গ্রহণের অনুমতি দিলেন।
5713 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من ابتاع طعاما فلا يبعه حتى يستوفيه".
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (40) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في البيوع (2126)، ومسلم في البيوع (1526) كلاهما من طريق مالك، به مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো খাদ্যদ্রব্য ক্রয় করে, সে যেন তা বিক্রি না করে যতক্ষণ না সে তা বুঝে নেয়।"
5714 - عن عبد اللَّه بن عمر أنه قال: كنا في زمان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نبتاع الطعام، فيبعث علينا من يأمرنا بانتقاله من المكان الذي ابتعناه فيه إلى مكان سواء قبل أن نبيعه.
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (42) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه مسلم في البيوع (1527: 33) من طريق مالك، به مثله.
ورواه البخاري في البيوع (2123) من وجه آخر عن نافع به نحوه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে খাদ্যদ্রব্য ক্রয় করতাম, তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এমন লোক পাঠাতেন, যে আমাদেরকে তা বিক্রি করার পূর্বে যেখানে তা ক্রয় করা হয়েছিল সেখান থেকে অন্য স্থানে সরিয়ে নিতে আদেশ করত।
5715 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: كانوا يبتاعون الطعام في أعلى السوق، فيبيعونه في مكانهم فنهاهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يبيعوه في مكانه حتى ينقلوه.
متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2167) عن مسدد، حدثنا يحيى (بن سعيد القطان) عن عبيد اللَّه قال: حدثني نافع، عن عبد اللَّه فذكره.
ورواه مسلم في البيوع (1526) من وجه آخر عن عبيد اللَّه به نحوه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তারা বাজারের উঁচু অংশে খাবার ক্রয় করত, অতঃপর তারা সেই স্থানেই তা বিক্রি করে দিত। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের সেই স্থানে তা বিক্রি করতে নিষেধ করেন, যতক্ষণ না তারা তা অন্য স্থানে সরিয়ে নিয়ে যায়।
5716 - عن ابن عمر أنهم كانوا يُضْربون على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا اشتروا طعاما جزافا، أن يبيعوه في مكانهم حتى يؤووه إلى رحالهم.
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6852) ومسلم في البيوع (1527: 37) كلاهما من حديث عبد الأعلى، حدثنا معمر، عن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر، فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে যখন তারা কোনো খাদ্যদ্রব্য আন্দাজ করে (جزافা) ক্রয় করত, তখন সেটিকে নিজেদের বাসস্থানে (আস্তানায়) নিয়ে না যাওয়া পর্যন্ত সে স্থানেই বিক্রি করলে তাদেরকে প্রহার করা হতো (বা শাস্তি দেওয়া হতো)।
5717 - عن زيد بن ثابت قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن تباع السلع حيث تبتاع، حتى يحوزها التجار إلى رحالهم.
حسن: رواه أبو داود (3499)، وأحمد (21668)، والدارقطني (2831)، والبيهقي (5/ 314) كلهم من طريق محمد بن إسحاق، حدثني أبو الزناد، عن عبيد بن حنين، عن عبد اللَّه بن عمر قال: قدم رجل من أهل الشام بزيت، فساومته فيمن ساومه من التجار، حتى ابتعته منه، فقام إليَّ رجل، فربَّحني فيه حتى أرضاني، قال: فأخذت بيده لأضرب عليها، فأخذ رجل بذراعي من خلفي، فالتفت إليه فإذا هو زيد بن ثابت فقال فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلس إلا أنه صرح بالتحديث، ومن طريقه رواه ابن حبان (4984)، والحاكم (2/ 40). وتابعه إسحاق بن حازم وجرير بن حازم كلاهما عن أبي الزناد عند الدارقطني.
وقوله:"لأضرب عليها" أي أُنهي صفقة البيع، ولعل ابن عمر نسي هذا الحكم حتى ذكَّره زيد ابن ثابت، فتذكر، وبدأ يحدث بما كان يعرفه من عهد النبي صلى الله عليه وسلم.
যায়িদ ইবনু ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই স্থানে পণ্য বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যেখানে তা কেনা হয়েছে, যতক্ষণ না ব্যবসায়ীরা তা নিজেদের আস্তানায় (বা গুদামে) নিয়ে যায়।
5718 - عن ابن عباس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من ابتاع طعاما فلا يبعه حتى يستوفيه".
قال ابن عباس: وأحسب كل شيء مثله.
متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2135)، ومسلم في البيوع (1525: 29)، كلاهما من طريق عمرو بن دينار، سمع طاوسا يقول: سمعت ابن عباس يقول فذكره. واللفظ لمسلم.
وفي رواية"من ابتاع طعاما فلا يبعه حتى يكتاله".
فقلت لابن عباس: لم؟ فقال:"ألا تراهم يتابعون بالذهب والطعامُ مرجأ". أي مؤخر.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যে ব্যক্তি কোনো খাদ্যদ্রব্য ক্রয় করে, সে যেন তা সম্পূর্ণভাবে গ্রহণ করার (হস্তগত করার) আগে বিক্রি না করে।"
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি মনে করি, অন্য সকল জিনিসও এর অনুরূপ।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "যে ব্যক্তি কোনো খাদ্যদ্রব্য ক্রয় করে, সে যেন তা পরিমাপ করে নেওয়ার আগে বিক্রি না করে।"
(বর্ণনাকারী বলেন) আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: কেন? তিনি বললেন: "তুমি কি দেখ না, তারা স্বর্ণ (মুদ্রা) দ্বারা লেনদেন সম্পন্ন করে ফেলে, অথচ খাদ্যদ্রব্য বিলম্বে থাকে (গ্রহণ করা হয় না)?" (অর্থাৎ: বিলম্বিত/পিছিয়ে রাখা হয়েছে)।
5719 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا ابتعت طعاما فلا تبعه حتى تستوفيه".
صحيح: رواه مسلم في البيوع (1529) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا روح، حدثنا ابن جريج، حدثني أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: যখন তোমরা খাদ্যদ্রব্য ক্রয় করবে, তখন তা পুরোপুরি বুঝে না নেওয়া পর্যন্ত বিক্রয় করবে না।
5720 - عن أبي هريرة أنه قال لمروان: أحللتَ بيع الربا فقال مروان: ما فعلت. فقال أبو هريرة: أحللتَ بيع الصكاك، وقد نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الطعام حتى يستوفى. قال: فخطب مروان الناس، فنهى عن بيعها. قال سليمان: فنظرت إلى حرس يأخذونها من أيدي الناس.
صحيح: رواه مسلم في البيوع (1528) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد اللَّه بن الحارث المخزومي، حدثنا الضحاك بن عثمان، عن بكير بن عبد اللَّه الأشج، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة فذكره.
وفي لفظ له:"من اشترى طعاما فلا يبعه حتى يكتاله".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মারওয়ানকে বললেন: আপনি তো সূদী লেনদেন হালাল করেছেন। মারওয়ান বললেন: আমি তা করিনি। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি সাক্ক (ঋণপত্র/ভাউচার)-এর বিক্রি হালাল করেছেন, অথচ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খাদ্যশস্য হাতে বুঝে না পাওয়া পর্যন্ত বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। রাবী বলেন: এরপর মারওয়ান লোকদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং ঐগুলোর বিক্রি নিষেধ করে দিলেন। সুলাইমান (বিন ইয়াসার) বলেন: এরপর আমি দেখলাম প্রহরীগণ লোকদের হাত থেকে ঐগুলো (সাক্ক) ছিনিয়ে নিচ্ছে।
আর তাঁর (মুসলিম-এর) অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে: “যে ব্যক্তি কোনো খাদ্যশস্য ক্রয় করে, সে যেন তা মেপে (বা পরিমাপ করে) না নেওয়া পর্যন্ত বিক্রি না করে।”
5721 - عن أبي هريرة قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع الطعام حتى يجري فيه الصاعان، فيكون للبائع الزيادة، وعليه النقصان.
حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1265) -، والبيهقي (5/ 316) كلاهما من حديث مسلم بن أبي مسلم الجرمي، حدثنا مخلد بن حسين، عن هشام، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة فذكره.
قال البزار:"لا نعلمه عن أبي هريرة إلا من هذا الوجه، تفرد به مخلد، عن هشام".
قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 98):"فيه مسلم بن أبي مسلم الجرمي لم أجد من ترجمه، وبقية رجاله رجال الصحيح".
كذا قال: مع أن ابن حبان ذكره في"الثقات" (9/ 158) وقال:"ربما أخطأ". وترجمه الخطيب في تاريخ بغداد (13/ 100) ووثّقه. وحسَّن إسناده الحافظ ابن حجر في"الفتح" (4/ 351).
وأما ما روي عن جابر قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الطعام حتى يجري فيه الصاعان: صاع البائع، وصاع المشتري. ففيه ضعف.
رواه ابن ماجه (2228)، والدارقطني (2819)، وعنه البيهقي (5/ 316)، وعبد بن حميد (1059) كلهم من حديث ابن أبي ليلى، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وابن أبي ليلى هو محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى ضُعِّف من قبل حفظه، وبه أعله البوصيري.
وعزاه الحافظ في الفتح (4/ 351) إلى الدارقطني، وسكت عليه، ولعله لوجود شاهد له، وهو حديث أبي هريرة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাদ্যদ্রব্য বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, যতক্ষণ না তাতে দু'টি সা' (পরিমাপ) ব্যবহার করা হয়। ফলে অতিরিক্তটুকু বিক্রেতার হবে এবং ঘাটতিও তার (বিক্রেতার) উপর বর্তাবে।
5722 - عن حكيم بن حزام قال: قلت: يا رسول اللَّه، إني رجل أشتري بيوعا، فما يحل منها وما يحرم؟ قال:"يا ابن أخي، إذا اشتريت بيعا فلا تبعه حتى تقبضه".
حسن: رواه ابن الجارود في المنتقى (602)، وابن حبان (4983)، والدارقطني (2822)، كلهم من طرق عن همام بن يحيى قال: حدثنا يحيى بن أبي كثير، حدثنا يعلى بن حكيم قال: ثنا يوسف بن ماهك، عن عبد اللَّه بن عصمة، عن حكيم بن حزام فذكره. واللفظ لابن الجارود، ولفظهما نحوه. وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن عصمة، وهو حسن الحديث.
وتابع هشام الدستوائي همامَ بن يحيى فرواه عن يحيى بن أبي كثير بإسناده. ومن طريقه رواه ابن الجارود، والبيهقي (5/ 313) إلا أن الأخير لم يذكر بين يحيى بن أبي كثير وبين يوسف بن ماهك (يعلى بن حكيم)، ولذا تعقبه بقوله: لم يسمعه يحيى بن أبي كثير من يوسف، إنما سمعه من يعلى ابن حكيم عن يوسف.
وكذلك تابعه شيبان، فرواه عن يحيى بن أبي كثير، عن يعلى بن حكيم بإسناده. ومن طريقه رواه ابن الجارود، والبيهقي.
قال البيهقي:"هذا إسناد حسن متصل". وقال:"وكذلك رواه همام بن يحيى وأبان بن عطار، عن يحيى بن أبي كثير".
قلت: حديث أبان العطار رواه الدارقطني (2820).
إذا عرفت هذا فاعلم أنه جاء في السنن والمسانيد: أبي داود (3503)، والترمذي (1232)، والنسائي (4613)، وابن ماجه (2187)، وأحمد (15312) وغيرهم عن يوسف بن ماهك، عن حكيم بن حزام فذكره.
وهذا إسناد منقطع فان يوسف بن ماهك لم يسمع من حكيم بن حزام، وما جاء في بعض الرواية التصريح بالسماع منه فإنه لا شيء، وقد جزم البخاري وغيره أن يوسف بن ماهك لم يسمع من حكيم بن حزام. فقول الترمذي:"هذا حديث حسن" ليس بحسن؛ فإن الإسناد المقطع لا يكون حسنا، إلا أن يحمل قوله على أنه حسن من طرق أخرى؛ لأنه حكم على الحديث، لا الإسناد.
হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি এমন একজন ব্যক্তি যে অনেক প্রকার পণ্যদ্রব্য ক্রয় করে থাকি। সেগুলোর মধ্যে আমার জন্য কোনটি হালাল এবং কোনটি হারাম? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র, তুমি যদি কোনো পণ্য ক্রয় করো, তবে সেটি দখল করার (নিজ অধিকারে নেওয়ার) আগে তা বিক্রি করবে না।"
5723 - عن عبد اللَّه بن عمرو قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يحل سلف وبيع، ولا شرطان في بيع، ولا ربح ما لم يضمن، ولا بيع ما ليس عندك".
حسن: رواه أبو داود (3504)، والترمذي (1234)، والنسائي (4611)، وابن ماجه (2188)، وصحّحه الحاكم (3/ 17) كلهم من حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره. ومنهم من اختصره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وقال الترمذي:"حسن صحيح".
وقال الحاكم:"حديث صحيح على شرط جملة من أئمة المسلمين".
ورُوي عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، ويعلى بن أمية، وابن عباس وغيرهم"أن النبي صلى الله عليه وسلم استعمل عتاب بن أَسِيد على مكة، وقال له:"انههم عن بيع ما لم يقبضوا، أو ربح ما لم يضمنوا، وعن قرض وبيع، وعن شرطين في بيع، وعن بيع وسلف".
وفي كله مقال. أخرج حديثهم ابن أبي شيبة، وابن ماجه، والبيهقي، وابن عدي، والطبراني، وغيرهم.
وأما ما روي عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم"نهى عن بيع وشرط". فليس بصحيح.
رواه الطبراني في معجمه الأوسط (4361 بتحقيق: طارق بن عوض اللَّه) عن عبد اللَّه بن أيوب القربي، ثنا محمد بن سليمان الذهلي، ثنا عبد الوارث بن سعيد قال: قدمت مكة، فوجدت بها أبا حنيفة، وابن أبي ليلى، وابن شبرمة، فسألت أبا حنيفة، قلت: ما تقول في رجل باع بيعا، وشرط شرطا، فقال: البيع باطل، والشرط باطل. ثم أتيت ابن أبي ليلى فسألته، فقال: البيع جائز، والشرط باطل. ثم أتيت ابن شبرمة فسألته، فقال: البيع جائز، والشرط جائز. فقلت: يا سبحان اللَّه! ثلاثة من فقهاء العراق اختلفوا في مسألة واحدة، فأتيت أبا حنيفة، فأخبرته، فقال: ما أدري ما قالا. حدثني عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم"أنه نهى عن بيع وشرط". البيع باطل، والشرط باطل. ثم أتيت ابن أبي ليلى، فأخبرته، فقال: ما أدري ما قالا: حدثني هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت:"أمرني النبي صلى الله عليه وسلم أن أشتري بريرة فأعتقها". البيع جائز والشرط باطل. ثم أتيت ابن شبرمة، فأخبرته، فقال: ما أدري ما قالا، حدثني مسعر بن كدام، عن محارب بن دثار، عن جابر قال:"بعتُ النبي صلى الله عليه وسلم ناقةً وشرط لي حملانها إلى المدينة". البيع جائز، والشرط جائز". انتهى.
ورواه الحاكم أبو عبد اللَّه في كتاب علوم الحديث في باب الأحاديث المتعارضة، عن أبي بكر ابن إسحاق، ثنا عبد اللَّه بن أيوب بن زاذان الضرير، ثنا محمد بن سليمان الذهلي بإسناده.
وفي الإسناد عبد اللَّه بن أيوب بن زاذان الضرير يعرف بالقربي أو بالقرني الخراز، سئل عنه الدارقطني فقال:"متروك". سؤالات الحاكم للدارقطني (125).
وقوله:"نهى عن بيع وشرط" لم يرد من وجه صحيح عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده
والصحيح عنه"نهى عن شرطين في بيع". كما مضى، ففي متنه نكارة؛ لأنه صح عن جابر وغيره جواز بيع وشرط، كما في الباب الآتي.
أحاديث هذا الباب ذات دلالات كثيرة في مسائل البيوع:
منها: أن الربح بمقابل الضمان، فأمر الشارع أن يقبض السلعة أولا؛ لتكون في ضمانه، ثم يبيعها.
ومنها: أنه يشمل بيع ما لا يملك على تسليمه مثل العبد الآبق، أو الجمل الشارد.
ومنها: أن البيع قبل القبض يؤدي إلى الخصام والتنازع؛ لأن القبض قد يتأخر، ويهلك المبيع.
ومنها: أنه يؤدي إلى القمر والميسر؛ لأن البائع قد يستفيد من رأس المال، والمشتري لم يستلم السلعة بعد، لأن البائع لم يقبضها حتى يسلمها إلى المشتري.
ويستثنى من هذا البيع، السلمُ الموصوف في الذمة، سواء كان مؤجلا أو حالا، وذلك لحاجة الناس إلى رأس المال لإنتاج السلعة الموصوفة، فأجاز الشارع بيع السلم؛ لئلا تعطل مصالح البائع والمشتري. وغالب التجارات اليوم قائمة على هذا الأساس وهو السلم.
وقد أشار الخطابي إلى هذا بقوله:"وقوله:"لا نبع ما ليس عندك" يريد بيع العين دون بيع الصفة، ألا ترى أنه أجاز السلم إلى الآجال، وهو بيع ما ليس عند البائع في الحال، وإنما نهى عن بيع ما ليس عند البائع من قبل الغرر. وذلك مثل أن يبيع عبده الآبق أو جمله الشارد، ويدخل في ذلك كل شيء ليس بمضمون عليه، مثل أن يشتري سلعة، فيبيعها قبل أن يقبضها، ويدخل في ذلك بيع الرجل مال غيره موقوفًا على إجازة المالك، لأنه يبيع ما ليس عنده. ولا في ملكه، وهو غرر، لأنه لا يدري هل يجيز صاحبه أم لا؟ . انتهى.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: একসাথে ঋণ (সালাফ) ও বিক্রি, একটি বিক্রয়ে দুই শর্ত আরোপ করা, যে জিনিসের দায়িত্ব (ঝুঁকি) তুমি নাওনি তার লাভ গ্রহণ করা এবং যা তোমার কাছে নেই তা বিক্রি করা বৈধ নয়।
5724 - عن جابر بن عبد اللَّه أنه كان يسير على جمل له قد أعيا، فأراد أن يسيبه. قال: فلحقني النبي صلى الله عليه وسلم، فدعا لي، وضربه، فسار سيرا لم يسر مثله. قال:"بعنيه بِوَقِيَّة". قلت: لا. ثم قال"بعنيه". فبعته بِوَقِيَّة، واستثنيت عليه حملانه إلى أهلي. فلما بلغت أتيته بالجمل، فنقدني ثمنه، ثم رجعت. فأرسل في إثري، فقال:"أتراني ماكستك لآخذ جملك، خذ جملك ودراهمك فهو لك".
متفق عليه: رواه البخاري في الشروط (2718)، ومسلم في المساقاة (715: 109) من طريق زكريا قال: سمعت عامرًا (هو الشعبي)، يقول: حدثني جابر بن عبد اللَّه فذكره. واللفظ لمسلم.
وزاد البخاري: قال شعبة، عن مغيرة، عن عامر، عن جابر:"أفقرني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ظهره إلى المدينة".
وقال إسحاق، عن جرير، عن مغيرة:"فبعته على أن لي فقار ظهره حتى أبلغ المدينة".
وقال عطاء، وغيره:"ولك ظهره إلى المدينة".
وقال محمد بن المنكدر، عن جابر:"شرط ظهره إلى المدينة".
وقال زيد بن أسلم، عن جابر:"ولك ظهره حتى ترجع".
وقال أبو الزبير، عن جابر:"أفقرناك ظهره إلى المدينة".
وقال الأعمش، عن سالم، عن جابر:"تبلغ عليه إلى أهلك".
قال أبو عبد اللَّه:"الاشتراط أكثر، وأصح عندي.
وقال عبيد اللَّه، وابن إسحاق، عن وهب عن جابر:"اشتراه النبي صلى الله عليه وسلم بأوقية". وتابعه زيد بن أسلم، عن جابر.
وقال ابن جريج، عن عطاء وغيره، عن جابر:"أخذته بأربعة دنانير". وهذا يكون أوقية على حساب الدينار بعشرة دراهم، ولم يبين الثمن مغيرة، عن الشعبي، عن جابر، وابن المنكدر، وأبو الزبير، عن جابر.
وقال الأعمش، عن سالم، عن جابر:"أوقية ذهب".
وقال أبو إسحاق، عن سالم، عن جابر:"بمائتي درهم".
وقال داود بن قيس، عن عبيد اللَّه بن مقسم، عن جابر:"اشتراه بطريق تبوك -أحسبه قال- بأربع أواق".
وقال أبو نضرة، عن جابر:"اشتراه بعشرين دينارا".
وقول الشعبي:"بوقية" أكثر. الاشتراط أكثر، وأصح عندي. قاله أبو عبد اللَّه. وهذه المعلقات وصلها الحافظ ابن حجر في"الفتح".
وليس الاختلاف في ثمن الظهر بأنه وقية، وإنما الخلاف في تقديرها بالدينار والدراهم، ومن اختلف في قدر الوقية فأمره راجع إلى الشك، واللَّه أعلم.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একটি উটের পিঠে যাচ্ছিলেন, যেটি দুর্বল হয়ে পড়েছিল। তিনি সেটিকে ছেড়ে দিতে চেয়েছিলেন। তিনি (জাবির) বলেন, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার সাথে মিলিত হলেন। তিনি আমার জন্য দুআ করলেন এবং সেটিকে (উটটিকে) আঘাত করলেন। ফলে উটটি এমন দ্রুত চলতে শুরু করল, যেমনটি এর আগে আর চলেনি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এক উকিয়ার বিনিময়ে এটিকে আমার কাছে বিক্রি করো।" আমি বললাম: "না।" এরপর তিনি বললেন: "এটিকে আমার কাছে বিক্রি করো।" অতঃপর আমি এক উকিয়ার বিনিময়ে সেটি তাঁর কাছে বিক্রি করে দিলাম, তবে শর্ত রাখলাম যে, আমার পরিবার পর্যন্ত (পৌঁছানো পর্যন্ত) সেটির পিঠে সওয়ার হওয়ার অধিকার আমার থাকবে। যখন আমি (আমার বাড়িতে) পৌঁছলাম, আমি উটটি নিয়ে তাঁর কাছে আসলাম। তিনি আমাকে এর মূল্য পরিশোধ করলেন। এরপর আমি ফিরে গেলাম। এরপর তিনি আমার সন্ধানে (লোক) পাঠালেন এবং বললেন: "তুমি কি মনে করেছো যে, তোমার উটটি ছিনিয়ে নেওয়ার জন্য আমি তোমার সাথে দর কষাকষি করছিলাম? তোমার উট এবং তোমার দিরহাম—দুটোই নাও, কারণ এগুলো তোমার।"
5725 - عن عائشة قالت: جاءتني بريرة، فقالت: كاتبت أهلي على تسع أواق، في كل عام أوقية، فأعينيني. فقلت: إن أحب أهلك أن أَعُدَّها لهم، ويكون ولاؤكِ لي فعل. فذهبت بريرة إلى أهلها، فقالت لهم، فأبوا ذلك عليها، فجاءت من عندهم -ورسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جالس-، فقالت: إني قد عرضت ذلك عليهم، فأبوا إلا أن يكون الولاء لهم. فسمع النبي صلى الله عليه وسلم، فأخبرت عائشة النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"خذيها، اشترطي لهم الولاء، فإنما الولاء لمن أعتق". ففعلت عائشة، ثم قام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الناس، فحمد اللَّه، وأثنى عليه، ثم قال:"أما بعد: ما بال رجال يشترطون شروطا ليست في كتاب اللَّه، ما كان من شرط ليس في كتاب اللَّه فهو باطل وإن كان مائة
شرط، قضاء اللَّه أحق، وشرط اللَّه أوثق، وإنما الولاء لمن أعتق".
متفق عليه: رواه مالك في العتق والولاء (17) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. ورواه البخاري في البيوع (2168) من طريق مالك، به. ورواه مسلم في العتق (1504) من وجه آخر عن هشام، به، ومن طرق أخرى عن عائشة.
وبهذا الحديث استدل ابن الجوزي في التحقيق (4/ 38): إذا باعه بشرط العتق فالشرطه والبيع صحيحان.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার কাছে বারীরা (নামের দাসী) এলো এবং বলল, আমি আমার মালিকদের সাথে নয় উকিয়ার (রৌপ্য/স্বর্ণের পরিমাপ) বিনিময়ে প্রতি বছর এক উকিয়া দেওয়ার শর্তে চুক্তিবদ্ধ হয়েছি। অতএব, আপনারা আমাকে সাহায্য করুন। আমি বললাম, যদি তোমার মালিকরা চায় যে আমি তাদের জন্য (একবারে) তা গণনা করে দিয়ে দেই, এবং তোমার আনুগত্য (ওয়ালা/উত্তরাধিকারের অধিকার) আমার জন্য নির্দিষ্ট হয়, তবে আমি তা করতে পারি।
এরপর বারীরা তার মালিকদের কাছে গেল এবং তাদের কাছে প্রস্তাবটি পেশ করল। কিন্তু তারা তা প্রত্যাখ্যান করল। অতঃপর বারীরা তাদের কাছ থেকে ফিরে এলো—তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপবিষ্ট ছিলেন— সে (আয়িশাকে) বলল, আমি তাদের কাছে সেই প্রস্তাব পেশ করেছি, কিন্তু তারা প্রত্যাখ্যান করেছে, তবে তারা চায় যেন ওয়ালা (আনুগত্য/উত্তরাধিকার) তাদেরই থাকে।
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা শুনতে পেলেন। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিষয়টি জানালেন। তিনি (নবী) বললেন: "তুমি তাকে নিয়ে নাও। তাদের জন্য ওয়ালার শর্ত রেখো। কেননা, ওয়ালা সেই ব্যক্তির জন্যই, যে আজাদ করে।"
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাই করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের মাঝে দাঁড়ালেন, আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন, অতঃপর বললেন: "অতঃপর শোনো: লোকদের কী হলো যে তারা এমন সব শর্ত আরোপ করে যা আল্লাহর কিতাবে (শরীয়তের বিধানে) নেই? আল্লাহর কিতাবে নেই এমন সকল শর্তই বাতিল, যদিও তা শত শর্ত হয়। আল্লাহর বিধানই অধিক সত্য ও গ্রহণযোগ্য এবং আল্লাহর শর্তই অধিক নির্ভরযোগ্য। আর ওয়ালা (উত্তরাধিকার) তো সেই ব্যক্তিরই, যে আজাদ করে।"
5726 - عن أبي هريرة قال: أرادت عائشة أن تشتري جارية تعتقها، فأبي أهلها إلا أن يكون لهم الولاء، فذكرت ذلك لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"لا يمنعك ذلك، فإنما الولاء لمن أعتق".
صحيح: رواه مسلم في العتق (1505) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا خالد بن مخلد، عن سليمان بن بلال، حدثني سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি দাসী ক্রয় করে তাকে মুক্ত করতে চাইলেন। কিন্তু দাসীর মালিকরা (বিক্রেতারা) এ শর্ত ছাড়া বিক্রি করতে অস্বীকার করল যে (মুক্ত করার পর) দাসীর 'আল-ওয়ালা' (উত্তরাধিকার সম্পর্ক) তাদেরই থাকবে। অতঃপর তিনি বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: "এটা যেন তোমাকে বাধা না দেয়। কারণ, 'আল-ওয়ালা' (মুক্তির অধিকার) কেবল তারই, যে মুক্ত করে।"
5727 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يبع بعضكم على بيع بعض".
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (95) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر.
ورواه البخاري في البيوع (2139)، ومسلم في البيوع (1412) من طريق مالك، به، مثله.
وزاد أبو داود:"إلا بإذنه". ولفظ النسائي:". . . حتى يبتاع أو يذر".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন অন্যের বিক্রির ওপর বিক্রি না করে।"
