হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5728)


5728 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يبيع حاضر لباد، ولا تناجشوا، ولا يبيع الرجل على بيع أخيه، ولا يخطب على خطبة أخيه، ولا تسأل المرأة طلاق أختها لتكفأ ما في إنائها.

متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2140)، ومسلم في البيوع (1413) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة. ولفظهما سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যে, কোনো শহরবাসী যেন কোনো গ্রামীণ (মরুবাসী) লোকের পক্ষে মধ্যস্থতা করে পণ্য বিক্রি না করে, আর তোমরা কৃত্রিম দর বৃদ্ধি (নাজাশ) করো না, কোনো ব্যক্তি যেন তার ভাইয়ের বিক্রয়ের উপর বিক্রয় না করে, এবং তার ভাইয়ের বিবাহের প্রস্তাবের উপর যেন প্রস্তাব না দেয়, আর কোনো নারী যেন তার (মুসলিম) বোনের তালাক না চায়—যাতে সে তার পাত্রে যা আছে তা উপুড় করে ফেলে (অর্থাৎ তার অবস্থান বা স্বামীকে দখল করে নিতে পারে)।









আল-জামি` আল-কামিল (5729)


5729 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يَسُم المسلم على سوم أخيه".

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1515: 9) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة.

ومعنى الحديث هو أن يكون يتفق مالك السلعة ومشتريها على البيع، ولم يعقداه، فيقول الآخر للبائع: أشتريها بكذا. فهذا هو السوم الذي لا يجوز.

وأما السوم في السلعة التي تباع فيمن يزيد فهذا ليس بحرام.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, “কোনো মুসলিম যেন তার (মুসলিম) ভাইয়ের দামের ওপর দাম না বাড়ায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (5730)


5730 - عن عبد الرحمن بن شُماسة أنه سمع عقبة بن عامر على المنبر يقول: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"المؤمن أخو المؤمن؛ فلا يحل للمؤمن أن يبتاع على بيع أخيه، ولا يخطب على خطبة أخيه حتى يذر".

صحيح: رواه مسلم في النكاح (1414: 56) عن أبي الطاهر، أخبرنا عبد اللَّه بن وهب، عن الليث وغيره، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عبد الرحمن بن شماسة فذكره.




উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুমিন মুমিনের ভাই; সুতরাং কোনো মুমিনের জন্য তার ভাইয়ের বিক্রয়ের উপর ক্রয় করা (দাম বলা) হালাল নয়, আর না তার ভাইয়ের বিবাহের প্রস্তাবের উপর প্রস্তাব দেওয়া হালাল, যতক্ষণ না সে (ভাই) তা ছেড়ে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5731)


5731 - عن سمرة بن جندب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى أن يخطب الرجل على خطبة أخيه، أو يبتاع على بيعه.

حسن: رواه أحمد (20115) عن سليمان بن داود الطيالسي، حدثني عمران، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمران، وهو ابن داود البصري، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، والحسن سمع من سمرة بالجملة، كما تقدم.




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যেন কোনো ব্যক্তি তার ভাইয়ের বিবাহের প্রস্তাবের ওপর প্রস্তাব না দেয়, অথবা তার বেচা-কেনার ওপর নতুন কেনা-বেচা না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (5732)


5732 - عن وعن أبي هريرة يبلغ به النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يبع حاضر لباد".

متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2140)، ومسلم في البيوع (1530) كلاهما من طريق سفيان، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.

واللفظ لمسلم، وساقه البخاري في سياق أتم ذكره في موضعه.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো শহরবাসী যেন কোনো গ্রামবাসীর পক্ষে (পণ্য) বিক্রি না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5733)


5733 - عن طاوس، عن ابن عباس قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن تتلقى الركبان، وأن يبيع حاضر لباد. قال: فقلت لابن عباس: ما قوله"حاضر لباد"؟ قال: لا يكن له سمسارا.

متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2158)، ومسلم في البيوع (1521) كلاهما من طريق معمر، عن عبد اللَّه بن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পথিমধ্যে আগত কাফেলার সাথে সাক্ষাত করতে এবং কোনো শহুরে লোক কোনো গ্রাম্য লোকের (পণ্য) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। (বর্ণনাকারী তাউস) বলেন, আমি ইবনে আব্বাসকে জিজ্ঞেস করলাম, তাঁর বাণী "শহুরে লোক গ্রাম্য লোকের (পণ্য বিক্রি) করা" এর অর্থ কী? তিনি বললেন: সে যেন তার (গ্রাম্য বিক্রেতার) জন্য দালালি না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (5734)


5734 - عن أنس بن مالك قال: نُهينا أن يبيع حاضر لباد.

متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2161)، ومسلم في البيوع (1523: 22) كلاهما عن محمد بن المثنى، حدثنا معاذ، حدثنا ابن عون، عن محمد قال: قال أنس بن مالك فذكره.

ورواه مسلم من وجه آخر عن يونس، عن ابن سيرين، وزاد فيه:"وإن كان أخاه أو أباه".




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, কোনো শহরবাসী যেন কোনো গ্রামবাসীর পক্ষে (পণ্য) বিক্রি না করে—এ থেকে আমাদের নিষেধ করা হয়েছিল।

মুসলিমের অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "এমনকি যদি সে তার ভাই বা পিতাও হয় (তবুও তা নিষিদ্ধ)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5735)


5735 - عن ابن عمر قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يبيع حاضر لباد.

صحيح: رواه البخاري في البيوع (2159) عن عبد اللَّه بن صبَّاح، حدثنا أبو علي الحنفي، عن عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن دينار قال: حدثني أبي، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো শহরবাসীকে কোনো গ্রামীণ বা যাযাবর লোকের পক্ষে বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5736)


5736 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يَبعْ حاضر لباد، دعوا الناس يرزق اللَّه بعضهم من بعض".

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1522) من طريقين، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.




জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো শহরবাসী যেন কোনো গ্রামবাসীর পক্ষে (পণ্য) বিক্রি না করে। মানুষকে তাদের হালে ছেড়ে দাও, আল্লাহ তাদের একজনকে আরেকজনের মাধ্যমে জীবিকা প্রদান করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5737)


5737 - عن طلحة بن عبيد اللَّه قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يبيع حاضر لباد.

حسن: رواه أبو داود (3441) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن محمد بن إسحاق، عن سالم المكي، أن أعرابيا حدّثه أنه قدم بحلوبة له على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فنزل على طلحة بن عبيد اللَّه، فقال: إن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يبيع حاضر لباد، ولكن اذهب إلى السوق، فانظر من يبايعك؟ فشاورني حتى آمرك أو أنهاك.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وهو مدلس، وقد صرح بالتحديث عند الإمام أحمد (1404) في سياق أطول من هذا، وسبق تخريجه في كتاب الزكاة، في عدم التعدي على الصدقات.

وسالم المكي هو سالم بن أبي أمية أبو النضر، كما جاء التصريح به في مسند أحمد.

وفي الباب ما روي عن ابن أبي يزيد أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"دعوا الناس يُصيب بعضهم من بعض، فإذا استنصح أحدكم أخاه فلينصحه".

رواه أحمد (15455)، والطبراني في الكبير (22/ 354)، وعبد بن حميد (438) كلهم من طرق عن عطاء بن السائب، عن حكيم بن أبي يزيد، عن أبيه قال: حدثني أبي أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال فذكر الحديث.

وحكيم بن أبي يزيد لم يوثّقه غير ابن حبان، ثم اختلف هل هو حكيم بن أبي يزيد، عن أبيه، عن جده، كما عند أحمد، أو حكيم بن أبي يزيد، عن أبيه، كما عند غيره، دون ذكر جده؟ وقد أشار إلى هذا الاختلاف ابن حجر في"الإصابة" في ترجمة أبي يزيد.

والراوي عنه عطاء بن السائب مختلط، وجميع من روى عنه هذا الحديث رواه بعد الاختلاط، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 83).

وقد كره أكثر أهل العلم بيع الحاضر للبادي حملا على أن النهي للتحريم؛ لأن بيع الحاضر للبادي يفوت مصلحة البيع والشراء، وهي أن اللَّه يرزق بعضهم من بعض.

وذهب بعضهم إلى أن النهي للإرشاد دون التحريم.




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শহরবাসীকে (স্থায়ী ব্যবসায়ীকে) গ্রামবাসীর (বহিরাগত বিক্রেতার) কাছে বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।

[অন্য বর্ণনায় এসেছে]: এক বেদুঈন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যমানায় তার দুগ্ধবতী পশু নিয়ে এসে তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আশ্রয় নিলো। তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শহরবাসীকে গ্রামবাসীর কাছে বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন। বরং তুমি বাজারে যাও, দেখ কে তোমার সাথে বেচাকেনা করে? তারপর আমার সাথে পরামর্শ করো, যেন আমি তোমাকে (সে অনুযায়ী) আদেশ করতে বা নিষেধ করতে পারি।









আল-জামি` আল-কামিল (5738)


5738 - عن ابن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن تلقي البيوع.

متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2164)، ومسلم في البيوع (1518) كلاهما من طريق التيمي، عن أبي عثمان، عن ابن مسعود به. واللفظ لمسلم.
والتيمي هو: سليمان بن طرخان أبو المعتمر، نزل في التيم، فنسب إليهم.




ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'তালাক্কী আল-বুয়ূ' (পণ্য বাজারে আসার আগেই পথিমধ্যে গিয়ে বিক্রেতাদের সাথে সাক্ষাৎ করে ক্রয়-বিক্রয় সম্পন্ন করা) থেকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5739)


5739 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يبيع بعضكم على بيع بعض، ولا تلقوا السلع حتى يُهبط بها إلى السوق".

متفق عليه: رواه البخاري (2165) عن عبد اللَّه بن يوسف، أخبرنا مالك، عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره.

ورواه مسلم في البيوع (1517) من طريق عبيد اللَّه، عن نافع به بلفظ: أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى أن تُتَلَقَّى السِّلَعُ حتى تبلغ الأسواق".

تنبيه: الحديث في موطأ مالك برواية يحيى الليثي، كما سبق في باب النهي عن بيع الرجل على بيع أخيه بلفظ الشطر الأول، وليس فيه قوله:"ولا تلقوا السلع. . . ." إلخ.

وإنما وقع ذلك في بعض الروايات عن مالك، كما في رواية عبد اللَّه بن يوسف هذه التي عند البخاري.

قال الحافظ ابن عبد البر في التمهيد (13/ 316):"وهذه الزيادة صحيحة لابن وهب، والقعنبي، وعبد اللَّه بن يوسف، وسليمان بن برد، عن مالك، وليست لغيرهم، وهي صحيحة". اهـ.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন অন্যের বিক্রয়ের ওপর নিজের পণ্য বিক্রি না করে, আর তোমরা পণ্যবাহী কাফেলার সাথে সাক্ষাৎ করো না, যতক্ষণ না তা বাজারে নামানো হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5740)


5740 - عن وعن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يُتَلَقَّى الجَلَبُ.

متفق عليه: رواه البخاري في البيوع (2162) من طريق سعيد بن أبي سعيد، ومسلم في البيوع (1519: 16) من طريق ابن سيرين، كلاهما عن أبي هريرة. واللفظ لمسلم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমদানি করা পণ্যসামগ্রী বাজারে আসার পূর্বে বাইরে গিয়ে সাক্ষাৎ (এবং ক্রয়-বিক্রয়) করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5741)


5741 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تلقوا الركبان للبيع، ولا يبع بعضكم على بيع بعض، ولا تناجشوا، ولا يبع حاضر لباد، ولا تصروا الإبل والغنم، فمن ابتاعها بعد ذلك فهو بخير النظرين بعد أن يحلبها: إن رضيها أمسكها، وإن سخطها ردها وصاعا من تمر".

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (96) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة. ورواه البخاري في البيوع (2150)، ومسلم في البيوع (1515: 11) كلاهما من طريق مالك به مثله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কাফেলার সাথে দেখা করে (বাজারে পৌঁছানোর আগে) বিক্রির জন্য তাদের পণ্য কিনে নিও না, আর তোমাদের কেউ যেন অপরের বিক্রির উপর বিক্রি না করে, আর তোমরা ‘নাজাশ’ (মিথ্যা মূল্যবৃদ্ধি) করো না, আর কোনো শহরবাসী যেন কোনো গ্রামবাসীর পক্ষে (মধ্যস্থতাকারী হিসেবে) বিক্রি না করে, আর তোমরা উট ও বকরীর দুধ স্তন্যে জমা করে রেখো না। অতঃপর যে ব্যক্তি এরূপ করার পর তা ক্রয় করবে, দুধ দোয়ানোর পর তার জন্য দুটি পছন্দের মধ্যে উত্তমটি গ্রহণ করার অধিকার থাকবে: যদি সে তা পছন্দ করে, তবে রেখে দেবে; আর যদি অপছন্দ করে, তবে তা ফিরিয়ে দেবে এবং এক সা' খেজুরও সাথে দেবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5742)


5742 - عن أبي هريرة قال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تلقوا الجلب، فمن تلقاه فاشترى منه، فإذا أتى سيده السوق فهو بالخيار".

صحيح: رواه مسلم في البيوع (1519: 17) عن ابن أبي عمر، حدثنا هشام بن سليمان، عن ابن جريج، أخبرني هشام القردوسي، عن ابن سيرين قال: سمعت أبا هريرة فذكر الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আগমনকারীদের (ব্যবসায়ীদের) সাথে (শহরে প্রবেশের পথে পণ্যের জন্য) সাক্ষাৎ করো না। সুতরাং যে ব্যক্তি তার সাথে সাক্ষাৎ করে তার থেকে (কোনো পণ্য) ক্রয় করে, অতঃপর তার মালিক যখন বাজারে এসে পৌঁছবে, তখন সে ইচ্ছানুযায়ী (ক্রয়চুক্তি বহাল বা বাতিল করার) ক্ষমতা রাখবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5743)


5743 - عن سمرة أن نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى أن تتلقى الأجلاب حتى تبلغ الأسواق، أو يبيع حاضر لباد.
حسن: رواه أحمد (20119)، والطبراني في الكبير (6929)، كلاهما من حديث علي بن عبد اللَّه (المديني)، حدثنا معاذ، حدثني أبي، عن مطر، عن الحسن، عن سمرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل مطر، وهو ابن طهمان الوراق، مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف؛ لأنه كان يخطئ.

وأما الحسن فهو البصري الإمام المعروف، وهو مدلس، وقد عنعن، إلا أن سماعه عن سمرة ثابت على رأي الجمهور.

معنى الحديث: كان من عادة العرب أنهم كانوا يتلقون الركبان قبل أن يقدموا البلد، ويعرفوا سعر السوق، فيخبروهم بأن الأسعار ساقطة، والسوق كاسدة، والرغبة قليلة، ويبتاعونه منهم بالوكس من الثمن، وهو يشبه الغش؛ فنهاهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وخيرهم بأن من غُش بهذا الشكل فهو بالخيار. وهو مذهب الشافعي وأحمد، وظاهر الحديث يدل على ذلك.

وقال بعض أهل العلم: إنما يكون للبائع الخبار إذا كان المتلقي قد ابتاعه بأقل من الثمن، فإذا ابتاعه بثمن مثله فلا خيار له حينئذ.




সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমদানিকৃত পণ্যসামগ্রী বাজারে পৌঁছার পূর্বে সেগুলোকে (রাস্তায়) গ্রহণ করতে নিষেধ করেছেন, অথবা কোনো শহরবাসী যেন কোনো গ্রামবাসীর পক্ষে (মধ্যস্থতাকারী হিসেবে) বিক্রি না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (5744)


5744 - عن معمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من احتكر فهو خاطئ". فقيل لسعيد: فإنك تحتكر؟ قال سعيد: إن معمرا الذي كان يحدث هذا الحديث كان يحتكر.

صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1605: 129) عن عبد اللَّه بن مسلمة بن قعنب، حدثنا سليمان (يعني ابن بلال)، عن يحيى (وهو ابن سعيد) قال: كان سعيد بن المسيب يحدث أن معمرا قال فذكره. ومعمر هو ابن عبد اللَّه أبي معمر، أحد بني عدي بن كعب.

وكون الصحابي يروي الحديث، ثم يخالفه، وكذا التابعي يرويه، ويخالفه، ويستدل على مخالفته لمخالفة الصحابي، فكل هذا مشعر، كما قال البيهقي (5/ 30):"إنهما احتكرا على غير الوجه المنهي عنه".

وقال الخطابي:"والحديث وإن جاء باللفظ العام، فاحتكار الراوي يدل على أنه مختص ببعض الأشياء، أو بعض الأحوال؛ إذ لا يظن بالصحابي أن يروي الحديث، ثم يخالفه، وكذلك سعيد بن المسيب لا يظن به في فضله وعلمه أنه يروي الحديث، ثم يخالفه، إلا أن يحمل الحديث على بعض الأشياء، فروي أنه كان يحتكر الزيت. انتهى.

وسيأتي كلام أهل العلم في آخر الباب.




মা'মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি খাদ্যদ্রব্য ইত্যাদি মজুদ করে (একচেটিয়া ব্যবসা করে), সে গুনাহগার।” তখন সাঈদকে (ইবনুল মুসায়্যিব) বলা হলো: আপনিও তো মজুদ করেন? সাঈদ বললেন: মা'মার, যিনি এই হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনিও তো মজুদ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5745)


5745 - عن عمر بن الخطاب أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يبيع نخل بني النضير ويحبس لأهله قوت سنتهم.
متفق عليه: رواه البخاري في النفقات (5357) ومسلم في الجهاد (1757) كلاهما من حديث ابن عيينة قال: قال لي معمر: قال لي الثوري: هل سمعت في رجل يجمع لأهله قوت سنتهم أو بعض السنة؟ قال معمر: فلم يحضرني، ثم ذكرت حديثًا حدثناه ابن شهاب الزهري، عن مالك بن أوس، عن عمر فذكره. والسياق للبخاري، وسياق مسلم نحوه، وحبس الطعام للأهل لا يسمى احتكارا.

وأما ما روي عن عمر بن الخطاب مرفوعًا:"من احتكر على المسلمين طعامهم ضربه اللَّه بالجذام والإفلاس". فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (2155)، وأحمد (135)، وعبد بن حميد (17) كلهم من حديث الهيثم بن رافع الطاطري البصري، حدثني أبو يحيى رجل من أهل مكة، عن فروخ مولى عثمان: إن عمر -وهو يومئذ أمير المؤمنين- خرج إلى المسجد، فرأى طعاما منثورا، فقال: ما هذا الطعام؟ فقالوا: طعام جلب إلينا. قال: بارك اللَّه فيه، وفيمن جلبه. قيل: يا أمير المؤمنين، فإنه قد احتكر. قال: ومن احتكره؟ قالوا: فروخ مولى عثمان، وفلان مولى عمر. فأرسل إليهما، فدعاهما، فقال: ما حملكما على احتكار طعام المسلمين؟ قالا: يا أمير المؤمنين، نشتري بأموالنا، ونبيع. فقال عمر: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل أبي يحيى المكي؛ فإنه مجهول. قال الذهبي في الميزان (4/ 587):"لا يعرف، والخبر منكر، أخرجه أحمد في مسند عمر".

وقال في ترجمة الهيثم بن رافع:"وقد أنكر حديثه في الحكرة". وقال:"وأبو يحيى: لا يدري من هو؟".

وفي الباب ما روي أيضًا عن عمر مرفوعًا:"الجالب مرزوق، والمحتكر ملعون". رواه ابن ماجه (2153)، وعبد بن حميد (33)، والدارمي (2582)، والحاكم (2/ 11).

وفي إسنادهم جميعًا علي بن زيد بن جدعان، وهو ضعيف، ضعّفه علي بن المديني، وغيره.

وفي الباب أيضًا ما روي عن ابن عمر مرفوعًا:"من احتكر طعامًا أربعين ليلة فقد برئ من اللَّه تعالى، وبرئ اللَّه تعالى عنه. وأيما أهل عرصةٍ أصبح فيهم امرؤ جائع فقد برئت منهم ذمة اللَّه تعالى".

رواه أحمد (4880) عن يزيد، أخبرنا أصبغ بن زيد، حدثنا أبو بشر، عن أبي الزاهرية، عن كثير بن مرة الحضرمي، عن ابن عمر فذكره. وأبو بشر مجهول، وضعفه يحيى بن معين.

وقال أبو حاتم:"هذا حديث منكر، وأبو بشر لا أعرفه". (العلل 1/ 392).

وأخرجه الحاكم (2/ 11 - 12) من طريق عمرو بن الحصين العقيلي، ثنا أصبغ بن زيد الجهني، عن أبي الزاهرية بإسناده، فأسقط فيه"أبا بشر" من بين أصبغ بن زيد وبين أبي الزاهرية.

وقال الذهبي:"عمرو تركوه، وأصبغ فيه لين".

وقد نبه الحاكم في آخر الأحاديث الستة التي ساقها بأنها ليست على شرط الكتاب.
وفي الباب ما روي أيضًا عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من احتكر حكرة يريد أن يغلي بها على المسلمين فهو خاطئ".

رواه أحمد (8617) عن سريج، حدثنا أبو معشر، عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وأبو معشر اسمه نجيح بن عبد الرحمن الندي، ضعيف عند جمهور أهل العلم.

ولكن رواه الحاكم (2/ 12)، وعنه البيهقي (6/ 30) من وجه آخر عن إبراهيم بن إسحاق العسيلي، ثنا عبد الأعلى بن حماد، ثنا حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو بإسناده نحوه.

قال الحاكم بعد أن ذكر ستة أحاديث، منها هذا:"هذه الأحاديث الستة طلبتها، وخرجتها في موضعها من هذا الكتاب احتسابا لما فيه الناس من الضيق -واللَّه يكشفها- وإن لم يكن من شرط هذا الكتاب". وقال الذهبي:"العسيلي كان يسرق الحديث".

وفي الباب أيضًا عن معقل بن يسار، وأبي أمامة الباهلي، وغيرهما. والصحيح ما ذكرته.

معنى الحديث وفقهه:

قال أبو داود: سألت أحمد: ما الحكرة؟ قال: ما فيه عيش الناس.

قال أبو داود: قال الأوزاعي: المحتكر من يعترض السوق.

وقال عقب حديث معمر (3447):"كان سعيد بن المسيب يحتكر النوى، والخبط، والبزر".

وقال الترمذي (1267):"حديث معمر حديث حسن صحيح. والعمل على هذا عند أهل العلم، كرهوا احتكار الطعام، ورخص بعضهم في الاحتكار في غير الطعام".

وقال الخطابي:"إنما جاء الحديث باللفظ العام، والمراد منه معنى خاص، وقد روي عن سعيد بن المسيب أنه كان يحتكر الزيت".

ونقل عن الإمام أحمد أنه قال:"ليس الاحتكار إلا في الطعام خاصة؛ لأنه قوت الناس".

وقال الحسن، والأوزاعي:"من جلب طعاما من بلد، فحبسه ينتظر زيادة السعر، فليس بمحتكر، وإنما المحتكر من أعترض سوق المسلمين".

ولذا يجوز للسلطان أن يمنع التجار من احتكار الطعام وقوت الناس حتى لا يتضرر عامتهم.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বানু নাযীরের খেজুর বাগান বিক্রি করে দিতেন এবং তাঁর পরিবারের জন্য এক বছরের খাদ্য সঞ্চয় করে রাখতেন।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী (৫৩৫৭) কিতাবুন নাফাকাত এবং ইমাম মুসলিম (১৭৫৭) কিতাবুল জিহাদে এটি বর্ণনা করেছেন। উভয়টিই ইবনু উয়াইনা থেকে বর্ণিত। ইবনু উয়াইনা বলেন, মা‘মার আমাকে বলেছেন, সাওরী আমাকে বলেছেন: তুমি কি এমন কোনো ব্যক্তি সম্পর্কে শুনেছ, যে তার পরিবারের জন্য এক বছর বা কিছু সময়ের খাবার সঞ্চয় করে রাখে? মা‘মার বলেন: তখন আমার মনে পড়েনি। পরে আমার সেই হাদীসটি মনে পড়ল যা ইবনু শিহাব আয-যুহরী, মালিক ইবনু আওস এর সূত্রে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন এবং যা তিনি উল্লেখ করেছেন। এই বর্ণনাটি ইমাম বুখারীর এবং ইমাম মুসলিমের বর্ণনাও অনুরূপ। আর পরিবারের জন্য খাবার সঞ্চয় করে রাখাকে মজুতদারি (احتکار) বলা হয় না।

তবে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে: “যে ব্যক্তি মুসলমানদের খাদ্য মজুত করবে, আল্লাহ তাকে কুষ্ঠরোগ ও দেউলিয়াত্ব দ্বারা আঘাত করবেন।” এটি দুর্বল।

ইবনু মাজাহ (২১৫৫), আহমাদ (১৩৫) ও আবদ ইবনু হুমাইদ (১৭) এটি বর্ণনা করেছেন। সকলেই হাইসাম ইবনু রাফি’ আত-তাতারী আল-বাসরী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: মক্কাবাসী একজন লোক আবু ইয়াহইয়া আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি উসমানের মাওলা ফাররুখ থেকে বর্ণনা করেন: একদা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—তখন তিনি আমীরুল মুমিনীন—মসজিদের দিকে বের হলেন। তিনি কিছু ছড়ানো খাদ্য দেখতে পেলেন। তিনি বললেন: এই খাদ্য কী? তারা বলল: এটা আমাদের কাছে আমদানিকৃত খাদ্য। তিনি বললেন: আল্লাহ এতে এবং যে এটি এনেছে তাতে বরকত দিন। বলা হলো: হে আমীরুল মুমিনীন, এটি মজুত করা হয়েছে। তিনি বললেন: কে মজুত করেছে? তারা বলল: উসমানের মাওলা ফাররুখ এবং উমরের মাওলা অমুক। তিনি তাদের কাছে লোক পাঠালেন এবং তাদের ডেকে আনলেন। তিনি বললেন: মুসলমানদের খাদ্য মজুত করতে তোমাদের কিসে প্ররোচিত করল? তারা বলল: হে আমীরুল মুমিনীন, আমরা আমাদের অর্থ দিয়ে কিনি এবং বিক্রি করি। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি— অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন।

এই হাদীসের সনদ দুর্বল, কারণ এর মধ্যে মক্কাবাসী আবু ইয়াহইয়া রয়েছে; সে মাজহুল (অজ্ঞাত)। যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) আল-মীযান (৪/৫৮৭)-এ বলেন: তাকে চেনা যায় না এবং খবরটি মুনকার (অগ্রহণযোগ্য)। আহমাদ এটিকে উমরের মুসনাদে এনেছেন।

হাইসাম ইবনু রাফি’-এর জীবনীতে তিনি (যাহাবী) বলেছেন: "মজুতদারি (আল-হুকরাহ) সম্পর্কে তার হাদীসটি মুনকার।" তিনি আরও বলেন: "আবু ইয়াহইয়া কে, তা জানা যায় না।"

এই অনুচ্ছেদে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ সূত্রে আরও বর্ণিত হয়েছে: "যে পণ্য আমদানি করে সে রিযিকপ্রাপ্ত হয় এবং যে মজুত করে সে অভিশপ্ত।" এটি ইবনু মাজাহ (২১৫৩), আবদ ইবনু হুমাইদ (৩৩), দারিমী (২৫৮২) এবং হাকিম (২/১১) বর্ণনা করেছেন।

তাদের সকলের সনদে আলী ইবনু যায়দ ইবনু জুদআন রয়েছে, যিনি দুর্বল। আলী ইবনুল মাদীনী এবং অন্যান্যরা তাকে দুর্বল বলেছেন।

এই অনুচ্ছেদে ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও মারফূ’ সূত্রে বর্ণিত হয়েছে: "যে ব্যক্তি চল্লিশ রাত খাদ্য মজুত করে রাখল, সে আল্লাহ তাআলা থেকে মুক্ত হয়ে গেল এবং আল্লাহ তাআলাও তার থেকে মুক্ত হয়ে গেলেন। আর যে কোনো বসতিতে এমন ব্যক্তি সকালে উপনীত হলো যে ক্ষুধার্ত, তবে আল্লাহর যিম্মা তাদের থেকে মুক্ত।"

আহমাদ (৪৮৮০) এটি ইয়াযীদ থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আসবাগ ইবনু যায়দ আমাদেরকে খবর দিয়েছেন, তিনি আবু বিশর থেকে, তিনি আবুল যাহিরিয়্যাহ থেকে, তিনি কাসীর ইবনু মুররাহ আল-হাদরামী থেকে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আবু বিশর মাজহুল (অজ্ঞাত), আর ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন তাকে দুর্বল বলেছেন।

আবু হাতিম বলেন: "এই হাদীসটি মুনকার (অগ্রহণযোগ্য), আর আমি আবু বিশরকে চিনি না।" (আল-ইলাল ১/৩৯২)।

ইমাম হাকিমও (২/১১-১২) এটি আমর ইবনুল হুসায়ন আল-উকায়লী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আসবাগ ইবনু যায়দ আল-জুহানী আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি আবুল যাহিরিয়্যাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এই সনদে আসবাগ ইবনু যায়দ ও আবুল যাহিরিয়্যাহ-এর মাঝে "আবু বিশর" বাদ পড়েছে।

যাহাবী বলেন: "আমরের হাদীস পরিত্যাগ করা হয়েছে, আর আসবাগে দুর্বলতা আছে।"

ইমাম হাকিম যে ছয়টি হাদীস উল্লেখ করেছেন, তার শেষে তিনি সতর্ক করে দিয়েছেন যে সেগুলো তার কিতাবের শর্ত পূরণ করে না।

এই অনুচ্ছেদে আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মজুতদারি করলো এবং এর মাধ্যমে মুসলমানদের উপর মূল্য বৃদ্ধি করতে চাইল, সে পাপী।"

আহমাদ (৮৬১৭) এটি সুরাইজ থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আবু মা‘শার আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু আমর ইবনু আলকামা থেকে, তিনি আবু সালামা থেকে, তিনি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আবু মা’শার-এর নাম নুজাইহ ইবনু আবদির রহমান আন-নাদী, যিনি জমহুর আলেমদের নিকট দুর্বল।

তবে ইমাম হাকিম (২/১২) এবং তাঁর সূত্রে বায়হাকী (৬/৩০) এটি ইবরাহীম ইবনু ইসহাক আল-‘উসাইলী-এর অন্য একটি সূত্র থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আবদুল আ’লা ইবনু হাম্মাদ আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি হাম্মাদ ইবনু সালামা থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু আমর থেকে অনুরূপ সনদে বর্ণনা করেছেন।

ইমাম হাকিম এই ছয়টি হাদীস উল্লেখ করার পর বলেন: "মানুষের কষ্ট দূরীকরণের উদ্দেশ্যে আমি এই ছয়টি হাদীস খুঁজে বের করে আমার কিতাবের উপযুক্ত স্থানে অন্তর্ভুক্ত করেছি— আল্লাহ যেন তাদের কষ্ট দূর করেন— যদিও এই কিতাবের শর্ত অনুসারে সেগুলো সঠিক নয়।" যাহাবী বলেন: "আল-‘উসাইলী হাদীস চুরি করত।"

এই অনুচ্ছেদে মা‘কিল ইবনু ইয়াসার, আবু উমামা আল-বাহিলী এবং অন্যান্যদের থেকেও বর্ণনা রয়েছে। তবে আমি যা উল্লেখ করেছি, তা-ই সহীহ।

হাদীসের অর্থ ও ফিকাহ:

আবু দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞেস করলাম: মজুতদারি (আল-হুকরাহ) কী? তিনি বললেন: যা মানুষের জীবনধারণের জন্য প্রয়োজন।

আবু দাউদ আরও বলেন: আওযাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: যে ব্যক্তি বাজারের কাজে বাধা সৃষ্টি করে, সেই মজুতকারী।

তিনি মা’মার (৩৪৪৭)-এর হাদীসের পরে বলেছেন: "সাঈদ ইবনুল মুসায়্যিব খেজুরের আঁটি, খবত (পশুর খাবার) এবং বীজ মজুত করতেন।"

তিরমিযী (১২৬৭) বলেন: "মা’মারের হাদীসটি হাসান ও সহীহ। বিদ্বানদের আমল এই মতের উপরই। তারা খাদ্য মজুত করাকে অপছন্দ করতেন, কিন্তু কেউ কেউ খাদ্য ব্যতীত অন্য কিছু মজুত করার অনুমতি দিয়েছেন।"

খাত্তাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "হাদীসটি সাধারণ শব্দে এলেও এর উদ্দেশ্য বিশেষ অর্থ।" সাঈদ ইবনুল মুসায়্যিব থেকে বর্ণিত আছে যে তিনি তেল মজুত করতেন।

ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত আছে যে তিনি বলেছেন: "মজুতদারি কেবল খাদ্যদ্রব্যের ক্ষেত্রেই হবে; কারণ এটি মানুষের প্রধান খাদ্য।"

হাসান এবং আওযাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো দেশ থেকে খাদ্য আমদানি করে, অতঃপর দাম বৃদ্ধির অপেক্ষায় তা ধরে রাখে, সে মজুতকারী নয়। মজুতকারী হলো সেই ব্যক্তি যে মুসলমানদের বাজারে বাধা সৃষ্টি করে।"

এই কারণে, শাসক (সুলতান) ব্যবসায়ীদেরকে খাদ্য এবং মানুষের জীবনধারণের উপাদান মজুত করা থেকে বিরত রাখতে পারেন, যাতে সাধারণ মানুষ ক্ষতিগ্রস্ত না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5746)


5746 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن النجش.

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (97) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في البيوع (2142)، ومسلم في البيوع (1516) كلاهما من طريق مالك به مثله.




আবদুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজশ (কৃত্রিম দর কষাকষি) করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5747)


5747 - عن عبد اللَّه بن أبي أوفى قال: أقام رجل سلعته، فحلف باللَّه: لقد أعطى بها ما
لم يعطها، فنزلت: {إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا} [سورة آل عمران: 77].

وقال ابن أبي أوفى: الناجش آكل ربا خائن.

صحيح: رواه البخاري في الشهادات (2675) عن إسحاق، أخبرنا يزيد بن هارون، أخبرنا العوام قال: حدثني إبراهيم أبو إسماعيل السكسكي، سمع عبد اللَّه بن أبي أوفى يقول فذكره.

والنجَش في اللغة تنفير الصيد واستشارته من مكانه ليصاد، يقال: نجشت الصيد، أنجُشه بالضم، نجْشا.

قال مالك عقب الحديث:"والنجش أن تعطيه بسلعته أكثر من ثمنها، وليس في نفسك اشتراؤها، فيقتدي بك غيرك".

وقال الترمذي:"والنجش أن يأتي الرجل الذي يفصل السلعة إلى صاحب السلعة، فيستام بأكثر مما تسوى، وذلك عندما يحضره المشتري، يريد أن يغتر المشتري به، وليس من رأيه الشراء، إنما يريد أن يخدع المشتري بما يستام". انتهى.

وأما حكم النجش فقال الشافعي:"الناجش آثم فيما يصنع، والبيع جائز؛ لأن البائع غير الناجش". ذكره الترمذي.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি তার পণ্যদ্রব্য বিক্রির জন্য পেশ করল। অতঃপর সে আল্লাহর নামে কসম করে বলল যে, সে মূল্য পেয়েছে যা তাকে দেওয়া হয়নি। ফলে এই আয়াতটি নাযিল হয়: {ইন্না-ল্লাযীনা ইয়াশতারূনা বি‘আহ্‌দি ল্লা-হি ওয়া আয়মা-নিহিম ছামানান ক্বালীলা-} অর্থাৎ, "নিশ্চয়ই যারা আল্লাহর অঙ্গীকার এবং নিজেদের শপথের বিনিময়ে সামান্য মূল্য ক্রয় করে..." [সূরা আলে ইমরান: ৭৭]।

ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন: যে ব্যক্তি দাম-বৃদ্ধি করে মিথ্যা মূল্য প্রদান করে (আন-নাজিশ), সে হলো সূদখোর ও প্রতারক (খائن)।