আল-জামি` আল-কামিল
5748 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تناجشوا".
صحيح: رواه أبو داود (3438) عن أحمد بن عمرو بن السرح، حدثنا سفيان، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.
ومن هذا الإسناد أخرجه كل من الترمذي (1304)، والنسائي (4506)، وابن ماجه (2174)، يزيد بعضهم على بعض، إلا أن النسائي رواه من طريق معمر، عن الزهري.
وحديث أبي هريرة ذكر كاملًا في باب النهي عن بيع المصراة.
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা (কৃত্রিমভাবে) দাম বাড়িয়ো না।
5749 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن المحاقلة، والمزابنة، والمعاومة، والمخابرة -قال أحدهما: بيع السنين هي المعاومة-، وعن الثنيا ورخص في العرايا.
صحيح: رواه مسلم في البيوع (1536: 85) عن طريق حماد بن زيد، حدثنا أيوب، عن أبي الزبير وسعيد بن ميناء، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.
ورواه أبو داود (3405)، والترمذي (1290)، وغيرهما من طريق يونس بن عبيد، عن عطاء، عن جابر، فذكر مثله، وزاد فيه:"والثنيا إلا أن تعلم".
وبيع الثنيا المنهي عنه أن يبيع ثمر حائطه، ويستثني منه جزءا غير معلوم، ولكن لو استثنى منه جزءا معلوما لجاز البيع.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাকালা, মুজাবানা, মু'আওয়ামা এবং মুখাবারা থেকে নিষেধ করেছেন। বর্ণনাকারীদের একজন বলেছেন: মু'আওয়ামা হলো কয়েক বছরের ফল বিক্রি। আর তিনি 'সুনিয়া' থেকেও নিষেধ করেছেন এবং 'আরায়া'-এর ক্ষেত্রে অনুমতি দিয়েছেন।
5750 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تلقوا الركبان للبيع، ولا يبع بعضكم على بيع بعض، ولا تناجشوا، ولا يبع حاضر لباد، ولا تُصرُّوا الإبل والغنم، فمن ابتاعها بعد ذلك فهو بخير النظرين بعد أن يحلبها: إن رضيها أمسكها، وإن سخطها ردها وصاعا من تمر".
متفق عليه: رواه مالك في البيوع (96) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاري في البيوع (2150)، ومسلم في البيوع (1515: 11)، كلاهما من طريق مالك به مثله.
ورواه مسلم أيضًا (1524: 28) من طريق همام بن منبه قال: هذا ما حدثنا أبو هريرة عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر أحاديث منها:"إذا ما أحدكم اشترى لقحة مصراة أو شاة مصراة، فهو بخير النظرين بعد أن يحلبها: إما هي، وإلا فليردها وصاعًا من تمرٍ".
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা ব্যবসার জন্য কাফেলার সাথে পথে দেখা করো না (তাদের আগমনের পূর্বেই দাম বলার জন্য এগিয়ে যেও না), আর তোমাদের কেউ যেন অন্যের বিক্রয়ের উপর বিক্রি না করে, আর তোমরা 'নাজাশ' (মিথ্যা দাম হাঁকা) করো না, আর কোনো শহরবাসী যেন কোনো গ্রামবাসীর পক্ষে (মধ্যস্থতা করে) বিক্রি না করে, আর তোমরা উট ও বকরীর স্তন বাঁধবে না (দুধ জমিয়ে রাখার জন্য)। এরপর যে ব্যক্তি তা ক্রয় করে, সে দুধ দোহনের পর দুটি বিষয়ের মধ্যে উত্তমটি গ্রহণের অধিকার রাখে: যদি সে তা পছন্দ করে তবে তা রেখে দেবে, আর যদি অপছন্দ করে তবে তা ফেরত দেবে এবং তার সাথে এক সা' (Sa') খেজুর দেবে।"
5751 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من ابتاع شاة مصراة فهو فيها بالخيار ثلاثة أيام، إن شاء أمسكها، وإن شاء ردها، ورد معها صاعا من تمر".
صحيح: رواه مسلم في البيوع (1524: 24) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا يعقوب بن عبد الرحمن القاري، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة.
وفي رواية عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة به مثله، إلا أنه قال:"فإن ردها رد معها صاعا من طعام، لا سمراء".
وفي رواية عن ابن سيرين أيضًا بلفظ:"من اشترى شاة مصراة فهو بخير النظرين: إن شاء أمسكها، وإن شاء ردها وصاعا من تمر لا سمراء".
وقد أشار البخاري إلى هذا الاختلاف في رواية ابن سيرين عقب حديث الأعرج عن أبي هريرة المتقدم في الباب، فقال:"وقال بعضهم عن ابن سيرين:"صاعا من تمر". ولم يذكر"ثلاثا"، والتمر أكثر. اهـ.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'যে ব্যক্তি এমন বকরী ক্রয় করে, যার দুধ আটকিয়ে রাখা হয়েছে (মুসাররাহ), সে তার ব্যাপারে তিন দিনের জন্য ইখতিয়ার (পছন্দ) পাবে। সে চাইলে এটিকে রেখে দিতে পারে, অথবা চাইলে এটিকে ফেরত দিতে পারে। আর সেটিকে ফেরত দিলে তার সাথে এক 'সা' পরিমাণ খেজুর ফেরত দিতে হবে।'
5752 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا باع أحدكم الشاة أو اللِقحة فلا يُحَفِّلها".
صحيح: رواه النسائي (4481)، وأحمد (7699)، وابن حبان (4969) من حديث عبد الرزاق -وهو في مصنفه (14864) -: أخبرنا معمر، عن يحيى بن أبي كثير، أخبرني أبو كثير، أنه سمع أبا هريرة فذكره. وإسناده صحيح.
"والتحفيل" هو جمع اللبن في ضرع الناقة.
"واللقحة" هي الناقة الناتجة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমাদের কেউ ভেড়া বা দুগ্ধবতী উটনী বিক্রি করে, তবে সে যেন (বাট-এ) তার দুধ জমিয়ে না রাখে।"
5753 - عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"لا يُتَلَقَّى جَلَبٌ، ولا يبع حاضر لباد، ومن اشترى شاة مصراة أو ناقة -قال شعبة: إنما قال: ناقة مرة واحدة- فهو فيها بآخر النظرين إذا هو حلب، إن ردها رد معها صاعا من طعام".
قال الحكم: أو قال:"صاعا من تمر".
صحيح: رواه أحمد (18819)، والبيهقي (5/ 319) كلاهما من حديث شعبة، عن الحكم، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
وإسناده صحيح، ولا تضر الجهالة بالصحابي، كما هو معلوم.
وقوله:"صاعا من طعام، أو صاعا من تمر" شك من أحد الرواة، لا أنه على التخيير؛ ليكون موافقا للأحاديث الثابتة. قاله البيهقي.
وقد أفتى بذلك من الصحابة عبد اللَّه بن مسعود.
رواه البخاري في البيوع (2149، 2164) من وجهين عن سليمان التيمي، عن أبي عثمان النهدي، عن عبد اللَّه قال:"من اشترى شاة محفلة، فردها، فليرد معها صاعا من تمر. ونهى النبي صلى الله عليه وسلم أن تُلقى البيوع".
وكذلك رواه عبد الرزاق (8/ 198) عن الثوري، والبيهقي (5/ 317) من حديث يعلى بن عبيد، كلاهما عن الأعمش، عن خيثمة، عن عبد اللَّه قال:"إياكم والمحفلات؛ فإنها خلابة، ولا تحل الخلابة لمسلم". ولكن زاد البيهقي بين خيثمة وبين عبد اللَّه"الأسود".
ورواه ابن ماجه (2241)، وأحمد (4125)، وأبو داود الطيالسي (292)، وعنه البيهقي (5/ 317) كلهم من حديث المسعودي، عن جابر، عن أبي الضحى، عن مسروق، عن عبد اللَّه، فرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم وهو الصادق المصدوق-، فذكر الحديث مثله.
وجابر هو أبن يزيد الجعفي، وهو ضعيف. والمسعودي هو عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن عتبة اختلط قبل موته. والصحيح أنه موقوف.
وسئل الدارقطني عن حديث خيثمة، عن ابن مسعود: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع المحفلات من الغنم.
فقال: أسنده أبو شهاب عن الأعمش، عن خيثمة.
وغيره يرويه موقوفا. وهو الصواب". (العلل 5/ 47 - 48).
ثم رواه عن أبي القاسم بن منيع، حدثنا محمد بن جعفر الوركاني، حدثنا أبو شهاب بذلك مرفوعا. وليس غيره.
وقال في أطراف الغرائب:"تفرد به محمد بن جعفر الوركاني، عن أبي شهاب، عن الأعمش،
عنه". انتهى.
وأما ما روي عن عبد اللَّه بن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا أيها الناس من باع محفلة فهو بالخيار ثلاثة أيام، فإن ردها رد معها مثلي لبنها -أو قال: مثل لبنها- قمحا". فهو ضعيف.
رواه أبو داود (3446)، وابن ماجه (2240)، والبيهقي (5/ 319) كلهم من حديث عبد الواحد ابن زياد قال: حدثنا صدقة بن سعيد الحنفي قال: حدثنا جميع بن عمير التيمي قال: حدثنا عبد اللَّه ابن عمر فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل جميع بن عمير التيمي، قال فيه البخاري:"فيه نظر". وقال ابن حبان:"رافضي يضع الحديث". إلا أن العجلي قال:"تابعي ثقة". وهو من تساهله، وحسن الترمذي بعض حديثه. وكذلك فيه صدقة بن سعيد الحنفي، ضعفه الساجي، وابن وضاح.
وفي الباب أيضًا ما روي عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تستقبلوا السوق، ولا تحفلوا، ولا يُنَفِّق بعضكم لبعض".
رواه الترمذي (1268)، وأحمد وابنه عبد اللَّه (3313)، وأبو يعلى (1345)، والبيهقي (5/ 317) كلهم من طريق أبي الأحوص، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وسماك هو أبن حرب الكوفي ثقة، وثّقه ابن معين وغيره، ولكن ضعّفه جمهور أهل العلم في روايته عن عكرمة؛ فإنه مضطرب فيه، كما قال أحمد، وابن المديني، والعجلي، وابن المبارك، وغيرهم.
وأما الترمذي فقال:"حسن صحيح". كأنه لم يأخذ بهذه العلة.
وقال:"والعمل على هذا عند أهل العلم، كرهوا بيع المحفلة، وهي المصراة، لا يحلبها صاحبها أياما ونحو ذلك؛ ليجتمع اللبن في ضرعها، فيغتر بها المشتري، وهذا ضرب من الخديعة والغرر".
قوله:"لا تصروا" بفتح التاء والصاد، ويأتي معناه اللغوي.
وفيه دليل على نهي التصرية، سواء قصد بها البيع أم لا؛ لما فيه من إيذاء الحيوان، وهو محرم. فإذا باع مع التصرية فإنه ارتكب المحظورين: إيذاء الحيوان، وغش المشتري. وما جاء بلفظ:"لا تصروا الإبل والغنم للبيع" فهو للغالب.
وقيل: إن النهي خاص بالبيع، ويجوز نصرية الحيوان لغير البيع.
وقوله:"فإن رضيها أمسكها" فيه دليل على صحة البيع مع التصرية إن رضي بها المشتري.
وقوله:"وصاعا من تمر" أي: ورد صاعا من تمر.
اختلاف أهل العلم واللغة في اشتقاق المصراة.
قال الشافعي: التصرية أن تربط أخلاف الناقة والشاة، وتترك من الحلب اليومين والثلاثة، حتى يجتمع لها لبن، فيراه المشتري كثيرا، ويزيد في ثمنها؛ لما يرى من كثرة لبنها، فإذا حلبها بعد تلك الحلبة حلبة أو اثنتين عرف أن ذلك ليس بلبنها، وهذا غرور للمشتري.
وقال أبو عبيد:"قوله:"مصرّاة" يعني الناقة أو البقرة أو الشاة التي قد صري اللبن في ضرعها، يعني حُقن فيه، وجمع أياما، فلم تحلب أياما. وأصل التصرية حبس الماء وجمعه، يقال منه: صَرّيت الماء وصَرَيته.
قال الأغلب:
رأيت غلاما قد صَرَى في فِقْرته … ماء الشبابِ عنفوانُ شِرّته
ويقال: هذا ماء صَرَى. مقصور.
قال عبيد بن الأبرص:
يا رُب ماءٍ صَرَى وردته … سبيله خائف جديبُ
ويقال منه: سميت المصّراة كأنها مياه اجتمعت، وكان بعض الناس يتأوّل من المصراة أنه من صرار الإبل، وليس هذا من ذلك في شيء، لو كان من ذاك لقال: مَصْرُورة، وما جاز أن يقال ذلك في البقر والغنم؛ لأن الصّرار لا يكون إلا للإبِل". انتهى. غريب الحديث (2/ 241 - 242).
قال الخطابي:"قول أبي عبيد حسن، وقول الشافعي صحيح".
انظر للمزيد"المنة الكبرى" (5/ 123 - 136)، وفيه تفاصيل أخرى من كلام أهل العلم في فقه الحديث.
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমদানি পণ্যের (ক্রেতাদের সাথে সাক্ষাৎ করে) استقبال করা হবে না, আর কোনো শহরবাসী কোনো গ্রামবাসীর পক্ষে বিক্রি করবে না। যে ব্যক্তি দুধ জমিয়ে রাখা (মুসাররাহ) ছাগল বা উটনি ক্রয় করলো, সে যখন এটিকে দোহন করবে, তখন সে (ফেরত দেওয়ার বিষয়ে) দুটি মতের শেষটি অনুসরণ করবে। যদি সে এটিকে ফেরত দেয়, তবে এর সাথে এক সা' পরিমাণ খাদ্য ফেরত দেবে।" আল-হাকাম (বর্ণনাকারী) বলেন: "অথবা তিনি বলেছেন: 'এক সা' পরিমাণ খেজুর'।"
5754 - عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن بيع الحيوان بالحيوان نسيئة.
صحيح: رواه عبد الرزاق (1433) قال: أخبرنا معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس قال فذكره.
وكذلك رواه ابن الجارود في المنتقى (610) من طريق داود بن عبد الرحمن العطار، والبيهقي (5/ 288 - 289) من طريق إبراهيم بن طهمان، وابن حبان (5028) من طريق سفيان الثوري، كل هؤلاء عن معمر بإسناده موصولا.
إلا أن سفيان الثوري قد اختلف عليه، فرواه ابن حبان من طريق داود الحفري عنه هكذا، ورواه البيهقي من طريق الفرياتي عنه مرسلا، وقال:"وكذلك رواه عبد الرزاق وعبد الأعلى عن معمر، وكذلك رواه علي بن المبارك عن يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا. وروينا عن البخاري أنه وهن رواية من وصله. ونقل عن الشافعي أنه قال: أما قوله:"إنه نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن بيع الحيوان بالحيوان نسيئة" فهذا غير ثابت عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم". انتهى قول البيهقي.
قلت: قول البخاري ذكره الترمذي في العلل الكبير (1/ 489 - 490) بعد أن رواه عن سفيان بن وكيع، نا محمد بن حميد هو الأحمدي، عن مَعْمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الحيوان باللحم نسيئة. قال: سألت مُحمدًا عن هذا الحديث،
فقال: روى داود بن عبد الرحمان العطار عن مَعْمر هذا، وقال: عن ابن عباس. وقال الناس: عن عكرمة عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا. فوهَّن محمد هذا الحديث. انتهى.
وأما الاختلاف على سفيان فقد ذكر البيهقي أبا أحمد الزبيري (عند الطحاوي 5612)، وعبد اللَّه بن عبد الرحمن الذماري رويا عنه موصولا، وتابعهما على وصله أبو داود الحفري، وخالفهم جميعا الفريابي، فروى عنه مرسلا. وقواعد التخريج تحكم أن من رواه عنه موصولا أولى من رواية من رواه عنه مرسلا.
وكذلك اختلف أيضًا على معمر، فرواه عنه عبد الرزاق -كما قال البيهقي-، وعبد الأعلى مرسلا، على أن عبد الرزاق رواه أيضًا عنه متصلا.
قال ابن التركماني:"كذا رأيت في نسخة جيدة من نسخ المصنف له، ورواه عن معمر: ابن طهمان والعطار موصولا، وتأيدت روايتهما بالرواية المذكورة عن عبد الرزاق، وكذلك معمر أحفظ من علي بن المبارك، فروايته عنه موصولا أولى من رواية ابن المبارك عنه مرسلا".
وقال:"وبالجملة فمن وصل حفظ وزاد، فلا يكون من قصر حجة عليه، وقد أخرج البزار هذا الحديث، وقال: ليس في هذا الباب حديث أجل إسنادا منه". انتهى كلام ابن التركماني.
هذا الكلام من ابن التركماني متجه مبني على قواعد الحديث، والبيهقي -رحمه اللَّه تعالى- ممن يقبل زيادة الثقة، لا سيما إذا كان الذين زادوه أكثر عددا، وأحسن حفظا. واللَّه أعلم بالصواب.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক পশুর বিনিময়ে আরেক পশু বাকিতে (বা বিলম্বে) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।
5755 - عن سمرة بن جندب أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الحيوان بالحيوان نسيئة.
صحيح: رواه أبو داود (3356)، والترمذي (1237)، والنسائي (4620)، وابن ماجه (2270)، وأحمد (20143)، والطحاوي في شرحه (5616)، وابن الجارود (611)، والبيهقي (5/ 288) كلهم من طرق عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة فذكره.
وإسناده صحيح. والحسن هو البصري، وقد صحح سماعه من سمرة مطلقة البخاري، وابن المديني، وأبو داود، وغيرهم.
ولذا قال الترمذي:"حسن صحيح، وسماع الحسن من سمرة صحيح، هكذا قال علي بن المديني وغيره".
وقال الخطابي:"وقد أثبت أحمد حديث سمرة".
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাকিতে প্রাণী দ্বারা প্রাণী বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।
5756 - عن جابر بن عبد اللَّه أنه قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيع الحيوان بالحيوان نسيئة، اثنين بواحد، ولا بأس به يدا بيد.
حسن: رواه الترمذي (1238)، وابن ماجه (2271)، وأحمد (14331)، كلهم من طريق حجاج، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وقال الترمذي:"حسن صحيح". ولكن نقل الزيلعي في نصب الراية (4/ 48):"حسن" فقط، وهو أولى؛ لأن فيه حجاج هو ابن أرطاة، مدلس يدلس عن الضعفاء.
ولكن تابعه أشعث بن سوار عند الطحاوي في شرحه (5614)، وكذلك الطبراني في الأوسط (2762) من طريق بحر بن كنيز، كلاهما عن أبي الزبير به. وأشعث وبحر ضعيفان.
وبمجموع هذه الطرق يصير الحديث حسنا.
وفي الباب عن جابر بن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الحيوان بالحيوان نسيئة.
رواه عبد اللَّه بن أحمد في زوائد المسند (20942).
وإسناده ضعيف؛ فإن فيه أبا عمر المقرئ، وهو حفص بن سليمان بن المغيرة، وهو مع إمامته في القراءة ضعيف في الحديث، وقد ضعفه أحمد، وابن المديني، ومسلم، وأبو حاتم، والنسائي، وغيرهم. وله أسانيد أخرى، وهي أضعف من هذا.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাকি/ধারে (নাসিয়্যাহ) এক প্রাণী দিয়ে অন্য প্রাণী বিক্রি করতে এবং (তাতে) দুইটির বিনিময়ে একটি (হিসাবে বিক্রি করতে) নিষেধ করেছেন। তবে হাতে হাতে (নগদ) বিক্রি করাতে কোনো অসুবিধা নেই।
5757 - عن عبد اللَّه بن عمرو أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أمره أن يجهز جيشا، فنفدت الإبل، فأمره أن يأخذ في قِلاص الصدقة، فكان يأخذ البعير بالبعيرين إلى إبل الصدقة.
حسن: رواه أبو داود (3357)، والدارقطني (3054)، والحاكم (2/ 56 - 57)، والبيهقي (5/ 287 - 289) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مسلم بن جبير، عن أبي سفيان، عن عمرو بن حريش، عن عبد اللَّه بن عمرو فذكره.
وعمرو بن حريش مجهول الحال، كما في القريب، ومدار الحديث عليه.
وفيه اضطراب في الإسناد في التقديم والتأخير، فقد رواه حماد بن سلمة هكذا، ورواه جرير بن حازم، عن محمد بن إسحاق، فقدم أبا سفيان على مسلم بن جبير، رواه أحمد (6593) في سياق أطول. ومحمد بن إسحاق مدلس، ولم أقف على تصريح منه.
قال البيهقي:"اختلفوا على محمد بن إسحاق في إسناده، وحماد بن سلمة أحسنهم سياقة، وله شاهد صحيح".
وهو يقصد به: طريق صحيح، وهو ما رواه الدارقطني (3052)، ومن طريقه البيهقي (5/ 287 - 289) عن ابن وهب، عن ابن جريج أن عمرو بن شعيب أخبره عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمرو فذكره.
وهذا إسناد حسن، وجعل البيهقي شاهدا صحيحا للإسناد السابق.
وقال الحافظ في الفتح (4/ 489): إسناده قوي. وحسَّنه ابن القيم في"تهذيب السنن".
وقلاص جمع قلوص، وهي الناقة الشابة.
وفي الباب عن عبد اللَّه بن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تبيعوا الدينار بالدينارين، ولا الدرهم بالدرهمين، ولا الصاع بالصاعين؛ فإني أخاف عليكم الرماء، والرماء هو الربا". فقام إليه رجل، فقال يا رسول اللَّه، أرأيت الرجل يبيع الفرس بالأفراس، والنجيبة بالإبل؟ قال:"لا بأس إذا كان يدا بيد".
رواه الإمام أحمد (5885) عن حسين بن محمد، ثنا خلف يعنى بن خليفة، عن أبي جناب، عن أبيه، عن ابن عمر فذكره.
وأبو جناب اسمه يحيى بن أبي حية الكلبي، وأبوه أبو حية الكلبي، وكلاهما مجهولان. وله أسانيد أخرى أضعف من هذا.
ورواه مالك في الموطأ (2/ 634) من طرق عن عمر بن الخطاب موقوفا عليه.
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে একটি সৈন্যদল প্রস্তুত করার নির্দেশ দিয়েছিলেন। কিন্তু উট ফুরিয়ে যাওয়ায় তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে সাদাকার (যাকাতের) ক্বিলাস (তরুণ উট) গ্রহণ করার আদেশ করলেন। তখন তিনি সাদাকার উটের বিনিময়ে একটি উটের স্থলে দুটি উট গ্রহণ করতেন।
5758 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: جاء عبد، فبايع النبي صلى الله عليه وسلم على الهجرة، ولم يشعر أنه عبد، فجاء سيده يريده، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"بعنيه". فاشتراه بعبدين أسودين، ثم لم يبايع أحدا بعد حتى يسأله"أعبد هو؟".
صحيح: رواه مسلم في المساقاة (1602) من طرق عن ليث، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ক্রীতদাস এসে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে হিজরতের উপর বাই'আত গ্রহণ করলো, অথচ তিনি জানতে পারেননি যে সে একজন ক্রীতদাস। অতঃপর তার মনিব তাকে খুঁজতে এলো। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে (মনিবকে) বললেন: "তাকে আমার কাছে বিক্রি করে দাও।" তিনি তাকে দুটি কালো ক্রীতদাসের বিনিময়ে কিনে নিলেন। এরপর তিনি কাউকে বাই'আত দেননি যতক্ষণ না জিজ্ঞেস করেছেন: "সে কি ক্রীতদাস?"
5759 - عن أنس قال: وقعت في سهم دحية جارية جميلة، فاشتراها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بسبعة أرؤس، ثم دفعها إلى أم سليم تصنعها، وتهيئها. قال: وأحسبه قال: وتعتد في بيتها، وهي صفية بنت حيي.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1365: 87) عن أبي بكر بن أبي شيبة قال: حدثنا عفان، حدثنا حماد بن سلمة، حدثنا ثابت، عن أنس فذكره.
ورواه الإمام أحمد (13575) عن عفان بأطول من هذا.
ورواه أبو داود (2997)، وابن ماجه (2272)، والبيهقي (6/ 306) كلهم من طرق عن حماد ابن سلمة مختصرا في شراء صفية بسبعة أرؤس.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দিহিয়্যার অংশে (গনিমতের ভাগ হিসেবে) একজন সুন্দরী দাসী এসেছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাতটি মাথা (পশু বা ক্রীতদাস) দিয়ে তাকে ক্রয় করলেন। এরপর তিনি তাকে উম্মে সুলাইমের কাছে অর্পণ করলেন, যেন তিনি তাকে সজ্জিত ও প্রস্তুত করেন। বর্ণনাকারী বলেন, আমি মনে করি তিনি (আনাস) বলেছেন: আর সে উম্মে সুলাইমের ঘরেই ইদ্দত পালন করল। তিনি ছিলেন সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াই।
5760 - عن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الشاة باللحم.
صحيح: رواه الحاكم (2/ 35)، والبيهقي (5/ 296) كلاهما من حديث إبراهيم بن طهمان، عن الحجاج بن الحجاج الباهلي، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكره.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، رواته عن آخرهم حفاظ ثقات، ولم يخرجاه، وقد
احتج البخاري بالحسن عن سمرة". انتهى.
قلت: اختلف في سماع الحسن من سمرة، والصحيح أنه سمع منه مطلقا.
ولذا قال البيهقي:"هذا إسناد صحيح، ومن أثبت سماع الحسن البصري من سمرة بن جندب عده موصولا، ومن لم يثبته فهو مرسل جيد، يضم إلى مرسل سعيد بن المسيب، والقاسم بن أبي بزة، وقول أبي بكر الصديق". اهـ.
ومرسل سعيد بن المسيب هو ما رواه مالك (2/ 655) عن زيد بن أسلم، عن سعيد بن المسيب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الحيوان باللحم.
وكذلك رواه أيضًا عن أبي الزناد، عن سعيد بن المسيب من قوله.
ومن طريق مالك رواه البيهقي (5/ 297).
قال ابن عبد البر:"لا أعلم هذا الحديث يتصل من وجه ثابت من الوجوه عن النبي صلى الله عليه وسلم".
وكذا قال أيضًا البيهقي:"هذا هو الصحيح. ورواه يزيد بن مروان الخلال، عن مالك، عن الزهري، عن سهل بن سعد، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وغلط فيه".
وحديث يزيد بن مروان رواه ابن عبد البر، والدارقطني، وأبو نعيم، وغيرهم. قال ابن عبد البر: وهذا إسناد موضوع، لا يصح عن مالك، ولا أصل له من حديثه".
ويزيد بن مروان هذا كذاب، كما قال ابن معين.
وأما مرسل القاسم بن أبي بزة فرواه البيهقي (5/ 296 - 297) من طريق الشافعي، أنا مسلم عن ابن جريج، عن القاسم بن أبي بزة قال: قدمت المدينة، فوجدت جزورا قد جزرت، فجزئت أربعة أجزاء، كل جزء منها بعناق. فأردت أن أبتاع منها جزءا، فقال لي رجل من أهل المدينة: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى أن يباع حي بميت. قال: فسألت عن ذلك الرجل، فأخبرت عنه خيرا.
ومسلم هو ابن خالد الزنجي، مختلف فيه، تكلم فيه ابن المديني، ووثّقه ابن معين والدارقطني، وقال ابن عدي: حسن الحديث لا بأس به. وذكره ابن حبان في الثقات.
والقاسم بن أبي بزة لم يلق أحدا من الصحابة، فالراوي المبهم أحد التابعين، فيكون الحديث مرسلا، كما قال البيهقي.
أخذ الجمهور بهذه الأحاديث -وتعضدها أقوال الصحابة-، فمنعوا بيع اللحم بالحيوان؛ لأن المقصود بالحيوان هنا الذي يشترى ويباع لأجل اللحم.
وتكون علة النهي التفاضل في جنس واحد، وهو ربا الفضل.
وأجاز أبو حنيفة بيع اللحم بالحيوان؛ لأن علة الربا عنده الكيل والوزن، والحيوان ليس بمكيل، ولا موزون، فجاز بيع اللحم بالحيوان.
قلت: لعله لم يبلغه هذا الحديث وأقوال الصحابة، وإلا فأبو حنيفة رحمه الله صرح مرارا
وتكرارا:"إذا صح الحديث فاضربوا بقولي الحائط".
فقه الحديث:
يستفاد من الأبواب السابقة ما يلي:
- النهي عن بيع الحيوان بالحيوان أو بالحيوانين نسيئة. وبه قال أحمد والكوفيون وسفيان الثوري وغيرهم محتجين بحديث سمرة. وجعل الطحاوي حديث سمرة ناسخا لحديث عبد اللَّه بن عمرو.
وذهب الشافعي وإسحاق إلى جوازه، سواء كان الجنس واحدا أو مختلفا، مأكول اللحم أو غير مأكول اللحم، وسواء باع واحدا بواحد أو اثنين فأكثر، واحتجوا بحديث عبد اللَّه بن عمرو، وحملوا حديث سمرة على إذا كان البيع نسيئة من الطرفين، وهو ما يقال بيع الكالئ بالكالئ.
وقال مالك:"إن كان الجنس مختلفا يجوز وإن كان متفاضلا".
- وقد استدل جماعة من أهل العلم بحديث عبد اللَّه بن عمرو على جواز السلم في الحيوان، سواء كان من جنس واحد أو من أجناس مختلفة موصوفة.
সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মাংসের বিনিময়ে ছাগল (জীবন্ত প্রাণী) বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন।
5761 - عن أنس بن مالك قال: قال الناس: يا رسول اللَّه، غلا السعر؛ فسعر لنا. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه هو المسعر القابض الباسط الرزاق، وإني لأرجو أن ألقى اللَّه، وليس أحد منكم يطالبني بمظلمة في دم ولا مال".
صحيح: أخرجه أبو داود (3451)، والترمذي (1314)، وابن ماجه (2200)، وأحمد (1259، 14057) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن قتادة وثابت وحميد، عن أنس بن مالك فذكره.
وقال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: إسناده صحيح إلا أن البعض لم يذكروا الرواة الثلاثة عن أنس.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, লোকেরা বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), মূল্য বৃদ্ধি পেয়েছে; তাই আমাদের জন্য (পণ্যের) মূল্য নির্ধারণ করে দিন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহই হলেন মূল্য নির্ধারণকারী (আল-মুস'য়ির), সঙ্কোচনকারী (আল-ক্বাবিদ), প্রসারণকারী (আল-বাসিত), রিযিকদাতা (আর-রাযযাক)। আর আমি অবশ্যই আশা করি যে, আমি আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় মিলিত হব যে, তোমাদের মধ্যে কেউই যেন রক্তপাত বা সম্পদের (সম্পর্কিত) কোনো প্রকার অন্যায়-অবিচারের দাবি নিয়ে আমার কাছে দাবিদার না হয়।"
5762 - عن أبي هريرة أن رجلا جاء، فقال: يا رسول اللَّه، سعر. فقال:"بل أدعو". ثم جاءه رجل، فقال: يا رسول اللَّه، سعر. فقال:"بل اللَّه يخفض ويرفع، وإني لأرجو أن ألقى اللَّه وليس لأحد عندي مظلمة".
صحيح: رواه أبو داود (3450)، وأحمد (8448، 8852)، والبيهقي (6/ 29) كلهم من طرق عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره. واللفظ لأبي داود، ولفظهم قريب منه. وإسناده صحيح
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি এসে বললো: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), (পণ্যের) মূল্য নির্ধারণ করে দিন। তিনি বললেন: "বরং আমি দু'আ করি।" অতঃপর আরেক ব্যক্তি এসে বললো: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), মূল্য নির্ধারণ করে দিন। তিনি বললেন: "বরং আল্লাহই মূল্য কমিয়ে দেন এবং বাড়িয়ে দেন, আর আমি আশা করি যে, আমি আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করব যে, কারো প্রতি আমার দ্বারা কোনো যুলুম বা কারো কোনো অভিযোগ থাকবে না।"
5763 - عن أبي سعيد قال: غلا السعر على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقالوا: لو قوَّمت يا رسول اللَّه، قال:"إني لأرجو أن أفارقكم، ولا يطلبني أحد منكم بمظلمة ظلمته".
صحيح: رواه ابن ماجه (2201)، والإمام أحمد (11809)، والطبراني في الأوسط (5952) كلهم من طرق عن أبي نضرة، عن أبي سعيد فذكره.
وأبو نضرة اسمه المنذر بن مالك بن قُطعة العبدي، ثقة من رجال مسلم.
قال الهيثمي في المجمع (4/ 99) بعد أن عزاه لأحمد والطبراني:"رجال أحمد رجال الصحيح".
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের যুগে দ্রব্যমূল্য বৃদ্ধি পেল। তখন (সাহাবীগণ) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি মূল্য নির্ধারণ করে দিতেন (দাম নিয়ন্ত্রণ করতেন)! তিনি বললেন: "আমি আশা করি যে, আমি তোমাদের থেকে এমন অবস্থায় বিদায় নেব যে, তোমাদের কেউ আমার করা কোনো অবিচারের (জুলুমের) কারণে তার প্রতিবিধান আমার কাছে চাইবে না।"
5764 - عن أبي سعيد الخدري أن يهوديا قدم زمن النبي صلى الله عليه وسلم بثلاثين حمل شعير وتمر، فسعَّر مدًّا بمد النبي صلى الله عليه وسلم، وليس في الناس يومئذ طعام غيره، وكان قد أصاب الناس قبل ذلك جوع، لا يجدون فيه طعاما، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم الناسُ يشكون إليه غلاء السعر، فصعد المنبر، فحمد اللَّه، وأثنى عليه، ثم قال:"لا ألقين اللَّه من قبل أن أعطي أحدا من مال أحد من غير طيب نفس، إنما البيع عن تراض، ولكن في بيوعكم خصالا أذكرها لكم. لا تضاغنوا، ولا تناجشوا، ولا تحاسدوا، ولا يسوم الرجل على سوم أخيه، ولا يبيعن حاضر لباد، والبيع عن تراض، وكونوا عباد اللَّه إخوانا".
حسن: رواه ابن حبان (4967)، وأبو يعلى (1354)، والبيهقي (6/ 17)، وابن ماجه (2185) كلهم من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن داود بن صالح التمار، عن أبيه، عن أبي سعيد الخدري فذكره. واللفظ لابن حبان. واختصره أبو يعلى والبيهقي، واكتفى ابن ماجه بقوله:"إنما البيع عن تراض". وإسناده حسن من أجل الدراوردي، وشيخه داود بن صالح.
وفي الباب عن ابن عباس، وعلي، وأبي جحيفة، وأبي بصيلة. ولا يصح منها شيء. (انظر مجمع الزوائد 4/ 99 - 100). والصحيح منها ما ذكرته.
فقه الحديث:
الأصل في البيع والشراء التراضي، كما قال اللَّه تعالى {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا
أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ إلا أَنْ تَكُونَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِنْكُمْ} [سورة النساء: 29].
ولذا ذهب جمهور أهل العلم إلى عدم التسعير مستدلين بهذه الأحاديث.
وقد ثبت عن عمر بن الخطاب أنه راجع عن تدخله في أمور السوق، رواه مالك في الموطأ في البيوع (60) عن يونس بن يوسف، عن سعيد بن المسيب أن عمر بن الخطاب مر بحاطب بن أبي بلتعة، وهو يبيع زبيبا له بالسوق، فقال له عمر بن الخطاب: إما أن تزيد في السعر، وإما أن ترفع من سوقنا.
وتفصيل ذلك كما رواه الشافعي عن الدراوردي، عن داود بن صالح التمار، عن القاسم بن محمد، عن عمر بن الخطاب أنه مر بحاطب بن أبي بلتعة، وبين يديه غرارتان فيهما زبيب، فذكر نحو حديث مالك: إما أن ترفع في السعر، وإما أن تدخل زبيبك بيتك فتبيعه كيف شئت. فلما رجع عمر حاسب نفسه، ثم أتى حاطبا في داره، فقال له عمر: إن الذي قلت ليس بعزيمة مني، ولا قضاء، وإنما هو شيء أردت به الخير لأهل البلد، فحيث شئت وكيف شئت فبع". (الاستذكار 20/ 75، والسنن الكبرى للبيهقي (6/ 29).
ولكن يجوز للحاكم إذا رأى أن البائعين أغلوا أسعارهم، وأفسدوا على المسلمين معيشتهم أن بسعر لهم الطعام الذي هو قوت الحياة؛ لأن فيه إقامة السوق وإصلاحها؛ لأن من حق الوالي أن ينظر للمسلمين فيما يصلحهم، ويعمهم نفعه.
وقد قال به بعض أهل العلم، منهم الليث بن سعد، وربيعة، ويحيى بن سعيد، وغيرهم.
وبه قال بعض المالكية والحنفية بناء على القاعدة الفقهية:"إن الضرر يزال". ولا شك إن تعدى البائع على السلعة الأساسية يعتبر من أكبر الضرر على عامة الناس.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে একজন ইয়াহুদী ত্রিশ বোঝা যব ও খেজুর নিয়ে আগমন করলো। সে (সেই ইয়াহুদী) এক মুদ্দ (পরিমাণ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুদ্দ অনুযায়ী মূল্য নির্ধারণ করলো। সেই দিন মানুষের কাছে তা ছাড়া অন্য কোনো খাদ্য ছিল না। এর আগে মানুষ দুর্ভিক্ষের শিকার হয়েছিল, যেখানে তারা কোনো খাদ্য খুঁজে পাচ্ছিল না। অতঃপর লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে জিনিসপত্রের মূল্যবৃদ্ধির অভিযোগ করলো। তখন তিনি মিম্বরে আরোহণ করলেন, আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন, অতঃপর বললেন: "আমি যেন আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ না করি যে, আমি কারও সম্পদ তার আন্তরিক সন্তুষ্টি ব্যতীত অন্য কাউকে দিয়ে দিয়েছি। নিশ্চয়ই বেচা-কেনা পারস্পরিক সম্মতির ভিত্তিতে হওয়া চাই। তবে তোমাদের ব্যবসায় কিছু অভ্যাস আছে যা আমি তোমাদের জন্য উল্লেখ করব। তোমরা একে অপরের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করবে না, নাজাশ (প্রতারণামূলক নিলাম) করবে না, আর একে অপরের প্রতি হিংসা করবে না। কোনো ব্যক্তি যেন তার ভাইয়ের দর কষাকষির (মূল্যের প্রস্তাবের) উপর দর কষাকষি না করে এবং কোনো শহরবাসী যেন কোনো গ্রামীণ ব্যক্তির পক্ষে বিক্রয় না করে। আর বেচা-কেনা পারস্পরিক সম্মতির ভিত্তিতে হওয়া চাই। আর তোমরা আল্লাহর বান্দা হিসেবে ভাই ভাই হয়ে যাও।"
5765 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن بيعتين في بيعة.
حسن: رواه الترمذي (1231)، والنسائي (4632)، وأحمد (9584)، وصحّحه ابن حبان (493)، والبيهقي (5/ 343)، وابن الجارود (600) كلهم من طرق عن محمد بن عمرو قال: حدثنا أبو سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو -وهو ابن علقمة الليثي-؛ فإنه حسن الحديث.
هكذا رواه عبد الوهاب بن عطاء، وإسماعيل بن جعفر، وعبد العزيز بن محمد الدراوردي، ومعاذ بن معاذ، وعبدة بن سليمان، ويحيى بن سعيد القطان، ويزيد بن هارون، كلهم عن محمد بن عمرو به مثله.
وخالفهم يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، فرواه عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي
هريرة مرفوعا بلفظ:"من باع بيعتين في بيعة فله أوكسهما أو الربا".
رواه أبو داود (3461)، وابن حبان (4974)، والحاكم (2/ 44)، والبيهقي (5/ 343)، كلهم من طريق يحيى بن زكريا فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
معنى الحديث:
"يشبه أن يكون ذلك في حكومة في شيء بعينه، كأنه أسلفه دينارا في قفيز إلى شهر، فلما حل الأجل، وطالبه بالبر قال له: بعني القفيز الذي لك علي بقفيزين إلى شهر، فهذا بيع ثان، قد دخل على البيع الأول، فصار بيعتين في بيعة، فيردان إلى أوكسهما، وهو الأصل، فإن تبايعا المبيع الثاني قبل أن يتناقضا الأول كانا مربيين".
وأما تفسير قوله:"بيعتين في بيعة" فقيل: تفسيره هو أن يقول البائع: بعتك بألف نقدا، وبألفين نسيئة، فاقبل أيهما شئت.
هذا تفسير الشافعي، وعلة التحريم فيه أنه يزيد الثمن بزيادة الأجل، وهو يشبه الربا. قاله الخطابي. وقيد بعضهم بأن يقبل على الإبهام.
أما لو قبل أحدهما جاز. حكي عن طاوس أنه قال: لا بأس أن يقول: هذا الثوب نقدا بعشرة، وإلى شهر بخمسة عشر، فيذهب به إلى أحدهما. أي اختار أحد البيعين قبل أن يفترقا فجاز.
ومن هذا النوع بيع التقسيط الذي لم يكن معروفا من قبل، فأجازه جمهور أهل العلم، وأفتت به اللجنة الدائمة للإفتاء بالسعودية بشروط، منها: تحديد الثمن المؤجل، وعدد الأقساط، ومقدار كل قسط، وغيرها؛ لئلا يقع فيه النزاع.
والتفسير الثاني: هو أن يقول البائع: أبيعك على أن تبيعني، أي إذا وجب البيع لك عندي وجب لي عندك، فهو بيع فاسد.
والتفسير الثالث: أن يقول البائع: بعتك هذا الثوب بمائة ريال على أن تعطيني ثلاثين دولارا.
ولكن لو قال: تُعطيني ما يساوي مائة ريال من الدولار في سعر اليوم لجاز، كما كان ابن عمر بيع ويشتري بالدينار، ويدفع إليه الدراهم بسعر اليوم، فهو ليس من بيعتين في بيعة.
والتفسير الرابع: قالوا: من بيعتين في بيعة، كمن باع البيت والسيارة بثمن واحد، ولكن الصحيح أنه جائز، إنما هي صفقة واحدة جمعت شيئين بثمن معلوم، كما قال الخطابي.
ولكن إن وقع النزاع بين البائع والمشتري فيفسخ البيع كله لعدم تحديد ثمن كل مبيع. وباللَّه التوفيق.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'এক বিক্রয়ের মধ্যে দুই বিক্রয়' করতে নিষেধ করেছেন।
এটি হাসান। এটি বর্ণনা করেছেন তিরমিযী (১২৩১), নাসাঈ (৪৬৩২), আহমাদ (৯৫৪৮), এবং একে সহীহ বলেছেন ইবনু হিব্বান (৪৯৩), বায়হাকী (৫/৩৪৩), ও ইবনুল জারুদ (৬০০)। তারা সবাই মুহাম্মাদ ইবনু আমর থেকে বিভিন্ন সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যিনি বলেছেন: আবূ সালামা আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা উল্লেখ করেছেন।
এর সনদ হাসান, কারণ এতে মুহাম্মাদ ইবনু আমর (যিনি ইবনু আলকামাহ আল-লাইসী) আছেন, আর তিনি হাসানুস হাদীস। অনুরূপভাবে এটি বর্ণনা করেছেন আব্দুল ওয়াহ্হাব ইবনু আতা, ইসমাঈল ইবনু জা‘ফর, আব্দুল আযীয ইবনু মুহাম্মাদ আদ-দারাওয়ার্দী, মু‘আয ইবনু মু‘আয, আবদাহ ইবনু সুলাইমান, ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ আল-কাত্তান, ও ইয়াযীদ ইবনু হারুন— এঁরা সবাই মুহাম্মাদ ইবনু আমর থেকে একই রকম বর্ণনা করেছেন।
কিন্তু ইয়াহইয়া ইবনু যাকারিইয়া ইবনু আবী যাইদাহ তাঁদের বিরোধিতা করেছেন এবং মুহাম্মাদ ইবনু আমর হতে, তিনি আবূ সালামা হতে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন: "যে ব্যক্তি এক বিক্রয়ের মধ্যে দুই বিক্রয় করে, তার জন্য দুটির মধ্যে সবচেয়ে কম মূল্যটি বৈধ হবে, অন্যথায় তা সুদ (রিবা) হবে।" এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাঊদ (৩৪৬১), ইবনু হিব্বান (৪৯৭৪), হাকিম (২/৪৪), ও বায়হাকী (৫/৩৪৩)। এঁরা সবাই ইয়াহইয়া ইবনু যাকারিইয়ার সূত্রে তা উল্লেখ করেছেন। হাকিম বলেন: এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।
হাদীসের অর্থ:
"এর অর্থ এমন হতে পারে যে, কোনো সুনির্দিষ্ট বিষয়ে সরকারি রায় জারি হয়েছে। যেমন, কেউ একজনের কাছে এক মাসের জন্য এক ক্বাফীয (শস্য) এর বিনিময়ে এক দীনার পেশগী দিলো। যখন সময় পূর্ণ হলো এবং সে তার শস্যের দাবি করল, তখন অপরজন বলল: আমার কাছে তোমার যে এক ক্বাফীয পাওনা আছে, তা আমার কাছেই দুই ক্বাফীযের বিনিময়ে এক মাসের জন্য বিক্রি করো। এটি হলো দ্বিতীয় বিক্রয়, যা প্রথম বিক্রয়ের উপর ঢুকে পড়েছে। ফলে এটি 'এক বিক্রয়ের মধ্যে দুই বিক্রয়' হয়ে গেল। তখন উভয়কে সবচেয়ে কম মূল্যের দিকে ফিরে যেতে হবে, যা ছিল মূল বিক্রয়। যদি তারা প্রথম বিক্রয় বাতিল না করেই দ্বিতীয় বিক্রয় সম্পাদন করে, তবে তারা উভয়েই সুদের কারবারি হবে।"
আর "এক বিক্রয়ের মধ্যে দুই বিক্রয়" এর ব্যাখ্যার বিষয়ে বলা হয়েছে: এর ব্যাখ্যা হলো, বিক্রেতা বলবে: আমি তোমার কাছে এটি নগদে এক হাজার [দিরহামে/রিয়ালে] এবং বাকিতে দুই হাজার [দিরহামে/রিয়ালে] বিক্রি করলাম। তুমি এর মধ্যে যেটি চাও গ্রহণ করো। এটি শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ব্যাখ্যা। এখানে নিষিদ্ধ হওয়ার কারণ হলো, মেয়াদ বৃদ্ধির সাথে মূল্য বৃদ্ধি করা হচ্ছে, যা সুদের (রিবা) সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ। এটি খাত্তাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন। কেউ কেউ শর্ত করেছেন যে, যদি সে অস্পষ্টভাবে গ্রহণ করে (তবে তা নিষিদ্ধ)। কিন্তু যদি দুটির মধ্যে যেকোনো একটিকে গ্রহণ করে নেয়, তবে তা বৈধ। তাউস (রাহিমাহুল্লাহ) সম্পর্কে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: কোনো সমস্যা নেই যদি সে বলে: এই কাপড়টি নগদে দশ [দিরহাম/রিয়াল] এবং এক মাসের জন্য পনেরো [দিরহাম/রিয়াল]। অতঃপর সে দুটি দামের যেকোনো একটি গ্রহণ করে নেয়। অর্থাৎ পৃথক হওয়ার পূর্বেই সে যদি দুটি বিক্রয়ের যেকোনো একটিকে বেছে নেয়, তবে তা বৈধ।
কিস্তিভিত্তিক বিক্রয় (بيع التقسيط), যা আগে পরিচিত ছিল না, তা এই প্রকারের অন্তর্ভুক্ত। জমহুর আলেমগণ এটিকে শর্ত সাপেক্ষে বৈধ বলেছেন। সৌদি আরবের স্থায়ী ফতোয়া কমিটি (আল-লাজনাহ আদ্-দায়িমাহ) এর শর্ত সাপেক্ষে ফতোয়া দিয়েছে। শর্তগুলোর মধ্যে রয়েছে: বিলম্বিত মূল্য নির্ধারণ, কিস্তির সংখ্যা ও প্রতি কিস্তির পরিমাণ নির্দিষ্ট করা ইত্যাদি, যাতে এতে কোনো বিবাদ না ঘটে।
দ্বিতীয় ব্যাখ্যা হলো: বিক্রেতা বলবে: আমি তোমার কাছে এই শর্তে বিক্রি করছি যে, তুমিও আমার কাছে বিক্রি করবে। অর্থাৎ যখন আমার কাছে তোমার বিক্রয় বাধ্যতামূলক হবে, তখন তোমার কাছেও আমার বিক্রয় বাধ্যতামূলক হবে। এটি একটি ফাসিদ (ত্রুটিপূর্ণ) বিক্রয়।
তৃতীয় ব্যাখ্যা হলো: বিক্রেতা বলবে: আমি তোমার কাছে এই কাপড়টি একশ রিয়ালের বিনিময়ে বিক্রি করলাম এই শর্তে যে, তুমি আমাকে ত্রিশ ডলার দেবে।
কিন্তু যদি সে বলে: তুমি আমাকে আজকের বিনিময় হার অনুসারে একশ রিয়ালের সমপরিমাণ ডলার দেবে, তবে তা বৈধ হবে। যেমন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দীনারের মাধ্যমে ক্রয়-বিক্রয় করতেন এবং তাঁকে দিনের বিনিময় হার অনুযায়ী দিরহাম পরিশোধ করা হতো। এটি 'এক বিক্রয়ের মধ্যে দুই বিক্রয়'-এর অন্তর্ভুক্ত নয়।
চতুর্থ ব্যাখ্যা: তারা বলেন, 'এক বিক্রয়ের মধ্যে দুই বিক্রয়'-এর উদাহরণ হলো, যে ব্যক্তি ঘর ও গাড়ি একটি মাত্র মূল্যে বিক্রি করে। কিন্তু সহীহ মত হলো, এটি জায়েয। এটি কেবল একটি একক চুক্তি যা দুটি বস্তুকে একটি জানা মূল্যে একত্রিত করেছে, যেমনটি খাত্তাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন। তবে যদি ক্রেতা ও বিক্রেতার মধ্যে বিবাদ দেখা দেয়, তখন প্রতিটি বিক্রিত বস্তুর মূল্য নির্দিষ্ট না থাকায় সম্পূর্ণ বিক্রয়টিই বাতিল বলে গণ্য হবে। আল্লাহর নিকটই সাহায্য কামনা করি।
5766 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تبع بيعتين في بيعة".
صحيح: رواه الترمذي (1309)، وابن ماجه (2404)، وأحمد (5395)، وابن الجارود (599)،
والبيهقي (6/ 77) كلهم من طرق عن هشيم بن بشير، حدثنا يونس بن عبيد، عن نافع، عن ابن عمر فذكره في حديث أوله:"مطل الغني ظلم، وإذا أحلت على ملأ فاتبعه".
وابن ماجه لم يذكر إلا أول الحديث.
تنبيه: اختلفت نسخ الترمذي، فوجد هذا الحديث في بعضها، ولم يوجد في البعض الآخر، فتأكد منه. واختلف أهل العلم في سماع يونس بن عبيد عن نافع:
فذهب أحمد، والبخاري، وأبو حاتم، وأبو داود إلى أنه لم يسمع منه شيئًا، وإنما سمع من ابن نافع، عن نافع.
وتوقف أبو زرعة قائلا:"أتوهم أن في حديثه شيئًا يدل على أنه سمع منه". المراسيل (191).
وجزم الطحاوي في مشكله (7/ 178) أنه سمع منه؛ لما روى عن شيخه أبي أمية قال: حدثنا معلى بن منصور قال: حدثنا هشيم قال: أخبرنا يونس بن عبيد قال: أخبرنا نافع، عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أحلت على ملأ فاتبعه". وهو جزء من الحديث، وفي إسناده تصريح بالأخبار، ثم قال:"غير أنا وجدنا يحيى بن معين قد تكلم في حديث ابن عمر هذا، وذكر أن يونس بن عبيد لم يسمع من نافع، كما حدثنا ابن أبي داود قال: قال لي يحيى بن معين في حديث يونس بن عبيد عن نافع عن ابن عمر:"مطل الغني ظلم" قال يحيى: قد سمعته عن هشيم، ولم يسمعه يونس من نافع.
قال لنا ابن أبي داود: قلت ليحيى: لم يسمع يونس من نافع شيئًا؟ قال: بلى، ولكن هذا الحديث خاصة لم يسمعه يونس من نافع".
فأخذ منه الطحاوي أن الذي لم يسمعه يونس من نافع هو قوله:"مطل الغني ظلم". وما سواه سمعه منه.
قلت: ومنه الجزء الآخر من الحديث، وهو"لا تبع بيعتين في بيعة". واللَّه تعالى أعلم.
وقد روي عن ابن مسعود، ولكنه موقوف عليه:"لا تصلح سفقتان في سفقة". رواه أحمد (3725)، وابن حبان (5025) كلاهما من حديث شعبة، عن سماك بن حرب، عن عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن مسعود، عن ابيه.
وكذلك رواه ابن خزيمة (176)، وابن حبان (1053)، والبزار -كشف الأستار (1278) -، والطبراني في الكبير (9/ 321) كلهم من حديث سفيان الثوري، عن سماك بن حرب، عن عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن مسعود، عن أبيه.
وله أسانيد أخرى عن سماك بن حرب موقوفا على ابن مسعود.
وخالفهم شريك النخعي، فرواه عن سماك بن حرب، عن عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن مسعود عنه مرفوعا: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن صفقتين في صفقة واحدة. رواه أحمد (3783)، والبزار -
كشف الأستار (1277) -، كلاهما عن أسود بن عامر قال: حدثنا شريك فذكره.
وشريك هو ابن عبد اللَّه، سيء الحفظ، وهذا مما أخطأ فيه شريك، والصحيح أنه موقوف على ابن مسعود.
وقد فسر سماك معنى قوله:"سفقتين في سفقة" بالسين، ويقال:"صفقتين في صفقة" بالصاد،" هو: الرجل يبيع البيع، فيقول: هو بنساء بكذا وكذا، وهو بنقد بكذا وكذا". أي ثم يتفرقان بلا جزم بأي البيعين تبايعا.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক বিক্রিতে দুই বিক্রিও করো না।"
5767 - عن ابن عمر قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا تبايعتم بالعينة، وأخذتم أذناب البقر، ورضيتم بالزرع، وتركتم الجهاد سلّط اللَّه عليكم ذُلًّا لا ينزعه حتى ترجعوا إلى دينكم".
حسن: رواه أبو داود (3462)، والبيهقي في الكبرى (5/ 316) كلاهما من حديث حيوة بن شريح، عن إسحاق أبي عبد الرحمن، أن عطاء الخراساني حدثه أن نافعا حدثه به.
وإسحاق أبو عبد الرحمن هو إسحاق بن أسيد أبو عبد الرحمن الأنصاري، قال أبو حاتم: شيخ ليس بالمشهور، ولا يشتغل به. وقال ابن عدي: مجهول. وأما ابن حجر فقال في التقريب:"فيه ضعف".
وللحديث إسناد آخر، رواه أحمد (4825)، والطبراني في الكبير (13585)، وأبو يعلى (4659)، وأبو نعيم في الحلية (1/ 313 - 314) كلهم من طريق الأعمش، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عمر قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا ضَن الناس بالدينار والدرهم، وتبايعوا بالعينة، واتبعوا أذناب البقر، وتركوا الجهاد في سبيل اللَّه أنزل اللَّه بلاء، فلم يرفعه عنهم حتى يراجعوا دينهم".
عطاء بن أبي رباح لم يسمع من ابن عمر، وإنما رآه فقط، كما قال أحمد، وابن المديني، ففيه انقطاع.
وللحديث إسناد ثالث: وهو ما رواه الإمام أحمد (5007) عن يحيى بن عبد الملك بن أبي غَنِيَّة، أخبرنا أبو جناب، عن شهر بن حوشب، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لئن تركتم الجهاد، وأخذتم أذناب البقر، وتبايعتم بالعينة، ليُلِزمنَّكم اللَّه مذلَّة في رقابكم، لا تنفك عنكم حتى تتوبوا إلى اللَّه، وترجعوا على ما كنتم عليه".
وفيه أبو جناب، وهو يحيى بن أبي حَيَّة الكلبي، قال أحمد وابن معين وغيرهما:"ليس به بأس، وكان يدلّس".
قلت: وبمجموع هذه الطرق يصير الحديث حسنا على رسم الترمذي إذْ ليس فيهم متّهمٌ.
"والعِينة" -بكسر العين- هو أن يبيع شيئًا من غيره بثمن مؤجل، ويسلم إلى المشتري، ثم يشتريه قبل قبض الثمن بثمن أقل مما باع به، وينقده الثمن.
وأما إذا اشترك في البيع ثلاثة أطراف فيخرج من بيع العينة، وصورته: أن يشتري رجل من البائع سلعة مؤجلا، ويقبض على السلعة، ثم يبيعها لرجل ثالث غير البائع بأقل مما اشترى بنقد. فهذا جائز باتفاق أهل العلم لتوفر جميع شروط البيع فيه.
شعيب. رواه عاصم بن عبد العزيز الأشجعي، عن الحارث بن عبد الرحمن.
ثم قال البيهقي:"وعاصم بن عبد العزيز الأشجعي فيه نظر، وحبيب بن أبي حبيب ضعيف، وعبد اللَّه بن عامر وابن لهيعة لا يحتج بهما، والأصل في هذا الحديث مرسل مالك". انتهى.
ولضعف هذا الحديث لم يأخذ به الإمام أحمد، بل ذهب إلى جواز العربون مستدلا بقصة عمر ابن الخطاب.
وأما جمهور الفقهاء فذهبوا إلى النهي عن بيع العربون مستدلين بهذا الحديث، وقالوا: بيع العربون أكل أموال الناس بالباطل.
ذكره الخطابي.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন তোমরা 'ঈনাহ' পদ্ধতিতে ক্রয়-বিক্রয় করবে, গরুর লেজ আঁকড়ে ধরবে (অর্থাৎ কৃষিকাজে অত্যধিক মনোযোগী হবে), চাষাবাদে সন্তুষ্ট থাকবে এবং জিহাদ ছেড়ে দেবে, তখন আল্লাহ তোমাদের ওপর এমন লাঞ্ছনা চাপিয়ে দেবেন, যা তিনি ততক্ষণ পর্যন্ত দূর করবেন না, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের দীনের দিকে ফিরে আসো।"
হাসান। হাদীসটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাউদ (৩৪৬২) এবং বায়হাকী তাঁর আস-সুনানুল কুবরা গ্রন্থে (৫/৩১৬)। উভয়ই হায়ওয়াহ ইবনু শুরাইহ-এর সূত্রে, তিনি ইসহাক আবূ আব্দুর রহমান থেকে, তিনি আতা আল-খুরাসানী থেকে, তিনি নাফি' থেকে বর্ণনা করেছেন।
আর ইসহাক আবূ আব্দুর রহমান হলেন ইসহাক ইবনু উসাইদ আবূ আব্দুর রহমান আল-আনসারী। আবূ হাতিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: তিনি শায়খ, তবে তিনি মশহুর নন এবং তার দ্বারা কাজ করা যায় না। ইবনু আদী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: তিনি মাজহুল (অজ্ঞাত)। তবে ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ) আত-তাকরীব গ্রন্থে বলেন: "তার মধ্যে দুর্বলতা আছে।"
এই হাদীসের অন্য একটি সনদ রয়েছে, যা বর্ণনা করেছেন আহমাদ (৪৮২৫), ত্বাবারানী আল-কাবীর গ্রন্থে (১৩৫৮৫), আবূ ইয়া'লা (৪৬৫৯) এবং আবূ নুআইম আল-হিলয়াহ গ্রন্থে (১/৩১৩-৩১৪)। তারা সকলেই আ'মাশ-এর সূত্রে, আতা ইবনু আবী রাবাহ থেকে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন লোকেরা দীনার ও দিরহামের ব্যাপারে কৃপণতা করবে, ‘ঈনাহ’ পদ্ধতিতে ক্রয়-বিক্রয় করবে, গরুর লেজ অনুসরণ করবে এবং আল্লাহর রাস্তায় জিহাদ ছেড়ে দেবে, তখন আল্লাহ তাদের ওপর বালা-মুসিবত নাযিল করবেন এবং যতক্ষণ না তারা তাদের দীনের দিকে ফিরে আসে, ততক্ষণ তিনি তা তাদের থেকে দূর করবেন না।"
আতা ইবনু আবী রাবাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে সরাসরি শোনেননি, বরং শুধু তাকে দেখেছেন। যেমন আহমাদ ও ইবনুল মাদীনী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন। সুতরাং এতে ইনকিতা' (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে।
এই হাদীসের তৃতীয় একটি সনদ রয়েছে, যা ইমাম আহমাদ (৫০৬৭) বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু আব্দুল মালিক ইবনু আবী গান্নিয়াহ থেকে, তিনি আবূ জানাব থেকে, তিনি শাহর ইবনু হাউশাব থেকে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: "যদি তোমরা অবশ্যই জিহাদ ছেড়ে দাও, আর গরুর লেজ আঁকড়ে ধরো এবং ‘ঈনাহ’ পদ্ধতিতে লেনদেন করো, তবে আল্লাহ তোমাদের ঘাড়ে এমন লাঞ্ছনা চাপিয়ে দেবেন, যা তোমাদের থেকে দূর হবে না যতক্ষণ না তোমরা আল্লাহর কাছে তাওবা করো এবং তোমরা যা ছিলে (অর্থাৎ দীনের ওপর) সেদিকে ফিরে যাও।"
এ সনদে আবূ জানাব রয়েছেন, তিনি হলেন ইয়াহইয়া ইবনু আবী হাইয়্যাহ আল-কালবী। আহমাদ, ইবনু মাঈন ও অন্যান্যরা বলেন: "তার মধ্যে কোনো অসুবিধা নেই, তবে তিনি তাদলীস করতেন।"
আমি (শুআইব) বলি: এই সকল সূত্রের সমষ্টির কারণে হাদীসটি ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সংজ্ঞা অনুসারে ‘হাসান’ (উত্তম) হয়ে যায়, যেহেতু তাদের মধ্যে কোনো অভিযুক্ত (মিথ্যাবাদী) রাবী নেই।
'আল-ঈনাহ' (আইন-এর নিচে কাসরাহ সহ) হলো: কোনো কিছু অন্য কারো কাছে নির্দিষ্ট মেয়াদে বাকি দামে বিক্রি করা এবং ক্রেতার হাতে তা হস্তান্তর করা। এরপর বিক্রেতা সেই ক্রেতার কাছ থেকে মূল্য পরিশোধের আগেই তার বিক্রয়মূল্যের চেয়ে কম দামে তা পুনরায় নগদে কিনে নেওয়া।
তবে যদি এই লেনদেনে তিনটি পক্ষ জড়িত থাকে, তবে তা 'ঈনাহ' বিক্রয় থেকে মুক্ত হয়ে যায়। এর পদ্ধতি হলো: একজন ব্যক্তি বিক্রেতার কাছ থেকে বাকি দামে পণ্য ক্রয় করবে এবং পণ্যটি কব্জা করবে, এরপর সে তা বিক্রেতা ছাড়া তৃতীয় ব্যক্তির কাছে ক্রয়ের দামের চেয়ে কম মূল্যে নগদে বিক্রি করে দেবে। এই পদ্ধতিটি উলামায়ে কেরামের ঐকমত্যে বৈধ, কারণ এতে বিক্রয়ের সকল শর্ত পাওয়া যায়।
শুআইব (রাহিমাহুল্লাহ)। হাদীসটি বর্ণনা করেছেন আসিম ইবনু আব্দুল আযীয আল-আশজাঈ, তিনি হারিস ইবনু আব্দুর রহমান থেকে।
এরপর বায়হাকী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "আসিম ইবনু আব্দুল আযীয আল-আশজাঈ-এর ব্যাপারে পর্যালোচনা রয়েছে, আর হাবীব ইবনু আবী হাবীব যঈফ (দুর্বল), এবং আব্দুল্লাহ ইবনু আমির ও ইবনু লাহী'আ দ্বারা প্রমাণ পেশ করা যায় না। এই হাদীসের মূল হলো মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) কর্তৃক মুরসাল সূত্রে বর্ণিত হাদীস।" সমাপ্ত।
এই হাদীসটির দুর্বলতার কারণে ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) তা গ্রহণ করেননি, বরং উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনা দ্বারা প্রমাণ দিয়ে তিনি ‘আরবুন’ (বায়'উল আরবুন বা বায়না) জায়েয হওয়ার মত দিয়েছেন।
অন্যদিকে জুমহুর ফুকাহাগণ এই হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করে 'আরবুন' বিক্রয়কে নিষেধ করেছেন এবং তারা বলেছেন: বায়'উল আরবুন হলো অন্যায়ভাবে লোকের সম্পদ ভক্ষণ করা।
খাত্তাবী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি উল্লেখ করেছেন।
