হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5788)


5788 - عن أبي سعيد الخدري، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا خَلَص المؤمنون من النّار حُبِسُوا بقنطرة بين الجنة والنار، فيتقاصُّون مظالم كانت بينهم في الدنيا، حتى إذا نُقُّوا وهُذِّبوا أذن لهم بدخول الجنة، فوالذي نفس محمد صلى الله عليه وسلم بيده لأحدهم بمسكنه في الجنة أدلُّ بمنزله كان في الدنيا".

صحيح: رواه البخاري في المظالم (2440) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة، عن أبي المتوكل الناجي، عن أبي سعيد الخدري فذكره.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মুমিনগণ জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি লাভ করবে, তখন তাদেরকে জান্নাত ও জাহান্নামের মধ্যবর্তী এক সেতুর (পুল) উপর আটকে রাখা হবে। অতঃপর তারা দুনিয়াতে একে অপরের প্রতি যে জুলুম করেছিল, তার প্রতিশোধ গ্রহণ করবে (বা তার হিসাব চুকিয়ে নেবে)। এভাবে যখন তারা সম্পূর্ণ পরিষ্কৃত ও পরিশোধিত হয়ে যাবে, তখন তাদেরকে জান্নাতে প্রবেশের অনুমতি দেওয়া হবে। সেই সত্তার শপথ, যার হাতে মুহাম্মাদের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রাণ! তাদের প্রত্যেকেই জান্নাতে তার বাসস্থানকে তার দুনিয়ার গৃহের চেয়েও অধিক সহজে চিনতে পারবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5789)


5789 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كانت له مظلمة لأحد من عرضه أو شيء فليتحلله منه اليوم قبل أن لا يكون دينار ولا درهم، إن كان له عمل صالح أخذ منه
بقدر مظلمته، وإن لم تكن له حسنات أخذ من سيئات صاحبه فحُمِل عليه".

صحيح: رواه البخاري في المظالم (2449) عن آدم بن أبي إياس، حدثنا ابن أبي ذئب، حدثنا سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.

قال البخاري: قال إسماعيل بن أبي أويس: إنما سمي المقبري؛ لأنه كان نزل ناحية المقابر. وقال البخاري: وسعيد المقبري هو مولى بني ليث، وهو سعيد بن أبي سعيد، واسم أبي سعيد كيسان.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার উপর তার কোনো ভাইয়ের মান-সম্মান বা অন্য কোনো কিছুর উপর কোনো যুলুম বা অধিকার রয়েছে, সে যেন আজই তার কাছ থেকে তা ক্ষমা করিয়ে নেয়—সেই দিন আসার পূর্বে যখন কোনো দিনার বা দিরহাম থাকবে না। যদি তার কোনো নেক আমল থাকে, তবে তার যুলুমের পরিমাণ অনুযায়ী তা থেকে কেটে নেওয়া হবে। আর যদি তার কোনো নেক আমল না থাকে, তবে তার প্রতি যুলুম করা ব্যক্তির গুনাহ থেকে নিয়ে তার (যালিমের) উপর চাপিয়ে দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5790)


5790 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أتدرون ما المفلس؟". قالوا: المفلس فينا من لا درهم له ولا متاع. فقال:"إن المفلس من أمتي يأتي يوم القيامة بصلاة وصيام وزكاة، ويأتي قد شتم هذا، وقذف هذا، وأكل مال هذا، وسفك دم هذا، وضرب هذا، فيُعْطَى هذا من حسناته، وهذا من حسناته، فإن فنيت حسناته قبل أن يقضي ما عليه أخذ من خطاياهم فطرحت عليه، ثم طرح في النّار".

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2581) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা কি জানো, নিঃস্ব কে?” তারা বলল: আমাদের মধ্যে নিঃস্ব তো সেই, যার কোনো দিরহাম বা কোনো সম্পদ নেই। তখন তিনি বললেন: “আমার উম্মতের মধ্যে প্রকৃত নিঃস্ব সে, যে কিয়ামতের দিন সালাত, সাওম ও যাকাত নিয়ে উপস্থিত হবে। অথচ সে (দুনিয়াতে) একে গালি দিয়েছে, ওকে অপবাদ দিয়েছে, এর সম্পদ অন্যায়ভাবে ভক্ষণ করেছে, এর রক্ত প্রবাহিত করেছে এবং ওকে প্রহার করেছে। তখন এর (মজলুমের) পাওনা পরিশোধ করা হবে তার নেক আমল থেকে, আর ওর পাওনা পরিশোধ করা হবে তার নেক আমল থেকে। যদি তার প্রাপ্য পরিশোধ করার আগেই তার সমস্ত নেক আমল নিঃশেষ হয়ে যায়, তবে তাদের গুনাহসমূহ তার উপর চাপিয়ে দেওয়া হবে এবং এরপর তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (5791)


5791 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لتؤدن الحقوق إلى أهلها يوم القيامة، حتى يقاد للشاة الجَلْحاءِ من الشاة القَرْناءِ".

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2582) من طرق عن إسماعيل (ابن جعفر)، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

"والجلحاء" هي الجماء التي لا قرن لها، والقصاص من القرناء والجلحاء ليس هو من قصاص التكلف؛ إذ لا تكلف عليها، إنما هو قصاص مقابلة، وفيه تصريح بحشر البهائم يوم القيامة، ويدل عليه قوله تعالى: {وَإِذَا الْوُحُوشُ حُشِرَتْ} [سورة التكوير: 5].

ولكن قال العلماء: ليس من شرط الحشر في القيامة المجازاة والعقاب والثواب، أفاده النووي باختصار.

وفيه إظهار قدرة اللَّه تعالى بأنه يستطيع أن يحشر البهائم يوم القيامة التي لا تكليف عليها، فكيف لا يحشر الآدميين.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কিয়ামতের দিন অবশ্যই হকদারদেরকে তাদের প্রাপ্য অধিকার ফিরিয়ে দেওয়া হবে, এমনকি শিংওয়ালা ছাগলের কাছ থেকে শিংহীন ছাগলের জন্য প্রতিশোধ নেওয়া হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (5792)


5792 - عن عبد اللَّه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الشيطان قد يئس أن تعبد الأصنام في أرض العرب، ولكنه سيرضى منكم بدون ذلك بالمُحَقِّرات، وهي الموبِقات يوم القيامة، اتقوا المظالم ما استطعتم؛ فإن العبد يجيء بالحسنات يوم القيامة يرى أنه ستنجيه، فما زال عبد يقوم، فيقول: يا رب، ظلمني عبدك مظلمة. فيقول: امْحُوا من حسناته. وما يزال كذلك حتى ما يبقى له حسنة من الذنوب، وإن مثل ذلك
كسَفْرٍ نزلوا بفلاة من الأرض ليس معهم حَطَب، فتفرق القوم ليحتطبوا، فلم يلبثوا أن حطبوا، فأَعْظَمُوا النار، وطبخوا ما أرادوا، وكذلك الذنوب".

حسن: رواه أبو يعلى (5122) عن محمد بن أبي بكر، عن محمد بن دينار، عن إبراهيم الهجري، عن أبي الأحوص، قال أبو يعلى: أحسبه عن ابن مسعود فذكره.

وإبراهيم الهجري -وهو ابن مسلم- ضعيف باتفاق أهل العلم، ولكن قال ابن عدي:"ومع ضعفه يكتب حديثه، وهو عندي ممن لا يجوز الاحتجاج بحديثه". أي إذا انفرد.

وقد وجدت رواه الإمام أحمد (3818) من وجه آخر عن قتادة، عن عبد ربه، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه بن مسعود بدون شك نحوه.

وعبد ربه هو ابن أبي يزيد، لم يرو عنه سوى قتادة، وقال ابن المديني:"مجهول".

ثم إبراهيم الهجري هذا روى عنه سفيان بن عيينة، كما رواه الحميدي في مسنده (98) عنه نحوه.

وسفيان بن عيينة يقول: أتيت إبراهيم الهجري، فدفع إلي عامة كتبه، فرحمت الشيخ، وأصلحت له كتابه، قلت: هذا عن عبد اللَّه، وهذا عن النبي صلى الله عليه وسلم، وهذا عن عمر. (تهذيب التهذيب 1/ 165).

قال ابن حجر:"هذه القصة عن ابن عيينة تقتضي أن حديثه عنه صحيح؛ لأنه إنما عيب عليه رفعه أحاديث موقوفة، وابن عيينة ذكر أنه ميز حديث عبد اللَّه من حديث النبي صلى الله عليه وسلم". اهـ. إلا أن الراوي عنه هنا محمد بن دينار.




আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই শয়তান আরবের ভূমিতে মূর্তি পূজা করানো সম্পর্কে হতাশ হয়ে গেছে। তবে সে এর চেয়ে কম অর্থাৎ তুচ্ছ বিষয়াদিতে সন্তুষ্ট হবে, যা কিয়ামতের দিন ধ্বংসাত্মক (পাপ) হবে। তোমরা যথাসাধ্য জুলুম থেকে বেঁচে থাকো। কারণ, কিয়ামতের দিন বান্দা এমন অনেক নেকি নিয়ে আসবে, যা দেখে সে মনে করবে, এসব নেকি তাকে মুক্তি দেবে। এরপর কোনো এক বান্দা দাঁড়িয়ে বলবে: ‘হে আমার রব, আপনার এই বান্দা আমার প্রতি জুলুম করেছে।’ আল্লাহ বলবেন: ‘তার নেকি থেকে মুছে দাও।’ সে (অন্যান্য জুলুমকারী) একইভাবে এসে দাবি করতে থাকবে যতক্ষণ না তার সমস্ত নেকি শেষ হয়ে যায়। আর এর উদাহরণ হলো— এমন একদল মুসাফিরের মতো, যারা কোনো এক জনশূন্য প্রান্তরে অবতরণ করল অথচ তাদের সাথে কাঠ ছিল না। তখন তারা কাঠ সংগ্রহের জন্য ছড়িয়ে পড়ল। অল্প সময়ের মধ্যে তারা যথেষ্ট কাঠ জোগাড় করে ফেলল, তারপর তারা বড় আগুন জ্বালালো এবং যা ইচ্ছা রান্না করল। পাপসমূহের অবস্থাও ঠিক তাই।"









আল-জামি` আল-কামিল (5793)


5793 - عن أبي موسى قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه ليملي للظالم حتى إذا أخذه لم يُفْلِته". قال: ثم قرأ: {وَكَذَلِكَ أَخْذُ رَبِّكَ إِذَا أَخَذَ الْقُرَى وَهِيَ ظَالِمَةٌ إِنَّ أَخْذَهُ أَلِيمٌ شَدِيدٌ} [سورة هود: 102].

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4686)، ومسلم في البر والصلة (2583) كلاهما من حديث أبي معاوية، حدثنا بُريد بن أبي بردة، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ্ জালিমকে অবকাশ দেন। কিন্তু যখন তিনি তাকে পাকড়াও করেন, তখন সে আর পালাতে পারে না।" তিনি বলেন, অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "আর এভাবেই আপনার রবের পাকড়াও, যখন তিনি কোনো জনপদকে পাকড়াও করেন, অথচ তারা ছিল জালিম। নিঃসন্দেহে তাঁর পাকড়াও কষ্টদায়ক, কঠোর।" [সূরা হুদ: ১০২]









আল-জামি` আল-কামিল (5794)


5794 - عن عبد اللَّه بن عمر أخبر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"المسلم أخو المسلم، لا يظلمه، ولا يُسْلِمه، ومن كان في حاجة أخيه كان اللَّه في حاجته، ومن فَرَّج عن مسلم
كربة فَرَّج اللَّه عنه كربة من كربات يوم القيامة، ومن ستر مسلما ستره اللَّه يوم القيامة".

متفق عليه: رواه البخاري في المظالم (2443)، ومسلم في البر والصلة (2580) كلاهما من حديث الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، أن سالما أخبره أن عبد اللَّه بن عمر أخبره فذكر الحديث.

وروي عن ابن عمر أيضًا مرفوعا:"المسلم أخو المسلم، لا يظلمه، ولا يخذله. والذي نفس محمد بيده، ما توادَّ اثنان، ففرق بينهما إلا بذنب يحدثه أحدهما". وكان يقول:"للمرء المسلم على أخيه من المعروف ست: يشمته إذا عطس، ويعوده إذا مرض، وينصحه إذا غاب، ويشهده ويسلم عليه إذا لقيه، ويجيبه إذا دعاء، ويتبعه إذا مات. ونهى عن هجرة المسلم أخاه فوق ثلاث".

رواه أحمد (5357) عن موسى بن داود، حدثنا ابن لهيعة، عن خالد بن أبي عمران، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وابن لهيعة سيء الحفظ، إلا أن لفقرات الحديث شواهد صحيحة ذُكِرت في مواضعها ولعله لذلك حسّنه المنذري في"الترغيب" (3405).




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুসলিম মুসলিমের ভাই; সে তাকে যুলম করে না এবং তাকে (শত্রুর হাতে) সোপর্দ করে না। আর যে ব্যক্তি তার ভাইয়ের প্রয়োজন পূরণে থাকে, আল্লাহ তার প্রয়োজন পূরণ করেন। যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের একটি বিপদ দূর করে, আল্লাহ কিয়ামতের দিনের বিপদসমূহের মধ্য থেকে তার একটি বিপদ দূর করে দেবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের দোষ ঢেকে রাখে, আল্লাহ কিয়ামতের দিন তার দোষ ঢেকে রাখবেন।

আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ সূত্রে আরো বর্ণিত: মুসলিম মুসলিমের ভাই; সে তাকে যুলম করে না এবং তাকে অপমানিত করে না। ঐ সত্তার কসম, যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন! দুই জন ব্যক্তির মধ্যে ভালোবাসা সৃষ্টি হওয়ার পর যদি তাদের মধ্যে বিচ্ছেদ ঘটে, তবে তা তাদের দুজনের কারো না কারো পাপের কারণেই ঘটে।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: মুসলিম ভাইয়ের ওপর মুসলিম ব্যক্তির ছয়টি হক রয়েছে: যখন সে হাঁচি দেয়, তখন তার হাঁচির জবাব দেবে; যখন সে অসুস্থ হয়, তখন তার সেবা করবে; যখন সে অনুপস্থিত থাকে, তখন তার কল্যাণ কামনা করবে; যখন তার সাথে সাক্ষাৎ হয়, তখন তাকে সাক্ষী রাখবে এবং সালাম দেবে; যখন সে ডাকে, তখন তার ডাকে সাড়া দেবে; এবং যখন সে মারা যায়, তখন তার জানাজায় অংশগ্রহণ করবে। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিম ভাইকে তিন দিনের বেশি সময় ধরে পরিত্যাগ (সম্পর্ক ছিন্ন) করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5795)


5795 - عن أنس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"انصر أخاك ظالما أو مظلوما". قالوا: يا رسول اللَّه، هذا ننصره مظلوما، فكيف ننصره ظالما؟ قال:"تأخذ فوق يديه".

صحيح: رواه البخاري في المظالم (2444) عن مسدد، حدثنا معتمر، عن حميد، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তুমি তোমার ভাইকে সাহায্য করো, সে অত্যাচারী হোক বা অত্যাচারিত।" সাহাবীগণ বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! অত্যাচারিতকে তো আমরা সাহায্য করি, কিন্তু অত্যাচারীকে আমরা কিভাবে সাহায্য করব?" তিনি বললেন: "তুমি তার হাত ধরে রাখবে (অর্থাৎ তাকে যুলুম করা থেকে বিরত রাখবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5796)


5796 - عن جابر قال: اقتتل غلامان: غلام من المهاجرين، وغلام من الأنصار، فنادى المهاجر أو المهاجرون: يا للمهاجرين. ونادى الأنصاري: يا للأنصار. فخرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"ما هذا دعوى أهل الجاهلية". قالوا: لا، يا رسول اللَّه، إلا أن غلامين اقتتلا، فكسع أحدهما الآخر. قال:"فلا بأس، ولينصر الرجل أخاه ظالما أو مظلوما، إن كان ظالما فلينهه؛ فإنه له نصر، وإن كان مظلوما فلينصره".

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2584) عن أحمد بن عبد اللَّه بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا أبو الزبير، عن جابر فذكره. وأصل القصة مخرج في الصحيحين، ولكن ليس فيهما قول النبي صلى الله عليه وسلم:"فلا بأس، ولينصر الرجل. . .". وهو مذكور في محله.

وقوله:"كسع" أي ضرب دبره.

وقوله:"فلا بأس" معناه لم يحصل من هذه القصة بأس مما كنت خِفْتُه.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দুইজন যুবক লড়াই করল: একজন যুবক মুহাজিরদের মধ্য থেকে এবং একজন যুবক আনসারদের মধ্য থেকে। তখন মুহাজির যুবক অথবা মুহাজিরগণ ডাক দিল: 'হে মুহাজিরগণ!' আর আনসারী যুবক ডাক দিল: 'হে আনসারগণ!' তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বেরিয়ে আসলেন এবং বললেন: "এ কেমন জাহেলিয়াতের (অন্ধকারের যুগের) ডাক!" তারা বলল: 'না, ইয়া রাসূলাল্লাহ! শুধু দুইজন যুবক লড়াই করেছে এবং তাদের একজন অন্যজনের নিতম্বে আঘাত করেছে।' তিনি বললেন: "তাহলে কোনো ক্ষতি নেই। আর মানুষ যেন তার ভাইকে সাহায্য করে, সে জালিম (অন্যায়কারী) হোক বা মাজলুম (অত্যাচারিত) হোক। যদি সে জালিম হয়, তবে সে যেন তাকে নিষেধ করে—কারণ এটাই তার জন্য সাহায্য—আর যদি সে মাজলুম হয়, তবে সে যেন তাকে সাহায্য করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5797)


5797 - عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"انصر أخاك ظالما أو مظلوما". قيل: يا رسول اللَّه، هذا نصره مظلوما، فكيف نصره ظالما؟ قال:"تُمسكه من الظلم
فذاك نصرك إياه".

حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (5166) عن الحسن بن سفيان، حدثنا محفوظ بن أبي توبة، حدثنا علي بن عياش، حدثنا أبو إسحاق الفزاري، عن عاصم بن محمد بن زيد العمري، عن أبيه قال: سمعت ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن من أجل محفوظ بن أبي توبة، وهو محفوظ بن الفضل بن أبي توبة، روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في ثقاته (9/ 204)، وأخرج حديثه في صحيحه، وفيه كلام يسير، ولذا قال الذهبي في الميزان (3/ 444):"لم يترك".

قلت: وحديثه هذا له أصل ثابت، فإن كان في حديثه مخالفة أو في متنه نكارة فيُضعّف.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমার ভাইকে সাহায্য করো, সে অত্যাচারী হোক অথবা অত্যাচারিত।" জিজ্ঞাসা করা হলো, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! অত্যাচারিতকে সাহায্য করা তো আমরা বুঝি, কিন্তু অত্যাচারীকে কিভাবে সাহায্য করব?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে যুলুম করা থেকে বিরত রাখবে। সেটাই তাকে তোমার সাহায্য করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (5798)


5798 - عن البراء قال: أمرنا النبي صلى الله عليه وسلم بسبع، ونهانا عن سبع: أمرنا باتباع الجنائز، وعيادة المريض، وإجابة الداعي، ونصر المظلوم، وإبرار القسم، ورد السلام، وتشميت العاطس. ونهانا عن سبع: آنية الفضة، وخاتم الذهب، والحرير، والديباج، والقسي، والإستبرق.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1339)، ومسلم في الأشربة (2066) كلاهما من حديث شعبة، عن أشعث بن سليم قال: سمعت معاوية بن سويد بن مقرن، عن البراء فذكره. واللفظ للبخاري. ورواه مسلم من أوجه أخرى عن أشعث، ولم يذكر لفظ شعبة، وإنما أحال على غيره، وهو نحوه، والسابع عنده هو"المياثر"، وهو جمع مئثرة -بكسر الميم-، وهو وطاء كانت النساء يصنعنه لأزواجهن على السروج، وكان من مراكب العجم، ويكون من الحرير، ويكون من الصوف وغيره، فإذا كان من الحرير فيكون منهيا عنه.

"والقسي" -بفتح القاف- هي ثياب مضلعة بالحرير، تعمل بالقس، وهو موضع ببلاد مصر.




বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে সাতটি কাজের নির্দেশ দিয়েছেন এবং সাতটি কাজ থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি আমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন জানাযার অনুসরণ করতে, অসুস্থকে দেখতে, দাওয়াতকারীর ডাকে সাড়া দিতে, অত্যাচারিতকে সাহায্য করতে, কসম পূর্ণ করতে, সালামের উত্তর দিতে এবং হাঁচিদাতাকে দো‘আ (ইয়ারহামুকাল্লাহ) দিতে। আর তিনি আমাদেরকে সাতটি জিনিস থেকে নিষেধ করেছেন: রূপার পাত্র, স্বর্ণের আংটি, রেশম (বস্ত্র), দীবা-জ (মোটা রেশম), ক্বাসী (এক প্রকার রেশমী বস্ত্র) এবং ইস্তাবরাক (খাঁটি মোটা রেশম)।









আল-জামি` আল-কামিল (5799)


5799 - عن ثابت مولى عمر بن عبد الرحمن قال: إنه لما كان بين عبد اللَّه بن عمرو وبين عنبسة بن أبي سفيان ما كان تيسَّرُوا للقتال، فركب خالد بن العاص إلى عبد اللَّه بن عمرو، فوعظه خالد، فقال عبد اللَّه بن عمرو: أما علمت أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من قتل دون ماله فهو شهيد".

متفق عليه: رواه مسلم في الإيمان (141) من حديث عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج قال: أخبرني سليمان الأحول أن ثابتا مولى عمر بن عبد الرحمن قال: فذكره، واللفظ له.
ورواه البخاري في المظالم (2480) من وجه آخر عن عكرمة، عن عبد اللَّه بن عمرو فذكر الحديث، ولم يذكر القصة.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু আমর) বললেন: যখন আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আনবাসাহ ইবনু আবী সুফিয়ানের মাঝে কোনো বিরোধ ঘটলো, তখন তারা যুদ্ধের জন্য প্রস্তুত হলেন। তখন খালিদ ইবনু আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন এবং তাঁকে উপদেশ দিলেন। তখন আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কি জানেন না যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার সম্পদের রক্ষার্থে নিহত হয়, সে শহীদ?"









আল-জামি` আল-কামিল (5800)


5800 - عن عبد اللَّه بن مسعود، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من حلف على يمين صبر يقتطع بها مال امرئ مسلم هو فيها فاجر، لقي اللَّه وهو عليه غضبان". قال: فدخل الأشعث بن قيس، فقال: ما يحدثكم أبو عبد الرحمن؟ قالوا كذا وكذا. قال: صدق أبو عبد الرحمن، في نزلت، كان بيني وبين رجل أرض باليمن، فخاصمته إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"هل لك بينة". فقلت: لا. قال:"فيمينه". قلت: إذن يحلف. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عند ذلك:"من حلف على يمين صبر يقتطع بها مال امرئ مسلم وهو فيها فاجر لقي اللَّه وهو عليه غضبان". فنزلت {إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا} [آل عمران: 77] إلى الآخر الآية.

متفق عليه: رواه البخاري في المساقاة (2356)، ومسلم في الإيمان (138) كلاهما من حديث الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد اللَّه بن مسعود فذكر مثله. واللفظ لمسلم.

وفي رواية عند البخاري (2416، 2417): قال الأشعث: كان بيني وبين رجل من اليهود أرض، فجحدني، فقدمته إلى النبي صلى الله عليه وسلم. . . والباقي مثله.

وفي رواية لهما: كانت الخصومة في بئر.

وفي رواية عند البخاري (2516):"شاهداك أو يمينه".




আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মিথ্যা কসমের মাধ্যমে এমন সম্পদ গ্রাস করে, যা কোনো মুসলিমের অধিকারভুক্ত এবং সে তাতে পাপাচারী (মিথ্যুক), সে আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে, আল্লাহ তার প্রতি রাগান্বিত থাকবেন।"

তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ) বলেন: এরপর আশআছ ইবনু ক্বাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে প্রবেশ করে বললেন, 'আবু আবদুর রহমান (অর্থাৎ আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ)- তোমাদেরকে কী বর্ণনা করেছেন?' লোকেরা বলল, 'এরকম এরকম।' তিনি বললেন, 'আবু আবদুর রহমান সত্য বলেছেন। এই বিষয়ে আমার ব্যাপারেই (এই হাদীস) নাযিল হয়েছে। ইয়ামেনে আমার এবং এক ব্যক্তির মধ্যে একটি জমি নিয়ে বিরোধ ছিল। আমি সেই বিরোধ নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ফয়সালার জন্য গেলাম। তিনি বললেন, "তোমার কি কোনো প্রমাণ আছে?" আমি বললাম, "না।" তিনি বললেন, "তাহলে সে কসম করবে।" আমি বললাম, "তাহলে সে কসম করুক।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি মিথ্যা কসমের মাধ্যমে এমন সম্পদ গ্রাস করে, যা কোনো মুসলিমের অধিকারভুক্ত এবং সে তাতে পাপাচারী (মিথ্যুক), সে আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে, আল্লাহ তার প্রতি রাগান্বিত থাকবেন।" এরপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: {নিশ্চয় যারা আল্লাহর অঙ্গীকার ও নিজেদের কসমের বিনিময়ে সামান্য মূল্য গ্রহণ করে...} [সূরা আলে ইমরান: ৭৭] আয়াতের শেষ পর্যন্ত।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী এটি বর্ণনা করেছেন মুসাক্বাত অধ্যায়ে (২৩৫৬), এবং মুসলিম ঈমান অধ্যায়ে (১৩৮), উভয়ে আ'মাশ, তিনি আবু ওয়াইল, তিনি আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। আর শব্দগুলো মুসলিমের।

আর বুখারীর এক বর্ণনায় (২৪১৬, ২৪১৭) আশআছ বলেছেন: আমার এবং জনৈক ইয়াহুদী ব্যক্তির মধ্যে একটি জমি ছিল, সে তা অস্বীকার করেছিল। অতঃপর আমি তাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উপস্থিত করলাম... এবং বাকি অংশ অনুরূপ।

আর উভয়ের (বুখারী ও মুসলিমের) এক বর্ণনায় আছে: বিরোধটি ছিল একটি কূপকে কেন্দ্র করে।

আর বুখারীর এক বর্ণনায় (২৫১৬) আছে: "তোমার দু'জন সাক্ষী, অথবা তার কসম।"









আল-জামি` আল-কামিল (5801)


5801 - عن وائل بن حجر، عن أبيه قال: جاء رجل من حضرموت، ورجل من كندة إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال الحضرمي: يا رسول اللَّه، إن هذا قد غلبني على أرض لي كانت لأبي. فقال الكندي: هي أرضي في يدي أزرعها ليس له فيها حق. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للحضرمي:"ألك بينة؟". قال: لا. قال:"فلك يمينه". قال: يا رسول اللَّه، إن الرجل فاجر لا يبالي على ما حلف عليه، وليس يتورع من شيء. فقال:"ليس لك منه إلا ذلك". فانطلق ليحلف، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما أدبر:"أما لئن حلف على ماله ليأكله ظلما ليلقين اللَّه وهو عنه مُعرض".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (139) من طرق عن أبي الأحوص، عن سماك، عن علقمة بن وائل، عن أبيه وائل بن حجر فذكره.

وفي رواية عن أبي عوانة، عن عبد الملك بن عمير، عن علقمة بن وائل، عن وائل بن حجر
قال: كنت عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأتاه رجلان يختصمان في أرض، فقال أحدهما: إن هذا انتزى على أرضي -يا رسول اللَّه- في الجاهلية، -وهو امرؤ القيس بن عابس الكندي، وخصمه ربيعة بن عبدان- قال:"بيتك". قال: ليس لي بينة. قال:"يمينه". قال: إذن يذهب بها. قال:"ليس لك إلا ذاك". قال: فلما قام ليحلف قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من اقتطع أرضا ظلما لقي اللَّه وهو عليه غضبان".

قوله:"انتزى" معناه غلب عليها، واستولى.




ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেন যে, হাযরামাওত গোত্রের একজন লোক এবং কিন্দাহ গোত্রের একজন লোক নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। হাযরামাওতী লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এই লোকটি আমার একটি জমি জবরদখল করে নিয়েছে, যা আমার পিতার ছিল। কিন্দী লোকটি বলল: ওটা আমার জমি, আমার দখলে আছে এবং আমি তাতে চাষ করি। এতে তার কোনো অধিকার নেই। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাযরামাওতী লোকটিকে জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার কি কোনো প্রমাণ (সাক্ষী) আছে?" সে বলল: না। তিনি বললেন: "তাহলে সে কসম করবে।" সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! লোকটি ফাসেক (দুরাচার), সে কিসের উপর কসম করছে তার পরোয়া করে না এবং কোনো কিছু থেকে বিরত থাকে না (পাপকে ভয় করে না)। তিনি বললেন: "এর চেয়ে বেশি কিছু তোমার জন্য নেই।" তখন লোকটি কসম করার জন্য চলে গেল। যখন সে পিছন ফিরে চলে যাচ্ছিল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সাবধান! যদি সে মিথ্যা কসম করে তার সম্পদ গ্রাস করার জন্য, তবে সে আল্লাহর সঙ্গে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে আল্লাহ তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়েছেন (অসন্তুষ্ট)।"

অন্য এক বর্ণনায় ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তখন তাঁর কাছে দুজন লোক একটি জমি নিয়ে বিবাদ করতে আসলো। তাদের একজন বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এই লোকটি জাহিলিয়াতের যুগে আমার জমি জবরদখল করে নিয়েছে। (এ ছিল কিন্দাহ গোত্রের ইমরুউল ক্বায়স ইবনু আবিস এবং তার প্রতিপক্ষ ছিল রাবী’আহ ইবনু আবদান।) তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার সাক্ষী (বা প্রমাণ) আছে কি?" সে বলল: আমার কোনো সাক্ষী নেই। তিনি বললেন: "তাহলে তার কসমই হবে।" সে বলল: তাহলে তো সে জমি নিয়েই যাবে। তিনি বললেন: "এর চেয়ে বেশি কিছু তোমার জন্য নেই।" বর্ণনাকারী বলেন: লোকটি যখন কসম করার জন্য দাঁড়ালো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি অন্যায়ভাবে কোনো জমি দখল করে নেয়, সে আল্লাহর সঙ্গে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে আল্লাহ তার উপর রাগান্বিত।"









আল-জামি` আল-কামিল (5802)


5802 - عن أبي أمامة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من اقتطع حق امرئ مسلم بيمينه فقد أوجب اللَّه له النّار، وحرم عليه الجنّة". فقال له رجل: وإن كان شيئًا يسيرا يا رسول اللَّه. قال:"وإن قضيبًا من أراك".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (137) من طرق عن إسماعيل بن جعفر قال: أخبرنا العلاء (وهو ابن عبد الرحمن مولى الحرقة)، عن معبد بن كعب السلمي، عن أخيه عبد اللَّه بن كعب، عن أبي أمامة فذكر مثله.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি শপথের মাধ্যমে কোনো মুসলিম ব্যক্তির অধিকার ছিনিয়ে নেয়, আল্লাহ তার জন্য জাহান্নাম ওয়াজিব করে দেন এবং তার উপর জান্নাত হারাম করে দেন।” তখন এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞাসা করল: হে আল্লাহর রাসূল! যদি তা সামান্য কিছু হয় তবুও? তিনি বললেন: “যদি তা পিলু গাছের একটি ডালও হয় তবুও।”









আল-জামি` আল-কামিল (5803)


5803 - عن عبد اللَّه بن يزيد قال: نهى النبي صلى الله عليه وسلم، عن النُهبى والمثلة.

صحيح: رواه البخاري في المظالم (2474)، عن آدم بن أبي إياس، حدثنا شعبة، حدثنا عدي ابن ثابت، سمعت عبد اللَّه بن يزيد الأنصاري وهو جده أبو أمه قال فذكر الحديث.

وقوله:"وهو جده أبو أمه" أي جد عدي بن ثابت لأمه."والنهبة" هو أخذ المال قهرا.




আব্দুল্লাহ ইবনে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লুঠতরাজ (জোরপূর্বক সম্পদ দখল করা) এবং (দেহ বা প্রাণীর) অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করা (মুমথালা) থেকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5804)


5804 - عن عمران بن حصين، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا جلب، ولا جنب، ولا شغار في الإسلام. ومن انتهب نُهبة فليس منا".

صحيح: رواه أبو داود (2581)، والترمذي (1123)، والنسائي (6/ 111)، وابن ماجه (3937)، وصحّحه ابن حبان (3267، 5170)، وأحمد (19946) كلهم من حديث حميد الطويل، عن الحسن، عن عمران بن حصين فذكره، واختصره البعض. قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: فيه الحسن، وهو الأمام المعروف، وهو مدلس، وقد اختلف في سماعه من عمران بن حصين، فنفاه علي بن المديني، وأثبته بهز بن أسد، ورواية ابن حبان هذا الحديث في صحيحه تشعر بأنه سمع منه؛ لأنه صرح في مقدمة كتابه بقوله:"فإذا صح عندي خبر من رواية مدلس أنه بين السماع فيه لا أبالي أن أذكره من غير بيان السماع في خبره بعد صحته عندي من طريق آخر" (1/ 162).

ولعل من هذا الطريق ما رواه الطبراني في الكبير (18/ 219) والمروزي في تعظيم قدر الصلاة (1081)
كلاهما من طريق محمد بن بشار، وقرنه المروزي بمحمد بن يحيى، قالا: حدثنا محمد ابن عبد اللَّه الأنصاري، قال: حدثنا صرد بن أبي المنازل، قال: سمعت حبيب بن أبي فضالة المالكي، قال: لما بني هذا المسجد مسجد الجامع قال: وعمران بن حصين جالس. فذكروا عنده الشفاعة، فقال رجل من القوم: يا أبا نجيد، إنكم لتحدثونا بأحاديث ما نجد لها أصلا في القرآن. فغضب عمران، وقال للرجل: قرأت القرآن؟ قال: نعم. قال: فهل وجدت فيه صلاة المغرب ثلاثا. . . وذكر أشياء منها الحديث المذكور.

وصرد بن أبي المنازل وشيخه حبيب بن أبي فضائة لا بأس بهما في المتابعات.

وقال الحافظ ابن حجر في النكت الظراف (8/ 173):"وله شاهد في المستدرك للحاكم من طريق عقبة بن خالد، عن عمران، وسياق حبيب أتم". كذا قال، والصواب: عن عقبة بن خالد، عن الحسن، عن عمران بن حصين، كما في المستدرك (1/ 109).

وبمجموع هذه الطرق صح هذا الحديث.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ইসলামে 'জালব' নেই, 'জানাব' নেই এবং 'শিগার' নেই। আর যে ব্যক্তি ছিনতাই করে, সে আমাদের অন্তর্ভুক্ত নয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5805)


5805 - عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن أبغض الرجال إلى اللَّه الألد الخصم".

متفق عليه: رواه البخاري في المظالم (2457)، ومسلم في العلم (2668) كلاهما عن ابن جريج، عن ابن أبي مليكة، عن عائشة فذكرته.

وقوله:"الألد" بمعنى شديد الخصومة، مأخوذ من لديدي الوادي، وهما جانباه، لأنه كلما احتج عليه بحجة أخذ في جانب آخر.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহর কাছে সবচেয়ে অপছন্দনীয় পুরুষ হলো প্রচণ্ড ঝগড়াকারী ও কলহপরায়ণ ব্যক্তি।”









আল-জামি` আল-কামিল (5806)


5806 - عن * *




৫৮০৬ - ... থেকে বর্ণিত ...









আল-জামি` আল-কামিল (5807)


5807 - عن سويد بن غفلة قال: لقيت أبي بن كعب، فقال: أخذت صرة مائة دينار، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"عرفها حولا". فعرفتها حولا، فلم أجد من يعرفها، ثم أتيته، فقال:"عرفها حولا". فعرفتها، فلم أجد، ثم أتيته ثلاثا، فقال:"احفظ وعاءها وعددها ووكاءها؛ فإن جاء صاحبها وإلا فاستمتع بها".

فاستمتعت، فلقيته بعد بمكة، فقال: لا أدري ثلاثة أحوال، أو حولا واحدا.

متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2426)، ومسلم في اللقطة (1723) كلاهما عن محمد ابن بشار، حدثنا غندر، حدثنا شعبة، عن سلمة بن كهيل قال: سمعت سويد بن غفلة قال: خرجت أنا وزيد بن صوحان وسلمان بن ربيعة غازين، فوجدت سوطا، فأخذته، فقالا لي: دعه. فقلت: لا، ولكني أعرفه، فإن جاء صاحبه وإلا استمتعت به. قال: فأبيت عليهما، فلما رجعنا من غزاتنا قضي لي أني حججت، فأتيت المدينة، فلقيت أبي بن كعب، فأخبرته بشأن السوط وبقولهما، فقال: إني وجدت صرة فذكر الحديث، واللفظ لمسلم.

والبخاري أيضًا ذكر القصة، ولكن رواه عن سليمان بن حرب، عن شعبة (2437).

وفي صحيح مسلم: قال شعبة: فسمعته بعد عشر سنين يقول:"عَرِّفها عاما واحدا".

فكأن سلمة بن كهيل يشك أول الأمر، ثم تيقن بأنه أمر بالتعريف الحول واحد، وهو المعتمد، كما في حديث زيد بن خالد الجهني الآتي في باب ضالة الإبل والغنم.

وقد روي من آثار الصحابة ما يدل على أن التعريف يكون سنة، منها ما رواه عبد اللَّه بن بدر الجهني أنه نزل منزل قوم بطريق الشام، فوجد صرة فيها ثمانون دينارا، فذكرها لعمر بن الخطاب، فقال له عمر:"عرفها على أبواب المساجد، واذكرها لكل من يأتي من الشام سنة، فإذا مضت السنة فشأنك بها".

رواه مالك في الأقضية (49) عن أيوب بن موسى، عن معاوية بن عبد اللَّه بن بدر الجهني، عن أبيه.

ومعاوية بن عبد اللَّه ترجمه ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (8/ 377)، وذكر من روى عنه أيوب بن موسى، ومحمد بن عمرو قاله أبو حاتم.

والحديث يدل على أن الملتقط يعرفها سنة، فإن جاء مالكها دفع إليها، وإن لم يجد مالكها فله أن يتملك ويأكل، سواء كان فقيرا أو غنيا، ثم إذا ظهر صاحبها دفع إليه قيمتها، وبه قال جمهور
أهل العلم الشافعي، وأحمد، وإسحاق. وبه قال من الصحابة عمر بن الخطاب، وعائشة، وغيرهما.

وذهب جماعة من أهل العلم أنه بعد ما عرفها سنة يتصدق بها، وليس له أن ينتفع بها، وهو رأي الثوري، وأصحاب الرأي.

والمذهب الأول يوافق حديث الباب.

وأما التعريف بها ثلاث سنوات فلم يقل به أحد من العلماء المعروفين للشك الذي وقع من سلمة بن كهيل، ثم تثبت، واستذكر، واستمر على عام واحد، إلا ما جاء عن عمر أن اللقطة تعرف ثلاثة أعوام، وله في ذلك أربعة أقوال، أصحها عام واحد، ومنها ثلاثة أشهر، ومنها ثلاثة أيام، ولعله يحمل ذلك على عظم اللقطة وحقارتها.

وأما ما روي عن يعلى بن مرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من التقط لقطة يسيرة درهما، أو حبلا، أو شبه ذلك فليعرفه ثلاثة أيام، فإن كان فوق ذلك فليعرفه ستة أيام". فهو ضعيف.

رواه أحمد (17566) عن يزيد بن هارون، أخبرنا إسرائيل بن يونس، حدثني عمر بن عبد اللَّه ابن يعلى، عن جدته حكيمة، عن أبيها يعلى فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل عمر، وجدتُه حكيمة لا تعرف حالها.

قال الهيثمي في المجمع (3/ 169):"رواه أحمد من طريق عمرو بن عبد اللَّه بن يعلى، فإن كان عمرو فلا أعرفه، وإن كان عمر فهو ضعيف".

قلت: وهو كما قال؛ فإن عمر بن عبد اللَّه ضعيف، ضعَّفه يحيى بن معين، ورماه جرير بن عبد اللَّه وغيره بشرب الخمر، ذكره البيهقي (6/ 195) عقب تخريج الحديث من هذا الوجه.




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একশ’ দীনারের একটি থলে (পুঁটলি) পেলাম। এরপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলাম। তিনি বললেন: “এক বছর ধরে এর পরিচিতি দাও।” অতএব আমি এক বছর ধরে এর পরিচিতি দিলাম, কিন্তু এর মালিককে পেলাম না। এরপর আমি তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) কাছে এলাম। তিনি বললেন: “এক বছর ধরে এর পরিচিতি দাও।” আমি পরিচিতি দিলাম, কিন্তু (মালিককে) পেলাম না। এরপর আমি তাঁর কাছে তিনবার এলাম। তিনি বললেন: “এর থলে, সংখ্যা এবং মুখ বাঁধার রশিটি (বাঁধন) মনে রাখো; যদি এর মালিক আসে, (তবে তাকে তা দিয়ে দেবে) অন্যথায় তুমি এটি ব্যবহার করতে পারো।”

অতঃপর আমি তা ব্যবহার করলাম। এরপরে মক্কায় উবাই ইবনু কা'বের সাথে আমার (বর্ণনাকারী সুওয়াইদের) সাক্ষাৎ হলে তিনি বললেন: আমি নিশ্চিত নই—তিনি কি তিন বছর বলেছিলেন, নাকি এক বছর বলেছিলেন।