আল-জামি` আল-কামিল
5808 - عن سهل بن سعد أخبره أن علي بن أبي طالب دخل على فاطمة، وحسن وحين يبكيان، فقال: ما يبكيهما؟ قالت: الجوع. فخرج علي، فوجد دينارا بالسوق، فجاء إلى فاطمة، فأخبرها، فقالت: اذهب إلى فلان اليهودي، فخذ لنا دقيقا، فجاء اليهودي، فاشترى به دقيقا، فقال اليهودي: أنت ختن هذا الذي يزعم أنه رسول اللَّه؟ قال: نعم. قال: فخذ دينارك، ولك الدقيق. فخرج علي حتى جاء به فاطمة، فأخبرها، فقالت: اذهب إلى فلان الجزار، فخذ بدرهم لحما، فذهب، فرهن الدينار بدرهم لحم، فجاء به، فعجنت، ونصبت، وخبزت، وأرسلت إلى أبيها، فجاءهم، فقالت: يا رسول اللَّه، أذكر لك، فإن رأيته لنا حلالا أكلناه وأكلت، من شأنه كذا وكذا. فقال:"كلوا باسم اللَّه". فأكلوا منه، فبينما هم مكانهم إذا غلام ينشد اللَّه والإسلام الدينار، فأمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فدعي له، فسأله،
فقال: سقط مني في السوق. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا علي، اذهب إلى الجزار، فقل له: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول لك: أرسل إلي بالدينار، ودرهمك علي". فأرسل به، فدفعه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إليه.
حسن: رواه أبو داود (1716) عن جعفر بن مسافر التنيسي، حدثنا ابن أبي فديك، حدثنا موسى بن يعقوب الزمعي، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد أخبره فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في موسى بن يعقوب، فضعفه ابن المديني والنسائي، ووثّقه ابن معين، وقال أبو داود:"صالح الحديث". وقال ابن عدي:"لا بأس به عندي". فمثله يحسن حديثه إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
وقد رويت هذه القصة من أوجه كثيرة، بعضها لا تصح. انظر مجمع الزوائد (3/ 169 - 170)، ولكن مجموعها تدل على أن له أصلا، أورد بعضها عبد الرزاق (10/ 140 - 142).
وقد اعترض على هذا الحديث بأنه أنفقه قبل التعريف.
فأجيب لعل ذلك لوقوع الاضطرار إليه، كما تدل عليه القصة، على أن صاحبه إن جاء يرد إليه، وهذا الذي حصل.
وقيل: إنه لم يشترط مضي سنة في قليل اللقطة.
وروي في هذه القصة عن عطاء بن يسار، عن علي بن أبي طالب أن النبي صلى الله عليه وسلم أمره أن يعرفه، فلم يعرف. وهو بعيد.
ذكر بعض هذه الوجوه البيهقي في السنن الكبرى (6/ 194)، ثم قال:"والأحاديث التي وردت في اشتراط التعريف سنة في جواز الأكل أصح وأكثر، فهي أولى".
সহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাঁদছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তারা কেন কাঁদছে? তিনি (ফাতিমা) বললেন: ক্ষুধার কারণে। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন এবং বাজারে একটি দীনার পেলেন। তিনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাকে জানালেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অমুক ইহুদির কাছে যান এবং আমাদের জন্য আটা নিয়ে আসুন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইহুদির কাছে গেলেন এবং দীনারটি দিয়ে আটা কিনলেন। তখন ইহুদি বলল: আপনি কি সেই ব্যক্তির জামাতা, যে নিজেকে আল্লাহর রাসূল বলে দাবি করে? তিনি বললেন: হ্যাঁ। ইহুদি বলল: আপনি আপনার দীনার ফেরত নিন এবং আটা আপনারই থাক। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আটা নিয়ে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলেন এবং তাকে জানালেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অমুক কসাইয়ের কাছে যান এবং এক দিরহামের বিনিময়ে গোশত নিয়ে আসুন। তিনি গেলেন এবং এক দিরহামের গোশতের বিনিময়ে দীনারটি বন্ধক রাখলেন। তিনি গোশত নিয়ে আসলেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খামির তৈরি করলেন, হাঁড়িতে চাপালেন এবং রুটি তৈরি করলেন। তারপর তিনি তাঁর পিতার কাছে লোক পাঠালেন। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে এলেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনাকে বিষয়টি জানাব। যদি আপনি এটি আমাদের জন্য হালাল মনে করেন, তবে আমরা খাব এবং আপনিও খাবেন। বিষয়টি এই এই হয়েছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আল্লাহর নামে খাও।” অতঃপর তারা তা থেকে খেলেন। তারা যখন সেখানে ছিলেন, তখন একজন বালক আল্লাহর এবং ইসলামের নামে দীনারটি খুঁজতে খুঁজতে এলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নির্দেশ দিলেন। তাকে ডেকে আনা হলো এবং তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন। সে বলল: এটা বাজারেই আমার কাছ থেকে পড়ে গিয়েছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “হে আলী! কসাইয়ের কাছে যাও এবং তাকে বলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আপনাকে বলছেন, দীনারটি আমার কাছে পাঠিয়ে দিন, আর আপনার দিরহাম আমার ওপর (দায়িত্ব রইল)।” সে (কসাই) দীনারটি পাঠিয়ে দিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দীনারটি সেই বালককে দিয়ে দিলেন।
5809 - عن زيد بن خالد الجهني أنه قال: جاء رجل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فسأله عن اللقطة، فقال:"اعرف عقاصها ووكاءها، ثم عرفها سنة، فإن جاء صاحبها، وإلا فشأنك بها". قال: فضالة الغنم يا رسول اللَّه؟ قال: هي لك، أو لأخيك، أو للذئب". قال: فضالة الإبل؟ قال: ما لك، ولها؟ معها سقاؤُها وحذاؤُها، ترد الماء، وتأكل الشجر حتى يلقاها ربها".
متفق عليه: رواه مالك في الأقضية (48) عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن يزيد مولى المنبعث، عن زيد بن خالد الجهني فذكره.
ورواه البخاري في المساقاة (2372)، ومسلم في اللقطة (1722) كلاهما من طريق مالك.
ورواه مسلم من وجه آخر عن سفيان الثوري، ومالك بن أنس، وعمرو بن الحارث، وغيرهم
أن ربيعة بن أبي عبد الرحمن حدثهم بهذا الإسناد مثل حديث مالك غير أنه زاد: قال أتى رجل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأنا معه، فسأله عن اللقطة. قال: وقال عمرو في الحديث:"فإذا لم يأت لها طالب فاستنفقها".
"والعِفاص" الوعاء الذي تكون فيه النفقة من جلد أو خرقة أو غير ذلك، ولهذا يسمى الجلد الذي تلبسه رأس القارورة العِفاص.
"والوكاء" الخيط الذي يشد به العِفاص.
وقوله:"معها سقاؤها وحذاؤها" أراد بالسقاء أنها إذا وردت الماء شربت منه ما يكون فيه ريها لظمئها، وهي أطول البهائم ظمأ لكثرة ما تحمل من الماء.
وأراد بالحذاء أخفافها، وأنها تقوى بها على السير، وقطع البلاد الشاسعة، وورود المياه النائية. انظر شرح السنة (8/ 210).
যায়েদ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে হারানো জিনিস (লুকতা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: "তুমি তার মুখবন্ধনী ও রশি (বাঁধনের চিহ্ন) চিনে রাখো, অতঃপর এক বছর পর্যন্ত তার ঘোষণা দিতে থাকো। যদি তার মালিক আসে, তবে (তাকে দিয়ে দাও)। অন্যথায়, এটি তোমার।" সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! হারানো বকরীর কী হবে? তিনি বললেন: "সেটা তোমার, অথবা তোমার (মুসলিম) ভাইয়ের, অথবা নেকড়ের জন্য।" সে বলল: হারানো উটের কী হবে? তিনি বললেন: "এর সাথে তোমার কী সম্পর্ক? তার কাছে রয়েছে তার পানির আধার এবং তার জুতো (শক্ত ক্ষুর)। সে নিজে পানি খুঁজে নেবে এবং গাছপালা খাবে, যতক্ষণ না তার মালিক তাকে পেয়ে যায়।"
5810 - عن زيد بن خالد الجهني صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن اللقطة الذهب أو الورق، فقال:"أعرف وكاءها وعفاصها، ثم عرفها سنة، فإن لم تعرف فاستنفقها، ولتكن وديعة عندك، فإن جاء طالبها يوما من الدهر فأدها إليه". وسأله عن ضالة الإبل، فقال:"ما لك ولها؟ دعها؛ فإن معها حذاءها وسقاءها، ترد الماء، وتأكل الشجر حتى يجدها ربها". وسأله عن الشاة، فقال:"خذها؛ فإنما هي لك، أو لأخيك، أو للذئب".
صحيح: رواه مسلم في اللقطة (1722: 5) عن عبد اللَّه بن مسلمة بن قعنب، حدثنا سليمان (يعني ابن بلال)، عن يحيى بن سعيد، عن يزيد مولى المنبعث، أنه سمع زيد بن خالد الجهني فذكره.
ورواه مسلم من حديث حماد بن سلمة، حدثني يحيى بن سعيد وربيعة الرأي بن أبي عبد الرحمن، عن يزيد مولى المنبعث، عن زيد بن خالد أن رجلا سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن ضالة الإبل. زاد ربيعة: فغضب حتى احمرت وجنتاه. واقتنص الحديث نحو حديثهم، وزاد:"فإن جاء صاحبها، فعرف عقاصها وعددها ووكاءها فأعطها إياه وإلا فهي لك".
যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সোনা বা রূপার (পাওয়া) বস্তু ('লুকতা' বা কুড়িয়ে পাওয়া জিনিস) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "তুমি তার বাঁধন (উকায়) এবং তার পাত্র/আবরণ (ইফাস) চিনে রাখো, এরপর এক বছর ধরে তার ঘোষণা দাও। যদি (মালিক) পরিচিত না হয়, তবে তুমি তা খরচ করো। আর তা তোমার কাছে আমানত হিসেবে থাকবে। যদি কোনো একদিন তার মালিক এসে যায়, তবে তুমি তা তাকে ফিরিয়ে দাও।" আর তাঁকে হারানো উট সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "এর সাথে তোমার কী সম্পর্ক? এটিকে ছেড়ে দাও। কেননা এর সাথে আছে এর পায়ের জুতো (শক্ত পায়ের তল) এবং এর মশক (পানি সংরক্ষণের ক্ষমতা)। এটি (নিজে নিজেই) পানি পান করবে এবং গাছ খাবে, যতক্ষণ না এর মালিক একে খুঁজে পায়।" আর তাঁকে (হারানো) ছাগল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "তুমি এটিকে ধরে নাও। কেননা এটি হয় তোমার জন্য, নয়তো তোমার ভাইয়ের (অন্য মুসলিমের) জন্য, নয়তো নেকড়ের জন্য।"
5811 - عن زيد بن خالد الجهني أن رجلا سأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن اللقطة، فقال:"عرفها سنة، ثم اعرف وكاءها وعناصها، ثم استنفق بها، فإن جاء ربها فأدها إليه". فقال: يا رسول اللَّه، فضالة الغنم؟ فقال:"خذها؛ فإنما هي لك، أو لأخيك، أو للذئب". قال: يا رسول اللَّه، فضالة الإبل؟ فغضب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى احمرت وجنتاه -أو احمر وجهه- وقال:"ما لك ولها؟ معها حذاؤها وسقاؤها حتى يأتيها ربها".
صحيح: رواه أبو داود (1704)، والترمذي (1373) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا إسماعيل بن جعفر، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن يزيد مولى المنبعث، عن زيد بن خالد الجهني فذكره.
قال أبو داود: حدثنا موسى بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن يحيى بن سعيد وربيعة بإسناد قتيبة ومعناه، وزاد فيه:"فإن جاء باغيها فعرف عقاصها وعددها فادفعها إليه". وقال حماد أيضًا: عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم مثله.
قال أبو داود: وهذه الزيادة التي زاد حماد بن سلمة في حديث سلمة بن كهيل ويحيى بن سعيد وعبيد اللَّه وربيعة:"إن جاء صاحبها فعرف عفاصها وراءها فدفعها إليه". ليست بمحفوظة:"فعرف عفاصها ووكاءها".
كذا قال أبو داود رحمه الله وهذه الزيادة ذكرها مسلم في صحيحه، كما مضى، وإن حماد ابن سلمة لم ينفرد بها، ولذا تعقبه المنذري، فقال:
"وهذه الزيادة قد أخرجها مسلم في صحيحه من حديث حماد بن سلمة، وقد أخرجه الترمذي والنسائي من حديث سفيان الثوري عن سلمة بن كهيل بهذه الزيادة، كما قدمنا، وذكر مسلم في صحيحه أن سفيان الثوري وزيد بن أبي أنيسة وحماد بن سلمة ذكروا هذه الزيادة، فقد تبين أن حماد ابن سلمة لم ينفرد بهذه الزيادة، فقد تابعه عليها. من ذكرناه". انتهى كلام المنذري.
وفي قوله من رواية حماد:"فإن جاء صاحبها فعرف عددها ووكاءها فادفعها إليه". دليل على أن صاحب اللقطة إذا جاء وعرف عناصها وعددها ندفع إليه اللقطة، ولا يطلب منه البينة على ذلك، وبه قال مالك، وأحمد. وقال ابن عبد البر:"والحديث حجة لهم".
وقال الشافعي:"إذا عرف الرجل العفاص والوكاء والعدد والوزن، ووقع في نفسه أنه صادق، فله أن يعطيه، ولا أجيزه إلا ببينة تقوم عليها، كما تقوم على الحقوق". انظر تفصيله في الأم (4/ 46).
قال الخطابي:"ظاهر الحديث يوجب دفعها إليه إذا أصاب الصفة، وهي فائدة قوله:"عفاصها ووكاءها". فإن صحت هذه اللفظة في رواية حماد، وهي قوله: فعرف عددها فادفعها إليه، كان ذلك أمرا لا يجوز خلافه، وإن لم يصح فالاحتياط مع من لم ير الرد إلا ببينة لقوله:"البينة على المدعي".
قلت: حديث حماد بن سلمة صحيح ثابت، كما تقدم، وأنه لم ينفرد بهذه الزيادة؛ فالأخذ بها واجب.
যায়েদ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাস্তায় কুড়িয়ে পাওয়া জিনিস (লুকাতাহ) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, “এক বছর পর্যন্ত এর পরিচিতি দাও (প্রচার করো)। এরপর এর বাঁধন ও পাত্রের মুখ চিনে নাও। অতঃপর তা ভোগ করো। যদি এর মালিক আসে, তবে তা তাকে দিয়ে দাও।”
সে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আর ছাগলের পাল যদি হারিয়ে যায়? তিনি বললেন, “তা নিয়ে নাও। কেননা তা তোমার, অথবা তোমার ভাইয়ের (অন্য মুসলিমের), অথবা নেকড়ের।”
সে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আর উট যদি হারিয়ে যায়? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এতই রাগান্বিত হলেন যে, তাঁর গাল দুটি লাল হয়ে গেল —অথবা তাঁর চেহারা লাল হয়ে গেল— এবং তিনি বললেন, “এতে তোমার কী আসে যায়? সেটির সঙ্গে তার জুতা (খুর) ও তার পানি রয়েছে। যতক্ষণ না তার মালিক আসে (ততক্ষণ সে চলতে পারবে)।”
5812 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه سئل عن الثمر المعلق، فقال:"من أصاب بفيه من ذي حاجة غير متخذ بنة فلا شيء عليه، ومن خرج بشيء منه فعليه غرامة مثليه والعقوبة، ومن سرق منه شيئًا بعد أن يؤويه الجرين، فبلغ ثمن المجن فعليه القطع". وذكر في ضالة الإبل والغنم كما ذكره غيره.
قال: وسئل عن اللقطة، فقال:"ما كان منها في طريق الميناء أو القرية الجامعة فعرفها سنة، فإن جاء طالبها فادفعها إليه، وإن لم يأت فهي لك، وما كان في الخراب يعني ففيها وفي الركاز الخمس".
حسن: رواه أبو داود (1710)، والترمذي (1288)، والنسائي (4958)، وابن ماجه (2596) كلهم عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن ابن عجلان، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد اللَّه بن عمرو بن العاص فذكر الحديث، إلا ابن ماجه فرواه من وجه آخر عن الوليد بن كثير، عن عمرو بن شعيب، واللفظ لأبي داود، وعند الآخرين مختصرا.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঝুলন্ত (গাছে থাকা) ফল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি অভাবগ্রস্ত হয়ে মুখ দিয়ে (খেয়ে নেয়) এবং তার আঁচলে ভরে নিয়ে যাওয়ার উদ্দেশ্য না থাকে, তার ওপর কোনো কিছু (দণ্ড) নেই। কিন্তু যে ব্যক্তি তা থেকে কিছু বের করে নিয়ে যায়, তার ওপর এর দ্বিগুণ জরিমানা ও শাস্তি রয়েছে। আর যে ব্যক্তি ফল মাড়াই করার স্থানে (শুকানোর জায়গায়) আশ্রয় নেওয়ার পর তা থেকে কিছু চুরি করে, আর তার মূল্য ঢালের মূল্যের সমপরিমাণ হয়, তবে তার হাত কাটা যাবে।" তিনি উট ও ছাগলের হারানো বস্তু সম্পর্কেও উল্লেখ করেছেন, যেমনটি অন্যরা উল্লেখ করেছেন। তিনি বললেন: তাঁকে লুক্তাহ (কুড়িয়ে পাওয়া বস্তু) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "যা বন্দরগামী পথে বা বড় জনপদের পথে পাওয়া যায়, তা এক বছর ধরে ঘোষণা করতে থাকবে। যদি তার দাবিদার আসে, তবে তা তাকে দিয়ে দাও। আর যদি না আসে, তবে তা তোমার। আর যা জনশূন্য স্থানে অর্থাৎ পরিত্যক্ত বা ধ্বংসপ্রাপ্ত স্থানে পাওয়া যায়, তাতে এবং রিকাজে (গুপ্তধনে) এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রযোজ্য হবে।"
5813 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: سمعت رجلا من مزينة يسأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: يا رسول اللَّه، جئت أسألك عن الضالة من الإبل. قال:"معها حذاؤها وسقاؤها، تأكل الشجر، وترد الماء، فدعها حتى يأتيها باغيها". قال: الضالة من الغنم؟ قال:"لك، أو لأخيك، أو للذئب، تجمعها حتى يأتيها باغيها". قال: الحريسة التي توجد في مراتعها؟ قال:"فيها ثمنها مرتين وضَرْبُ نكالٍ، وما أُخِذ من عطنه ففيه القطعُ إذا بلغ ما يؤخذ من ذلك ثمنَ المِجَنِّ". قال: يا رسول اللَّه، فالثمار، وما أخذ منها في أكمامها؟ قال:"من أخذ بفمه ولم يتخذ خَبْنة فليس عليه شيء، ومن احتمل فعليه ثمنه مرتين وضربا ونكالا، وما أخذ من أجرانه ففيه القطع إذا بلغ ما يؤخذ من ذلك ثمنَ المجنِّ". قال: يا رسول اللَّه، واللقطة نجدها في سبيل العامرة؟ قال:"عرِّفها حولا، فإن وجد باغيها فأدها إليه، وإلا فهي لك". قال: ما يوجد في الحرب العادي؟ قال:"فيه وفي الركاز الخمس".
حسن: رواه الإمام أحمد (6683) عن يعلى، حدثنا محمد بن إسحاق، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد توبع، كما سبق.
ومن طريقه رواه أيضًا البغوي في شرح السنة (2211).
وقوله:"الحريسة توجد في مراتعها"، وفي شرح السنة:"حريسة الجبل".
قال البغوي:"أراد بحريسة الجبل: البقر أو الشاة أو الإبل المأخوذة من المرعى، يقال: احترس الرجل إذا أخذ الشاة من المرعى. وإيجاب الثمن مرتين يشبه أن يكون على سبيل الوعيد والزجر، وإلا فالشيء المتلف لا يضمن أكثر من ثمن مثله، وكان عمر بن الخطاب يحكم به، وإليه ذهب أحمد بن حنبل، وقد قيل: كان في صدر الإسلام يقع بعض العقوبات في الأموال، ثم نسخ، واللَّه أعلم". انتهى.
كذا قال بالنسخ، ولم يبين الناسخ، مع أن عمر بن الخطاب، وبعده أحمد وإسحاق بن راهويه ذهبوا إلى مضاعفة العقوبة لمن أخذ الضوال، ولم يعرف بها، كما جاء في حديث أبي هريرة في الباب الآتي.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মুজায়না গোত্রের এক ব্যক্তিকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করতে শুনেছি। লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনার কাছে উটের ‘হারিয়ে যাওয়া বস্তু’ (হারাণো উট) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে এসেছি।
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “উটের সাথে তার খুর ও তার মশক (খাবার ও পানীয়ের ব্যবস্থা) আছে। সে গাছপালা খায় এবং জলাধারে যায়। সুতরাং তুমি তাকে ছেড়ে দাও, যতক্ষণ না তার মালিক তাকে খুঁজে পায়।”
লোকটি বলল: ছাগলের ‘হারিয়ে যাওয়া বস্তু’ (হারাণো ছাগল)?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সেটি তোমার জন্য, অথবা তোমার ভাইয়ের জন্য, অথবা নেকড়ের জন্য। তুমি সেগুলোকে একত্র করে রাখবে (সংরক্ষণ করবে) যতক্ষণ না তার মালিক আসে।”
লোকটি বলল: সেই চুরির বিধান কী যা চারণভূমিতে (পশুর বিশ্রামাগার থেকে) পাওয়া যায়?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাতে তার মূল্যের দ্বিগুণ জরিমানা এবং কঠোর শাস্তি রয়েছে। আর যা তার আস্তাবল থেকে নেওয়া হয়, তাতে হাত কাটার বিধান রয়েছে, যদি তা চুরি হওয়া বস্তুর মূল্য ঢালের মূল্যের সমপরিমাণ হয়।”
লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ফলমূলের হুকুম কী, আর যা তার মোচার ভেতর থেকে (কাঁচা অবস্থায়) নেওয়া হয়?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি মুখ দিয়ে খেল, আর তা আঁচল বা কাপড়ের ভাঁজে ভরে নিল না, তার ওপর কোনো কিছু (জরিমানা) নেই। আর যে ব্যক্তি তা উঠিয়ে নিল (চুরি করল), তার ওপর তার মূল্যের দ্বিগুণ জরিমানা এবং কঠোর শাস্তি রয়েছে। আর যা তার খামার থেকে নেওয়া হয়, তাতে হাত কাটার বিধান রয়েছে, যদি তা চুরি হওয়া বস্তুর মূল্য ঢালের মূল্যের সমপরিমাণ হয়।”
লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সাধারণ (জনাকীর্ণ) পথে পাওয়া ‘লুকতা’ (কুড়িয়ে পাওয়া জিনিস) এর হুকুম কী?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি এক বছর তার ঘোষণা দেবে। যদি তার মালিককে পাওয়া যায়, তাহলে তা তাকে দিয়ে দেবে, অন্যথায় তা তোমার।”
লোকটি বলল: প্রাচীন যুদ্ধে (ঐতিহ্যগত যুদ্ধে) যা পাওয়া যায় (এর হুকুম কী)?
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তাতে এবং রিকাযে (গুপ্তধনে) এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) আদায় করতে হবে।”
5814 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وسئل عن ضالة الغنم، فقال:"هي لك، أو لأخيك، أو للذئب". وسئل عن ضالة الإبل، فقال:"ما لك ولها؟ ومعها سقاؤها، أو سقاؤه وحذاؤه، دعه حتى يجد ربه".
حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1364) - عن محمد بن مسكين، ثنا سعيد بن أبي مريم، ثنا يحيى بن أيوب، عن ابن عجلان، عن القعقاع بن حكيم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.
قال البزار:"لا نعلمه عن القعقاع، عن أبي صالح إلا من حديث يحيى".
وقال الهيثمي في المجمع (4/ 167):"رواه البزار والطبراني في الأوسط، ورجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال إلا أن يحيى بن أيوب -وهو الغافقي- وإن كان من رجال الصحيح إلا أنه لا يرتقي إلى درجة ثقة، ولكنه حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হারানো ছাগল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: “তা তোমার জন্য, অথবা তোমার ভাইয়ের জন্য, অথবা নেকড়ের জন্য।” আর যখন তাঁকে হারানো উট সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো, তিনি বললেন: “তোমার সাথে তার কী সম্পর্ক? তার সাথে রয়েছে তার পানপাত্র (জল ধারণের ক্ষমতা) এবং তার জুতা (শক্ত খুর)। এটিকে ছেড়ে দাও, যতক্ষণ না তার মালিক তাকে খুঁজে পায়।”
5815 - عن وعن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ضالة الإبل المكتومة غرامتها، ومثلها معها".
حسن: رواه أبو داود (1718) عن مخلد بن خالد، حدثنا عبد الرزاق -وهو في مصنفه (18599) - أخبرنا معمر، عن عمرو بن مسلم، عن عكرمة، أحسبه عن أبي هريرة فذكره.
وأعله المنذري فقال:"لم يحزم عكرمة بسماعه من أبي هريرة فهو مرسل".
قلت: ولكن قوله: (أحسبه) يحمل على الظن الغالب أنه عن أبي هريرة، ومعنى الحديث يدل على ذلك أيضًا؛ لأن الصحابي لا يحق له أن يحكم على الغرامة مثلها.
ولكن آفته عمرو بن مسلم الجَندي -بفتح الجيم والنون-؛ فإنه مختلف فيه، فضعفه أحمد والنسائي، واختلف فيه قول ابن معين: فمرة قال:"لا بأس به". وأخرى:"ليس بالقوي".
وذكره ابن حبان في الثقات، وقال ابن عدي:"ليس له حديث منكر جدا". وقال الساجي:"صدوق يهم". فمثله يحسن حديثه.
قال الخطابي:"سبيل هذا الحديث سبيل ما تقدم ذكره من الوعيد الذي يراد به وقوع الفعل، وإنما هو زجر وردع، وكان عمر بن الخطاب يحكم به، وإليه ذهب أحمد بن حنبل. وأما عامة الفقهاء فعلى خلافه". انتهى.
قلت: وبه قال أيضًا الزهري وإسحاق بن راهويه، وهو اختيار شيخ الإسلام ابن تيمية بأن من كتم الإبل الضالة تضعف عليه غرامتها.
ويظهر من أحاديث سبق ذكرها أن أحكام اللقطة تختلف عن أحكام الضوال، فأباح الشارع في بعض صورة أخذ اللقطة، ومنع من أخذ الضوال، انظر للمزيد"المنة الكبرى"
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: গোপন করা পথভ্রষ্ট উটের জরিমানা হলো তার মূল্য এবং তার সাথে অনুরূপ আরও একটি মূল্য।
5816 - عن أبي هريرة قال: لما فتح اللَّه على رسوله مكة، فقام في الناس، فحمد اللَّه، وأثنى عليه، ثم قال:"ولا تحل ساقطتها إلا لمنشد".
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2434)، ومسلم في الحج (1355)، كلاهما من حديث الوليد بن مسلم، حدثنا الأوزاعيّ قال: حدثني يحيى بن أبي كثير قال: حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن قال: حدثني أبو هريرة فذكره في حديث طويل.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: যখন আল্লাহ তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য মক্কা বিজয় করলেন, তখন তিনি লোকদের মাঝে দাঁড়ালেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও গুণগান করলেন, এরপর বললেন: "আর তার (মক্কার) পড়ে থাকা জিনিস (হারানো বস্তু) তুলে নেওয়া হালাল হবে না, তবে কেবল সেই ব্যক্তির জন্য যে তা ঘোষণা করবে।"
5817 - عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوم فتح مكة:"إن هذا البلد حرمه اللَّه، لا يعضد شوكهـ، ولا ينفر صيده، ولا يلتقط لقطته إلا من عرفها".
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1587) ومسلم في الحج (1353) كلاهما من حديث جرير بن عبد الحميد، عن منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره. واللفظ للبخاري، وسياق مسلم أطول.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন বলেছেন: "নিশ্চয় এই শহরকে আল্লাহ সম্মানিত (হারাম) করেছেন। এর কাঁটা উপড়ানো হবে না, এর শিকারকে তাড়িয়ে দেওয়া হবে না, আর এর পড়ে থাকা বস্তু (লুকতা) তুলে নেওয়া হবে না, কেবল সেই ব্যক্তি ব্যতীত যে এর ঘোষণা করবে।"
5818 - عن عبد الرحمن بن عثمان التيمي أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن لقطة الحاج.
صحيح: رواه مسلم في اللقطة (1724) من طرق عن عبد اللَّه بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن بكير بن عبد اللَّه بن الأشج، عن يحيى بن عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن حاطب، عن عبد الرحمن بن عثمان فذكره.
قال ابن وهب: ولقطة الحاج يتركها حتى يجدها صاحبها. ذكره أبو داود (1719)، وابن حبان (4896).
ولكن لا مانع من التقاطها للحفظ بها في مكان مأمون معروف مثل مستودع الحكومة، ليرجع إليها الحاج فيجدها؛ وإنما النهي يقصد به التملك.
قال المنذري:"والصحيح: أنه إذا وجد لقطة في الحرم لم يجز له أن يأخذها إلا للحفاظ على صاحبها، وليعرفها أبدا بخلاف لقطة سائر البلاد، فإنه يجوز التقاطها للتملك. ومنهم من قال: إن حكم لقطة مكة حكم لقطة سائر البلاد". انتهى.
আবদুর রহমান ইবনে উসমান আত-তাইমী থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজীর হারানো বস্তু গ্রহণ করতে নিষেধ করেছেন।
5819 - عن أنس قال: مر النبي صلى الله عليه وسلم بتمرة في الطريق، قال:"لولا أني أخاف أن تكون من الصدقة لأكلتها".
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2431)، ومسلم في الزكاة (1071) كلاهما من حديث سفيان، عن منصور، عن طلحة بن مصرف، عن أنس بن مالك فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাস্তার মধ্যে একটি খেজুর দেখতে পেলেন। তিনি বললেন: "যদি আমি ভয় না করতাম যে এটা সাদকার (দানের) মাল হতে পারে, তাহলে আমি অবশ্যই এটা খেয়ে নিতাম।"
5820 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إني لأنقلب إلى أهلي، فأجد التمرة ساقطة على فراشي، فأرفعها لآكلها، ثم أخشى أن تكون من صدقة، فألقيها".
متفق عليه: رواه البخاري في اللقطة (2432)، ومسلم في الزكاة (1070: 163) كلاهما من حديث معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة فذكره.
وأما ما روي عن جابر بن عبد اللَّه قال: رخص لنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في العصا، والسوط، والحبل، وأشباهه، يلتقطه الرجل ينتفع به. فهو ضعيف.
رواه أبو داود (1717) عن سلمان بن عبد الرحمن الدمشقي، حدثنا محمد بن شعيب، عن المغيرة بن زياد، عن أبي الزبير المكي أنه حدثه عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
قال أبو داود:"رواه النعمان بن عبد السلام، عن المغيرة أبي سلمة بإسناده. ورواه شبابة عن مغيرة بن مسلم، عن أبي الزبير، عن جابر قال: كانوا. . . لم يذكر النبي صلى الله عليه وسلم". انتهى.
قال المنذري:"وفي إسناده المغيرة بن زياد، قد تكلم فيه غير واحد".
قلت: وهو كما قال؛ فإن المغيرة بن زياد البجلي أبو هشام ضعيف باتفاق أهل العلم، وقد خالفه المغيرة بن مسلم أبو سلمة القسملي، فرواه عن أبي الزبير موقوفا، وهو أحسن حالا منه.
قال البيهقي (6/ 195):"في رفع هذا الحديث شك، وفي إسناده ضعف".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘আমি আমার পরিবারের নিকট প্রত্যাবর্তন করে আমার বিছানার উপর একটি খেজুর পড়ে থাকতে দেখি। আমি সেটা তুলে খাওয়ার জন্য নিই, অতঃপর আমার আশঙ্কা হয় যে, তা সাদাকার (দানকৃত মালের) হতে পারে। তাই আমি সেটা ফেলে দিই।’
5821 - عن زيد بن خالد الجهني، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من آوى ضالة فهو ضال ما لم يعرفها".
صحيح: رواه مسلم في اللقطة (1725) من طرق عن عبد اللَّه بن وهب قال: أخبرني عمرو بن الحارث، عن بكر بن سوادة، عن أبي سالم الجيشاني، عن زيد بن خالد الجهني فذكره.
যায়দ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো হারানো জিনিস আশ্রয় দেয় (বা নিজের কাছে রেখে দেয়), সে পথভ্রষ্ট, যতক্ষণ না সে সেটির পরিচয় তুলে ধরে (বা ঘোষণা দেয়)।"
5822 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يحلُبن أحد ماشية امرئ بغير إذنه، أيحب أحدكم أن تؤتى مشربتُه، فتكسر خزانتُه، فينتقل طعامه؟ فإنما تخزن لهم ضروعُ مواشيهم أطعمتَهم، فلا يحلُبن أحد ماشية أحد إلا بإذنه".
متفق عليه: رواه مالك في الاستئذان (17) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه البخاري في اللقطة (2435)، ومسلم في اللقطة (1726) كلاهما من حديث مالك به مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেউ যেন কারো অনুমতি ছাড়া অন্যের গবাদিপশুর দুধ দোহন না করে। তোমাদের মধ্যে কি কেউ পছন্দ করে যে, তার ভাণ্ডারে (খাদ্য মজুতের স্থানে) আসা হবে, অতঃপর তার ভাঁড়ারঘর ভেঙে দেওয়া হবে এবং তার খাবার স্থানান্তরিত করা হবে? কারণ তাদের পশুর স্তনগুলো তাদের জন্য খাদ্য সঞ্চয় করে রাখে। সুতরাং কেউ যেন কারো অনুমতি ছাড়া অন্যের গবাদিপশুর দুধ দোহন না করে।"
5823 - عن عبد اللَّه بن الشخير قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ضالة المسلم حرق النّار".
صحيح: رواه ابن ماجه (2502)، وأحمد (16314)، وابن حبان (4888)، والبيهقي (6/ 191)، والبغوي في شرحه (2209) كلهم من حديث يحيى بن سعيد، عن حميد الطويل، عن الحسن، عن مطرف بن عبد اللَّه بن الشخير، عن أبيه فذكره.
وإسناده صحيح. والحسن هو البصري الإمام المعروف، وكان مدلسا، إلا أن إخراج ابن حبان في صحيحه مشعر بأنه لم يدلس فيه، وقد تابعه قتادة، عن مطرف به. رواه أبو نعيم في الحلية (9/ 33).
وقوله:"حرق النّار" أي سبب دخوله في النّار إذا تملكها، ولم يعرف بها.
আবদুল্লাহ ইবনুশ শিখখীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুসলিমের হারানো জিনিস জাহান্নামের জ্বালানি।
5824 - عن الجارود العبدي قال: بينما نحن مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره، وفي الظهر قلة، إذ تذاكر القوم الظهر، فقلت: يا رسول اللَّه، قد علمت ما يكفينا من الظهر، فقال:"وما يكفينا؟". قلت: ذود نأتي عليهن في جرف، فنستمتع بظهورهم. قال:"لا، ضالة المسلم حرق النّار، فلا تقربَنَّها. ضالة المسلم حرق النّار، فلا تقربَنَّها. ضالة المسلم حرق النّار، فلا تقربَنَّها".
وقال في اللقطة:"الضالة تجدها فانشدنَّها، ولا تكتم، ولا تُغيب، فإن عُرفتْ فأدها، وإلا فمال اللَّه يؤتيه من يشاء".
حسن: رواه أحمد (20754) عن إسماعيل، أخبرنا سعيد الجريري، عن أبي العلاء بن الشخير، عن مطرف، قال: حديثان بلغاني عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد عرفت أن قد صدَّقتهما، لا أدري أيهما قبل صاحبه؟ حدثنا أبو مسلم الجذمي جذيمة عبد القيس، حدثنا الجارود فذكره.
ورواه أيضًا الطبراني في الكبير (2/ 298)، والدارمي (2643، 2644)، وابن حبان (4887)، والبيهقي (6/ 190) كلهم من طرق عن أبي مسلم الجذمي، عن الجارود مختصرا.
وأبو مسلم الجذمي ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 581)، ولم يذكر في"التهذيب" (12/ 235) توثيق أحد له، ولكنه ذكر عددا رووه عنه، فهو"مقبول" كما في"التقريب" أي عند المتابعة.
وقد توبع. أخرجه ابن قانع في معجمه (164)، والطبراني (5/ 581) كلاهما من طريق أبي كامل الجحدري، حدثنا أبو معشر البراء، حدثنا المثنى بن سعيد، عن قتادة، عن عبد اللَّه بن باباه، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص قال: أخبرني الجارود فذكره مختصرا.
وهي متابعة قوية إلا أن الدارقطني يرى أن أبا البراء وهم فيه، وقول الجريري أشبه."العلل" (14/ 6).
ورواه عبد الرزاق (18603)، وعنه أحمد (20755)، والطبراني (2/ 296)، والبيهقي (6/ 191) عن سفيان، عن خالد الحذاء، عن يزيد بن عبد اللَّه بن الشخير، عن مطرف بن الشخير، عن الجارود العبدي يرفعه مختصرا.
قال البيهقي:"وقد قيل عنه عن مطرف، عن أبي مسلم، عن الجارود. وقد قيل: عن مطرف ابن عبد اللَّه بن الشخير، عن أبيه". انتهى.
ورواه عبد الرزاق بأسانيد أخرى أيضًا، وبالجملة فالحديث بمجموع طرقه يكون حسنا.
وقول مطرف:"الحديثان بلغاني. . ." يرى أن أحدهما ناسخا للآخر، ولكنه لم يدر أيهما قبل، والذي يظهر لي أنه ليس بينهما تناقض حتى نحتاج إلى النسخ، فقول النبي صلى الله عليه وسلم:"ضالة المسلم حرق". إذا تملكها، ولم يقم بالتعريف بها، كما جاء في الأحاديث الأخرى. فإذا عرفها ولم يجد صاحبها ومضى عليها عام كما في الأحاديث الصحيحة فهو مال اللَّه يؤتيه من يشاء.
وقيل معناه: الحيوان الممتنع أخذه كالإبل كما تقدم. واللَّه تعالى أعلم.
জারুদ আল-আবদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদা আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর কোনো এক সফরে ছিলাম। তখন বাহন পশুর (উটের) সংখ্যা ছিল কম, যখন লোকেরা বাহন পশু সম্পর্কে আলোচনা করছিল। তখন আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! বাহন পশুর মধ্যে যা আমাদের জন্য যথেষ্ট হবে, তা তো আমি জানি। তিনি বললেন: "আর কী আমাদের জন্য যথেষ্ট হবে?" আমি বললাম: এক পাল উট, যা আমরা কোনো বালুকাময় বা উঁচু জমিতে পাব এবং সেগুলোর পিঠ ব্যবহার করে আনন্দ লাভ করব (অর্থাৎ, কুড়িয়ে নেব)। তিনি বললেন: "না। মুসলিমের হারানো বস্তু হলো আগুনের সম্পদ (বা আগুনের জ্বালানি)। সুতরাং তোমরা তার (কাছেও) যেও না। মুসলিমের হারানো বস্তু হলো আগুনের সম্পদ। সুতরাং তোমরা তার (কাছেও) যেও না। মুসলিমের হারানো বস্তু হলো আগুনের সম্পদ। সুতরাং তোমরা তার (কাছেও) যেও না।"
আর হারানো বস্তু (লুকতা) সম্পর্কে তিনি বললেন: "তুমি হারানো জিনিস খুঁজে পেলে তা ঘোষণা করো, গোপন করো না এবং লুকিয়ে রেখো না। যদি সেটির মালিক পরিচিত হয়, তবে তাকে তা ফিরিয়ে দাও। আর যদি না হয়, তবে তা আল্লাহর মাল। তিনি যাকে ইচ্ছা তা দেন।"
5825 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سئل عن اللقطة، فقال:"تُعرف، ولا تُغيب، ولا تكتم، فإن جاء صاحبها، وإلا فهو مال اللَّه يؤتيه من يشاء".
صحيح: رواه البزار -كشف الأستار (1367) - عن محمد بن معمر، ثنا الحجاج، ثنا حماد (يعني ابن سلمة)، عن سعيد الجريري، عن أبي العلاء، عن مطرف، عن أبي هريرة فذكره.
قال البزار:"لا نعلم أسند مطرف عن أبي هريرة إلا هذا".
وأبو العلاء هو يزيد بن عبد اللَّه بن الشخير، ومطرف ثقة من رجال الجماعة.
قال الهيثمي في المجمع (4/ 167):"رجاله رجال الصحيح".
وفي الباب ما روي عن المنذر بن جرير قال: كنت مع جرير (ابن عبد اللَّه) بالبوازيج، فجاءه الراعي بالبقرة، وفيها بقرة ليست منها، فقال له جرير: ما هذه؟ قال: لحقت بالبقر لا ندري لمن هي؟ . فقال جرير: أخرجوها؛ فقد سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يأوي الضالة إلا ضال".
رواه أبو داود (1720) عن عمرو بن عون، أخبرنا خالد بن عبد اللَّه، عن أبي حيان التيمي، عن المنذر ابن جرير فذكره.
واختلف على أبي حيان، وهو يحيى بن سعيد بن حيان التيمي، ثقة من رجال الجماعة. فرواه خالد بن عبد اللَّه الواسطي عنه هكذا.
ورواه يحيى بن سعيد عنه قال: حدثنا الضحاك خال المنذر بن جرير، عن المنذر بن جرير. ومن طريقه رواه ابن ماجه (2503).
وكذلك رواه يعلى بن عبيد الطنافسي عنه، عن الضحاك بن المنذر. وهو عند الطحاوي في مشكله (4719)، والإمام أحمد (19184) عن يحيى بن زكريا (وهو أبي زائدة)، عن أبي حيان، عن الضحاك بن المنذر مختصرا.
والضحاك بن المنذر، ويقال: الضحاك بن جرير بن عبد اللَّه، لم يرو عنه غير أبي حيان. قال ابن المديني:"الضحاك لا يعرفونه".
ولكن تابعه أبو زرعة عمرو بن جرير، عن المنذر بن جرير. رواه النسائي في الكبرى (5799) من حديث إبراهيم بن عيينة، عن أبي حيان، عن أبي زرعة عمرو بن جرير.
ورواه شعبة، عن أبي حيان، عن رجل، عن المنذر بن جرير، عن جرير. وهو في السنن الكبرى للنسائي.
ورواه روح بن القاسم، عن أبي حيان، عن الضحاك بن المنذر، عن رجل، عن جرير. رواه الطبراني في الأوسط (1403).
ذكره المزي في"تهذيب الكمال" في ترجمة الضحاك بن المنذر بعض هذه الوجوه، وقال:"الاضطراب فيه من أبي حيان التيمي". انتهى
"والبوازيج" بلد قريب من دجلة.
وقوله:"لا يأوي" أي لا يخلطها بماله.
نعم. فقال عمر بن الخطاب:"اذهب فهو حر، ولك ولاؤه، وعلينا نفقته".
رواه مالك في الأقضية (21) عن ابن شهاب، عن سنين أبي جميلة فذكره.
ومن طريقه رواه البيهقي في السنن الكبرى (6/ 201 - 202)، والصغرى (2234) بتحقيقي.
وإسناده صحيح إلا أنه موقوف على عمر، وذكره البخاري (5/ 274) تعليقا بالجزم، فقال:"وقال أبو جميلة: وجدت منبوذا، فلما رآني عمر قال:"عسى الغوير أبؤسا". كأنه يتهمني. قال عَريفي: إنه رجل صالح. قال: كذلك، اذهب وعلينا نفقته". انتهى
وقوله:"عسى الغوير أبؤسا". الغوير تصغير غار، وأبؤسا جمع بؤس، وهو الشدة. وهو مثل قديم يقال عند التهمة، ومعناه ربما جاء الشر من معدن الخير، أراد عمر بقوله هذا: لعلك زنيت بأمه، وادعيته لقيطا.
قلت: لا خلاف بين أهل العلم بأن اللقيط يكون حرا. ونقل ابن المنذر الإجماع على ذلك."الإجماع" (570).
وأما قول عمر"ولاؤه لك" فلم يقل أحد -فيما أعلم- بظاهر".
قال مالك عقب رواية الأثر: الأمر عندنا في المنبوذ أنه حر، وأن ولاءه للمسلمين، هم يرثونه، ويعقلون عنه.
وقال البيهقي في"الصغرى":"ويحتمل أن يكون المراد بقوله:"ولاؤه لك" ولاء الإسلام، لا ولاء العتاق".
وقال ابن عبد البر:"ذهب مالك والشافعي وجماعة من أهل الحجاز أن اللقيط حر، لا ولاء لأحد عليه".
وقال:"وتأولوا قول عمر:"لك ولاؤه" أي لك أن تليه، وتقبض عطاءه، وتكون أولى الناس بأمره حتى يبلغ رشده، ويحسن النظر لنفسه، فإن مات كان ميراثه لجماعة المسلمين، وعقله عليهم". انتهى. الاستذكار (22/ 157 - 158).
واللقيط في الغالب يستعمل في الطفل المفقود المطروح على الأرض فرارا من تهمة الزنا، أو لسبب غير معلوم. والملتقط له الحق في إمساك اللقيط إلا إن خاف على نفسه من تهمة السرقة، فيرفع أمره إلى الحاكم، ويستأذن منه للإمساك إن شاء، أو يرده إلى دار التربية.
وأما نسب اللقيط فيكون مجهولا إلا إذا ادعى أحد فتقبل دعوته بدون بينة؛ لما فيه من الشرف والكرم يعود على اللقيط، إلا أن يكون المدعي أكثر من واحد، فيطلب من كل واحد بينة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লুকতা (পাওয়া বস্তু) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো। তিনি বললেন: "তা পরিচিত করা হবে, লুকিয়ে রাখা হবে না এবং গোপন করা হবে না। এরপর যদি তার মালিক আসে (তবে তাকে দিয়ে দেওয়া হবে), অন্যথায় তা আল্লাহর মাল, তিনি যাকে ইচ্ছা তাকে তা দান করেন।"
[অন্য এক বর্ণনায়] মুনযির ইবনু জারীর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জারীর ইবনু আবদুল্লাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে আল-বাওয়াযীজে ছিলাম। তখন রাখাল তার কাছে একটি গরু নিয়ে এলো, যার মধ্যে এমন একটি গরু ছিল যা তাদের পালের ছিল না। জারীর তাকে জিজ্ঞেস করলেন: এটা কী? রাখাল বলল: এটা গরুর পালের সাথে মিশে গেছে, আমরা জানি না এটি কার? তখন জারীর বললেন: এটিকে বের করে দাও; কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "পথভ্রষ্ট ব্যক্তি ছাড়া অন্য কেউ হারানো বস্তুকে (নিজের মালের সাথে) আশ্রয় দেয় না।"
[অন্য প্রসঙ্গে] উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) [প্রাপ্ত নবজাতক সম্পর্কে] বললেন: "যাও, সে স্বাধীন। তার অভিভাবকত্ব তোমার জন্য, আর তার খরচ বহন করা আমাদের দায়িত্ব।"
5826 - عن * *
৫৮২৬ - থেকে বর্ণিত * *
5827 - عن عائشة قالت لعروة: يا ابن أختي، إن كنا لننظر إلى الهلال، ثم الهلال، ثلاثة أهلة في شهرين، وما أُوقِدت في أبيات رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نار. فقلت: يا خالة، ما كان يُعيشكم؟ قالت: الأسودان: التمر والماء، إلا أنه قد كان لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جيران من الأنصار كانت لهم منائح، وكانوا يمنحون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من ألبانهم فيسقينا.
متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2567)، ومسلم في الزهد (2972) كلاهما من حديث عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উরওয়াকে বললেন, "হে আমার বোনের ছেলে, আমরা চাঁদ দেখতাম, তারপর আবার চাঁদ দেখতাম—দুই মাসে তিনটি চাঁদ (উদিত হতে) দেখতাম, অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘরসমূহে আগুন জ্বালানো হতো না।" (উরওয়া বলেন) আমি বললাম, 'খালা, কীসে আপনাদের জীবন ধারণ হতো?' তিনি বললেন, 'দুই কালো জিনিস: খেজুর ও পানি। তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আনসারদের মধ্য থেকে এমন প্রতিবেশীরা ছিলেন, যাদের দুগ্ধবতী পশু ছিল; আর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাদের দুধ থেকে কিছু দান করতেন, ফলে তিনি আমাদের তা পান করাতেন।"
