আল-জামি` আল-কামিল
5941 - عن أسامة بن زيد أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يرث المسلم الكافر، ولا الكافر المسلم".
متفق عليه: رواه البخاري في الفرائض (6764) من طريق ابن جريج، ومسلم في الفرائض (1614) من حديث ابن عيينة، كلاهما عن ابن شهاب، عن علي بن حسين، عن عمرو بن عثمان، عن أسامة بن زيد فذكره.
وعمرو بن عثمان هو ابن الخليفة عثمان بن عفان ورواه مالك في الفرائض (10) عن ابن شهاب، عن علي بن حسين بن علي، عن عمر بن عثمان بن عفان، عن أسامة بن زيد أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يرث المسلم الكافر".
قلت: اقتصر مالك على قوله:"لا يرث المسلم الكافر" فيرى ابن عبد البر أن مالكا اقتصر على موضع الفقه الذي فيه التنازع، وعزف عن غيره، فلم يقل:"ولا الكافر المسلم"؛ لأن الكافر لا يرث المسلم بإجماع المسلمين، فلم يحتج إلى هذه اللفظة مالك. الاستذكار (15/ 490).
قلت: لعل هذا التصرف من يحيى الراوي عن مالك، وإلا فقد رواه الشافعي في الأم (4/ 72) عنه، فذكر الجزأين من الحديث. فالظاهر أن الاقتصار ليس من مالك.
وكذلك قال فيه: عن عمرو بن عثمان بن عفان.
في نسخة يحيى: عمر بن عثمان بن عفان. فقال ابن عبد البر:"ممن قال في هذا الحديث:"عمرو ابن عثمان" معمر وابن عيينة وابن جريج وعقل وشعيب والأوزاعي، وهؤلاء الجماعة أئمة حفاظ، وهم أولي أن يُسَلَّم لهم ويُصَوَّب قولهم، ومالك حافظ الدنيا، ولكن الغلط لا يسلم منه أحد".
ولكن الظاهر من روايات أخرى عن مالك أنه"عمرو بن عثمان". هكذا ذكره الشافعي، وأبو مصعب، وابن وهب، ومعن، وابن القاسم، ويحيى بن يحيى الأندلسي، كما في مسند الموطأ للجوهري (ص 200).
فيبدو أن مالكا كان يرى أولا أنه عمر بن عثمان، فقد قال يونس: قيل لمالك: عمرو. فقال:"هو عمر، ونحن أعلم به، وهذا منزله". ذكره الجوهري في مسند الموطأ، ولكن لما نبه إلى أنه عمرو بن عثمان، رجع إلى ذلك، فهؤلاء الذين سبق ذكرهم قالوا في روايته عنه:"عمرو بن عثمان". وهو الصحيح.
উসামা ইবনে যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘মুসলিম কাফেরের উত্তরাধিকারী হবে না, আর কাফেরও মুসলিমের উত্তরাধিকারী হবে না।’
5942 - عن أسامة بن زيد أنه قال: يا رسول اللَّه، أين تنزل في دارك بمكة؟ فقال:"هل ترك عقيل من رباع أو دور؟". وكان عقيل ورث أبا طالب هو وطالب، ولم برئه جعفر ولا علي شيئًا؛ لأنهما كانا مسلمين، وكان عقيل وطالب كافرين.
فكان عمر بن الخطاب يقول:"لا يرث المؤمن الكافر".
قال ابن شهاب: وكانوا يتأولون قول اللَّه تعالى: {إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ آوَوْا وَنَصَرُوا أُولَئِكَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ} [سورة الأنفال: 72].
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1588)، ومسلم في الحج (1351) كلاهما من حديث ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، عن علي بن حسين، عن عمرو بن عثمان، عن أسامة بن زيد فذكره.
أبو طالب بن عبد المطلب وُلِد له أربعة أولاد، وهم علي بن أبي طالب، وجعفر بن أبي طالب، وعقيل بن أبي طالب، وطالب بن أبي طالب، فآمن منهم ثلاثة، وهم علي، وجعفر، وعقيل، ولم يؤمن طالب، وقد استكرهه قريش على الخروج إلى غزوة بدر، يقال: إنه مات، ولا عقب له، ولا يعرف عنه شيء أكثر من هذا. انظر تاريخ دمشق (41/ 8).
والعمل عند عامة أهل العلم من الصحابة والتابعين فمن بعدهم أن الكافر لا يرث المسلم، والمسلم لا يرث الكافر لقطع الولاية بينهما، إلا ما روي عن معاذ بإسناد ضعيف، وهو الآتي.
حدثنا عبد اللَّه بن بريدة. وفي قوله:"أن رجلا حدثه أن معاذا حدثه" فيه رجل لم يسم.
ورواه أيضًا (2913) عن مسدد، حدثنا يحيى بن سعيد، عن شعبة، عن عمرو بن أبي حكيم، عن عبد اللَّه بن بريدة، عن يحيى بن يعمر، عن أبي الأسود الديلي أن معاذا أتى بميراث يهودي وارثه مسلم بمعناه عن النبي صلى الله عليه وسلم.
وفيه انقطاع؛ فإن أبا الأسود لم يسمع من معاذ.
উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি মক্কায় আপনার বাড়িতে কোথায় অবস্থান করবেন? তিনি বললেন: আকীল কি কোনো জমি বা বাড়ি অবশিষ্ট রেখেছে?
আকীল এবং তালিব আবূ তালিবের উত্তরাধিকারী হয়েছিল। কিন্তু জা‘ফর ও আলী তাঁর (সম্পত্তির) অংশ পাননি, কেননা তারা দু’জন ছিলেন মুসলিম, আর আকীল ও তালিব ছিল কাফির।
এই কারণে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: মুসলিম ব্যক্তি কাফিরের উত্তরাধিকারী হতে পারে না।
ইবনু শিহাব বলেন, তাঁরা আল্লাহর এই বাণী দ্বারা এই বিধানের ব্যাখ্যা করতেন: “নিশ্চয় যারা ঈমান এনেছে, হিজরত করেছে এবং নিজেদের সম্পদ ও জীবন দ্বারা আল্লাহর পথে জিহাদ করেছে এবং যারা আশ্রয় দিয়েছে ও সাহায্য করেছে, তারা পরস্পর পরস্পরের অভিভাবক।” [সূরা আল-আনফাল: ৭২]
সাহাবী, তাবিঈন এবং পরবর্তী যুগের সাধারণ আলিমদের আমল হলো—কাফির মুসলিমের উত্তরাধিকারী হবে না এবং মুসলিমও কাফিরের উত্তরাধিকারী হবে না; কেননা তাদের মধ্যে অভিভাবকত্ব ছিন্ন হয়ে যায়।
[এরপর বর্ণনাকারী মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কিত একটি দুর্বল সূত্র উল্লেখ করেছেন, যেখানে তিনি একজন ইহুদীর উত্তরাধিকারী হওয়া মুসলিম ব্যক্তির প্রসঙ্গে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে একটি অনুরূপ বর্ণনা এনেছেন।]
5943 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد اللَّه بن عمرو قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يتوارث أهل ملتين شتى".
حسن: رواه أبو داود (2911) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن حبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب بإسناده.
ورواه الإمام أحمد (6664)، والبيهقي (6/ 218) كلاهما من حديث سفيان، عن يعقوب بن عطاء وغيره، عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله.
ويعقوب بن عطاء هو ابن أبي رباح المكي، ضعَّفه ابن معين وأبو زرعة والنسائي. وقال أحمد:"منكر الحديث". إلا أنه لم ينفرد به، فقد تابعه غيره، كما قال أحمد في الإسناد المذكور، وهو كما قال؛ فقد رواه أبو داود عن حبيب المعلم، عن عمرو. ورواه ابن ماجه (2731) عن محمد بن رمح قال: أنبأنا ابن لهيعة، عن خالد بن زيد، أن المثنى بن الصباح أخبره عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله. وابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أنه توبع هنا.
والخلاصة أن إسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
وأما ما روي عن عمرو بن شعيب قال: أخبرني أبي، عن جدي عبد اللَّه بن عمرو أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قام يوم فتح مكة، فقال:"لا يتوارث أهل ملتين، والمرأة ترث من دية زوجها وماله، وهو يرث من ديتها ومالها ما لم يقتل أحدهما صاحبه عمدا، فإن قتل أحدهما صاحبه عمدا لم ترث من ديته وماله شيئًا، وإن قتل صاحبه خطأ ورث من ماله، ولم ترث من ديته" فهو ضعيف.
رواه الدارقطني (4/ 72 - 73) عن محمد بن جعفر المطيري، نا إسماعيل بن عبد اللَّه بن ميمون، نا عبيد اللَّه بن موسى، نا حسن بن صالح، عن محمد بن سعيد، عن عمرو بن شعيب، أخبرني أبي، عن جدي عبد اللَّه بن عمرو أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قام فذكره.
وقال: محمد بن سعيد الطائفي ثقة.
ولكن رواه ابن ماجه (2736) عن علي بن محمد، ومحمد بن يحيى قالا: حدثنا عبيد اللَّه بن موسى، عن الحسن بن صالح، عن محمد بن سعيد. وقال محمد بن يحيى: عن عمر بن سعيد،
عن عمرو بن شعيب بإسناده.
ورواه أيضًا ابن الجارود (967) عن محمد بن يحيى قال: حدثنا عبيد اللَّه بن موسى قال: أنا الحسن بن صالح، عن عمر بن سعيد، عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله. وكذا رواه أيضًا الدارقطني عقب الرواية الأولى، ولكنه حذف الإسناد بعد الحسن بن صالح، فقال: بإسناده مثله. أي عن محمد بن سعيد، عن عمرو بن شعيب.
وقال:"ومحمد بن سعيد الطائفي ثقة".
فهل محمد بن سعيد هو عمر بن سعيد نفسه، أو هما رجلان؟
فمن ذهب إلى أنهما واحد ضعفوا هذا الإسناد، وقالوا: محمد بن سعيد هو ابن حسان بن قيس الأسدي الشامي المصلوب كذبوه؛ فإن من رواته الحسن بن صالح بن حيي.
ومن ذهب إلى أنهما اثنان فقالوا: محمد بن سعيد هو الطائفي، وثّقه الدارقطني، وقال غيره: حسن الحديث. ولكن لم يذكر المزي من الرواة عنه الحسن بن صالح، ولا في شيوخه عمرو بن شعيب.
والذي يغلب على الظن أنه المصلوب.
ولذا قال الذهبي:"هذا خبر منكر". انظر"التنقيح" له (7/ 69).
وكذا ضعَّفه أبو محمد بن حزم في كتاب الفرائض له، كما قال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 259).
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুই ভিন্ন ধর্মের অনুসারীরা একে অপরের উত্তরাধিকারী হবে না।"
5944 - عن عائشة قالت: وجدت في قائم سيف رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كتابا:"إن أشد الناس عتوا من ضرب غير ضاربه، ورجل قتل غير قاتله، ورجل تولى غير أهل نعمته، فمن فعل ذلك فقد كفر باللَّه ورسوله، لا يقبل اللَّه منه صرفا ولا عدلا، وفي الأجر المؤمنون تكافأ دماؤهم، ويسعى بذمتهم أدناهم. لا يقتل مسلم بكافر، ولا ذو عهد في عهده، ولا يتوارث أهل ملتين، ولا تنكح المرأة على عمتها ولا على خالتها، ولا صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، ولا تسافر امرأة ثلاث ليال مع غير ذي محرم".
حسن: رواه أبو يعلى (4757) عن أبي خيثمة، حدثنا عبيد اللَّه بن عبد المجيد، حدثنا عبد اللَّه ابن عبد الرحمن بن موهب، قال: سمعت مالك بن محمد بن عبد الرحمن، قال: سمعت عمرة بنت عبد الرحمن، تحدث عن عائشة، فذكرته.
ورواه أيضًا الدارقطني (3/ 131)، والبيهقي (8/ 29 - 30) كلاهما من حديث عبد اللَّه بن عبد المجيد فذكره.
وإسناده حسن من أجل مالك بن محمد أبي رجال، سئل الدارقطني عنه، فقال: صالح."سؤالات البرقاني" (498)، وهو أخو حارثة بن أبي الرجال، وعبد الرحمن بن أبي الرجال
وإخوانه اشتهروا بكنية أبيهم.
قال أبو حاتم: مالك أحسن حالا من إخوته.
وذكره ابن حبان في الثقات (9/ 164)، وهو من رجال"التعجيل".
وعبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن موهب مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وفي الباب عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يتوارث أهل ملتين".
رواه الترمذي (2108) عن حميد بن مسعدة، حدثنا حصين بن نمير، عن ابن أبي ليلى، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب، لا نعرفه من حديث جابر إلا من حديث ابن أبي ليلى".
قلت: ليس كما قال الترمذي، بل رواه أيضًا ابن جريج عن أبي الزبير، وبإسناده رواه الدارقطني (4/ 74)، والحاكم (4/ 345) من حديث محمد بن عمرو عنه، ولفظه:"لا يرث المسلم النصراني إلا أن يكون عبده وأمته".
قال الحاكم:"محمد بن عمرو هذا هو اليافعي من أهل مصر، صدوق، والحديث صحيح؛ فإن الأصل فيه حديث عمرو بن شعيب".
ولكن محمد بن عمرو اليافعي وصف بأنه صدوق له أوهام، وقد خالف عبد الرزاق الذي رواه عن ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير، عن جابر فذكره موقوفا عليه. رواه الدارقطني من طريقه، وقال:"هو المحفوظ".
وفي الباب أيضًا عن ابن عمر مرفوعا:"لا يتوارث أهل ملتين". رواه ابن حبان في سياق طويل (5996)، وفيه سنان بن الحارث بن مصرف، ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (4/ 254)، ولم يقل فيه شيئًا. وذكره ابن حبان في الثقات (6/ 424).
وذهب جماعة إلى هذه الأحاديث، فقالوا: إن اختلاف المال في الكفر يمنع التوارث، فلا يرث اليهودي النصراني، ولا النصراني المجوسي. يروى ذلك عن عمر، وهو قول الزهري، والأوزاعي، وابن أبي ليلى، وأحمد، وإسحاق. واحتجوا بحديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، وغيره كما مضى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তলোয়ারের হাতলে একটি লেখা পেলাম: "নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সীমালঙ্ঘনকারী (হতভাগ্য) হলো সেই ব্যক্তি, যে তার আঘাতকারীর পরিবর্তে অন্য কাউকে আঘাত করে; আর সেই ব্যক্তি, যে তার হত্যাকারীর পরিবর্তে অন্য কাউকে হত্যা করে; আর সেই ব্যক্তি, যে তার অনুগ্রহের পাত্র নয়, তাকে আপন করে নেয়। যে ব্যক্তি এসব কাজ করে, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি কুফরী করে। আল্লাহ তার কাছ থেকে কোনো নফল ইবাদত বা ফরয ইবাদত কবুল করবেন না। আর (ইহকালের) প্রতিদান হলো, মুমিনদের রক্ত একই সমমানের, এবং তাদের মধ্যে নিম্নপদস্থ ব্যক্তিও তাদের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা প্রদান করতে পারে। কোনো মুসলমানকে কোনো কাফেরের (বদলে) হত্যা করা হবে না এবং চুক্তিবদ্ধ অবস্থায় চুক্তিতে আবদ্ধ কাউকে হত্যা করা হবে না। আর দুই ভিন্ন ধর্মের অনুসারীরা একে অপরের উত্তরাধিকারী হবে না। আর কোনো নারীকে তার ফুফুর উপর বা তার খালার উপর (একই সাথে) বিবাহ করা যাবে না। আর সূর্য ডোবা পর্যন্ত আসরের পর কোনো সালাত (নামাজ) নেই। আর কোনো নারী মাহরাম ছাড়া তিন রাতের দূরত্বে সফর করবে না।"
5945 - عن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليس للقاتل شيء".
حسن: رواه مالك (2/ 867) عن يحيى بن سعيد، عن عمرو بن شعيب أن رجلا من بني مُدْلج، يقال له: قتادة، حذف ابنه بسيف، فأصاب ساقه، فتزي في جرحه، فمات، فقدم سراقة بن جعشم على عمر بن الخطاب، فذكر ذلك له، فقال عمر بن الخطاب: اعْدُد لي على ماء قديد عشرين ومائة بعير
حتى أقدم عليك، فلما قدم عليه عمر أخذ من تلك الإبل ثلاثين حقة، وثلاثين جذعة، وأربعين خلفة، ثم قال: أين أخو المقتول؟ فقال: ها أنا ذا. فقال: خذها؛ فإن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال فذكر الحديث.
وعمرو بن شعيب لم يدرك عمر بن الخطاب فقيه انقطاع، ولكن جاء موصولا من طريق محمد ابن عجلان، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص قال: نحلت لرجل من بني مدلج جارية، فأصاب منها ابنا، فكان يستخدمها، فلما شب الغلام دعاها يوما، فقال: اصنعي كذا وكذا. فقال: لا تأتيك حتى متى تستأمي أمي؟ قال: فغضب، فحذفه بسيفه، فأصاب رجله، فنزف الغلام، فمات، فانطلق في رهط من قومه إلى عمر، فقال: يا عدو نفسه، أنت الذي قتلت ابنك لولا أني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقاد الأب من ابنه" لقتلتك. هلم ديته، قال: فأتاه بعشرين أو ثلاثين ومائة بعير، قال: فخير منها مائة، فدفعها إلى ورثته، وترك أباه.
رواه ابن الجارود (788)، والدارقطني (3/ 140)، والبيهقي (8/ 38) كلهم من حديث محمد ابن واره -يعني محمد بن مسلم-، نا محمد بن سعيد، نا عمرو بن أبي قيس، عن منصور، عن محمد بن عجلان، عن عمرو بن شعيب بإسناده. واللفظ لابن الجارود، والبيهقي.
وأما الدارقطني فاختصره على قوله:"لا يقاد الأب من ابنه".
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
وقال البيهقي في"المعرفة" (12/ 40): وإسناده صحيح.
قلت: محمد بن عجلان صدوق، وتابعه الحجاج بن أرطاة في قوله:"لا يقتل والد بولده". رواه الترمذي (1400)، وابن ماجه (2662)، وأحمد (346)، والبيهقي وغيرهم كلهم من طريق الحجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قتل رجل ابنه عمدا، فرفع إلى عمر بن الخطاب، فجعل عليه مائة من الإبل إلى أن قال: ولولا أني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقتل والد بولده" لقتلتك. والحجاج بن أرطاة مدلس، وقد عنعن، وتابعه أيضًا ابن لهيعة فقال: حدثنا عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقاد والد من ولد". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يرث المال من يرث الولاء".
رواه الإمام أحمد (147) عن أبي سعيد، حدثنا عبد اللَّه بن لهيعة بإسناده.
وبمجموع هذه الأسانيد يكون الحديث حسنا.
وأما ما رواه الدارقطني (4/ 96) من طريق إسماعيل بن عياش، عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليس للقاتل من الميراث شيء". فهو خطأ. أخطأ فيه إسماعيل بن عياش، فإنه يخطئ في روايته عن غير الشامين، وهذا منها، والصواب فيه ما رواه مالك، عن يحيى بن سعيد، عن عمرو بن شعيب، عن عمر فذكر الحديث. كما قال النسائي. وكذلك لا يصح ما روي عن عمر بن الخطاب قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ليس
لقاتل ميراث" فإنه ضعيف.
رواه الدارقطني (4/ 95) من طريق محمد بن سليمان بن أبي داود، نا عبد اللَّه بن جعفر، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن عمر بن الخطاب فذكره. ومحمد بن سليمان بن أبي داود قال فيه أبو حاتم الرازي:"منكر الحديث". الجرح والتعديل (7/ 267).
وقال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 257):"هذا إسناد لا يثبت، وهو غير مخرج في شيء من السنن، والصواب ما تقدم من رواية مالك، عن يحيى بن سعيد".
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"القاتل لا يرث". رواه الترمذي (2109)، وابن ماجه (2645، 2735)، والدارقطني (4/ 96) كلهم من طريق إسحاق بن عبد اللَّه ابن أبي فروة، عن الزهري، عن حميد بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث لا يصح، لا يعرف إلا من هذا الوجه، وإسحاق بن عبد اللَّه بن أبي فروة، قد تركه بعض أهل العلم، منهم أحمد بن حنبل". انتهى.
قلت: وكذلك تركه أيضًا: البخاري، وابن معين، وأبو زرعة، وأبو حاتم، والنسائي، والدارقطني، وغيرهم. فقول الترمذي:"تركه بعض أهل العلم" لا معنى له، بل تركهـ جمهور أهل العلم.
ثم قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أهل العلم أن القاتل لا يرث، كان القتلُ عمدًا أو خطأ. وقال بعضهم: إذا كان القتل خطأ، فإنه يرثه، وهو قول مالك".
قلت: قول عامة أهل العلم أن من قتل مورثه لا يرث، عمدًا كان القتل أو خطأً.
وخالفهم مالك فقال: قتل الخطأ لا يمنع من الميراث؛ لأنه غير منهم فيه، إلا أنه لا يرث من ديته شيئًا. لعل من عمدته حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد اللَّه بن عمرو، وفيه:"إن قتل أحدهما صاحبه عمدًا لم يرث من دينه وماله شيئًا، وإن قتل صاحبه خطأ ورث من ماله، ولم ترث من ديته". رواه الدارقطني (4/ 72 - 73): وفيه سعيد الشامي المصلوب ضعيف جدا، وقال الذهبي:"هذا خبر منكر".
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হত্যাকারীর জন্য কিছুই নেই।"
5946 - عن ابن عباس قال: كان المال للولد، وكانت الوصية للوالدين، فنسخ اللَّه من ذلك ما أحب، فجعل للذكر مثل حظ الأنثيين، وجعل للأبوين لكل واحد منهما السدس، وجعل للمرأة الثمن والربع، وللزوج الشطر والربع.
صحيح: أخرجه البخاري في الفرائض (6739) عن محمد بن يوسف، عن ورقاء، عن ابن أبي نجيح، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সম্পদ সন্তানের জন্য ছিল এবং অসিয়ত ছিল পিতামাতার জন্য। অতঃপর আল্লাহ তাআলা এর থেকে যা ইচ্ছা তা রহিত করে দিলেন। সুতরাং তিনি পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান অংশ নির্ধারণ করলেন, আর তিনি পিতা-মাতা উভয়ের প্রত্যেকের জন্য এক-ষষ্ঠাংশ (১/৬) নির্ধারণ করলেন, আর নারীর (স্ত্রীর) জন্য অষ্টম অংশ (১/৮) ও চতুর্থ অংশ (১/৪) নির্ধারণ করলেন, এবং স্বামীর জন্য অর্ধেক (১/২) ও চতুর্থ অংশ (১/৪) নির্ধারণ করলেন।
5947 - عن تميم الداري قال: سألت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن الرجل يسلم على يدي الرجل. فقال:"هو أولى الناس بمحياه ومماته".
صحيح: رواه الطحاوي في مشكله (2852)، والدارمي (3076)، والبيهقي (10/ 296) كلهم من حديث أبي نعيم، حدثنا عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، عن عبد اللَّه بن موهب قال: سمعت تميما الداري فذكره.
ورواه ابن ماجه (2752) عن أبي بكر بن أبي شيبة -وهو في مصنفه (11/ 408) - قال: حدثنا وكيع، عن عبد العزيز بن عمر بإسناده مثله.
ورواه الترمذي (2112) من طريق أبي أسامة وابن نمير ووكيع، كلهم عن عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، عن عبد اللَّه بن موهب. وقال بعضهم: عن عبد اللَّه بن موهب، عن تميم الداري قال: سألت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورواه أبو داود (2918) عن يزيد بن خالد بن موهبة الرملي وهشام بن عمار قالا: حدثنا يحيى -قال أبو داود: وهو ابن حمزة-، عن عبد العزيز بن عمر قال: سمعت عبد اللَّه بن موهب يحدث عمر بن عبد العزيز، عن قبيصة بن ذؤيب - قال هشام: عن تميم الداري أنه قال: يا رسول اللَّه. وقال يزيد: أن تميما قال يا رسول اللَّه، ما السنة في رجل يسلم على يدي الرجل من المسلمين؟ قال:"هو أولى الناس بمحياه ومماته".
ومن طريق هشام بن عمار رواه أيضًا الطحاوي في مشكله (2854).
وهشام بن عمار ضعيف إلا أنه توبع، تابعه يزيد بن خالد.
ورواه الطحاوي أيضًا (2853)، والحاكم (2/ 219) من طريق عبد الأعلى بن مسهر الغساني، حدثنا يحيى بن حمزة الحضرمي قال: حدثني عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز، عن عبد اللَّه بن موهب، عن قبيصة بن ذؤيب، عن تميم الداري قال: سألت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر مثله.
قال الحاكم بعد أن رواه من حديث عبد اللَّه بن وهب، عن تميم:"هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم، ولم يخرجاه، وعبد اللَّه بن وهب بن زمعة مشهور، وشاهده عن تميم الداري حديث قبيصة بن ذؤيب". ثم رواه من طريقه.
ولكن قال الشافعي:"هذا الحديث ليس بثابت، إنما يرويه عبد العزيز بن عمر، عن ابن موهب، عن تميم الداري، وابن موهب ليس بمعروف عندنا، ولا نعلمه لقي تميما، ومثل هذا لا
يثبت عندنا ولا عندك من قبل أنه مجهول، ولا أعلمه متصلا".
قال يعقوب بن سفيان: هذا خطأ، ابن موهب لم يسمع من تميم، ولا لحقه. ذكره البيهقي.
وقال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه إلا من حديث عبد اللَّه بن موهب. ويقال: ابن وهب، عن تميم الداري، وقد أدخل بعضهم بين عبد اللَّه بن وهب وبين تميم الداري"قبيصة بن ذؤيب"، ولا يصح، رواه يحيى بن حمزة، عن عبد العزيز بن عمر، وزاد فيه:"قبيصة بن ذؤيب".
والعمل على هذا الحديث عند بعض أهل العلم، وهو عندي ليس بمتصل. وقال بعضهم: يجعل ميراثه في بيت المال، وهو قول الشافعي: واحتج بحديث النبي صلى الله عليه وسلم:"إنما الولاء لمن أعتق". انتهى قول الترمذي.
وذكر البخاري في كتاب الفرائض:"باب إذا أسلم على يديه الرجل، كان الحسن لا يرى له ولاية.
ويذكر عن تميم الداري رفعه قال:"هو أولى الناس بمحياه ومماته".
واختلفوا في صحة هذا الخبر". انتهى كلام البخاري.
هذا هو الصحيح بأن الناس اختلفوا في صحة هذا الخبر إلا أن البخاري جزم في"التاريخ" (5/ 199) بأنه لا يصح لمعارضته حديث"إنما الولاء لمن أعتق".
قال ابن حجر في"الفتح" (12/ 47):"ويؤخذ منه أنه لو صح سنده لما قاوم هذا الحديث، وعلى التنزل فتردد في الجمع هل يخص عموم الحديث المتفق على صحته بهذا، فيستثنى منه من أسلم، أو تؤول الأولوية في قوله:"أولى الناس" بمعنى النصرة والمعاونة وما أشبه ذلك لا بالميراث، ويبقى الحديث المتفق على صحته على عمومه. جنح الجمهور إلى الثاني، ورجحانه ظاهر". انتهى.
أي بعد صحة الخبر، وعدم معارضته لحديث"إنما الولاء لمن أعتق". وقد صحح هذا الخبر أبو زرعة الدمشقي، ويعقوب بن سفيان، والحاكم، وغيرهم.
وقال الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (4/ 186):"وحديث تميم -وإن لم يكن في رتبة الصحيح- فلا ينحط عن أدنى درجات الحسن، وقد عضده المرسل (وهو يقصد به مرسل سعيد بن المسيب)، وقضاء عمر بن الخطاب وعمر بن عبد العزيز برواية الفرائض، وإنما يقتضي تقديم الأقارب عليه، ولا يدل على عدم توريثه إذا لم يكن له نسب".
وقال:"وبهذا الحديث قال إسحاق بن راهويه، وأحمد بن حنبل في إحدى الروايتين عنه، وطاوس، وربيعة، والليث بن سعد، وهو قول عمر بن الخطاب، وعمر بن عبد العزيز". انتهى قوله.
وفي مصنف ابن أبي شيبة عن عبد السلام بن حرب، عن خصيف، عن مجاهد أن رجلا أتى عمر، فقال: إن رجلا أسلم على يدي، وترك ألف درهم، فتحرجت منها، فقال: أرأيت لو جنى جناية على من تكون؟ قال: علي. قال: فميراثه لك.
قلت: وبه قال شريح.
وبه قال الحنفية إلا أنهم اشترطوا المحالفة.
وقال الطحاوي:"وقال بهذا الحديث عمر بن عبد العزيز، فإنه قضى بذلك في رجل أسلم على يدي رجل مسلم، فمات، وترك مالا وابنة. فأعطى البنت النصف، والذي أسلم على يديه البقية، ومنهم ربيعة بن أبي عبد الرحمن، وسعيد بن المسيب.
وذهب آخرون -وهم أكثر العلماء سواهم- إلى أن إسلام الرجل على يدي الرجل لا يوجب له ولاءه حتى يواليه بعد ذلك، فيكون بذلك مولاه، كما يكون مولاه لو والاه، ولم يكن أسلم على يديه قبل هذا، وهذا مذهب الكوفيين، وقد روي هذا القول عن ابن شهاب الزهري أنه سئل عن رجل أسلم، فوالى رجلا هل بذلك بأس؟ فقال: لا بأس به. قد أجاز ذلك عمر بن الخطاب". الطحاوي في مشكله (7/ 282 - 283).
وقال ابن التركماني في الجوهر النقي (10/ 297 - 298):"وفي التهذيب لابن جرير الطبري: وروى خصيف، عن مجاهد قال: جاء رجل إلى عمر، فقال: إن رجلا أسلم على يدي، ومات، وترك ألف درهم، فلمن ميراثه؟ قال: أرأيت لو جنى جناية من كان يعقل عنه؟ قال: أنا. قال: فميراثه لك. ورواه مسروق، عن ابن مسعود. وقاله إبراهيم، وابن المسيب، والحسن، ومكحول، وعمر بن عبد العزيز. وفي الاستذكار: هو قول أبي حنيفة وصاحبيه وربيعة. وقال يحيى بن سعيد في الكافر الحربي: إذا أسلم على يد مسلم. وروي عن عمر، وعثمان، وعلي، وابن مسعود أنهم أجازوا الموالاة، وورثوا بها. وقال الليث. وعن عطاء والزهري ومكحول نحوه. وعن ابن المسيب: أيما رجل أسلم على يديه رجل فعقل عنه ورثه، وإن لم يعقل عنه لم يرثه. وقال به طائفة.
وعند أبي حنيفة وأصحابه: إذا أسلم على يديه ولم يعقل عنه ولم يواله لم يرثه ولم يعقل عنه، وإن والاه على أن يعقل عنه ويرثه ورِثه وعقل عنه. وهو قول الحكم، وحماد، وإبراهيم. وهذا كله إذا لم تكن له عصبة". انتهى قول ابن التركماني
ويظهر من هذا الكلام أن الحديث كان معمولا به في القرنين الأول والثاني، ولم يختلف فيه أحد، وإنما وقع الخلاف في أوائل القرن الثالث، ولعل الشافعي هو أول من تكلم فيه، ورده سندا ومتنا.
وأما ما روي عن عمرو بن العاص أنه أتى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال: إن رجلا أسلم على يدي، وله مال وقد مات. قال:"فلك ميراثه". ففيه رجل مجهول لم يتنبه إليه الحافظ الهيثمي.
رواه إسحاق بن راهويه في مسنده: حدثنا بقية بن الوليد، حدثني كثير بن مرة النهراني، ثنا شيخ من باهلة، عن عمرو بن العاص فذكره. ومن طريق إسحاق رواه الطبراني في معجمه، كما في نصب الراية (4/ 158).
قلت: وفي الإسناد رجل مجهول، وهو شيخ من باهلة.
وأما قول الهيثمي في المجمع (4/ 232):"من رواية بقية قال: حدثني كثير بن مرة، فإن كان سمع منه فالحديث صحيح". فليس بصحيح لوجود رجل مجهول في الإسناد.
তামীম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম সেই ব্যক্তি সম্পর্কে যে অন্য কোনো ব্যক্তির হাতে ইসলাম গ্রহণ করে। তিনি বললেন: "সে (যার হাতে ইসলাম গ্রহণ করেছে) তার (ইসলাম গ্রহণকারী) জীবিতাবস্থায় এবং মৃতাবস্থায় সকল মানুষের চেয়ে বেশি হকদার।"
5948 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: جاءت امرأة سعد بن الربيع بابنتي سعد إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: يا رسول اللَّه، هاتان ابنتا سعد، قتل معك يوم أحد، وإن عمهما أخذ جميع ما ترك أبوهما، وإن المرأة لا تنكح إلا على مالها، فسكت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى أنزلت آية الميراث، فدعا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أخا سعد بن الربيع، فقال:"أعط ابتي سعد ثلثي ماله، وأعط امرأته الثمن، وخذ أنت ما بقي".
حسن: رواه ابن ماجه (2720) من حديث سفيان بن عيينة، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
وكذلك رواه عبيد اللَّه بن عمرو الرقي، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، ومن طريقه رواه الترمذي (2092)، وأحمد (14798)، والحاكم (4/ 333 - 334).
قال الترمذي:"هذا حديث صحيح لا نعرفه إلا من حديث عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، وقد رواه شريك أيضًا، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل".
قلت: الصواب أنه حسن من أجل الكلام في عبد اللَّه بن محمد بن عقيل إلا أنه حسن الحديث. وقد نقل المنذري عن الترمذي تحسينه، وهو أصح.
وأما ما رواه أبو داود (2891) من حديث بشر بن المفضل، حدثنا عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد اللَّه قال: خرجنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى جئنا امرأة من الأنصار في الأسواق، فجاءت المرأة بابنتين لها، فقالت: يا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، هاتان بنتا ثابت بن قيس قتل معك يوم أحد، وقد استفاء عمهما مالهما وميراثهما كله، فلم يدع لهما مالا إلا أخذه، فما تري يا رسول اللَّه؟ فواللَّه لا تنكحان أبدا إلا ولهما مال.
فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يقضي اللَّه في ذلك". قال: ونزلت سورة النساء: {يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ} الآية. [سورة النساء: 11] فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ادعوا لي المرأة وصاحبها". فقال لعمهما:"أعطهما الثلثين، وأعط أمهما الثمن، وما بقي فلك". فهو خطأ، أخطأ فيه بشر كما قال أبو داود، وإنما هما ابنتا سعد بن الربيع، وثابت بن قيس قتل يوم اليمامة. وكذلك قال البيهقي والخطابي وغيرهما. والصحيح أنهما ابنتا سعد بن الربيع.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনু রাবী‘-এর স্ত্রী সা'দ-এর দুই কন্যাকে নিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এলেন, এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! এ দু’জন সা'দ-এর কন্যা। সে উহুদের যুদ্ধে আপনার সাথে শহীদ হয়েছে। আর তাদের চাচা তাদের পিতা যা কিছু রেখে গেছেন, তার সবই নিয়ে নিয়েছে। অথচ সম্পদ না থাকলে মেয়েদের বিবাহ দেওয়া যায় না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নীরব রইলেন, যতক্ষণ না মীরাসের আয়াত নাযিল হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সা'দ ইবনু রাবী‘-এর ভাইকে ডাকলেন, এবং বললেন, "সা'দ-এর দুই কন্যাকে তার সম্পদের দুই-তৃতীয়াংশ দাও, তার স্ত্রীকে দাও এক-অষ্টমাংশ এবং যা অবশিষ্ট থাকে তা তুমি নাও।"
5949 - عن قبيصة بن ذؤيب أنه قال: جاءت الجدة إلى أبي بكر الصديق تسأله ميراثها، فقال: ما لك في كتاب اللَّه تعالى شيء، وما علمت لك في سنة نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم شيئًا، فارجعي حتى أسأل الناس، فسأل الناس، فقال المغيرة بن شعبة: حضرت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أعطاها السدس. فقال أبو بكر: هل معك غيرك؟ فقام محمد بن مسلمة، فقال مثل ما قال المغيرة بن شعبة، فأنفذه لها أبو بكر.
ثم جاءت الجدة الأخرى إلى عمر بن الخطاب تسأله ميراثها، فقال: ما لك في كتاب اللَّه تعالى شيء، وما كان القضاء الذي قضي به إلا لغيرك، وما أنا بزائد في الفرائض، ولكن هو ذلك السدس، فإن اجتمعتما فهو بينكما، وأيكما خلت به فهو لها.
حسن: رواه مالك في الفرائض (4) عن ابن شهاب، عن عثمان بن إسحاق بن خرشة، عن قبيصة بن ذؤيب فذكره.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا أبو داود (2894)، والترمذي (2101)، وابن ماجه (2724)، والبيهقي (6/ 234).
وإسناده منقطع؛ فإن قبيصة بن ذؤيب لم يسمع من الصديق؛ لأنه ولد عام الفتح على الراجح، ولكن يجوز أن يكون سمعه بعد ذلك من محمد بن مسلمة، ولذا ذكره المزي في"التحفة" (8/ 361) في ترجمة قبيصة بن ذؤيب الخزاعي، عن محمد بن مسلمة، ونقل عن الترمذي: أنه قال:"حسن صحيح، وهو أصح -يعني حديث مالك- من حديث ابن عيينة".
وأما في بعض النسخ المطبوعة للترمذي فليس فيه قوله:"حسن صحيح".
ثم هو حسن فقط؛ لأن عثمان بن إسحاق بن خرشة ليس بمشهور في الحديث، غير أنه حسن الحديث. وقد حسنه أيضًا البغوي (8/ 346)، وصحّحه ابن حبان (6031)، وابن الملقن في"البدر المنير" (7/ 207). وقال ابن حجر في"التلخيص" (3/ 82):"إسناده صحيح لثقة رجاله إلا أن صورته مرسل؛ فإن قبيصة لا يصح له سماع من الصديق، ولا يمكن شهوده للقصة. قاله ابن عبد البر بمعناه".
قلت: وهو كما قال إلا أنه لا يعد أن يكون قد سمع بعد ذلك من محمد بن مسلمة.
ولذا صحّحه الترمذي وحسنه، وهو لا يصحح المنقطع، وإخراج مالك يشعر بصحته أيضًا، وكذا تصحيح ابن حبان له، وقد أجمع أهل العلم -كما قال ابن المنذر- على أن للجدة السدس إذا لم تكن أم، وهذا عاضد له أيضًا.
أو أن قبيصة بن ذؤيب ولد في أول الهجرة، كما قال بعض أهل العلم، فإن صح هذا فلا
إشكال في صحته.
وأما اختلافه على الزهري فليس بعلة قادحة، فإن الصحيح لا يُعل بالضعيف.
فقد رواه سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن قبيصة، ومن هذا الطريق رواه الحاكم (4/ 338)، وقال: صحيح على شرط الشيخين.
وكذلك رواه جماعات عن الزهري، عن قبيصة، ولم يذكروا أحدًا بينهما، وفيه انقطاع؛ فإن الزهري لم يسمع من قبيصة.
ولذا رجح الترمذي رواية مالك على رواية سفيان بن عيينة، وكذا الدارقطني في"علله" (1/ 248 - 249)، فإنه ذكر جماعة رووه عن الزهري، عن قبيصة بن ذؤيب، ولم يذكروا بينهما أحدا.
فقال: ويشبه أن يكون الصواب ما قاله مالك وأبو أويس، وأن الزهري لم يسمعه من قبيصة، وإنما أخذه عن عثمان بن إسحاق بن خرشة عنه.
ক্বাবীসাহ ইবনু যু'আইব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন নানী/দাদী আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তার উত্তরাধিকারের অংশ সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ তা‘আলার কিতাবে তোমার জন্য কিছুই নেই এবং আমি আল্লাহ্র নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতেও তোমার জন্য কিছু জানি না। অতএব, তুমি ফিরে যাও যতক্ষণ না আমি লোকদের জিজ্ঞেস করি। অতঃপর তিনি লোকদের জিজ্ঞেস করলেন। মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম, যখন তিনি তাকে ষষ্ঠাংশ (১/৬) দিয়েছিলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: তোমার সাথে কি অন্য কেউ আছে? তখন মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা বলেছিলেন, তিনিও ঠিক তাই বললেন। এরপর আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা তার জন্য কার্যকর করলেন।
এরপর আরেকজন নানী/দাদী উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তার উত্তরাধিকার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি বললেন: আল্লাহ তা‘আলার কিতাবে তোমার জন্য কিছুই নেই এবং যে ফায়সালা করা হয়েছে, তা কেবল তোমার পূর্বের জনের জন্যই (অর্থাৎ আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সময়ের ফয়সালা)। আমি ফারাইযের (উত্তরাধিকারের সুনির্দিষ্ট অংশ) ক্ষেত্রে কোনো অতিরিক্ত বিষয় যোগ করব না। তবে তা হলো সেই ষষ্ঠাংশ (১/৬)। যদি তোমরা দু’জন একত্র হও, তবে তা তোমাদের দু’জনের মাঝে ভাগ হবে, আর যদি তোমাদের মধ্যে কেউ একা থাকে, তবে তা তার একার জন্য।
5950 - عن بريدة بن الحصيب أن النبي صلى الله عليه وسلم جعل للجدة السدس إذا لم تكن دونها أم.
حسن: رواه أبو داود (2895)، والنسائي في الكبرى (6338) كلاهما من حديث عبيد اللَّه بن عبد اللَّه أبي المنيب العتكي، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره.
وعبيد اللَّه بن عبد اللَّه العتكي مختلف فيه، فقال البخاري:"عنده مناكير". وقال العقيلي:"لا يتابع عليه". ولكن قال أبو حاتم:"صالح". وأنكر على البخاري إدخاله في كتاب"الضعفاء"، وقال:"يحول". ووثّقه ابن معين والنسائي، وأورده ابن عدي في الكامل، وقال:"هو عندي لا بأس به". وذكر ابن السكن هذا الحديث في"صحاحه" كما في التلخيص (3/ 83).
والخلاصة فيه أنه حسن الحديث إذا لم يكن في حديثه نكارة أو مخالفة، وقد يشهد له ما سبق.
বুরাইদা ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাদীর (বা নানীর) জন্য ছয় ভাগের এক ভাগ অংশ নির্ধারণ করে দিয়েছেন, যদি তার চেয়ে নিকটবর্তী কোনো মা না থাকেন।
5951 - عن معقل بن يسار المزني قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم أتي بفريضة فيها جد، فأعطاه ثلثا أو سدسا.
حسن: رواه ابن ماجه (2722) عن أبي بكر بن أبي شيبة قال: حدثنا شبابة قال: حدثنا يونس ابن أبي إسحاق، عن أبي إسحاق، عن عمرو بن ميمون، عن معقل بن يسار المزني فذكره.
وإسناده حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق؛ فإنه حسن الحديث، إلا أنه اختلف عليه: فرواه عنه شبابة هكذا، وهو عند ابن أبي شيبة (11/ 291).
ورواه أيضًا عن عبد الأعلى، عن يونس، عن الحسن أن عمر قال: من يعلم قضية رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الجد؟ فقال معقل بن يسار المزني: فينا قضى به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: ما ذاك؟ قال: السدس. بدون شك. قال: مع من؟ قال لا أدري، قال: لا دريت، فما تغني إذا.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا أحمد (20310)، وكذا رواه أبو داود (2897) عن خالد، عن يونس.
والحسن لم يسمع من عمر بن الخطاب.
ولكن رواه ابن ماجه (2723)، والبيهقي (6/ 244) كلاهما عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن معقل بن يسار أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قضى في الجد بالسدس. هكذا عند ابن ماجه.
وعند البيهقي: أن عمر سأل الناس: من علم من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الجد شيئًا؟ فقال معقل: أعطاه السدس. قال: مع من؟ ويلك! قال: لا أدري. قال: لا دريت.
واختلف في سماع الحسن، عن معقل بن يسار فنفاه أبو حاتم.
وقال أبو زرعة: الحسن عن معقل بن يسار أشبه، والحسن عن معقل بن سنان بعيد جدا. وقال ابن معين: وقد ذكروا سماع الحسن من معقل بن يسار، وليس هو بمستفيض.
قلت: وفي صحيح البخاري (4529) قال الحسن: حدثني معقل بن يسار قال فذكره. والخلاصة أن حديث معقل بن يسار صحيح الإسناد بمجموع الطريقين.
وأما ما روي عن عمران بن حصين أن رجلا أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: إن ابن ابني مات فما لي من ميراثه؟ فقال:"لك السدس". فلما أدبر دعاه، فقال:"لك سدس آخر". فلما أدبر دعاه، فقال:"إن السدس الآخر طعمة". قال قتادة:"فلا يدرون مع أي شيء ورثه".
قال قتادة:"أقل شيء وُرِّث الجد السدس". فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2891)، والترمذي (2099)، وأحمد (19848)، والدارقطني (4/ 84)، والبيهقي (6/ 244) كلهم من حديث همام بن يحيى، عن قتادة، عن الحسن، عن عمران بن حصين فذكره.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: بل هو ضعيف؛ لأن الحسن لم يسمع من عمران بن حصين شيئًا، كما قال علي بن المديني، ويحيى بن معين، وأحمد بن حنبل، وبهز بن أسد، وغيرهم.
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ورَّث جدة سدسًا.
رواه ابن ماجه (2725) عن عبد الرحمن بن عبد الوهاب قال: حدثنا سَلْم بن قتيبة، عن شريك، عن ليث، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
وفيه شريك القاضي وشيخه ليث كلاهما سيء الحفظ، إلا أن الثاني اختلط جدا، فلم يتميز حديثه.
وكذلك لم يصح ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود في الجدة مع ابنها: إنها أول جدة أطعمها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سدسا مع ابنها، وابنها حي.
رواه الترمذي (2102) عن الحسن بن عرفة، حدثنا يزيد بن هارون، عن محمد بن سالم، عن الشعبي، عن مسروق، عن عبد اللَّه بن مسعود فذكره.
ومحمد بن سالم هو الهمداني الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم.
ومن طريقه رواه البزار في مسنده (5/ 325)، والبيهقي (6/ 226).
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه مرفوعا إلا من هذا الوجه، وقد وَرَّث بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم الجدة مع ابنها، ولم يورثها بعضهم".
وقال البزار:"هذا الحديث لا نعلم أحدا رواه إلا محمد بن سالم، ولم يتابع عليه، ومحمد بن سالم هذا لين الحديث".
وقال البيهقي:"محمد بن سالم يتفرد به هكذا، وروي عن يونس، عن ابن سيرين قال: أنبئت وأشعث بن سوار، عن ابن سيرين، عن عبد اللَّه. وعن أشعث بن عبد الملك، عن الحسن وابن سيرين، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وحديث يونس وأشعث منقطع، ومحمد بن سالم غير محتج به، وإنما الرواية الصحيحة فيه عن عمر، وعبد اللَّه، وعمران بن حصين.
ثم أسند من كل هؤلاء الثلاثة أنهم وَرَّثوا الجدة مع ابنها". انتهى.
وقال في معرفة السنن والآثار (9/ 115):"تفرد به هكذا محمد بن سالم، وهو غير محتج به".
ورواية أشعث رواها الدارمي (2974) عن يزيد بن هارون، عنه، عن ابن سيرين، عن ابن مسعود قال: إن أول جدة أُطْعِمَت في الإسلام سهما أم أب، وابنها حي.
وأشعث هو ابن سوار الكندي ضعيف باتفاق أهل العلم. وابن سيرين لم يدرك ابن مسعود.
والصواب في حديث عبد اللَّه بن مسعود أنه موقوف عليه، رواه البيهقي من حديث سفيان، عن ابن أبي خالد، عن أبي عمرو، عن عبد اللَّه بن مسعود أنه ورَّث جدة مع ابنها. وإسناده صحيح.
وقد روي عنه أيضًا:"الجدات ليس لهن ميراث، إنما هي طعمة أُطْعِمْنَها، فأقربهن وأبعدهن سواء".
رواه الدارمي (2985) عن يزيد بن هارون، أنبأنا الأشعث، عن ابن سيرين، عن ابن مسعود فذكره.
ومن طريق الأشعث -وهو ابن سوار- رواه أيضًا البيهقي (6/ 226).
والأشعث ضعيف، كما أن فيه انقطاعا.
وفي الباب أيضًا ما رواه أبو يعلى (1095)، والبزار -كشف الأستار (1387) - كلاهما من حديث قبيصة بن عقبة، ثنا سفيان الثوري، عن زيد بن أسلم، عن عياض، عن أبي سعيد الخدري قال:"كنا نورثه على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم". يعني الجد.
قال البزار:"لا نعلمه بهذا اللفظ إلا من هذا الوجه عن أبي سعيد، وأحسب أن قبيصة أخطأ في لفظه، وإنما كان عندي:"كنا نؤديه". يعني: زكاة الفطر. ولم يتابع قبيصة على هذا غيره".
وكذا أعله مسلم في"كتاب التمييز" (ص 189 - 190).
وأما الهيثمي فقال في المجمع (4/ 227): رواه أبو يعلى والبزار، ورجال أبي يعلى رجال الصحيح.
وفي الباب أيضًا ما روي عن عبادة بن الصامت:"إن من قضاء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للجدتين من الميراث بالسدس بينهما بالسواء" في حديث طويل.
رواه عبد اللَّه في مسند أبيه (22778) قال: حدثنا أبو كامل الجحدري، حدثنا الفضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة، عن إسحاق بن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصامت، عن عبادة فذكر الحديث.
وإسحاق بن يحيى بن عبادة بن الصامت قال فيه ابن عدي:"عامة أحاديثه غير محفوظة، وله حديث طويل في قضايا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم".
وفي تهذيب الكمال:"روى عن عبادة بن الصامت، ولم يدركهـ. وروى عنه موسى بن عقبة، ولا يروي عنه غيره". وخلاصته في التقريب:"أرسل عن عبادة، وهو مجهول الحال".
وأما حديثه في قضايا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فهو ما ذكره أحمد (22778) بالإسناد المذكور.
وكان ابن عباس يرى أن الجد أب، ويتلو قوله تعالى: {وَاتَّبَعْتُ مِلَّةَ آبَائِي إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ} [يوسف: 38].
وعن ابن جريج قال: أخبرني عطاء أن ابن عباس كان يجعل الجد أبا.
وأما الذين ذهبوا إلى أن الجدة لا ترث مع ابنها من الصحابة فهم عثمان، وعلي، وزيد بن ثابت، رضي الله عنهم جميعا.
والحارث لا يحتج بخبره لطعن الحفاظ فيه".
قلت: وإسناد هذا الحديث وإن كان ضعيفا، فقد اتفق أهل العلم على صحة معناه، فلعل الحارث حفظ هذا الحديث من علي بن أبي طالب؛ لأنه كان عارفا بالفرائض معتنيا بها وبالحساب، كما قال ابن كثير في تفسير الآية الكريمة.
ولذا قال الترمذي:"والعمل على هذا الحديث عند عامة أهل العلم".
قلت: وذلك في الأمرين في تقديم الدين على الوصية، وتوريث أعيان بني الأم، وهم الإخوة الأب واحد وأم واحدة، دون بني العلات، وهم الذين أبوهم واحد وأمهاتهم مختلفة إذا اجتمعوا.
মা'কিল ইবন ইয়াসার আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি যে, তাঁর কাছে এমন একটি উত্তরাধিকারের (ফারায়েযের) মামলা আনা হয়েছিল যাতে দাদা উপস্থিত ছিলেন। তখন তিনি দাদাকে এক-তৃতীয়াংশ অথবা এক-ষষ্ঠাংশ প্রদান করেন।
5952 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا استهلّ المولودُ وُرِّث".
حسن: رواه أبو داود (2920) ومن طريقه البيهقي (6/ 257) عن حسين بن معاذ، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا محمد -يعني ابن إسحاق-، عن يزيد بن عبد اللَّه بن قسيط، عن أبي هريرة فذكره.
جوّد إسناده ابن عبد الهادي في التنقيح (4/ 277).
ورواه أيضًا ابن خزيمة -كما قال البيهقي- عن الفضل بن يعقوب الجزري، عن عبد الأعلى بهذا الإسناد مثله. وزاد موصولا بالحديث:"تلك طعنة الشيطان، كل بني آدم نائل منه تلك الطعنة إلا ما كان من مريم وابنها، فإنها لما وضعتها أمها قالت: {وَإِنِّي أُعِيذُهَا بِكَ وَذُرِّيَّتَهَا مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ} [سورة آل عمران: 36] فضرب دونها بحجاب، فطعن فيه - يعني في الحجاب".
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق؛ فإنه مدلس، وقد عنعن، ولم أقف على تصريح منه، ولكن لحديث أبي هريرة طرق أخرى تقويه، وإن كانت هذه الطرق لا تصح بانفرادها.
ومما يقوي هذا الحديث أنه روي مرسلا من وجه آخر.
رواه البيهقي من طريق موسى بن داود، عن عبد العزيز بن أبي سلمة، عن الزهري، عن سعيد ابن المسيب، عن أبي هريرة قال:"من السنة أن لا يرث المنفوس، ولا يُوَرِّث حتى يستهل صارخا". قال: كذا وجدته، ورواه يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يرث الصبي إذا لم يستهل، والاستهلال الصياح، أو العطاس، أو البكاء، ولا يكمل ديته".
وقال سعيد:"لا يصلى عليه".
ورواه السِلَفي في الطيوريات موصولا (242) من حديث عبد اللَّه بن شبيب، حدثني إسحاق بن محمد، حدثني علي بن أبي علي، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا استهلَّ الصبي صارخًا سُمِّيَ، وصُلِّيَ عليه، وتَمَّتْ ديته ووُرِّث، وإن لم يستهلَّ صارخًا، وولد حيًا لم يُسَمَّ، ولم تتمَّ ديته، ولم يصلَّ عليه، ولم يُوَرَّث".
إلا أن فيه علي بن أبي علي ضعيف باتفاق أهل العلم، وقد روى أحاديث موضوعة عن محمد ابن المنكدر، كما أن فيه عبد اللَّه بن شبيب ضعيف أيضًا كما في التلخيص (4/ 147).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন নবজাতক চিৎকার করে ওঠে (বা শব্দ করে), তখন সে উত্তরাধিকার লাভ করে।”
5953 - عن المسور بن مخرمة وجابر بن عبد اللَّه قالا: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يرث الصبي حتى يستهل صارخا، واستهلاله أن يصيح، أو يبكي، أو يعطس".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (2/ 20 - 21)، والأوسط (4596) -كما في"مجمع البحرين" (4/ 134) - عن عبدان بن أحمد، ثنا العباس بن الوليد الخلال الدمشقي، ثنا مروان بن محمد الطاطري، ثنا سلمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن المسور بن مخرمة وجابر بن عبد اللَّه فذكراه. وإسناده حسن من أجل العباس بن الوليد وشيخه مروان بن محمد الطاطري، فهما حسنا الحديث.
وأما قول الهيثمي في"المجمع" (4/ 225):"فيه عباس بن الوليد الخلال وثّقه أبو مسهر ومروان بن محمد. وقال أبو داود: لا أحدث عنه، وبقية رجاله رجال الصحيح". ففي نقله عن أبي داود، عن مروان بن محمد:"لا أحدث عنه" فيه نظر.
فإن هذا القول لم يذكره المزي في" تهذيب الكمال" ولا ابن حجر في"تهذيب التهذيب"، بل فيه: قال أبو حاتم وصالح بن محمد:"ثقة".
وقال أبو زرعة الدمشقي:"قال لي أحمد: عندكم ثلاثة أصحاب حديث: مروان بن محمد الطاطري، والوليد بن مسلم، وأبو مسهر".
وقال الدوري عن ابن معين:"لا بأس به، وكان مرجئا". وقال الدارقطني:"ثقة".
فمع توثيق هؤلاء الأئمة بعد أن يكون أبو داود قال فيه: لا أحدث عنه، فلعله التبس الأمر على الهيثمي، ولو فرضنا أن أبا داود قال فيه ما قال فقول الأئمة يقدم على قوله، فأقل أحواله حسن الحديث.
ثم وجدت هذا الحديث في سنن ابن ماجه (2751) بتحقيق محمد فؤاد عبد الباقي عن العباس ابن الوليد الدمشقي قال: حدثنا مروان بن محمد قال: حدثنا سليمان بن بلال قال: حدثنا يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، عن جابر بن عبد اللَّه والمسور بن مخرمة فذكرا الحديث مثله.
وأنا أستبعد أن يكون ابن ماجه روى هذا الحديث، وإن كان وجد في بعض النسخ الخطية، إلا أني لم أتمكن من تقييم هذه المخطوطة، والدليل على ذلك أن المزي لم يذكر هذا الحديث في"تحفة الأشراف"، ولا استدركهـ ابن حجر في"النكت الظراف"، ولا الحافظ أبو زرعة العراقي في"الإطراف بأوهام الأطراف"، كما لم يذكره البوصيري في زوائد ابن ماجه، ولا الدكتور محمد مصطفى الأعظمي في تحقيقه لسنن ابن ماجه، فمن المستبعد أن يفوت هؤلاء جميعا هذا الحديث من نسخهم التي اعتمدوا عليها، وأبعد من هذا أن يكون هذا الحديث من زيادات أبي الحسن بن القطان؛ لأنه ولد عام 254 هـ، وتوفي العباس بن الوليد الدمشقي عام 248 هـ أي قبل ولادته بست
سنوات تقريبا، وهو من شيوخ ابن ماجه. فكل هذه الأمور تدعو إلى التأمل في نسبة هذا الحديث إلى ابن ماجه، أو إلى زيادات أبي الحسن القطان، وقد أفرد الدكتور مسفر زيادات أبي الحسن في جزء، ولم يذكر فيه هذا الحديث. واللَّه تعالى أعلم بالصواب.
ولجابر حديث آخر، وهو معلول ذكر في كتاب الجنائز.
والحديث يدل على أن المولود لا يرث حتى يستهل صارخا.
وإليه ذهب مالك وأحمد، وبه قال محمد بن سيرين، والشعبي، والزهري، وقتادة، وغيرهم.
وقال أبو حنيفة، والشافعي: إذا تنفس وتحرك يُوَرَّث ولو لم يكون فيه الاستهلال، وهو رفع الصوت؛ لأن وجود الحركة أو التنفس أمارة الحياة.
মিসওয়ার ইবন মাখরামাহ ও জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়েই বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শিশু চিৎকার করে আওয়াজ না করা পর্যন্ত উত্তরাধিকার লাভ করবে না। আর তার আওয়াজ করা হল এই যে, সে চিৎকার করবে, অথবা কাঁদবে, অথবা হাঁচি দেবে।"
5954 - عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"كل قَسْم قُسِم في الجاهلية فهو على ما قُسم، وكل قَسم أدركه الإسلام فهو على قَسْم الإسلام".
حسن: رواه أبو داود (2914)، وابن ماجه (2485) كلاهما من حديث موسى بن داود قال: حدثنا محمد بن مسلم الطائفي، عن عمرو بن دينار، عن أبي الشعثاء، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن مسلم الطائفي؛ فإنه حسن الحديث، وهو من رجال مسلم.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا الطحاوي في مشكله (3221)، والبيهقي (9/ 122).
ورواه مالك في الأقضية (37) بلاغا عن ثور بن زيد الديلي أنه قال: بلغني أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أيما دار أو أرض قُسمت في الجاهلية، فهي على قَسم الجاهلية، وأيما دار أو أرض أدركها الإسلام ولم تقسم فهي على قسم الإسلام".
ووصله البيهقي (9/ 122) بذكر عكرمة، عن ابن عباس، فقال: أخبرنا أبو عبد اللَّه، حدثني محمد ابن المظفر الحافظ، ثنا أبو بكر بن أبي داود، ثنا أحمد بن حفص، حدثني أبي، ثنا إبراهيم بن طهمان، عن مالك، عن ثور بن زيد، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
وأما ما روي عن عبد اللَّه بن عمر مرفوعا مثله فهو ضعيف. رواه ابن ماجه (2749) عن محمد ابن رمح قال: أنبأنا عبد اللَّه بن لهيعة، عن عقيل أنه سمع نافعا يخبر عن عبد اللَّه بن عمر فذكره.
وعبد اللَّه بن لهيعة فيه كلام معروف، وعقيل هو ابن خالد الأيلي، وهو من رجال الجماعة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জাহিলিয়্যাতের যুগে যে বন্টন করা হয়েছিল, তা সেভাবেই বলবৎ থাকবে। আর যে বন্টন ইসলাম এসে পেয়েছে, তা ইসলামের বন্টন অনুযায়ী হবে।"
5955 - عن عبد اللَّه قال: إن أهل الإسلام لا يُسيّبون، وإن أهل الجاهلية كانوا يُسِيبون.
رواه البخاري في الفرائض (6753) عن قبيصة بن عقبة، حدثنا سفيان، عن أبي قيس، عن هزيل، عن عبد اللَّه فذكره موقوفا.
وقوله:"السائبة" هو: أن يقول السيد لعبده: لا ولاء لأحد عليك، أو أنت سائبة. يريد بذلك عنقه، وأن لا ولاء لأحد عليه. وقد يقول له: أعتقتك سائبة، أو أنت حر سائبة.
وحديث عبد اللَّه بن مسعود هو طرف من حديث أخرجه الإسماعيلي بتمامه من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان بسنده إلى هزيل قال: جاء رجل إلى عبد اللَّه، فقال: إني أعتقت عبدا لي سائبة، فمات، فترك مالا، ولم يدع وارثا. فقال عبد اللَّه: فذكر حديث الباب، وزاد: وأنت ولي نعمته، فلك ميراثه، فإن تأثمت، أو تحرجت في شيء فنحن نقبله، ونجعله في بيت المال. انتهى كما في الفتح (12/ 41).
وكذلك رواه أيضًا عبد الرزاق (16223) عن الثوري بإسناده نحوه، وأخرج عبد الرزاق (16222) عن معمر، عن قتادة أن ابن مسعود أتاه رجل فقال: مولى لي توفي أعتقته سائبة، وترك مالا، قال: أنت أحق بماله، قال: إنما أعتقته للَّه، قال: أنت أحق بماله، فإن تدعه فأرِنه هاهنا ورثة كثير - يعني بيت المال.
وأخرج أيضًا عبد الرزاق (16232) عن معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين أن سالما مولى أبي حذيفة أعتقته امرأة من الأنصار، فلما قتل يوم اليمامة دفع ميراثه إلى الأنصارية التي أعتقته أو إلى ابنها.
عن ابن إسحاق قال: حدثني عبد اللَّه بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن عبد اللَّه بن وديعة بن خِدام بن خالد أخي بني عمرو بن عوف قال: كان سالم مولى أبي حذيفة مولى لامرأة منا يقال لها سلمى بنت يعار أعتقته سائبة في الجاهلية، فلما أصيب باليمامة أتى عمر بن الخطاب بميراثه، فدعا وديعة بن خدام، فقال: هذا ميراث مولاكم، وأنتم أحق به. فقال: يا أمير المؤمنين، قد أغنانا اللَّه عنه، قد أعتقته صاحبتنا سائبة، فلا نريد أن نندا من أمره شيئًا، أو قال: نرزأ. فجعله عمر في بيت المال.
رواه يعقوب بن سفيان في"المعرفة"، ومن طريقه البيهقي (10/ 300): ثنا محمد بن منصور، ثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، أنبأ أبي، عن ابن إسحاق فذكره. وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق؛ فإنه مدلس إلا أنه صرّح بالتحديث.
وفي الباب آثار أخرى ذكرها عبد الرزاق والبيهقي وغيرهما.
وأما أقوال العلماء في السائبة: فمنها قول الشافعي: العتق ماض، وولاءه لمعتقه، وإن تحرج من الأخذ به فيجعل في بيت المال.
ومنها: أن ميراث السائبة للمسلمين يرثونه، ويعقلون عنه. وبه قال مالك.
ومنها: أنه لا بأس بيع ولاء السائبة وهبته. وبه قال الكوفيون، وبه قال إبراهيم والشعبي.
وما ذهب إليه الشافعي هو الظاهر من النصوص، ومن قول النبي صلى الله عليه وسلم:"الولاء لمن أعتق". وهو الذي يذهب إليه البخاري؛ فإنه بعد أثر ابن مسعود، أورد حديث عائشة، وقال لها:"أعتقيها فإن
الولاء لمن أعتق".
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় ইসলামের অনুসারীরা (দাসকে) 'সাইবা' বানায় না, তবে জাহিলিয়াতের যুগের লোকেরা 'সাইবা' বানাত।
5956 - عن عمر بن الخطاب أنه كان يقول: الدية للعاقلة، ولا ترث المرأة من دية زوجها شيئًا، حتى قال له الضحاك بن سفيان: كتب إلي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن أورّث امرأة أشيم الضِّبابي من دية زوجها.
صحيح: رواه أبو داود (2927)، والترمذي (2110)، وابن ماجه (2642)، وأحمد (15745) كلهم من حديث الزهري، عن سعيد بن المسيب أن عمر بن الخطاب قال فذكره.
وأهل العلم مختلفون في سماع سعيد بن المسيب من عمر، والصحيح أنه سمع منه.
و"أشيم" بفتح الهمزة وسكون الشين. والضِّبابي - بكسر الضاد منسوب إلى محلة بالكوفة يقال لها: قلعة الضباب.
والضحاك بن سفيان هو الكلابي أبو سعيد صحب النبي صلى الله عليه وسلم، وعقد له لواء، وكان على صدقات قومه.
وقال ابن سعد: كان ينزل نجدا في موالي ضرية، وكان واليا على من أسلم هناك من قومه. وقد جاء في بعض الروايات أنه الضحاك بن قيس الفهري. هكذا وقع في رواية الطبراني في المعجم الكبير (1/ 282) عن المغيرة بن شعبة أن أسعد بن زرارة قال لعمر بن الخطاب: إن النبي صلى الله عليه وسلم كتب إلى الضحاك بن قيس أن يُوَرث امرأة أشْيم الضبابي من دية زوجها.
قال الحافظ الهيثمي في"المجمع" (4/ 230):"ورجاله ثقات".
قلت: فيه أمران مخالفان للواقع.
الأول: قوله: الضحاك بن قيس، وهو ليس بصحيح، فإن أكثر ما قيل فيه أن سنه عند وفاة النبي صلى الله عليه وسلم كان ثماني سنوات. قال الطبري:"مات النبي صلى الله عليه وسلم، وهو غلام يافع".
ويبدو أن الحافظ الهيثمي تنبه له، فقال في"المجمع":"الضحاك بن سفيان".
والأمر الثاني: قوله: أسعد بن زرارة. فيه خطأ جسيم، فإن أسعد بن زرارة مات في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، وهو يبني المسجد.
قال البغوي:"بلغني أنه أول من مات من الصحابة بعد الهجرة، وأول ميت صلى عليه النبي صلى الله عليه وسلم. فلعله تصحف كما قال الحافظ في ترجمته في الإصابة (1/ 35) من"سعد بن زرارة" إلى"أسعد بن زرارة"، أو أنه أسعد بن زرارة آخر". انتهى.
قال زيد: هي من سبعة وعشرين، وهي الأكدرية يعني أم الفروج.
رواه الدارمي (2973) عن سعيد بن عامر، عن همام، عن قتادة، أن زيد بن ثابت قال فذكره.
ورواه عبد الرزاق (19074) عن الثوري، عن الأعمش، عن إبراهيم أن عبد اللَّه قال في أم وأخت وزوج وجد: هي من ثمانية: للأخت النصف ثلاثة، وللزوج النصف ثلاثة، وللأم سهم، وللجد سهم. وقال زيد: هي من سبعة وعشرين ثم ذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: দিয়াত (রক্তপণ) হলো ‘আক্বিলা’র (গোত্রীয় পুরুষদের) উপর, এবং স্ত্রী তার স্বামীর রক্তপণ থেকে কিছুই মীরাস পাবে না। এমনকি (একবার) আদ-দাহ্হাক ইবনু সুফ্ইয়ান তাঁকে বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার নিকট লিখে পাঠিয়েছিলেন যে, আমি যেন আশইয়াম আদ-দ্বিবাবী’র স্ত্রীকে তার স্বামীর রক্তপণ থেকে উত্তরাধিকারী বানাই।
5957 - عن زينب أنها كانت تَفْلي رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وعنده امرأة عثمان بن مظعون، ونساء من المهاجرات يشكون منازلهن، وأنهن يخرجن منه، ويضيق عليهن فيه، فتكلمت زينب، وتركت رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنك لست تكلمين بعينيك، تكلمي واعملي عملك".
فأمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومئذ أن يُوَرَّث من المهاجرين النساءُ. فمات عبد اللَّه فورثته امرأته دارا بالمدينة.
حسن: رواه أبو داود (3080)، والبيهقي (6/ 156) من طريقه، وأحمد (27050) -واللفظ له- كلهم من حديث عبد الواحد بن زياد، حدثنا الأعمش، عن جامع بن شداد، عن كلثوم، عن زينب فذكرته.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (27049) من وجه آخر عن شريك، عن الأعمش، بإسناده مختصرا: أن النبي صلى الله عليه وسلم ورَّث النساءَ خِططهن.
وشريك هو ابن عبد اللَّه النخعي سيئ الحفظ، ولكنه توبع في الإسناد الأول.
وإسناده حسن من أجل كلثوم، وهو ابن علقمة، ذكره ابن حبان في ثقات التابعين، وقال ابن حجر في التقريب:"ثقة" والصحيح أنه"صدوق" فإنه لم يذكر هو ولا المزي من وثّقه غير ابن حبان، إلا أنه روى عنه جمع، كما ذكره المزي، ويقال: كان له صحبة.
وزينب التي كانت تَفْلي رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنها تكون بنت جحش أم المؤمنين، ومن المستبعد أن تكون هي زينب بنت معاوية زوج ابن مسعود، وكونها ورثت دارا بالمدينة بعد موت عبد اللَّه (ابن مسعود) فهو لبيان الواقع الذي وقع.
وقوله:"خططهن" الخطط -بكسر الخاء وفتح الطاء- هي وضع علامة على الأرض إشارة إلى امتلاكها، مثل خطط المدن للتمليك، سواء كان ذلك للدولة أو لأفراد الشعب.
ومعنى الحديث أن النبي صلى الله عليه وسلم وضع خِططًا للنساء المهاجرات شبه القطائع، فكن امتلكن هذه القطائع، فيها بيوت أزواجهن، فإنه جرت العادة أن المرأة إذا مات عنها زوجها كانت تطرد من
بيت زوجها، فورَّث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نساءَ المهاجرين بيوت أزواجهن بعد موتهم مثل تمليك الخطط إلا أن هذا الحكم كان مخصوصا بالمهاجرين، وبعد انقضائهم انقضى.
যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মাথা দেখছিলেন (উকুন ইত্যাদি পরিষ্কার করছিলেন)। এ সময় তাঁর কাছে উসমান ইবনে মাযঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী এবং অন্যান্য মুহাজির নারীগণ উপস্থিত ছিলেন। তারা তাদের বাসস্থান নিয়ে অভিযোগ করছিলেন যে, তাদের সেখান থেকে বের করে দেওয়া হচ্ছে এবং সেখানে তাদের জন্য সংকীর্ণতা সৃষ্টি করা হচ্ছে। তখন যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বলতে শুরু করলেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মাথা দেখা বন্ধ করে দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি তো তোমার চোখ দিয়ে কথা বলছো না (অর্থাৎ, মাথা দেখা বন্ধ করার দরকার নেই)। তুমি কথা বলতে থাকো এবং তোমার কাজও করতে থাকো।"
অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেদিন আদেশ করলেন যে, মুহাজিরদের মধ্য থেকে যেন নারীদেরও উত্তরাধিকার দেওয়া হয়। এরপর যখন আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসঊদ) ইন্তেকাল করলেন, তখন তাঁর স্ত্রী মদিনায় একটি বাড়ির উত্তরাধিকার লাভ করেছিলেন।
5958 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: توفي أبي وعليه دين، فعرضت على غرمائه أن يأخذوا التمر بما عليه، فأبوا، ولم يروا أن فيه وفاء، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت ذلك له، فقال: إذا جددته فوضعته في المربد آذنت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فجاء ومعه أبو بكر وعمر، فجلس عليه، ودعا بالبركة، ثم قال:"ادع غرماءك، فأوفهم". فما تركت أحدا له على أبي دين إلا قضيته، وفضل ثلاثة عشر وسقا، سبعة عجوة وستة لون، أو ستة عجوة وسبعة لون، فوافيت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم المغرب، فذكرت ذلك له، فضحك، فقال:"ائت أبا بكر وعمر فأخبرهما". فقالا: لقد علمنا إذ صنع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ما صنع أن سيكون ذلك.
صحيح: رواه البخاري في الصلح (2709) عن محمد بن بشار، حدثنا عبد الوهاب، حدثنا عبيد اللَّه، عن وهب بن كيسان، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমার পিতা মারা গেলেন এবং তাঁর উপর ঋণ ছিল। আমি তাঁর পাওনাদারদের কাছে প্রস্তাব করলাম যে, তারা যেন তাদের প্রাপ্য অনুযায়ী খেজুর নিয়ে নেয়। কিন্তু তারা অস্বীকার করল, কারণ তারা দেখল যে, তাতে ঋণ পরিশোধের মতো পর্যাপ্ত হবে না। অতঃপর আমি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁকে এ বিষয়ে জানালাম। তিনি বললেন: যখন তুমি তা পেড়ে গোলায় রাখবে, তখন তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর দিও। তিনি আসলেন এবং তাঁর সাথে আবূ বাকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। তিনি তার (খাবারের স্তূপের) উপর বসলেন এবং বরকতের জন্য দু‘আ করলেন। অতঃপর বললেন: "তোমার পাওনাদারদের ডাকো এবং তাদের পাওনা পরিশোধ করো।" যারাই আমার পিতার কাছে পাওনাদার ছিল, আমি তাদের প্রত্যেকের ঋণ পরিশোধ করলাম। এরপরও তের ওয়াসক খেজুর উদ্বৃত্ত রইল। সাত ওয়াসক ছিল ‘আজওয়া এবং ছয় ওয়াসক ছিল ‘লউন’ (অন্য প্রকারের খেজুর), অথবা ছয় ওয়াসক ছিল ‘আজওয়া এবং সাত ওয়াসক ছিল ‘লউন’। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মাগরিবের সালাতে মিলিত হলাম এবং তাঁকে এ সম্পর্কে বললাম। তিনি হাসলেন এবং বললেন: "আবূ বাকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট যাও এবং তাদের এ সংবাদ দাও।" তখন তারা (আবূ বাকর ও উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন যা করার তা করলেন, তখনই আমরা জানতাম যে, এমনটিই ঘটবে।
5959 - عن * *
৫৯৫৯ - ...হতে বর্ণিত।
5960 - عن ابن عباس في قوله عز وجل: {يُوصِيكُمُ اللَّهُ فِي أَوْلَادِكُمْ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ الْأُنْثَيَيْنِ} [النساء: 11] قال: كان الميراث للولد، وكانت الوصية للوالدين والأقربين، فنسخ اللَّه من ذلك ما أحب، فجعل للولد الذكر مثل حظ الأنثيين، وجعل للوالدين لكل واحد منهما السدس، وجعل للمرأة الثمن والربع، وللزوج الشطر والربع.
صحيح: رواه البخاري في الوصايا (2747) عن محمد بن يوسف، عن ورقاء، عن ابن أبي نجيح، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
وفي رواية (4578): وجعل للأبوين لكل واحد منهما السدس والثلث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে বলেন: “{আল্লাহ তোমাদেরকে তোমাদের সন্তানদের ব্যাপারে নির্দেশ দিচ্ছেন: পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান} [সূরা নিসা: ১১]।” তিনি বলেন: (ইসলামের শুরুতে) মিরাছ (উত্তরাধিকার) ছিল শুধু সন্তানের জন্য, আর পিতা-মাতা ও নিকটাত্মীয়দের জন্য ছিল অসিয়ত (মৃত্যুকালীন নির্দেশ)। অতঃপর আল্লাহ তাআলা এর মধ্য থেকে যা ইচ্ছা করলেন তা রহিত করে দিলেন। সুতরাং তিনি সন্তানের মধ্যে পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান নির্ধারণ করলেন, পিতা-মাতার প্রত্যেকের জন্য (মিরাছের) এক ষষ্ঠাংশ নির্ধারণ করলেন, স্ত্রীর জন্য (ক্ষেত্রেভেদে) এক অষ্টমাংশ ও এক চতুর্থাংশ নির্ধারণ করলেন এবং স্বামীর জন্য (ক্ষেত্রেভেদে) অর্ধেক ও এক চতুর্থাংশ নির্ধারণ করলেন।