আল-জামি` আল-কামিল
5961 - عن ابن عباس قال: {إِنْ تَرَكَ خَيْرًا الْوَصِيَّةُ لِلْوَالِدَيْنِ وَالْأَقْرَبِينَ} فكانت الوصية كذلك حتى نسختها آية الميراث.
حسن: رواه أبو داود (2869)، ومن طريقه البيهقي (6/ 265) عن أحمد بن محمد بن ثابت المروزي، حدثني علي بن حسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. وإسناده حسن من أجل علي بن الحسين بن واقد وأبيه؛ فإنهما حسنا الحديث.
كانت الوصية قبل نزول آية الميراث واجبة، ثم نُسخت للوارثين، فبقيت في غير الوارثين مستحبة، وهو رأي جمهور أهل العلم، إلا أن يكون عليه دين، أو عنده أمانة، أو وديعة؛ فيجب عليه أن يوصي بذلك للحفاظ على حقوق الآخرين.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "{যদি সে কিছু সম্পদ রেখে যায়, তবে পিতা-মাতা ও নিকটাত্মীয়দের জন্য ওসিয়ত করবে।}" সুতরাং ওসিয়ত এভাবেই প্রচলিত ছিল, যতক্ষণ না মীরাসের (উত্তরাধিকারের) আয়াত তা রহিত করে দেয়।
5962 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ما حق امرئ مسلم له شيء يريد أن يوصي فيه يبيت ليلتين إلا ووصيته مكتوبة عنده".
متفق عليه: رواه مالك في الوصية (1) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في الوصايا (2738) من طريق مالك.
ورواه مسلم في الوصية (1627) من أوجه أخرى عن نافع به مثله. وذلك في غير الوارثين.
أما ما روي عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"المحروم من حرم وصيته" فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (2700) عن نصر بن علي الجهضمي قال: حدثنا دُرست بن زياد قال: حدثنا يزيد الرقاشي، عن أنس بن مالك فذكره. ودرست بن زياد وشيخه يزيد -وهو ابن أبان الرقاشي- ضعيفان. وكذلك لا يصح ما روي عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه تصدق عليكم عند وفاتكم بثلث أموالكم زيادة لكم في أعمالكم".
رواه ابن ماجه (2709) عن علي بن محمد قال: حدثنا وكيع، عن طلحة بن عمرو، عن عطاء، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده ضعيف جدا؛ فإن طلحة بن عمرو الحضرمي المكي ضعيف جدا، بل قال الإمام أحمد:"لا شيء، متروك". ومن طريقه رواه أيضًا البيهقي (6/ 269).
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي الدرداء، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه تصدق عليكم بثلث أموالكم عند وفاتكم".
رواه أحمد (27482)، والبزار -كشف الأستار (1382) - كلاهما من حديث أبي اليمان، ثنا أبو بكر بن أبي مريم، عن ضمرة بن حبيب، عن أبي الدرداء فذكره.
قال البزار:"وهذا قد روي من غير وجه، وأعلى من روى في ذلك أبو الدرداء، ولا نعلم له طريقا غير هذا، وضمرة وابن أبي مريم معروفان بالنقل للعلم، واحتمل عنهما الحديث".
كذا قال رحمه الله! وأبو بكر بن أبي مريم هو أبو بكر بن عبد اللَّه بن أبي مريم الغساني الشامي، قد ينسب إلى جده، ضعيف باتفاق أهل العلم، وكان قد سرق بيته فاختلط.
وأما شيخه ضمرة بن حبيب -وهو الزبيدي- فهو كما قال البزار: كان معروفا بالعلم. وثّقه ابن سعد، وقال أبو حاتم:"لا بأس به". وقال العجلي:"شامي ثقة".
وفي الباب أيضًا عن أبي بكر الصديق، ومعاذ بن جبل، وغيرهما، وكلها ضعيفة، وإن كان يقوي بعضها بعضا. وإلى هذا ذهب جمهور أهل العلم، فقالوا: إن الوصية بالثلث لغير الوارثين مستحبة لمن وجد سعة، ولم يرد إضرار الورثة. وذهب الشافعي في القديم، وداود الظاهري إلى وجوب الوصية لغير الوارثين.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো মুসলিম ব্যক্তি যার কাছে এমন কিছু রয়েছে যা সম্পর্কে সে অসিয়ত করতে চায়, তার জন্য এটা উচিত নয় যে সে দু’টি রাতও অতিবাহিত করবে অথচ তার অসিয়ত তার কাছে লিখিত থাকবে না।
5963 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن الرجل ليعمل بعمل أهل الخير سبعين سنة، فإذا أوصى حاف في وصيته، فيختم له بشر عمله، فيدخل النّار. وإن الرجل ليعمل بعمل أهل الشر سبعين سنة، فيعدل في وصيته، فيختم له بخير عمله، فيدخل الجنّة".
قال أبو هريرة: اقرؤوا إن شئتم {تِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ} إلى قوله {وَلَهُ عَذَابٌ مُهِينٌ} [سورة النساء: 12 - 14].
حسن: رواه أبو داود (2867)، وابن ماجه (2704)، والترمذي (2117)، وأحمد (7743) واللفظ لأحمد، كلهم من حديث أشعث بن عبد اللَّه، عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة فذكره.
قال الترمذي:"حسن غريب".
قلت: وهو كما قال؛ فإن شهر بن حوشب عندي حسن الحديث، وثّقه أحمد، وابن معين، وغيرهما. وأما ما روي عن ابن عباس مرفوعا:"الإضرار في الوصية من الكبائر". فالصحيح أنه موقوف. رواه الدارقطني (4/ 151)، والعقيلي (3/ 189) من طريق عمر بن مغيرة، نا داود بن أبي هند، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره مرفوعا.
قال العقيلي:"لا نعرف أحدا رفعه غير عمر بن المغيرة المصيصي".
ورواه سعيد بن منصور (342 - 344)، ومن طريقه البيهقي (6/ 271) موقوفا على ابن عباس، وقال:"هذا هو الصحيح موقوف، وروي من وجه آخر مرفوعا، ورفعه ضعيف".
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি সত্তর বছর ধরে নেককারদের মতো আমল করে। কিন্তু যখন সে অসিয়ত করে, তখন সে তার অসিয়তে (শরীয়তের সীমা লঙ্ঘন করে) জুলুম করে বসে। ফলে তার জীবনের পরিসমাপ্তি ঘটে মন্দ আমলের মাধ্যমে এবং সে জাহান্নামে প্রবেশ করে। আর নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি সত্তর বছর ধরে মন্দ লোকদের মতো আমল করে। কিন্তু যখন সে অসিয়ত করে, তখন সে তার অসিয়তে ন্যায়বিচার প্রতিষ্ঠা করে। ফলে তার জীবনের পরিসমাপ্তি ঘটে উত্তম আমলের মাধ্যমে এবং সে জান্নাতে প্রবেশ করে।
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তোমরা যদি চাও, তবে পাঠ করো: {তিলকা হুদূদুল্লাহি} থেকে {ওয়া লাহূ আযাবুন মুহীন} পর্যন্ত (সূরা আন-নিসা: ১২-১৪)।
5964 - عن أبي أمامة قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول في خطبته عام حجة الوداع:"إن اللَّه قد أعطى كل ذي حق حقه، فلا وصية لوارث".
صحيح: رواه أبو داود (2870)، والترمذي (2120)، وابن ماجه (2713)، وأحمد (22294)، والبيهقي (6/ 72، 264) من طريق إسماعيل بن عياش، ثنا شرحبيل بن مسلم الخولاني قال: سمعت أبا أمامة الباهلي يقول فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في إسماعيل بن عياش، إلا أن روايته عن الشاميين لا بأس به، وهذا منها.
قال الترمذي:"حسن صحيح". وفي نسخة:"حسن غريب".
وقال:"وقد روي عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم من غير هذا الوجه، ورواية إسماعيل بن عياش عن أهل العراق وأهل الحجاز ليس بذاك فيما تفرد به؛ لأنه روى عنهم مناكير، وروايته عن أهل
الشام أصح، هكذا قال محمد بن إسماعيل".
وكذلك نقل البيهقي عن الإمام أحمد أنه قال:"إسماعيل بن عياش ما روي عن الشاميين صحيح، وما روي عن أهل الحجاز فليس بصحيح".
ونقل عن الشافعي بعد أن روى عنه عن ابن عيينة، عن سليمان الأحول، عن مجاهد أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا وصية لوارث" قال: وروى بعض الشاميين حديثا ليس مما يثبته أهل الحديث بأن بعض رجاله مجهولون، فروينا عن النبي صلى الله عليه وسلم منقطعا، واعتمدنا على حديث أهل المغازي عامة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال عام الفتح:"لا وصية لوارث"، وإجماع الأمة على القول به".
فالظاهر أنه يقصد به حديث أبي أمامة الذي يرويه إسماعيل بن عياش الشامي، عن شرحبيل بن مسلم، عن أبي أمامة.
وللحديث طريق آخر: وهو ما رواه ابن الجارود في المنتقى (949) عن أبي أيوب سليمان بن عبد المجيد البهراني قال: ثنا يزيد بن عبد ربه قال: ثنا الوليد بن مسلم قال: ثنا ابن جابر، وحدثني سُليم بن عامر وغيره، عن أبي أمامة، وغيره ممن شهد خطبة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومئذ، فكان فيما تكلم به:"ألا إن اللَّه قد أعطى كل ذي حق حقه، ألا لا وصية لوارث".
ورواه أبو داود (1955) من وجه آخر عن الوليد بن مسلم مختصرا.
وهذا إسناد صحيح، والوليد بن مسلم مدلس، ولكنه صرح بالتحديث في جميع طبقات الإسناد.
وابن جابر هو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر الأزدي أبو عتبة الشامي الدارمي، وثّقه ابن معين، وابن سعد، وأبو حاتم، وغيرهم.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিদায় হজ্জের বছর তাঁর খুতবার মধ্যে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা প্রত্যেক হকদারকে তার প্রাপ্য হক দিয়ে দিয়েছেন। সুতরাং কোনো উত্তরাধিকারীর (ওয়ারিসের) জন্য কোনো ওসিয়ত (উইল) নেই।"
5965 - عن عمرو بن خارجة، أن النبي صلى الله عليه وسلم خطبهم وهو على راحلته، وإن راحلته لتقصع بجرتها، وإن لُعَابها ليسيل بين كتفي قال:"إن اللَّه قسم لكل وارث نصيبه من الميراث، فلا يجوز لوارث وصية".
حسن: رواه الترمذي (2121)، والنسائي (6/ 247)، وابن ماجه (2712)، وأحمد (17669) لهم من طرق عن قتادة، عن شهر بن حوشب، عن عبد الرحمن بن غَنْم، عن عمرو بن خارجة، فذكره في حديث طويل تم تخريجه في العيدين.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب، غير أنه حسن الحديث، إذا لم يخالف، ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
وأما عمرو بن خارجة فقيل هكذا، وقيل: خارجة بن عمرو. والأول أصح.
আমর ইবনে খারিজাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মাঝে খুতবা দিচ্ছিলেন, তখন তিনি তাঁর সাওয়ারীর উপর আরোহণরত ছিলেন। আর তাঁর সাওয়ারীটি জাবর কাটছিল এবং তার লালা তাঁর (নবীজীর) দুই কাঁধের মাঝখান দিয়ে গড়িয়ে পড়ছিল। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ প্রত্যেক উত্তরাধিকারীর জন্য মীরাসের মধ্যে তার প্রাপ্য অংশ বন্টন করে দিয়েছেন। সুতরাং কোনো উত্তরাধিকারীর জন্য (অতিরিক্ত) ওসিয়ত করা বৈধ নয়।"
5966 - عن أنس بن مالك قال: إني لتحت ناقة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يسيل علي لعابها، فسمعته
يقول:"إن اللَّه جعل لكل ذي حق حقه، ألا لا وصية لوارث. . . .".
صحيح: رواه ابن ماجه (2714) عن هشام بن عمار قال: حدثنا محمد بن شعيب بن شابور قال: حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن سعيد بن أبي سعيد، أنه حدثه عن أنس بن مالك فذكره.
وإسناده صحيح، ومحمد بن شعيب وإن كان فيه كلام يسير فلا يضر، وقد توبع في أصل خطبة النبي صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع.
وأما سعيد بن أبي سعيد فهو المقبري حسب الظاهر، وقد قيل: إنه رجل آخر من ساحل بيروت، ذكرت ذلك في خطب النبي صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع، فراجعه.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উষ্ট্রীর নিচে ছিলাম, আর তার লালা আমার ওপর পড়ছিল। তখন আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: “নিশ্চয় আল্লাহ প্রত্যেক হকদারের জন্য তার প্রাপ্য হক নির্ধারণ করে দিয়েছেন। সাবধান! ওয়ারিশের (উত্তরাধিকারীর) জন্য কোনো অসিয়ত (উইল) নেই।”
5967 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تجوز وصية الوارث، والولد للفراش، وللعاهر حجر".
حسن: رواه ابن عدي في"الكامل" (2/ 817) عن ابن ذُرَيح، ثنا عبد الأعلى بن حماد، ثنا حماد بن سلمة، عن حبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.
وحبيب المعلم هو ابن أبي قريبة أبو محمد المعلم، بصري من رجال الجماعة، ذكره ابن عدي في الكامل؛ لأن عبد الرحمن ما كان يحدث به، وقال في نهاية الحديث:"ولحبيب أحاديث صالحة، وأرجو أنه مستقيم الرواية".
ولا يُعِلُّ هذا ما رواه الدارقطني (4/ 98) من طريق سهل بن عمار، نا الحسين بن الوليد، ثنا حماد بن سلمة، عن حبيب بن الشهيد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن النبي صلى الله عليه وسلم قال في خطبة يوم النحر:"لا وصية للوارث إلا أن يُجيز الورثة".
وذلك لأن سهل بن عمار هذا كذبه الحاكم، كما أنه زاد في المتن:"إلا أن يُجيز الورثة"، وهي زيادة منكرة، وأنه أخطأ في جعل الحديث من حبيب بن الشهيد، والصواب أنه حبيب المعلم، كما مضى.
وفي الباب ما روي عن جابر مرفوعا:"لا وصية لوارث".
رواه الدارقطني (4/ 97) عن أحمد بن محمد بن إسماعيل الأدمي، نا فضل بن سهل، حدثني إسحاق ابن إبراهيم الهروي، نا سفيان، عن عمرو، عن جابر فذكره. قال الدارقطني: الصواب مرسل.
ولعل مستنده ما ذكر عبد اللَّه بن علي بن المديني قال: سمعت أبي يقول:"أبو موسى الهروي روى عن سفيان، عن عمرو، عن جابر:"لا وصية لوارث" حدثنا به سفيان، عن عمرو مرسلا، وغمزه".
ذكره الذهبي في الميزان في ترجمة إسحاق بن إبراهيم الهروي.
وأخرجه ابن عدي عن أحمد بن محمد بن صاعد، عن أبي موسى الهروي، عن ابن عيينة. وأعله بأحمد هذا، وقال: هو أخو يحيى بن محمد بن صاعد، وأكبر منه، وأقدم موتا، وهو ضعيف".
وفي الباب ما روي أيضًا عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تجوز الوصية لوارث إلا أن يشاء الورثة".
رواه أبو داود في المراسيل (341)، والدارقطني (4/ 97)، ومن طريقه البيهقي (6/ 263) من حديث ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
وفيه علتان:
الأولى: تدليس ابن جريج.
والثانية: الانقطاع؛ فإن عطاء -وهو الخراساني- لم يدرك ابن عباس، ولم يره. قاله أبو داود. وقال البيهقي:"وقد روي من وجه آخر عنه، عن عكرمة، عن ابن عباس".
قلت: وهو ما رواه الدارقطني (4/ 98)، والبيهقي من حديث يونس بن راشد، عن عطاء الخراساني، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكر الحديث مثله.
قال البيهقي:"عطاء الخراساني غير قوي".
قال الحافظ في التلخيص (3/ 92):"وصله يونس بن راشد، فقال: عن عكرمة، عن ابن عباس. أخرجه الدارقطني، والمعروف المرسل".
ولكن قال الحافظ:"ورواه الدارقطني من طريق ابن عباس بسند حسن".
قلت: وهو يقصد ما رواه الدارقطني (4/ 98) عن يوسف بن سعيد، نا عبد اللَّه بن ربيعة، نا محمد ابن مسلم، عن ابن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا وصية لوارث".
وفيه عبد اللَّه بن ربيعة لا يعرف من هو؟ ولم يشتهر هذا الحديث عن ابن عباس، ولذا لم يذكره الزيلعي في"نصب الراية" (4/ 404) مع أنه ذكر الرواية المرسلة، والمتصلة بذكر يونس بن راشد.
وفي الباب أحاديث أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.
ومن العلماء من جعل حديث"لا وصية لوارث" من الأحاديث المتواترة؛ لأنه ليس من شرط المتواتر أن تكون كلها صحيحة، فإن كثرة المخارج للحديث تدل على استحالة الكذب فيه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ওয়ারিশের জন্য কোনো অসিয়ত করা জায়েজ নয়। আর সন্তান হলো বিছানার (স্বত্বাধিকারীর), এবং ব্যভিচারীর জন্য রয়েছে পাথর (হতাশা/ব্যর্থতা)।"
5968 - عن سعد بن أبي وقاص قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يعودني عام حجة الوداع من وَجَع اشتد بي، فقلتُ: إني قد بلغ بي من الوجَع، وأنا ذو مال، ولا يرثني إلا ابنة، أفأتصدق بثلثي مالي؟ قال:"لا". فقلت: بالشطر؟ فقال:"لا". ثم قال:"الثلث، والثلث كبير أو كثير، إنك أن تذر ورثتك أغنياء خير من أن تذرهم عالة يتكففون الناس".
متفق عليه: رواه مالك في الوصية (4) عن ابن شهاب، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه فذكره.
ورواه البخاري في الجنائز (1295) من حديث مالك.
ورواه مسلم في الوصية (1628) من وجه آخر عن ابن شهاب فذكره.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের বছর আমার উপর প্রবলভাবে চেপে বসা অসুস্থতার সময় আমাকে দেখতে এসেছিলেন। আমি বললাম, আমার রোগ তো চরম পর্যায়ে পৌঁছেছে, আর আমি প্রচুর সম্পদের মালিক। আমার এক মেয়ে ছাড়া আর কেউ ওয়ারিশ নেই। আমি কি আমার সম্পদের দুই-তৃতীয়াংশ সাদাকাহ করে দেব? তিনি বললেন, “না।” আমি বললাম, তবে কি অর্ধেক? তিনি বললেন, “না।” অতঃপর তিনি বললেন, “এক-তৃতীয়াংশ। আর এক-তৃতীয়াংশও অনেক। নিশ্চয়ই তুমি তোমার ওয়ারিশদেরকে সচ্ছল অবস্থায় রেখে যাওয়া, তাদেরকে মানুষের কাছে হাত পাতা অভাবগ্রস্ত অবস্থায় রেখে যাওয়ার চেয়ে উত্তম।”
5969 - عن ابن عباس قال: لو أن الناس غضوا من الثلث إلى الربع؛ فإن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"الثلث، والثلث كثير".
متفق عليه: رواه البخاري في الوصايا (2743)، ومسلم في الوصية (1629) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن ابن عباس فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যদি মানুষ এক-তৃতীয়াংশ (অসীয়ত) থেকে কমিয়ে এক-চতুর্থাংশ করে নিত, (তবে ভালো হতো)। কেননা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "এক-তৃতীয়াংশ, আর এক-তৃতীয়াংশও অনেক।"
5970 - عن حنظلة بن حِذْيم أن جده حنيفة قال لحذيم: اجمع لي بَنيَّ؛ فإني أريد أن أوصي. فجمعهم، فقال: إن أول ما أوصي أن لِيتيمي هذا الذي في حجري مائة من الإبل التي كنا نسميها في الجاهلية: المُطيَّبة. فقال حذيم: يا أبت، إني سمعت بنيك يقولون: إنما نقر بهذا عند أبينا، فإذا مات رجعنا فيه، قال: فبيني وبينكم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فقال حذيم: رضينا. فارتفع حذيم، وحنيفة، وحنظلة معهم غلام، وهو رديف الحذيم، فلما أتوا النبي صلى الله عليه وسلم سلموا عليه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"وما رفعك يا أبا حذيم؟" قال: هذا، وضرب بيده على فخذ حذيم. فقال: إني خشيت أن يفجأني الكبر أو الموت، فأردت أن أوصي، وإني قلت: إن أول ما أوصي أن ليتيمي هذا الذي في حجري مائة من الإبل، كنا نسميها في الجاهلية المُطيَّبة، فغضب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، حتى رأينا الغضب في وجهه، وكان قاعدا، فجثا على ركبتيه، وقال:"لا، لا، لا، الصدقة خمس، وإلا فعشر، وإلا فخمس عشرة، وإلا فعشرون، وإلا فخمس وعشرون، وإلا فثلاثون، وإلا فخمس وثلاثون، فإن كثرت فأربعون".
قال: فودَّعوه، ومع اليتيم عصا، وهو يضرب جملا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"عظُمت هذه هِراوة يتيم".
قال حنظلة: فدنا بي إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: إن لي بنين ذوي لحي، ودون ذلك، وإن ذا أصغرهم، فادع اللَّه له، فمسح رأسه، وقال: بارك اللَّه فيك، أو بورك فيه".
قال ذيال: فلقد رأيت حنظلة يؤتى بالإنسان الوارم وجهه، أو البهيمة الوارمة الضرع، فيتفُل على يديه، ويقول: بسم اللَّه، ويضع يده على رأسه، ويقول: على موضع كف رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فيمسحه عليه، وقال ذيال: فيذهب الورم.
صحيح: رواه أحمد (20665) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، حدثنا ذيَّال بن عبيد بن حنظلة قال: سمعت حنظلة بن حِذيم جدي قال فذكره.
وإسناده صحيح.
হানযালা ইবনে হিযাইম থেকে বর্ণিত যে, তাঁর দাদা হুনায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ছেলে হিযাইমকে বললেন: আমার সন্তানদের একত্রিত করো; কারণ আমি উপদেশ (অসিয়ত) দিতে চাই।
তিনি তাদের একত্রিত করলেন। এরপর হুনায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি প্রথম যে বিষয়ে অসিয়ত করছি তা হলো, আমার কোলে থাকা এই ইয়াতীমের জন্য সেই উটগুলোর মধ্যে থেকে একশ' উট থাকবে, জাহিলিয়্যাতের যুগে আমরা যেগুলোর নাম দিয়েছিলাম 'আল-মুতাইয়্যাবাহ' (উত্তম উট)।
তখন হিযাইম বললেন: হে আব্বা, আমি আপনার ছেলেদের বলতে শুনেছি যে, আমরা আমাদের বাবার সামনে এতে সম্মতি দিচ্ছি ঠিকই, কিন্তু বাবা মারা গেলে আমরা তা ফিরিয়ে নেব। হুনায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে আমার ও তোমাদের মধ্যে ফায়সালা করবেন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।
হিযাইম বললেন: আমরা রাজি। অতঃপর হিযাইম, হুনায়ফা এবং হানযালা উপরে উঠলেন (মদীনার দিকে রওয়ানা হলেন)। তাদের সাথে একটি ছোট ছেলে ছিল, যে ছিল হিযাইমের পিছনে সওয়ার (আরদফ)। তারা যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, তখন তাঁকে সালাম দিলেন।
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবূ হিযাইম, কিসের জন্য তুমি উঠে এসেছো (বা এখানে এসেছো)?" তিনি বললেন: এই ব্যাপারে। আর (এ কথা বলে) তিনি হিযাইমের উরুর উপর হাত দিয়ে আঘাত করলেন।
তিনি (হুনায়ফা) বললেন: আমি আশঙ্কা করেছি যে, বার্ধক্য অথবা মৃত্যু আমাকে হঠাৎ গ্রাস করবে। তাই আমি অসিয়ত করতে চাইলাম। আমি বলেছিলাম: প্রথম যে বিষয়ে আমি অসিয়ত করছি, তা হলো আমার কোলে থাকা এই ইয়াতীমের জন্য একশ' উট থাকবে, জাহিলিয়্যাতের যুগে আমরা যেগুলোর নাম দিয়েছিলাম 'আল-মুতাইয়্যাবাহ'।
এ কথা শুনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত হলেন, এমনকি আমরা তাঁর চেহারায় রাগের চিহ্ন দেখতে পেলাম। তিনি বসে ছিলেন, অতঃপর তিনি হাঁটু গেড়ে বসলেন।
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, না, না। সাদাকাহ (দান/উপহার) হবে পাঁচটি। নতুবা দশটি। নতুবা পনেরোটি। নতুবা বিশটি। নতুবা পঁচিশটি। নতুবা ত্রিশটি। নতুবা পঁয়ত্রিশটি। যদি তা খুব বেশি হয়, তবে চল্লিশটি।"
হানযালা বললেন: এরপর তাঁরা তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট থেকে বিদায় নিলেন। ইয়াতীম ছেলেটির হাতে একটি লাঠি ছিল, যা দিয়ে সে একটি উটকে আঘাত করছিল।
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি তো এক ইয়াতীমের বিরাট লাঠি (বড় সম্পদ)!"
হানযালা বললেন: এরপর তিনি (তাঁর দাদা হুনায়ফা) আমাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে নিয়ে গেলেন এবং বললেন: আমার দাড়িওয়ালা কিছু ছেলে আছে, আর এর চেয়ে ছোটরাও আছে। আর এ (হানযালা) হলো তাদের মধ্যে সবচেয়ে ছোট। আপনি তার জন্য আল্লাহর কাছে দু‘আ করুন।
তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার মাথায় হাত বুলালেন এবং দু‘আ করলেন: "আল্লাহ যেন তোমার মধ্যে বরকত দান করেন," অথবা "তার মধ্যে বরকত হোক।"
যিয়্যাল (রাবী) বলেন: আমি হানযালাকে দেখেছি, তাঁর কাছে এমন কোনো ব্যক্তি আনা হতো, যার মুখ ফুলে গেছে, অথবা এমন কোনো চতুষ্পদ জন্তু আনা হতো, যার স্তন ফুলে গেছে। তখন তিনি তাঁর দু’হাতে থুতু দিতেন এবং ‘বিসমিল্লাহ’ বলতেন। এরপর তিনি নিজের মাথায় হাত রেখে বলতেন: "এটা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতের স্পর্শের স্থান।" এরপর তিনি সেই ফোলা জায়গায় হাত বুলিয়ে দিতেন। যিয়্যাল বলেন: ফলে ফোলা দূর হয়ে যেত।
5971 - عن عمران بن حصين أن رجلا أعتق ستة مملوكين له عند موته، لم يكن له مال
غيرهم، فدعا بهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فجزّأهم أثلاثا، ثم أقرع بينهم، فأعتق اثنين، وأرق أربعة، وقال له قولا شديدا.
صحيح: رواه مسلم في البيوع (1668) من طرق عن إسماعيل بن علية، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي المهلب، عن عمران بن حصين فذكره.
وقوله:"وقال له قولا شديدا" هو كما جاء في السنن:"لو شهدته قبل أن يُدفن لم يقبر في مقابر المسلمين".
ইমরান বিন হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার মৃত্যুর সময় তার ছয়জন ক্রীতদাসকে মুক্ত করে দিল। তাদের ছাড়া তার আর কোনো সম্পদ ছিল না। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের (ক্রীতদাসদের) ডেকে আনলেন এবং তাদের তিন ভাগে ভাগ করলেন। এরপর তিনি তাদের মাঝে লটারি করলেন। ফলে তিনি দু’জনকে মুক্ত করে দিলেন এবং চারজনকে দাস (গোলাম) হিসেবে বহাল রাখলেন। আর তিনি তাকে কঠিন কথা বললেন।
5972 - عن أبي هريرة أن رجلا كان له ستة أعبد، فأعتقهم عند موته، فأقرع النبي صلى الله عليه وسلم بينهم، فأعتق منهم اثنين، وأرق أربعة.
صحيح: رواه ابن أبي شيبة (23847، 37239) عن عبيد اللَّه بن موسى، عن إسرائيل، عن عبد اللَّه بن المختار، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح، وعبد اللَّه بن المختار ثقة، وثقه ابن معين، والنسائي، وغيرهما. وقال أبو حاتم:"لا بأس به".
وفي الباب ما روي عن أبي سعيد الخدري أن رجلا في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أعتق ستة مملوكين، لم يكن له مال غيرهم، ومات الرجل، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، فأقرع بينهم، فأعتق اثنين، وأرق أربعة.
رواه البزار -كشف الأستار- (1396) عن بشر بن خالد العسكري، ثنا يزيد بن هارون، ثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن سعيد بن المسيب، عن أبي سعيد فذكره.
قال البزار:"رواه غير يزيد عن سعيد بن المسيب مرسلا، ووصله يزيد مرة بغداد".
قلت: وفيه علي بن زيد، وهو ابن جدعان ضعيف.
ورواه البيهقي (10/ 286) من طريق ابن جريج، أخبرني قيس بن سعد، أنه سمع مكحولا يقول: سمعت سعيد بن المسيب يقول:"أعتقت أمرأة أو رجل ستة أعبد لها. . .، فذكر نحوه.
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي أمامة، رواه الدارقطني (4/ 234).
ذهب إلى هذه الأحاديث والآثار جمهور أهل العلم: مالك، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، وجماعة من أهل الحديث والأثر.
وقال أبو حنيفة وأصحابه فيمن أعتق عبيدا له في مرضه، ولا مال له غيرهم، أنه يعتق من كل واحد منهم ثلثه، ويسعى في ثلثي قيمته الورثة، وقال: حكمه ما دام يسعى حكم المكاتب.
وقال أبو يوسف، ومحمد: هم أحرار، وثلثا قيمتهم دين عليهم، يسعون في ذلك حتى يؤدوه إلى الورثة.
انظر للمزيد"التمهيد" (23/ 421)، فقد بسط الكلام عليه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তির ছয়টি গোলাম ছিল। সে তার মৃত্যুর সময় তাদেরকে মুক্ত করে দিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের মাঝে লটারি করলেন। ফলে তিনি তাদের মধ্য থেকে দু'জনকে মুক্ত করে দিলেন এবং চারজনকে দাস হিসেবে বহাল রাখলেন।
5973 - عن عائشة قالت: ما ترك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم دينارا ولا درهما، ولا شاة ولا بعيرا، ولا أوصى بشيء.
صحيح: رواه مسلم في الوصية (1635) من طرق عن الأعمش، عن أبي وائل، عن مسروق، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিনার বা দিরহাম (স্বর্ণমুদ্রা বা রৌপ্যমুদ্রা) রেখে যাননি, না কোনো বকরী বা উট, আর তিনি কোনো কিছুর অসিয়তও করেননি।
5974 - عن عمرو بن الحارث ختن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أخي جويرية بنت الحارث قال: ما ترك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عند موته درهما ولا دينارا، ولا عبدا ولا أمة، ولا شيئًا إلا بغلته البيضاء، وسلاحه، وأرضا جعلها صدقة.
صحيح: رواه البخاري في الوصايا (2739) عن إبراهيم بن الحارث، حدثنا يحيى بن أبي بكير، حدثنا زهير بن معاوية الجعفي، حدثنا أبو إسحاق، عن عمرو بن الحارث فذكره.
আমর ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভগ্নিপতি এবং জুওয়াইরিয়াহ বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ভাই ছিলেন— তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মৃত্যুর সময় কোনো দিরহাম, কোনো দীনার, কোনো দাস, কোনো দাসী, অথবা অন্য কোনো কিছুই রেখে যাননি। তবে তিনি রেখে গিয়েছিলেন তাঁর সাদা খচ্চর, তাঁর অস্ত্রশস্ত্র এবং যে জমি তিনি সাদকা (দান) হিসেবে নির্ধারণ করে দিয়েছিলেন।
5975 - عن طلحة بن مصرف قال: سألت عبد اللَّه بن أبي أوفى: هل كان النبي صلى الله عليه وسلم أوصى؟ فقال: لا. فقلت: كيف كتب على الناس الوصية؟ أو أمروا بالوصية؟ قال: أوصى بكتاب اللَّه.
متفق عليه: رواه البخاري في الوصايا (2740) من طريق مالك، عن طلحة بن مصرف فذكره. وليس في رواية موطأ يحيى الليثي.
ورواه مسلم في الوصية (1636) من وجه آخر عن طلحة بن مصرف.
আবদুল্লাহ ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তালহা ইবনু মুসাররিফ তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি কোনো ওসিয়ত করে গিয়েছিলেন? তিনি বললেন: না। আমি (তালহা) বললাম: তাহলে মানুষের উপর ওসিয়ত ফরয করা হলো কেন? অথবা তাদের ওসিয়ত করার নির্দেশ দেওয়া হলো কেন? তিনি বললেন: তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর কিতাবের ব্যাপারে ওসিয়ত করে গেছেন।
5976 - عن علي قال: كان آخر كلام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الصلاة، الصلاة، اتقوا اللَّه فيما ملكت أيمانكم".
حسن: رواه أبو داود (5156)، وابن ماجه (2698) كلاهما من حديث محمد بن فضيل، عن مغيرة، عن أم موسى، عن علي فذكره.
وإسناده حسن من أجل أم موسى، وهي سرية علي، قيل: إنها فاختة. وقيل: حبيبة، روى عنها مغيرة بن مقسم الضبي، قال الدارقطني:"حديثها مستقيم، يخرج حديثها اعتبارا". وقال العجلي:"كوفية تابعية ثقة".
وفي الباب عن أم سلمة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يقول في مرضه الذي توفي فيه:"الصلاة، وما ملكت أيمانكم" فما زال يقولها حتى ما يفيض بها لسانه.
رواه ابن ماجه (1625)، وأحمد (2665، 26727)، وأبو يعلى (6979) كلهم من حديث همام، عن قتادة، عن صالح أبي الخليل، عن سفينة، عن أم سلمة فذكرته.
ورجاله ثقات غير أن فيه انقطاعا؛ فإن صالحا -وهو ابن أبي مريم الضبعي مولاهم أبو خليل- روايته عن سفينة مرسلة، إلا أن رواية همام عن قتادة أصح من رواية سليمان التيمي، عن قتادة، عن أنس، وهو الآتي.
قال ابن أبي حاتم: سألت أبي، وأبا زرعة عن حديث رواه المعتمر بن سليمان، عن أبيه، عن قتادة، عن أنس قال: كانت عامة وصية رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حين حضره الموت:"الصلاة وما ملكت أيمانكم".
قال أبي: نرى أن هذا خطأ، والصحيح حديث همام، عن قتادة، عن صالح أبي الخليل، عن سفينة، عن أم سلمة، عن النبي صلى الله عليه وسلم.
وقال أبو زرعة:"رواه سعيد بن أبي عروبة، فقال: عن قتادة، عن سفينة، عن أم سلمة، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقال: وابن أبي عروبة أحفظ، وحديث همام أشبه، زاد همام رجلا". انتهى."العلل" (1/ 110 - 111).
وحديث سعيد بن أبي عروبة رواه أحمد (26483، 26684)، والنسائي في"الكبرى" (7098) عن قتادة، أن سفينة مولى أم سلمة حدث عن أم سلمة فذكرته.
وقال النسائي:"قتادة لم يسمعه من سفينة".
وأما حديث أنس فرواه ابن ماجه (2697)، وأحمد (12169)، وابن حبان (6605) كلهم من حديث سليمان التيمي، عن قتادة، عن أنس قال: كان آخر وصية رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وهو يغرغر بها في صدره، وما كان يُفيض بها لسانه:"الصلاة، الصلاة، اتقوا اللَّه فيما ملكت أيمانكم".
وأما الحاكم (3/ 57) فرواه من هذا الوجه، ولكنه أسقط"قتادة" بين سليمان، وأنس، فجعله عن أنس.
قال النسائي:"وسليمان التيمي لم يسمع هذا الحديث من أنس".
السنن الكبرى (7095)، ثم رواه النسائي في الكبرى (7096) من حديث سليمان، عن قتادة، عن صاحب له، عن أنس نحوه. فهذه علته لهذا الإسناد.
ومجموع هذه الأحاديث تقوّي حديث علي بن أبي طالب، وتفيد على أن له أصلا.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সর্বশেষ কথা ছিল: "সালাত, সালাত (নামাজ, নামাজ), তোমাদের ডান হাত যার অধিকারী (তোমাদের অধীনস্থ দাস-দাসী ও কর্মচারীদের) বিষয়ে আল্লাহকে ভয় করো।"
5977 - عن ابن عباس أنه قال: يوم الخميس، وما يوم الخميس؟ ثم بكى حتى خضب دمعُه الحَصْباء، فقال: اشتد برسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وجعه يوم الخميس، فقال:"ائتوني بكتاب، أكتب لكم كتابا لن تضلوا بعده أبدا". فتنازعوا، ولا ينبغي عند نبي تنازع،
فقالوا: هجر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"دعوني، فالذي أنا فيه خير مما تدعونني إليه".
وأوصى عند موته بثلاث:"أخرجوا المشركين من جزيرة العرب، وأجيزوا الوفد بنحو ما كنت أُجيزهم". ونسيت الثالثة.
قال يعقوب بن محمد: سألت المغيرة بن عبد الرحمن عن جزيرة العرب، فقال: مكة، والمدينة، واليمامة، واليمن.
وقال يعقوب: والعرج أول تهامة.
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (3053)، ومسلم في الوصية (1637) كلاهما من حديث سفيان بن عينة، عن سليمان الأحول، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
اختلف أهل العلم في تحديد جزيرة العرب، والصحيح هي الأرض الواقعة بين بحر الهند، وبحر القلزم، والخليج العربي، وبحر الحبشة، وأضيفت إلى العرب؛ لأنها كانت بأيديهم، وبها أوطانهم ومنازلهم، ولكن الذي يمنع المشركون من سكناه منها: الحجاز خاصة -وهو مكة والمدينة- على رأي جمهور العلماء. وأما دخولهم في الحرم المصلحة المسلمين فلا بد من إذن الإمام أو من ينوب عنه كما قال الشافعي وغيره. انظر للمزيد"فتح الباري" (6/ 171).
وقوله:"هجر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم"، وفي صحيح مسلم:"أهجر؟ استفهموه". قال القاضي عياض: وهو أصح من رواية من روي: هجر، يهجر. لأن هذا كله لا يصح منه صلى الله عليه وسلم؛ لأن معنى هجر: هذي. وإنما جاء هذا من قائله استفهاما للإنكار على من قال: لا تكتبوا. أي: لا تتركوا أمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وتجعلوه كأمر من هجر في كلامه؛ لأنه صلى الله عليه وسلم لا يهجر".
وقوله:"دعوني، فالذي أنا فيه خير" معناه دعوني من النزاع واللغط الذي شرعتم فيه، فالذي أنا فيه من مراقبة اللَّه والتأهب للقائه أفضل مما أنتم فيه.
وقوله:"وأجيزوا الوفد" هذا أمر من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بإجازة الوفود، وضيافتهم، وإكرامهم تطييبا لنفوسهم، وترغيبا لغيرهم من المؤلفة قلوبهم ونحوهم؛ لأن في آخر أيام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كثرت الوفود من جميع النواحي للدخول في الإسلام.
وقوله:"نسيت الثالثة" وفي رواية:"وسكت عن الثالثة، أو قالها، فأُنسيتها". فقوله:"سكت" أي ابن عباس، فلم يذكر الثالثة.
"أو قالها فأُنسيتها" قائلها سعيد بن جبير.
وقيل: الثالثة هي تجهيز جيش أسامة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বৃহস্পতিবার, আর সেই বৃহস্পতিবার কেমন ছিল? অতঃপর তিনি কাঁদতে শুরু করলেন, এমনকি তাঁর চোখের পানিতে (ভূমিতে থাকা) ছোট নুড়ি পাথরগুলো ভিজে গেলো। তিনি বললেন: বৃহস্পতিবার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কষ্ট খুব তীব্র হয়ে গেল। তিনি বললেন: "তোমরা আমার কাছে কাগজ নিয়ে আসো, আমি তোমাদের জন্য এমন কিছু লিখে দেবো, যার পর তোমরা আর কখনোই পথভ্রষ্ট হবে না।" অতঃপর তারা পরস্পর মতবিরোধ করতে লাগলেন, অথচ কোনো নবীর সামনে মতভেদ করা উচিত নয়।
তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (অসুস্থতার কারণে) বেহুঁশ হয়ে গেছেন/প্রলাপ বকছেন। তিনি বললেন: "আমাকে ছেড়ে দাও। তোমরা আমাকে যেদিকে ডাকছো (অর্থাৎ লেখালেখি), তার চেয়ে আমি এখন যাঁর মধ্যে আছি, সেটাই উত্তম।"
আর তিনি তাঁর মৃত্যুর সময় তিনটি ওসিয়ত করেছিলেন: "তোমরা আরব উপদ্বীপ থেকে মুশরিকদেরকে বের করে দেবে, এবং যেভাবে আমি প্রতিনিধিদলকে পুরস্কৃত করতাম, তোমরাও তাদেরকে সেভাবে পুরস্কৃত করবে।" (ইবনে আব্বাস বলেন) আর আমি তৃতীয়টি ভুলে গেছি।
5978 - عن ابن عباس أنه قال: يوم الخميس، وما يوم الخميس؟ ثم جعل تسيل دموعُه حتى رأيت على خديه كأنها نظام اللؤلؤ. قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ائتوني بالكتف والدواة -أو اللوح والدواة- أكتب لكم كتابا لن تضلوا بعده أبدا".
فقالوا: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يهجر.
صحيح: رواه مسلم في الوصية (1637: 21) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا وكيع، عن مالك ابن مغول، عن طلحة بن مصرف، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বৃহস্পতিবার, আর বৃহস্পতিবার কী (গুরুত্বপূর্ণ দিবস)! অতঃপর তাঁর চোখ থেকে অশ্রু ঝরতে লাগল, এমনকি আমি তার উভয় গালে মুক্তোর মালার মতো অশ্রু দেখতে পেলাম। তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা আমার কাছে কাঁধের হাড় ও দোয়াত নিয়ে আসো— অথবা (তিনি বললেন) ফলক ও দোয়াত নিয়ে আসো— আমি তোমাদের জন্য এমন একটি কিতাব (দলিল) লিখে দেব, যার পর তোমরা আর কখনও পথভ্রষ্ট হবে না।" তখন তারা বলল: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভুল বকছেন।
5979 - عن ابن عباس قال: لما حُضر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وفي البيت رجال، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"هلموا، أكتب لكم كتابا لا تضلوا بعده".
فقال بعضهم: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد غلبه الوجع، وعندكم القرآن، حسبنا كتاب اللَّه، فاختلف أهل البيت، واختصموا، فمنهم من يقول: قربوا يكتب لكم كتابا لا تضلوا بعده. ومنهم من يقول غير ذلك.
فلما أكثروا اللغو والاختلاف قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"قوموا".
قال عبيد اللَّه: فكان يقول ابن عباس: إن الرزية كل الرزية ما حال بين رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وبين أن يكتب لهم ذلك الكتاب لاختلافهم ولغَطهم.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4432)، ومسلم في الوصية (1637: 22) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة، عن ابن عباس فذكره، واللفظ للبخاري.
وفي مسلم:"فيهم عمر بن الخطاب، فقال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد غلب عليه الوجع، وعندكم القرآن، حسبنا كتاب اللَّه".
وقول عمر:"حسبنا كتاب اللَّه" رد على من نازع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، لا على أمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. ومعناه أن كتاب اللَّه شامل لكل شيء، كقوله تعالى: {مَا فَرَّطْنَا فِي الْكِتَابِ مِنْ شَيْءٍ} [الأنعام: 38] وهو أراد بذلك الترفيه على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، لا الاستغناء عن السنة؛ فإن كتاب اللَّه أحوج إلى السنة من السنة إلى الكتاب لمعرفة المراد من كتاب اللَّه.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (মৃত্যুর) সময় আসন্ন হলো এবং ঘরে কয়েকজন লোক উপস্থিত ছিলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা এসো, আমি তোমাদের জন্য এমন একটি কিতাব (দলিল) লিখে দেবো, যার পরে তোমরা আর পথভ্রষ্ট হবে না।"
তখন তাদের কেউ কেউ বললো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর কষ্টের (রোগের) প্রভাব প্রবল হয়ে উঠেছে। আর তোমাদের কাছে তো কুরআন আছেই, আল্লাহর কিতাবই আমাদের জন্য যথেষ্ট। ফলে গৃহবাসীরা (উপস্থিত লোকেরা) মতভেদ করলো এবং বাদানুবাদ শুরু করলো। তাদের মধ্যে কেউ কেউ বলছিলেন, "কাছে আসো, তিনি তোমাদের জন্য এমন একটি কিতাব লিখে দেবেন, যার পরে তোমরা পথভ্রষ্ট হবে না।" আর তাদের কেউ কেউ এর বিপরীত কথা বলছিলেন।
যখন তারা বেশি তর্ক-বিতর্ক ও বাগ্বিতণ্ডা করতে লাগলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা উঠে যাও।"
উবাইদুল্লাহ (বর্ণনাকারী) বলেন, ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রায়ই বলতেন: সমস্ত দুর্ভোগ (বড় ক্ষতি) হচ্ছে সেটাই, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এবং তাঁদের জন্য সেই কিতাব লিখে দেওয়ার মধ্যে তাদের মতভেদ ও গোলমালের কারণে অন্তরায় সৃষ্টি করেছিল।
5980 - عن الأسود بن يزيد قال: ذكروا عند عائشة أن عليًّا كان وصيا، فقالت: متى أوصى إليه؟ لقد كنت مسندتَه إلى صدري (أو قالت: حجري)، فدعا بالطسْت، فلقد انخنث في حجري، وما شعرت أنه مات، فمتى أوصى إليه؟
متفق عليه: رواه البخاري في الوصايا (2741)، ومسلم في الوصية (1636) كلاهما من حديث إسماعيل بن علية، عن ابن عون، عن إبراهيم، عن الأسود فذكره.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর নিকট লোকেরা উল্লেখ করল যে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাকি (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) ওয়াসী ছিলেন। তিনি (আয়েশা) বললেন: তিনি কখন আলীর প্রতি ওয়াসিয়াত করে গেলেন? আমি তো তাঁকে আমার বুকের (অথবা বলেছেন: আমার কোলের) সাথে হেলান দিয়ে রেখেছিলাম। অতঃপর তিনি একটি পাত্র চাইলেন। তিনি আমার কোলেই ঢলে পড়লেন, আর আমি টের পাইনি যে তিনি মারা গেছেন। তাহলে তিনি কখন আলীর প্রতি ওয়াসিয়াত করে গেলেন?