আল-জামি` আল-কামিল
5988 - عن * *
৫৯৮৮ - ...থেকে বর্ণিত * *
5989 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أيما رجل أعتق امرأ مسلما، استنقذ اللَّه بكل عضو منه عضوا منه من النار".
قال سعيد بن مرجانة: فانطلقت به إلى علي بن حسين، فعمد علي بن حسين رضي الله عنهما إلى عبد له قد أعطاه به عبد اللَّه بن جعفر عشرة آلاف درهم أو ألف دينار، فأعتقه.
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2517)، ومسلم في العتق (1509: 24) كلاهما من طريق عاصم بن محمد العمرى، حدثني واقد بن محمد (يعني أخاه)، حدثني سعيد بن مُرجانة صاحب علي بن حسين قال: قال لي أبو هريرة رضي الله عنه فذكره.
وعلي بن الحسين هو ابن علي بن أبي طالب، زين العابدين.
ورواه أحمد (9441)، وابن الجارود (968)، والبيهقي (6/ 273) كلهم من طريق مكي بن إبراهيم، عن عبد اللَّه بن سعيد بن أبي هند، عن إسماعيل بن أبي حكيم مولى آل الزبير، عن سعيد بن مرجانة، وزاد فيه:"حتى إنه ليعتق باليد اليدّ، وبالرجل الرجلَ، وبالفرج الفرجَ". ورجاله ثقات.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মুসলিম দাসকে মুক্ত করবে, আল্লাহ তার প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে মুক্তিদাতার একটি অঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করবেন।"
সাঈদ ইবনে মারজানা বলেন: অতঃপর আমি তাঁকে আলী ইবনে হুসাইনের নিকট নিয়ে গেলাম। তখন আলী ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর এক গোলামের দিকে মনোযোগ দিলেন, যার বিনিময়ে আব্দুল্লাহ ইবনে জাফর তাঁকে দশ হাজার দিরহাম অথবা এক হাজার দীনার দিয়েছিলেন, অতঃপর তিনি তাকে মুক্ত করে দিলেন।
5990 - عن أبي نَجيح السلمي (هو عمرو بن عبسة) قال: حاصرنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بقصر الطائف -قال معاذ: سمعت أبي يقول: بقصر الطائف، بحصن الطائف، كل ذلك- فسمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من بلغ بسهم في سبيل اللَّه عز وجل فله درجة". وساق الحديث. وسمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"أيما رجل مسلم أعتق رجلا مسلما فإن اللَّه عز وجل جاعل وقاء كل عظم من عظامه عظما من عظام محرَّره من النار. وأيما امرأة أعتقت امرأة مسلمة فإن اللَّه جاعل وقاء كل عظم من عظامها عظما من عظام محررها من النار يوم القيامة".
صحيح: رواه أبو داود (3965)، والترمذي (1638)، والنسائي (3143)، وصحّحه ابن حبان (4615)،
والحاكم (2/ 95، 3/ 49 - 50)، والبيهقي (10/ 272)، وأحمد (17022) كلهم من طرف عن هشام بن أبي عبد اللَّه، عن قتادة، عن سالم بن أبي الجعد، عن معدان بن أبي طلحة، عن أبي نجيح السلمي قال فذكره، ومنهم من اختصره.
قال الترمذي:"هذا حديث صحيح. وأبو نَجيح هو عمرو بن عبسة".
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: سالم بن أبي الجعد يروي هذا الحديث عن معدان بن أبي طلحة، كما يروي عن رجل، عن أبي نَجيح، فالظاهر أن المبهم هو معدان بن أبي طلحة.
كما يروي عن كعب بن مرة، ولكن أدخل شعبة بينهما شرحبيل بن السمط، رواه أبو داود (3967)، والطحاوي في مشكله (726).
قال أبو داود:"لم يسمع سالم بن أبي الجعد من شرحبيل بن السمط".
وكذلك رواه ابن ماجه (2522) من طريق الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن سالم بن أبي الجعد.
وقد وصف سالم بن أبي الجعد بالتدليس، وكثرة الإرسال.
আবু নুজাইহ আস-সুলামী (তিনি 'আমর ইবনে আবাসা) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তায়েফের দুর্গে অবরোধ করেছিলাম। (মু'আয বলেন: আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি, তায়েফের কসর, তায়েফের দুর্গ, উভয়টিই) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে একটি তীর নিক্ষেপ করবে, তার জন্য একটি মর্যাদা রয়েছে।" (এবং তিনি পূর্ণ হাদীসটি বর্ণনা করলেন।) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আরও বলতে শুনেছি: "যে কোনো মুসলিম ব্যক্তি কোনো মুসলিম ব্যক্তিকে আযাদ (মুক্ত) করবে, আল্লাহ তা‘আলা অবশ্যই তার মুক্ত করা ব্যক্তির প্রতিটি অঙ্গ-প্রত্যঙ্গের বিনিময়ে আযাদকারীর প্রতিটি অঙ্গ-প্রত্যঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে ঢাল স্বরূপ বানিয়ে দেবেন। আর যে কোনো মুসলিম মহিলা কোনো মুসলিম মহিলাকে আযাদ করবে, আল্লাহ তা‘আলা অবশ্যই কিয়ামতের দিন তার আযাদ করা মহিলার প্রতিটি অঙ্গ-প্রত্যঙ্গের বিনিময়ে আযাদকারিণীর প্রতিটি অঙ্গ-প্রত্যঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে ঢাল স্বরূপ বানিয়ে দেবেন।"
5991 - عن أبي أمامة وغيره من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أيما امرئ مسلم أعتق امرأ مسلما كان فكاكه من النار، يجزي كل عضو منه عضوا منه. وأيما امرئ مسلم أعتق امرأتين مسلمتين كانتا فكاكه من النار، يجزي كل عضو منهما عضوا منه. وأيما امرأة مسلمة أعتقت امرأة مسلمة كانت فكاكها من النار، يجزي كل عضو منها عضوا منها".
حسن: رواه الترمذي (1547) عن محمد بن عبد الأعلى، حدثنا عمران بن عيينة أخو سفيان ابن عيينة، عن حصين، عن سالم بن أبي الجعد، عن أبي أمامة فذكره. وإسناده حسن من أجل عمران بن عيينة؛ فإنه حسن الحديث. وسالم بن أبي الجعد أدرك أبا أمامة، كما قال أبو حاتم.
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো মুসলিম ব্যক্তি একজন মুসলিম দাসকে মুক্ত করবে, সেই মুক্তি তার জন্য জাহান্নাম থেকে মুক্তির কারণ হবে। (মুক্ত হওয়া দাসের) প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে (মুক্তকারীর) একটি অঙ্গকে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেওয়া হবে। আর যে কোনো মুসলিম ব্যক্তি দুজন মুসলিম দাসীকে মুক্ত করবে, তারা দুজন তার জন্য জাহান্নাম থেকে মুক্তির কারণ হবে। তাদের দুজনের প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে (মুক্তকারীর) একটি অঙ্গকে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেওয়া হবে। আর যে কোনো মুসলিম নারী একজন মুসলিম দাসীকে মুক্ত করবে, সেই মুক্তি তার জন্য জাহান্নাম থেকে মুক্তির কারণ হবে। (মুক্ত হওয়া দাসীর) প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে (মুক্তকারী নারীর) একটি অঙ্গকে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেওয়া হবে।"
5992 - عن علي بن أبي طالب، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق رقبة مؤمنة وقى اللَّه تعالى بكل عضو منها عضوا منه من النار".
حسن: رواه النسائي في"الكبرى" (4877)، والطحاوي في مشكله (715) كلاهما من حديث أبي نعيم، حدثنا الحكم بن أبي نُعم البجلي، حدثتني فاطمة بنت علي قالت: قال أبي عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكرته.
وإسناده حسن من أجل الحكم بن أبي نُعم؛ فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি একজন মুমিন দাসকে আযাদ (মুক্ত) করবে, আল্লাহ তাআলা সেই দাসটির প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে তার (আযাদকারী ব্যক্তির) প্রতিটি অঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করবেন।"
5993 - عن الغريف بن الديلمي قال: أتينا واثلة بن الأسقع، فقلنا له: حدثنا حديثا ليس فيه زيادة، ولا نقصان، فغضب، وقال: إن أحدكم ليقرأ، ومصحفه معلق في بيته،
فيزيد وينقص. قلنا: إنما أردنا حديثا سمعته من النبي صلى الله عليه وسلم. قال: أتينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في صاحب لنا أوجب -يعني النار- بالقتل، فقال:"أعتقوا عنه يعنق اللَّه بكل عضو منه عضوا منه من النار".
صحيح: رواه أبو داود (3964)، عن عيسى بن محمد الرملي، حدثنا ضمرة، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن الغريف بن الديلمي فذكره.
ورواه أيضًا أحمد (16012)، والحاكم (2/ 212)، والبيهقي (8/ 132 - 133) كلهم من حديث ضمرة بن ربيعة بإسناده مثله.
والغريف بن الديلمي هو ابن عياش بن فيروز الديلمي، وقد ينسب إلى جده، لم يرو عنه سوى إبراهيم بن أبي عبلة، ولم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول". أي عند المتابعة، وقد تابعه عبد اللَّه بن فيرروز الديلمي، ومن طريقه رواه الطحاوي في مشكله (737)، وابن حبان (4307)، والحاكم (2/ 212)، إلا أن الحاكم جعل الغريف لقب عبد اللَّه بن الديلمي، وهو خطأ؛ فإن الغريف هو ابن عياش بن فيروز، أي ابن أخي عبد اللَّه بن فيروز الديلمي، ولذا ذكر المزي من شيوخ إبراهيم بن أبي عبلة عبد اللَّه بن الديلمي، والغريف بن عياش الديلمي.
وهذه متابعة قوية للغريف. إن صح هذا الحديث فهو من جملة المخصصات لقوله تعالى {وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إلا مَا سَعَى} [سورة النجم: 39] في حين أن الطحاوي ذكر من أربعة أوجه: عبد اللَّه بن المبارك، وهانئ بن عبد الرحمن، ويحيى بن حمزة، ومالك بن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم الأمر الذين سألوه عما سألوه عن رجل أوجب النار أن يأمروا صاحبهم أن يعتق عن نفسه رقبة؛ لتكون فكاكه من النار.
ورجح الطحاوي صحة هذا اللفظ لرواية أربعة، وهم أولى بالحفظ، وفيهم مالك، وابن المبارك، فلا يحتاج إلى تأويل، إلا أن في روايات بعضهم كلاما.
ওয়াসিলা ইবনুল আসকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আল-গুরিফ ইবনে আদ-দাইলামি বলেন, আমরা ওয়াসিলা ইবনুল আসকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাঁকে বললাম: আমাদেরকে এমন একটি হাদীস বর্ণনা করুন, যাতে কোনো বৃদ্ধি বা কমতি নেই। এতে তিনি রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: তোমাদের কেউ কেউ তো এমন যে তার ঘরে কুরআন শরীফ ঝুলানো আছে, তবুও সে তাতে বাড়ায় বা কমায়। আমরা বললাম: আমরা কেবল এমন একটি হাদীস জানতে চেয়েছি যা আপনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছেন। তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসেছিলাম আমাদের এক সঙ্গীর বিষয়ে, যে হত্যার কারণে (নিজের জন্য) জাহান্নাম অবধারিত করে ফেলেছিল। তখন তিনি বললেন: "তোমরা তার পক্ষ থেকে গোলাম আযাদ করো। আল্লাহ তার (আযাদকৃত গোলামের) প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে তার (অপরাধীর) একটি অঙ্গকে জাহান্নাম থেকে মুক্ত করবেন।"
5994 - عن البراء قال: جاء أعرابي إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، أخبرني بعمل يدخلني الجنّة. قال:"لئن قصَّرت في الخطبة لقد عرضت المسألة، أعتق النسمة وفك الرقبة". قال: يا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، أوما هما سواء؟ قال:"لا، عتق النسمة أن تفرد بها، وفك الرقبة أن تعين في ثمنها، والمنحة الوكوف، والفيء على ذي الرحم الظالم". قال: فمن لم يطق ذلك؟ قال:"فأطعم الجائع، واسق الظمآن". قال: فإن لم أستطع؟ قال:"مر بالمعروف، وانه عن المنكر". قال: فمن لم يطق ذاك؟ قال:"فكف لسانك إلا من خير".
صحيح: رواه أحمد (18647)، وأبو داود الطيالسي (775)، والبخاري في الأدب المفرد (69)، وابن حبان (374)، والحاكم (2/ 217)، والبيهقي (10/ 272 - 273) كلهم من حديث
عيسى بن عبد الرحمن، عن طلحة اليامي، عن عبد الرحمن بن عوسجة، عن البراء فذكره. وإسناده صحيح.
বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন বেদুঈন নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমাকে এমন একটি আমল সম্পর্কে বলুন যা আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবে।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি সংক্ষিপ্ত কথা বললেও প্রশ্নটি পরিষ্কারভাবে তুলে ধরেছো। (আমলগুলো হলো:) ক্রীতদাসকে মুক্ত করো এবং দাসত্বমুক্তিতে সহযোগিতা করো।"
সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), এই দু'টি কি একই জিনিস নয়?
তিনি বললেন: "না। ক্রীতদাস মুক্ত করা হলো— তুমি একা তাকে মুক্ত করবে, আর দাসত্বমুক্তিতে সহযোগিতা করা হলো— তুমি তার মূল্য পরিশোধে সাহায্য করবে। আর (অন্য আমল হলো) দুধ প্রদানকারী জন্তু দান করা এবং অত্যাচারী আত্মীয়ের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখা।"
সে বলল: যে ব্যক্তি এগুলো করতে সমর্থ নয়?
তিনি বললেন: "তবে তুমি ক্ষুধার্তকে খাদ্য দাও এবং পিপাসার্তকে পানি পান করাও।"
সে বলল: আমি যদি সেটিও করতে না পারি?
তিনি বললেন: "তবে সৎ কাজের আদেশ দাও এবং অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করো।"
সে বলল: যে ব্যক্তি তাও করতে সমর্থ নয়?
তিনি বললেন: "তবে তুমি কল্যাণ ছাড়া অন্য বিষয়ে তোমার জিহ্বাকে সংযত রাখো।"
5995 - عن أبي بردة بن أبي موسى قال: أي بني، ألا أحدثكم حديثا حدثني أبي عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق رقبة أعتق اللَّه عز وجل بكل عضو منها عضوا منه من النار".
حسن: رواه أحمد (19623)، والحاكم (2/ 211)، والبيهقي (10/ 272) كلهم من حديث سفيان بن عيينة، حدثنا شعبة الكوفي قال: كنا عند أبي بردة بن أبي موسى فقال فذكره.
وإسناده حسن من أجل شعبة، وهو ابن دينار الكوفي، قال ابن معين:"ليس به بأس". ووثّقه ابن عيينة، وابن نمير، وأبو نعيم. وقال يعقوب بن سفيان:"كوفي لا بأس به". وهو قليل الحديث، وقد يكون له حديث واحد، وهو هذا.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি একটি দাসকে মুক্ত করবে, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল দাসটির প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে মুক্তকারী ব্যক্তির প্রতিটি অঙ্গকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্ত করে দেবেন।"
5996 - عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من أعتق رقبة أعتق اللَّه بكل عضو منه عضوا".
صحيح: رواه الطحاوي في مشكله (716) عن أبي أمية، حدثنا أبو عاصم، عن عثمان بن مرة، عن القاسم، عن عائشة، فذكره. وإسناده صحيح.
وفي معناه ما روي عن عقبة بن عامر الجهني أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق رقبة مؤمنة فهي فكاكه من النار".
رواه أحمد (17326)، والطبراني في"الكبير" (17/ رقم 918) كلاهما من حديث سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، قال: ذكر أن قيسا الجذامي حدث عن عقبة بن عامر الجهني فذكره. وقيس الجذامي له صحبة.
وفيه قتادة مدلس، وقد عنعن، كما أنه لم يلق أحدا من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلا أنسا وعبد اللَّه بن سرجس، كما نص عليه أبو حاتم في"المراسيل".
وقيس الجذامي -وله صحبة- رواه أيضًا عن معاذ بن جبل. رواه أحمد (22113)، عن محمد ابن جعفر، حدثنا شعبة، عن قتادة، عن قيس. وفيه أيضًا الانقطاع؛ فإن قتادة لم يلق قيسا.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি একটি দাস মুক্ত করবে, আল্লাহ তার প্রতিটি অঙ্গের বিনিময়ে (জাহান্নাম থেকে) তার একটি অঙ্গকে মুক্ত করে দেবেন।"
5997 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يجزي ولد والدا إلا أن يجده مملوكا، فيشتريه، فيُعتقه".
صحيح: رواه مسلم في العتق (1510) من طريق جرير، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
وقوله:"فيشتريه، فيعتقه" أي يقع العتق بالشراء مباشرة، ولا يحتاج إلى إنشاء العتق، فإن إنشاء العتق يستلزم إبقاءه تحت ملكه أيضًا إن شاء، ولم يقل أحد من أهل العلم أن يكون الأب مملوكالولده حتى يعتقه.
ثم رواه من حديث سعيد (هو ابن أبي عروبة)، عن قتادة أن عمر بن الخطاب قال:"من ملك ذا رحم محرم فهو حر". هذا منقطع.
ورواه أيضًا عن سعيد (بن أبي عروبة)، عن قتادة، عن جابر بن زيد والحسن مثله. قال أبو داود:"سعيد أحفظ من حماد". انتهى كلام أبي داود.
ورواه البيهقي (10/ 290) من طريق أبي موسى محمد بن المثنى، ثنا الضحاك، عن أبي عوانة، عن الحكم، عن إبراهيم النخعي، عن الأسود بن يزيد قال: قال عمر:"من ملك ذا رحم محرم فهو حر -أو ذا محرم-" شك الضحاك. قال أبو موسى: وسمعت أبا الوليد يقول: قرأت في كتاب أبي عوانة، عن الحكم، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عمر قال:"لا يسترق ذو رحم".
قال الترمذي عقب حديث سمرة:"والعمل على هذا الحديث عند بعض أهل العلم".
وقال البغوي في"شرح السنة" (9/ 364) بعد أن أخرج حديث أبي هريرة:
"والعمل على هذا عند أهل العلم قالوا: إذا اشترى الرجل أحدا من آبائه، أو أمهاته، أو واحدا من أولاده، أو أولاد أولاده، أو ملكهـ بسبب آخر، يعتق عليه من غير أن ينشئ فيه عتقا.
وقوله:"فيعتقه" لم يرد به أن إنشاء الإعتاق شرط، بل أراد به أن الشراء يخلصه عن الرق.
واختلف أهل العلم في غير الوالدين والمولودين من المحارم، فذهب أكثر أهل العلم إلى أن من ملك ذا رحم محرم كالأخ، وابن الأخ، والعم، والعمة، والخال، والخالة، يعتق عليه. يروى ذلك عن عمر، وعبد اللَّه بن مسعود، ولا يعرف لهما مخالف في الصحابة، وهو قول الحسن، وجابر بن زيد، وعطاء، والشعبي، والزهري، والحكم، وحماد، وإليه ذهب سفيان الثوري، وأصحاب الرأي، وأحمد، وإسحاق.
واحتجوا بما روي عن حماد بن سلمة، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من ملك ذا رحم محرم، فهو حر".
وقال مالك:"لا يعتنق إلا الوالد، والولد، والإخوة". وقال قوم:"لا يعتق إلا الوالدون، والمولودون"، وإليه ذهب الشافعي.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “কোনো সন্তান তার পিতামাতার প্রতিদান দিতে পারে না, তবে এই ক্ষেত্রে পারবে যে, সে যদি তাকে গোলাম অবস্থায় পায়, অতঃপর তাকে ক্রয় করে এবং তাকে মুক্ত করে দেয়।”
5998 - عن أبي ذر قال: سألت النبي صلى الله عليه وسلم أي العمل أفضل؟ قال:"إيمان باللَّه، وجهاد في سبيله". قلت: فأي الرقاب أفضل؟ قال:"أعلاها ثمنا، وأنفسها عند أهلها" قلت: فإن لم أفعل؟ قال:"تُعين صانعا، أو تَصنع لأخرق". قال: فإن لم أفعل؟ قال:"تَدَعُ النَّاس من الشر، فإنها صدقة، تصدق بها على نفسك".
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2518)، ومسلم في الإيمان (136: 84) كلاهما من
طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن أبي مُراوح الليثي، عن أبي ذر فذكره.
আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞাসা করলাম, “কোন কাজটি সর্বোত্তম?”
তিনি বললেন: “আল্লাহর প্রতি ঈমান এবং তাঁর পথে জিহাদ।”
আমি বললাম: “তবে (মুক্তির জন্য) কোন গোলামটি সর্বোত্তম?”
তিনি বললেন: “যার মূল্য সবচেয়ে বেশি এবং যা তার মালিকদের কাছে সবচেয়ে প্রিয়।”
আমি বললাম: “যদি আমি তা করতে না পারি?”
তিনি বললেন: “তুমি কোনো কারিগরকে সাহায্য করো, অথবা কোনো অনভিজ্ঞ বা অদক্ষ ব্যক্তির জন্য কিছু তৈরি করে দাও।”
তিনি বললেন: “যদি আমি তাও করতে না পারি?”
তিনি বললেন: “তুমি মানুষকে তোমার মন্দ (অনিষ্ট) থেকে দূরে রাখো। কেননা, এটিও একটি সাদকা (দান), যা তুমি তোমার নিজের উপর সাদকা করলে।”
5999 - عن أسماء بنت أبي بكر قالت: أمر النبي صلى الله عليه وسلم بالعتاقة في كسوف الشمس. وفي لفظ: كنا نؤمر عند الخسوف بالعتاقة.
صحيح: رواه البخاري في العتق (2519) عن موسى بن مسعود، حدثنا زائدة بن قدامة، عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء بنت أبي بكر، فذكرته. واللفظ الآخر عنده أيضًا (2520) عن محمد بن أبي بكر، حدثنا عَثّام، حدثنا هشام به.
আসমা বিনতে আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্যগ্রহণের সময় দাসমুক্ত করার (গোলাম আযাদ করার) নির্দেশ দিয়েছিলেন। অন্য এক বর্ণনায় (লাফয) আছে: চন্দ্রগ্রহণের সময়ও আমাদের দাসমুক্ত করার নির্দেশ দেওয়া হতো।
6000 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق شركاله في عبد، فكان له مال يبلغ ثمن العبد قُوِّم عليه قيمة العدل، فأعطى شركاءه حصصهم، وعتق عليه العبد، وإلا فقد عتق منه ما عتق".
متفق عليه: رواه مالك في العتق والولاء (1) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في العتق (2522)، ومسلم في العتق (1501: 1)، وفي الأيمان والنذور (1501: 47) كلاهما من طريق مالك به مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো গোলামের মধ্যে তার অংশীদারদের অংশ মুক্ত করে দেয়, আর যদি তার কাছে গোলামটির মূল্যের সমপরিমাণ সম্পদ থাকে, তবে তার ওপর ন্যায্য মূল্য নির্ধারণ করা হবে। অতঃপর সে তার অংশীদারদের তাদের অংশসমূহ প্রদান করবে এবং গোলামটি সম্পূর্ণরূপে মুক্ত হয়ে যাবে। আর যদি (তার কাছে পর্যাপ্ত সম্পদ) না থাকে, তবে সে যতটুকু মুক্ত করেছে কেবল ততটুকুই মুক্ত হবে।"
6001 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق عبدا بينه وبين آخر قُوِّم عليه في ماله قيمة عدل، لا وكس، ولا شطط، ثم عتق عليه في ماله إن كان موسرا".
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2521)، ومسلم في الأيمان والنذور (1501: 50) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار)، عن سالم، عن أبيه، فذكره. والسياق لمسلم.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো ক্রীতদাসের মধ্যে নিজের ও আরেকজনের অংশীদারিত্ব থাকাবস্থায় (নিজের অংশ) আযাদ করে দেয়, তার মালের ওপর তার (ক্রীতদাসের) ন্যায্য মূল্য নির্ধারণ করা হবে—যাতে কোনো কমতিও (লোকসান) না থাকে এবং বাড়াবাড়িও (অতিরিক্ত মূল্য) না থাকে। এরপর যদি সে সচ্ছল হয়, তবে তার মালের মাধ্যমে ঐ ক্রীতদাসকে সম্পূর্ণরূপে আযাদ করে দেওয়া হবে।"
6002 - عن ابن عمر أنه كان يفتي في العبد أو الأمة يكون بين شركاء، فيعتق أحدهم نصيبه منه يقول:"قد وجب عليه عتقه كله إذا كان للذي أعتق من المال ما يبلغ، يقوم من ماله قيمة العدل، ويدفع إلى الشركاء أنصباؤهم، ويخلى سبيل المعتق" يخبر ذلك ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البخاري في العتق (2525) عن أحمد بن مقدام، حدثنا الفضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة، أخبرني نافع، عن ابن عمر فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এমন দাস বা দাসীর ব্যাপারে ফতোয়া দিতেন যারা কয়েকজন অংশীদারের মালিকানায় থাকে, অতঃপর তাদের মধ্যে কেউ তার অংশটি আযাদ করে দেয়। তিনি বলতেন, 'যদি মুক্তিদানকারীর কাছে পর্যাপ্ত সম্পদ থাকে, তবে ঐ দাস বা দাসীকে সম্পূর্ণরূপে আযাদ করা তার উপর ওয়াজিব হয়ে যায়। সে তার সম্পদ থেকে ন্যায্য বাজারমূল্য অনুযায়ী মূল্য পরিমাপ করবে, অংশীদারদের তাদের হিস্যা দিয়ে দেবে এবং মুক্তিপ্রাপ্ত দাস বা দাসীকে ছেড়ে দেবে (মুক্ত করে দেবে)।' ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই মাসআলাটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করতেন।
6003 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق نصيبا له في مملوك كُلف أن يتم عتقه بقيمة عدل".
صحيح: رواه أحمد (4451) عن هشيم، أخبرنا يحيى بن سعيد، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه (5474) عن يزيد بن هارون قال: أخبرنا يحيى، وزاد فيه:"فإن لم يكن له مال يعتقه به فقد جاز ما عتق".
ورواه مسلم (1501) من طريق يحيى بن سعيد وغيره، ولم يذكر لفظه، وإنما أحاله على لفظ مالك.
وأما البخاري (2525) فعلقه بعد أن أخرج حديث موسى بن عقبة، عن نافع قال:"ورواه الليث، وابن أبي ذئب، وابن إسحاق، وجويرية، ويحيى بن سعيد، وإسماعيل بن أمية، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم مختصرا.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো দাসের মধ্যে তার অংশকে মুক্ত করে দেয়, তাকে ন্যায্য মূল্যের মাধ্যমে তার সম্পূর্ণ মুক্তি সম্পন্ন করতে বাধ্য করা হবে।”
6004 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال في المملوك بين الرجلين، فيعتق أحدهما قال:"يضمن".
صحيح: رواه مسلم في العتق (1502) من طريق محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة فذكره.
وفي الباب ما روي عن سعيد بن المسيب قال: حفظنا عن ثلاثين من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من أعتق شقصا له في مملوك ضمن بقيته". رواه أحمد (16418) عن يزيد بن هارون قال: حدثنا حجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب، عن سعيد بن المسيب فذكره.
وفي إسناده حجاج بن أرطاة مدلس، وفيه كلام معروف.
وفي الباب أيضًا ما روي عن إسماعيل بن أمية، عن أبيه، عن جده قال: كان لهم غلام يقال له: طهمان، أو ذكوان، فأعتق جدُّه نصفَه، فجاء العبد إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"تعتق في عتقك، وترق في رقك".
رواه الإمام أحمد (15402) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (16705) -، وأبو داود عنه في مراسيله (185)، والبيهقي (10/ 274): قال عبد الرزاق: حدثنا عمر بن حوشب، حدثني إسماعيل بن أمية، عن أبيه، عن جده فذكره.
وعمر بن حوشب الصنعاني"مجهول"، كما في"التقريب".
وإسماعيل بن أمية هو ابن عمرو بن سعيد بن العاص الأموي، ثقة ثبت، وثَّقه ابن معين، وأبو زرعة، والنسائي، وغيرهم.
وأبوه أمية بن عمرو بن سعيد بن العاص الأموي، ابن الأشدق، صدوق.
وجدُّ إسماعيل عمرو بن سعيد الأموي تابعي، وليس له صحبة، ولذا قال: إنه حديث مرسل.
قال البيهقي: تفرد به عمر بن حوشب، وعمرو بن سعيد ليس له صحبة.
وفي أحاديث الباب دليل على أن المملوك إذا أعتق الشقص منه فإنه يعتق كله، ولا يتوقف ذلك على عتق الشريك الآخر، بل يغرم المعتق نصيب شريكهـ، ويكون الولاء كله له؛ لأن الأصل في
الإنسان أن يكون حرا، إلا أن هذا الحديث يختص بالموسر دون المعسر، فإن المعتق إذا كان معسرا فله حكم آخر.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই গোলাম সম্পর্কে বলেছেন, যে দুজন লোকের মধ্যে অংশীদারিত্বে ছিল, অতঃপর তাদের একজন তাকে মুক্ত করে দিল। তিনি বললেন: "তাকে (অন্য শরিকের অংশ) ক্ষতিপূরণ দিতে হবে।"
6005 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق نصيبا، أو شقيصا في مملوك فخلاصه عليه في ماله إن كان له مال، وإلا قُوِّم عليه، فاستسعي به غير مشقوق عليه".
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2527)، ومسلم في العتق (1503: 3)، كلاهما من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة فذكره.
والمعنى أن العبد لا يعتق من نصيب الثاني إذا كان الأول غنيا، بل يخير المعتق الأول بين عتق نصيب الثاني، أو يستسعي العبد لخلاص نفسه.
وقوله:"شقيصا" أي بعضه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো ক্রীতদাসের মধ্যে তার কোনো অংশ বা ভাগ মুক্ত করে দেয়, যদি তার সম্পদ থাকে, তবে সেই সম্পদ থেকে তাকে সম্পূর্ণরূপে মুক্ত করার দায়িত্ব তার উপরই বর্তায়। আর যদি তার সম্পদ না থাকে, তবে তার (ক্রীতদাসের) মূল্য নির্ধারণ করা হবে এবং তাকে কোনো প্রকার কষ্ট না দিয়ে (মুক্তি লাভের জন্য) কাজ করে অর্থ উপার্জনের সুযোগ দেওয়া হবে।"
6006 - عن سلمان قال: كاتبت أهلي على أن أغرس لهم خمس مائة فسيلة، فإذا علقِت فأنا حر. قال: فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت ذلك له، فقال:"اغرس، واشترط لهم، فإذا أردت أن تغرس فآذني". قال: فآذنته. قال: فجاء، فجعل يغرس بيده إلا واحدة، غرستها بيدي، فعلقن إلا الواحدة.
حسن: رواه أحمد (23730) عن عفان، حدثنا حماد بن سلمة، أخبرنا علي بن زيد، عن أبي عثمان النهدي، عن سلمان فذكره.
وعلي بن زيد هو ابن جدعان ضعيف، لكن تابعه عاصم بن سليمان الأحول، رواه الحاكم (2/ 217 - 218)، وعنه البيهقي (10/ 321) كلاهما من حديث عثمان بن مسلم، ثنا حماد بن سلمة، عن عاصم بن سليمان الأحول، وعلي بن زيد، كلاهما عن أبي عثمان النهدي فذكره.
وفي الباب ما روي عن سهل بن حنيف قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من أعان مجاهدا في سبيل اللَّه عز وجل، أو مكاتبا في رقبته أظله اللَّه يوم لا ظل إلا ظله". رواه أحمد (15986) عن زكريا بن عدي قال: أخبرنا عبيد اللَّه بن عمرو، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن عبد اللَّه بن سهل بن حنيف، عن أبيه فذكره.
وفيه عبد اللَّه بن سهل بن حنيف الأنصاري من رجال"التعجيل" (549)، لم يرو عنه سوى عبد اللَّه بن عقيل، ليس بمشهور، قال الحافظ:"صحح حديثه الحاكم، ولم أره في ثقات ابن حبان، وهو على شرطه".
قلت: وهو كما قال، أخرجه الحاكم (2/ 89 - 90)، وأحمد (15987) كلاهما من حديث زهير بن محمد قال: حدثنا عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن عبد اللَّه بن سهل بن حنيف، أن سهلا حدثه أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعان مجاهدا في سبيل اللَّه، أو غارما في عسرته، أو مكاتبا في رقبته أظله اللَّه في ظله يوم لا ظل إلا ظله". وسكت عليه الحاكم.
ثم رواه (2/ 217) من طريق عمرو بن ثابت، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل بإسناده نحوه، وقال:"صحيح الإسناد". فتعقبه الذهبي بقوله:"بل عمرو رافضي متروك".
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি আমার মালিকদের সাথে এই শর্তে চুক্তিবদ্ধ হলাম যে, আমি তাদের জন্য পাঁচশত খেজুর চারা রোপণ করব, যখন সেগুলো ফলবতী হবে, তখন আমি মুক্ত হয়ে যাব। তিনি (সালমান) বললেন: অতঃপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং এ বিষয়টি তাঁর নিকট উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: "তুমি রোপণ করো এবং তাদের জন্য শর্ত রাখো। যখন তুমি রোপণ করতে চাইবে, তখন আমাকে জানাও।" তিনি বললেন: অতঃপর আমি তাঁকে জানালাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন এবং একটি ছাড়া সবগুলো নিজ হাতে রোপণ করলেন, যা আমি আমার নিজ হাতে রোপণ করেছিলাম। অতঃপর একটি ছাড়া সবগুলোই ফলবতী হয়েছিল।
6007 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المكاتب عبد ما بقي من مكاتبته درهم".
وفي لفظ:"أيما عبد كاتب على مائة أوقية فأداها إلا عشرة أواق، فهو عبد، وأيما عبد كاتب على مائة دينار، فأداها إلا عشرة دنانير، فهو عبد".
حسن: رواه أبو داود (3926، 3927)، والترمذي (1260)، وابن ماجه (2519)، وأحمد (6666)، والبيهقي (10/ 324) كلهم من طرق عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وبعض الرواة عن عمرو تكلم فيهم، ولكن يقويهم الآخرون.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.
وقد تفرد عمرو بن شعيب بهذا الحديث، فلم يروه غيره، ولذا تكلم فيه بعض أهل العلم.
والحق أنه حسن الحديث، وقد قبل جمهور أهل العلم ما تفرد به عمرو بن شعيب إذا لم يخالف، أو لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
وهذا الحديث مما قال به أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، وغيرهم أن المكاتب عبد ما بقي عليه درهم من كتابته، وهو قول سفيان الثوري، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، كما قال الترمذي.
ونقل البيهقي عن الشافعي في القديم:"ولم أعلم أحدا روى هذا الحديث عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا عمرو بن شعيب، وعلى هذا فتيا المفتين".
قلت: وبه قال أحمد، ومالك، والشافعي في القديم، ثم رجع إلى أن بيعه غير جائز، وهو قول أبي حنيفة. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (9/ 334).
وأما ما روي عن أم سلمة أنها أخبرت عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا كان لإحداكن مكاتب، وكان عنده ما يؤدي، فلتحتجب منه".
ففيه رجل مقبول لم يتابع.
رواه أبو داود (3928)، والترمذي (1261)، وابن ماجه (2520)، وأحمد (26273)، وصحّحه ابن حبان (4322)، والحاكم (2/ 219) كلهم من طرف عن الزهري، عن نبهان مولى أم سلمة، عن أم سلمة فذكرته.
وقال الترمذي:"حسن صحيح".
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
والصحيح أن فيه نبهان مولى أم سلمة، لم يوثقه غير ابن حبان، وأخرج حديثه في صحيحه، فهو مجهول عند جمهور أهل الحديث.
وفي الحديث قصة، وهي أن نبهان قال: إن أم سلمة كاتبته، فبقي من كتابته ألفا درهم. قال نبهان: كنت أمسكها؛ لكي لا تحتجب عني أم سلمة. قال: فحججت، فرأيتها بالبيداء، فقالت لي: من ذا؟ فقلت: أنا أبو يحيى. فقالت لي: أي بني، تدعو إلى ابن أخي محمد بن عبد اللَّه بن أبي أمية، وتعطي في نكاحه الذي لي عليك، وأنا أقرأ عليك السلام. قال: فبكيت، وصِحتُ، وقلت: واللَّه لا أدفعها إليه أبدا. فقالت: أي بني، إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كان عند مكاتب إحداكن ما يقضي عنه فاحتجي" فواللَّه، لا تراني إلا أن تراني في الآخرة.
والصحيح أن أمهات المؤمنين لم يكن يحتجبن من المكاتب؛ فإنه في حكم المملوك. ذكر البيهقي (10/ 324) أن سليمان بن يسار استأذن على عائشة، فقالت: من هذا؟ فقلت: سليمان. قالت: كم بقي عليك من مكاتبتك؟ قال: قلت: عشر أواق. قالت: ادخل؛ فإنك عبد ما بقي عليك درهم.
وكذلك ذكر قصة سالم سبلان مولى النصريين.
أخبره عن علي بن أبي طالب، عن النبي صلى الله عليه وسلم: {وَالَّذِينَ يَبْتَغُونَ الْكِتَابَ مِمَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ فَكَاتِبُوهُمْ إِنْ عَلِمْتُمْ فِيهِمْ خَيْرًا وَآتُوهُمْ مِنْ مَالِ اللَّهِ الَّذِي آتَاكُمْ} [النور: 33]. قال:"يترك للمكاتب الربع". قال ابن جريج: وأخبرني غير واحد عن عطاء بن السائب أنه كان يحدث بهذا الحديث، لا يذكر فيه النبي صلى الله عليه وسلم. انتهى.
هذا هو الصحيح أنه موقوف على علي، كذلك رواه روح بن عبادة، وهشام الدستوائي، عن عطاء بن السائب.
رواه البيهقي (10/ 329)، وقال: الصواب أنه موقوف، وكان ابن عمر كاتب عبدا له بخمسة وثلاثين ألفا، فوضع عنه خمسة آلاف من آخر نجومه.
وقد ذهب إلى وجوب الوضع الشافعي، وأحمد، وإسحاق، وهو مذهب ابن عباس.
وقال أبو حنيفة، ومالك: ليس بواجب؛ لأنه عقد معاوضة، فلا يجب فيه الإيتاء كسائر العقود، ولكن من الندب وضع جزء منه.
بالحجاز، والشام، والعراق، وبه قال أحمد، وإسحاق. وذكر المزني عن الشافعي: ويجبر السيد على قبول النجم إذا عجله له المكاتب، واحتج في ذلك بحديث عمر".
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মাকাতাব ততক্ষণ পর্যন্ত গোলাম যতক্ষণ তার মুকাতাবা চুক্তির এক দিরহামও বাকি থাকে।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: যে গোলাম একশত উকিয়া বিনিময়ে চুক্তিবদ্ধ হলো এবং দশ উকিয়া বাদে তা পরিশোধ করলো, সে তখনও গোলাম। আর যে গোলাম একশত দীনারের বিনিময়ে চুক্তিবদ্ধ হলো এবং দশ দীনার বাদে তা পরিশোধ করলো, সে তখনও গোলাম।
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন যে তিনি বলেছেন: তোমাদের কারো অধীনে যদি কোনো মাকাতাব থাকে এবং তার কাছে পরিশোধ করার মতো অর্থ থাকে, তবে সে যেন তার থেকে পর্দা করে।
আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) [সূরা নূর: ৩৩]-এর এই আয়াত সম্পর্কে বলেন: {আর তোমাদের মালিকানাধীন দাসদের মধ্যে যারা মুক্তি চায়, তোমরা তাদের সাথে চুক্তিবদ্ধ হও, যদি তোমরা তাদের মধ্যে কোনো কল্যাণ দেখতে পাও; আর আল্লাহ তোমাদেরকে তাঁর যে সম্পদ দিয়েছেন, তা থেকে তোমরা তাদের দাও।} তিনি বলেন: মাকাতাবের জন্য এক-চতুর্থাংশ ছেড়ে দেওয়া হবে।
