আল-জামি` আল-কামিল
6001 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق عبدا بينه وبين آخر قُوِّم عليه في ماله قيمة عدل، لا وكس، ولا شطط، ثم عتق عليه في ماله إن كان موسرا".
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2521)، ومسلم في الأيمان والنذور (1501: 50) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار)، عن سالم، عن أبيه، فذكره. والسياق لمسلم.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো ক্রীতদাসের মধ্যে নিজের ও আরেকজনের অংশীদারিত্ব থাকাবস্থায় (নিজের অংশ) আযাদ করে দেয়, তার মালের ওপর তার (ক্রীতদাসের) ন্যায্য মূল্য নির্ধারণ করা হবে—যাতে কোনো কমতিও (লোকসান) না থাকে এবং বাড়াবাড়িও (অতিরিক্ত মূল্য) না থাকে। এরপর যদি সে সচ্ছল হয়, তবে তার মালের মাধ্যমে ঐ ক্রীতদাসকে সম্পূর্ণরূপে আযাদ করে দেওয়া হবে।"
6002 - عن ابن عمر أنه كان يفتي في العبد أو الأمة يكون بين شركاء، فيعتق أحدهم نصيبه منه يقول:"قد وجب عليه عتقه كله إذا كان للذي أعتق من المال ما يبلغ، يقوم من ماله قيمة العدل، ويدفع إلى الشركاء أنصباؤهم، ويخلى سبيل المعتق" يخبر ذلك ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البخاري في العتق (2525) عن أحمد بن مقدام، حدثنا الفضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة، أخبرني نافع، عن ابن عمر فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এমন দাস বা দাসীর ব্যাপারে ফতোয়া দিতেন যারা কয়েকজন অংশীদারের মালিকানায় থাকে, অতঃপর তাদের মধ্যে কেউ তার অংশটি আযাদ করে দেয়। তিনি বলতেন, 'যদি মুক্তিদানকারীর কাছে পর্যাপ্ত সম্পদ থাকে, তবে ঐ দাস বা দাসীকে সম্পূর্ণরূপে আযাদ করা তার উপর ওয়াজিব হয়ে যায়। সে তার সম্পদ থেকে ন্যায্য বাজারমূল্য অনুযায়ী মূল্য পরিমাপ করবে, অংশীদারদের তাদের হিস্যা দিয়ে দেবে এবং মুক্তিপ্রাপ্ত দাস বা দাসীকে ছেড়ে দেবে (মুক্ত করে দেবে)।' ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই মাসআলাটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করতেন।
6003 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق نصيبا له في مملوك كُلف أن يتم عتقه بقيمة عدل".
صحيح: رواه أحمد (4451) عن هشيم، أخبرنا يحيى بن سعيد، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه (5474) عن يزيد بن هارون قال: أخبرنا يحيى، وزاد فيه:"فإن لم يكن له مال يعتقه به فقد جاز ما عتق".
ورواه مسلم (1501) من طريق يحيى بن سعيد وغيره، ولم يذكر لفظه، وإنما أحاله على لفظ مالك.
وأما البخاري (2525) فعلقه بعد أن أخرج حديث موسى بن عقبة، عن نافع قال:"ورواه الليث، وابن أبي ذئب، وابن إسحاق، وجويرية، ويحيى بن سعيد، وإسماعيل بن أمية، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم مختصرا.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো দাসের মধ্যে তার অংশকে মুক্ত করে দেয়, তাকে ন্যায্য মূল্যের মাধ্যমে তার সম্পূর্ণ মুক্তি সম্পন্ন করতে বাধ্য করা হবে।”
6004 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال في المملوك بين الرجلين، فيعتق أحدهما قال:"يضمن".
صحيح: رواه مسلم في العتق (1502) من طريق محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة فذكره.
وفي الباب ما روي عن سعيد بن المسيب قال: حفظنا عن ثلاثين من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من أعتق شقصا له في مملوك ضمن بقيته". رواه أحمد (16418) عن يزيد بن هارون قال: حدثنا حجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب، عن سعيد بن المسيب فذكره.
وفي إسناده حجاج بن أرطاة مدلس، وفيه كلام معروف.
وفي الباب أيضًا ما روي عن إسماعيل بن أمية، عن أبيه، عن جده قال: كان لهم غلام يقال له: طهمان، أو ذكوان، فأعتق جدُّه نصفَه، فجاء العبد إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"تعتق في عتقك، وترق في رقك".
رواه الإمام أحمد (15402) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (16705) -، وأبو داود عنه في مراسيله (185)، والبيهقي (10/ 274): قال عبد الرزاق: حدثنا عمر بن حوشب، حدثني إسماعيل بن أمية، عن أبيه، عن جده فذكره.
وعمر بن حوشب الصنعاني"مجهول"، كما في"التقريب".
وإسماعيل بن أمية هو ابن عمرو بن سعيد بن العاص الأموي، ثقة ثبت، وثَّقه ابن معين، وأبو زرعة، والنسائي، وغيرهم.
وأبوه أمية بن عمرو بن سعيد بن العاص الأموي، ابن الأشدق، صدوق.
وجدُّ إسماعيل عمرو بن سعيد الأموي تابعي، وليس له صحبة، ولذا قال: إنه حديث مرسل.
قال البيهقي: تفرد به عمر بن حوشب، وعمرو بن سعيد ليس له صحبة.
وفي أحاديث الباب دليل على أن المملوك إذا أعتق الشقص منه فإنه يعتق كله، ولا يتوقف ذلك على عتق الشريك الآخر، بل يغرم المعتق نصيب شريكهـ، ويكون الولاء كله له؛ لأن الأصل في
الإنسان أن يكون حرا، إلا أن هذا الحديث يختص بالموسر دون المعسر، فإن المعتق إذا كان معسرا فله حكم آخر.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই গোলাম সম্পর্কে বলেছেন, যে দুজন লোকের মধ্যে অংশীদারিত্বে ছিল, অতঃপর তাদের একজন তাকে মুক্ত করে দিল। তিনি বললেন: "তাকে (অন্য শরিকের অংশ) ক্ষতিপূরণ দিতে হবে।"
6005 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أعتق نصيبا، أو شقيصا في مملوك فخلاصه عليه في ماله إن كان له مال، وإلا قُوِّم عليه، فاستسعي به غير مشقوق عليه".
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2527)، ومسلم في العتق (1503: 3)، كلاهما من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة فذكره.
والمعنى أن العبد لا يعتق من نصيب الثاني إذا كان الأول غنيا، بل يخير المعتق الأول بين عتق نصيب الثاني، أو يستسعي العبد لخلاص نفسه.
وقوله:"شقيصا" أي بعضه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো ক্রীতদাসের মধ্যে তার কোনো অংশ বা ভাগ মুক্ত করে দেয়, যদি তার সম্পদ থাকে, তবে সেই সম্পদ থেকে তাকে সম্পূর্ণরূপে মুক্ত করার দায়িত্ব তার উপরই বর্তায়। আর যদি তার সম্পদ না থাকে, তবে তার (ক্রীতদাসের) মূল্য নির্ধারণ করা হবে এবং তাকে কোনো প্রকার কষ্ট না দিয়ে (মুক্তি লাভের জন্য) কাজ করে অর্থ উপার্জনের সুযোগ দেওয়া হবে।"
6006 - عن سلمان قال: كاتبت أهلي على أن أغرس لهم خمس مائة فسيلة، فإذا علقِت فأنا حر. قال: فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت ذلك له، فقال:"اغرس، واشترط لهم، فإذا أردت أن تغرس فآذني". قال: فآذنته. قال: فجاء، فجعل يغرس بيده إلا واحدة، غرستها بيدي، فعلقن إلا الواحدة.
حسن: رواه أحمد (23730) عن عفان، حدثنا حماد بن سلمة، أخبرنا علي بن زيد، عن أبي عثمان النهدي، عن سلمان فذكره.
وعلي بن زيد هو ابن جدعان ضعيف، لكن تابعه عاصم بن سليمان الأحول، رواه الحاكم (2/ 217 - 218)، وعنه البيهقي (10/ 321) كلاهما من حديث عثمان بن مسلم، ثنا حماد بن سلمة، عن عاصم بن سليمان الأحول، وعلي بن زيد، كلاهما عن أبي عثمان النهدي فذكره.
وفي الباب ما روي عن سهل بن حنيف قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من أعان مجاهدا في سبيل اللَّه عز وجل، أو مكاتبا في رقبته أظله اللَّه يوم لا ظل إلا ظله". رواه أحمد (15986) عن زكريا بن عدي قال: أخبرنا عبيد اللَّه بن عمرو، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن عبد اللَّه بن سهل بن حنيف، عن أبيه فذكره.
وفيه عبد اللَّه بن سهل بن حنيف الأنصاري من رجال"التعجيل" (549)، لم يرو عنه سوى عبد اللَّه بن عقيل، ليس بمشهور، قال الحافظ:"صحح حديثه الحاكم، ولم أره في ثقات ابن حبان، وهو على شرطه".
قلت: وهو كما قال، أخرجه الحاكم (2/ 89 - 90)، وأحمد (15987) كلاهما من حديث زهير بن محمد قال: حدثنا عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن عبد اللَّه بن سهل بن حنيف، أن سهلا حدثه أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أعان مجاهدا في سبيل اللَّه، أو غارما في عسرته، أو مكاتبا في رقبته أظله اللَّه في ظله يوم لا ظل إلا ظله". وسكت عليه الحاكم.
ثم رواه (2/ 217) من طريق عمرو بن ثابت، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل بإسناده نحوه، وقال:"صحيح الإسناد". فتعقبه الذهبي بقوله:"بل عمرو رافضي متروك".
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি আমার মালিকদের সাথে এই শর্তে চুক্তিবদ্ধ হলাম যে, আমি তাদের জন্য পাঁচশত খেজুর চারা রোপণ করব, যখন সেগুলো ফলবতী হবে, তখন আমি মুক্ত হয়ে যাব। তিনি (সালমান) বললেন: অতঃপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং এ বিষয়টি তাঁর নিকট উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: "তুমি রোপণ করো এবং তাদের জন্য শর্ত রাখো। যখন তুমি রোপণ করতে চাইবে, তখন আমাকে জানাও।" তিনি বললেন: অতঃপর আমি তাঁকে জানালাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন এবং একটি ছাড়া সবগুলো নিজ হাতে রোপণ করলেন, যা আমি আমার নিজ হাতে রোপণ করেছিলাম। অতঃপর একটি ছাড়া সবগুলোই ফলবতী হয়েছিল।
6007 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المكاتب عبد ما بقي من مكاتبته درهم".
وفي لفظ:"أيما عبد كاتب على مائة أوقية فأداها إلا عشرة أواق، فهو عبد، وأيما عبد كاتب على مائة دينار، فأداها إلا عشرة دنانير، فهو عبد".
حسن: رواه أبو داود (3926، 3927)، والترمذي (1260)، وابن ماجه (2519)، وأحمد (6666)، والبيهقي (10/ 324) كلهم من طرق عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وبعض الرواة عن عمرو تكلم فيهم، ولكن يقويهم الآخرون.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.
وقد تفرد عمرو بن شعيب بهذا الحديث، فلم يروه غيره، ولذا تكلم فيه بعض أهل العلم.
والحق أنه حسن الحديث، وقد قبل جمهور أهل العلم ما تفرد به عمرو بن شعيب إذا لم يخالف، أو لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
وهذا الحديث مما قال به أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، وغيرهم أن المكاتب عبد ما بقي عليه درهم من كتابته، وهو قول سفيان الثوري، والشافعي، وأحمد، وإسحاق، كما قال الترمذي.
ونقل البيهقي عن الشافعي في القديم:"ولم أعلم أحدا روى هذا الحديث عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا عمرو بن شعيب، وعلى هذا فتيا المفتين".
قلت: وبه قال أحمد، ومالك، والشافعي في القديم، ثم رجع إلى أن بيعه غير جائز، وهو قول أبي حنيفة. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (9/ 334).
وأما ما روي عن أم سلمة أنها أخبرت عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا كان لإحداكن مكاتب، وكان عنده ما يؤدي، فلتحتجب منه".
ففيه رجل مقبول لم يتابع.
رواه أبو داود (3928)، والترمذي (1261)، وابن ماجه (2520)، وأحمد (26273)، وصحّحه ابن حبان (4322)، والحاكم (2/ 219) كلهم من طرف عن الزهري، عن نبهان مولى أم سلمة، عن أم سلمة فذكرته.
وقال الترمذي:"حسن صحيح".
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
والصحيح أن فيه نبهان مولى أم سلمة، لم يوثقه غير ابن حبان، وأخرج حديثه في صحيحه، فهو مجهول عند جمهور أهل الحديث.
وفي الحديث قصة، وهي أن نبهان قال: إن أم سلمة كاتبته، فبقي من كتابته ألفا درهم. قال نبهان: كنت أمسكها؛ لكي لا تحتجب عني أم سلمة. قال: فحججت، فرأيتها بالبيداء، فقالت لي: من ذا؟ فقلت: أنا أبو يحيى. فقالت لي: أي بني، تدعو إلى ابن أخي محمد بن عبد اللَّه بن أبي أمية، وتعطي في نكاحه الذي لي عليك، وأنا أقرأ عليك السلام. قال: فبكيت، وصِحتُ، وقلت: واللَّه لا أدفعها إليه أبدا. فقالت: أي بني، إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كان عند مكاتب إحداكن ما يقضي عنه فاحتجي" فواللَّه، لا تراني إلا أن تراني في الآخرة.
والصحيح أن أمهات المؤمنين لم يكن يحتجبن من المكاتب؛ فإنه في حكم المملوك. ذكر البيهقي (10/ 324) أن سليمان بن يسار استأذن على عائشة، فقالت: من هذا؟ فقلت: سليمان. قالت: كم بقي عليك من مكاتبتك؟ قال: قلت: عشر أواق. قالت: ادخل؛ فإنك عبد ما بقي عليك درهم.
وكذلك ذكر قصة سالم سبلان مولى النصريين.
أخبره عن علي بن أبي طالب، عن النبي صلى الله عليه وسلم: {وَالَّذِينَ يَبْتَغُونَ الْكِتَابَ مِمَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ فَكَاتِبُوهُمْ إِنْ عَلِمْتُمْ فِيهِمْ خَيْرًا وَآتُوهُمْ مِنْ مَالِ اللَّهِ الَّذِي آتَاكُمْ} [النور: 33]. قال:"يترك للمكاتب الربع". قال ابن جريج: وأخبرني غير واحد عن عطاء بن السائب أنه كان يحدث بهذا الحديث، لا يذكر فيه النبي صلى الله عليه وسلم. انتهى.
هذا هو الصحيح أنه موقوف على علي، كذلك رواه روح بن عبادة، وهشام الدستوائي، عن عطاء بن السائب.
رواه البيهقي (10/ 329)، وقال: الصواب أنه موقوف، وكان ابن عمر كاتب عبدا له بخمسة وثلاثين ألفا، فوضع عنه خمسة آلاف من آخر نجومه.
وقد ذهب إلى وجوب الوضع الشافعي، وأحمد، وإسحاق، وهو مذهب ابن عباس.
وقال أبو حنيفة، ومالك: ليس بواجب؛ لأنه عقد معاوضة، فلا يجب فيه الإيتاء كسائر العقود، ولكن من الندب وضع جزء منه.
بالحجاز، والشام، والعراق، وبه قال أحمد، وإسحاق. وذكر المزني عن الشافعي: ويجبر السيد على قبول النجم إذا عجله له المكاتب، واحتج في ذلك بحديث عمر".
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মাকাতাব ততক্ষণ পর্যন্ত গোলাম যতক্ষণ তার মুকাতাবা চুক্তির এক দিরহামও বাকি থাকে।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: যে গোলাম একশত উকিয়া বিনিময়ে চুক্তিবদ্ধ হলো এবং দশ উকিয়া বাদে তা পরিশোধ করলো, সে তখনও গোলাম। আর যে গোলাম একশত দীনারের বিনিময়ে চুক্তিবদ্ধ হলো এবং দশ দীনার বাদে তা পরিশোধ করলো, সে তখনও গোলাম।
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন যে তিনি বলেছেন: তোমাদের কারো অধীনে যদি কোনো মাকাতাব থাকে এবং তার কাছে পরিশোধ করার মতো অর্থ থাকে, তবে সে যেন তার থেকে পর্দা করে।
আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) [সূরা নূর: ৩৩]-এর এই আয়াত সম্পর্কে বলেন: {আর তোমাদের মালিকানাধীন দাসদের মধ্যে যারা মুক্তি চায়, তোমরা তাদের সাথে চুক্তিবদ্ধ হও, যদি তোমরা তাদের মধ্যে কোনো কল্যাণ দেখতে পাও; আর আল্লাহ তোমাদেরকে তাঁর যে সম্পদ দিয়েছেন, তা থেকে তোমরা তাদের দাও।} তিনি বলেন: মাকাতাবের জন্য এক-চতুর্থাংশ ছেড়ে দেওয়া হবে।
6008 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنما الولاء لمن أعتق".
صحيح: رواه البخاري في الفرائض (6752) عن إسماعيل بن عبد اللَّه قال: حدثني مالك، عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল-ওয়ালা (স্বাধীন করার কারণে সৃষ্ট উত্তরাধিকারের অধিকার) কেবল সেই ব্যক্তির জন্য, যে (গোলামকে) মুক্ত করেছে।"
6009 - عن ابن عمر أن عائشة أم المؤمنين أرادت أن تشتري جارية تعتقها، فقال أهلها: نبيعكها على أن ولاءها لنا. فذكرت ذلك لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"لا يمنعنك ذلك، فإنما الولاء لمن أعتق".
متفق عليه: رواه مالك في العتق والولاء (18) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في المكاتب (2562)، ومسلم في العتق (1504: 5) كلاهما من طريق مالك به مثله.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুমিনদের মাতা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একজন দাসী কিনতে চাইলেন যেন তাকে মুক্ত করতে পারেন। তখন দাসীর মালিকরা বলল: আমরা এই শর্তে আপনার কাছে বিক্রি করব যে, তার ‘ওয়ালা’ (মুক্তির অধিকার ও উত্তরাধিকার) আমাদের থাকবে। অতঃপর তিনি বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: "তা যেন তোমাকে বিরত না রাখে। কারণ, ‘ওয়ালা’ কেবল তারই, যে মুক্ত করেছে।"
6010 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: جاءت بريرة، فقالت: إني كاتبت أهلي على تسع أواق، في كل عام أوقية، فأعينيني، فقالت عائشة: إن أحب أهلك أن أعدها لهم عنك عددتها، ويكون لي ولاؤك، فعلت. فذهبت بريرة إلى أهلها، فقالت لهم ذلك، فأبوا عليها، فجاءت من عند أهلها ورسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جالس، فقالت لعائشة: إني قد عرضت عليهم ذلك، فأبوا على إلا أن يكون الولاء لهم، فسمع ذلك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فسألها، فأخبرته عائشة، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"خذيها، واشترطي لهم الولاء، فإنما الولاء لمن أعتق". ففعلت عائشة، ثم قام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الناس، فحمد اللَّه، وأثنى عليه، ثم قال:"أما بعد، فما بال رجال يشترطون شروطا ليست في كتاب اللَّه، ما كان من شرط ليس في كتاب اللَّه فهو باطل، وإن كان مائة شرط، فضاء اللَّه أحق، وشرط اللَّه أوثق، وإنما الولاء لمن أعتق".
متفق عليه: رواه مالك في العتق والولاء (17) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. ورواه البخاري في الشروط (2729) من طريق مالك، به، مثله. ورواه مسلم في العتق (1504: 8) من طريق أبي أسامة، حدثنا هشام بن عروة، به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ছিলেন, তিনি বলেন: বারীরা (নামের ক্রীতদাসী) এসে বললেন, আমি আমার মালিকদের সাথে নয় 'ঊকিয়া' (নির্ধারিত পরিমাণ রূপা) এর বিনিময়ে মুকাতাবা (মুক্তির চুক্তি) করেছি, প্রতি বছর এক ঊকিয়া করে দেব। সুতরাং আপনি আমাকে সাহায্য করুন। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, যদি তোমার মালিকরা চায় যে আমি তোমার পক্ষ থেকে তাদের পাওনা একসাথে গুণে দিয়ে দেই, এবং তোমার 'ওয়ালা' (উত্তরাধিকারের অধিকার) আমার জন্য থাকে, তবে আমি তা করতে পারি। তখন বারীরা তার মালিকদের কাছে গেলেন এবং তাদেরকে তা বললেন। কিন্তু তারা তা প্রত্যাখ্যান করল।
এরপর বারীরা তার মালিকদের কাছ থেকে ফিরে আসলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে উপবিষ্ট ছিলেন। তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, আমি তাদের কাছে এই প্রস্তাব পেশ করেছিলাম, কিন্তু তারা প্রত্যাখ্যান করেছে, তারা চাচ্ছে 'ওয়ালা' যেন তাদেরই থাকে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই কথা শুনতে পেলেন। তিনি বারীরাকে জিজ্ঞেস করলেন। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (ঘটনাটি) জানালেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাকে (বারীরাকে) তুমি কিনে নাও এবং তাদের জন্য 'ওয়ালা'র শর্ত রাখো, কারণ 'ওয়ালা' (উত্তরাধিকারের অধিকার) কেবল সেই ব্যক্তির জন্য, যে মুক্ত করে।"
তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা-ই করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জনগণের মাঝে দাঁড়ালেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন। অতঃপর বললেন, "আম্মা বা'দ (যাহোক), কী হয়েছে সেই সব লোকেদের, যারা এমন সব শর্তারোপ করে যা আল্লাহর কিতাবে নেই? যে শর্ত আল্লাহর কিতাবে নেই, তা বাতিল, যদিও তা শত শর্ত হয়। আল্লাহর ফায়সালাই বেশি হকদার এবং আল্লাহর শর্তই অধিক নির্ভরযোগ্য। আর 'ওয়ালা' (উত্তরাধিকার) কেবল সেই ব্যক্তির জন্য, যে মুক্ত করে।"
6011 - عن عروة قال: إن عائشة أخبرته: أن بريرة جاءت عائشة تستعينها في كتابتها، ولم تكن قضت من كتابتها شيئًا. فقالت لها عائشة: ارجعي إلى أهلك، فإن أحبوا أن أقضي عنك كتابتك، ويكون ولاؤك لي فعلت، فذكرت ذلك بريرة لأهلها، فأبوا،
وقالوا: إن شاءت أن تحتسب عليك فلتفعل، ويكون لنا ولاؤك، فذكرت ذلك لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أبتاعي، فأعتقي، فإنما الولاء لمن أعتق".
ثم قام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"ما بال أناس يشترطون شروطا ليست في كتاب اللَّه، من اشترط شرطا ليس في كتاب اللَّه فليس له، وإن شرط مائة مرة، شرط اللَّه أحق وأوثق".
متفق عليه: رواه البخاري في المكاتب (2561)، ومسلم في العتق (1504: 6) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ليث، عن ابن شهاب، عن عروة أن عائشة أخبرته فذكرته.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরওয়াহ তাকে খবর দেন যে, বারীরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তার মুকাতাবা (মুক্তির চুক্তি)-এর ব্যাপারে সাহায্য চান। কিন্তু তখনো তিনি তার মুকাতাবার কোনো অংশ পরিশোধ করেননি। তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তুমি তোমার মালিকদের কাছে ফিরে যাও। যদি তারা চায় আমি তোমার মুকাতাবা পরিশোধ করে দেব এবং তোমার 'ওয়ালা' (মুক্তির বন্ধন) আমার জন্য হবে, তবে আমি তা করতে পারি। বারীরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিষয়টি তার মালিকদের কাছে বললেন। কিন্তু তারা অস্বীকার করল এবং বলল: যদি সে (আয়েশা) তোমার জন্য সওয়াবের আশায় তা করতে চায়, তবে করুক। কিন্তু তোমার 'ওয়ালা' আমাদেরই থাকবে। বারীরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি তাকে কিনে নাও এবং আযাদ (মুক্ত) করে দাও। কারণ, 'ওয়ালা' (মুক্তির বন্ধন) কেবল সেই ব্যক্তির জন্য যে মুক্তি দেয়।"
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং বললেন: "মানুষের কী হলো যে তারা এমন সব শর্তারোপ করে যা আল্লাহর কিতাবে নেই? যে ব্যক্তি এমন কোনো শর্তারোপ করে যা আল্লাহর কিতাবে নেই, তা তার জন্য প্রযোজ্য হবে না, যদিও সে একশ’ বার শর্তারোপ করে। আল্লাহর শর্তই অধিকতর সত্য ও নির্ভরযোগ্য।"
6012 - عن عائشة قالت: كان في بريرة ثلاث قضيات: أراد أهلها أن يبيعوها، ويشترطوا ولاءها، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"اشتريها، وأعتقيها؛ فإن الولاء لمن أعتق".
قالت: وعتقت، فخيرها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فاختارت نفسها.
قالت: وكان الناس يتصدقون عليها، وتهدي لنا. فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"هو عليها صدقة، وهو لكم هدية، فكلوه".
صحيح: رواه مسلم في العتق (1504: 10) من طرق عن أبي معاوية، حدثنا هشام بن عروة، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বারীরার (মুক্তি) ব্যাপারে তিনটি ঘটনা ছিল। তার (বারীরার) মালিকরা তাকে বিক্রি করতে চেয়েছিল এবং এই শর্ত করেছিল যে, তার ‘ওয়ালা’ (অভিভাবকত্বের অধিকার) তাদেরই থাকবে। তিনি (আয়িশা) বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে কিনে নাও এবং মুক্ত করে দাও। কারণ, ‘ওয়ালা’ (অভিভাবকত্বের অধিকার) কেবল সেই ব্যক্তির জন্য, যে মুক্ত করে।"
তিনি (আয়িশা) বললেন: আর সে মুক্ত হয়ে গেল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (তার স্বামীর সঙ্গে থাকার বা না থাকার) এখতিয়ার দিলেন, ফলে সে নিজেকে (স্বামীর থেকে আলাদা হওয়াকে) বেছে নিলো।
তিনি (আয়িশা) বললেন: লোকেরা তাকে (বারীরাকে) সদকা দিত এবং সে আমাদেরকে হাদিয়া দিত। আমি বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: "এটি তার জন্য সদকা, আর তোমাদের জন্য হাদিয়া, সুতরাং তোমরা তা খাও।"
6013 - عن عائشة أنها اشترت بريرة من أناس من الأنصار، واشترطوا الولاء، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الولاء لمن ولي النعمة". وخيرها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وكان زوجها عبدا، وأهدت لعائشة لحما، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو صنعتم لنا من هذا اللحم". قالت عائشة: تصدق به على بريرة، فقال:"هو لها صدقة، ولنا هدية".
متفق عليه: رواه مسلم في العتق (1504: 11) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا حسين بن علي، عن زائدة، عن سماك، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
ورواه البخاري في الهبة (2578)، ومسلم كلاهما من حديث شعبة، عن عبد الرحمن بن القاسم، وفيه: قال عبد الرحمن:"زوجها حر، أو عبد".
قال شعبة:"سألت عبد الرحمن عن زوجها، قال: لا أدري أحر، أم عبد". هذا لفظ البخاري، ولفظ مسلم: قال: لا أدري.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আনসারদের কিছু লোকের কাছ থেকে বারীরাকে ক্রয় করলেন, এবং তারা 'আল-ওয়ালা' (মুক্তির অধিকার) শর্তারোপ করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল-ওয়ালা (মুক্তির অধিকার) সেই ব্যক্তির জন্য, যে অনুগ্রহ প্রদান করে (অর্থাৎ মুক্ত করে)।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (বারীরাকে) এখতিয়ার দিলেন (স্বাধীনতার পর বৈবাহিক সম্পর্ক বজায় রাখার বা ছিন্ন করার), আর তার স্বামী ছিল গোলাম। সে (বারীরা) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কিছু গোশত উপহার দিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যদি তোমরা এই গোশত থেকে আমাদের জন্য রান্না করতে!" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "এটি বারীরার প্রতি সদকাহ (দান) করা হয়েছে।" তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এটি তার (বারীরার) জন্য সদকাহ, কিন্তু আমাদের জন্য হাদিয়া (উপহার)।"
6014 - عن أيمن قال: دخلت على عائشة رضي الله عنها، فقلت: كنت غلاما لعتبة ابن أبي لهب، ومات، وورثني بنوه، وإنهم باعوني من ابن أبي عمرو، فأعتقني ابن
أبي عمرو، واشترط بنو عتبة الولاء، فقالت: دخلت بريرة، وهي مكاتبة، فقالت: اشتريني، وأعتقيني. قالت: نعم. قالت: لا يبيعوني حتى يشترطوا ولائي، فقالت: لا حاجة لي بذلك، فسمع بذلك النبي صلى الله عليه وسلم، أو بلغه، فذكر لعائشة فذكرت عائشة ما قالت لها، فقال:"اشتريها، وأعتقيها، ودعيهم يشترطون ما شاؤوا". فاشترتها عائشة، فأعتقتها، واشترط أهلها الولاء، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"الولاء لمن أعتق، وإن اشترطوا مائة شرط".
صحيح: رواه البخاري في المكاتب (2565) عن أبي نعيم، حدثنا عبد الواحد بن أيمن، حدثني أبي أيمن فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আয়মান তাঁর নিকট প্রবেশ করে বললেন: আমি উতবা ইবনে আবী লাহাবের গোলাম ছিলাম। সে মারা গেলে তার সন্তানেরা আমার উত্তরাধিকারী হলো। তারা আমাকে ইবনে আবী আমরের কাছে বিক্রি করে দেয়। ইবনে আবী আমর আমাকে মুক্ত করে দেন, কিন্তু উতবার সন্তানেরা 'ওয়ালা' (উত্তরাধিকারের সম্পর্ক)-এর শর্তারোপ করে। তখন তিনি (আয়িশা) বললেন: একবার বারীরাহ আমার নিকট এসেছিল—সে ছিল মুকাতাবা (মুক্তিপণ চুক্তিবদ্ধ দাসী)—সে বলল: আপনি আমাকে কিনে নিন এবং মুক্ত করে দিন। আমি বললাম: হ্যাঁ। সে বলল: তারা আমার 'ওয়ালা' (উত্তরাধিকারের সম্পর্ক)-এর শর্তারোপ না করলে আমাকে বিক্রি করবে না। তিনি (আয়িশা) বললেন: আমার এতে কোনো প্রয়োজন নেই। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বিষয়ে শুনতে পেলেন, অথবা তাঁর কাছে এই সংবাদ পৌঁছাল। তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট বিষয়টি উল্লেখ করলেন। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে জানালেন যে বারীরাহ তাঁকে কী বলেছিল। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে কিনে নাও এবং তাকে মুক্ত করে দাও। তারা যা ইচ্ছা শর্তারোপ করুক।" অতএব, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে কিনে নিলেন এবং মুক্ত করে দিলেন। আর তার মালিকেরা 'ওয়ালা'-এর শর্তারোপ করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওয়ালা' (উত্তরাধিকারের সম্পর্ক) তার, যে মুক্ত করেছে; তারা যদি একশ' শর্তও আরোপ করে।"
6015 - عن أبي هريرة قال: أرادت عائشة أن تشتري جارية تعتقها، فأبى أهلها إلا أن يكون لهم الولاء، فذكرت ذلك لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"لا يمنعك ذلك، فإنما الولاء لمن أعتق".
صحيح: رواه مسلم في العتق (1505) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا خالد بن مخلد، عن سليمان بن بلال، حدثني سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি দাসী ক্রয় করে তাকে মুক্ত করে দিতে চাইলেন, কিন্তু তার মালিকরা এই শর্ত ছাড়া অস্বীকার করল যে (মুক্ত করার পরেও) ওয়ালা' (পৃষ্ঠপোষকতার অধিকার) তাদেরই থাকবে। তিনি (আয়েশা) বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন, তখন তিনি বললেন: "তা যেন তোমাকে বাধা না দেয়। কারণ, ওয়ালা' সেই ব্যক্তিই লাভ করে, যে মুক্ত করে।"
6016 - عن عائشة قالت: اشتريت بريرة، فاشترط أهلها ولاءها، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"أعتقيها؛ فإن الولاء لمن أعطى الورق". فأعتقتها، فدعاها النبي صلى الله عليه وسلم، فخيرها من زوجها، فقالت: لو أعطاني كذا وكذا ما ثبتُّ عنده، فاختارت نفسها.
صحيح: رواه البخاري في العتق (2536) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة فذكرته.
ورواه في الفرائض (6754) من حديث أبي عوانة، عن منصور به نحوه، وفيه: قال الأسود:"وكان زوجها حرا". وقول الأسود منقطع، وقول ابن عباس:"رأيته عبدا" أصح. . انتهى.
قلت: لأنه رآه، وحضر القصة، وشاهدها، فيترجح قوله على قول من لم يشهدها، والأسود لم يدخل المدينة في عهد النبي صلى الله عليه وسلم. كذا في الفتح أيضًا (12/ 40).
وفي رواية عند البخاري (6760) من حديث سفيان، عن منصور بإسناده، وفيه:"الولاء لمن أعطى الورق، وولي النعمة".
وقوله:"ولي النعمة" أي أعتق. وفي الحديث دليل على أن الولاء لكل معتق، ذكرا كان، أو أنثى، وهو أمر مجمع عليه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বারীরাকে ক্রয় করলাম। কিন্তু তার মালিকরা (বিক্রয়ের শর্ত হিসেবে) তাদের আনুগত্যের (Walā'-এর) শর্তারোপ করল। আমি বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: "তুমি তাকে মুক্ত করে দাও। কারণ আনুগত্য (Walā') তো তার জন্যই হবে, যে (মুক্তিপণের) মূল্য প্রদান করে।" অতঃপর আমি তাকে মুক্ত করে দিলাম। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডাকলেন এবং তার স্বামীর ব্যাপারে তাকে এখতিয়ার (পছন্দের স্বাধীনতা) দিলেন। সে বলল: যদি সে আমাকে এত এত সম্পদও দেয়, তবুও আমি তার সাথে থাকব না। এরপর সে নিজেকেই বেছে নিল (অর্থাৎ স্বামীকে প্রত্যাখ্যান করল)।
6017 - عن وعن عبد اللَّه بن عمر: أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن بيع الولاء، وعن هبته.
متفق عليه: رواه مالك في العتق والولاء (20) عن عبد اللَّه بن دينار، عن عبد اللَّه بن عمر فذكره. ورواه البخاري في العتق (2535) من طريق شعبة، ومسلم في العتق (1506) من طريق سليمان بن بلال، وغيره، كلهم عن عبد اللَّه بن دينار به.
قال مسلم:"الناس كلهم عيال على عبد اللَّه بن دينار في هذا الحديث".
وقال الترمذي (2126):"هذا حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلا من حديث عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر. . .، وقد رواه شعبة، وسفيان الثوري، ومالك بن أنس، عن عبد اللَّه بن دينار. ويروى عن شعبة قال:"لوددت أن عبد اللَّه بن دينار حين حدث بهذا الحديث أذن لي حتى كنت أقوم إليه، فأقبل رأسه".
قال أبو عيسى:"وروى يحيى بن سليم هذا الحديث عن عبيد اللَّه بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وهو وهم، وهم فيه يحيى بن سليم، والصحيح عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، هكذا رواه غير واحد، عن عبيد اللَّه بن عمر". انتهى.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'আল-ওয়ালা' (মুক্তির অধিকার) বিক্রি করতে এবং তা দান করতে নিষেধ করেছেন।
6018 - عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الولاء لحمة كلحمة النسب، لا يباع، ولا يوهب".
صحيح: رواه ابن حبان (4950) عن أبي يعلى قال: قرئ على بشر بن الوليد، عن يعقوب بن إبراهيم، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر فذكره، وإسناده صحيح. ويعقوب بن إبراهيم هو أبو يوسف القاضي، صاحب أبي حنيفة.
وقد روي مرسلا من وجه آخر إلا أن هذا المرسل لا يُعل الموصول لاختلاف مخارجها، كما أنه روي موقوفا على سعيد بن المسيب، رواه عبد الرزاق (16149)، فالمرسل والموقوف يقويان الموصول، انظر تخريجه المفصل في الفرائض.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ওয়ালা (মুক্তিদানজনিত সম্পর্ক) হলো বংশের সম্পর্কের মতোই একটি সম্পর্ক, এটা বিক্রিও করা যায় না, দানও করা যায় না।”
6019 - عن علي قال: ما عندنا شيء إلا كتاب اللَّه، وهذه الصحيفة عن النبي صلى الله عليه وسلم:"المدينة حرم ما بين عائر إلى كذا، من أحدث فيها حدثا، أو آوى محدثا فعليه لعنة اللَّه والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منه صرف ولا عدل".
وقال:"ذمة المسلمين واحدة، فمن أخفر مسلما، فعليه لعنة اللَّه والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منه صرف ولا عدل، ومن تولى قوما بغير إذن مواليه فعليه لعنة اللَّه والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منه صرف ولا عدل".
متفق عليه: رواه البخاري في فضائل المدينة (1870)، ومسلم في العتق (1370: 20) من طريق الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن أبيه، عن علي فذكره. والسياق للبخاري.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাদের কাছে আল্লাহর কিতাব এবং নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে প্রাপ্ত এই সহীফা (লিখিত পাণ্ডুলিপি) ছাড়া আর কিছুই নেই। (তাতে লেখা আছে:) "মদীনা হলো ‘আয়ির’ থেকে ‘অমুক’ স্থানের মধ্যবর্তী হারাম (পবিত্র এলাকা)। যে ব্যক্তি এর মধ্যে (শরীয়ত বিরোধী) কোনো কাজ করবে, অথবা কোনো পাপকারীকে আশ্রয় দেবে, তার উপর আল্লাহ, ফেরেশতা এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ। তার থেকে কোনো ফরয বা নফল ইবাদত কবুল করা হবে না।"
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেন: "মুসলমানদের প্রদত্ত নিরাপত্তা চুক্তি অভিন্ন (এক ও অখণ্ড)। যে ব্যক্তি কোনো মুসলমানের নিরাপত্তা চুক্তি ভঙ্গ করবে, তার উপর আল্লাহ, ফেরেশতা এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ। তার থেকে কোনো ফরয বা নফল ইবাদত কবুল করা হবে না। আর যে ব্যক্তি তার মনিবদের অনুমতি ছাড়া অন্য কোনো গোষ্ঠীর আনুগত্য গ্রহণ করবে (বা তাদের সঙ্গে মিত্রতা স্থাপন করবে), তার উপর আল্লাহ, ফেরেশতা এবং সমস্ত মানুষের অভিশাপ। তার থেকে কোনো ফরয বা নফল ইবাদত কবুল করা হবে না।"
6020 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كتب النبي صلى الله عليه وسلم على كل بطن عقوله، ثم كتب:"أنه لا يحل لمسلم أن يتولى مولى رجل مسلم بغير إذنه".
ثم أخبرت أنه لعن في صحيفته من فعل ذلك.
صحيح: رواه مسلم في العتق (1507) عن محمد بن رافع، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابرا يقول فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক গোত্রের উপর তাদের দিয়াত (রক্তপণ) নির্ধারণ করে লিখেছিলেন, অতঃপর তিনি লিখলেন: "কোনো মুসলিমের জন্য এটা বৈধ নয় যে, সে অন্য কোনো মুসলিম ব্যক্তির আযাদকৃত গোলামকে (মাওলা) তার অনুমতি ব্যতীত নিজের তত্ত্বাবধানে নিয়ে নেবে।" এরপর আমাকে জানানো হলো যে, যারা এমন কাজ করবে, তাদেরকে তাঁর সহীফায় (লিখিত দলিলে) অভিশাপ দেওয়া হয়েছে।