আল-জামি` আল-কামিল
6021 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من تولى قوما بغير إذن مواليه فعليه لعنة اللَّه والملائكة، لا يقبل منه عدل ولا صرف".
صحيح: رواه مسلم في العتق (1508: 18) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا يعقوب بن عبد الرحمن القاري، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, 'যে ব্যক্তি তার মনিবদের অনুমতি ব্যতীত অন্য কোনো কওমের পৃষ্ঠপোষকতা গ্রহণ করে, তার উপর আল্লাহ ও ফেরেশতাদের অভিশাপ। তার কাছ থেকে ফরয বা নফল কোনো প্রকার আমলই কবুল করা হবে না।'
6022 - عن جابر بن عبد اللَّه أن رجلا من الأنصار أعتق غلاما له عن دبر لم يكن له مال غيره، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"من يشتريه مني؟"، فاشتراه نعيم بن عبد اللَّه بثمانمائة درهم، فدفعها إليه.
قال عمرو: سمعت جابر بن عبد اللَّه يقول: عبدا قبطيا مات عام أول.
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2534) من طريق شعبة-، ومسلم في الأيمان والنذور (997: 58) من طريق حماد بن زيد- كلاهما عن عمرو بن دينار، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره. واللفظ لمسلم.
قوله:"عن دبر" أي علق عتقه بموته؛ لأن الموت دبر الحياة.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের এক ব্যক্তি তার এক গোলামকে ‘দুবুর’ করল (অর্থাৎ, তার মৃত্যুর পর সে মুক্ত হবে)। তার কাছে সেটি ছাড়া অন্য কোনো সম্পদ ছিল না। এই সংবাদ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন, "কে আমার কাছ থেকে একে কিনবে?" তখন নুআইম ইবনে আবদুল্লাহ আটশো দিরহামের বিনিময়ে তাকে কিনে নিলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই টাকা তাকে দিয়ে দিলেন।
আমর (ইবনে দীনার) বলেন, আমি জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: (সে ছিল) এক কিবতী গোলাম, যে গত বছর মারা গিয়েছিল।
6023 - عن جابر قال: أعتق رجل من بني عُذْرة عبدا له عن دبر، فبلغ ذلك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"ألك مال غيره؟". فقال: لا. فقال:"من يشتريه مني؟". فاشتراه نعيم ابن عبد اللَّه العدوي بثمانمائة درهم، فجاء بها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فدفعها إليه، ثم قال:"ابدأ بنفسك، فتصدق عليها؛ فإن فضل شيء فلأهلك، فإن فضل عن أهلك شيء فلذي قرابتك، فإن فضل عن ذي قرابتك شيء فهكذا وهكذا". يقول: فبين يديك، وعن يمينك، وشمالك.
متفق عليه: رواه مسلم في الزكاة (997) عن قتيبة بن سعيد، عن الليث، عن أبي الزبير، عن
جابر فذكره.
ورواه البخاري في الأحكام (7186) من وجه آخر عن جابر مختصرا.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনু উযরা গোত্রের এক ব্যক্তি তার এক গোলামকে ‘দুবর’ (মৃত্যুর পর মুক্তির শর্তে) মুক্ত করল। এ সংবাদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: "এ ছাড়া কি তোমার আর কোনো সম্পদ আছে?" সে বলল: "না।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কে এটিকে আমার কাছ থেকে কিনবে?" তখন নু'আইম ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আদাবী সেটি আটশ' দিরহামে কিনে নিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই অর্থ এনে তাকে দিলেন, এরপর বললেন: "তুমি তোমার নিজের (প্রয়োজন) দিয়ে শুরু করো, এবং তার উপরই ব্যয় করো। যদি কিছু উদ্বৃত্ত থাকে, তবে তা তোমার পরিবারের জন্য। যদি পরিবারের প্রয়োজন মেটানোর পরও কিছু উদ্বৃত্ত থাকে, তবে তা তোমার নিকটাত্মীয়দের জন্য। আর যদি নিকটাত্মীয়দের প্রয়োজন মেটানোর পরও কিছু উদ্বৃত্ত থাকে, তবে এমনভাবে এবং এমনভাবে (ব্যয় করো)।" তিনি বললেন: অর্থাৎ তোমার সামনে, তোমার ডান দিকে এবং তোমার বাঁ দিকে।
6024 - عن جابر بن عبد اللَّه يقول: كنا نبيع سرارينا، وأمهات أولادنا، والنبي صلى الله عليه وسلم فينا، لا نرى بذلك بأسا.
صحيح: رواه عبد الرزاق (13211)، وعنه أحمد (14446)، وابن ماجه (2517)، وابن حبان (4323)، والدارقطني (4/ 135)، والبيهقي (10/ 348) كلهم عن ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه أبو داود (3950) من وجه آخر، عن عطاء، عن جابر بن عبد اللَّه قال: بعنا أمهات الأولاد على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وأبي بكر، فلما كان عمر نهانا فانتهينا.
قال الحاكم (2/ 19):"صحيح على شرط مسلم".
وفي الباب ما روي عن أبي سعيد الخدري قال: كنا نبيع أمهات الأولاد على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
رواه أحمد (11164)، والدارقطني (4/ 135 - 136)، والحاكم (2/ 19)، والبيهقي (10/ 348) كلهم من طريق شعبة، عن زيد بن الحواري قال: سمعت أبا الصديق يحدث عن أبي سعيد الخدري فذكره.
وزيد بن الحواري هو العمي البصري، واسم أبيه مرة، ضعيف باتفاق أهل العلم، ومع ذلك قال الحاكم: صحيح الإسناد.
هذا هو الصحيح أن أم الولد -وهي التي ولدت من سيدها في ملكه- كانت تباع في عهد النبي صلى الله عليه وسلم.
وما رواه أبو داود (3953) قال: حدثنا عبد اللَّه بن محمد النفيلي، حدثنا محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن خطاب بن صالح مولى الأنصار، عن أمه، عن سلامة بنت معقل -امرأة من خارجة قيس عيلان- قالت: قدم بي عمي في الجاهلية، فباعني من الحباب بن عمرو أخي أبي اليسر بن عمرو، فولدت له عبد الرحمن بن الحباب، ثم هلك، فقالت امرأته: الآن واللَّه تباعين في دينه، فأتيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول اللَّه، إني امرأة من خارجة قيس عيلان، قدم بي عمي المدينة في الجاهلية، فباعني من الحباب بن عمرو أخي أبي اليسر بن عمرو، فولدت له عبد الرحمن بن الحباب، فقالت امرأته: الآن واللَّه تباعين في دينه. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من ولي الحباب؟". قيل: أخوه أبو اليسر بن عمرو، فبعث إليه، فقال:"أعتقوها، فإذا سمعتم برقيق قدم علي، فأتوني أعوضكم منها". قالت: فأعتقوني، وقدم على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رقيق، فعوضهم مني غلاما". فلا يصح: فيه محمد بن إسحاق مدلس، وقد عنعن، وأم خطاب"مجهولة لا تعرف".
وأما ما روي عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم"نهى عن بيع أمهات الأولاد، لا يبعن، ولا يوهبن، ولا يورثن، يستمتع بها سيدها ما دام حيا، فإذا مات فهي حرة" فالصواب أنه موقوف.
رواه الدارقطني (4/ 135) عن أبي بكر الشافعي، نا الهيثم بن محمد بن خلف، نا عبد اللَّه بن مطيع، نا عبد اللَّه بن جعفر -هو المخزومي-، نا عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر فذكره.
وأعل بعبد اللَّه بن جعفر المديني والد علي بن المديني الإمام المعروف، فإن رواياته عن عبد اللَّه ابن دينار كلها غير محفوظة، كما قال ابن عدي في ترجمته، وهذا منها.
وأما قول الدارقطني:"المخزومي" فيبدو أنه وقع خطأ في نسخته، وإلا فقد ذكره في العلل (2/ 42)، فقال فيه: عبد اللَّه بن جعفر المديني، ورجح أن يكون موقوفا على عمر بن الخطاب.
ثم رواه في السنن من وجه آخر، عن يحيى بن إسحاق، نا عبد العزيز بن مسلم، عن عبد اللَّه بن دينار، عن عبد اللَّه بن عمر، عن عمر نحوه غير مرفوع.
وكذلك رواه فليح بن سليمان، عن عبد اللَّه بن دينار.
وكذلك رواه البيهقي من رواية سلمان بن بلال وسفيان، عن عبد اللَّه بن دينار. قال البيهقي:"كذا رواية الجماعة عن عبد اللَّه بن دينار، وغلط فيه بعض الرواة عن عبد اللَّه بن دينار، فرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وهو وهم لا يحل ذكره".
ورواه عبد الرزاق (13225) بإسناد صحيح عن ابن عمر قال: قضى عمر في أمهات الأولاد أن لا يبعن.
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس قال: ذكرت أم إبراهيم عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"أعتقها ولدها".
رواه ابن ماجه (2516) عن أحمد بن يوسف قال: حدثنا أبو عاصم، قال: حدثنا أبو بكر يعني النهشلي، عن الحسين بن عبد اللَّه، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل الحسين بن عبد اللَّه بن عبيد اللَّه بن عباس الهاشمي المدني ضعيف باتفاق أهل العلم، ومن طريقه رواه أيضًا البيهقي (10/ 346)، وقال: حسين بن عبد اللَّه ضعفه اكثر أصحاب الحديث.
وفي معناها أحاديث أخرى، رواها الدارقطني، والحاكم، والبيهقي، وكلها معلولة.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আমাদের বাঁদিদের এবং উম্মাহাতুল আওলাদদের (যাদের গর্ভে আমাদের সন্তান জন্ম নিত) বিক্রি করতাম। আর নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের মাঝে উপস্থিত ছিলেন, আমরা এতে কোনো দোষ মনে করতাম না।
6025 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كنا نبيع أمهات الأولاد على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وأبي بكر، فلما كان عمر نهى عن بيعهن.
صحيح: رواه أبو داود (3954)، وابن حبان (4324)، والحاكم (2/ 18 - 19)، والبيهقي (10/ 347)
كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن قيس بن سعد، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه البيهقي بإسناد صحيح عن ابن عمر أن عمر بن الخطاب قال:"أيما وليدة ولدت من سيدها فإنه لا يبيعها، ولا يهبها، ولا يورثُها، وهو يستمتع منها فإذا مات فهي حرة".
ذهب عامة أهل العلم من الصحابة والتابعين إلى قول عمر بن الخطاب إلا ما روي عن علي بن أبي طالب، وقد كان في أول الأمر مع عمر، ثم اختلف عنه، كما رواه عبد الرزاق (13224)، عن معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين، عن عبيدة السلماني قال: سمعت عليا: يقول: اجتمع رأيي ورأي عمر في أمهات الأولاد: أن لا يبعن. قال: ثم رأيت بعد أن يبعن. قال عبيدة: فقلت له: فرأيك ورأي عمر في الجماعة أحب إلي من رأيك وحدك في الفرقة -أو قال في الفتنة- قال: فضحك علي.
وذهب الخطابي إلى قول آخر، فقال:"وقد يحتمل أن يكون ذلك مباحًا في العصر الأول، ثم نهى النبي صلى الله عليه وسلم عن ذلك قبل خروجه من الدنيا، ولم يعلم به أبو بكر؛ لأن ذلك لم يحدث في أيامه لقصر مدتها، ولاشتغاله بأمور الدين، ومحاربة أهل الردة، واستصلاح أهل الدعوة، ثم بقي الأمر على ذلك في عصر عمر مدة من الزمان، ثم نهى عنه عمر حين بلغه ذلك عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فانتهوا عنه".
وقال الشافعي: هي مملوكة بحالها إلا أنه لا يجوز لسيدها بيعها، ولا إخراجها عن ملكهـ بشيء غير العتق، وإنها حرة إذا مات من رأس المال. قال: هو تقليد لعمر بن الخطاب.
وقد بيّنتُ أحكام أمهات الأولاد بالتفصيل في"المنة الكبرى" (9/ 350 - 360)، ولا أرى إعادتها مخافة التطويل.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে উম্মাহাতুল আওলাদদের (স্বামীর ঔরসে সন্তান জন্মদানকারী দাসী) বিক্রি করতাম। কিন্তু যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগ আসল, তিনি তাদের বিক্রি করতে নিষেধ করলেন।
বায়হাকী সহীহ সনদে ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: "যে কোনো দাসী তার মনিবের ঔরসে সন্তানের জন্ম দেবে, তবে সে যেন তাকে বিক্রি না করে, তাকে দান না করে এবং তাকে যেন উত্তরাধিকার সূত্রে না দেওয়া হয়। মনিব তার থেকে (স্ত্রী হিসেবে) ভোগ করবে এবং যখন সে (মনিব) মারা যাবে, তখন সে (দাসী) স্বাধীন হয়ে যাবে।"
6026 - عن حكيم بن حزام أنه أعتق في الجاهلية مائة رقبة، وحمل على مائة بعير، فلما أسلم حمل على مائة بعير، وأعتق مائة رقبة. قال: فسألت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول اللَّه، أرأيت أشياء كنت أصنعها في الجاهلية كنت أتحنث بها، يعني أتبرر بها. قال: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أسلمت على ما سلف لك من خير".
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2538)، ومسلم في الإيمان (123: 195) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن حكيم بن حزام فذكره، والسياق للبخاري.
وأوضحت رواية مسلم أن قائل:"يعني أتبرر بها" هو هشام بن عروة.
হাকীম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি জাহেলী যুগে একশো দাস মুক্ত করেছিলেন এবং একশো উটের উপর (মাল বা আরোহী দিয়ে) দান করেছিলেন। যখন তিনি ইসলাম গ্রহণ করলেন, তখনও তিনি একশো উটের উপর (দান) করলেন এবং একশো দাস মুক্ত করলেন। তিনি (হাকীম) বলেন: এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম এবং বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ, জাহেলী যুগে আমি যে সমস্ত কাজ করতাম, যার মাধ্যমে আমি আল্লাহ্র সন্তুষ্টি ও পুণ্য লাভ করতে চাইতাম – আপনি সে সম্পর্কে কী মনে করেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "পূর্বে তুমি যে সৎকাজ করেছিলে, সেগুলোর কল্যাণ সহই তুমি ইসলাম গ্রহণ করেছো।"
6027 - عن أبي سعيد الخدري قال: خرجنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في غزوة بني المصطلق، فأصبنا سبيا من سبي العرب، فاشتهينا النساء، واشتدت علينا العزبة، وأحببنا الفداء، فأردنا أن نعزل، فقلنا: نعزل ورسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بين أظهرنا قبل أن نسأله، فسألناه عن ذلك، فقال:"ما عليكم أن لا تفعلوا، ما من نسمة كائنة إلى يوم القيامة إلا وهي كائنة".
متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (95) عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن محمد بن يحيى بن حَبَّان، عن ابن مُحَيريز أنه قال: دخلت المسجد، فرأيت أبا سعيد الخدري، فجلست إليه، فسألته عن العزل، فقال أبو سعيد الخدري فذكره. ورواه البخاري في العتق (2542)، ومسلم في النكاح (1438: 127) كلاهما من طريق مالك به.
وهو عند مسلم باختصار، وكلاهما لم يذكرا القصة في أوله.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে বনূ মুসতালিকের যুদ্ধে বের হলাম। সেখানে আমরা আরবের কিছু যুদ্ধবন্দী পেলাম। আমরা নারীদের প্রতি আগ্রহী হলাম এবং অবিবাহিত জীবন আমাদের কাছে কঠিন মনে হচ্ছিল। আর আমরা মুক্তিপণকে (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) পছন্দ করতাম। তাই আমরা আযল (সহবাসে বীর্যপাত বাইরে করা) করতে চাইলাম। আমরা বললাম: আমরা কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের মাঝে উপস্থিত থাকা সত্ত্বেও তাঁকে জিজ্ঞেস না করে আযল করব? অতঃপর আমরা তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলাম। তখন তিনি বললেন: “তোমরা আযল না করলে তোমাদের কোনো ক্ষতি নেই। কিয়ামত পর্যন্ত যত মানুষ সৃষ্টি হওয়ার আছে, তা অবশ্যই সৃষ্টি হবে।”
6028 - عن ابن عون قال: كتبت إلى نافع، فكتب إلي أن النبي صلى الله عليه وسلم أغار على بني المصطلق وهم غارون، وأنعامهم تسقى على الماء، فقتل مقاتلتهم، وسبى ذراريهم، وأصاب يومئذ جويرية. حدثني به عبد اللَّه بن عمر، وكان في ذلك الجيش.
متفق عليه: رواه البخاري في العتق (2541) من طريق عبد اللَّه بن المبارك-، ومسلم في الجهاد والسير (1730) من طريق سليم بن أخضر-، كلاهما عن ابن عون قال فذكره. والسياق للبخاري.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঐ সেনাবাহিনীর অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। (তিনি বলেন যে) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু মুসতালিক গোত্রের উপর আক্রমণ করেন, যখন তারা সম্পূর্ণ অসতর্ক ছিল এবং তাদের গৃহপালিত পশুদেরকে পানির কাছে পানি পান করানো হচ্ছিল। অতঃপর তিনি তাদের যুদ্ধ করতে সক্ষম পুরুষদেরকে হত্যা করেন এবং তাদের নারী ও শিশুদেরকে বন্দী করেন। আর সেদিন তিনি জুওয়াইরিয়্যাহকে লাভ করেন।
6029 - عن أبي هريرة أنه لما أقبل يريد الإسلام، ومعه غلامه ضل كل واحد منهما من صاحبه، فأقبل بعد ذلك، وأبو هريرة جالس مع النبي صلى الله عليه وسلم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا أبا هريرة، هذا غلامك قد أتاك". فقال: أما إني أشهدك أنه حر، قال فهو حين يقول:
يا ليلة من طولها وعنائها … على أنها من دارة الكفر نجت
صحيح: رواه البخاري في العتق (2530) عن محمد بن عبد اللَّه بن نمير، عن محمد بن بشر، عن إسماعيل، عن قيس، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি ইসলাম গ্রহণের উদ্দেশ্যে আসছিলেন, তখন তাঁর সাথে তাঁর একজন গোলাম ছিল। তাদের প্রত্যেকেই একে অপরের থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে গেল। এরপর সেই গোলাম এলো। এদিকে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উপবিষ্ট ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আবূ হুরায়রা, এই যে তোমার গোলাম তোমার কাছে এসে পড়েছে।" আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'আমি আপনাকে সাক্ষী রাখছি যে, সে মুক্ত (স্বাধীন)।' তিনি তখনই এই কথাগুলো বলেছিলেন:
"কত দীর্ঘ ও ক্লান্তিকর ছিল সেই রাত!
যদিও তা কুফরের বেষ্টনী (অঞ্চল) থেকে মুক্তি পেয়েছে।"
6030 - عن جرير بن عبد اللَّه البجلي قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أيما عبد أبق من مواليه فقد كفر حتى يرجع إليهم".
وفي لفظ:"أيما عبد أبق فقد برئت منه الذمة".
وفي لفظ آخر:"إذا أبق العبد لم تقبل له صلاة".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (68) من طريق إسماعيل ابن علية، عن منصور بن عبد الرحمن، عن الشعبي، عن جرير فذكره.
واللفظ الثاني عنده (69) من طريق حفص بن غياث، عن داود، عن الشعبي، به، فذكره.
واللفظ الأخير عنده أيضًا (70) من طريق جرير، عن مغيرة، عن الشعبي به، فذكره.
জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ আল-বাজালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো গোলাম তার মনিবদের থেকে পালিয়ে যায়, সে কাফির (অকৃতজ্ঞ) হয়ে গেল, যতক্ষণ না সে তাদের কাছে ফিরে আসে।"
এবং অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যে কোনো গোলাম পালিয়ে যায়, তার থেকে জিম্মাদারী (আল্লাহর পক্ষ থেকে নিরাপত্তা/দায়িত্ব) উঠে যায়।"
অন্য আরেক বর্ণনায় আছে: "যখন কোনো গোলাম পালিয়ে যায়, তখন তার সালাত (নামাজ) কবুল হয় না।"
6031 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ولد الزنا شر الثلاثة". قال أبو هريرة: لأن أمتع بسوط في سبيل اللَّه أحب إلي من أن أعتق ولد زنية.
صحيح: رواه أبو داود (3963) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا جرير، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
ورواه أحمد (8098)، والحاكم (2/ 214، 4/ 100)، والبيهقي (10/ 57، 59) كلهم من طرق عن سهيل بن أبي صالح مثله.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وذكر البيهقي قول سفيان:"يعني إذا عمل بعمل أبويه".
وقد روي مرفوعا، ولا يصح.
وقد اختلف أهل العلم في تأويل هذا الحديث؛ لأن اللَّه تعالى يقول: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} [سورة الأنعام: 164].
فقيل: إنما جاء في رجل بعينه كان مرسوما بالشر.
وقيل: معناه إنه شر الثلاثة أصلا، وعنصرا، ونسبا، ومولدا، وذلك لأنه خلق من ماء الزاني والزانية، وهو ماء خبيث. ذكره الخطابي.
وأما تفسير سفيان فهو ليس خاصا بولد الزنا، بل كل من عمل عمل أبويه -وهما على شر من الكفر والنفاق والزنا والفسق- يلحق بهم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ব্যভিচারের সন্তান হলো তিনজনের মধ্যে নিকৃষ্টতম।” আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর পথে আমাকে চাবুক মারা হলেও, তা আমার নিকট ব্যভিচারের সন্তানকে মুক্ত করে দেওয়ার চেয়ে বেশি প্রিয়।
6032 - عن أبي حبيبة الطائي قال: أوصى إليَّ أخي بطائفة من ماله فلقيت أبا الدرداء، فقلت: إن أخي أوصى إلي بطائفة من ماله، فأين ترى لي وضعه في الفقراء، أو المساكين، أو المجاهدين في سبيل اللَّه؟ فقال: أما أنا فلو كنت لم أعدل بالمجاهدين. سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"مثل الذي يعتق عند الموت كمثل الذي
يهدي إذا شبع".
حسن: رواه أبو داود (3968)، والترمذي (2123)، والنسائي (1/ 238)، وأحمد (21718، 21719)، وصحّحه ابن حبان (3336)، والحاكم (2/ 213)، والبيهقي (10/ 273) كلهم من طرق عن أبي إسحاق، عن أبي حبيبة الطائي فذكره. ومنهم من اختصره بدون القصة.
قال الترمذي:"حسن صحيح". وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وحسنه أيضًا الحافظ ابن حجر في"الفتح" (5/ 374).
قلت: إسناده حسن من أجل أبي حبيية الطائي لوجود أصول صحيحة لحديثه في فضل الصدقة في رجال الصحة.
আবূ হাবীবা আত-ত্বা'ঈ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার ভাই তার সম্পদের একটি অংশ আমার কাছে অসিয়ত করে গিয়েছিলেন। আমি আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং বললাম: আমার ভাই তার সম্পদের একটি অংশ আমার জন্য অসিয়ত করেছেন। আপনি আমার জন্য কোথায় তা রাখা বা ব্যয় করা ভালো মনে করেন—ফকির, নাকি মিসকিন, নাকি আল্লাহ্র রাস্তায় জিহাদকারীদের জন্য? তিনি (আবূ দারদা) বললেন: আমি হলে মুজাহিদীনদের (জিহাদকারী) থেকে মুখ ফিরিয়ে নিতাম না। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি মৃত্যুর সময় দাস মুক্ত করে, তার উদাহরণ হলো এমন ব্যক্তির মতো, যে পেট ভরে খাওয়ার পর (অন্যকে) হাদিয়া দেয়।"
6033 - عن سفينة أبي عبد الرحمن قال: أعتقتني أم سلمة، فاشترطتْ على أن أخدم النبي صلى الله عليه وسلم ما عاش.
حسن: رواه أبو داود (3932)، وابن ماجه (2526)، وأحمد (21927)، والحاكم (2/ 213 - 214)، والبيهقي (10/ 291) كلهم من طرق عن سعيد بن جمهان، عن سفينة فذكره.
قال الحاكم"صحيح الإسناد".
قلت: إسناده حسن من أجل سعيد بن جُمهان -بضم الجيم، وسكون الميم-؛ فإنه حسن الحديث. الشرط على قسمين:
شرط يفي به العبد، سواء اشترط، أو لم يشترط، فقد روي عن سفينة قال: كنت مملوكا لأم سلمة، فقالت: أعتقك، واشترط عليك أن تخدم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ما عشت. فقلت: إن لم تشترطي علي ما فارقت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ما عشت، فأعتقتني.
وشرط مخالف لحرية العبد، مثل أن يشترط أن يدفع كل شهر كذا من المال ما عاش، وأن لا يتزوج، فهذا شرط فاسد، سواء قبل، أو لم يقبل، وهو بمجرد النطق بالحرية يكون حرا، وليس عليه الوفاء بهذا الشرط؛ لأن الأصل في الإنسان الحرية. (انظر شرح السنة 9/ 77).
সফীনা আবূ আবদুর রহমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে আযাদ (মুক্ত) করেন এবং আমার ওপর এই শর্তারোপ করেন যে, আমি যতদিন বেঁচে থাকব, ততদিন যেন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের খিদমত করি।
6034 - عن زاذان أبي عمر قال: أتيت ابن عمر، وقد أعتق مملوكا. قال: فأخذ من الأرض عودا أو شيئًا، فقال: ما فيه من الأجر ما يسوى هذا إلا أني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من لطم مملوكه، أو ضربه فكفارته أن يعتقه".
صحيح: رواه مسلم في النذر (1657) عن أبي كامل فضيل بن حسين الجحدري، حدثنا أبو عوانة، عن فراس، عن ذكوان أبي صالح، عن زاذان فذكره. ورواه شعبة عن فراس، وقال فيه:
"من ضرب غلاما له حدا لم يأته".
আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জাযান আবূ উমার বলেন: আমি ইব্ন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম। তখন তিনি একজন গোলামকে মুক্ত করেছিলেন। তিনি মাটি থেকে একটি ছোট লাঠি বা অন্য কিছু তুলে নিলেন এবং বললেন: এটিকে মুক্ত করার জন্য (আমার) যে সাওয়াব হবে, তা এই লাঠিটির মূল্যের সমানও নয়। তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি তার গোলামকে চপেটাঘাত করে অথবা তাকে প্রহার করে, তার কাফফারা হলো তাকে মুক্ত করে দেওয়া।"
6035 - عن معاوية بن سويد قال: لطمت مولى لنا فهربت، ثم جئت قبيل الظهر، فصليت خلف أبي، فدعاه ودعاني، ثم قال: امتثل منه. فعفا، ثم قال: كنا بني مقرن على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليس لنا إلا خادم واحدة، فلطمها أحدنا، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"أعتقوها". قالوا: ليس لهم خادم غيرها. قال:"فليستخدموها، فإذا استغنوا عنها، فليخلوا سبيلها".
صحيح: رواه مسلم في النذر (1658) من طرق عن عبد اللَّه بن نمير، حدثنا سفيان، عن سلمة ابن كهيل، عن معاوية بن سويد فذكره.
وفي رواية: قال سويد بن مقرن: وقد لطم إنسان جارية له، فقال: أما علمت أن الصورة محرمة؟ فقال: لقد رأيتني وإني لسابع إخوة لي مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وما لنا خادم غير واحدة، فذكر الحديث.
সুওয়াইদ ইবনু মুকাররিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পুত্র মু'আবিয়াহ ইবনু সুওয়াইদ বলেন: আমি আমাদের এক গোলামকে চড় মারলাম, ফলে সে পালিয়ে গেল। এরপর আমি যুহরের কিছু আগে ফিরে এসে আমার পিতার পিছনে সালাত (নামাজ) আদায় করলাম। তিনি গোলামটিকে ও আমাকে ডাকলেন। এরপর তিনি বললেন: তাকে এর বদলা নিতে দাও। সে (গোলামটি) ক্ষমা করে দিল। এরপর তিনি (আমার পিতা) বললেন: আমরা বনু মুকাররিন গোত্রের লোক ছিলাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে। আমাদের মাত্র একজন খাদেম ছিল। আমাদের মধ্যে একজন তাকে চড় মেরেছিল। এই ঘটনা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: "তোমরা তাকে মুক্ত করে দাও।" তারা বলল: তাদের কাছে এই খাদেম ছাড়া আর কেউ নেই। তিনি বললেন: "তাহলে তারা যেন তাকে ব্যবহার করে (তাকে দিয়ে কাজ করায়), এরপর যখন তারা তার থেকে অমুখাপেক্ষী হয়ে যাবে, তখন যেন তার পথ ছেড়ে দেয় (তাকে মুক্তি দেয়)।"
অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে, সুওয়াইদ ইবনু মুকাররিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এক ব্যক্তি তার এক দাসীকে চড় মারল। তখন তিনি (সুওয়াইদ) বললেন: তুমি কি জান না যে, (আল্লাহর দেওয়া) চেহারায় আঘাত করা হারাম? এরপর তিনি বললেন: আমি তখন আমাকে এমন অবস্থায় দেখেছিলাম যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমার সাত ভাইয়ের মধ্যে সপ্তম ছিলাম এবং আমাদের মাত্র একজন খাদেম ছাড়া আর কেউ ছিল না। এরপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
6036 - عن أبي مسعود الأنصاري قال: كنت أضرب غلاما لي، فسمعت من خلفي صوتا:"اعلم أبا مسعود: اللَّه أقدر عليك منك عليه". فالتفت، فإذا هو رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول اللَّه، هو حر لوجه اللَّه، فقال:"أما لو لم تفعل للفحتك النار، أو لمستك النار".
صحيح: رواه مسلم في النذر (1659: 35) عن أبي كريب محمد بن العلاء، حدثنا أبو معاوية، حدثنا الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن أبيه، عن أبي مسعود فذكره.
وفي رواية عبد الواحد بن زياد، عن الأعمش:"اعلم أبا مسعود، إن اللَّه أقدر عليك منك على هذا الغلام".
আবূ মাসউদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার এক গোলামকে মারছিলাম। তখন আমি পেছন থেকে একটি শব্দ শুনলাম: "হে আবূ মাসউদ! জেনে রাখো, তোমার ঐ গোলামের উপর তোমার যেমন ক্ষমতা আছে, আল্লাহ তোমার উপর তার চেয়েও বেশি ক্ষমতা রাখেন।" আমি ফিরে তাকালাম, দেখলাম তিনি হলেন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! সে আল্লাহর ওয়াস্তে মুক্ত। তখন তিনি বললেন: "যদি তুমি তা না করতে, তবে আগুন তোমাকে অবশ্যই জ্বালিয়ে দিত, অথবা আগুন তোমাকে অবশ্যই ছুঁয়ে দেখত।"
6037 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم صارخا، فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مالك؟". قال: سيدي رآني أقبل جارية له فجَبَّ مذاكيري. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"عليَّ بالرجل". فطلب، فلم يقدر عليه. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اذهب، فأنت حر". قال: على من نصرتي يا رسول اللَّه؟ قال: يقول: أرأيت إن استرقني مولاي؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"على كل مؤمن، أو مسلم".
حسن: رواه أبو داود (4519)، وابن ماجه (2680) كلاهما من حديث أبي حمزة الصيرفي قال: حدثني عمرو بن شعيب بإسناده فذكره.
قال أبو داود: الذي عتق اسمه: روح بن دينار. والذي جبه زنباع.
قال أبو داود: هذا زنباع أبو روح كان مولى العبد.
وفي إسناده سوار -بتشديد الواو، وآخره راء- ابن داود المزني، قال فيه أحمد: شيخ بصري، لا بأس به. وذكره ابن حبان في الثقات.
وقد تابعه معمر، وابن جريج عن عمرو بن شعيب بإسناده. رواه عبد الرزاق (17932) عنهما، ورواه أحمد (6710) عن عبد الرزاق قال: أخبرني معمر، أن ابن جريج أخبره عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده.
فكأن معمرا رواه أولا عن ابن جريج، ثم تيسر له السماع من عمرو، فروى على الوجهين، وهما قرينان من شيوخ عبد الرزاق.
وفي حديثهما: أن زنباعا أبا روح وجد غلاما له مع جارية له، فجدع أنفه، وجبه، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"من فعل هذا بك؟". قال: زنباع. فدعاه النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"ما حملك على هذا؟". فقال: كان من أمره كذا وكذا. فقال النبي صلى الله عليه وسلم للعبد:"اذهب فأنت حر". فقال: يا رسول اللَّه فمولى من أنا؟ قال:"مولى اللَّه ورسوله. فأوصى به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم المسلمين.
قال: فلما قبض رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جاء إلى أبي بكر، فقال: وصية رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. قال: نعم، نجري عليك النفقة، وعلى عيالك، فأجراها عليه حتى قبض أبو بكر، فلما استخلف عمر جاءه، فقال: وصية رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. قال: نعم، أين تريد؟ قال: مصر. فكتب عمر إلى صاحب مصر أن يعطيه أرضا يأكلها.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنه حسن الحديث.
وإن زنباعا في البداية هرب خوفا من العقاب، فلما عرف ما عليه إلا عتقه حضر في خدمة النبي صلى الله عليه وسلم.
وقوله:"نجري عليك النفقة وعلى عيالك" فيه إشارة إلى أن له أولادا قبل جبه. وقوله:"مولى اللَّه ورسوله" أي ولاؤه للمسلمين جميعا، وأزال ولاء سيده عنه بسبب الظلم الذي حصل منه.
وفي الباب ما روي عن ابن عباس قال: جاءت جارية إلى عمر بن الخطاب، فقالت. . . . فذكرت الحديث، وفيه قال عمر: لو لم أسمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقاد مملوك من مالكه، ولا والد من ولده" لأقدتها منك، فبرزه، وضربه مائة سوط، وقال للجارية: إذهبي، فأنت حرة لوجه اللَّه، أنت مولاة اللَّه ورسوله.
رواه الحاكم (2/ 216) من حديث عمر بن عيسى القرشي ثم الأسدي، عن ابن جريج، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
فتعقبه الذهبي بقوله:"بل عمر بن عيسى منكر الحديث".
وترجمه في"الميزان" (3/ 216)، وذكر هذا الحديث من منكراته، وقال البخاري: منكر
الحديث. وقال ابن حبان: يروي الموضوعات عن الأثبات.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক চিৎকার করতে করতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার কী হয়েছে?" সে বলল: আমার মনিব আমাকে তার এক দাসীর সাথে চুমু খেতে দেখেছে, ফলে সে আমার পুরুষাঙ্গ কেটে ফেলেছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "লোকটিকে আমার কাছে নিয়ে আসো।" তাকে খোঁজা হলো, কিন্তু পাওয়া গেল না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, তুমি মুক্ত (স্বাধীন)।" সে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার সাহায্য কার উপর (কর্তব্য)? (সে বলল: আপনি কি মনে করেন যদি আমার মনিব আমাকে পুনরায় দাস করে নেয়?) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "প্রত্যেক মুমিন, অথবা মুসলিমের উপর (তোমার সাহায্য করা আবশ্যক)।"
6038 - عن ابن عمر قال قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من أعتق عبدا وله مال، فمال العبد له إلا أن يشترط السيد ماله فيكون له".
صحيح: رواه أبو داود (3962)، من حديث عبد اللَّه بن وهب قال: أخبرني ابن لهيعة، والليث ابن سعد، عن عبيد اللَّه بن أبي جعفر، عن بكير بن الأشج، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه ابن ماجه (2529) من طريق ابن وهب، عن ابن لهيعة، ومن طريق سعيد بن أبي مريم، عن الليث، كلاهما عن عبيد اللَّه بن أبي جعفر به.
وابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أن رواية العبادلة -منهم عبد اللَّه بن وهب- عنه أعدل من غيرهم، كما أنه توبع.
وعبيد اللَّه بن أبي جعفر المصري قال أبو حاتم، والنسائي، وغيرهما: ثقة. وقال ابن يونس: كان عالما زاهدا عابدا. واختلف فيه قول الإمام أحمد، فروي عنه أنه قال: ليس بقوي. وروي عبد اللَّه بن أحمد عن أبيه قال: ليس به بأس، كان يتفقه، والقول الثاني موافق لقول الجمهور، وقد احتج به الشيخان.
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি এমন কোনো দাসকে মুক্ত করে যার ধন-সম্পদ আছে, তবে সেই দাসের সম্পদ তারই থাকবে, তবে যদি মনিব তার সেই সম্পদের উপর অধিকার শর্ত করে নেয়, তবে তা মনিবের হবে।”
6039 - عن * *
৬039 - অন **
6040 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الحمد للَّه نحمده ونستعينه ونعوذ باللَّه من شرور أنفسنا، ومن سيئات أعمالنا، من يهده اللَّه فلا مضل له، ومن يضلل فلا هادي له، وأشهد أن لا إله إلا اللَّه وحده لا شريك له، وأن محمدا عبدُه ورسوله، أما بعد:".
صحيح: رواه مسلم في الجمعة (868) من طرق عن عبد الأعلى (وهو أبو همام)، حدثنا داود (ابن أبي هند) عن عمرو بن سعيد، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره، وفيه قصة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য। আমরা তাঁর প্রশংসা করি এবং তাঁর কাছে সাহায্য চাই। আর আমরা আমাদের নফসের মন্দ কাজ থেকে এবং আমাদের খারাপ আমলসমূহের অশুভ পরিণতি থেকে আল্লাহর নিকট আশ্রয় চাই। আল্লাহ যাকে হেদায়েত দান করেন, তাকে কেউ পথভ্রষ্ট করতে পারে না। আর যাকে পথভ্রষ্ট করেন, তাকে কেউ হেদায়েত দিতে পারে না। আর আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া অন্য কোনো উপাস্য নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো অংশীদার নেই। এবং মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল। অতঃপর...”