হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6041)


6041 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: أوتي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جوامع الخير، وخواتمه، أو قال فواتح الخير، فعلمنا خطبة الصلاة وخطبة الحاجة، خطبة الصلاة: التحيات للَّه والصلوات والطيبات، السلام عليك أيها النبي ورحمة اللَّه وبركاته، السلام علينا وعلى عباد اللَّه الصالحين، أشهد أن لا إله إلا اللَّه وأشهد أن محمدًا عبده ورسوله، وخطبة الحاجة: أن الحمد للَّه نحمده ونستعينه ونستغفره ونعوذ باللَّه من شرور أنفسنا ومن سيئات أعمالنا، من يهده اللَّه فلا مضل له، ومن يضلل فلا هادي له، وأشهد أن لا إله إلا اللَّه وحده لا شريك له، وأشهد أن محمدا عبده ورسوله، ثم تصل خطبتك بثلاث آيات من كتاب اللَّه {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلَا تَمُوتُنَّ إلا وَأَنْتُمْ مُسْلِمُونَ} [آل عمران: 102] {يَاأَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ مِنْهُمَا رِجَالًا كَثِيرًا وَنِسَاءً وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي تَسَاءَلُونَ بِهِ وَالْأَرْحَامَ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا} [النساء: 1] {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا (70) يُصْلِحْ لَكُمْ أَعْمَالَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظِيمًا} [الأحزاب: 70 - 71].

صحيح: رواه أبو داود (2118)، والترمذي (1105) والنسائي (3277) وابن ماجه (1892) كلهم من طرق عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه بن مسعود فذكره. وإسناده صحيح.

وصحّحه ابن خزيمة (270) وابن حبان (1952) ومنهم من اقتصر على التشهد في الصلاة فقط.

قال الترمذي:"حديث عبد اللَّه حديث حسن، رواه الأعمش عن أبي إسحاق، عن أبي
الأحوص، عن عبد اللَّه، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه شعبة، عن أبي إسحاق، عن أبي عبيدة، عن عبد اللَّه، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وكلا الحديثين صحيح، لأن إسرائيل جمعهما فقال: عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص وأبي عبيدة، عن عبد اللَّه بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم وقد قال أهل العلم: إن النكاح جائز بغير خطبة، وهو قول سفيان الثوري وغيره من أهل العلم". انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উত্তম বিষয়ের মূল অংশ এবং তার সমাপ্তি প্রদান করা হয়েছে, অথবা তিনি (বর্ণনাকারী) বলেছেন: উত্তম বিষয়ের সূচনা প্রদান করা হয়েছে। তিনি আমাদেরকে সালাতের খুতবা (তাশাহহুদ) এবং বিবাহের খুতবা (খুতবাতুল হাজাহ) শিক্ষা দিয়েছেন।

সালাতের খুতবা হলো:
اَلتَّحِيَّاتُ لِلَّهِ وَالصَّلَوَاتُ وَالطَّيِّبَاتُ، السَّلاَمُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ، السَّلاَمُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللَّهِ الصَّالِحِينَ، أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ.
(সমস্ত সম্মানসূচক অভিবাদন, সমস্ত সালাত এবং সমস্ত পবিত্রতা আল্লাহর জন্য। হে নবী! আপনার উপর শান্তি বর্ষিত হোক এবং আল্লাহর রহমত ও বরকত বর্ষিত হোক। আমাদের উপর এবং আল্লাহর নেক বান্দাদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল।)

আর খুতবাতুল হাজাহ হলো:
إِنَّ الْحَمْدَ لِلَّهِ نَحْمَدُهُ وَنَسْتَعِينُهُ وَنَسْتَغْفِرُهُ، وَنَعُوذُ بِاللَّهِ مِنْ شُرُورِ أَنْفُسِنَا وَمِنْ سَيِّئَاتِ أَعْمَالِنَا، مَنْ يَهْدِهِ اللَّهُ فَلاَ مُضِلَّ لَهُ، وَمَنْ يُضْلِلْ فَلاَ هَادِيَ لَهُ، وَأَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ.
(সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য। আমরা তাঁরই প্রশংসা করি, তাঁরই সাহায্য চাই, তাঁরই কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করি এবং আমাদের প্রবৃত্তির অনিষ্ট ও আমাদের খারাপ আমলসমূহ থেকে আল্লাহর নিকট আশ্রয় চাই। আল্লাহ যাকে পথ দেখান, তাকে কেউ পথভ্রষ্ট করতে পারে না; আর তিনি যাকে পথভ্রষ্ট করেন, তাকে কেউ পথ দেখাতে পারে না। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। আমি আরও সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল।)

অতঃপর তোমার খুতবাকে আল্লাহর কিতাবের তিনটি আয়াতের সাথে যুক্ত করবে:

১. {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلَا تَمُوتُنَّ إلا وَأَنْتُمْ مُسْلِمُونَ} [آل عمران: 102]
(হে মুমিনগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো যেমন ভয় করা উচিত এবং মুসলিম না হয়ে মৃত্যুবরণ করো না।) [সূরা আলে ইমরান: ১০২]

২. {يَاأَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ مِنْهُمَا رِجَالًا كَثِيرًا وَنِسَاءً وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي تَسَاءَلُونَ بِهِ وَالْأَرْحَامَ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا} [النساء: 1]
(হে লোক সকল! তোমরা তোমাদের প্রতিপালককে ভয় করো, যিনি তোমাদেরকে এক ব্যক্তি থেকে সৃষ্টি করেছেন এবং তার থেকে তার জুড়ি সৃষ্টি করেছেন। আর তাদের দু'জন থেকে ছড়িয়ে দিয়েছেন বহু পুরুষ ও নারী। আর আল্লাহকে ভয় করো, যাঁর মাধ্যমে তোমরা একে অন্যের কাছে কিছু চাও এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক সম্পর্কেও সচেতন হও। নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের উপর পর্যবেক্ষক।) [সূরা আন-নিসা: ১]

৩. {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا (70) يُصْلِحْ لَكُمْ أَعْمَالَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَمَنْ يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظِيمًا} [الأحزاب: 70 - 71].
(হে মুমিনগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং সঠিক কথা বলো। তিনি তোমাদের আমলসমূহকে সংশোধন করে দেবেন এবং তোমাদের পাপসমূহ ক্ষমা করে দেবেন। আর যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য করে, সে তো মহাসাফল্য লাভ করলো।) [সূরা আল-আহযাব: ৭০-৭১]।









আল-জামি` আল-কামিল (6042)


6042 - عن وعن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"كل خُطبة ليس فيها تشهد فهي كاليد الجذماء".

حسن: رواه أبو داود (4841) والترمذي (1118) وأحمد (8018) وابن حبان في صحيحه (2796) كلهم من طرق عن عاصم بن كليب، قال: حدثني أبي، قال: سمعت أبا هريرة فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب".

قلت: إسناده حسن من أجل عاصم وأبيه فهما حسنا الحديث.

والجذماء: المقطوعة أي اليد التي لا يستفاد منها.

وأما ما روي عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كل أمر ذي بال، لا يبدأ فيه بالحمد فهو أقطع" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (4840) وابن ماجه (1894) والدارقطني (1/ 229) كلهم من حديث الأوزاعي، عن قرة، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل قرة وهو ابن عبد الرحمن المعافري المصري مختلف فيه، والجمهور على تضعيفه.

قال الدارقطني:"تفرد به قرة عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة".

وأرسله غيره عن الزهري، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وقرة ليس بقوي في الحديث. ورواه صدقة، عن محمد بن سعيد، عن الزهري، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولا يصح الحديث. وصدقة ومحمد بن سعيد ضعيفان. والمرسل هو الصواب. انتهى




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “প্রত্যেক সেই খুতবা, যাতে শাহাদাত (তাশাহহুদ) পাঠ করা হয় না, তা কর্তিত হাতের মতো।”









আল-জামি` আল-কামিল (6043)


6043 - عن أنس بن مالك قال: جاء ثلاثة رهط إلى بيوت أزواج النبي صلى الله عليه وسلم يسألون عن عبادة النبي صلى الله عليه وسلم، فلما أخبروا كأنهم تقالوها، فقالوا: وأين نحن من النبي صلى الله عليه وسلم؟ قد غفر اللَّه له ما تقدّم من ذنبه وما تأخّر. قال أحدهم: أما أنا فأصلي الليل أبدا. وقال آخر: وأنا أصوم الدهر ولا أفطر، وقال آخر: أنا أعتزل النساء فلا أتزوج أبدًا. فجاء
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال:"أنتم الذين قلتم كذا وكذا؟ أما واللَّه إني لأخشاكم للَّه وأتقاكم له، لكني أصوم وأفطر، وأصلي وأرقد، وأتزوج النساء، فمن رغب عن سنتي فليس مني".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5063) عن طريق حميد بن أبي حميد الطويل أنه سمع أنس بن مالك يقول (فذكره). واللفظ له.

ورواه مسلم في النكاح (1401) من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، به، بمعناه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের বাড়িতে এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইবাদত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। যখন তাদের জানানো হলো, তখন তারা যেন তা কম মনে করল। তারা বলল: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমাদের তুলনা কোথায়? আল্লাহ তো তাঁর পূর্বাপর সকল গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন। তাদের মধ্যে একজন বলল: আমি তো চিরকাল রাতভর সালাত আদায় করব। আরেকজন বলল: আমি সারা বছর রোযা রাখব এবং কখনও ইফতার (রোযা ভঙ্গ) করব না। আরেকজন বলল: আমি মহিলাদের থেকে দূরে থাকব এবং কখনও বিয়ে করব না। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং বললেন: "তোমরা কি এমন এমন কথা বলেছ? আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের মধ্যে আল্লাহকে সবচাইতে বেশি ভয় করি এবং আল্লাহকে সবচাইতে বেশি তাকওয়া (ভীতি) করি। কিন্তু আমি রোযা রাখি এবং ইফতার করি, সালাত আদায় করি এবং ঘুমাই, আর নারীদেরকে বিয়েও করি। অতএব, যে আমার সুন্নাত থেকে বিমুখ হবে, সে আমার উম্মতের অন্তর্ভুক্ত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6044)


6044 - عن علقمة قال: كنتُ أمشي مع عبد اللَّه بمنى، فلقيه عثمان، فقام معه يحدّثُه. فقال له عثمان: يا أبا عبد الرحمن، ألا نزوِّجك جاريةً شابةً لعلّها تذكِّرك بعضّ ما مضى من زمانك. قال: فقال عبد اللَّه: لئن قلتَ ذاك، لقد قال لنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا معشر الشباب، من استطاع منكمُ الباءة فليتزوج، فإنه أغضُّ للبصر، وأحصن للفرج، ومن لم يستطع فعليه بالصوم، فإنه له وِجاءٌ".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5065) من طريق حفص بن غياث، ومسلم في النكاح (1: 1400) من طريق أبي معاوية كلاهما عن الأعمش، حدثني إبراهيم (وهو النخعي)، عن علقمة، فذكره. واللفظ لمسلم.

وفي رواية له من طريق جرير، عن الأعمش، عن عمارة بن عمير، عن عبد الرحمن بن يزيد، قال: دخلت أنا وعمّي علقمة والأسود على عبد اللَّه بن مسعود قال: وأنا شابّ يومئذ، فذكر حديثًا رُئيتُ أنه حدث به من أجلي. قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بمثل حديث أبي معاوية. وزاد: قال: فلم ألبث حتى تزوّجتُ.

والباءة معناها الجماع، وأصلها المكان، والذي يأوي إليه الإنسان، وسمي النكاح بها، لأن من تزوج امرأة بوأها منزلًا."شرح السنة" (9/ 4).




আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। 'আলক্বামা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি মীনায় আবদুল্লাহর (ইবনু মাসঊদ) সাথে হাঁটছিলাম। এমন সময় উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তাঁর দেখা হলো। অতঃপর তিনি তাঁর সাথে দাঁড়িয়ে কথা বলতে লাগলেন। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে আবূ আব্দুর রহমান! আমরা কি আপনাকে একজন যুবতী দাসী/কুমারীর সাথে বিবাহ দেব না? সম্ভবত সে আপনার বিগত দিনের যৌবনের কিছু স্মৃতি স্মরণ করিয়ে দেবে। তিনি (আবদুল্লাহ) বললেন: আপনি যদি এই বিষয়ে বলেন, তবে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের বলেছেন: "হে যুবসমাজ! তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি বিবাহের সামর্থ্য রাখে, সে যেন বিবাহ করে নেয়। কেননা তা চক্ষুকে অধিক অবনত রাখে এবং লজ্জাস্থানকে অধিক হেফাযত করে। আর যে ব্যক্তি সামর্থ্য রাখে না, সে যেন রোযা রাখে; কারণ রোযা তার জন্য ঢালস্বরূপ।"









আল-জামি` আল-কামিল (6045)


6045 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: كنا نغزو مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وليس لنا شيء، فقلنا: ألا نستخصي؟ فنهانا عن ذلك، ثم رخص لنا أن ننكح المرأة بالثوب، ثم قرأ علينا {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ} [المائدة: 87].

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5075)، ومسلم في النكاح (1404) كلاهما من طريق جرير، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس (هو ابن أبي حازم) قال سمعت عبد اللَّه يقول (فذكره). واللفظ للبخاري.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জিহাদে যেতাম এবং (আমাদের কাছে স্ত্রীদের জন্য) কোনো সম্পদ ছিল না। তখন আমরা বললাম: আমরা কি পুরুষত্বহীন (খাসী) হয়ে যাব না? তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে তা থেকে নিষেধ করলেন। এরপর তিনি কাপড়ের বিনিময়ে নারীকে বিবাহ করার অনুমতি দিলেন। অতঃপর তিনি আমাদের সামনে এই আয়াত পাঠ করলেন: "হে মুমিনগণ, তোমরা আল্লাহ্‌ তোমাদের জন্য যে পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, তা হারাম করো না।" (সূরা আল-মায়িদাহ: ৮৭)।









আল-জামি` আল-কামিল (6046)


6046 - عن سعد بن أبي وقاص قال: ردّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على عثمان بن مظعون التّبتُّل، ولو أذن له لاختصينا.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5073)، ومسلم في النكاح (7: 1402) كلاهما من طريق إبراهيم بن سعد، أخبرنا ابن شهاب، سمع سعيد بن المسيب يقول، سمعت سعد بن أبي وقاص يقول (فذكره).




সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসমান ইবনু মাযঊনের তাবাত্তুল (স্ত্রী-সংসর্গ ত্যাগ ও বৈরাগ্য) প্রত্যাখ্যান করেছিলেন। যদি তিনি তাঁকে অনুমতি দিতেন, তবে আমরা নিজেদেরকে খোজা করে দিতাম (বা খাসি করে দিতাম)।









আল-জামি` আল-কামিল (6047)


6047 - عن سعد بن أبي وقاص قال: لما كان من أمر عثمان بن مظعون الذي كان من ترك النساء بعث إليه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"يا عثمان، إني لم أومر بالرهبانية، أرغبت عن سنتي؟" قال: لا، يا رسول اللَّه. قال:"إن من سنتي أن أصلي وأنام، وأصوم وأطعم، وأنكح وأطلق، فمن رغب عن سنتي فليس مني، يا عثمان، إن لأهلك عليك حقا، ولنفسك عليك حقا".

قال سعد: فواللَّه لقد كان أجمع رجال من المسلمين على أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إن هو أقر عثمان على ما هو عليه أن نختصي فنتبتل.

حسن: رواه الدارمي (2215) عن محمد بن يزيد الحزامي، حدثنا يونس بن بكير، حدثني ابن إسحاق، حدثني الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن سعد بن أبي وقاص، فذكره. وإسناده حسن من أجل تصريح ابن إسحاق.

قوله:"التّبتُّل" أصله القطع. والمراد الانقطاع عن النساء وترك النكاح انقطاعًا إلى عبادة اللَّه.

قوله:"لاختصيا" الخصاء هو نزع البيضتين من الخصيتين بشق جلدها.




সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উসমান ইবনু মায‘ঊনের নারীদের (বিবাহ/সংসার) ত্যাগ করার বিষয়টি ঘটলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: "হে উসমান, আমাকে তো বৈরাগ্যবাদের (সন্ন্যাস) আদেশ দেওয়া হয়নি। তুমি কি আমার সুন্নাহ থেকে বিমুখ হয়েছ?" তিনি বললেন: না, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় আমার সুন্নাহ হলো আমি সালাত আদায় করি এবং ঘুমাই, রোযা রাখি এবং আহার গ্রহণ করি, বিবাহ করি এবং (প্রয়োজনে) তালাকও দেই। অতএব, যে আমার সুন্নাহ থেকে বিমুখ হবে, সে আমার উম্মতের অন্তর্ভুক্ত নয়। হে উসমান, তোমার স্ত্রীর তোমার উপর হক রয়েছে এবং তোমার নিজের উপরও তোমার হক রয়েছে।" সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম, মুসলিমদের মধ্যে বেশ কিছু লোক সম্মিলিতভাবে এই সিদ্ধান্ত নিয়েছিল যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যদি উসমানকে তার অবস্থায় থাকতে দেন, তবে আমরা নিজেদেরকে খাসি করে নেব এবং বৈরাগ্য অবলম্বন করব।









আল-জামি` আল-কামিল (6048)


6048 - عن أبي هريرة قال: قلت: يا رسول اللَّه، إني رجل شابٌّ، وأنا أخاف على نفسي العَنَت ولا أجد ما أتزوّج به النساء، فسكت عني، ثم قلت مثل ذلك، فسكت عني، ثم قلت له مثل ذلك، فسكت عني، ثم قلتُ مثل ذلك. فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"يا أبا هريرة، جفّ القلم بما أنت لاقٍ، فاختص على ذلك أو ذر".

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5076) فقال: وقال أصبغ: أخبرني ابنُ وهب، عن يونس ابن يزيد، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال (فذكره).

وأصبغ هو ابن الفَرَج القرشي الأمويّ أبو عبد اللَّه المصري الفقيه أحد شيوخ البخاري. وقال البخاري:"قال أصبغ" محمول على الاتصال على رأي ابن الصلاح وغيره، وهو الذي نختاره.

قال الحافظ في"الفتح" (9/ 119): قوله"وقال أصبغ" كذا في جميع الروايات التي وقفت عليها، وكلام أبي نعيم في"المستخرج" يشعر بأنه قال فيه حدثنا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমি একজন যুবক। আমি আমার নিজের ওপর গুনাহের ভয় করি, অথচ নারীদের বিবাহ করার মতো সম্পদ আমি পাই না।’ তখন তিনি আমার থেকে নীরব থাকলেন। এরপর আমি আবার একই কথা বললাম, তিনি নীরব থাকলেন। এরপর আমি তাঁকে আবার একই কথা বললাম, তিনি নীরব থাকলেন। এরপর আমি আবার একই কথা বললাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “হে আবূ হুরায়রা! তোমার জীবনে যা ঘটবে, সে বিষয়ে কলম শুকিয়ে গেছে (ফয়সালা হয়ে গেছে)। সুতরাং তুমি এই বিষয়ে (খাসি হয়ে) নিবৃত্ত থাকো অথবা (ধৈর্য ধরে) ছেড়ে দাও।”









আল-জামি` আল-কামিল (6049)


6049 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم خرج على فتية من شباب قريش، فقال:"يا معشر الشباب من استطاع منكم الطول فلينكح، أو فليتزوج، وإلا فعليه بالصوم، فإنه له وجاء".

صحيح: رواه البزار -كشف الأستار (1398) - عن محمد بن الليث، ثنا علي بن عبد الحميد،
ثنا سلمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس فذكره.

قال البزار:"لا نعلم رواه عن ثابت إلا سليمان".

قلت: ولا يضر تفرد سليمان بن المغيرة وهو القيسي مولاهم، فإنه ثقة.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরাইশের একদল যুবকের কাছ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি বললেন: "হে যুবকের দল! তোমাদের মধ্যে যে সামর্থ্য রাখে, সে যেন বিবাহ করে, আর যে সামর্থ্য রাখে না, সে যেন রোজা পালন করে, কেননা এটি তার জন্য সুরক্ষা (যৌন উত্তেজনা দমনকারী)।"









আল-জামি` আল-কামিল (6050)


6050 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يأمر بالباءة، وينهى عن التبتل نهيا شديدًا، ويقول:"تزوجوا الودود الولود، إني مكاثر الأنبياء يوم القيامة".

حسن: رواه أحمد (12613) عن حسين وعفان، والبزار -كشف الأستار (1400) - من طريق محمد بن معاوية، وابن حبان في صحيحه (4028) من طريق قتيبة بن سعيد، والبيهقي (7/ 81 - 82) من طريق إبراهيم بن أبي العباس، كلهم عن خلف بن خليفة، قال: حدثني حفص بن عمر، عن أنس بن مالك فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في خلف بن خليفة غير أنه حسن الحديث فقد قال فيه ابن معين والنسائي: ليس به بأس. وقال ابن معين أيضًا وأبو حاتم: صدوق، وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به، ولا أبرئه من أن يخطئ في بعض الأحايين في بعض رواياته.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (13569) عن عفان، حدثنا خلف بن خليفة -قال عبد اللَّه: قال أبي: وقد رأيت خلف بن خليفة وقد قال له إنسان: يا أبا أحمد، حدثك محارب بن دثار؟ قال أبي: فلم أفهم كلامه، كان قد كبِرَ فتركته، -حدثنا حفص، عن أنس بن مالك قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يأمر بالباءة، وينهى عن التبتل فذكر الحديث.

ويظهر من سباق الإمام أحمد أنه لم يرو عنه من أجل اختلاطه، ولكن لما وجد الحديث عن اثنين من شيوخه وهما حسين وعفان فروى عنه بواسطتهما لعله لقدم سماعهما منه، إلا أنه لم يظهر لي من روى عنه قبل الاختلاط، ومن روى عنه بعد الاختلاط من هؤلاء الذين ذكرتهم.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাআহ-এর (বিবাহের) নির্দেশ দিতেন এবং কঠোরভাবে তাবা তুল (বৈরাগ্য বা বিবাহ থেকে বিরত থাকা) থেকে নিষেধ করতেন। তিনি বলতেন: "তোমরা প্রেমময়ী ও অধিক সন্তান জন্মদানকারী (নারীকে) বিবাহ করো, কারণ কিয়ামতের দিন আমি (আমার উম্মতের সংখ্যা দিয়ে) অন্যান্য নবীদের উপর গর্ব করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (6051)


6051 - عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا شباب قريش، لا تزنوا، احفظوا فروجكم، ألا من حفظ فرجه فله الجنّة".

حسن: رواه البزار - كشف الأستار (1401)، والطبراني في الكبير (12/ 165) والأوسط، من حديث مسلم بن إبراهيم، ثنا شداد بن سعيد، ثنا سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن ابن عباس فذكره واللفظ للبزار.

وإسناده حسن من أجل شداد بن سعيد فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، وهو من رجال مسلم، وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 252):"ورجاله رجال الصحيح".

وسعيد الجُريري هو ابن إياس، أبو مسعود البصري، أطلق يحيى بن معين والنسائي القول بتوثيقه، ولكن قال أبو حاتم:"تغير حفظه قبل موته. فمن كتب عنه قديمًا فهو صالح وهو حسن الحديث".

وقال ابن حبان:"كان قد اختلط قبل موته بثلاث سنين، قال: وقد رآه يحيى القطان وهو
مختلط، ولم يكن اختلاطه فاحشًا".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে কুরাইশের যুবকেরা! তোমরা যেনা (ব্যভিচার) করো না। তোমরা তোমাদের লজ্জাস্থানকে সংরক্ষণ করো। জেনে রাখো, যে ব্যক্তি তার লজ্জাস্থানকে সংরক্ষণ করে, তার জন্য রয়েছে জান্নাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (6052)


6052 - عن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن التبتل.

صحيح: رواه الترمذي (1082) وابن ماجه (1849) والنسائي (3214) وأحمد (20192) وابن الجارود (673) كلهم من طريق معاذ بن هشام، عن أبيه، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة، فذكره.

قال الترمذي وابن ماجه: وزاد زيد بن أخْزم (عن معاذ بن هشام) في حديثه: وقرأ قتادة: {وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِنْ قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ أَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةً} [سورة الرعد: 38].

وإسناده صحيح. والحسن سمع سمرة مطلقا كما أوضحت ذلك في المواضيع الكثيرة.

وروي هذا الحديث عن عائشة أيضًا كما في الآتي.




সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবাত্তুল (বৈরাগ্য বা বৈবাহিক জীবন ত্যাগ করা) অবলম্বন করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6053)


6053 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن التبتل.

صحيح: رواه النسائي (3214) وأحمد (24943) كلاهما من حديث خالد بن الحارث، قال: حدثنا أشعث، عن الحسن، عن سعد بن هشام، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.

وأشعث هو ابن عبد الملك الحُمراني ثقة من رجال الصحيح.

قال الترمذي عقب حديث سمرة:"حديث سمرة حديث حسن غريب، وروى أشعث بن عبد الملك هذا الحديث عن الحسن، عن سعد بن هشام، عن عائشة. ويقال: كلا الحديثين صحيح.

وقال النسائي:"قتادة أثبت وأحفظ من أشعث، وحديث أشعث أشبه بالصواب".

وفي"علل ابن أبي حاتم" (1/ 402) أنه سأل أباه عن حديث رواه أشعث بن عبد الملك، عن الحسن، عن سعد بن هشام، عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن التبتل، ورواه معاذ بن هشام، عن أبيه عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن التبتل. قلت: أيهما أصح؟ قال أبي:"قتادة أحفظ من أشعث، وأحسب الحديثين صحيحين، لأن لسعد بن هشام قصة في سؤاله عائشة عن ترك النكاح يعني التبتل".

فهما حديثان، والحسن له شيخان، سمرة بن جندب، وسعد بن هشام، ولا يُعِلُّ أحدهما الآخر.

قال الترمذي في"العلل الكبير": سألت محمدًا (البخاري) عن الحديث فقال:"حديث الحسن عن سمرة محفوظ، وحديث الحسن عن سعد بن هشام، عن عائشة حسن".

قلت: سعد بن هشام الأنصاري المدني ثقة من رجال الجماعة استشهد بأرض الهند.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবাত্তুল (বৈরাগ্য অবলম্বন) করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6054)


6054 - عن عائشة قالت: دخلت امرأة عثمان بن مظعون واسمها خولة بنت حكيم على عائشة وهي باذّة الهيئة، فسألتها ما شأنك؟ فقالت: زوجي يقوم الليل، ويصوم النهار. فدخل النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له عائشة. فلقي النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"يا عثمان، إن
الرهبانية لم تكتب علينا، أما لك فيّ أسوة؟ فواللَّه إن أخشاكم للَّه، وأحفظكم لحدوده لأنا".

صحيح: رواه عبد الرزاق (10375) عن معمر، عن الزهري، عن عروة وعمرة، عن عائشة قالت: فذكرته.

ومن هذا الطريق رواه البزار -كشف الأستار (1458) -، وابن حبان (9) ولكن عن عروة وحده.

ورواه الإمام أحمد (25893) عن عبد الرزاق، حدثنا معمر، عن الزهري، عن عروة، قال: دخلت امرأة عثمان فذكره مرسلًا.

وإليه أشار الهيثمي في"المجمع" (4/ 301) بقوله:"وأسانيد أحمد رجالها ثقات إلا أن طريق إن أخشاكم أسندها أحمد، ووصلها البزار برجال ثقات".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসমান ইবনে মাযউন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী, যার নাম ছিল খাওলা বিনতে হাকিম, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলেন এমন অবস্থায় যে, তিনি ছিলেন মলিন বেশভূষার। (আয়িশা) তাকে জিজ্ঞেস করলেন, তোমার কী হয়েছে? তিনি বললেন: আমার স্বামী রাতে নামায পড়েন এবং দিনে রোযা রাখেন। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে প্রবেশ করলেন এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বিষয়টি বললেন। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসমানের সাথে দেখা করলেন এবং বললেন: "হে উসমান! আমাদের উপর বৈরাগ্যবাদ (সন্ন্যাস) আবশ্যক করা হয়নি। আমার মধ্যে কি তোমাদের জন্য কোনো আদর্শ নেই? আল্লাহর কসম! তোমাদের মধ্যে আমিই আল্লাহকে সবচেয়ে বেশি ভয় করি এবং তাঁর সীমাসমূহকে সবচেয়ে বেশি হিফাজত (রক্ষা) করে চলি।"









আল-জামি` আল-কামিল (6055)


6055 - عن عائشة قالت: كانت امرأة عثمان بن مظعون تختضب وتطَيَّب، فتركته، فدخلت عليّ، فقلت لها: أمُشهد أم مُغيب؟ فقالت: مُشهد كمغيب. قلت لها: مالك؟ قالت: عثمان لا يريد الدنيا، ولا يريد النساء. قالت عائشة: فدخل عليّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأخبرتُه بذلك. فلقي عثمان فقال:"يا عثمان، أتؤمن بما نؤمن به؟" قال: نعم، يا رسول اللَّه، قال:"فاصنعْ كما نصنعُ".

حسن: رواه الإمام أحمد (24754) عن مؤمل، حدثنا حماد، حدثنا إسحاق بن سويد، عن أبي فاختة، عن عائشة فذكرت.

ومؤمل هذا، هو ابن إسماعيل سيء الحفظ إلا أنه توبع. فرواه أبو نعيم في"الحلية" (6/ 257) من وجه آخر عن هشام بن عبد الملك، ثنا حماد بن سلمة، عن إسحاق بن سويد، حدثني أبو فاختة، عن عائشة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال لعثمان بن مظعون: فذكر نحوه.

وإسناده حسن من أجل أبي فاختة وهو سعيد بن علاقة الكوفي فإنه حسن الحديث وإن كان ابن حجر قال فيه"ثقة" بناء على توثيق الدارقطني.

واللفظ الذي سقتُه ذكره أحمد (24753) وأحال إليه إلا أن فيه"فأسوةٌ مالَكَ بنا".

وللحديث طرق أخرى ذكرتُها في صلاة الليل.

وأما ما روي عن أبي ذر قال: دخل على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رجل يقال له: عكاف بن بشر التميمي، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"يا عكاف، هل لك من زوجة؟" قال: لا. قال:"ولا جارية؟" قال: ولا جارية. قال:"وأنت موسر بخير؟" قال: وأنا موسر بخير. قال:"أنت إذًا من إخوان الشياطين، لو كنت في النصارى كنت من رهبانهم، إنّ سنَّتنا النكاح، شراركم عزّابكم، وأراذل موتاكم عزّابكم، أبِالشيطان تمرّسون! ما للشيطان من سلاح أبلغ في الصالحين من النساء إلا المتزوجون، أولئك
المطهرون المبرَّؤون من الخَنا، ويحك يا عكّاف، إنهن صواحب أيوب وداود ويوسف وكُرسُف".

فقال له بشر بن عطيّة: ومن كُرسُف يا رسول اللَّه؟ قال:"رجل كان يعبد اللَّه بساحل من سواحل البحر ثلاث مئة عام، يصوم النّهار، ويقوم الليل، ثم إنه كفر باللَّه العظيم في سبب امرأة عشقها، وترك ما كان عليه من عبادة اللَّه. ثم استدرك اللَّه ببعض ما كان منه فتاب عليه، ويحك يا عكّاف تزوج، وإلا فأنت من المذبذبين"، قال: زوّجني يا رسول اللَّه. قال:"قد زوّجتك كَريمة بنت كلثوم الحميري" فهو ضعيف.

رواه عبد الرزاق (10387) حدثنا محمد بن راشد، عن مكحول، عن رجل، عن أبي ذر فذكره. ومن هذا الطريق رواه الإمام أحمد (21450). وفيه رجل لم يُسم.

وله إسناد آخر وهو ما رواه العقلي في الضعفاء (3/ 356) وأبو يعلى (6856) والطبراني في الكبير (18/ 85 رقم 158) وابن حبان في المجروحين (1022) كلهم من طرق عن معاوية بن يحيى، عن سليمان بن موسى، عن مكحول، عن غضيف بن الحارث، عن عطية بن بُسر المازني قال: جاء عكاف بن وداعة فذكر الحديث. وعطية بن بُسر لا يتابع عليه كما قال العقيلي.

وقال ابن حبان: معاوية بن يحيى وهو الصرفي منكر الحديث جدًا كان يشتري الكتب ويحدث بها. . .

وقال ابن حجر في"الإصابة" (2/ 496) في ترجمة عكاف بن وداعة بعد أن ساق للحديث طرقا أخرى:"الطرق المذكورة لا تخلو من ضعف واضطراب".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান ইবন মাযঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী (পূর্বে) মেহেদি লাগাতেন এবং সুগন্ধি ব্যবহার করতেন, কিন্তু তিনি তা ছেড়ে দিয়েছিলেন। এরপর তিনি আমার কাছে আসলেন। তখন আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: তোমার স্বামী উপস্থিত নাকি অনুপস্থিত? তিনি বললেন: উপস্থিত থেকেও অনুপস্থিতের মতোই। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: তোমার কী হয়েছে? তিনি বললেন: উসমান দুনিয়া চান না, আর মহিলাদেরও চান না। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার নিকট প্রবেশ করলেন। আমি তাঁকে এ বিষয়ে অবগত করলাম। এরপর তিনি উসমানের সাথে দেখা করে জিজ্ঞেস করলেন: "হে উসমান, তুমি কি তাতে বিশ্বাস রাখো যাতে আমরা বিশ্বাস রাখি?" তিনি বললেন: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে আমরা যা করি, তুমিও তাই করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6056)


6056 - عن عقبة بن عامر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أحقُّ الشروط أن توفوا به ما استحللتم به الفروج".

متفق عليه: رواه البخاري في الشروط (2721) ومسلم في النكاح (1418) كلاهما من حديث يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر فذكره.

قال أهل العلم: من هذه الشروط: من تزوج امرأة على أن لا يخرجها من دارها، أو لا يخرج بها إلى البلد، أو ما أشبه ذلك فإن عليه الوفاء بذلك.

وبه قال الإمام أحمد وإسحاق والأوزاعي، وهو قول عمر بن الخطاب.

وقال غيرهم: الشرط هنا خاص بالمهر والحقوق الواجبة التي هي مقتضى العقد دون غيرها مما لا يقتضيه.

هو مذهب أبي حنيفة ومالك والشافعي، وبه قال قبلهم كثير من التابعين.




উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যেসব শর্তের মাধ্যমে তোমরা (বিবাহের দ্বারা) লজ্জাস্থানকে হালাল করেছ, সেসব শর্তই হলো পূরণ করার জন্য সবচেয়ে বেশি হকদার (উপযুক্ত)।"

[হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি, অর্থাৎ সহীহ বুখারী (২৭২১) এবং সহীহ মুসলিম (১৪১৮)-এ বর্ণিত। উভয় কিতাবে ইয়াযিদ ইবনু আবী হাবীব—আবিুল খায়র—উকবাহ ইবনু আমির-এর সূত্রে এটি বর্ণিত হয়েছে।]

আলিমগণ বলেছেন: এই শর্তগুলোর অন্তর্ভুক্ত হলো—যদি কেউ কোনো মহিলাকে এই শর্তে বিবাহ করে যে সে তাকে তার বাড়ি থেকে বের করবে না, অথবা তাকে অন্য কোনো শহরে নিয়ে যাবে না, অথবা এর মতো অন্য কোনো শর্ত দেয়, তবে তার জন্য তা পূরণ করা ওয়াজিব।

ইমাম আহমাদ, ইসহাক এবং আওযাঈ এই মত পোষণ করেন। এটি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এরও অভিমত।

অন্যরা বলেছেন: এখানে শর্ত বলতে কেবল মোহর এবং চুক্তির দাবি অনুযায়ী আবশ্যকীয় অধিকারসমূহকে বোঝানো হয়েছে, চুক্তির দাবি বহির্ভূত অন্য কোনো শর্তকে নয়।

এটি ইমাম আবূ হানীফা, মালিক ও শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাযহাব। তাঁদের পূর্বে অনেক তাবেঈনও এই মত পোষণ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6057)


6057 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ثلاثة كلهم حق على اللَّه عونه، الغازي
في سبيل اللَّه، والمكاتب الذي يريد الأداء، والناكح الذي يريد التعفف".

حسن: رواه الترمذي (1655) والنسائي (3120، 3218) وابن ماجه (2518) وأحمد (7416) وصحّحه ابن حبان (4030) والحاكم (2/ 160) كلهم من طريق ابن عجلان، عن سعيد ابن أبي سعيد، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن عجلان وهو حسن الحديث.

وقد حسَّنه أيضًا الترمذي.

وأما الحاكم فصحّحه على شرط مسلم، لأنه لا يفرق بين الأصول والشواهد كما هو معلوم لدى طلبة العلم.

وأما ما رُوي عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تزوجوا النساء، فإنهن يأتين بالمال" فالصواب أنه مرسل.

رواه البزار -كشف الأستار (1402) -، والحاكم (2/ 16) كلاهما من حديث سَلْم بن جنادة، عن أبي أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه لتفرد سَلْم بن جنادة بسنده، وسَلْم ثقة مأمون".

وقال البزار:"رواه غير واحد مرسلًا، ولا نعلم أحدًا قال فيه عن عائشة إلا أبو أسامة".

والصواب لو قال: لا نعلم أحدا قال فيه عن عائشة إلا سَلْم بن جنادة، لأن الاختلاف وقع على أبي أسامة. فرواه سَلْم بن جنادة عنه موصولًا. وسَلْم هذا في حفظه شيء.

وقد خالفه الربيع بن نافع، عن أبي أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.

ومن هذا الوجه رواه أبو داود (192) في مراسيله، وأبو بكر بن أبي شيبة (4/ 127) والربيع بن نافع ثقة حجة من رجال الشيخين.

ولذا رجح الدارقطني الإرسال على الموصول"العلل" (15/ 61).

وروي أيضًا عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لم نر -يُر- للمتحابّين مِثلُ النكاح".

رواه ابن ماجه (1847) والحاكم (2/ 160) والبيهقي (7/ 78) كلهم من طريق محمد بن مسلمة الطائفي، ثنا إبراهيم بن ميسرة، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.

ومحمد بن مسلمة الطائفي له أوهام وهو وإن كان من رجال مسلم، ولذا قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه، لأن سفيان بن عيينة ومعمر بن راشد أوقفاه عن إبراهيم بن ميسرة على ابن عباس".

قلت: وكذلك أوقفه أيضًا ابن جريج رواه البيهقي من طريقه وأما حديث سفيان فرواه العقيلي
في ترجمة محمد بن مسلم الطائفي (4/ 134) من طريق الحميدي عنه، قال: حدثنا إبراهيم بن ميسرة قال: سمعت طاوسًا يقول: قال النبي صلى الله عليه وسلم فذكره. قال العقيلي: وهذا أولى.

وقد رُوي عن سفيان بن عيينة بإسناد آخر موصولًا وفيه رجال مجهولون.



قال أبو بكر الأثرم:"سمعت أبا عبد اللَّه (أحمد) وذكر رواية الشاميين عن زهير بن محمد قال: يروون عنه أحاديث مناكير هؤلاء ثم قال لي: ترى هذا زهير بن محمد الذي يروون عنه أصحابنا. ثم قال: أما رواية أصحابنا عنه فمستقيمة: عبد الرحمن بن مهدي وأبو عامر أحاديث صحاح مستقيمة، وأما أحاديث أبي حفص ذاك التنيسي عنه فتلك بواطيل موضوعة، أو نحو هذا، فأما بواطيل فقد قاله" (وأبو حفص هو عمرو بن أبي سلمة).

وكذلك قال أبو حاتم:"محله الصدق. وفي حفظه سوء كان حديثه بالشام أنكر من حديثه بالعراق لسوء حفظه".

وكذلك قال البخاري:"ما روى عنه أهل الشام فإنه مناكير، وما روي عنه أهل البصرة فإنه صحيح".

وكذلك قال النسائي:"ليس به بأس وعند عمرو بن أبي سلمة (وهو أبو حفص التنيسي) عنه مناكير".

والخلاصة في زهير بن محمد أن رواية أهل العراق عنه مستقيمة، ورواية أهل الشام عنه بواطيل، وعمرو بن أبي سلمة التنيسي من أهل الشام.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তিন প্রকার লোক রয়েছে, যাদেরকে সাহায্য করা আল্লাহর উপর কর্তব্য: আল্লাহর পথে যুদ্ধকারী, এবং ঐ মুকাতাব (চুক্তিভুক্ত) গোলাম যে মুক্তিপণ আদায় করতে চায়, এবং ঐ বিবাহকারী যে সতীত্ব রক্ষা করতে চায়।









আল-জামি` আল-কামিল (6058)


6058 - عن جابر بن عبد اللَّه، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا دخلت ليلًا، فلا تدخل على أهلك حتى تستحدّ المُغَيبة، وتمتشط الشّعِثَة".

قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فعليك بالكَيْس الكَيْس".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5246) من طريق شعبة -ومسلم في الرضاع (57: 715) من طريق هُشيم- كلاهما عن سيّار، عن الشعبي، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.

والسياق للبخاري وقال عقبه: تابعه عبيد اللَّه، عن وهب، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم في"الكيس".

قوله:"فعليك بالكيس الكيس" فسّره البخاري في الحديث الذي قبله بالولد، يعني طلب الولد. وقال ابن الأعرابي: الكيس: الجماع. والكيس: العقل، والمراد حثه على ابتغاء الولد. انظر: شرح مسلم للنووي (10/ 54).




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন তুমি রাতে (সফর শেষে) প্রবেশ করো, তখন তোমার পরিবারের কাছে (সহবাসের উদ্দেশ্যে) প্রবেশ করবে না, যতক্ষণ না (দীর্ঘ অনুপস্থিতির কারণে) যে নারীর অবাঞ্ছিত লোম বেড়ে গেছে সে তা ক্ষৌরকার্য করে পরিচ্ছন্ন করে নেয় এবং যে নারীর চুল এলোমেলো হয়ে আছে সে তা আঁচড়ে নেয়।" তিনি (জাবির) বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "সুতরাং তুমি কিয়াস (বুদ্ধিমত্তা বা সহবাস) অবলম্বন করো, কিয়াস অবলম্বন করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6059)


6059 - عن معقل بن يسار قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إني أحببت امرأة ذات حسب وجمال إلا إنها لا تلد، أفأتزوجها؟ قال:"لا" ثم أتاه الثانية، فنهاه، ثم أتاه الثالثة فقال:"تزوجوا الودود الولود، فإني مكاثر بكم".

حسن: رواه أبو داود (2050) والنسائي (3227) كلاهما من حديث يزيد بن هارون قال: أنبأنا المستلم بن سعيد -ابن أخت منصور بن زاذان- عن منصور، يعني -ابن زاذان- عن معاوية بن
قرة، عن معقل بن يسار فذكره. ومن هذا الطريق رواه ابن حبان (4056) والحاكم (2/ 162).

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وإسناده حسن من أجل المستلم بن سعيد فإنه حسن الحديث.




মা'কিল ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমি একজন মহিলাকে পছন্দ করেছি, যে বংশমর্যাদা ও সৌন্দর্য উভয়ের অধিকারী। কিন্তু সে সন্তান জন্ম দিতে পারে না, আমি কি তাকে বিবাহ করব? তিনি বললেন: "না।" এরপর সে দ্বিতীয়বার তাঁর কাছে এলো, তিনি তাকে বারণ করলেন। এরপর সে তৃতীয়বার তাঁর কাছে এলো। তিনি বললেন: "তোমরা অধিক প্রেমময়ী ও অধিক সন্তান জন্মদানকারী নারীকে বিবাহ কর, কারণ আমি (কিয়ামতের দিন) তোমাদের সংখ্যাধিক্য নিয়ে গর্ব করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (6060)


6060 - عن ابن عمر أنه تزوج امرأة فأصابها شمطاء فطلقها. وقال: حصير في بيت خير من امرأة لا تلد. واللَّه ما أقربكن شهوة، ولكني سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"تزوجوا الودود الولود، فإني مكاثر بكم الأمم يوم القيامة".

صحيح: رواه الخطيب في"تاريخ بغداد" (6782) في ترجمة"الفضل بن أحمد بن منصور بن الذيّال الزبيدي" عن الحسن بن أبي طالب، قال: حدثنا أبو محمد عبيد اللَّه بن أحمد بن معروف القاضي، قال: حدثنا الفضل بن أحمد بن منصور الزبيدي، إملاء من حفظه، قال: حدثنا زياد بن أيوب، قال: حدثنا إسماعيل بن عُلية، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. وإسناده صحيح.

وفي الباب أحاديث ضعيفة منها:

ما رواه صاحب مسند الفردوس من طريق محمد بن الحارث، عن محمد بن عبد الرحمن البيلماني، عن أبيه، عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حجوا تستغنوا، وسافروا تصحوا، وتناكحوا تكثروا، فإني أباهي بكم الأمم".

ذكره في التلخيص (3/ 115 - 116) وقال: والمحمدان ضعيفان.

وقوله:"شَمْطاء" من الشَمْط. وهو بياض شعر الرأس يخالط سواده، وفيه إشارة إلى تقدم سنها، وعدم قدرتها على الإنجاب.

وفي الباب أيضًا ما روي عن عبد اللَّه بن عمرو أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أنكحوا أمهات الأولاد، فإني أباهي بهم يوم القيامة".

رواه الإمام أحمد (6598) عن حسن، حدثنا ابن لهيعة، حدثني حُيّي بن عبد اللَّه، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد اللَّه بن عمرو فذكره.

وفيه ابن لهيعة وفيه كلام معروف، وشيخه حُيّي بن عبد اللَّه وهو المغافري، قال فيه البخاري:"فيه نظر" وقال أحمد:"أحاديثه مناكير" وتكلم فيه النسائي والعقيلي وغيرهما، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 258): وقال:"حيي بن عبد اللَّه المغافري وقد وُثِّق وفيه ضعف" ولم يشر إلى وجود ابن لهيعة في الإسناد وهذا قصور منه في التخريج.

وكذلك لا يصح ما روي عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"النكاح من سنتي، فمن لم يعمل بسنتي فليس مني، وتزوجوا، فإني مكاثر بكم الأمم، ومن كان ذا طَوْل فلينكح، ومن لم يجد فعليه بالصوم، فإن الصوم له وجاء".

رواه ابن ماجه (1846) عن أحمد بن الأزهر، قال: حدثنا آدم، قال: حدثنا عيسى بن ميمون،
عن القاسم، عن عائشة فذكرته.

وعيسى بن ميمون ضعيف، قال البخاري:"منكر الحديث"، وقال أبو حاتم:"لا يصح حديثه" وبه أعله الحافظ في"التلخيص" (3/ 116).

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنكحوا فإني مكاثر بكم".

رواه ابن ماجه (1863) عن يعقوب بن حميد بن كاسب قال: حدثنا عبد اللَّه بن الحارث المخزومي، عن طلحة، عن عطاء، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده ضعيف جدًّا فإن طلحة هو ابن عمرو بن عثمان الحضرمي المكي ضعيف باتفاق أهل العلم.

والخلاصة فيه: أن الحديث صحيح وإن لم تصح هذه الشواهد.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একজন মহিলাকে বিবাহ করেছিলেন। অতঃপর দেখলেন সে ‘শামত' (চুলে কালো সাদার মিশ্রণ, অর্থাৎ বয়স্ক ও সম্ভবত অনুর্বর) হওয়ায় তাকে তালাক দিলেন। তিনি বললেন, ঘরের ভেতরে থাকা একটি মাদুর সেই নারীর চেয়েও ভালো, যে সন্তান প্রসব করে না। আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের (নারীদের) কাছে কেবল কামনার জন্য যাই না। বরং আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমরা অধিক প্রেমময়ী ও অধিক সন্তান প্রসবকারী নারীকে বিবাহ কর। কারণ আমি ক্বিয়ামতের দিন তোমাদের সংখ্যা নিয়ে অন্য উম্মতদের উপর গর্ব করব।"