হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6048)


6048 - عن أبي هريرة قال: قلت: يا رسول اللَّه، إني رجل شابٌّ، وأنا أخاف على نفسي العَنَت ولا أجد ما أتزوّج به النساء، فسكت عني، ثم قلت مثل ذلك، فسكت عني، ثم قلت له مثل ذلك، فسكت عني، ثم قلتُ مثل ذلك. فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"يا أبا هريرة، جفّ القلم بما أنت لاقٍ، فاختص على ذلك أو ذر".

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5076) فقال: وقال أصبغ: أخبرني ابنُ وهب، عن يونس ابن يزيد، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال (فذكره).

وأصبغ هو ابن الفَرَج القرشي الأمويّ أبو عبد اللَّه المصري الفقيه أحد شيوخ البخاري. وقال البخاري:"قال أصبغ" محمول على الاتصال على رأي ابن الصلاح وغيره، وهو الذي نختاره.

قال الحافظ في"الفتح" (9/ 119): قوله"وقال أصبغ" كذا في جميع الروايات التي وقفت عليها، وكلام أبي نعيم في"المستخرج" يشعر بأنه قال فيه حدثنا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমি একজন যুবক। আমি আমার নিজের ওপর গুনাহের ভয় করি, অথচ নারীদের বিবাহ করার মতো সম্পদ আমি পাই না।’ তখন তিনি আমার থেকে নীরব থাকলেন। এরপর আমি আবার একই কথা বললাম, তিনি নীরব থাকলেন। এরপর আমি তাঁকে আবার একই কথা বললাম, তিনি নীরব থাকলেন। এরপর আমি আবার একই কথা বললাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “হে আবূ হুরায়রা! তোমার জীবনে যা ঘটবে, সে বিষয়ে কলম শুকিয়ে গেছে (ফয়সালা হয়ে গেছে)। সুতরাং তুমি এই বিষয়ে (খাসি হয়ে) নিবৃত্ত থাকো অথবা (ধৈর্য ধরে) ছেড়ে দাও।”









আল-জামি` আল-কামিল (6049)


6049 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم خرج على فتية من شباب قريش، فقال:"يا معشر الشباب من استطاع منكم الطول فلينكح، أو فليتزوج، وإلا فعليه بالصوم، فإنه له وجاء".

صحيح: رواه البزار -كشف الأستار (1398) - عن محمد بن الليث، ثنا علي بن عبد الحميد،
ثنا سلمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس فذكره.

قال البزار:"لا نعلم رواه عن ثابت إلا سليمان".

قلت: ولا يضر تفرد سليمان بن المغيرة وهو القيسي مولاهم، فإنه ثقة.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরাইশের একদল যুবকের কাছ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি বললেন: "হে যুবকের দল! তোমাদের মধ্যে যে সামর্থ্য রাখে, সে যেন বিবাহ করে, আর যে সামর্থ্য রাখে না, সে যেন রোজা পালন করে, কেননা এটি তার জন্য সুরক্ষা (যৌন উত্তেজনা দমনকারী)।"









আল-জামি` আল-কামিল (6050)


6050 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يأمر بالباءة، وينهى عن التبتل نهيا شديدًا، ويقول:"تزوجوا الودود الولود، إني مكاثر الأنبياء يوم القيامة".

حسن: رواه أحمد (12613) عن حسين وعفان، والبزار -كشف الأستار (1400) - من طريق محمد بن معاوية، وابن حبان في صحيحه (4028) من طريق قتيبة بن سعيد، والبيهقي (7/ 81 - 82) من طريق إبراهيم بن أبي العباس، كلهم عن خلف بن خليفة، قال: حدثني حفص بن عمر، عن أنس بن مالك فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في خلف بن خليفة غير أنه حسن الحديث فقد قال فيه ابن معين والنسائي: ليس به بأس. وقال ابن معين أيضًا وأبو حاتم: صدوق، وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به، ولا أبرئه من أن يخطئ في بعض الأحايين في بعض رواياته.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (13569) عن عفان، حدثنا خلف بن خليفة -قال عبد اللَّه: قال أبي: وقد رأيت خلف بن خليفة وقد قال له إنسان: يا أبا أحمد، حدثك محارب بن دثار؟ قال أبي: فلم أفهم كلامه، كان قد كبِرَ فتركته، -حدثنا حفص، عن أنس بن مالك قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يأمر بالباءة، وينهى عن التبتل فذكر الحديث.

ويظهر من سباق الإمام أحمد أنه لم يرو عنه من أجل اختلاطه، ولكن لما وجد الحديث عن اثنين من شيوخه وهما حسين وعفان فروى عنه بواسطتهما لعله لقدم سماعهما منه، إلا أنه لم يظهر لي من روى عنه قبل الاختلاط، ومن روى عنه بعد الاختلاط من هؤلاء الذين ذكرتهم.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাআহ-এর (বিবাহের) নির্দেশ দিতেন এবং কঠোরভাবে তাবা তুল (বৈরাগ্য বা বিবাহ থেকে বিরত থাকা) থেকে নিষেধ করতেন। তিনি বলতেন: "তোমরা প্রেমময়ী ও অধিক সন্তান জন্মদানকারী (নারীকে) বিবাহ করো, কারণ কিয়ামতের দিন আমি (আমার উম্মতের সংখ্যা দিয়ে) অন্যান্য নবীদের উপর গর্ব করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (6051)


6051 - عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا شباب قريش، لا تزنوا، احفظوا فروجكم، ألا من حفظ فرجه فله الجنّة".

حسن: رواه البزار - كشف الأستار (1401)، والطبراني في الكبير (12/ 165) والأوسط، من حديث مسلم بن إبراهيم، ثنا شداد بن سعيد، ثنا سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن ابن عباس فذكره واللفظ للبزار.

وإسناده حسن من أجل شداد بن سعيد فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، وهو من رجال مسلم، وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 252):"ورجاله رجال الصحيح".

وسعيد الجُريري هو ابن إياس، أبو مسعود البصري، أطلق يحيى بن معين والنسائي القول بتوثيقه، ولكن قال أبو حاتم:"تغير حفظه قبل موته. فمن كتب عنه قديمًا فهو صالح وهو حسن الحديث".

وقال ابن حبان:"كان قد اختلط قبل موته بثلاث سنين، قال: وقد رآه يحيى القطان وهو
مختلط، ولم يكن اختلاطه فاحشًا".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে কুরাইশের যুবকেরা! তোমরা যেনা (ব্যভিচার) করো না। তোমরা তোমাদের লজ্জাস্থানকে সংরক্ষণ করো। জেনে রাখো, যে ব্যক্তি তার লজ্জাস্থানকে সংরক্ষণ করে, তার জন্য রয়েছে জান্নাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (6052)


6052 - عن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن التبتل.

صحيح: رواه الترمذي (1082) وابن ماجه (1849) والنسائي (3214) وأحمد (20192) وابن الجارود (673) كلهم من طريق معاذ بن هشام، عن أبيه، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة، فذكره.

قال الترمذي وابن ماجه: وزاد زيد بن أخْزم (عن معاذ بن هشام) في حديثه: وقرأ قتادة: {وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِنْ قَبْلِكَ وَجَعَلْنَا لَهُمْ أَزْوَاجًا وَذُرِّيَّةً} [سورة الرعد: 38].

وإسناده صحيح. والحسن سمع سمرة مطلقا كما أوضحت ذلك في المواضيع الكثيرة.

وروي هذا الحديث عن عائشة أيضًا كما في الآتي.




সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবাত্তুল (বৈরাগ্য বা বৈবাহিক জীবন ত্যাগ করা) অবলম্বন করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6053)


6053 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن التبتل.

صحيح: رواه النسائي (3214) وأحمد (24943) كلاهما من حديث خالد بن الحارث، قال: حدثنا أشعث، عن الحسن، عن سعد بن هشام، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.

وأشعث هو ابن عبد الملك الحُمراني ثقة من رجال الصحيح.

قال الترمذي عقب حديث سمرة:"حديث سمرة حديث حسن غريب، وروى أشعث بن عبد الملك هذا الحديث عن الحسن، عن سعد بن هشام، عن عائشة. ويقال: كلا الحديثين صحيح.

وقال النسائي:"قتادة أثبت وأحفظ من أشعث، وحديث أشعث أشبه بالصواب".

وفي"علل ابن أبي حاتم" (1/ 402) أنه سأل أباه عن حديث رواه أشعث بن عبد الملك، عن الحسن، عن سعد بن هشام، عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن التبتل، ورواه معاذ بن هشام، عن أبيه عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن التبتل. قلت: أيهما أصح؟ قال أبي:"قتادة أحفظ من أشعث، وأحسب الحديثين صحيحين، لأن لسعد بن هشام قصة في سؤاله عائشة عن ترك النكاح يعني التبتل".

فهما حديثان، والحسن له شيخان، سمرة بن جندب، وسعد بن هشام، ولا يُعِلُّ أحدهما الآخر.

قال الترمذي في"العلل الكبير": سألت محمدًا (البخاري) عن الحديث فقال:"حديث الحسن عن سمرة محفوظ، وحديث الحسن عن سعد بن هشام، عن عائشة حسن".

قلت: سعد بن هشام الأنصاري المدني ثقة من رجال الجماعة استشهد بأرض الهند.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবাত্তুল (বৈরাগ্য অবলম্বন) করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6054)


6054 - عن عائشة قالت: دخلت امرأة عثمان بن مظعون واسمها خولة بنت حكيم على عائشة وهي باذّة الهيئة، فسألتها ما شأنك؟ فقالت: زوجي يقوم الليل، ويصوم النهار. فدخل النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له عائشة. فلقي النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"يا عثمان، إن
الرهبانية لم تكتب علينا، أما لك فيّ أسوة؟ فواللَّه إن أخشاكم للَّه، وأحفظكم لحدوده لأنا".

صحيح: رواه عبد الرزاق (10375) عن معمر، عن الزهري، عن عروة وعمرة، عن عائشة قالت: فذكرته.

ومن هذا الطريق رواه البزار -كشف الأستار (1458) -، وابن حبان (9) ولكن عن عروة وحده.

ورواه الإمام أحمد (25893) عن عبد الرزاق، حدثنا معمر، عن الزهري، عن عروة، قال: دخلت امرأة عثمان فذكره مرسلًا.

وإليه أشار الهيثمي في"المجمع" (4/ 301) بقوله:"وأسانيد أحمد رجالها ثقات إلا أن طريق إن أخشاكم أسندها أحمد، ووصلها البزار برجال ثقات".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসমান ইবনে মাযউন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী, যার নাম ছিল খাওলা বিনতে হাকিম, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলেন এমন অবস্থায় যে, তিনি ছিলেন মলিন বেশভূষার। (আয়িশা) তাকে জিজ্ঞেস করলেন, তোমার কী হয়েছে? তিনি বললেন: আমার স্বামী রাতে নামায পড়েন এবং দিনে রোযা রাখেন। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে প্রবেশ করলেন এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বিষয়টি বললেন। অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসমানের সাথে দেখা করলেন এবং বললেন: "হে উসমান! আমাদের উপর বৈরাগ্যবাদ (সন্ন্যাস) আবশ্যক করা হয়নি। আমার মধ্যে কি তোমাদের জন্য কোনো আদর্শ নেই? আল্লাহর কসম! তোমাদের মধ্যে আমিই আল্লাহকে সবচেয়ে বেশি ভয় করি এবং তাঁর সীমাসমূহকে সবচেয়ে বেশি হিফাজত (রক্ষা) করে চলি।"









আল-জামি` আল-কামিল (6055)


6055 - عن عائشة قالت: كانت امرأة عثمان بن مظعون تختضب وتطَيَّب، فتركته، فدخلت عليّ، فقلت لها: أمُشهد أم مُغيب؟ فقالت: مُشهد كمغيب. قلت لها: مالك؟ قالت: عثمان لا يريد الدنيا، ولا يريد النساء. قالت عائشة: فدخل عليّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأخبرتُه بذلك. فلقي عثمان فقال:"يا عثمان، أتؤمن بما نؤمن به؟" قال: نعم، يا رسول اللَّه، قال:"فاصنعْ كما نصنعُ".

حسن: رواه الإمام أحمد (24754) عن مؤمل، حدثنا حماد، حدثنا إسحاق بن سويد، عن أبي فاختة، عن عائشة فذكرت.

ومؤمل هذا، هو ابن إسماعيل سيء الحفظ إلا أنه توبع. فرواه أبو نعيم في"الحلية" (6/ 257) من وجه آخر عن هشام بن عبد الملك، ثنا حماد بن سلمة، عن إسحاق بن سويد، حدثني أبو فاختة، عن عائشة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال لعثمان بن مظعون: فذكر نحوه.

وإسناده حسن من أجل أبي فاختة وهو سعيد بن علاقة الكوفي فإنه حسن الحديث وإن كان ابن حجر قال فيه"ثقة" بناء على توثيق الدارقطني.

واللفظ الذي سقتُه ذكره أحمد (24753) وأحال إليه إلا أن فيه"فأسوةٌ مالَكَ بنا".

وللحديث طرق أخرى ذكرتُها في صلاة الليل.

وأما ما روي عن أبي ذر قال: دخل على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رجل يقال له: عكاف بن بشر التميمي، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"يا عكاف، هل لك من زوجة؟" قال: لا. قال:"ولا جارية؟" قال: ولا جارية. قال:"وأنت موسر بخير؟" قال: وأنا موسر بخير. قال:"أنت إذًا من إخوان الشياطين، لو كنت في النصارى كنت من رهبانهم، إنّ سنَّتنا النكاح، شراركم عزّابكم، وأراذل موتاكم عزّابكم، أبِالشيطان تمرّسون! ما للشيطان من سلاح أبلغ في الصالحين من النساء إلا المتزوجون، أولئك
المطهرون المبرَّؤون من الخَنا، ويحك يا عكّاف، إنهن صواحب أيوب وداود ويوسف وكُرسُف".

فقال له بشر بن عطيّة: ومن كُرسُف يا رسول اللَّه؟ قال:"رجل كان يعبد اللَّه بساحل من سواحل البحر ثلاث مئة عام، يصوم النّهار، ويقوم الليل، ثم إنه كفر باللَّه العظيم في سبب امرأة عشقها، وترك ما كان عليه من عبادة اللَّه. ثم استدرك اللَّه ببعض ما كان منه فتاب عليه، ويحك يا عكّاف تزوج، وإلا فأنت من المذبذبين"، قال: زوّجني يا رسول اللَّه. قال:"قد زوّجتك كَريمة بنت كلثوم الحميري" فهو ضعيف.

رواه عبد الرزاق (10387) حدثنا محمد بن راشد، عن مكحول، عن رجل، عن أبي ذر فذكره. ومن هذا الطريق رواه الإمام أحمد (21450). وفيه رجل لم يُسم.

وله إسناد آخر وهو ما رواه العقلي في الضعفاء (3/ 356) وأبو يعلى (6856) والطبراني في الكبير (18/ 85 رقم 158) وابن حبان في المجروحين (1022) كلهم من طرق عن معاوية بن يحيى، عن سليمان بن موسى، عن مكحول، عن غضيف بن الحارث، عن عطية بن بُسر المازني قال: جاء عكاف بن وداعة فذكر الحديث. وعطية بن بُسر لا يتابع عليه كما قال العقيلي.

وقال ابن حبان: معاوية بن يحيى وهو الصرفي منكر الحديث جدًا كان يشتري الكتب ويحدث بها. . .

وقال ابن حجر في"الإصابة" (2/ 496) في ترجمة عكاف بن وداعة بعد أن ساق للحديث طرقا أخرى:"الطرق المذكورة لا تخلو من ضعف واضطراب".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান ইবন মাযঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী (পূর্বে) মেহেদি লাগাতেন এবং সুগন্ধি ব্যবহার করতেন, কিন্তু তিনি তা ছেড়ে দিয়েছিলেন। এরপর তিনি আমার কাছে আসলেন। তখন আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: তোমার স্বামী উপস্থিত নাকি অনুপস্থিত? তিনি বললেন: উপস্থিত থেকেও অনুপস্থিতের মতোই। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: তোমার কী হয়েছে? তিনি বললেন: উসমান দুনিয়া চান না, আর মহিলাদেরও চান না। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার নিকট প্রবেশ করলেন। আমি তাঁকে এ বিষয়ে অবগত করলাম। এরপর তিনি উসমানের সাথে দেখা করে জিজ্ঞেস করলেন: "হে উসমান, তুমি কি তাতে বিশ্বাস রাখো যাতে আমরা বিশ্বাস রাখি?" তিনি বললেন: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে আমরা যা করি, তুমিও তাই করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6056)


6056 - عن عقبة بن عامر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أحقُّ الشروط أن توفوا به ما استحللتم به الفروج".

متفق عليه: رواه البخاري في الشروط (2721) ومسلم في النكاح (1418) كلاهما من حديث يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر فذكره.

قال أهل العلم: من هذه الشروط: من تزوج امرأة على أن لا يخرجها من دارها، أو لا يخرج بها إلى البلد، أو ما أشبه ذلك فإن عليه الوفاء بذلك.

وبه قال الإمام أحمد وإسحاق والأوزاعي، وهو قول عمر بن الخطاب.

وقال غيرهم: الشرط هنا خاص بالمهر والحقوق الواجبة التي هي مقتضى العقد دون غيرها مما لا يقتضيه.

هو مذهب أبي حنيفة ومالك والشافعي، وبه قال قبلهم كثير من التابعين.




উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যেসব শর্তের মাধ্যমে তোমরা (বিবাহের দ্বারা) লজ্জাস্থানকে হালাল করেছ, সেসব শর্তই হলো পূরণ করার জন্য সবচেয়ে বেশি হকদার (উপযুক্ত)।"

[হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি, অর্থাৎ সহীহ বুখারী (২৭২১) এবং সহীহ মুসলিম (১৪১৮)-এ বর্ণিত। উভয় কিতাবে ইয়াযিদ ইবনু আবী হাবীব—আবিুল খায়র—উকবাহ ইবনু আমির-এর সূত্রে এটি বর্ণিত হয়েছে।]

আলিমগণ বলেছেন: এই শর্তগুলোর অন্তর্ভুক্ত হলো—যদি কেউ কোনো মহিলাকে এই শর্তে বিবাহ করে যে সে তাকে তার বাড়ি থেকে বের করবে না, অথবা তাকে অন্য কোনো শহরে নিয়ে যাবে না, অথবা এর মতো অন্য কোনো শর্ত দেয়, তবে তার জন্য তা পূরণ করা ওয়াজিব।

ইমাম আহমাদ, ইসহাক এবং আওযাঈ এই মত পোষণ করেন। এটি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এরও অভিমত।

অন্যরা বলেছেন: এখানে শর্ত বলতে কেবল মোহর এবং চুক্তির দাবি অনুযায়ী আবশ্যকীয় অধিকারসমূহকে বোঝানো হয়েছে, চুক্তির দাবি বহির্ভূত অন্য কোনো শর্তকে নয়।

এটি ইমাম আবূ হানীফা, মালিক ও শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাযহাব। তাঁদের পূর্বে অনেক তাবেঈনও এই মত পোষণ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6057)


6057 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ثلاثة كلهم حق على اللَّه عونه، الغازي
في سبيل اللَّه، والمكاتب الذي يريد الأداء، والناكح الذي يريد التعفف".

حسن: رواه الترمذي (1655) والنسائي (3120، 3218) وابن ماجه (2518) وأحمد (7416) وصحّحه ابن حبان (4030) والحاكم (2/ 160) كلهم من طريق ابن عجلان، عن سعيد ابن أبي سعيد، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن عجلان وهو حسن الحديث.

وقد حسَّنه أيضًا الترمذي.

وأما الحاكم فصحّحه على شرط مسلم، لأنه لا يفرق بين الأصول والشواهد كما هو معلوم لدى طلبة العلم.

وأما ما رُوي عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تزوجوا النساء، فإنهن يأتين بالمال" فالصواب أنه مرسل.

رواه البزار -كشف الأستار (1402) -، والحاكم (2/ 16) كلاهما من حديث سَلْم بن جنادة، عن أبي أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه لتفرد سَلْم بن جنادة بسنده، وسَلْم ثقة مأمون".

وقال البزار:"رواه غير واحد مرسلًا، ولا نعلم أحدًا قال فيه عن عائشة إلا أبو أسامة".

والصواب لو قال: لا نعلم أحدا قال فيه عن عائشة إلا سَلْم بن جنادة، لأن الاختلاف وقع على أبي أسامة. فرواه سَلْم بن جنادة عنه موصولًا. وسَلْم هذا في حفظه شيء.

وقد خالفه الربيع بن نافع، عن أبي أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.

ومن هذا الوجه رواه أبو داود (192) في مراسيله، وأبو بكر بن أبي شيبة (4/ 127) والربيع بن نافع ثقة حجة من رجال الشيخين.

ولذا رجح الدارقطني الإرسال على الموصول"العلل" (15/ 61).

وروي أيضًا عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لم نر -يُر- للمتحابّين مِثلُ النكاح".

رواه ابن ماجه (1847) والحاكم (2/ 160) والبيهقي (7/ 78) كلهم من طريق محمد بن مسلمة الطائفي، ثنا إبراهيم بن ميسرة، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.

ومحمد بن مسلمة الطائفي له أوهام وهو وإن كان من رجال مسلم، ولذا قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه، لأن سفيان بن عيينة ومعمر بن راشد أوقفاه عن إبراهيم بن ميسرة على ابن عباس".

قلت: وكذلك أوقفه أيضًا ابن جريج رواه البيهقي من طريقه وأما حديث سفيان فرواه العقيلي
في ترجمة محمد بن مسلم الطائفي (4/ 134) من طريق الحميدي عنه، قال: حدثنا إبراهيم بن ميسرة قال: سمعت طاوسًا يقول: قال النبي صلى الله عليه وسلم فذكره. قال العقيلي: وهذا أولى.

وقد رُوي عن سفيان بن عيينة بإسناد آخر موصولًا وفيه رجال مجهولون.



قال أبو بكر الأثرم:"سمعت أبا عبد اللَّه (أحمد) وذكر رواية الشاميين عن زهير بن محمد قال: يروون عنه أحاديث مناكير هؤلاء ثم قال لي: ترى هذا زهير بن محمد الذي يروون عنه أصحابنا. ثم قال: أما رواية أصحابنا عنه فمستقيمة: عبد الرحمن بن مهدي وأبو عامر أحاديث صحاح مستقيمة، وأما أحاديث أبي حفص ذاك التنيسي عنه فتلك بواطيل موضوعة، أو نحو هذا، فأما بواطيل فقد قاله" (وأبو حفص هو عمرو بن أبي سلمة).

وكذلك قال أبو حاتم:"محله الصدق. وفي حفظه سوء كان حديثه بالشام أنكر من حديثه بالعراق لسوء حفظه".

وكذلك قال البخاري:"ما روى عنه أهل الشام فإنه مناكير، وما روي عنه أهل البصرة فإنه صحيح".

وكذلك قال النسائي:"ليس به بأس وعند عمرو بن أبي سلمة (وهو أبو حفص التنيسي) عنه مناكير".

والخلاصة في زهير بن محمد أن رواية أهل العراق عنه مستقيمة، ورواية أهل الشام عنه بواطيل، وعمرو بن أبي سلمة التنيسي من أهل الشام.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তিন প্রকার লোক রয়েছে, যাদেরকে সাহায্য করা আল্লাহর উপর কর্তব্য: আল্লাহর পথে যুদ্ধকারী, এবং ঐ মুকাতাব (চুক্তিভুক্ত) গোলাম যে মুক্তিপণ আদায় করতে চায়, এবং ঐ বিবাহকারী যে সতীত্ব রক্ষা করতে চায়।









আল-জামি` আল-কামিল (6058)


6058 - عن جابر بن عبد اللَّه، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا دخلت ليلًا، فلا تدخل على أهلك حتى تستحدّ المُغَيبة، وتمتشط الشّعِثَة".

قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فعليك بالكَيْس الكَيْس".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5246) من طريق شعبة -ومسلم في الرضاع (57: 715) من طريق هُشيم- كلاهما عن سيّار، عن الشعبي، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.

والسياق للبخاري وقال عقبه: تابعه عبيد اللَّه، عن وهب، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم في"الكيس".

قوله:"فعليك بالكيس الكيس" فسّره البخاري في الحديث الذي قبله بالولد، يعني طلب الولد. وقال ابن الأعرابي: الكيس: الجماع. والكيس: العقل، والمراد حثه على ابتغاء الولد. انظر: شرح مسلم للنووي (10/ 54).




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন তুমি রাতে (সফর শেষে) প্রবেশ করো, তখন তোমার পরিবারের কাছে (সহবাসের উদ্দেশ্যে) প্রবেশ করবে না, যতক্ষণ না (দীর্ঘ অনুপস্থিতির কারণে) যে নারীর অবাঞ্ছিত লোম বেড়ে গেছে সে তা ক্ষৌরকার্য করে পরিচ্ছন্ন করে নেয় এবং যে নারীর চুল এলোমেলো হয়ে আছে সে তা আঁচড়ে নেয়।" তিনি (জাবির) বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "সুতরাং তুমি কিয়াস (বুদ্ধিমত্তা বা সহবাস) অবলম্বন করো, কিয়াস অবলম্বন করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6059)


6059 - عن معقل بن يسار قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إني أحببت امرأة ذات حسب وجمال إلا إنها لا تلد، أفأتزوجها؟ قال:"لا" ثم أتاه الثانية، فنهاه، ثم أتاه الثالثة فقال:"تزوجوا الودود الولود، فإني مكاثر بكم".

حسن: رواه أبو داود (2050) والنسائي (3227) كلاهما من حديث يزيد بن هارون قال: أنبأنا المستلم بن سعيد -ابن أخت منصور بن زاذان- عن منصور، يعني -ابن زاذان- عن معاوية بن
قرة، عن معقل بن يسار فذكره. ومن هذا الطريق رواه ابن حبان (4056) والحاكم (2/ 162).

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وإسناده حسن من أجل المستلم بن سعيد فإنه حسن الحديث.




মা'কিল ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমি একজন মহিলাকে পছন্দ করেছি, যে বংশমর্যাদা ও সৌন্দর্য উভয়ের অধিকারী। কিন্তু সে সন্তান জন্ম দিতে পারে না, আমি কি তাকে বিবাহ করব? তিনি বললেন: "না।" এরপর সে দ্বিতীয়বার তাঁর কাছে এলো, তিনি তাকে বারণ করলেন। এরপর সে তৃতীয়বার তাঁর কাছে এলো। তিনি বললেন: "তোমরা অধিক প্রেমময়ী ও অধিক সন্তান জন্মদানকারী নারীকে বিবাহ কর, কারণ আমি (কিয়ামতের দিন) তোমাদের সংখ্যাধিক্য নিয়ে গর্ব করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (6060)


6060 - عن ابن عمر أنه تزوج امرأة فأصابها شمطاء فطلقها. وقال: حصير في بيت خير من امرأة لا تلد. واللَّه ما أقربكن شهوة، ولكني سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"تزوجوا الودود الولود، فإني مكاثر بكم الأمم يوم القيامة".

صحيح: رواه الخطيب في"تاريخ بغداد" (6782) في ترجمة"الفضل بن أحمد بن منصور بن الذيّال الزبيدي" عن الحسن بن أبي طالب، قال: حدثنا أبو محمد عبيد اللَّه بن أحمد بن معروف القاضي، قال: حدثنا الفضل بن أحمد بن منصور الزبيدي، إملاء من حفظه، قال: حدثنا زياد بن أيوب، قال: حدثنا إسماعيل بن عُلية، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. وإسناده صحيح.

وفي الباب أحاديث ضعيفة منها:

ما رواه صاحب مسند الفردوس من طريق محمد بن الحارث، عن محمد بن عبد الرحمن البيلماني، عن أبيه، عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حجوا تستغنوا، وسافروا تصحوا، وتناكحوا تكثروا، فإني أباهي بكم الأمم".

ذكره في التلخيص (3/ 115 - 116) وقال: والمحمدان ضعيفان.

وقوله:"شَمْطاء" من الشَمْط. وهو بياض شعر الرأس يخالط سواده، وفيه إشارة إلى تقدم سنها، وعدم قدرتها على الإنجاب.

وفي الباب أيضًا ما روي عن عبد اللَّه بن عمرو أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أنكحوا أمهات الأولاد، فإني أباهي بهم يوم القيامة".

رواه الإمام أحمد (6598) عن حسن، حدثنا ابن لهيعة، حدثني حُيّي بن عبد اللَّه، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد اللَّه بن عمرو فذكره.

وفيه ابن لهيعة وفيه كلام معروف، وشيخه حُيّي بن عبد اللَّه وهو المغافري، قال فيه البخاري:"فيه نظر" وقال أحمد:"أحاديثه مناكير" وتكلم فيه النسائي والعقيلي وغيرهما، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 258): وقال:"حيي بن عبد اللَّه المغافري وقد وُثِّق وفيه ضعف" ولم يشر إلى وجود ابن لهيعة في الإسناد وهذا قصور منه في التخريج.

وكذلك لا يصح ما روي عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"النكاح من سنتي، فمن لم يعمل بسنتي فليس مني، وتزوجوا، فإني مكاثر بكم الأمم، ومن كان ذا طَوْل فلينكح، ومن لم يجد فعليه بالصوم، فإن الصوم له وجاء".

رواه ابن ماجه (1846) عن أحمد بن الأزهر، قال: حدثنا آدم، قال: حدثنا عيسى بن ميمون،
عن القاسم، عن عائشة فذكرته.

وعيسى بن ميمون ضعيف، قال البخاري:"منكر الحديث"، وقال أبو حاتم:"لا يصح حديثه" وبه أعله الحافظ في"التلخيص" (3/ 116).

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنكحوا فإني مكاثر بكم".

رواه ابن ماجه (1863) عن يعقوب بن حميد بن كاسب قال: حدثنا عبد اللَّه بن الحارث المخزومي، عن طلحة، عن عطاء، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده ضعيف جدًّا فإن طلحة هو ابن عمرو بن عثمان الحضرمي المكي ضعيف باتفاق أهل العلم.

والخلاصة فيه: أن الحديث صحيح وإن لم تصح هذه الشواهد.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একজন মহিলাকে বিবাহ করেছিলেন। অতঃপর দেখলেন সে ‘শামত' (চুলে কালো সাদার মিশ্রণ, অর্থাৎ বয়স্ক ও সম্ভবত অনুর্বর) হওয়ায় তাকে তালাক দিলেন। তিনি বললেন, ঘরের ভেতরে থাকা একটি মাদুর সেই নারীর চেয়েও ভালো, যে সন্তান প্রসব করে না। আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের (নারীদের) কাছে কেবল কামনার জন্য যাই না। বরং আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমরা অধিক প্রেমময়ী ও অধিক সন্তান প্রসবকারী নারীকে বিবাহ কর। কারণ আমি ক্বিয়ামতের দিন তোমাদের সংখ্যা নিয়ে অন্য উম্মতদের উপর গর্ব করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (6061)


6061 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: قفلنا مع النبي صلى الله عليه وسلم من غزوة، فتعجّلت على بعير لي قَطُوفٍ، فلحقني راكب من خلفي، فنخس بعيري بعنزة كانت معه، فانطلق بعيري كأجود ما أنت راءٍ من الإبل، فإذا النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"ما يُعجلك؟" قلتُ: كنت حديث عهد بعرسٍ، قال:"أبكرًا أم ثيبًا؟" قلتُ: ثيِّبًا. قال:"فهلا جارية تلاعبها وتلاعبك". قال: فلما ذهبنا لندخل قال:"أمهلوا حتى تدخلوا ليلًا -أي عشاءً- لكي تمتشط الشعثة، وتستحدّ المُغيبة".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5079) ومسلم في الرضاع (1466: 57) كلاهما من طريق هُشيم، حدثنا سيّار، عن الشعبي، عن جابر بن عبد اللَّه، قال: فذكره.

قوله:"قطوف" أي بطيء المشي.

وقوله:"الشَّعِثة" هي المرأة المتفرقة شعر رأسها، أي لتتزين هي لزوجها.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাথে এক যুদ্ধ থেকে ফিরছিলাম। আমি আমার এক ধীরগামী উটের (কাতুফ) পিঠে চড়ে দ্রুত যাওয়ার চেষ্টা করছিলাম। তখন পেছন থেকে একজন আরোহী এসে আমাকে ধরলেন এবং তার সাথে থাকা লাঠি (আনযাহ) দিয়ে আমার উটটিকে খোঁচা দিলেন। ফলে আমার উটটি এমন দ্রুত চলতে শুরু করল যেমন দ্রুতগামী উট তুমি সচরাচর দেখতে পাও না। হঠাৎ দেখি তিনি (খোঁচা দাতা) হলেন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তিনি বললেন, "তোমার এত তাড়াহুড়ো কিসের?" আমি বললাম, আমি সদ্য বিবাহ করেছি। তিনি বললেন, "কুমারী নাকি পূর্বে বিবাহিতা?" আমি বললাম, পূর্বে বিবাহিতা। তিনি বললেন, "তবে কেন এমন যুবতীকে বিয়ে করলে না, যার সাথে তুমি খেলা করবে এবং সেও তোমার সাথে খেলা করবে?"

বর্ণনাকারী বলেন, এরপর যখন আমরা (মদীনার কাছাকাছি) প্রবেশ করতে গেলাম, তিনি বললেন, "তোমরা দেরি করো, যাতে রাতের বেলা—অর্থাৎ ইশার সময়—তোমরা প্রবেশ করতে পারো, যেন এলোমেলো চুলের (স্ত্রী) তার চুল আঁচড়ে পরিপাটি হতে পারে এবং দীর্ঘকাল অনুপস্থিত স্বামীর স্ত্রী (লজ্জাস্থানে) ক্ষৌরকার্য সেরে পরিচ্ছন্ন হতে পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6062)


6062 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: هلك أبي وترك سبع بنات، أو تسع بنات فتزوجت امرأة ثيّبًا، فقال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تزوجت يا جابر؟" فقلتُ: نعم، فقال:"بكرًا أم ثيِّبًا؟" قلتُ: بل ثيِّبًا قال:"فهلا جارية تلاعبها وتلاعبك، وتضاحكها وتضاحكك" قال: فقلت له: إن عبد اللَّه هلك وترك بناتٍ وإني كرهت أن أجيئهن بمثلهن، فتزوجت امرأةً تقوم عليهنّ وتصلِحُهُنّ فقال:"بارك اللَّه لك - أو قال خيرا".

وفي لفظ: فكرهت أن أجمع إليهن جارية خرقاء مثلهنّ، ولكن امرأة تمشطهن وتقوم عليهن.

متفق عليه: رواه البخاري في النفقات (5367)، ومسلم في الرضاع (1466: 56) كلاهما من
طريق حماد بن يزيد، عن عمرو بن دينار، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره. واللفظ الآخر للبخاري في المغازي (4052) من طريق سفيان (هو ابن عيينة) عن عمرو بن دينار، به.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার পিতা মারা গেলেন এবং সাতটি অথবা নয়টি কন্যা রেখে গেলেন। তখন আমি একজন সায়্যিব (বিধবা বা তালাকপ্রাপ্তা) মহিলাকে বিবাহ করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হে জাবির, তুমি কি বিবাহ করেছ?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "কুমারী, নাকি সায়্যিব?" আমি বললাম: বরং সায়্যিব। তিনি বললেন: "তুমি কেন একজন যুবতীকে বিবাহ করলে না, যার সাথে তুমি খেলা করতে এবং সে তোমার সাথে খেলা করতো; তুমি তাকে হাসাতে এবং সে তোমাকে হাসাতো?"

তিনি (জাবির) বলেন: আমি তাঁকে বললাম: আবদুল্লাহ (আমার পিতা) মারা গেছেন এবং কন্যারা রেখে গেছেন। আমি অপছন্দ করেছি যে তাদের কাছে তাদের মতোই (খেলোয়াড় প্রকৃতির) কাউকে নিয়ে আসি। তাই আমি এমন একজন মহিলাকে বিবাহ করেছি, যিনি তাদের দেখাশোনা করবেন এবং তাদের যত্ন নিবেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তোমার জন্য বরকত দিন" - অথবা তিনি 'খাইরান' (কল্যাণ) বললেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমি অপছন্দ করেছি যে তাদের সাথে তাদের মতোই একজন আনাড়ী মেয়েকে একত্রিত করি। বরং (আমি এমন একজন মহিলাকে বিবাহ করেছি) যিনি তাদের চুল আঁচড়ে দেবেন এবং তাদের দেখাশোনা করবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6063)


6063 - عن جابر قال: تزوّجتُ امرأة فقال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: هل تزوجت؟" قلتُ: نعم. قال:"أبكرًا أم ثيِّبًا؟" قلتُ: ثيِّبًا. قال:"فأين أنت من العَذارى ولعابها؟".

قال شعبة: فذكرته لعمرو بن دينار. فقال: قد سمعته من جابر.

وإنما قال:"فهلا جارية تلاعبها وتلاعبك؟".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5080) ومسلم في الرضاع (1466: 55) كلاهما من طريق شعبة، حدّثنا محارب قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه يقول: فذكره. واللفظ لمسلم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক মহিলাকে বিবাহ করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কি বিবাহ করেছ?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "কুমারী, না বিধবা?" আমি বললাম: বিধবা। তিনি বললেন: "তবে কেন একটি কুমারী নয়, যার সাথে তুমি আমোদ-প্রমোদ করতে (এবং সেও তোমার সাথে আমোদ-প্রমোদ করত)?"

শু‘বা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বিষয়টি ‘আমর ইবনু দীনারের কাছে উল্লেখ করলে তিনি বললেন: আমি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে শুনেছি। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "তবে কেন একটি কুমারী নয়, যার সাথে তুমি খেলা করবে এবং সেও তোমার সাথে খেলা করবে?"

(হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী ৫ ০৮০, মুসলিম ১৪৬৬: ৫৫)









আল-জামি` আল-কামিল (6064)


6064 - عن عائشة قالت: قلت: يا رسول اللَّه، أرأيت لو نزلتَ واديًا وفيه شجرة قد أكل منها، ووجدتَ شجرًا لم يؤكل منها، في أيهما كنتَ ترتع بعيرك؟ قال:"في التي لم يرتع منها" يعني أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لم يتزوّج بكرًا غيرها.

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5077) عن إسماعيل بن عبد اللَّه، قال: حدثني أخي، عن سليمان (هو ابن بلال)، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.

وأما ما روي عن عبد الرحمن بن سالم بن عتبة بن عويم بن ساعدة الأنصاري، عن أبيه، عن جده قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"عليكم بالأبكار فإنهن أعذب أفواهًا، وأنتق أرحامًا، وأرضى باليسير" فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (1861) عن إبراهيم بن المنذر الحزامي، قال: حدثنا محمد بن طلحة التيمي، قال حدثني عبد الرحمن بن سالم بن عتبة، عن أبيه، عن جده، فذكره.

وعبد الرحمن بن سالم لم يرو عنه إلا محمد بن طلحة التيمي فهو مجهول، وكذلك لم يرو عن سالم بن عتبة إلا ابنه عبد الرحمن بن سالم فهو مجهول أيضًا.

ورواه البيهقي (7/ 81) من وجه آخر عن الفيض بن وثيق، عن محمد بن طلحة بن الطويل التيمي، أخبرني عبد الرحمن بن سالم بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن جده فذكر الحديث.

قال البيهقي: عبد الرحمن بن عويم ليست له صحبة.

قلت: إنما الصحبة لعتبة بن عويم وأبيه. ويظهر أن بعض الرواة اختصر الإسناد فوهم فيه.

وقوله:"وأنتق أرحامًا" يريد أكثر أولادًا.

وفي معناه أحاديث عن جابر بن عبد اللَّه وعبد اللَّه بن مسعود وكعب بن عجرة، وغيرهم. رواه الطبراني وغيرهم وكلها معلولة كما ذكرها الهيثمي في"المجمع" (4/ 259).

وله شواهد أخرى ولكن لم يثبت منها شيء.
إلا أن يقال: إن كثرة شواهده تدل على أن له أصلًا في تفضيل الأبكار على الثيب للأسباب التي ذُكِرَتْ. واللَّه تعالى أعلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল, আপনি যদি এমন কোনো উপত্যকায় অবতরণ করেন, যেখানে এমন গাছ আছে যা থেকে ইতোমধ্যে খাওয়া হয়েছে, এবং এমন গাছও পান যা থেকে খাওয়া হয়নি, তবে আপনি আপনার উটকে এর মধ্যে কোনটিতে চরাবেন?' তিনি বললেন, 'যেটি থেকে চরাণো হয়নি, তাতে।' (এর অর্থ হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ছাড়া অন্য কোনো কুমারী নারীকে বিবাহ করেননি।)









আল-জামি` আল-কামিল (6065)


6065 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تُنكح المرأة لأربع: لمالها، ولحسبها، وجمالها، ولدينها، فاظفر بذات الدين تَرِبَتْ يداك".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5090)، ومسلم في الرضاع (1466: 53) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد (وهو القطان)، عن عبيد اللَّه، حدثني سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

وفي الحديث مراعاة الكفاءة في النكاح، وأن الدين أولى ما اعتبر منها. فأهل الدين كلهم أكفاء بعضهم لبعض. ولفقهاء الإسلام في الكفاءة كلام كثير.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নারীকে চারটি কারণে বিবাহ করা হয়: তার সম্পদ, তার বংশমর্যাদা, তার সৌন্দর্য এবং তার দ্বীনের (ধর্মপরায়ণতার) কারণে। অতএব, তুমি দ্বীনদার নারীকে লাভ করে সফল হও। তোমার উভয় হাত ধূলিমলিন হোক।"









আল-জামি` আল-কামিল (6066)


6066 - عن جابر قال: تزوجت امرأة في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فلقيت النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"يا جابر، تزوجت؟" قلت: نعم. قال:"بكرٌ أم ثيّب؟" قلتُ: ثيّب. قال:"فهلَّا بكرًا تُلاعبها؟" قلتُ: يا رسول اللَّه، إن لي أخواتٍ فخشيتُ أن تدخل بيني وبينهنّ. قال:"فذاك إذن، إن المرأة تُنكح على دينها، ومالها، وجمالها. فعليك بذات الدّين تربتْ يداك".

صحيح: رواه مسلم في الرضاع (54: 715) عن محمد بن عبد اللَّه بن نُمير، حدثنا أبي، حدثنا عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، أخبرني جابر بن عبد اللَّه، فذكره.

وأصل الحديث في البخاري من وجوه أخرى، إلا قوله:"إن المرأة" إلخ فلم يخرجه. انظر"الجمع بين الصحيحين للإشبيلي" (2/ 439).




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে একজন মহিলাকে বিবাহ করলাম। অতঃপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলে তিনি বললেন: "হে জাবির, তুমি কি বিবাহ করেছ?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "কুমারী না বিধবা/তালাকপ্রাপ্তা (থাইয়্যিব)?" আমি বললাম: বিধবা/তালাকপ্রাপ্তা। তিনি বললেন: "তুমি কি কোনো কুমারীকে বিবাহ করলে না, যার সাথে তুমি খেলাধুলা করতে (আনন্দ উপভোগ করতে)?" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ, আমার কতিপয় বোন রয়েছে, তাই আমি ভয় পেলাম যে সে (অল্পবয়স্ক কুমারী স্ত্রী) আমার ও তাদের মাঝে প্রবেশ করে ঝামেলা তৈরি করবে। তিনি বললেন: "তাহলে তাই হোক। নিশ্চয়ই নারীকে তার দ্বীন, তার সম্পদ ও তার সৌন্দর্যের কারণে বিবাহ করা হয়। সুতরাং তুমি দ্বীনদার মহিলাকে আঁকড়ে ধরো—তোমার হাত ধূলিধূসরিত হোক।"









আল-জামি` আল-কামিল (6067)


6067 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تُنكح المرأة على إحدى خصال ثلاث: تُنكح المرأة على مالها، وتُنكح المرأة على جمالها، وتُنكح المرأة على دينها، فخذ ذات الدين والخلق تَرِبت يمينك".

حسن: رواه أحمد (11765) وأبو يعلى (1012) والبزّار -كشف الأستار (1403) -، وصحّحه ابن حبان (4037) والحاكم (2/ 161) كلهم من طريق محمد بن موسى الفطري المدني، عن سعد ابن إسحاق، عن عمته، عن أبي سعيد الخدري فذكره. واللفظ لأحمد.

وزاد البزار:"وخُلُقها" وقال:"لا نعلم روي أحد في الخلق شيئًا إلا أبو سعيد بهذا الإسناد".

والخُلُق بضم الخاء واللام، ويجوز بسكون اللام معناه السجية.
وإسناده حسن من أجل عمة سعد بن إسحاق وهي زينب كما سماها البزار -وهي ابنة كعب بن عجرة، وكانت تحت أبي سعيد الخدري، وقد روت عن زوجها أبي سعيد الخدري. وروى عنها سعد بن إسحاق بن كعب بن عجرة ابن أخيها، وسليمان بن محمد بن كعب بن عجرة كما قال المزي في الرد على علي بن المديني حيث قال:"لم يرو عنها غير سعد بن إسحاق".

وذكرها ابن حبان في"الثقات".

وصحّحه الحاكم، وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 254)"رجاله ثقات".




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নারীকে তিনটি বৈশিষ্ট্যের মধ্যে কোনো একটির ভিত্তিতে বিবাহ করা হয়: নারীকে তার সম্পদের জন্য বিবাহ করা হয়, নারীকে তার সৌন্দর্যের জন্য বিবাহ করা হয় এবং নারীকে তার দীনের (ধর্মপরায়ণতার) জন্য বিবাহ করা হয়। অতএব, তুমি দীনদার ও চরিত্রবতী নারীকে গ্রহণ করো, তোমার হাত ধূলিধূসরিত হোক।