আল-জামি` আল-কামিল
6121 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تسأل المرأة طلاق أختها لتستفرغ صَحْفَتَها، ولتنْكحْ فإنما لها ما قُدّرَ لها".
متفق عليه: رواه مالك في القدر (7) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاري في القدر (6601) من طريق مالك، به.
ورواه مسلم في النكاح (1408: 38) عن طريق هشام، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يخطب الرّجلُ على خطبة أخيه. . ." الحديث، وفيه:"ولا تسأل المرأة طلاق أختها لتكتفئ صَحْفتها، ولْتنكح فإنما لها ما كتب اللَّه لها".
وفي لفظ من رواية داود بن أبي هند، عن ابن سيرين، به:"فإن اللَّه عز وجل رازقها".
وقوله:"صحْفَتها" الصحفة: إناء من آنية الطعام.
فقه هذا الحديث: قال أبو عمر بن عبد البر في التمهيد (8/ 166):"أنه لا يجوز لامرأة ولا لوليها أن يشترط في عقد نكاحها طلاق غيرها، ولهذا الحديث وشبهه استدل جماعة من العلماء بأن شرط المرأة على الرجل عند عقد نكاحها: أنها إنما تنكحه على أن كل من يتزوجها عليها من النساء فهي طالق، شرط باطل، وعقد نكاحها على ذلك فاسد يفسخ قبل الدخول؛ لأنه شرط فاسد دخل في الصداق المستحل به الفرج ففسد، لأنه طابق النهي.
ومن أهل العلم من يرى الشرط باطلا في ذلك كله، والنكاح ثابت صحيح، وهذا هو الوجه المختار، وعليه أكثر علماء الحجاز، وهم مع ذلك يكرهونها، ويكرهون عقد النكاح عليها، وحجتهم حديث هذا الباب وما كان مثله".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো নারী যেন তার (মুসলিম) বোনের তালাক না চায়—যাতে সে তার থালাটি (খালি করে) নিজের জন্য নিতে পারে। বরং সে যেন বিবাহ করে। কেননা, তার জন্য তাই নির্ধারিত রয়েছে যা তার জন্য তাকদীর করা হয়েছে।"
6122 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن التلقي، وأن يبتاع المهاجر للأعرابيّ، وأن تشترط المرأة طلاق أختها. . . الحديث.
صحيح: رواه البخاري في الشروط (2727) عن محمد بن عرعرة، حدثنا شعبة، عن عدي بن ثابت، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (বাজারের বাইরে) আগত কাফেলাকে অভ্যর্থনা জানাতে নিষেধ করেছেন, এবং কোনো মুহাজির যেন কোনো বেদুইনের পক্ষে বিক্রয় না করে, এবং কোনো নারী যেন তার (অন্য) বোনের তালাক শর্ত না করে। ...
6123 - عن عائشة قالت: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم دخل عليّ مسرورًا تبرق أسارير وجهه فقال:"ألم تري أن مجزّزًا نظر آنفا إلى زيد بن حارثة وأسامة بن زيد فقال: إن هذه الأقدام بعضها من بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6770) ومسلم في الرضاع (1459) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
قال أبو داود صاحب السنن (2268):"سمعت أحمد بن صالح يقول: كان أسامة أسود شديد السواد مثل الفار، وكان زيد (بن حارثة) أبيض مثل الطعن".
رواه أبو داود (2269) والنسائي (3489) وأحمد (19339) وصحّحه الحاكم (2/ 207) وعنه البيهقي (10/ 267) كلهم من الأجلح، عن الشعبي، عن عبد اللَّه بن الخليل، عن زيد بن أرقم فذكره.
والأجلح هو ابن عبد اللَّه بن حُجيّة في حديثه لين غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.
وقد خالف سلمة بن كهيل أنه قال: سمعت الشعبي يحدث عن أبي الخليل أو ابن أبي الخليل أن ثلاثة نفر اشتركوا في طهر فذكر نحوه. ولم يذكر زيد بن أرقم، ولم يرفعه.
رواه أبو داود (2271) والنسائي (3492) والبيهقي (10/ 267) كلهم من هذا الوجه.
قال النسائي بعد أن ذكر المرفوع من عدة طرق في الكبرى (3/ 380):"هذه الأحاديث كلها مضطربة الأسانيد، وحديث سلمة بن كهيل أثبتهم، وحديثه أولى بالصواب".
وسأل عبد الرحمن أباه عن حديث الأجلح عن الشعبي فقال:"قد اختلفوا في هذا الحديث فاضطربوا، والصحيح حديث سلمة بن كهيل""العلل" (1/ 402) وكذا الدارقطني في العلل وكذا أعله أيضًا المنذري في مختصر أبي داود بالأجلح والبيهقي وغيرهم ونقل عن ابن عدي قول البخاري في عبد اللَّه بن الخليل الحضرمي عن زيد بن أرقم عن النبي صلى الله عليه وسلم في القرعة لم يتابع عليه.
ثم قال البيهقي: وأصح ما روي في هذا الباب حديث سلمة بن كهيل عن الشعبي عن أبي الخليل أو ابن الخليل، عن علي موقوفا. انتهى.
وقد قيل للإمام أحمد في حديث زيد هذا؟ فقال:"حديث القافة أحب إليّ وقد تكلم بعضهم في إسناده" ذكره الخطابي في معالمه.
وقال الحافظ ابن القيم: ذهب أحمد ومالك إلى تقديم حديث القافة على القرعة. ولم يقل أبو حنيفة بواحد من الحديثين، لا بالقرعة ولا بالقافة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশ করলেন, তিনি অত্যন্ত আনন্দিত ছিলেন এবং তাঁর মুখমণ্ডলের রেখাগুলো উজ্জ্বল হয়ে উঠছিল (বা, তাঁর চেহারায় খুশির আভা ঝলমল করছিল)। অতঃপর তিনি বললেন: "তুমি কি দেখনি যে, মুজায্যিজ কিছুক্ষণ আগে যায়দ ইবনু হারিসা এবং উসামা ইবনু যায়দ-এর দিকে তাকিয়েছিল? অতঃপর সে বলল: 'এই পাগুলো একটি আরেকটির সাথে সম্পর্কিত (বা, এই পাগুলো একে অপরের থেকে এসেছে)?"
(সহমত, হাদীসটি বুখারী (৬৭৭০) ও মুসলিম (১৪৫৯) বর্ণনা করেছেন।
সুনান-এর লেখক আবু দাঊদ (২২৬৮) বলেন: আমি আহ্মাদ ইবনু সালিহকে বলতে শুনেছি: উসামা ছিলেন ইঁদুরের মতো কালো, অতিশয় কালো। আর যায়দ (ইবনু হারিসা) ছিলেন ছুরিকাঘাতের স্থানের মতো (রক্তিম আভার) সাদা।)
6124 - عن * *
৬১২৪ - এর সূত্রে বর্ণিত * *
6125 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يخطب أحدكم على خِطبة أخيه".
وزاد في رواية:"حتى يترك الخاطب قبله أو يأذن له الخاطب".
متفق عليه: رواه مالك في النكاح (2) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره. ورواه البخاري في النكاح (5142) من طريق ابن جريج والزيادة المذكورة له. ومسلم في النكاح (1412) من طريق الليث (هو ابن سعد)، وعبد اللَّه (هو ابن عمر) وأيوب أربعتهم عن نافع، به، نحوه وزاد في أوله النهي عن بيع الرجل على بيع أخيه.
আবদুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন তার ভাইয়ের প্রস্তাবের (খিত্ববার) উপর প্রস্তাব না দেয়।"
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "যতক্ষণ না প্রথম প্রস্তাবকারী এর পূর্বেই তা পরিত্যাগ করে অথবা সেই প্রস্তাবকারী তাকে অনুমতি দেয়।"
6126 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يخطب أحدكم على خطبة أخيه" وزاد في رواية:"حتى ينكح أو يترك".
متفق عليه: رواه مالك في النكاح (1) عن محمد بن يحيى بن حبّان، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه البخاري في النكاح (5143) من طريق الليث، عن جعفر بن ربيعة، عن الأعرج به، وأوله:"إياكم والظن فإن الظنّ أكذب الحديث. . ." الحديث مع الزيادة المذكورة. ورواه مسلم في النكاح (1413) من أوجه عن أبي هريرة مختصرًا ومطولًا.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন তার ভাইয়ের বিবাহের প্রস্তাবের উপর প্রস্তাব না দেয়।" এবং এক বর্ণনায় এর সাথে যোগ করা হয়েছে: "যতক্ষণ না সে (প্রথম প্রস্তাবকারী) বিবাহ করে নেয় অথবা সে (প্রস্তাবটি) ছেড়ে দেয়।"
6127 - عن أبي بكر بن أبي الجهم بن صُخير العدوي قال: سمعت فاطمة بنت قيس تقول: إن زوجها طلّقها ثلاثا، فلم يجعل لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سكنى ولا نفقة قالت: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا حللت فآذنيني" فآذنته. فخطبها معاوية وأبو جهم وأسامة ابن زيد. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أما معاوية فرجل تَرب لا مال له، وأما أبو جهم فرجل ضراب للنساء، ولكن أسامة بن زيد".
فقالت بيدها هكذا: أسامة! أسامة! فقال لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"طاعة اللَّه وطاعة رسوله خير لك" قالت: فتزوجته فاغتبطتُ.
صحيح: رواه مسلم في الطلاق (47: 1480) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا وكيع، حدثنا سليمان، عن أبي بكر بن أبي الجهم فذكره.
وقوله: ترب يعني الفقير، لأنه من شدة فقره يكون ملصقا بالتراب.
قال مالك:"إنما معنى كراهية أن يخطب الرجل على خطبة أخيه إذا خطب الرجل المرأة،
فرضيتْ به، فليس لأحد أن يخطب على خطبته".
وقال الشافعي:"أن معنى حديث الباب إذا خطب الرجلُ المرأة فرضيت به، وركنت إليه، فليس لأحد أن يخطب على خطبته، فإذا لم يعلم برضاها ولا ركونها فلا بأس أن يخطبها، والحجة فيه قصة فاطمة بنت قيس فإنها لم تخبره برضاها بواحد منهما، ولو أخبرته بذلك لم يشر عليها بغير من اختارت" حكاه الترمذي (1134).
قال ابن عباس: {فِيمَا عَرَّضْتُمْ} يقول:"إني أريد التزويج، ولَوَدِدْتُ أنه يُيَسَّر لي امرأة صالحة".
صحيح: رواه البخاري في النكاح (5124) قال: قال لي طلق (هو ابن غنّام)، حدثنا زائدة، عن منصور، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.
وقال القاسم بن محمد بن أبي بكر في تفسير هذا التعريض في هذه الآية:"أن يقول الرّجل للمرأة وهي في عدّتها من وفاة زوجها:"إنك عليّ لكريمة، وإني فيك لراغبٌ، وإن اللَّه لسائق إليك خيرًا ورزْقًا، ونحو هذا من القول".
رواه مالك في النكاح (3) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، فذكره.
وعلّقه البخاري في الموضع السابق إثر قول ابن عباس.
ফাতেমা বিনতে কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তার স্বামী তাকে তিন তালাক দিয়েছিলেন। ফলে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার জন্য বাসস্থান বা খোরপোশের (نفقة) কোনো ব্যবস্থা করেননি।
তিনি (ফাতেমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বলেছিলেন: "যখন তোমার ইদ্দত শেষ হবে, তখন আমাকে জানাবে।" আমি তাঁকে জানালাম। অতঃপর মু'আবিয়া, আবূ জাহম এবং উসামা ইবনে যায়েদ তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন।
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "মু'আবিয়ার বিষয়টি হলো, সে হলো 'তারাব' (দরিদ্র) ব্যক্তি, তার কোনো সম্পদ নেই। আর আবূ জাহম হলো এমন ব্যক্তি যে মহিলাদের উপর চাবুক/মারধরকারী। বরং (তুমি বিয়ে করো) উসামা ইবনে যায়েদকে।"
তিনি (ফাতেমা) হাত দিয়ে এভাবে ইশারা করলেন (যেন আপত্তি জানাচ্ছেন): "উসামা! উসামা!" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "আল্লাহর আনুগত্য ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য তোমার জন্য উত্তম।" তিনি (ফাতেমা) বললেন: অতঃপর আমি তাকে (উসামাকে) বিবাহ করলাম এবং আমি তাতে সুখী হলাম।
আর তাঁর বাণী: 'তারাব' (ترب) অর্থ দরিদ্র, কারণ সে চরম দারিদ্র্যের কারণে মাটির সাথে লেগে থাকে।
ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "কারো বিবাহের প্রস্তাবের উপর অন্য কারো প্রস্তাব দেওয়ার অপছন্দ হওয়ার অর্থ হলো, যখন কোনো ব্যক্তি কোনো মহিলাকে প্রস্তাব দেয় এবং সে তাতে সম্মত হয়, তখন তার প্রস্তাবের উপর অন্য কারো প্রস্তাব দেওয়া বৈধ নয়।"
ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "এই হাদীসের অর্থ হলো, যখন কোনো ব্যক্তি মহিলাকে বিবাহের প্রস্তাব দেয় এবং সে তাতে সম্মত হয় ও তার প্রতি ঝুঁকে পড়ে, তখন তার প্রস্তাবের উপর অন্য কারো প্রস্তাব দেওয়া বৈধ নয়। তবে যদি তার সম্মতি বা প্রবণতা সম্পর্কে জানা না যায়, তাহলে তাকে প্রস্তাব দেওয়াতে কোনো সমস্যা নেই। এর প্রমাণ হলো ফাতেমা বিনতে কায়সের ঘটনা, কারণ তিনি তাদের কারো প্রতি তার সম্মতি প্রকাশ করেননি। যদি তিনি তা করতেন, তবে তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তার নির্বাচিত ব্যক্তি ছাড়া অন্য কারো সাথে পরামর্শ দিতেন না।" (তিরমিযী ১১৪৪ এ এটি বর্ণিত হয়েছে।)
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর বাণী: {তোমরা যা ইংগিত করবে/ইঙ্গিতে প্রকাশ করবে} এর তাফসীরে বলেন: (অর্থাৎ ইদ্দতে থাকা মহিলার কাছে ইঙ্গিতে বলা যে,) "আমি বিবাহ করতে চাই, এবং আমি পছন্দ করি যে আমার জন্য একজন নেককার স্ত্রী সহজলভ্য হোক।" (বুখারী, ৫১২৪)
আর কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আবূ বকর এই আয়াতে ইঙ্গিতে প্রস্তাব দেওয়ার তাফসীরে বলেন: কোনো পুরুষ তার ইদ্দতে থাকা স্ত্রীকে (যার স্বামী মারা গেছেন) বলবে: "তুমি আমার কাছে অত্যন্ত সম্মানিত, এবং আমি তোমার প্রতি আগ্রহী, আর আল্লাহ অবশ্যই তোমার দিকে কল্যাণ ও রিযিক নিয়ে আসবেন," অথবা এ ধরনের অন্য কোনো কথা। (মালিক, নিকাহ ৩)
(বুখারী এই কথাটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্যের পর উল্লেখ করেছেন।)
6128 - عن أبي سلمة، أن فاطمة بنت قيس -أخت الضحاك بن قيس- أخْبرته أنّ أبا حفص بن المغيرة المخزومي طلّقها ثلاثًا. ثم انطلق إلى اليمن. فقال لها أهله: ليس لك علينا نفقة فانطلق خالد بن الوليد في نفر، فأتوا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في بيت ميمونة. فقالوا: إن أبا حفص طلّق امرأته ثلاثًا، فهل لها من نفقة؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليست لها نفقة، وعليها العدة" وأرسل إليها: أن لا تسبقيني بنفسك. . ." الحديث.
وفي لفظ:"لا تفوتينا بنفْسك".
صحيح: رواه مسلم في الطلاق (38: 1480) عن محمد بن رافع، حدّثنا حسين بن محمد، حدّثنا شيبان، عن يحيى (وهو ابن كثير)، أخبرني أبو سلمة، فذكره.
واللفظ الآخر من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، به.
وهذا اللفظ عزاه الحافظ في الفتح (9/ 179) لأبي داود وحده وفيه قصور.
وقوله:"لا تسبقيني" فيه التعريض بالخِطبة.
فقه الحديث: قال الحافظ ابن حجر: اتفق العلماء على أن المرأة بهذا الحكم من مات عنها زوجها، واختلفوا في المعتدة من الطلاق البائن، وكذا من وقف نكاحها، وأما الرجعية فقال الشافعي:"لا يجوز لأحد أن يعرض لها بالخطبة فيها".
قال الحافظ:"والحاصل أن التصريح بالخطبة حرام لجميع المعتدات، والتعريض مباح للأولى، حرام في الأخيرة، مختلف فيه في البائن" الفتح (9/ 179).
ফাতেমা বিনতে কায়েস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি দাহহাক ইবনু কায়েসের বোন, তিনি আবূ সালামাকে জানিয়েছিলেন যে, আবূ হাফস ইবনু মুগীরাহ মাখযূমী তাকে তিন তালাক দেন। এরপর তিনি ইয়ামেনে চলে যান। তখন তার পরিবার তাকে বলল: আমাদের পক্ষ থেকে তোমার জন্য কোনো ভরণপোষণ (নফাকা) নেই। অতঃপর খালিদ ইবনু ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদল লোকের সাথে রওনা হলেন এবং মায়মূনাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তারা বললেন: আবূ হাফস তার স্ত্রীকে তিন তালাক দিয়েছেন, তার জন্য কি কোনো ভরণপোষণ আছে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য কোনো ভরণপোষণ নেই, তবে তাকে ইদ্দত পালন করতে হবে।" এবং তিনি তার নিকট এই বার্তা পাঠালেন যে, তুমি যেন নিজের ব্যাপারে আমার আগে সিদ্ধান্ত নিয়ে না ফেলো।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তুমি যেন নিজের ব্যাপারে আমাদেরকে হারিয়ে না দাও।"
6129 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كان رسول صلى الله عليه وسلم يُعلِّمنا الاستخارة في الأمور كلها كما يعلمنا السورةَ من القرآن يقول:"إذا همَّ أحدُكم بالأمر، فليركعْ ركعتين من غير الفريضة ثم ليقل: اللهم إني أستخيرُك بعلمك، وأستقدرك بقدرتك، وأسألك من
فضلك العظيم، فإنك تقدر، ولا أقدر، وتعلم، ولا أعلم، وأنت علام الغيوب، اللهم إن كنتَ تعلم أن هذا الأمر خيرٌ لي في ديني ومعاشي وعاقبة أمري -أو قال عاجل أمري وآجله- فاقدُرْه لي ويسِّرْه لي ثم بارك لي فيه، وإن كنتَ تعلم أن هذا الأمر شرٌّ لي في ديني، ومعاشي، وعاقبة أمري -أو قال في عاجل أمري وآجله- فاصرفْه عني، واصرفْني عنه، واقدُرْ لي الخيرَ حيث كان، ثم أرضِني، قال: ويسمِّي حاجته".
صحيح: رواه البخاري في التهجد (1162) عن قتيبة قال: حدثنا عبد الرحمن بن أبي الموالِ، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সকল বিষয়ে ইস্তেখারা (কল্যাণ কামনার দু’আ) শিক্ষা দিতেন, যেভাবে তিনি আমাদেরকে কুরআনের সূরা শিক্ষা দিতেন। তিনি বলতেন: "যখন তোমাদের কেউ কোনো কাজের ইচ্ছা করে, তখন সে যেন ফরয (নামাজ) ছাড়া দু'রাকাত নামাজ আদায় করে, অতঃপর বলে: 'হে আল্লাহ! আমি তোমার জ্ঞানের মাধ্যমে তোমার কাছে কল্যাণ কামনা করছি, তোমার ক্ষমতার মাধ্যমে তোমার কাছে শক্তি কামনা করছি, এবং তোমার মহান অনুগ্রহ প্রার্থনা করছি। কারণ তুমিই ক্ষমতা রাখো, আমি ক্ষমতা রাখি না; তুমিই জানো, আমি জানি না; এবং তুমিই গায়েবের (অদৃশ্য বিষয়ের) মহাজ্ঞানী। হে আল্লাহ! তুমি যদি জানো যে এই কাজটি আমার জন্য আমার দ্বীন, আমার জীবিকা ও আমার কাজের শেষ পরিণতির দিক থেকে— অথবা তিনি (রাবী) বলেছেন, আমার বর্তমান ও ভবিষ্যতের দিক থেকে— কল্যাণকর, তবে এটিকে আমার জন্য নির্ধারিত করে দাও, আমার জন্য সহজ করে দাও এবং এরপর এতে আমার জন্য বরকত দাও। আর যদি তুমি জানো যে এই কাজটি আমার দ্বীন, আমার জীবিকা এবং আমার কাজের শেষ পরিণতির দিক থেকে— অথবা তিনি (রাবী) বলেছেন, আমার বর্তমান ও ভবিষ্যতের দিক থেকে— অকল্যাণকর, তবে তা আমার কাছ থেকে সরিয়ে দাও এবং আমাকেও তা থেকে ফিরিয়ে নাও। আর যেখানেই কল্যাণ থাকুক, আমার জন্য তা নির্ধারণ করে দাও, অতঃপর আমাকে (তাতে) সন্তুষ্ট রাখো।' তিনি (জাবির) বলেন, আর সে সময় যেন সে তার প্রয়োজনের নাম উল্লেখ করে।"
6130 - عن أيوب بن خالد بن أبي أيوب الأنصاري، حدثه عن أبيه، عن جده أبي أيوب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"اكتم الخطبة، ثم توضأ فأحسن وضوءك، ثم صلِّ ما كتب اللَّه لك، ثم احمد ربّك، ومجّده ثم قل: اللهمّ إنك تقدر ولا أقدر، وتعلم ولا أعلم، وأنت علّام الغيوب، فإن رأيت في فلانة -تسميها باسمها- خيرًا لي في ديني ودنياي وآخرتي فاقدُرها لي، وإن كان غيرُها خيرًا لي منها في ديني ودنياي وآخرتي فاقض لي ذلك".
حسن: رواه أحمد (23597) وابن خزيمة (1220) وابن حبان (4040) والحاكم (1/ 314) والبيهقي (7/ 147 - 148) وابن المنذر في الأوسط (8/ 233) كلهم من طريق ابن وهب، أخبرني حيوة، أن الوليد بن الوليد أخبره، أن أيوب بن خالد بن أبي أيوب حدثه بإسناده ومعناه.
قال الحاكم:"هذه سنة صلاة الاستخارة عزيزة تفرد بها أهل مصر، ورواته عن آخرهم ثقات، ولم يخرجاه".
قلت: فيه أيوب بن خالد بن أبي أيوب الأنصاري هذا هو المعروف، ولكن أبو أيوب الصحابي المشهور ليس هو جده، بل هو جده لأمه عمرة، وإنما جده هو صفوان بن أوس بن جابر الأنصاري. ولذا ترجمه المزي بقوله: أيوب بن خالد بن صفوان بن أوس بن جابر الأنصاري المدني. وأم خالد بن صفوان: عميرة بنت أبي أيوب الأنصاري.
وإسناده حسن من أجل أيوب بن خالد وهو من رجال مسلم حسن الحديث في الشواهد، وأبوه من رجال التعجيل، ووثقه ابن حبان، ولم يجرّحه أحدٌ وهو من التابعين، ولحديثه أصل ثابت كما سبق.
وفي الباب أحاديث أخرى انظر: كتاب الاستخارة.
আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: বিবাহের প্রস্তাব গোপন রাখবে। এরপর তুমি উত্তমরূপে উযূ (ওযু) করো, অতঃপর আল্লাহ তোমার জন্য যতটুকু (নফল নামায) নির্ধারণ করেছেন, তা আদায় করো। এরপর তোমার রবের প্রশংসা করো এবং তাঁর মহিমা ঘোষণা করো, অতঃপর বলো: হে আল্লাহ! আপনিই ক্ষমতা রাখেন, আমার কোনো ক্ষমতা নেই। আপনিই জানেন, আর আমি জানি না। আপনিই সকল অদৃশ্য বিষয়ে মহাজ্ঞানী। যদি আপনি (অমুক) মহিলার মধ্যে - (যার নাম উল্লেখ করবে) - আমার দ্বীন, দুনিয়া এবং আখিরাতের জন্য কল্যাণ দেখেন, তাহলে তাকে আমার জন্য নির্ধারিত করে দিন। আর যদি তার চেয়ে অন্য কেউ আমার দ্বীন, দুনিয়া এবং আখিরাতের জন্য উত্তম হয়, তবে আপনি সেটিই আমার জন্য ফয়সালা করে দিন।
6131 - عن سهيل بن سعد: أن امرأة جاءت إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول اللَّه، جئتُ لأهب لك نفسي، فنظر إليها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فصعّد النظر إليها وصوّبه، ثم طأطأ رأسه. فلما رأت المرأة أنه لم يقض فيها شيئًا جلستْ. . . . الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5126) ومسلم في النكاح (76: 1425) كلاهما عن قتيبة ابن سعيد الثقفي، حدّثنا يعقوب (يعني ابن عبد الرحمن القاريّ)، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি আমার নিজেকে আপনার নিকট হেবা (উপহার) করার জন্য এসেছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে তাকালেন এবং উপরে-নিচে দৃষ্টি দিলেন, অতঃপর তিনি মাথা নিচু করলেন। যখন মহিলাটি দেখলেন যে তিনি তার বিষয়ে কোনো ফায়সালা করলেন না, তখন তিনি বসে পড়লেন। ... (হাদীসের বাকি অংশ)।
6132 - عن أبي هريرة قال: كنت عند النبي صلى الله عليه وسلم فأتاه رجل فأخبره أنه تزوّج امرأة من الأنصار. فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنظرت إليها؟" قال: لا، قال:"فاذهب فانظر إليها، فإن في أعين الأنصار شيئًا".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1424: 74) عن ابن أبي عمر، حدّثنا سفيان، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
وفي رواية الحميدي، عن سفيان: أن رجلًا أراد أن يتزوج امرأة من الأنصار فذكر بقية الحديث. رواه الطحاوي في شرح معاني الآثار (3/ 14).
قوله:"في أعين الأنصار شيئًا" قيل المراد بذلك صغر، وقيل زرقة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে জানায় যে, সে আনসারী গোত্রের একজন নারীকে বিবাহ করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কি তাকে দেখেছ?" লোকটি বলল, না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, তাকে দেখে নাও। কারণ আনসারদের চোখে কিছু একটা আছে।"
6133 - عن أبي حُميد أو أبي حميدة قال: -وقد رأى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا خطب أحدكم امرأة فلا جناح عليه أن ينظر إليها، إذا كان إنما ينظر لخطبة، وإن كانت لا تعلم".
صحيح: رواه أحمد (23603) عن أبي كامل، حدثنا زهير، حدثنا عبد اللَّه بن عيسى، حدثني موسى بن عبد اللَّه بن يزيد، عن أبي حُميد أو أبي حميدة فذكره.
ورواه الطحاوي في شرحه (3/ 14) والطبراني في الأوسط (1/ 498) كلاهما من طريق زهير، والبزار (9/ 165) من حديث قيس، كلاهما عن عبد اللَّه بن عيسى، عن أبي حميد -بلا شك- مثله. وإسناده صحيح.
قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 276): رواه أحمد إلا أن زهيرًا شك فقال: عن أبي حميد أو أبي حميدة، والبزار من غير شك، والطبراني في الأوسط والكبير، ورجال أحمد رجال الصحيح.
قلت: يبدو أن الشك ليس من زهير، فقد يكون من أبي كامل، لأن الطحاوي والطبراني في الأوسط روياه أيضًا عن زهير من غير شك.
وأبو حميد هذا ليس هو أبو حميد الساعدي الصحابي المشهور وإن كان الإمام أحمد أخرج هذا الحديث ضمن أحاديث أبي حميد الساعدي. وقد ذكره البلاذري هذا في الصحابة. ولم يذكره ابن عبد البر في"الاستيعاب" فاستدركهـ ابن فتحون كما في الإصابة. وفي نص الحديث دليل على أن له صحبة.
আবু হুমাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যখন কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেয়, তখন তাকে দেখতে তার কোনো দোষ হবে না, যদি সে কেবল বিবাহের প্রস্তাবের উদ্দেশ্যেই দেখে, যদিও সে (নারী) তা জানতে না পারে।"
6134 - عن المغيرة بن شعبة، قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت له امرأة أخْطُبُها، فقال:
"اذهب فانظر إليها، فإنه أجدر أن يُؤْدم بينكما". قال: فأتيت امرأة من الأنصار، فخطبتها إلى أبويها، وأخبرتهما بقول رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فكأنهما كرها ذلك، قال: فسمعت ذلك المرأة وهي في خِدرها، فقالت: إنْ كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أمَرَكَ أن تنظر، فانظر، وإلا إني أنشُدُك. كأنهما عظّمت ذلك عليه. قال: فنظرتُ إليها: فتزوجتُها. فذكر من موافقتها.
صحيح: رواه الترمذي (1087) والنسائي (3235) وابن ماجه (1866) وأحمد (18137) واللفظ له، والبيهقي (7/ 84 - 85) وابن الجارود (675) كلهم من حديث بكر بن عبد اللَّه المزني، عن المغيرة بن شعبة فذكره. واختصر البعض. وزاد البيهقي: فما وقعت عندي امرأة بمنزلتها، ولقد تزوجت سبعين، أو بضع وسبعين امرأة.
وإسناده صحيح وقد اختلف في سماع بكر بن عبد اللَّه المزني من المغيرة بن شعبة. فقال ابن معين:"بكر لم يسمع من المغيرة".
ولكن ذهب الدارقطني في"العلل" (7/ 139) إلى أنه سمع منه، فقد قيل له: هل سمع من المغيرة؟ فقال: نعم.
وأما ما رواه عبد الرزاق في مصنفه (10335) ومن طريقه ابن ماجه (1865) وابن حبان (4043) والحاكم (2/ 165) والبيهقي (7/ 84) وابن الجارود (676) والدارقطني (3/ 253) عن معمر، عن ثابت، عن أنس، أن المغيرة بن شعبة خطب امرأة فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"اذهب فانظر إليها فإنه أدوم لما بينكما" فهو غلط، غلط فيه معمر فإنه ضعيف في ثابت كما قال ابن معين، إنما الصحيح ثابت، عن بكر مرسلًا كما قال الدارقطني، ورواه عبد الرزاق أيضًا عن سفيان الثوري، عن حميد، عن أنس فقال الدارقطني:"إنما رواه حميد، عن بكر. ومدار الحديث على بكر بن عبد اللَّه المزني" انتهى كلام الدارقطني.
وقال في سننه:"الصواب عن ثابت، عن بكر المزني. ثم رواه عن ابن مخلد، نا الجرجاني، نا عبد الرزاق، أنا معمر، عن ثابت، عن بكر المزني أن المغيرة بن شعبة قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فذكر نحوه".
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁকে জানালাম যে আমি একজন নারীকে বিবাহ করার প্রস্তাব দিতে চাই। তখন তিনি বললেন: "তুমি যাও এবং তাকে দেখে নাও। কারণ, এটা তোমাদের দুজনের মাঝে সদ্ভাব ও স্থায়ী সম্পর্ক সৃষ্টিতে অধিক সহায়ক হবে।" তিনি বলেন, অতঃপর আমি আনসার গোত্রের একজন নারীর নিকট আসলাম এবং তার বাবা-মায়ের নিকট তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলাম। আমি তাদেরকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বক্তব্য জানালাম। মনে হচ্ছিল তারা (বাবা-মা) সেটা অপছন্দ করলেন। তিনি বলেন, সেই সময় পর্দার আড়ালে থাকা মেয়েটি তাদের কথা শুনতে পেল। সে বলল: "যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে দেখতে আদেশ করে থাকেন, তবে দেখে নিন। অন্যথায় আমি আপনাকে আল্লাহর দোহাই দিচ্ছি।" মনে হচ্ছিল তারা (বাবা-মা) ব্যাপারটিকে তার জন্য বিরাট মনে করছিলেন। তিনি বলেন, অতঃপর আমি তাকে দেখলাম এবং তাকে বিবাহ করলাম। এরপর তিনি তার (স্ত্রীর) ভালো সম্পর্কের কথা উল্লেখ করেন।
6135 - عن جابر بن عبد اللَّه الأنصاري قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا خطب أحدكم المرأة، فقَدَرَ أن يرى منها بعض ما يدعوه إليها فليفعل".
حسن: رواه الإمام أحمد (14869) عن يعقوب، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني داود بن الحصين مولى عمرو بن عثمان، عن واقد بن عمرو بن سعد بن معاذ، عن جابر فذكره.
وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن اسحاق، وواقد بن عمرو بن سعد بن معاذ الأنصاري"ثقة".
اختلف على محمد بن إسحاق، فرواه يعقوب بن إبراهيم، عن أبيه إبراهيم عنه فقال فيه: واقد
ابن عمرو بن سعد بن معاذ، وكذلك رواه الحاكم (2/ 165) من طريق عمر بن علي المقدمي، والطحاوي في شرحه (3/ 14) والبيهقي (7/ 84) من طريق أحمد بن خالد الوهبي، كلاهما عن محمد بن إسحاق، عن داود بن الحصين، عن واقد بن عمرو بن سعد بن معاذ. وهذا هو الصواب.
ولكن رواه أبو داود (2082) من طريق عبد الواحد بن زياد، ثنا محمد بن إسحاق عن داود بن حصين، عن واقد بن عبد الرحمن يعني - ابن سعد بن معاذ.
واقد بن عبد الرحمن بن سعد لا تعرف حاله كما قال ابن القطان الفاسي في الوهم والإيهام (4/ 429) وقال:"إنما هو واقد بن عمرو بن سعد بن معاذ أبو عبد اللَّه الأنصاري الأشهل. وهو مدني ثقة قاله أبو زرعة".
إذا فالوهم من عبد الواحد بن زياد، وهو وإن كان ثقة، فرواية الجماعة أولى، وفيهم إبراهيم ابن سعد بن إبراهيم الزهري ثقة حجة.
قال جابر: فلقد خطبت امرأة من بني سلمة. فكنت أتخبّأ -أي أختفي- في أصول النخل، حتى رأيت منها بعض ما يُعجبني فخطبتُها، فتزوجتها.
وفي الباب ما روي عن محمد بن مسلمة قال: خطبتُ امرأة، فجعلت أتخبأ لها، حتى نظرت إليها في نخل لها. فقيل له: أتفعل هذا، وأنت صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ ! فقال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا ألقى اللَّه في قلب امرئ خطبة امرأة فلا بأس أن ينظر إليها".
رواه ابن ماجه (1864) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا حفص بن غياث، عن حجاج، عن محمد بن سليمان، عن عمه، سهل بن أبي حثْمة، عن محمد بن مسلمة قال: فذكر الحديث.
وسهل بن أبي حثمة هو ابن ساعدة الخزرجي المدني صحابي صغير ومحمد بن سليمان هو ابن أبي حثمة"مجهول".
والحجاج هو ابن أرطاة وهو ضعيف، وفيه كلام معروف، وقد اختلف عليه.
فرواه حفص بن غياث هكذا، وكذلك رواه محمد بن جعفر ويحيى بن زكريا بن أبي زائدة عند الإمام أحمد (17976) وفيه قال سهل بن أبي حثمة: رأيت محمد بن مسلمة يطارد امرأة من الأنصار يريد أن ينظر إليها.
قال ابن أبي زائدة: هي ثُبيتة ابنة الضحاك.
فقلت: أنت صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وتفعل هذا؟ ! قال: فذكر الحديث.
وكذلك رواه عباد بن العوام عند أحمد أيضًا (17977) ويزيد بن هارون عنده أيضًا (16028) وكذلك رواه سعيد بن منصور في سننه (519) عن أبي شهاب عن الحجاج به مثله.
ورواه الطبراني في الكبير (19/ 225) من طريق عبد الواحد بن زياد، عن حجاج إلا أنه قال فيه: عن محمد بن سليمان بن أبي حثمة، عن أبيه -يعني سليمان بن أبي حثمة-.
ورواه الطيالسي (1282) من طريق حماد بن سلمة، عن حجاج بن أرطاة، عن محمد بن سهل ابن حنيف، عن أبيه قال: رأيت محمد بن مسلمة فذكر الحديث. وكذا رواه الطبراني أيضًا (19/ 226) وقال: هكذا رواه حماد بن سلمة. وخالف الناس فيه، وقد اختلف الرواة عن الحجاج بن أرطاة في هذا الحديث، والصواب عندي -واللَّه أعلم- ما رواه حفص بن غياث ويزيد بن هارون، عن الحجاج بن أرطاة، عن محمد بن سليمان بن أبي طلحة، عن عمه سهل بن أبي حثمة، عن محمد بن مسلمة. انتهى.
ورواه ابن حبان (4042) عن أبي يعلى، حدثنا أبو خيثمة قال: حدثنا محمد بن خازم، عن سهل بن محمد بن أبي حثمة، عن عمه سليمان بن أبي حثمة قال: رأيت محمد بن مسلمة يطارد ابنة الضحاك فذكره.
فأسقط من الإسناد"الحجاج بن أرطاة".
ومن طريق محمد بن خازم رواه أيضًا الطبراني في الكبير (19/ 225 - 226) فذكر"الحجاج" بينه وبين سهل بن محمد بن أبي حثمة.
فوقع فيه سقط وقلب في الإسناد. ولا يوجد من الرواة من اسمه سهل بن محمد بن أبي حثمة.
وقد أشار إليه الدارقطني في"العلل" (14/ 13) فقال: خالفهم أبو معاوية الضرير فقلّب إسناده، ولم يضبطه فقال:"عن الحجاج، عن سهل بن محمد بن أبي حثمة، عن عمه سليمان بن أبي حثمة، عن محمد بن مسلمة. ورواه حماد بن سلمة عن الحجاج عن محمد بن سهل بن حنيف، عن أبيه، عن محمد بن مسلمة ووهم أيضًا".
ثم قال:"والصحيح قول عبد الواحد بن زياد ومن تابعه عن الحجاج".
قلت: صحّح رواية عبد الواحد بن زياد. وقد رأيت أنه أخطأ فيه في قوله: عن محمد بن سليمان بن أبي حثمة عن أبيه - يعني سليمان بن أبي حثمة.
والصحيح ما رواه حفص بن غياث ومحمد بن جعفر ويحيى بن أبي زكريا ومن تابعهم. إلا أن يقال: لعل عبد الواحد بن زياد روي من وجهين عن أبيه سليمان وعن عمه سهل بن أبي حثمة. واللَّه تعالى أعلم.
والإسناد ضعيف على كل حال، لأن مداره على الحجاج بن أرطاة مع الاضطراب في الإسناد وله طرق أخرى أضعف من هذا.
وأما اسم المرأة التي كان يطاردها محمد بن مسلمة فقيل: إنها نُبيتة -بالنون. وقيل: بُثينة- بالباء. وكلاهما وهم، والصواب ثُبيتة كما قال ابن أبي زائدة. وهذا الذي رجحه الدارقطني وقال: وهي بنت الضحاك، أخت أبي جَبيرة بن الضحاك، وأخت ثابت بن الضحاك. وقول حماد بن سلمة:"بنت الضحاك بن قيس وهم".
قلت وهو كما قال، فإنه الضحاك بن خليفة بن ثعلبة الأشهلي الأنصاري. صحابي شهد غزوة بني النضير، وليست له رواية.
فقه الحديث: أحاديث الباب تدل على جواز النظر إلى المخطوبة وهو مما لا خلاف فيه عند جمهور أهل العلم إلا من شذ. ولكنهم اختلفوا في القدر الذي يجوز النظر إليه فالمشهور من مذهب الجمهور: الوجه والكفان لقوله تعالى: {وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إلا مَا ظَهَرَ مِنْهَا} [النور: 31] وهو الوجه والكفان. قال ذلك ابن عباس وغيره. وعليه يدل قول النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا خطب أحدكم المرأة فقدر أن يرى منها بعض ما يدعو إليها" والوجه والكفان هما أساس جمال المرأة، وهو القدر الكافي للنظر إليه.
قال الخطابي:"إنما أبيح له النظر إلى وجهها وكفيها فقط، ولا ينظر إليها حاسرًا، ولا يطلع على شيء من عورتها، سواء كانت أذنت له في ذلك أو لم تأذن. وإلى هذه الجملة ذهب الشافعي وأحمد بن حنبل، وإلى نحو هذا أشار سفيان الثوري".
ونقل الترمذي (1087) عن أحمد وإسحاق"أنه لا بأس أن ينظر إليها ما لم ير منها محرمًا".
ولكن يشكل في هذا ما رواه عبد الرزاق (10352) وسعيد بن منصور في سننه (521) كلاهما عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن أبي جعفر، قال: خطب عمر بن الخطاب ابنة علي ابن أبي طالب فقال: إنها صغيرة، فقيل لعمر: إنما يريد بذلك منعها. قال: فكلمه فقال علي: أبعث بها إليك فإن رضيتَ فهي امرأتك قال: فبعث بها إليه قال: فذهب عمر، فكشف عن ساقها. فقالت:"أرسل. فلولا أنك أمير المؤمنين لصككت عنقك" كذا عند عبد الرزاق. وفي سند سعيد:"للطمت عينيك".
وللقصة أسانيد أخرى كلها منقطعة. انظر علل الدارقطني (2/ 190) فذهب أحمد إلى القول بجواز النظر إلى ما يظهر غالبا كالرقبة والساقين ونحوهما.
فائدة: ابنة علي اسمها أم كلثوم، وأمها فاطمة بنت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم تزوجها عمر بن الخطاب، فلم تزل عنده إلى أن قتل، وولدت له زيد بن عمر، ورقية بنت عمر، ثم خلف على أم كلثوم بعد عمر: عون بن جعفر بن أبي طالب، فتوفي عنها. ثم خلف عليها أخوه محمد بن جعفر بن أبي طالب فتوفي عنها، فخلف عليها أخوه عبد اللَّه بن جعفر فقالت أم كلثوم: إني أستحي من أسماء بنت عميس إن ابنيها ماتا عندي، وإني لأتخوف على هذا الثالث. فهلكت عنده، ولم تلد لأحد منهم. طبقات ابن سعد (8/ 4
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের কেউ যখন কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেয়, আর সে যদি তার সেই অংশটুকু দেখতে সক্ষম হয়, যা তাকে বিবাহের প্রতি উদ্বুদ্ধ করে, তাহলে সে যেন তা করে।"
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বনি সালামার এক নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দিতে চেয়েছিলাম। তাই আমি খেজুর গাছের গোড়ায় লুকিয়ে থাকতাম, যতক্ষণ না তার কিছু অংশ দেখলাম যা আমাকে মুগ্ধ করে। এরপর আমি তাকে প্রস্তাব দিলাম এবং তাকে বিবাহ করলাম।
মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন আল্লাহ কোনো ব্যক্তির হৃদয়ে কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়ার ইচ্ছা দেন, তখন তাকে দেখা দোষণীয় নয়।"
6136 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه كتب على ابن آدم حظه من الزنا،
أدرك ذلك لا محالة، فزنا العين النظر، وزنا اللسان المنطق، والنفس تمني وتشتهي، والفرج يصدق ذلك كله ويُكذبه".
متفق عليه: رواه البخاري في الاستئذان (6243) ومسلم في القدر (2657) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس قال: ما رأيت شيئًا أشبه باللمم مما قال أبو هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা আদম সন্তানের উপর যিনার একটি অংশ লিখে রেখেছেন, সে তাতে অবশ্যই লিপ্ত হবে। সুতরাং চোখের যিনা হলো (অবৈধভাবে) তাকানো, আর জিহ্বার যিনা হলো (অশোভন) কথা বলা। আর মন কামনা ও আকাঙ্ক্ষা করে। আর লজ্জাস্থান তা সবটিকে সত্যে পরিণত করে অথবা মিথ্যা প্রতিপন্ন করে।"
6137 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"كُتب على ابن آدم نصيبُه من الزنا، مدرك ذلك لا محالة، فالعينان زناهما النظر، والأذنان زناهما الاستماع، واللسان زناه الكلام، واليد زناهما البطش، والرجل زناها الخُطا، والقلب يهوى ويتمنى، ويصدق ذلك الفَرْجُ ويكذبه".
صحيح: رواه مسلم في القدر (21: 2657) عن إسحاق بن منصور، أخبرنا أبو هشام المخزومي، حدثنا وُهيب، حدثنا سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه أبو داود (2152) من وجه آخر عن حماد، عن سهيل بن أبي صالح بإسناده وزاد فيه:"والفم يزني فزناه القبل" وإسناده حسن.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানের উপর যিনার যে অংশ লেখা আছে, তা সে অবশ্যই পাবে। সুতরাং দুই চোখের যিনা হলো তাকানো, দুই কানের যিনা হলো শোনা, আর জিহ্বার যিনা হলো কথা বলা, দুই হাতের যিনা হলো স্পর্শ করা, আর দুই পায়ের যিনা হলো (যিনার দিকে) হেঁটে যাওয়া। আর অন্তর আকাঙ্ক্ষা করে ও কামনা করে, আর লজ্জাস্থান তা সত্যে পরিণত করে অথবা মিথ্যা প্রতিপন্ন করে।"
6138 - عن جرير بن عبد اللَّه قال: سألتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن نَظَرِ الفُجاءةِ فأمرني أن أَصْرِف بصري.
صحيح: رواه مسلم في الآداب (2159) من طرق عن عمرو بن سعيد، عن أبي زرعة، عن جرير بن عبد اللَّه، فذكره.
জারীর ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হঠাৎ দৃষ্টিপাতের (অনিচ্ছাকৃতভাবে নজর পড়ে যাওয়ার) বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম, তখন তিনি আমাকে আমার দৃষ্টি ফিরিয়ে নিতে নির্দেশ দিলেন।
6139 - عن ابن بريدة، عن أبيه، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم"يا علي، لا تُتبع النظرةَ النظرةَ، فإن لك الأولى، وليست لك الآخرة".
حسن: رواه أبو داود (2148) والترمذي (2777) والحاكم (2/ 194) والبيهقي (7/ 90) وأحمد (22974) والطحاوي في مشكله (1866) كلهم من حديث شريك، عن أبي ربيعة، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره.
قال الترمذي: هذا حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث شريك.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".
قلت: فيه شريك هو ابن عبد اللَّه النخعي سيئ الحفظ، وشيخه أبو ربيعة الإيادي واسمه عمر بن ربيعة قال فيه أبو حاتم:"منكر الحديث" ولكن قال ابن معين: كوفي ثقة، انظر الجرح والتعديل (3/ 109) فالخلاصة فيه أنه منكر الحديث إذا تفرد، وهو لم يتفرد هنا فقد رواه الإمام أحمد (23021) عن أحمد بن عبد الملك، حدثنا شريك، عن أبي إسحاق وأبي ربيعة الإيادي بإسناده
مثله.
ولكن علّتُه شريك هو سيئ الحفظ كما قلت: ولذا قال الترمذي لا نعرفه إلا من حديث شريك، ولكن يشهد له ما يدل على أنه لم يهم في هذا الحديث.
বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আলী, তুমি এক দৃষ্টির পর আরেক দৃষ্টি ফেলো না (অর্থাৎ অনিচ্ছাকৃত প্রথম দৃষ্টির পর ইচ্ছাকৃতভাবে দ্বিতীয়বার তাকিয়ো না)। কেননা প্রথম দৃষ্টি তোমার জন্য (ক্ষমার্হ), কিন্তু দ্বিতীয় দৃষ্টি তোমার জন্য নয়।"
6140 - عن علي بن أبي طالب قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تُتبع النظرَ النظرَ، فإن الأولى لك، وليست لك الآخرة".
حسن: رواه أحمد (1369) والبزار -كشف الأستار- (907) والدارمي (2751) والطحاوي في مشكله (1865) وابن حبان (5570) والحاكم (3/ 123) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، عن سلمة بن أبي الطفيل، عن علي فذكره. وذكر بعضهم قبل الحديث:"يا علي، إن لك كنزًا في الجنة، وإنك ذو قرنيها" وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وإسناده حسن من أجل سلمة بن أبي الطفيل وهو من رجال التعجيل (403) روى عنه محمد بن إبراهيم وفطر بن خليفة، ووثّقه ابن حبان، ولحديثه أصل ثابت كما سبق إلا أني لم أقف على تصريح ابن إسحاق.
ومعنى قوله:"وإنك ذو قرنيها" أي إنك ذو قرني الجنة، وقال غيرهم: إنك ذو قرني هذه الأمة، فأضمر الأمة.
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: “তুমি এক দৃষ্টির পর আরেক দৃষ্টি অনুসরণ করো না। কারণ, প্রথম দৃষ্টি তোমার জন্য (ক্ষমাযোগ্য), কিন্তু দ্বিতীয় দৃষ্টি তোমার জন্য নয়।”