আল-জামি` আল-কামিল
6128 - عن أبي سلمة، أن فاطمة بنت قيس -أخت الضحاك بن قيس- أخْبرته أنّ أبا حفص بن المغيرة المخزومي طلّقها ثلاثًا. ثم انطلق إلى اليمن. فقال لها أهله: ليس لك علينا نفقة فانطلق خالد بن الوليد في نفر، فأتوا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في بيت ميمونة. فقالوا: إن أبا حفص طلّق امرأته ثلاثًا، فهل لها من نفقة؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليست لها نفقة، وعليها العدة" وأرسل إليها: أن لا تسبقيني بنفسك. . ." الحديث.
وفي لفظ:"لا تفوتينا بنفْسك".
صحيح: رواه مسلم في الطلاق (38: 1480) عن محمد بن رافع، حدّثنا حسين بن محمد، حدّثنا شيبان، عن يحيى (وهو ابن كثير)، أخبرني أبو سلمة، فذكره.
واللفظ الآخر من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، به.
وهذا اللفظ عزاه الحافظ في الفتح (9/ 179) لأبي داود وحده وفيه قصور.
وقوله:"لا تسبقيني" فيه التعريض بالخِطبة.
فقه الحديث: قال الحافظ ابن حجر: اتفق العلماء على أن المرأة بهذا الحكم من مات عنها زوجها، واختلفوا في المعتدة من الطلاق البائن، وكذا من وقف نكاحها، وأما الرجعية فقال الشافعي:"لا يجوز لأحد أن يعرض لها بالخطبة فيها".
قال الحافظ:"والحاصل أن التصريح بالخطبة حرام لجميع المعتدات، والتعريض مباح للأولى، حرام في الأخيرة، مختلف فيه في البائن" الفتح (9/ 179).
ফাতেমা বিনতে কায়েস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি দাহহাক ইবনু কায়েসের বোন, তিনি আবূ সালামাকে জানিয়েছিলেন যে, আবূ হাফস ইবনু মুগীরাহ মাখযূমী তাকে তিন তালাক দেন। এরপর তিনি ইয়ামেনে চলে যান। তখন তার পরিবার তাকে বলল: আমাদের পক্ষ থেকে তোমার জন্য কোনো ভরণপোষণ (নফাকা) নেই। অতঃপর খালিদ ইবনু ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদল লোকের সাথে রওনা হলেন এবং মায়মূনাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তারা বললেন: আবূ হাফস তার স্ত্রীকে তিন তালাক দিয়েছেন, তার জন্য কি কোনো ভরণপোষণ আছে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য কোনো ভরণপোষণ নেই, তবে তাকে ইদ্দত পালন করতে হবে।" এবং তিনি তার নিকট এই বার্তা পাঠালেন যে, তুমি যেন নিজের ব্যাপারে আমার আগে সিদ্ধান্ত নিয়ে না ফেলো।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তুমি যেন নিজের ব্যাপারে আমাদেরকে হারিয়ে না দাও।"
6129 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كان رسول صلى الله عليه وسلم يُعلِّمنا الاستخارة في الأمور كلها كما يعلمنا السورةَ من القرآن يقول:"إذا همَّ أحدُكم بالأمر، فليركعْ ركعتين من غير الفريضة ثم ليقل: اللهم إني أستخيرُك بعلمك، وأستقدرك بقدرتك، وأسألك من
فضلك العظيم، فإنك تقدر، ولا أقدر، وتعلم، ولا أعلم، وأنت علام الغيوب، اللهم إن كنتَ تعلم أن هذا الأمر خيرٌ لي في ديني ومعاشي وعاقبة أمري -أو قال عاجل أمري وآجله- فاقدُرْه لي ويسِّرْه لي ثم بارك لي فيه، وإن كنتَ تعلم أن هذا الأمر شرٌّ لي في ديني، ومعاشي، وعاقبة أمري -أو قال في عاجل أمري وآجله- فاصرفْه عني، واصرفْني عنه، واقدُرْ لي الخيرَ حيث كان، ثم أرضِني، قال: ويسمِّي حاجته".
صحيح: رواه البخاري في التهجد (1162) عن قتيبة قال: حدثنا عبد الرحمن بن أبي الموالِ، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সকল বিষয়ে ইস্তেখারা (কল্যাণ কামনার দু’আ) শিক্ষা দিতেন, যেভাবে তিনি আমাদেরকে কুরআনের সূরা শিক্ষা দিতেন। তিনি বলতেন: "যখন তোমাদের কেউ কোনো কাজের ইচ্ছা করে, তখন সে যেন ফরয (নামাজ) ছাড়া দু'রাকাত নামাজ আদায় করে, অতঃপর বলে: 'হে আল্লাহ! আমি তোমার জ্ঞানের মাধ্যমে তোমার কাছে কল্যাণ কামনা করছি, তোমার ক্ষমতার মাধ্যমে তোমার কাছে শক্তি কামনা করছি, এবং তোমার মহান অনুগ্রহ প্রার্থনা করছি। কারণ তুমিই ক্ষমতা রাখো, আমি ক্ষমতা রাখি না; তুমিই জানো, আমি জানি না; এবং তুমিই গায়েবের (অদৃশ্য বিষয়ের) মহাজ্ঞানী। হে আল্লাহ! তুমি যদি জানো যে এই কাজটি আমার জন্য আমার দ্বীন, আমার জীবিকা ও আমার কাজের শেষ পরিণতির দিক থেকে— অথবা তিনি (রাবী) বলেছেন, আমার বর্তমান ও ভবিষ্যতের দিক থেকে— কল্যাণকর, তবে এটিকে আমার জন্য নির্ধারিত করে দাও, আমার জন্য সহজ করে দাও এবং এরপর এতে আমার জন্য বরকত দাও। আর যদি তুমি জানো যে এই কাজটি আমার দ্বীন, আমার জীবিকা এবং আমার কাজের শেষ পরিণতির দিক থেকে— অথবা তিনি (রাবী) বলেছেন, আমার বর্তমান ও ভবিষ্যতের দিক থেকে— অকল্যাণকর, তবে তা আমার কাছ থেকে সরিয়ে দাও এবং আমাকেও তা থেকে ফিরিয়ে নাও। আর যেখানেই কল্যাণ থাকুক, আমার জন্য তা নির্ধারণ করে দাও, অতঃপর আমাকে (তাতে) সন্তুষ্ট রাখো।' তিনি (জাবির) বলেন, আর সে সময় যেন সে তার প্রয়োজনের নাম উল্লেখ করে।"
6130 - عن أيوب بن خالد بن أبي أيوب الأنصاري، حدثه عن أبيه، عن جده أبي أيوب أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"اكتم الخطبة، ثم توضأ فأحسن وضوءك، ثم صلِّ ما كتب اللَّه لك، ثم احمد ربّك، ومجّده ثم قل: اللهمّ إنك تقدر ولا أقدر، وتعلم ولا أعلم، وأنت علّام الغيوب، فإن رأيت في فلانة -تسميها باسمها- خيرًا لي في ديني ودنياي وآخرتي فاقدُرها لي، وإن كان غيرُها خيرًا لي منها في ديني ودنياي وآخرتي فاقض لي ذلك".
حسن: رواه أحمد (23597) وابن خزيمة (1220) وابن حبان (4040) والحاكم (1/ 314) والبيهقي (7/ 147 - 148) وابن المنذر في الأوسط (8/ 233) كلهم من طريق ابن وهب، أخبرني حيوة، أن الوليد بن الوليد أخبره، أن أيوب بن خالد بن أبي أيوب حدثه بإسناده ومعناه.
قال الحاكم:"هذه سنة صلاة الاستخارة عزيزة تفرد بها أهل مصر، ورواته عن آخرهم ثقات، ولم يخرجاه".
قلت: فيه أيوب بن خالد بن أبي أيوب الأنصاري هذا هو المعروف، ولكن أبو أيوب الصحابي المشهور ليس هو جده، بل هو جده لأمه عمرة، وإنما جده هو صفوان بن أوس بن جابر الأنصاري. ولذا ترجمه المزي بقوله: أيوب بن خالد بن صفوان بن أوس بن جابر الأنصاري المدني. وأم خالد بن صفوان: عميرة بنت أبي أيوب الأنصاري.
وإسناده حسن من أجل أيوب بن خالد وهو من رجال مسلم حسن الحديث في الشواهد، وأبوه من رجال التعجيل، ووثقه ابن حبان، ولم يجرّحه أحدٌ وهو من التابعين، ولحديثه أصل ثابت كما سبق.
وفي الباب أحاديث أخرى انظر: كتاب الاستخارة.
আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: বিবাহের প্রস্তাব গোপন রাখবে। এরপর তুমি উত্তমরূপে উযূ (ওযু) করো, অতঃপর আল্লাহ তোমার জন্য যতটুকু (নফল নামায) নির্ধারণ করেছেন, তা আদায় করো। এরপর তোমার রবের প্রশংসা করো এবং তাঁর মহিমা ঘোষণা করো, অতঃপর বলো: হে আল্লাহ! আপনিই ক্ষমতা রাখেন, আমার কোনো ক্ষমতা নেই। আপনিই জানেন, আর আমি জানি না। আপনিই সকল অদৃশ্য বিষয়ে মহাজ্ঞানী। যদি আপনি (অমুক) মহিলার মধ্যে - (যার নাম উল্লেখ করবে) - আমার দ্বীন, দুনিয়া এবং আখিরাতের জন্য কল্যাণ দেখেন, তাহলে তাকে আমার জন্য নির্ধারিত করে দিন। আর যদি তার চেয়ে অন্য কেউ আমার দ্বীন, দুনিয়া এবং আখিরাতের জন্য উত্তম হয়, তবে আপনি সেটিই আমার জন্য ফয়সালা করে দিন।
6131 - عن سهيل بن سعد: أن امرأة جاءت إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول اللَّه، جئتُ لأهب لك نفسي، فنظر إليها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فصعّد النظر إليها وصوّبه، ثم طأطأ رأسه. فلما رأت المرأة أنه لم يقض فيها شيئًا جلستْ. . . . الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5126) ومسلم في النكاح (76: 1425) كلاهما عن قتيبة ابن سعيد الثقفي، حدّثنا يعقوب (يعني ابن عبد الرحمن القاريّ)، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি আমার নিজেকে আপনার নিকট হেবা (উপহার) করার জন্য এসেছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে তাকালেন এবং উপরে-নিচে দৃষ্টি দিলেন, অতঃপর তিনি মাথা নিচু করলেন। যখন মহিলাটি দেখলেন যে তিনি তার বিষয়ে কোনো ফায়সালা করলেন না, তখন তিনি বসে পড়লেন। ... (হাদীসের বাকি অংশ)।
6132 - عن أبي هريرة قال: كنت عند النبي صلى الله عليه وسلم فأتاه رجل فأخبره أنه تزوّج امرأة من الأنصار. فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنظرت إليها؟" قال: لا، قال:"فاذهب فانظر إليها، فإن في أعين الأنصار شيئًا".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1424: 74) عن ابن أبي عمر، حدّثنا سفيان، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
وفي رواية الحميدي، عن سفيان: أن رجلًا أراد أن يتزوج امرأة من الأنصار فذكر بقية الحديث. رواه الطحاوي في شرح معاني الآثار (3/ 14).
قوله:"في أعين الأنصار شيئًا" قيل المراد بذلك صغر، وقيل زرقة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে জানায় যে, সে আনসারী গোত্রের একজন নারীকে বিবাহ করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কি তাকে দেখেছ?" লোকটি বলল, না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, তাকে দেখে নাও। কারণ আনসারদের চোখে কিছু একটা আছে।"
6133 - عن أبي حُميد أو أبي حميدة قال: -وقد رأى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا خطب أحدكم امرأة فلا جناح عليه أن ينظر إليها، إذا كان إنما ينظر لخطبة، وإن كانت لا تعلم".
صحيح: رواه أحمد (23603) عن أبي كامل، حدثنا زهير، حدثنا عبد اللَّه بن عيسى، حدثني موسى بن عبد اللَّه بن يزيد، عن أبي حُميد أو أبي حميدة فذكره.
ورواه الطحاوي في شرحه (3/ 14) والطبراني في الأوسط (1/ 498) كلاهما من طريق زهير، والبزار (9/ 165) من حديث قيس، كلاهما عن عبد اللَّه بن عيسى، عن أبي حميد -بلا شك- مثله. وإسناده صحيح.
قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 276): رواه أحمد إلا أن زهيرًا شك فقال: عن أبي حميد أو أبي حميدة، والبزار من غير شك، والطبراني في الأوسط والكبير، ورجال أحمد رجال الصحيح.
قلت: يبدو أن الشك ليس من زهير، فقد يكون من أبي كامل، لأن الطحاوي والطبراني في الأوسط روياه أيضًا عن زهير من غير شك.
وأبو حميد هذا ليس هو أبو حميد الساعدي الصحابي المشهور وإن كان الإمام أحمد أخرج هذا الحديث ضمن أحاديث أبي حميد الساعدي. وقد ذكره البلاذري هذا في الصحابة. ولم يذكره ابن عبد البر في"الاستيعاب" فاستدركهـ ابن فتحون كما في الإصابة. وفي نص الحديث دليل على أن له صحبة.
আবু হুমাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যখন কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেয়, তখন তাকে দেখতে তার কোনো দোষ হবে না, যদি সে কেবল বিবাহের প্রস্তাবের উদ্দেশ্যেই দেখে, যদিও সে (নারী) তা জানতে না পারে।"
6134 - عن المغيرة بن شعبة، قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت له امرأة أخْطُبُها، فقال:
"اذهب فانظر إليها، فإنه أجدر أن يُؤْدم بينكما". قال: فأتيت امرأة من الأنصار، فخطبتها إلى أبويها، وأخبرتهما بقول رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فكأنهما كرها ذلك، قال: فسمعت ذلك المرأة وهي في خِدرها، فقالت: إنْ كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أمَرَكَ أن تنظر، فانظر، وإلا إني أنشُدُك. كأنهما عظّمت ذلك عليه. قال: فنظرتُ إليها: فتزوجتُها. فذكر من موافقتها.
صحيح: رواه الترمذي (1087) والنسائي (3235) وابن ماجه (1866) وأحمد (18137) واللفظ له، والبيهقي (7/ 84 - 85) وابن الجارود (675) كلهم من حديث بكر بن عبد اللَّه المزني، عن المغيرة بن شعبة فذكره. واختصر البعض. وزاد البيهقي: فما وقعت عندي امرأة بمنزلتها، ولقد تزوجت سبعين، أو بضع وسبعين امرأة.
وإسناده صحيح وقد اختلف في سماع بكر بن عبد اللَّه المزني من المغيرة بن شعبة. فقال ابن معين:"بكر لم يسمع من المغيرة".
ولكن ذهب الدارقطني في"العلل" (7/ 139) إلى أنه سمع منه، فقد قيل له: هل سمع من المغيرة؟ فقال: نعم.
وأما ما رواه عبد الرزاق في مصنفه (10335) ومن طريقه ابن ماجه (1865) وابن حبان (4043) والحاكم (2/ 165) والبيهقي (7/ 84) وابن الجارود (676) والدارقطني (3/ 253) عن معمر، عن ثابت، عن أنس، أن المغيرة بن شعبة خطب امرأة فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"اذهب فانظر إليها فإنه أدوم لما بينكما" فهو غلط، غلط فيه معمر فإنه ضعيف في ثابت كما قال ابن معين، إنما الصحيح ثابت، عن بكر مرسلًا كما قال الدارقطني، ورواه عبد الرزاق أيضًا عن سفيان الثوري، عن حميد، عن أنس فقال الدارقطني:"إنما رواه حميد، عن بكر. ومدار الحديث على بكر بن عبد اللَّه المزني" انتهى كلام الدارقطني.
وقال في سننه:"الصواب عن ثابت، عن بكر المزني. ثم رواه عن ابن مخلد، نا الجرجاني، نا عبد الرزاق، أنا معمر، عن ثابت، عن بكر المزني أن المغيرة بن شعبة قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فذكر نحوه".
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁকে জানালাম যে আমি একজন নারীকে বিবাহ করার প্রস্তাব দিতে চাই। তখন তিনি বললেন: "তুমি যাও এবং তাকে দেখে নাও। কারণ, এটা তোমাদের দুজনের মাঝে সদ্ভাব ও স্থায়ী সম্পর্ক সৃষ্টিতে অধিক সহায়ক হবে।" তিনি বলেন, অতঃপর আমি আনসার গোত্রের একজন নারীর নিকট আসলাম এবং তার বাবা-মায়ের নিকট তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলাম। আমি তাদেরকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বক্তব্য জানালাম। মনে হচ্ছিল তারা (বাবা-মা) সেটা অপছন্দ করলেন। তিনি বলেন, সেই সময় পর্দার আড়ালে থাকা মেয়েটি তাদের কথা শুনতে পেল। সে বলল: "যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে দেখতে আদেশ করে থাকেন, তবে দেখে নিন। অন্যথায় আমি আপনাকে আল্লাহর দোহাই দিচ্ছি।" মনে হচ্ছিল তারা (বাবা-মা) ব্যাপারটিকে তার জন্য বিরাট মনে করছিলেন। তিনি বলেন, অতঃপর আমি তাকে দেখলাম এবং তাকে বিবাহ করলাম। এরপর তিনি তার (স্ত্রীর) ভালো সম্পর্কের কথা উল্লেখ করেন।
6135 - عن جابر بن عبد اللَّه الأنصاري قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا خطب أحدكم المرأة، فقَدَرَ أن يرى منها بعض ما يدعوه إليها فليفعل".
حسن: رواه الإمام أحمد (14869) عن يعقوب، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني داود بن الحصين مولى عمرو بن عثمان، عن واقد بن عمرو بن سعد بن معاذ، عن جابر فذكره.
وهذا إسناد حسن من أجل محمد بن اسحاق، وواقد بن عمرو بن سعد بن معاذ الأنصاري"ثقة".
اختلف على محمد بن إسحاق، فرواه يعقوب بن إبراهيم، عن أبيه إبراهيم عنه فقال فيه: واقد
ابن عمرو بن سعد بن معاذ، وكذلك رواه الحاكم (2/ 165) من طريق عمر بن علي المقدمي، والطحاوي في شرحه (3/ 14) والبيهقي (7/ 84) من طريق أحمد بن خالد الوهبي، كلاهما عن محمد بن إسحاق، عن داود بن الحصين، عن واقد بن عمرو بن سعد بن معاذ. وهذا هو الصواب.
ولكن رواه أبو داود (2082) من طريق عبد الواحد بن زياد، ثنا محمد بن إسحاق عن داود بن حصين، عن واقد بن عبد الرحمن يعني - ابن سعد بن معاذ.
واقد بن عبد الرحمن بن سعد لا تعرف حاله كما قال ابن القطان الفاسي في الوهم والإيهام (4/ 429) وقال:"إنما هو واقد بن عمرو بن سعد بن معاذ أبو عبد اللَّه الأنصاري الأشهل. وهو مدني ثقة قاله أبو زرعة".
إذا فالوهم من عبد الواحد بن زياد، وهو وإن كان ثقة، فرواية الجماعة أولى، وفيهم إبراهيم ابن سعد بن إبراهيم الزهري ثقة حجة.
قال جابر: فلقد خطبت امرأة من بني سلمة. فكنت أتخبّأ -أي أختفي- في أصول النخل، حتى رأيت منها بعض ما يُعجبني فخطبتُها، فتزوجتها.
وفي الباب ما روي عن محمد بن مسلمة قال: خطبتُ امرأة، فجعلت أتخبأ لها، حتى نظرت إليها في نخل لها. فقيل له: أتفعل هذا، وأنت صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ ! فقال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا ألقى اللَّه في قلب امرئ خطبة امرأة فلا بأس أن ينظر إليها".
رواه ابن ماجه (1864) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا حفص بن غياث، عن حجاج، عن محمد بن سليمان، عن عمه، سهل بن أبي حثْمة، عن محمد بن مسلمة قال: فذكر الحديث.
وسهل بن أبي حثمة هو ابن ساعدة الخزرجي المدني صحابي صغير ومحمد بن سليمان هو ابن أبي حثمة"مجهول".
والحجاج هو ابن أرطاة وهو ضعيف، وفيه كلام معروف، وقد اختلف عليه.
فرواه حفص بن غياث هكذا، وكذلك رواه محمد بن جعفر ويحيى بن زكريا بن أبي زائدة عند الإمام أحمد (17976) وفيه قال سهل بن أبي حثمة: رأيت محمد بن مسلمة يطارد امرأة من الأنصار يريد أن ينظر إليها.
قال ابن أبي زائدة: هي ثُبيتة ابنة الضحاك.
فقلت: أنت صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وتفعل هذا؟ ! قال: فذكر الحديث.
وكذلك رواه عباد بن العوام عند أحمد أيضًا (17977) ويزيد بن هارون عنده أيضًا (16028) وكذلك رواه سعيد بن منصور في سننه (519) عن أبي شهاب عن الحجاج به مثله.
ورواه الطبراني في الكبير (19/ 225) من طريق عبد الواحد بن زياد، عن حجاج إلا أنه قال فيه: عن محمد بن سليمان بن أبي حثمة، عن أبيه -يعني سليمان بن أبي حثمة-.
ورواه الطيالسي (1282) من طريق حماد بن سلمة، عن حجاج بن أرطاة، عن محمد بن سهل ابن حنيف، عن أبيه قال: رأيت محمد بن مسلمة فذكر الحديث. وكذا رواه الطبراني أيضًا (19/ 226) وقال: هكذا رواه حماد بن سلمة. وخالف الناس فيه، وقد اختلف الرواة عن الحجاج بن أرطاة في هذا الحديث، والصواب عندي -واللَّه أعلم- ما رواه حفص بن غياث ويزيد بن هارون، عن الحجاج بن أرطاة، عن محمد بن سليمان بن أبي طلحة، عن عمه سهل بن أبي حثمة، عن محمد بن مسلمة. انتهى.
ورواه ابن حبان (4042) عن أبي يعلى، حدثنا أبو خيثمة قال: حدثنا محمد بن خازم، عن سهل بن محمد بن أبي حثمة، عن عمه سليمان بن أبي حثمة قال: رأيت محمد بن مسلمة يطارد ابنة الضحاك فذكره.
فأسقط من الإسناد"الحجاج بن أرطاة".
ومن طريق محمد بن خازم رواه أيضًا الطبراني في الكبير (19/ 225 - 226) فذكر"الحجاج" بينه وبين سهل بن محمد بن أبي حثمة.
فوقع فيه سقط وقلب في الإسناد. ولا يوجد من الرواة من اسمه سهل بن محمد بن أبي حثمة.
وقد أشار إليه الدارقطني في"العلل" (14/ 13) فقال: خالفهم أبو معاوية الضرير فقلّب إسناده، ولم يضبطه فقال:"عن الحجاج، عن سهل بن محمد بن أبي حثمة، عن عمه سليمان بن أبي حثمة، عن محمد بن مسلمة. ورواه حماد بن سلمة عن الحجاج عن محمد بن سهل بن حنيف، عن أبيه، عن محمد بن مسلمة ووهم أيضًا".
ثم قال:"والصحيح قول عبد الواحد بن زياد ومن تابعه عن الحجاج".
قلت: صحّح رواية عبد الواحد بن زياد. وقد رأيت أنه أخطأ فيه في قوله: عن محمد بن سليمان بن أبي حثمة عن أبيه - يعني سليمان بن أبي حثمة.
والصحيح ما رواه حفص بن غياث ومحمد بن جعفر ويحيى بن أبي زكريا ومن تابعهم. إلا أن يقال: لعل عبد الواحد بن زياد روي من وجهين عن أبيه سليمان وعن عمه سهل بن أبي حثمة. واللَّه تعالى أعلم.
والإسناد ضعيف على كل حال، لأن مداره على الحجاج بن أرطاة مع الاضطراب في الإسناد وله طرق أخرى أضعف من هذا.
وأما اسم المرأة التي كان يطاردها محمد بن مسلمة فقيل: إنها نُبيتة -بالنون. وقيل: بُثينة- بالباء. وكلاهما وهم، والصواب ثُبيتة كما قال ابن أبي زائدة. وهذا الذي رجحه الدارقطني وقال: وهي بنت الضحاك، أخت أبي جَبيرة بن الضحاك، وأخت ثابت بن الضحاك. وقول حماد بن سلمة:"بنت الضحاك بن قيس وهم".
قلت وهو كما قال، فإنه الضحاك بن خليفة بن ثعلبة الأشهلي الأنصاري. صحابي شهد غزوة بني النضير، وليست له رواية.
فقه الحديث: أحاديث الباب تدل على جواز النظر إلى المخطوبة وهو مما لا خلاف فيه عند جمهور أهل العلم إلا من شذ. ولكنهم اختلفوا في القدر الذي يجوز النظر إليه فالمشهور من مذهب الجمهور: الوجه والكفان لقوله تعالى: {وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إلا مَا ظَهَرَ مِنْهَا} [النور: 31] وهو الوجه والكفان. قال ذلك ابن عباس وغيره. وعليه يدل قول النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا خطب أحدكم المرأة فقدر أن يرى منها بعض ما يدعو إليها" والوجه والكفان هما أساس جمال المرأة، وهو القدر الكافي للنظر إليه.
قال الخطابي:"إنما أبيح له النظر إلى وجهها وكفيها فقط، ولا ينظر إليها حاسرًا، ولا يطلع على شيء من عورتها، سواء كانت أذنت له في ذلك أو لم تأذن. وإلى هذه الجملة ذهب الشافعي وأحمد بن حنبل، وإلى نحو هذا أشار سفيان الثوري".
ونقل الترمذي (1087) عن أحمد وإسحاق"أنه لا بأس أن ينظر إليها ما لم ير منها محرمًا".
ولكن يشكل في هذا ما رواه عبد الرزاق (10352) وسعيد بن منصور في سننه (521) كلاهما عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن أبي جعفر، قال: خطب عمر بن الخطاب ابنة علي ابن أبي طالب فقال: إنها صغيرة، فقيل لعمر: إنما يريد بذلك منعها. قال: فكلمه فقال علي: أبعث بها إليك فإن رضيتَ فهي امرأتك قال: فبعث بها إليه قال: فذهب عمر، فكشف عن ساقها. فقالت:"أرسل. فلولا أنك أمير المؤمنين لصككت عنقك" كذا عند عبد الرزاق. وفي سند سعيد:"للطمت عينيك".
وللقصة أسانيد أخرى كلها منقطعة. انظر علل الدارقطني (2/ 190) فذهب أحمد إلى القول بجواز النظر إلى ما يظهر غالبا كالرقبة والساقين ونحوهما.
فائدة: ابنة علي اسمها أم كلثوم، وأمها فاطمة بنت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم تزوجها عمر بن الخطاب، فلم تزل عنده إلى أن قتل، وولدت له زيد بن عمر، ورقية بنت عمر، ثم خلف على أم كلثوم بعد عمر: عون بن جعفر بن أبي طالب، فتوفي عنها. ثم خلف عليها أخوه محمد بن جعفر بن أبي طالب فتوفي عنها، فخلف عليها أخوه عبد اللَّه بن جعفر فقالت أم كلثوم: إني أستحي من أسماء بنت عميس إن ابنيها ماتا عندي، وإني لأتخوف على هذا الثالث. فهلكت عنده، ولم تلد لأحد منهم. طبقات ابن سعد (8/ 4
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের কেউ যখন কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেয়, আর সে যদি তার সেই অংশটুকু দেখতে সক্ষম হয়, যা তাকে বিবাহের প্রতি উদ্বুদ্ধ করে, তাহলে সে যেন তা করে।"
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বনি সালামার এক নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দিতে চেয়েছিলাম। তাই আমি খেজুর গাছের গোড়ায় লুকিয়ে থাকতাম, যতক্ষণ না তার কিছু অংশ দেখলাম যা আমাকে মুগ্ধ করে। এরপর আমি তাকে প্রস্তাব দিলাম এবং তাকে বিবাহ করলাম।
মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন আল্লাহ কোনো ব্যক্তির হৃদয়ে কোনো নারীকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়ার ইচ্ছা দেন, তখন তাকে দেখা দোষণীয় নয়।"
6136 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه كتب على ابن آدم حظه من الزنا،
أدرك ذلك لا محالة، فزنا العين النظر، وزنا اللسان المنطق، والنفس تمني وتشتهي، والفرج يصدق ذلك كله ويُكذبه".
متفق عليه: رواه البخاري في الاستئذان (6243) ومسلم في القدر (2657) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس قال: ما رأيت شيئًا أشبه باللمم مما قال أبو هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা আদম সন্তানের উপর যিনার একটি অংশ লিখে রেখেছেন, সে তাতে অবশ্যই লিপ্ত হবে। সুতরাং চোখের যিনা হলো (অবৈধভাবে) তাকানো, আর জিহ্বার যিনা হলো (অশোভন) কথা বলা। আর মন কামনা ও আকাঙ্ক্ষা করে। আর লজ্জাস্থান তা সবটিকে সত্যে পরিণত করে অথবা মিথ্যা প্রতিপন্ন করে।"
6137 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"كُتب على ابن آدم نصيبُه من الزنا، مدرك ذلك لا محالة، فالعينان زناهما النظر، والأذنان زناهما الاستماع، واللسان زناه الكلام، واليد زناهما البطش، والرجل زناها الخُطا، والقلب يهوى ويتمنى، ويصدق ذلك الفَرْجُ ويكذبه".
صحيح: رواه مسلم في القدر (21: 2657) عن إسحاق بن منصور، أخبرنا أبو هشام المخزومي، حدثنا وُهيب، حدثنا سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه أبو داود (2152) من وجه آخر عن حماد، عن سهيل بن أبي صالح بإسناده وزاد فيه:"والفم يزني فزناه القبل" وإسناده حسن.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানের উপর যিনার যে অংশ লেখা আছে, তা সে অবশ্যই পাবে। সুতরাং দুই চোখের যিনা হলো তাকানো, দুই কানের যিনা হলো শোনা, আর জিহ্বার যিনা হলো কথা বলা, দুই হাতের যিনা হলো স্পর্শ করা, আর দুই পায়ের যিনা হলো (যিনার দিকে) হেঁটে যাওয়া। আর অন্তর আকাঙ্ক্ষা করে ও কামনা করে, আর লজ্জাস্থান তা সত্যে পরিণত করে অথবা মিথ্যা প্রতিপন্ন করে।"
6138 - عن جرير بن عبد اللَّه قال: سألتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن نَظَرِ الفُجاءةِ فأمرني أن أَصْرِف بصري.
صحيح: رواه مسلم في الآداب (2159) من طرق عن عمرو بن سعيد، عن أبي زرعة، عن جرير بن عبد اللَّه، فذكره.
জারীর ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হঠাৎ দৃষ্টিপাতের (অনিচ্ছাকৃতভাবে নজর পড়ে যাওয়ার) বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম, তখন তিনি আমাকে আমার দৃষ্টি ফিরিয়ে নিতে নির্দেশ দিলেন।
6139 - عن ابن بريدة، عن أبيه، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم"يا علي، لا تُتبع النظرةَ النظرةَ، فإن لك الأولى، وليست لك الآخرة".
حسن: رواه أبو داود (2148) والترمذي (2777) والحاكم (2/ 194) والبيهقي (7/ 90) وأحمد (22974) والطحاوي في مشكله (1866) كلهم من حديث شريك، عن أبي ربيعة، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره.
قال الترمذي: هذا حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث شريك.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".
قلت: فيه شريك هو ابن عبد اللَّه النخعي سيئ الحفظ، وشيخه أبو ربيعة الإيادي واسمه عمر بن ربيعة قال فيه أبو حاتم:"منكر الحديث" ولكن قال ابن معين: كوفي ثقة، انظر الجرح والتعديل (3/ 109) فالخلاصة فيه أنه منكر الحديث إذا تفرد، وهو لم يتفرد هنا فقد رواه الإمام أحمد (23021) عن أحمد بن عبد الملك، حدثنا شريك، عن أبي إسحاق وأبي ربيعة الإيادي بإسناده
مثله.
ولكن علّتُه شريك هو سيئ الحفظ كما قلت: ولذا قال الترمذي لا نعرفه إلا من حديث شريك، ولكن يشهد له ما يدل على أنه لم يهم في هذا الحديث.
বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আলী, তুমি এক দৃষ্টির পর আরেক দৃষ্টি ফেলো না (অর্থাৎ অনিচ্ছাকৃত প্রথম দৃষ্টির পর ইচ্ছাকৃতভাবে দ্বিতীয়বার তাকিয়ো না)। কেননা প্রথম দৃষ্টি তোমার জন্য (ক্ষমার্হ), কিন্তু দ্বিতীয় দৃষ্টি তোমার জন্য নয়।"
6140 - عن علي بن أبي طالب قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تُتبع النظرَ النظرَ، فإن الأولى لك، وليست لك الآخرة".
حسن: رواه أحمد (1369) والبزار -كشف الأستار- (907) والدارمي (2751) والطحاوي في مشكله (1865) وابن حبان (5570) والحاكم (3/ 123) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، عن سلمة بن أبي الطفيل، عن علي فذكره. وذكر بعضهم قبل الحديث:"يا علي، إن لك كنزًا في الجنة، وإنك ذو قرنيها" وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وإسناده حسن من أجل سلمة بن أبي الطفيل وهو من رجال التعجيل (403) روى عنه محمد بن إبراهيم وفطر بن خليفة، ووثّقه ابن حبان، ولحديثه أصل ثابت كما سبق إلا أني لم أقف على تصريح ابن إسحاق.
ومعنى قوله:"وإنك ذو قرنيها" أي إنك ذو قرني الجنة، وقال غيرهم: إنك ذو قرني هذه الأمة، فأضمر الأمة.
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: “তুমি এক দৃষ্টির পর আরেক দৃষ্টি অনুসরণ করো না। কারণ, প্রথম দৃষ্টি তোমার জন্য (ক্ষমাযোগ্য), কিন্তু দ্বিতীয় দৃষ্টি তোমার জন্য নয়।”
6141 - عن أبي برزة الأسلمي: أن جُليبيبًا كان امرأً يدخل على النساء ويلاعبهن، فقلت لامرأتي: لا تدخلن عليكم جُليبيبًا، فإنه إن دخل عليكم لأفعلنَّ ولأفعلنَّ. قال: وكانت الأنصار إذا كان لأحدهم أيم، لم يُزوّجها حتى يعلم هل للنبي صلى الله عليه وسلم فيها حاجة أم لا، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لرجل من الأنصار:"زوّجني ابنتك" فقال: نعم وكَرامة يا رسول اللَّه، ونُعم عيني. قال:"إني لست أريدها لنفسي" قال: فلمن يا رسول اللَّه؟ قال:"لجليبيب" قال: فقال: يا رسول اللَّه، أشاوِرُ أمّها. فأتي أمّها، فقال: رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يخطب ابنتك. فقالت: نعم ونعْمة عيني. فقال: إنه ليس يخطبها لنفسه، إنما يخطبها لجليبيب. فقالت: أجُليبيبٌ إنيهِ؟ أجُليبيبٌ إنيهِ؟ أجُليبيبٌ إنيهِ؟ لا لعمرُ اللَّه، لا نزوّجه. فلما أراد أن يقوم ليأتي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فيخبره بما قالت أمُّها، قالت الجارية: من خطبني إليكم؟ فأخبرتها أمُّها. فقالت: أتردّون على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أمره، ادفعوني، فإنّه لم يضيّعني. فانطلق أبوها إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال: شأنك بها. فزوّجها جليبيبًا.
صحيح: رواه الإمام أحمد (19784) عن عفان، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن كنانة
ابن نُعيم العَدوي، عن أبي برزة الأسلمي فذكره. قال أحمد: ما حدّث به في الدنيا أحد إلا حماد ابن سلمة ما أحسنه من حديث.
ورواه مسلم في الفضائل (2472) من حديث حماد بن سلمة في قصة قتله دون قصة الخطبة. وهو مذكور في فضائله.
وروي بمثله عن أنس بن مالك. رواه الإمام أحمد (12393) والبزار وابن حبان (4059) كلهم من حديث عبد الرزاق - وهو في مصنفه (10333) قال: أخبرنا معمر، عن ثابت، عن أنس بن مالك.
ورجاله ثقات غير أن معمرا يروي عن ثابت أحاديث مناكير، كما قال أحمد.
আবূ বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জুলিবিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এমন একজন লোক ছিলেন, যিনি (মুক্তভাবে) মহিলাদের কাছে প্রবেশ করতেন এবং তাদের সাথে কৌতুক করতেন। আমি আমার স্ত্রীকে বললাম: "জুলিবিবকে তোমাদের কাছে প্রবেশ করতে দেবে না। সে যদি প্রবেশ করে, তবে আমি এটা করব এবং ওটা করব (অর্থাৎ কঠোর ব্যবস্থা নেব)।" তিনি (আবূ বারযাহ) বললেন: আনসারদের নিয়ম ছিল যে, তাদের কারো কাছে যদি কোনো অবিবাহিতা মহিলা থাকত, তবে সে ততক্ষণ তাকে বিবাহ দিত না, যতক্ষণ না সে জানতে পারত যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কি তার ব্যাপারে কোনো প্রয়োজন আছে, নাকি নেই। তারপর এক আনসার সাহাবীকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার মেয়েকে আমার সাথে বিবাহ দাও।" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! এটা আমার জন্য সম্মানজনক এবং আমার চোখের প্রশান্তি (বা আনন্দের বিষয়)।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তো তাকে নিজের জন্য চাচ্ছি না।" সাহাবী বললেন: "তাহলে কার জন্য, ইয়া রাসূলাল্লাহ?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জুলিবিবের জন্য।" সাহাবী বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তার মায়ের সাথে পরামর্শ করি।" অতঃপর তিনি তার মায়ের কাছে এলেন এবং বললেন: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমার মেয়ের বিয়ের প্রস্তাব দিয়েছেন।" সে (মা) বলল: "হ্যাঁ, এবং আমার চোখের প্রশান্তি।" তখন তিনি (স্বামী) বললেন: "তিনি তো নিজের জন্য প্রস্তাব করেননি, তিনি কেবল জুলিবিবের জন্য প্রস্তাব করেছেন।" সে (মা) বলল: "জুলিবিব! জুলিবিব! জুলিবিব! না, আল্লাহর কসম! আমরা তাকে তার সাথে বিবাহ দেব না।" যখন তিনি (বাবা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাওয়ার জন্য দাঁড়ালেন এবং তার মাকে যা বললেন তা জানানোর প্রস্তুতি নিলেন, তখন মেয়েটি বলল: "কে আমার জন্য তোমাদের কাছে প্রস্তাব করেছে?" তার মা তাকে জানাল। মেয়েটি বলল: "তোমরা কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আদেশ প্রত্যাখ্যান করছ? আমাকে পাঠিয়ে দাও, নিশ্চয়ই তিনি আমাকে নষ্ট করবেন না (বা আমার ক্ষতি করবেন না)।" অতঃপর তার বাবা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন এবং তাঁকে (মেয়ের কথা) জানালেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার দায়িত্ব তোমার উপর (অর্থাৎ তুমি তাকে বিবাহ দাও)।" ফলে তিনি তার সাথে জুলিবিবের বিবাহ দিলেন।
6142 - عن * *
৬১৪২ - থেকে বর্ণিত * *
6143 - عن عائشة قالت: جلس إحدى عشرة امرأة فتعاهدْنَ وتعاقدْنَ أن لا يكتُمنَ من أخبار أزواجهن شيئًا، قالت الأولى: زوجي لحمُ جملٍ غثٍّ، على رأس جبل: لا سهلٍ فيُرتقى ولا سمينٍ فيُنتقَل، قالت الثانية: زوجي لا أبُثُّ خبرَه، إني أخاف أن لا أذرَه إن أذكرْه أَذكرْ عُجَره وبُجَره قالت الثالثة: زوجي العشَنَّق، إنْ أنطقْ أُطلَّقْ، وإن أسكُتْ أُعلَّقْ قالت الرابعة: زوجي كلَيْل تِهامَة، لا حَرٌّ ولا قَرٌّ، ولا مخافةَ ولا سآمةَ، قالت الخامسة: زوجي إنْ دخل فهِدَ، وإن خرج أسِدَ، ولا يسأل عما عهِدَ، قالت السادسة: زوجي إنْ أكلَ لفَّ، وإن شرِبَ اشتفَّ، وإن اضطجع التفَّ، ولا يولج الكفَّ لِيعلمَ البثَّ، قالت السابعة: زوجي غياياءُ أو عياياء طباقاءُ، كلُّ داء له داء، شجَّكِ أو فَلَّكِ أو جمعَ كُلا لكِ، قالت الثامنة: زوجي المسُّ مسُّ أرنبٍ، والريح ريحُ زرنبٍ، قالت التاسعة: زوجي رفيعُ العماد، طويلُ النجاد، عظيمُ الرماد، قريبُ البيتِ من النادِ، قالت العاشرة: زوجي مالِكٌ، وما مالكٌ، مالك خير من ذلك، له إبل كثيراتُ المَباركِ، قليلاتُ المسارحِ، وإذا سمعنَ صوتَ المِزْهرِ، أيقن أنهن هوالكُ، قالت الحادية عشرة: زوجي أبو زَرْعٍ، فما أبو زرع، أناسَ من حلي أذنيَّ، وملأ من شحم عضديَّ، وبَجَّحني فبجحتْ إليَّ نفسي، وجدَني في أهل غُنيمةٍ بشقٍّ، فجعلني في أهل صهيلٍ وأطيطٍ، ودائسٍ ومُنقٍّ، فعنده أقول فلا أُقَبَّح، وأرقد فأتصبح، وأشرب فأتقنح، أمُّ أبي زرع، فما أمُّ أبي زرع عُكومها رداح، وبيتُها فساحٌ، ابنُ أبي زرع، فما ابن أبي زرع، مضجعُه كمسلِّ شَطْبة، ويُشبعه ذراعُ الجفرة، بنتُ أبي زرع، فما بنتُ أبي زرع، طوعُ أبيها، وطوع أمِّها، وملءُ كسائها، وغيظُ جارتها، جاريةُ أبي زرع، فما جاريةُ أبي زرع، لا تبُثُّ حديثنا تبثيثًا، ولا تُنَقِّت مِيرتَنا تنقيثا، ولا تملأ بيتنا تعشيشا. قالت: خرج أبو زرع والأوطاب تُمخض، فلقي امرأةً معها ولدان لها
كالفهدين، يلعبان من تحت خصرها برُمَّانتين، فطلقني ونكحها، فنكحتُ بعده رجلا سَرِيًّا، ركب شَرِيًّا، وأخذ خطّيا، وأراح علي نعما ثريًّا، وأعطاني من كل رائحة زوجا، وقال، كُلِي أم زرع، وميري أهلَكِ، قالت: فلو جمعتُ كلَّ شيءٍ أعطانيه، ما بلغ أصغرَ آنيةِ أبي زرع. قالت عائشة: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كُنْتُ لَكِ كَأَبِي زَرْعٍ لأُمِّ زَرْعٍ".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5189) ومسلم في فضائل الصحابة (2448) كلاهما عن علي بن حُجر، أخبرنا عيسى بن يونس، حدّثنا هشام بن عروة، عن عبد اللَّه بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
قوله صلى الله عليه وسلم:"كُنْتُ لَكِ كَأَبِي زَرْعٍ لأُمِّ زَرْعٍ" يعني في الوفاء والألفة لا في الطلاق والفرقة.
فقالت عائشة:"بأبي أنت وأمي يا رسول اللَّه، بل أنت خير إليّ من أبي زرع" رواه النسائي في الكبرى (9092) من طريق عباد بن منصور، عن هشام بن عروة، عن أبيه عروة، عن عائشة مرفوعًا.
ورواية الشيخين من تأمل تتبين له أنها مرفوعة أيضًا.
وقولها:"غث" المراد منه المهزول.
وقولها:"على رأس جبل وعر" أي صعب الوصول إليه. ومعناه: أنه قليل الخير من أوجه.
وقال الخطابي: قولها: على رأس جبل - أي يرتفع، ويتكبر ويسمو بنفسه فوق موضعها كثيرًا. أي أنه يجمع إلى قلة خيره، تكبره وسوء الخلق.
وقولها:"إني أخاف أن لا أذره" فيه تأويلان: أحدهما: أن خبره طويل، إن شرعت في تفصيله لا أقدر على إتمامه لكثرته.
والثاني: إني أخاف أن يطلقني فأذره. وتكون لا زائدة.
وقولها:"عجره وبُجره": المراد بهما عيوبه.
وقولها:"العشنق": هو الطويل ومعناه أنه ليس فيه إلا الطول بلا نفع.
وقولها:"كَلَيْلِ تهامة": أي ليس فيه أذى بل هو راحة ولذاذة كليل تهامة.
وقولها:"إنْ دخل فهِدَ. . ." أي أنه ينام كثيرا ولا يسأل عما كان عهده في البيت من ماله ومتاعه.
وقولها:"إنْ أكل لفَّ. . ." أي أنه يُكثر في الطعام والشراب حتى لا يبقى منهما شيء.
وقولها:"وإن اضطجع التف. . ." أي إذا رقد التف في ثيابه في ناحية ولم يضاجعني ليعلم ما عندي من محبته.
وقولها:"عياياء" هو الذي لا يلقح وقيل: هو العنّين.
وقولها:"طباقاء" أي المطبقة عليه أموره حمقا.
وقولها:"شجك أو فلك. . ." أي إنها معه بين شج رأس وضرب وكسر عضو أو جمع بينهما.
وقولها:"ريح زرنب. . ." الزرنب نوع من الطيب معروف والمسُّ مسُّ أرنب أي إنه ليِّنُ الجانب وكريم الخلق.
وقولها:"رفيع العماد. . ." تصفه بالشرف وسناء الذكر، وبطول القامة، وبالجود وكثرة الضيافة.
وقولها:"وإذا سمعن صوت المزهر. . ." المزهر العود الذي يُضرب أرادت أن زوجها عود إبله إذا نزل بهم الضيوف نحر لهم منها.
وقولها:"أناس من حليٍ أذنيَّ" أي حلّاني قرطة وشنوفا فهي تنوس أي تتحرك لكثرتها.
وقولها:"بجحني فبجحت": أي فرحني ففرحتُ.
وقولها:"بشقٍّ" وهو اسم موضع.
وقولها:"جعلني في أهل صهيل. . ." يعني أهلها كانوا أصحاب غنم فقراء وزوجها من الأغنياء صاحب الإبل والخيول.
وقولها:"عكومها رداح" العكوم الأعدال والأوعية التي فيها الطعام و"رداح" أي عظام كبيرة.
وقولها:"مضجعه كمسل شطبة" أي إنه مهفهف خفيف اللحم كالسعفة.
وقولها:"ولا تنقث ميرتنا تنقيثا" الميرة الطعام المجلوب، ومعناه لا تفسده.
وقولها:"ولا تملأ بيتنا تعشيشا" أي لا تترك الكُناسة والقمامة فيه مفرقة كعش الطير.
وقولها:"رجلا سريا، ركب شريا" السري السيد الشريف، والشري هو الفرس الذي يمضي في سيره بلا فتور ولا انكسار.
وقولها:"وأخذ خطيا" الخطي الرمح منسوب إلى الخط قرية من سيف البحر. من شرح النووي لصحيح مسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এগারো জন নারী একত্রে বসে শপথ ও প্রতিজ্ঞা করল যে, তারা তাদের স্বামীদের কোনো সংবাদ গোপন করবে না।
প্রথমজন বলল: আমার স্বামী রোগা-শুকনা উটের গোশতের মতো, যা পাহাড়ের চূড়ায় রয়েছে—সহজে পৌঁছানোও যায় না, আবার তা এতো মোটাতাজাও নয় যে স্থানান্তরিত করা হবে।
দ্বিতীয়জন বলল: আমি আমার স্বামীর খবর বিস্তারিত বলতে চাই না। কারণ, আমি ভয় করি যে আমি তাকে (সম্পূর্ণভাবে) বর্ণনা করতে পারব না। যদি আমি তাকে বর্ণনা করি, তবে আমি তার দোষ ও ত্রুটিগুলিই বর্ণনা করব।
তৃতীয়জন বলল: আমার স্বামী লম্বা-পাতলা (যেন কঙ্কাল)। যদি আমি কথা বলি, তবে সে আমাকে তালাক দেবে; আর যদি চুপ থাকি, তবে (তালাক না দিয়ে) ঝুলিয়ে রাখবে।
চতুর্থজন বলল: আমার স্বামী তিহামার রাতের মতো—না উষ্ণ, না শীতল; না কোনো ভয়, না কোনো বিরক্তি।
পঞ্চমজন বলল: আমার স্বামী, যখন ঘরে প্রবেশ করে, তখন সে চিতার (ঘুমন্ত/অলস) মতো থাকে; আর যখন বাইরে যায়, তখন সিংহের (সাহসী) মতো হয়ে যায়। আর ঘরে যা দেখে তা নিয়ে প্রশ্ন করে না।
ষষ্ঠজন বলল: আমার স্বামী যখন খায়, তখন পুরোটা শেষ করে ফেলে; আর যখন পান করে, তখন সম্পূর্ণটা পান করে ফেলে; আর যখন শোয়, তখন একা গুটিয়ে শুয়ে থাকে এবং আমার হৃদয়ের দুঃখ জানার জন্য হাতও বাড়ায় না।
সপ্তমজন বলল: আমার স্বামী দুর্বল (স্ত্রীর সাথে মিলিত হতে অক্ষম) অথবা নির্বোধ ও বোকা; সকল অসুস্থতার কারণ যেন তারই ভেতরে। সে হয়তো তোমাকে আঘাত করে মাথা ফাটিয়ে দেবে, অথবা অঙ্গ ভেঙে দেবে, কিংবা এই দুটোই তোমার জন্য একত্রে করবে।
অষ্টমজন বলল: আমার স্বামী স্পর্শে খরগোশের মতো নরম, আর তার ঘ্রাণ জারণাব (এক প্রকার সুগন্ধি) ফুলের ঘ্রাণের মতো।
নবমজন বলল: আমার স্বামী উঁচু স্তম্ভবিশিষ্ট (সম্মানিত), লম্বা তরবারির বেল্টধারী (লম্বা ও বীর), প্রচুর ছাইবিশিষ্ট (অত্যন্ত দানশীল), এবং তার ঘর সভাস্থলের কাছাকাছি।
দশমজন বলল: আমার স্বামী মালিক, মালিক আবার কেমন! মালিক এসবের চেয়েও উত্তম। তার এমন বহু উট রয়েছে যাদের বসার স্থান বেশি কিন্তু চারণভূমি কম। আর যখনই তারা (উটগুলো) বীণার আওয়াজ শোনে, তখনই নিশ্চিত হয় যে তারা জবাই হতে চলেছে।
একাদশতমজন (উম্মু যার‘) বলল: আমার স্বামী আবূ যার‘। আবূ যার‘ কেমন! সে আমার কানকে গহনা দিয়ে দুলিয়েছে (ভারী করেছে), আমার বাহুগুলোকে চর্বি দিয়ে পূর্ণ করেছে, এবং আমাকে আনন্দ দিয়েছে, ফলে আমার আত্মমর্যাদা বেড়েছে। সে আমাকে 'শিক্ক' নামক স্থানে একদল ছোট ছাগলের মালিকদের মধ্যে পেয়েছিল। অতঃপর সে আমাকে ঘোড়ার চিঁহিঁ এবং উটের ডাকের (সমৃদ্ধ), শস্য মাড়ানো ও পরিষ্কার করার শব্দে ভরপুর ঘরে নিয়ে আসে। তার কাছে আমি কথা বললে আমাকে মন্দ বলা হয় না, আমি ঘুমাই এবং সকালে দেরি করে উঠি, আর আমি পান করি এবং তৃপ্ত হয়ে পান করি।
আবূ যার‘-এর মা: আবূ যার‘-এর মা আবার কেমন! তার খাদ্য রাখার পাত্রগুলো বিশাল ও ভারী, আর তার ঘর প্রশস্ত। আবূ যার‘-এর ছেলে: আবূ যার‘-এর ছেলে আবার কেমন! তার শোয়ার স্থান (দেহ) তলোয়ারের খাপ থেকে বের করা সরু পাতার মতো (পাতলা ও সুঠাম), আর একটি ছোট ছাগলের সামনের এক বাহু তাকে পরিতৃপ্ত করে দেয়। আবূ যার‘-এর মেয়ে: আবূ যার‘-এর মেয়ে আবার কেমন! সে তার পিতা ও মাতার বাধ্য, তার পোশাক পূর্ণকারী (স্বাস্থ্যবতী) এবং তার প্রতিবেশীর ক্রোধের কারণ। আবূ যার‘-এর দাসী: আবূ যার‘-এর দাসী আবার কেমন! সে আমাদের কথা ফাঁস করে প্রচার করে না, আমাদের খাদ্য সামগ্রীতে একটুও কমতি করে না, আর আমাদের ঘরকে আবর্জনা দিয়ে পাখির বাসার মতো পূর্ণ করে না।
সে (উম্মু যার‘) বলল: (একদিন) আবূ যার‘ বের হল যখন চামড়ার মশকগুলোতে মাখন তৈরি হচ্ছিল (দুধ মন্থন করা হচ্ছিল)। পথে সে এমন এক মহিলার সাক্ষাৎ পেল যার সাথে তার দুটি বাঘ শাবকের মতো ছেলে ছিল, যারা তার কোমরের নিচে দুটি ডালিম নিয়ে খেলছিল। ফলে সে আমাকে তালাক দিল এবং সেই মহিলাকে বিয়ে করল। তার পরে আমি একজন সম্মানিত পুরুষকে বিবাহ করলাম, যে দ্রুতগামী ঘোড়ায় আরোহণ করত, খাত্তি (এক প্রকার বল্লম) ব্যবহার করত এবং প্রচুর সম্পদ ও পশু আমার জন্য এনে দিত। সে আমাকে সকল প্রকার চতুষ্পদ জন্তুর এক-একটি জোড়া দিল এবং বলল, ‘হে উম্মু যার‘, তুমি খাও আর তোমার পরিবারের লোকজনের জন্যেও পাঠাও।’ উম্মু যার‘ বলল: যদি সে আমাকে যা কিছু দিয়েছে তা সব একত্র করি, তবে তা আবূ যার‘-এর (দেওয়া বস্তুর) ক্ষুদ্রতম পাত্রটির সমানও হবে না।
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমার জন্য আবূ যার‘-এর প্রতি উম্মু যার‘-এর মতো (প্রেমময়) ছিলাম।"
6144 - عن النعمان بن بشير قال: استأذن أبو بكر على النبي صلى الله عليه وسلم، فسمع صوت عائشة عاليا، فلما دخل تناولها ليلطمها، وقال: ألا أراك ترفعين صوتك على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فجعل النبي صلى الله عليه وسلم يحجزه، وخرج أبو بكر مغضبا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم حين خرج أبو بكر:"كيف رأيتني أنقذتك من الرجل؟" قال: فمكث أبو بكر أياما، ثم استأذن على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فوجدهما قد اصطلحا، فقال لهما: أدخلاني في سلمكما كما أدخلتماني في حربكما. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"قد فعلنا، قد فعلنا".
صحيح: رواه أبو داود (4999) وأحمد (18394) كلاهما من حديث أبي إسحاق، عن العيزار ابن حريث، عن النعمان بن بشير، فذكره، واللفظ لأبي داود. ولم يذكر أحمد قوله:"قد فعلنا، قد فعلنا".
وأبو إسحاق هو السبيعي مدلس مختلط، ولكن رواه النسائي في الكبرى (9110) من وجه
آخر عن عمرو بن محمد العنقري، قال: أنا يونس بن أبي إسحاق، عن عيزار بن حريث. ولم يذكر أبا إسحاق.
ويونس بن أبي إسحاق شارك في شيوخ أبيه كثيرا كما هنا، فإنه روى الحديث من وجهين، وبهذا صح الحديث بدون أبي إسحاق.
নু'মান ইবন বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। তখন তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উচ্চস্বর শুনতে পেলেন। যখন তিনি ভেতরে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি আয়েশাকে মারার জন্য ধরতে গেলেন এবং বললেন: আমি কি দেখছি তুমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর তোমার আওয়াজ উঁচু করছো? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (আবূ বকরকে) বাধা দিলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ক্রুদ্ধ অবস্থায় বের হয়ে গেলেন। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বেরিয়ে গেলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি কি দেখলে, আমি কীভাবে তোমাকে লোকটির হাত থেকে বাঁচালাম?” রাবী বলেন, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কয়েক দিন থাকলেন। এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন এবং দেখলেন তারা দু’জন সন্ধি করেছেন। অতঃপর তিনি (আবূ বকর) তাদের দু’জনকে বললেন: তোমরা আমাকে তোমাদের শান্তিতে প্রবেশ করাও, যেমন তোমরা আমাকে তোমাদের যুদ্ধে প্রবেশ করিয়েছিলে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমরা তা করেছি, আমরা তা করেছি।”
6145 - عن ابن عباس قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إن امرأتي لا تمنع يد لامس. فقال:"غَرِّبْها إن شئت". قال: إني أخاف أن تتبعها نفسي، قال:"استمتع بها".
حسن: رواه أبو داود (2049) والنسائي (3464) والبيهقي (7/ 154) من طريق أبي داود - كلاهما عن حسين بن حُريث المروزي، ثنا الفضل بن موسى، عن الحسين بن واقد، عن عمارة بن أبي حفصة، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. غير إن أبا داود قال: كتب إليّ حسينُ بن حريث المروزي - يعني أنه رواه عنه كتابة.
وإسناده حسن من أجل الحسين بن واقد فإنه وإن كان من رجال مسلم إلا أنه حسن الحديث. لا يرتقي إلى درجة"ثقة".
ورواه البيهقي من وجه آخر عن أبي عبد اللَّه الصفار الوزان، ثنا الحسين بن حريث بإسناده وفيه:"فاستمتع بها إذًا" وقال: ليس في رواية أبي داود:"إذًا".
وللحديث أسانيد أخرى منها:
ما رواه النسائي (3465) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: حدثنا النضر بن شُميل، قال: حدثنا حماد بن سلمة، قال: أنبأنا هارون بن رئاب، عن عبد اللَّه بن عبيد بن عمير، عن ابن عباس أن رجلًا قال: يا رسول اللَّه، إن تحتي امرأة لا ترد يد لامس. قال:"طلقها" قال: إني لا أصبر عنها. قال:"فأمسكها".
قال النسائي:"هذا خطأ، والصواب مرسل".
ومنها ما رواه أيضًا (3229) عن محمد بن إسماعيل بن إبراهيم، قال: حدثنا يزيد، قال: حدثنا حماد بن سلمة وغيره، عن هارون بن رئاب، عن عبد اللَّه بن عبيد اللَّه بن عمير. وعبد الكريم عن عبد اللَّه بن عبيد اللَّه بن عمير عن ابن عباس. عبد الكريم يرفعه إلى ابن عباس، وهارون لم يرفعه، قالا: جاء رجلٌ إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: إن عندي امرأة هي من أحبِّ الناس إلي، وهي لا تمنع يدَ لامسٍ. قال:"طلقها" قال: لا أصبر عنها. قال:"استمتع بها".
ومنها ما رواه أيضًا البيهقي من وجه آخر عن حماد بن سلمة، ثنا عبد الكريم بن أبي المخارق وهارون بن رئاب الأسدي، عن عبد اللَّه بن عبيد بن عمير الليثي، قال حماد: قال أحدُهما: عن ابن عباس أن رجلًا قال: يا رسول اللَّه، إن عندي بنت عم لي جميلة، وإنها لا ترد يد لامس. قال:"طلقها" قال: لا أصبر عنها، قال:"فأمسكها إذًا".
قال:"ورواه ابن عيينة عن هارون بن رئاب مرسلا".
وقال النسائي:"هذا الحديث ليس بثابت، وعبد الكريم ليس بالقوي، وهارون بن رئاب أثبت منه، وقد أرسل الحديث، وهارون ثقة، وحديثه أولى بالصواب من حديث عبد الكريم". انتهى.
قلت: وهو كما قال، فإن عبد الكريم وهو ابن أبي المخارق ضعيف عند جمهور أهل العلم.
وأما هارون بن رئاب -بكسر الراء- التميمي فهو ثقة، وثّقه أحمد، وابن معين، والنسائي وغيرهم. روى عنه أبن عيينة وحماد بن سلمة وغيرهما مرسلًا إلا أن هذا المرسل يقوي رواية حسين بن حريث المروزي الذي سبق ذكره في أول الحديث لاختلاف مخارجهما كما هو المقرر في المصطلح الحديث.
فإذا ثبت هذا فقول النسائي:"هذا الحديث ليس بثابت". يحمل على الإسنادين الذين ساقهما، وإلا فالحديث حسن بالإسناد الأول كما مضى، وسكت عليه النسائي. وقد أطلق النووي عليه الصحة كما في"التلخيص" (3/ 225) لعله لوجود مجموع هذه الطرق. واللَّه تعالى أعلم.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমার স্ত্রী স্পর্শকারীর হাত (অর্থাৎ যে তাকে স্পর্শ করতে চায় তাকে) বারণ করে না। তিনি বললেন: "তুমি চাইলে তাকে দূর করে দাও (তালাক দাও)।" লোকটি বলল: আমি আশংকা করি যে আমার মন তার পিছু নেবে (অর্থাৎ তাকে ছাড়া আমি থাকতে পারব না)। তিনি বললেন: "তবে তুমি তাকে ভোগ করতে থাকো।"
6146 - عن جابر بن عبد اللَّه أن رجلا أتي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه، إن لي امرأة وهي لا تدفع يد لامس. قال:"طلِّقْها". قال: إني أحبها، وهي جميلة. قال:"فاستمتعْ بها".
حسن: رواه البيهقي في السنن الكبرى (7/ 154 - 155) من طرق عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
وله شاهد من حديث ابن عباس كما مضى. وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.
وقوله:"لا تمنع يد لامس" أشكل على العلماء معناه فقيل: معناه الفجور، وأنها لا تمتنع ممن يطلب منها الفاحشة، وبهذا قال أبو عبيد والخلال والنسائي والخطابي والغزالي والنووي وغيرهم.
فإن صحّ هذا المعنى فكيف يأمره النبي صلى الله عليه وسلم بالإبقاء، ولذا ذهب الإمام أحمد وغيرُه إلى معنى التبذير، بأنها لا تمنع أحدًا طلب منها شيئًا من مال زوجها.
ولكن اعترض عليه بأن السخاء مندوب إليه، فلا يكون موجبا لقوله:"طلّقها".
وقيل: معناه أنها لا تمتنع ممن يمد يده ليتلذذ بلمسها، فهم منها زوجها من حالها أنها لا تمتنع ممن أراد منها الفاحشة، لا أن ذلك وقع منها. هذه المعاني كلها ذكرها الحافظ في"التلخيص".
والذي أميل إليه أن الرجل وقع في قلبه ريبة منها، وفي الوقت نفسه لا يستطيع مفارقتها، فأمر النبي صلى الله عليه وسلم بالبقاء معها، والصبر عليها، لعلها يتحسن حالُها بخلاف من ذهب إلى الفجور.
وقول النبي صلى الله عليه وسلم"استمتع بها" إشارة إلى كثرة الجماع منها لكسر شهوتها حتى لا تعرض نفسها على كل من يتقدم إليها. واللَّه تعالى أعلم.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল, আমার একজন স্ত্রী আছে, সে স্পর্শকারীর হাত প্রত্যাখ্যান করে না (অর্থাৎ সে নিজেকে সংযত রাখে না)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে তালাক দাও।" সে বলল: আমি তাকে ভালোবাসি, আর সে সুন্দরী। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তার সাথে উপভোগ করো।"
6147 - عن أنس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حُببت إلىّ النساء، والطيب، وجعل قرة عيني في الصلاة".
حسن: رواه النسائي (3939) وأحمد (13057) والبيهقي (7/ 78) كلهم من حديث سلام أبي المنذر، عن ثابت، عن أنس فذكره واللفظ لأحمد، وإسناده حسن من أجل سلام أبي المنذر وهو سلام بن سليمان المزني القاري البصري قال ابن معين: لا بأس به وعنه رواية أخرى: لا شيء. ويحتمل أن يكون أراد سلامًا الطويل، وقال أبو حاتم: صدوق صالح، وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال أحمد: حسن الحديث كما سيأتي.
قال الذهبي في الميزان (2/ 177): وإسناده قوي.
وقال ابن حجر في التلخيص (3/ 116): إسناده حسن.
قلت: وتابعه جعفر بن سليمان، عن ثابت كما قال البيهقي.
رواه النسائي (3940) والحاكم (2/ 160) كلاهما عن سيار بن حاتم، قال: ثنا جعفر، عن ثابت، عن أنس.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: بل إسناده ضعيف، فإن سيار بن حاتم العنزي أبو سلمة البصري قال أبو أحمد الحاكم:"في حديثه بعض المناكير"، وقال العقيلي:"أحاديثه مناكير" وضعفه ابن المديني، وقال الأزدي: عنده مناكير، ثم هو ليس من رجال مسلم فتنبه.
ثم قال البيهقي: روى ذلك جماعة من الضعفاء، عن ثابت.
قلت: منهم سلّام بن أبي الصهباء، عن ثابت. كما ذكره الدارقطني في"العلل" (12/ 40) ولم أقف على مخرجه، إلا أنه ضعيف. قال البخاري: منكر الحديث.
ومجموع هذه الطرق يقوي بعضها بعضا. ويكون الحديث حسنًا كما قال ابن حجر. ولكن خالفهم حماد بن زيد ومحمد بن عثمان فروياه عن ثابت مرسلًا. قال الدارقطني:"والمرسل أشبه بالصواب".
هكذا قال. والقواعد الحديثية تقتضي أن تقبل الزيادة.
وأما ابن عدي فخلّط بين سلّام بن سليمان وبين سلّام بن أبي الصهباء لأن كلًّا منهما يكنّى بأبي المنذر. فنقل عن البخاري عن سلّام بن أبي الصهباء البصري سمع ثابتًا أنه"منكر الحديث" ونقل عن الإمام أحمد يقول: سلّام أبو المنذر حسن الحديث. الكامل (3/ 1151).
فقول البخاري في سلّام بن أبي الصهباء، وقول الإمام أحمد في سلّام بن سليمان أبي المنذر
فافترقا. ثم قال ابن عدي:"وأرجو أنه لا بأس به".
قلت: إن كان يريد سلّام بن سليمان فهو كما قال، وإن يريد سلّام بن أبي الصهباء فهو لا"لا بأس به" بل ضعيف، وقد فرق البخاري وغيره بينهما.
وقد جاء في بعض الروايات:"حُببت إلي من دنياكم ثلاث".
فقوله:"من دنياكم" خطأ، لأن الصلاة ليست من الدنيا إلا بتأويل. ورواه النسائي من وجهين: في حديث سلّام أبي المندر ذكر"الدنيا" وفي حديث جعفر لم يذكر"الدنيا".
وأما"الثلاث" فلم يرد في الروايات الصّحيحة ولذا نفاها العراقي وابن حجر وغيرهما.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার কাছে নারী ও সুগন্ধিকে প্রিয় করা হয়েছে, আর আমার চোখের শীতলতা স্থাপন করা হয়েছে সালাতের মধ্যে।"
