হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6168)


6168 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا دعا الرجل امرأته إلى فراشه، فأبتْ أن تجيءَ لعنتها الملائكةُ حتى تصبح".

وفي رواية:"إذا باتت المرأة مهاجرةً فراش زوجها، لعنتها الملائكة حتى ترجع".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5193)، ومسلم في النكاح (12: 1436) كلاهما عن سليمان الأعمش، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره، واللفظ للبخاري.

والرواية الثانية عند البخاري في النكاح (5193)، ومسلم في النكاح (120: 1436) كلاهما من طريق شعبة قال: سمعت قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن أبي هريرة، فذكره، واللفظ للبخاري.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো পুরুষ তার স্ত্রীকে বিছানায় ডাকে, আর সে আসতে অস্বীকার করে, তখন সকাল হওয়া পর্যন্ত ফেরেশতারা তাকে লা'নত (অভিসম্পাত) করতে থাকে।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যখন কোনো স্ত্রী তার স্বামীর বিছানা ত্যাগ করে রাত কাটায়, তখন ফেরেশতারা তাকে লা'নত (অভিসম্পাত) করতে থাকে, যতক্ষণ না সে ফিরে আসে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6169)


6169 - عن أبي هريرة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحل للمرأة أن تصوم وزوجها شاهد إلا بإذنه، ولا تأذن في بيته إلا بإذنه، وما أنفقتْ من نفقةٍ عن غير أمره فإنه يؤدّي إليه شطرُه".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5195)، من طريق أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه مسلم في الزكاة (1026) من طريق عبد الرزاق، حدثنا معمر، عن همام بن منبّه، عن أبي هريرة، بنحوه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো নারীর জন্য তার স্বামীর উপস্থিতিতে তার অনুমতি ছাড়া (নফল) রোজা রাখা বৈধ নয়। আর তার অনুমতি ছাড়া তার ঘরে কাউকে প্রবেশ করতে দেবে না। আর তার নির্দেশ ছাড়া সে যা কিছু খরচ করে, তবে এর অর্ধেক তার (স্বামীর) প্রাপ্য হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6170)


6170 - عن طلق بن علي قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا الرجل دعا زوجته لحاجته فلْتأته، وإن كانت على التنور".

حسن: رواه الترمذي (1160) وابن حبان في صحيحه (4165) والبيهقي (7/ 294) كلهم من طريق ملازم بن عمرو، حدثنا عبد اللَّه بن بدر، عن قيس بن طلق، عن أبيه فذكره.
قال الترمذي: حسن غريب.

قلت: وهو كما قال فإن قيس بن طلق حسن الحديث وللحديث طرق أخرى عن قيس بن طلق فمداره عليه.




তলক ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো পুরুষ তার স্ত্রীকে তার প্রয়োজনে ডাকে, তখন সে যেন তার কাছে আসে, যদিও সে রুটি তৈরির চুলা বা উনানের উপর থাকে।









আল-জামি` আল-কামিল (6171)


6171 - عن زيد بن أرقم أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذ دعا الرجل امرأته فلتجب، وإن كانت على ظهر قتب".

حسن: رواه البزار -كشف الأستار- (1472) والطبراني في المعجم الأوسط (7429) كلاهما من حديث محمد بن سواء، ثنا سعيد، عن قتادة، عن القاسم الشيباني، عن زيد بن أرقم، فذكره، ولفظهما سواء.

وإسناده حسن من أجل محمد بن سواء، وهو السدوسي العنبري حسن الحديث.

ورواه الطبراني في الكبير (5/ 227) من وجه آخر عن زيد بن أرقم مثله.

وقال المنذري في الترغيب والترهيب (3019):"رواه الطبراني في الكبير والأوسط بإسناد جيد".

والقَتَبُ: هو الرحل الصغير على قدر سنام البعير.

وفي معناه ما رُوي أيضًا عن ابن أبي أوفى قال: قدم معاذ اليمن -أو الشام- فرأى النصاري تسجد لبطارقتها وأساقفتها. . . فذكر الحديث وجاء فيه:"ولا تؤدي المرأة حق اللَّه عز وجل عليها كله حتى تؤدي حق زوجها عليه كلّه حتى لو سألها نفسها وهي على ظهر قتب لأعطته إياه" ففيه اضطراب كما سيأتي.




যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি কোনো পুরুষ তার স্ত্রীকে ডাকে, তবে তার সাড়া দেওয়া উচিত, যদিও সে উটের হাওদার পিঠে থাকে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6172)


6172 - عن الحصين بن محصن أن عمة له أتت النبي صلى الله عليه وسلم في حاجة، ففرغتْ من حاجتها. فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم"أذات زوج أنت؟" قالت: نعم. قال:"كيف أنت له؟" قالت: ما آلوه إلا ما عجزت عنه. قال:"فانظري أين أنت منه، فإنما هو جنتك ونارُك".

صحيح: رواه الإمام أحمد (19003) والطبراني في الكبير (25/ 183) والأوسط (532) والحاكم (2/ 189) وعنه البيهقي (7/ 291) والنسائي في الكبرى (8963) كلهم من حديث يحيى ابن سعيد الأنصاري، عن بُشير بن يسار، عن الحصين بن محصن فذكره. وقال الحاكم: صحيح.

قلت: وهو كما قال، وجوّد إسناده المنذري في الترغيب والترهيب.

والحصين بن محصن الأنصاري المدني مختلف في صحبته، والذي عليه أكثر أهل العلم أن له صحبة، منهم ابن السكن قال: يقال له صحبة غير أن روايته عن عمته، وليست له رواية عن النبي صلى الله عليه وسلم وذكره أبو موسى المديني في ذيل الصحابة، وحكى عن عبدان وابن شاهين أنهما ذكراه في الصحابة، ونسبه ابن شاهين: أشهليا، وذكره ابن فتحون في الصحابة ونسبه ابن محصن بن عامر ابن أبي قيس بن الأسلت. وأما ابن حبان فذكره في التابعين.




হুসাইন ইবন মুহসিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর এক ফুফু কোনো প্রয়োজনে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তিনি তাঁর প্রয়োজন শেষ করলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি কি বিবাহিতা?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "তুমি তাঁর (স্বামীর) প্রতি কেমন?" তিনি বললেন, "আমি সাধ্যের বাইরে কোনো বিষয়েই ত্রুটি করি না।" তিনি বললেন, "তাহলে তুমি খেয়াল করো, তাঁর (স্বামীর) কাছে তোমার অবস্থান কেমন! কেননা সে-ই তোমার জান্নাত এবং সে-ই তোমার জাহান্নাম। "









আল-জামি` আল-কামিল (6173)


6173 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لو كنت آمرا أحدًا يسجد لأحد، لأمرت المرأة أن تسجد لزوجها".

حسن: رواه الترمذي (1159) والبيهقي (7/ 291) وابن أبي الدنيا في العيال (534) كلهم من حديث النضر بن شميل، أنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو ابن علقمة الليثي فإنه حسن الحديث.

ورواه ابن حبان في صحيحه (4162) من وجه آخر عن أبي أسامة قال: حدثنا محمد بن عمرو بإسناده وجاء فيه: دخل رسول اللَّه حائطا من حوائط الأنصار، فإذا فيه جملان يضربان ويُرعدان، فاقترب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم منهما. فوضعا جرانهما بالأرض. فقال من معه: سجد له، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما ينبغي لأحد أن يسجد لأحد، ولو كان ينبغي أن يسجد لأحد لأمرت المرأة أن تسجد لزوجها لما عظّم اللَّه عليها من حقه".

ومن هذا الوجه رواه أيضًا البزار -كشف الأستار- (2451) مختصرًا وقال: رواه عن محمد بن عمرو أبو أسامة والنضر بن شميل.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমি কাউকে অন্য কারো জন্য সিজদা করার নির্দেশ দিতাম, তাহলে আমি নারীকে নির্দেশ দিতাম যেন সে তার স্বামীকে সিজদা করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6174)


6174 - عن سراقة بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم"لو كنت آمرًا أحدًا أن يسجد لأحد لأمرت المرأة أن تسجد لزوجها".

صحيح: رواه الطبراني في الكبير (7/ 152) وابن أبي الدنيا في العيال (537) كلاهما من حديث وهب بن جرير بن حازم، حدثنا موسى بن عُليّ، عن أبيه، عن سراقة بن مالك فذكره.

وإسناده صحيح، وموسى بن عليّ بن رباح اللخمي، وأبوه ثقتان، روى لهما مسلم وأصحاب السنن. وتحرف في"مجمع الزوائد" (4/ 310) فصار"وهب بن علي عن أبيه" فقال الهيثمي:"لا أعرفهما، وبقية رجاله ثقات".

قلت:"لعله كان في نسخة الطبراني عند الهيثمي هكذا فقال: لا أعرفهما" وأما موسى بن عُلَيّ وأبوه فهما معروفان من رجال الصحيح، ومثلهما لا يخفيان على الحافظ الهيثمي.




সুরাকাহ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমি কাউকে কারো জন্য সিজদা করার আদেশ দিতাম, তাহলে আমি স্ত্রীকে আদেশ দিতাম যেন সে তার স্বামীকে সিজদা করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6175)


6175 - عن عائشة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لو أمرت أحدًا أن يسجد لأحد لأمرت المرأة أن تسجد لزوجها، ولو أن رجلًا أمر امرأته أن تنقل من جبل أحمر إلى جبل أسود، ومن جبل أسود إلى جبل أحمر لكان نَولُها أن تفعل".

حسن: رواه ابن ماجه (1852) عن ابن أبي شيبة وهو في مصنفه (4/ 206) وأحمد (24471) كلهم من طريق عفان، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن سعيد بن المسيب، عن عائشة فذكرته. واللفظ لابن ماجه.

ولفظ أحمد: أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان في نفر من المهاجرين والأنصار، فجاءه بعير فسجد له،
فقال أصحابه: يا رسول اللَّه، تسجد لك البهائم والشجر، فنحن أحق أن نسجد لك. فقال:"اعبدوا ربكم، وأكرموا أخاكم، ولو كنت آمرًا أحدًا أن يسجد لأحد. . ." فذكر الحديث.

قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 310):"رواه أحمد وفيه علي بن زيد وحديثه حسن، وقد ضُعّف". وأورده مرة ثانية (9/ 9) وقال: رواه أحمد"إسناده جيد".

قلت: وهو كما قال؛ فإن رواية حماد بن سلمة، عن علي بن زيد صحيحة.

وفي هذا الباب أحاديث لا تصح، منها: ما روي عن أبي هريرة أيضًا قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا صلت المرأة خَمْسها، وصامت شهرها، وحصّنت فرجها، وأطاعت بعْلها، دخلت من أي أبواب الجنة شاءت".

رواه ابن حبان في صحيحه (4163) من حديث داهر بن نوح الأهواني، قال: حدثنا أبو همام محمد بن الزبرقان، قال: حدثنا هُدْبَةُ بن المنهال، عن عبد الملك بن عمير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وفيه داهر بن نوح شيخ لأهل الأهواز قال الدارقطني في"العلل" (1/ 174)"ليس بقوي في الحديث" وقال ابن القطان:"لا يعرف".

وقال ابن حبان عقب رواية الحديث:"تفرد بهذا الحديث عبد الملك بن عُمير من حديث أبي سلمة. وما رواه عن عبد الملك إلا هُدْبَة بن المنهال، وهو شيخ هوازي".

ورُوي مثله عن أنس بن مالك رواه البزار -كشف الأستار- (1463) من طريق روّاد بن الجراح، ثنا سفيان الثوري، عن الزبير بن عدي، عن أنس فذكر الحديث.

قال البزار:"لا نعلمه عن أنس بهذا اللفظ مرفوعًا إلا عن الزبير، ولا عن الزبير إلا عن الثوري، ولا عنه إلا رواد، ورواد صالح الحديث ليس بالقوي، حدّث عنه جماعة من أهل العلم".

كذا ليّن القول في رواد، وقد قال النسائي: منكر، وقال الدارقطني: متروك، وذكر ابن أبي حاتم هذا الحديث في"العلل" (2/ 177) فقال أبوه: هذا حديث باطل ليس له أصل، لعلهم لقنوا روادًا، وأدخلوا عليه، إنما روي عن الثوري قال:"بلغني مرسل".

وكذلك لا يصح ما رواه الحاكم (2/ 189) عن علي بن حمشاذ العدل، ثنا محمد بن المغيرة السكري بهمدان، ثنا القاسم بن الحكم العرني، ثنا سليمان بن داود اليمامي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: جاءت امرأة إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالت يا رسول اللَّه، أنا فلانة بنت فلان. قال:"قد عرفتك فما حاجتك؟" قالت: حاجتي إلى ابن عمي فلان العابد. قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: قد عرفته" قالت: يخطبني فأخبِرْني ما حق الزوج على الزوجة؟ فإن كان شيئًا أطيقه تزوجته، وإن لم أطق لا أتزوج. قال:"من حق الزوج على الزوجة إن لو سالت منخراه دمًا، وقيحًا، وصديدًا، فلحسته بلسانها ما أدّت حقه، لو كان ينبغي لبشر أن يسجد لبشر لأمرت المرأة
أن تسجد لزوجها إذا دخل عليها لما فضّله اللَّه عليها".

قالت: والذي بعثك بالحق لا أتزوج ما بقيت في الدنيا.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد" وتعقبه الذهبي فقال:"بل منكر، وسليمان واه، والقاسم صدوق تكلم فيه".

قلت: وهو كما قال الذهبي. فإن سليمان قال فيه ابن معين: ليس بشيء.

وقال البخاري: منكر الحديث. وقال ابن حبان: ضعيف. وقال آخرون: متروك. وساق ابن عدي عدة أحاديث عنه، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة منها هذا الحديث ثم قال:"ولسليمان بن داود غير ما ذكرت عن يحيى بهذا الإسناد. وعامة ما يُروى عن يحيى بن أبي كثير يُعرف، وعامة ما يرويه بهذا الإسناد لا يتابعه عليه أحد"."الكامل" (3/ 1126).

ورُوي مثله عن أبي سعيد الخدري قال: جاء رجل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بابنة له فقال: يا رسول اللَّه، هذه ابنتي قد أبتْ أن تتزوج، فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم:"أطيعي أباك" فقالت: والذي بعثك بالحق، لا أتزوج حتى تُخبرني ما حق الزوج على زوجته؟ فقال لها النبي صلى الله عليه وسلم:"حق الزوج على زوجته أن لو كانت قرْحة فلَحَسَتها ما أدتْ حقه" قالت: والذي بعثك بالحق لا أتزوج أبدًا. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تنكحُوهن إلا بإذن أهلهنّ" وفي رواية"بإذنهن".

رواه ابن حبان في صحيحه (4164) والدارقطني (3/ 237) والحاكم (2/ 188) وعنه البيهقي (7/ 291) والبزار -كشف الأستار- (1465) كلهم من حديث جعفر بن عون، ثنا ربيعة بن عثمان، عن محمد بن يحيى بن حيان، عن نهار العبدي، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

فتعقبه الذهبي فقال:"بل منكر"، قال أبو حاتم:"ربيعة منكر الحديث".

وكذلك لا يصحُّ ما رويَ عن أنس بن مالك قال: كان أهل البيت من الأنصار لهم جمل يَسنُون عليه، وإن الجمل استصعب عليهم فمنعهم ظهرَه، وإن الأنصار جاؤوا إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالوا: إنه كان لنا جمل نسْني عليه، وإنه استصعب علينا، ومنعنا ظهره، وقد عطِشَ الزرعُ والنخلُ. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لأصحابه:"قوموا" فقاموا فدخل الحائطَ، والجملُ في ناحيته، فمشى النبي صلى الله عليه وسلم نحوه، فقالت الأنصار: يا رسول اللَّه، إنه قد صار مثل الكَلْب الكَلِبِ، وإنا نخاف عليك صولتَه، فقال:"ليس عليّ منه بأس" فلما نظر الجمل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أقبل نحوه، حتى خرّ ساجدا بين يديه، فأخذ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بناصيته أذلّ ما كانت قط، حتى أدخله في العمل، فقال له أصحابه يا نبي اللَّه، هذه بهيمة لا تعقل تسجد لك، ونحن نعقل، فنحن أحق أن نسجد لك! فقال:"لا يصلح لبشر أن يسجد لبشر، ولو صلح لبشر أن يسجد لبشر لأمرت المرأة أن تسجد لزوجها من عظم حقه عليها، والذي نفسي بيده، لو كان من قدمه إلى مفرق رأسه قرحة تتبجَّس بالقيح والصديد، ثم استقبلته
تَلْحَسُه، ما أدَّتْ حقه".

رواه أحمد (12614) عن حسن بن محمد، والبزار في مسنده (13/ 93) عن محمد بن معاوية البغدادي الأنماطي -ثقة- واللفظ لهما، والنسائي في الكبرى (9147) عن محمد بن معاوية مختصرا، كلاهما أعني -حسين بن محمد ومحمد بن معاوية- عن خلف بن خليفة، عن حفص ابن أخي أنس، عن عمه أنس بن مالك فذكره.

قال البزار: هذا الحديث لا نعلمه بروي بهذا اللفظ عن أنس إلا بهذا الإسناد، وحفص ابن أخي أنس فلا نعلم حدّث عنه إلا خلف بن خليفة.

قلت: إن كان قصده لا يروي عن حفص إلا خلف بن خليفة فليس بصحيح، فقد روى عنه جمع، وإن كان قصده هذا الحديث بهذا الطول لا يروي عن حفص إلا خلف بن خليفة فهو كما قال؛ فإن حفصا ابن أخي أنس روى عنه جمع، منهم خلف بن خليفة وقال أبو حاتم: صالح الحديث ووثّقه الدارقطني.

وأما خلف بن خليفة الأشجعي التابعي فمختلط قال الإمام أحمد: رأيته مفلوجًا سنة سبع وسبعين ومائة، وكان لا يفهم فمن كتب عنه قديمًا فسماعه صحيح. وقيل له: في أي سنة مات؟ قال: أظنه في سنة ثمانين. وقال ابن سعد:"كان ثقة ثم أصابه الفالج قبل أن يموت حتى ضعف وتغير لونه واختلط" ولم يذكروا في ترجمته من روى عنه قبل الاختلاط ومن روى عنه بعد الاختلاط، فاحتمال الخطأ موجود في بعض رواياته كما قال ابن عدي.

وفي الباب ما روي عن قيس بن سعد قال: أتيت الحيرة فرأيتهم يسجدون لمرزبان لهم، فقلت: رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أحق أن يُسجد له، قال: فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم فقلت: إني أتيت الحيرة فرأيتهم يسجدون لمرزبان لهم، فأنت رسول اللَّه أحق أن يسجد لك قال:"أرأيت لو مررت بقبري أكنت تسجد له؟" قال: قلت: لا. قال:"فلا تفعلوا، لو كنت آمرًا أحدا أن يسجد لأحد لأمرت النساء أن يسجُدن لأزواجهن لما جعل اللَّه لهم عليهن من الحق".

رواه أبو داود (2140) والحاكم (2/ 187) والبيهقي (7/ 291) كلهم من طريق شريك، عن حصين بن عبد الرحمن السلمي، عن عامر الشعبي، عن قيس فذكره. قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: شريك هو ابن عبد اللَّه النخعي مختلف فيه، أكثر أهل العلم على أنه سيء الحفظ: أي إذا لم يتابع على روايته فإنه لا يُقبل، وهذا منها فإني لم أقف على من تابعه ورواه عن حصين بن السلمي.

وأما ما رُوي عن عبد اللَّه بن أبي أوفى قال: لما قدم معاذ من الشام سجد للنبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما هذا يا معاذ؟" قال: أتيت الشام فوافقتُهم يسجدون لأساقفتهم وبطارقتهم، فودِدْتُ في نفسي أن نفعل ذلك بك. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فلا تفعلوا، فإني لو كنت آمرًا أحدًا أن يسجد لغير اللَّه، لأمرت المرأة أن تسجد لزوجها. والذي نفس محمد بيده لا تؤدّي المرأة حق ربها حتى تؤدّي حق
زوجها، ولو سألها نفسها وهي على قتب لم تمنعه" فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (1853) وابن حبان (4171) والبيهقي (7/ 292) كلهم من طرق عن حماد بن زيد، عن أيوب عن القاسم الشيباني، عن ابن أبي أوفى فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل القاسم وهو ابن عوف الشيباني روى له مسلم حديثًا واحدًا، ولكن قال النسائي ضعيف، وقال أبو حاتم: مضطرب الحديث، ومحله عنده الصدوق، يعني إذا لم يضطرب في حديثه فهو صدوق، وهذا الحديث مما اضطرب فيه القاسم بن عوف كما قال أبو حاتم نفسه في العلل (2/ 252 - 253).

وذكر أيضًا الدارقطني في"العلل" (6/ 37 - 40) اضطرابه في رواية هذا الحديث فإنه رواه بألوان. ونص على أن الاضطراب منه.

فمرة قال كما مضى، وأخرى أن معاذا قدم من اليمن ومن المعلوم أنه لم يرجع من اليمن إلا بعد وفاة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وسجد لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الرواية السابقة، وفي رواية لم يسجد، بل قال رأيت النصارى يسجدون لبطارقتهم وأساقفتهم. فروّأْتُ في نفسي أنك أحق أن تُعظم فقال النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.

وهذا اللفظ أقرب إلى الحقيقة، إذ كيف يتصور من مثل معاذ بن جبل أحد فقهاء الإسلام وأعلامهم أن يسجد للنبي صلى الله عليه وسلم وهو أعرف الناس بأن السجود لا يجوز لغير اللَّه وهذه علة أخرى لتضعيف هذا الحديث وهي نكارة في المتن.

وللحديث طرق أخرى من غير القاسم وهو ما رواه الإمام أحمد (21986) عن وكيع، حدثنا الأعمش، عن أبي ظبيان، عن معاذ بن جبل أنه لما رجع من اليمن فذكر الحديث.

وأبو ظبيان واسمه حصين بن جندب الجنبي لم يدرك معاذًا.

وفي رواية عن الأعمش، عن أبي ظبيان، عن رجل من الأنصار، عن معاذ بن جبل فذكره. وفيه رجل مجهول لم يسم.

والخلاصة فيه أن حديث ابن أبي أوفى لا يصح من وجه من الوجوه.

وكذلك لا يصح ما روي عن عائشة قالت: سألت النبي صلى الله عليه وسلم: أي الناس أعظم حقا على المرأة؟ قال:"زوجها" قلت: فأي الناس أعظم حقا على الرجل؟ قال:"أمه".

رواه النسائي في الكبرى (9148) والبزار -كشف الأستار- (1462) والحاكم (2/ 175) كلهم من طريق مسعر، عن أبي عتبة، عن عائشة فذكرته.

وأبو عتبة كما قال ابن حجر في"التقريب" شيخ لمسعر"مجهول".

قلت: وقد أدخل بعض الرواة بين أبي عتبة وعائشة رجلًا لم يسم ففيه جهالة الواسطة.

وكذلك لا يصح ما روي عن أم سلمة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أيما امرأة ماتت، وزوجها
راضٍ عنها دخلت الجنة".

رواه الترمذي (1161) وابن ماجه (1854) والحاكم (4/ 174) وابن أبي الدنيا في العيال (532) كلهم من طريق مساور الحميري، عن أمه، قالت: سمعت أم سلمة فذكرته.

قال الترمذي: حسن غريب. وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: ليس بحسن فضلًا عن أن يكون صحيحا، فإن مساورا الحميري وأمه مجهولان.

وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم أن امرأة أتته، فقالت: ما حق الزوج على امرأته؟ فقال:"لا تمنعه نفسها وإن كانت على ظهر قتب، ولا تعطي من بيته شيئًا إلا بإذنه، فإن فعلت ذلك كان له الأجر وعليها الوزر، ولا تصوم تطوّعا إلا بإذنه، فإن فعلت أثمت ولم تؤجر، وأن لا تخرج من بيته إلا بإذنه، فإن فعلت لعنتها الملائكة -ملائكة الغضب وملائكة الرحمة- حتى تتوب أو تراجع" قيل: وإن كان ظالمًا؟ قال:"وإن كان ظالمًا".

رواه أبو داود الطيالسي في مسنده (2063) ومن طريقه البيهقي (7/ 292 - 293) عن جرير، عن ليث، عن عطاء، عن ابن عمر فذكره. وليث هو ابن أبي سليم سيء الحفظ مع الاختلاط، وقد اضطرب في رواية هذا الحديث فمرة روى هكذا، وأخرى عن مجاهد، عن ابن عباس، وثالثة عن عطاء، عن ابن عباس. وهذه كلها تدل على تخاليط ليث بن أبي سليم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমি কাউকে নির্দেশ দিতাম যে, সে যেন অন্য কাউকে সিজদা করে, তাহলে আমি স্ত্রীকে নির্দেশ দিতাম তার স্বামীকে সিজদা করতে। আর যদি কোনো স্বামী তার স্ত্রীকে নির্দেশ দেয় যে, সে যেন একটি লাল পর্বতকে কালো পর্বতে এবং একটি কালো পর্বতকে লাল পর্বতে সরিয়ে দেয়, তবুও তার উচিত হলো সেই নির্দেশ পালন করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (6176)


6176 - عن عبد اللَّه بن عمرو قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا ينظر اللَّه إلى امرأة لا تشكر لزوجها، وهي لا تستغني عنه".

صحيح: رواه النسائي في الكبرى (9086) عن عمرو بن منصور، قال: حدثنا محمد بن محبوب، قال: حدثنا سَرَّار بن مجشِّر بن قبيصة البصري -ثقة-، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن سعيد بن المسيب، عن عبد اللَّه بن عمرو، فذكره.

قال النسائي:"سَرَّار بن مجشِّر هذا ثقة بصري، هو ويزيد بن زريع يُقَدَّمان في سعيد بن أبي عروبة، لأن سعيدا كان تغير في آخر عمره، فمن سمع منه قديما فحديثه صحيح". انتهى.

قلت: سعيد بن أبي عروبة لم يتفرد به، بل تابعه أيضًا عمر بن إبراهيم، رواه الحاكم (2/ 190) وعنه البيهقي (7/ 294) عن بكر بن محمد بن حمدان المروزي، ثنا إسماعيل القاضي، ثنا شاذ بن فياض، ثنا عمر بن إبراهيم، عن قتادة، بإسناده مثله.

وقال الحاكم: صحيح الإسناد. ولكن قال البيهقي:"هكذا أتى به مرفوعا، والصحيح أنه من قول عبد اللَّه بن عمرو غير مرفوع".

وهو يقصد به ما رواه النسائي في الكبرى (9088) من وجه آخر عن شعبة، عن قتادة بإسناده من
قول عبد اللَّه بن عمرو.

ولكن النسائي نفسه رجَّح المرفوع، فإنه صحَّح أولا إسناد سعيد بن أبي عروبة، ثم ذكر له موافقته لعمر بن إبراهيم على رفعه، ولكن الحسن بدلا من سعيد بن المسيب.

وقد وجدنا أن عمر بن إبراهيم هذا روى عن قتادة، عن سعيد بن المسيب عند الحاكم. وعمر ابن إبراهيم هذا وثّقه أحمد بن حنبل وابن معين، وقال عبد الصمد بن عبد الوارث: ثقة وفوق الثقة. فوجب قول زيادتهما، والحكم لحديثهما.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ সেই নারীর দিকে তাকাবেন না যে তার স্বামীর প্রতি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না, অথচ সে তার থেকে মুখাপেক্ষীহীন নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6177)


6177 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"خير نساء رَكبْن الإبل صالحو نساء قريش، أحناه على ولدٍ في صغره، وأرعاه على زوج في ذات يده".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5082) ومسلم في فضائل الصحابة (200: 2527) كلاهما من طريق أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره، واللفظ للبخاري.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উটে আরোহণকারী নারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হলো কুরাইশ গোত্রের নেককার নারীরা; যারা তাদের শৈশবে সন্তানদের প্রতি সর্বাধিক স্নেহশীলা এবং স্বামীর সম্পদের প্রতি সর্বাধিক যত্নশীলা।"









আল-জামি` আল-কামিল (6178)


6178 - عن أسماء بنت أبي بكر قالت: تزوجني الزبير وماله في الأرض من مالٍ ولا مملوك، ولا شيء غير ناضح وغير فرسه، فكنت أعلف فرسه وأستقي الماء، وأخرز غرَبه وأَعجن، ولم أكن أحسن أَخْبز، وكان يخبِزُ جارات لي من الأنصار، وكن نسوة صدق، وكنت أنقل النوى من أرض الزبير التي أقطعه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على رأسي، وهي مني على ثلثي فرسخ، فجئت يوما والنوى على رأسي، فلقيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ومعه نفر من الأنصار، فدعاني ثم قال:"إخ إخ"، ليحملني خلفه، فاستحييت أن أسير مع الرجال، وذكرت الزبير وغيرته، وكان أغيرَ الناس، فعرف رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إني قد استحييت فمضى، فجئت الزبير فقلت: لقيني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وعلى رأسي النوى، ومعه نفر من أصحابه، فأناخ لأركب، فاستحييت منه وعرفت غيرتك، فقال: واللَّه لحملك النوى على رأسك كان أشد عليّ من ركوبك معه. قالت: حتى أرسل إليّ أبو بكر بعد ذلك بخادم يكفيني سياسة الفرس، فكأنما أعتقتني.

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5224)، ومسلم في السلام (2182) كلاهما من حديث أبي أسامة، حدثنا هشام، قال: أخبرني أبي، عن أسماء بنت أبي بكر رضي الله عنهما، فذكرته.

فقه الحديث: قال ابن حجر: واستدل بهذه القصة على أن على المرأة القيام بجميع ما يحتاج إليه زوجها من الخدمة، وإليه ذهب أبو ثور.

وحمله الباقون على أنها تطوّعت بذلك ولم يكن لازمًا.
قال:"والذي يترجّح حمل الأمر في ذلك على عوائد البلاد فإنها مختلفة في هذا الباب" انظر فتح الباري (9/ 324).




আসমা বিনতে আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যুবাইর আমাকে বিবাহ করেন। তখন যমীনে তার কোনো ধন-সম্পদ, কোনো গোলাম, কিংবা তার ঘোড়া এবং পানি টানার বাহনটি ছাড়া আর কিছুই ছিল না। আমি তার ঘোড়ার ঘাস দিতাম, পানি উঠাতাম, তার মশক সেলাই করতাম এবং আটা মাখতাম। তবে আমি ভালোভাবে রুটি তৈরি করতে জানতাম না। আমার আনসারী প্রতিবেশিনীরা রুটি তৈরি করে দিত এবং তারা ছিল অত্যন্ত সৎ নারী। আমি যুবাইরের সেই জমি থেকে খেজুরের আঁটি মাথায় করে বহন করে আনতাম, যে জমি তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দান করেছিলেন। জমিটি আমার বাসস্থান থেকে দুই-তৃতীয়াংশ ফারসাখ (প্রায় দুই মাইল) দূরে ছিল। একদিন আমি আঁটিগুলো মাথায় নিয়ে আসছিলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তাঁর সাথে আনসার গোত্রের কয়েকজন লোক ছিলেন। তিনি আমাকে ডাকলেন, তারপর 'ইখ, ইখ' (উটের প্রতি ইঙ্গিত করে বসার জন্য) বলে আমাকে তার পিছনে সওয়ার করতে চাইলেন। কিন্তু পুরুষদের সাথে চলাফেরা করতে আমার লজ্জা বোধ হচ্ছিল। আর আমার যুবাইরের আত্মমর্যাদাবোধের (غيرةতের) কথা মনে পড়ল। তিনি ছিলেন (সেই সময়ের) সবচেয়ে বেশি আত্মমর্যাদাবোধসম্পন্ন ব্যক্তি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বুঝতে পারলেন যে আমি লজ্জাবোধ করছি, তাই তিনি চলে গেলেন। আমি যুবাইরের কাছে এসে বললাম, আমার মাথায় খেজুরের আঁটি থাকা অবস্থায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ হয়েছিল। তাঁর সাথে কয়েকজন সাহাবীও ছিলেন। তিনি আমাকে সওয়ার করার জন্য উট বসালেন। কিন্তু আমি তাঁর কাছ থেকে লজ্জা পেলাম এবং আপনার আত্মমর্যাদাবোধের কথা স্মরণ করলাম। তখন তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! তোমার মাথায় খেজুরের আঁটি বহন করে আনা আমার কাছে তার সাথে সওয়ার হওয়ার চেয়েও অনেক বেশি কষ্টের ছিল। আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমার বাবা আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে একজন খাদেম পাঠালেন, যে ঘোড়ার দেখাশোনা করার ব্যাপারে আমার জন্য যথেষ্ট ছিল। আমার কাছে মনে হলো যেন তিনি আমাকে মুক্ত করে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6179)


6179 - عن علي، أن فاطمة أتت النبي صلى الله عليه وسلم تشكو إليه ما تلقى في يدها من الرّحى، وبلغه أنه جاءه رقيق، فلم تصادفه، فذكرتْ ذلك لعائشة، فلما جاء أخبرته عائشة، قال: فجاءنا وقد أخذنا مضاجعنا، فذهبنا نقوم، فقال:"على مكانكما" فجاء فقعد بيني وبينها، حتى وجدتُ بَرْدَ قدميه على بطني، فقال:"ألا أدلكما على خير مما سألتما؟ إذا أخذتما مضاجعكما، أو آويتما إلى فراشكما، فسبّحا ثلاثًا وثلاثين، واحمدا ثلاثًا وثلاثين، وكبِّرا أربعًا وثلاثين، فهو خير لكما من خادم".

متفق عليه: رواه البخاري في النفقات (5361) ومسلم في الذكر والدعاء (2727) كلاهما من طريق شعبة، قال: حدثني الحكم، عن ابن أبي ليلى، حدثنا علي، فذكره.

فائدة: قال ابن حجر:"قوله:"ألا أدلكما على خير مما سألتما" أن الذي يلازم ذكر اللَّه يُعطي قوةً أعظم من القوة التي يعملها له الخادم، أو تتسهل الأمور عليه بحيث يكون تعاطيه أسهل من تعاطي الخادم لها، هكذا استنبطه بعضهم من الحديث، والذي يظهر أن المراد أن نفع التسبيح مختص بالدار الآخرة ونفع الخادم مختص بالدار الدنيا، والآخرة خير وأبقى" الفتح (9/ 506).

قلت: ولا مانع من إيراد المعنين معًا. وعندي وجه ثالث وهو: إن الانشغال بالتسبيح والتحميد عند فراغ الإنسان من تعب النهار يُنسي ما لقيه من المشقة وبالتالي يستغني عن وجود الخادم؛ لأن نفسه مشغولة بذكر اللَّه عز وجل والحاجة الدنيوية لا تجد مكانا في هذه النفس.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে যাঁতা ঘোরানোর কারণে তাঁর হাতে যে কষ্ট হতো, সে সম্পর্কে অভিযোগ করলেন। আর তিনি জানতে পেরেছিলেন যে তাঁর (নবীর) নিকট কিছু দাস-দাসী এসেছে, কিন্তু তিনি (নবীকে) পেলেন না। অতঃপর তিনি বিষয়টি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বললেন। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন এলেন, তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বিষয়টি জানালেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে এলেন যখন আমরা শোবার প্রস্তুতি নিচ্ছিলাম। আমরা উঠে দাঁড়াতে চাইলে তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের জায়গায় থাকো।" অতঃপর তিনি এলেন এবং আমার ও তার (ফাতিমার) মাঝে বসলেন, এমনকি আমি তাঁর উভয় পায়ের শীতলতা আমার পেটের উপর অনুভব করলাম। তিনি বললেন: "আমি কি তোমাদেরকে তোমাদের চাওয়া বস্তুর চেয়েও উত্তম কিছুর সন্ধান দেব না? যখন তোমরা শোবার প্রস্তুতি নেবে, অথবা তোমাদের বিছানায় যাবে, তখন তোমরা ৩৩ বার ‘সুবহানাল্লাহ’ বলবে, ৩৩ বার ‘আলহামদুলিল্লাহ’ বলবে এবং ৩৪ বার ‘আল্লাহু আকবার’ বলবে। এটা তোমাদের জন্য একজন খাদেমের চেয়েও উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (6180)


6180 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"كلّكم راع وكلكم مسؤول عن رعيته، والأمير راعٍ، والرجل راعٍ على أهل بيته، والمرأة راعية على بيت زوجها وولده، فكلّكم راعٍ وكلكم مسؤول عن رعيته".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5200) من طريق موسى بن عُقبة، ومسلم في الإمارة (20: 1829) من طريق الليث - كلاهما عن نافع، عن ابن عمر. وزاد مسلم:"والعبدُ راعٍ على مال سيّده، وهو مسؤول عنه".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা প্রত্যেকেই দায়িত্বশীল এবং তোমাদের প্রত্যেকেই তার অধীনস্থদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসিত হবে। শাসক (আমীর) একজন দায়িত্বশীল, পুরুষ তার পরিবারের উপর দায়িত্বশীল, আর নারী তার স্বামীর ঘর ও তার সন্তানের উপর দায়িত্বশীলা। সুতরাং তোমরা প্রত্যেকেই দায়িত্বশীল এবং তোমাদের প্রত্যেকেই তার অধীনস্থদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসিত হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6181)


6181 - عن عائشة قالت: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني لأعلمُ إذا كنت عني راضية، وإذا كنت علي غَضْبي"، قالت: فقلتُ: من أين تعرف ذلك؟ فقال:"أما إذا كنت عني راضية فإنك تقولين: لا ورب محمد، وإذا كنت غضبي قلت: لا ورب إبراهيم"، قالت: قلت: أجل واللَّه يا رسول اللَّه، ما أهجر إلا اسمك.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5228)، ومسلم في فضائل الصحابة (80: 2439) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.

والغضب هنا: المراد منه الغيرة التي تلحق نساء النبي صلى الله عليه وسلم، وأما الغضب بمعنى الكراهية فهي لا يتصور من عائشة في حق النبي صلى الله عليه وسلم لأنها كبيرة ومُحْبطة للأعمال، بخلاف غير النبي صلى الله عليه وسلم فممكن.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আমি অবশ্যই জানতে পারি কখন তুমি আমার প্রতি সন্তুষ্ট থাকো এবং কখন তুমি আমার উপর রাগান্বিত থাকো।" তিনি (আয়েশা) বললেন: আমি বললাম, "আপনি তা কীভাবে জানতে পারেন?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তুমি আমার প্রতি সন্তুষ্ট থাকো, তখন তুমি বলো: 'না, মুহাম্মাদের রবের কসম!' আর যখন তুমি রাগান্বিত থাকো, তখন তুমি বলো: 'না, ইবরাহীমের রবের কসম!'" তিনি (আয়েশা) বললেন: আমি বললাম, "হ্যাঁ, আল্লাহর কসম! হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি শুধু আপনার নামটাই (রাগ প্রকাশকালে) পরিহার করি।"









আল-জামি` আল-কামিল (6182)


6182 - عن جابر قال: تزوجت امرأة فقال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هل تزوجت؟" قلت: نعم. قال:"أبكرًا أم ثيْبًا؟" قلت: ثيّبًا. قال:"فأين أنت من العذارى ولعَابها؟".

قال شعبة: فذكرته لعمرو بن دينار. فقال: قد سمعته من جابر. وإنما قال:"فهلا جارية تلاعبُها وتلاعبُك؟".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5080)، ومسلم في الرضاع (55: 1466) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا محارب قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه يقول: فذكره واللفظ لمسلم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এক মহিলাকে বিবাহ করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি কি বিবাহ করেছ?" আমি বললাম, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "কুমারী না বিধবা (তালাকপ্রাপ্তা)?" আমি বললাম, "বিধবা।" তিনি বললেন, "তুমি কুমারী মেয়ে এবং তাদের সাথে আমোদ-প্রমোদ করা থেকে কেন দূরে রইলে?" শু’বাহ (রাবী) বলেন, আমি (এই কথাটি) আমর ইবনু দীনারের কাছে উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন, আমি জাবিরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে এটি শুনেছি। তবে তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন, "তুমি কেন একজন কুমারী মেয়েকে বিবাহ করলে না, যার সাথে তুমি খেলা করবে এবং সেও তোমার সাথে খেলা করবে?"









আল-জামি` আল-কামিল (6183)


6183 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: كنا نتقي الكلام والانبساط إلى نسائنا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم هيبة أن ينزل فينا شيء، فلما توفّي النبي صلى الله عليه وسلم تكلّمنا وانبسطنا.

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5187) عن أبي نعيم، حدثنا سفيان، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر رضي الله عنهما. فذكره.

قوله:"فلما توفي. . الخ".

قال ابن حجر: يشعر بأن الذي كانوا يتركونه كان من المباح تحت البراءة الأصلية، فكانوا يخافون أن ينزل في ذلك منع أو تحريم، وبعد وفاة النبي صلى الله عليه وسلم أمِنوا ففعلوا تمسكًا بالبراءة الأصلية.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমাদের স্ত্রীদের সাথে কথা বলা ও স্বাভাবিকভাবে মেলামেশা করা থেকে বিরত থাকতাম, এই ভয়ে যে হয়তো আমাদের ব্যাপারে (কোনো কঠোর নির্দেশ) অবতীর্ণ হবে। অতঃপর যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করলেন, তখন আমরা (স্বাচ্ছন্দ্যে) কথা বললাম এবং মেলামেশা শুরু করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (6184)


6184 - عن عائشة أن امرأة من الأنصار زوّجت ابنتها، فتمعَّط شعرُ رأسِها، فجاءت إلى النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له، فقالتْ: إنّ زوجها أمرني أن أصل في شعَرها. فقال:"لا، إنه قد لُعِن الموصِلات".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5205)، ومسلم في اللباس والزينة (188: 2123) كلاهما من طريق إبراهيم بن نافع، أخبرني الحسن بن مسلم بن ينّاق، عن صفية بنت شيبة، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاري.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক আনসারী মহিলা তার মেয়ের বিয়ে দিলেন। অতঃপর (বিয়ের পর) তার মাথার চুল ঝরে গেল (বা খুব পাতলা হয়ে গেল)। তখন সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে এ ব্যাপারে বলল। অতঃপর সে বলল: তার স্বামী আমাকে আদেশ করেছেন যে আমি যেন তার চুলে চুল সংযোজন করি (পরচুল লাগাই)। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না। নিশ্চয়ই যারা চুল সংযোজন করে (অর্থাৎ যারা অন্যের চুলে পরচুল লাগিয়ে দেয়), তারা অভিশপ্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (6185)


6185 - عن أنس بن مالك قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم لا يطرق أهله. كان لا يدخل إلا غُدوةً
أو عشيةً.

متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1800)، ومسلم في الإمارة (1928 - 180) كلاهما من حديث همام بن يحيى، حدثنا إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের বেলা হঠাৎ করে তাঁর পরিবারের কাছে যেতেন না। তিনি কেবল সকালের প্রথমভাগে অথবা সন্ধ্যায় প্রবেশ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6186)


6186 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في غزاة، فلما قدمنا المدينة ذهبنا لندخل، فقال:"أمهلوا حتى ندخل ليلًا (أي عشاءً) كي تمتشط الشَّعِثةُ، وتستجِدّ المُغيبَةُ".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5079)، ومسلم في الإمارة (1928: 181) كلاهما من طريق هُشيم، حدثنا سيّار، عن الشعبي، عن جابر، فذكره، واللفظ لمسلم.

وفي رواية عند البخاري (5344):"إذا طال أحدكم الغيبة فلا يطرق أهله ليلًا".

وفي رواية عند أبي داود (2777) من وجه آخر عن مغيرة عن الشعبي:"إن أحسن ما دخل الرجل على أهله إذا قدم من سفر أول الليل".




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক যুদ্ধে ছিলাম। যখন আমরা মদিনায় পৌঁছলাম এবং (ঘরে) প্রবেশ করতে গেলাম, তখন তিনি বললেন: "তোমরা অপেক্ষা করো, আমরা রাতে (অর্থাৎ সন্ধ্যায়) প্রবেশ করব, যাতে এলোমেলো চুলের মহিলারা চুল আঁচড়ে নিতে পারে এবং যার স্বামী দূরে ছিল সে নিজেকে প্রস্তুত করে নিতে পারে।"

বুখারীর এক বর্ণনায় এসেছে: "যখন তোমাদের কেউ দীর্ঘ সময় অনুপস্থিত থাকে, তখন সে যেন রাতে হঠাৎ করে তার পরিবারের কাছে না আসে।"

আবু দাউদের অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "কোনো লোক সফর থেকে ফিরে এসে তার পরিবারের কাছে প্রবেশ করার উত্তম সময় হলো রাতের প্রথম ভাগ।"









আল-জামি` আল-কামিল (6187)


6187 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يكره أن يأتي الرجل أهله طروقًا. وزاد في رواية: يتخوّنهم أو يلتمِسُ عثراتهم.

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5243)، ومسلم في الإمارة (185: 1928) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا محارب بن دثار، قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه، فذكره. واللفظ للبخاري.

والزيادة لمسلم من رواية وكيع، عن سفيان (هو الثوري) عن محارب، به.

ورواه أيضًا من طريق عبد الرحمن -هو ابن مهدي- عن سفيان، به.

وقال: قال سفيان:"لا أدري هذا في الحديث أم لا؟" يعني"أن يتخونهم أو يلتمس عثراتهم".

قلت: ووقعت هذه الزيادة أيضًا من رواية أبي نعيم -هو الفضل بن دكين- عن سفيان، به، من غير شك. أخرجه النسائي في الكبرى (9096) وهو الصحيح، فإن الشك يزول باليقين.

وقولهم:"يتخونهم. . ." قال الخطابي في معالم السنن (2/ 92):"معناه كيلا يطلع منهم على خيانة أو رية".

وفي الباب ما رُوي عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نزل العقيق، فنهي عن طروق النساء الليلة التي يأتي فيها فعصاه فتيان، فكلاهما رأى ما يكره.

رواه أحمد (5814) والبزار -كشف الأستار- (1485) كلاهما من حديث خالد بن الحارث، عن محمد بن عجلان، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ورجاله ثقات غير محمد بن عجلان فإنه ثقة إلا أنه اضطرب في حديث نافع كما قال يحيى بن معين:"كان ابن عجلان مضطرب الحديث في حديث نافع، ولم يكن له تلك القيمة عنده".

وذكره العقيلي في"الضعفاء" (4/ 118).
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد اللَّه بن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"لا تطرقوا النساء ليلًا".

رواه البزار - كشف الأستار (1487) عن محمد بن المثنى، ثنا أبو عامر، ثنا زمعة، عن سلمة ابن وهرام، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وفيه زمعة بن صالح ضعيف. وبه أعله الهيثمي في المجمع (4/ 330) بعد أن عزاه للطبراني والبزار باختصار - وقال:"صالح بن معاوية ضعيف وقد وُثِّق. وسلمة بن وهرام روى عنه زمعة أحاديث مناكير".

ومن طريقه رواه الدارمي (458) وجاء فيه: وأقبل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قافلًا، فانسل رجلان إلى أهليهما، وكلاهما وجد مع امرأته رجلًا.

وفي الباب ما روي عن سعيد بن المسيب مرسلًا. رواه الدارمي (459).




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অপছন্দ করতেন যে কোনো ব্যক্তি হঠাৎ করে (বিনা নোটিশে) রাতে তার পরিবারের কাছে আগমন করুক। অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: (তিনি এমন করতেন) যাতে সে তাদের উপর কোনো সন্দেহ না করে অথবা তাদের কোনো দোষত্রুটি খুঁজে না বেড়ায়।