হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6188)


6188 - عن عبد اللَّه بن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني رأيت الجنة فتناولت منها عنقودًا، ولو أخذته لأكلتم منه ما بقيت الدنيا، ورأيت النار فلم أر كاليوم منظرًا قط أفظع ورأيت أكثرها النساء" قالوا: لم يا رسول اللَّه؟ قال:"لكفرهنه قيل: أيكفرن باللَّه؟ قال:"ويكفرن العشير، ويكفرْنَ الإحسان، لو أحسنتَ إليها الدهر كله، ثم رأت منك شيئًا، قالت: ما رأيتُ منك خيرًا قط".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الكسوف (2) عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد اللَّه بن عباس، فذكره بتمامه في صلاة الكسوف.

ورواه البخاري في النكاح (5197)، ومسلم في صلاة الكسوف (907) كلاهما من طريق مالك، به، مثله، إلا أن مسلمًا لم يسق لفظه وإنما أحال على حديث حفص بن ميسرة عن زيد بن أسلم.

وقوله:"العشير" هو الزوج.

وقوله:"يكفرن" أي أنكرنَ، وفيه جواز إطلاق الكفر على كفران الحقوق ولا يكون الإنسان بهذا كافرا باللَّه تعالى. انظر تفصيل ذلك في كتاب الإيمان.

وقوله:"العنقود" من العنب ونحوه، ما تعقد وتراكم من ثمرة في أصل واحد. ويقال له أيضًا"القطف".




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি জান্নাত দেখেছি এবং সেখান থেকে এক থোকা (ফল) ধরে নিয়েছিলাম। আমি যদি তা গ্রহণ করতাম, তবে পৃথিবী বিদ্যমান থাকা পর্যন্ত তোমরা তা থেকে খেতে পারতে। আর আমি জাহান্নাম দেখেছি। আজকের দিনের মতো এত ভয়াবহ দৃশ্য আর কখনও দেখিনি। আমি দেখেছি যে জাহান্নামীদের অধিকাংশই হলো নারী।" তাঁরা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কেন?" তিনি বললেন: "তাদের অকৃতজ্ঞতার কারণে।" জিজ্ঞেস করা হলো: "তারা কি আল্লাহ্‌র প্রতি কুফুরী করে?" তিনি বললেন: "তারা স্বামীর (বা সহচারীর) প্রতি অকৃতজ্ঞতা দেখায় এবং ইহসানের (উপকারের) অস্বীকার করে। যদি তুমি তাদের কারো প্রতি সারা জীবন অনুগ্রহ করতে থাকো, এরপর তোমার পক্ষ থেকে সামান্য কিছু দেখলেই সে বলে ওঠে: 'আমি তোমার কাছ থেকে কখনও কোনো কল্যাণ পাইনি'।"









আল-জামি` আল-কামিল (6189)


6189 - عن أبي سعيد الخدري، قال خرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في أضحى أو فطر إلى المصلى، فمر على النساء، فقال:"يا معشر النساء، تصدقن، فإني رأيتكن أكثر أهل النار"، فقلن: وبمَ يا رسول اللَّه؟ قال: تكثرن اللعْن، وتكفرن العشير. . . الحديث.

متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (304)، ومسلم في الإيمان (80) من طريق سعيد بن أبي
مريم، أخبرنا محمد بن جعفر، أخبرني زيد بن أسلم، عن عياض بن عبد اللَّه، عن أبي سعيد الخدري، فذكره. والنفظ للبخاري. ولم يذكر مسلم لفظه وإنما حال فيه على حديث ابن عمر رضي الله عنهما، وهو الآتي:




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল আযহা অথবা ঈদুল ফিতরের দিন ঈদগাহের দিকে বের হলেন। অতঃপর তিনি মহিলাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন এবং বললেন: "হে নারী সমাজ, তোমরা সাদকা করো। কেননা আমি দেখেছি যে তোমরা জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী।" তারা বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ! কী কারণে? তিনি বললেন: তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ দাও এবং স্বামীর অকৃতজ্ঞতা প্রকাশ করো। . . . (বাকি অংশ)









আল-জামি` আল-কামিল (6190)


6190 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: شهدت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الصلاة يوم العيد، فبدأ بالصلاة قبل الخطبة بغير أذان ولا إقامة، ثم قام متوكئًا على بلال، فأمر بتقوى اللَّه وحث على طاعته، ووعظ الناس وذكرهم، ثم مضى حتى أتى النساء، فوعظهنّ وذكرهنّ، فقال:"تصدقن فإن أكثركن حطب جهنم" فقامت امرأة من سِطة النساء سعفاء الخدين، فقالت: لم يا رسول اللَّه؟ قال:"لأنكنّ تكثرْن الشكاة وتكفرن العشير" قال: فجعلنَ يتصدقنَ من حليّهنَّ يلقينَ في ثوب بلالٍ من أقرِطَتِهنّ وخواتمهن.

متفق عليه: رواه مسلم في صلاة العيدين (4: 885) عن محمد بن عبد اللَّه بن نمير، حدثنا أبي، حدّثنا عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن جابر، فذكره.

ورواه البخاري في العيدين (978) من طريق عبد الرزاق، حدثنا ابن جريج، قال أخبرني عطاء، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكر بنحوه وليس فيه قوله:"تصدقن" إلى قوله"وتكفرن العشير".




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ঈদের দিন সালাতে উপস্থিত ছিলাম। তিনি আযান ও ইকামত ছাড়াই খুতবার আগে সালাত শুরু করলেন। অতঃপর তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ভর করে দাঁড়ালেন। তিনি আল্লাহকে ভয় করার আদেশ দিলেন এবং তাঁর আনুগত্যের জন্য উৎসাহিত করলেন, আর লোকদের নসিহত করলেন ও তাদের উপদেশ দিলেন। এরপর তিনি নারীদের কাছে গেলেন, তাদের নসিহত করলেন ও উপদেশ দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা সাদাকা করো। কারণ তোমাদের অধিকাংশই জাহান্নামের ইন্ধন হবে।" তখন মহিলাদের মধ্য থেকে গালের দিক থেকে শ্যামলা এক নারী দাঁড়িয়ে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কেন?" তিনি বললেন: "কারণ তোমরা বেশি অভিযোগ করো এবং স্বামীর অকৃতজ্ঞ হও।" রাবী বলেন: এরপর তারা তাদের অলঙ্কার থেকে সাদাকা দিতে লাগল। তারা তাদের কানের দুল ও আংটি বিলালের কাপড়ের মধ্যে নিক্ষেপ করতে লাগল।









আল-জামি` আল-কামিল (6191)


6191 - عن عبد اللَّه بن عمر، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"يا معشر النساء، تصدَّقْنَ وأكثِرْنَ الاستغفارَ، فإني رأيتكنّ أكثرَ أهل النار"، فقالت امرأة منهنّ، جزْلة: ومالنا يا رسول اللَّه، أكثر أهل النار؟ قال:"تُكثرن اللعن، وتكفُرْنَ العشيرَ" الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (79) عن محمد بن رُمح بن المهاجر المصريّ، أخبرنا الليث (هو ابن سعد)، عن ابن الهاد، عن عبد اللَّه بن دينار، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে নারী সমাজ, তোমরা সাদকা করো এবং বেশি বেশি ইস্তিগফার (আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা) করো। কারণ আমি তোমাদেরকে জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী হিসেবে দেখেছি।" তখন তাদের মধ্য থেকে এক বুদ্ধিমতী নারী বলল: হে আল্লাহর রাসূল, কী কারণে আমরা জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী? তিনি বললেন: "তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ (লা'নত) দাও এবং স্বামীর (কৃত উপকার অস্বীকার করে) নাশুকরি করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6192)


6192 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم بمثل معنى حديث ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم كما قال مسلم.

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (80) من طريق إسماعيل (هو ابن جعفر) عن عمرو بن أبي عمرو، عن المقبري، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم ولم يذكر مسلم لفظه وإنما أحال فيه على حديث ابن عمر السابق.

ورواه أحمد (8862) عن سليمان بن داود الهاشمي، أخبرنا إسماعيل بإسناده مطولا، وفيه قصة زينب زوج ابن مسعود، وليس فيه:"تكثرن اللعن، وتكفرن العشير"، فكأنه أحال إليه لمعناه المتقارب.




৬১৯২ - আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে, ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীসের অর্থের অনুরূপ একটি বর্ণনা এসেছে, যেমনটি ইমাম মুসলিম বলেছেন।

সহীহ: এটি ইমাম মুসলিম ঈমান (৮০) গ্রন্থে ইসমাঈল (তিনি ইবনু জা‘ফার), তিনি ‘আমর ইবনু আবূ ‘আমর, তিনি মাকবুরী, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে রিওয়ায়াত করেছেন। মুসলিম এই হাদীসের শব্দগুলো উল্লেখ করেননি, বরং তিনি পূর্বের ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের দিকেই ইঙ্গিত করেছেন।

এবং এটি আহমাদ (৮৮৬২)-এ সুলায়মান ইবনু দাঊদ আল-হাশিমী থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি ইসমাঈল থেকে তাঁর সূত্রে বিস্তারিতভাবে রিওয়ায়াত করেছেন। তাতে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনাও রয়েছে। কিন্তু তাতে এই শব্দগুলো নেই: "তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ দাও এবং স্বামীর প্রতি অকৃতজ্ঞ হও।" তাই ধারণা করা হয়, তিনি অর্থের সাদৃশ্যতার কারণে এই হাদীসের দিকে ইঙ্গিত করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6193)


6193 - عن أسماء بنت يزيد -إحدى نساء بني عبد الأشهل- تقول: مَرَّ بنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ونحن في نسوة، فسلَّم علينا، وقال:"إياكن وكفر الْمُنْعِمين"، فقلنا: يا رسول اللَّه، وما كفر الْمُنعِمين؟ قال:"لعل إحداكن أن تطول أيمتها بين أبويها، وتعنس، فيرزقها
اللَّه عز وجل زوجا، ويرزقها منه مالا وولدا، فتغضب الغضبة، فتقول: ما رأيت منه يوما خيرا قط".

حسن: رواه أحمد (27561) والطبراني في الكبير (24/ 164) كلاهما من حديث شهر يقول: سمعت أسماء تقول: فذكرته.

وذكر بعض أصحاب السنن مقتصرا على ذكر السلام على النساء.

وإسناده حسن، وفي شهر كلام معروف غير أنه توبع. فقد رواه البخاري في الأدب المفرد (1048) عن مخلد، قال: حدثنا مبشر بن إسماعيل، عن ابن أبي غنية، عن محمد بن مهاجر، عن أبيه، عن أسماء، فذكرته نحوه.

ورواه الطبراني في الكبير (24/ 184) من وجه آخر عن ابن أبي غنية بإسناده مثله. ومحمد بن مهاجر وأبوه ذكر هما ابن حبان في"الثقات".




আসমা বিনত ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা কয়েকজন মহিলা ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তিনি আমাদেরকে সালাম দিলেন এবং বললেন: "তোমরা নেয়ামতদাতাদের (উপকারকারীদের) অকৃতজ্ঞতা থেকে বেঁচে থাকো।" আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, নেয়ামতদাতাদের অকৃতজ্ঞতা কী? তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে হয়তো কোনো একজনের তার বাবা-মায়ের কাছে দীর্ঘ সময় অবিবাহিত অবস্থায় কেটে যায়, এবং সে বার্ধক্যে পৌঁছায়, অতঃপর আল্লাহ তাআলা তাকে স্বামী দান করেন, এবং তার পক্ষ থেকে ধন-সম্পদ ও সন্তান দান করেন। এরপর সে যখন রাগান্বিত হয়, তখন সে বলে: 'আমি তার পক্ষ থেকে কোনো দিনও সামান্য ভালো কিছু দেখিনি।'"









আল-জামি` আল-কামিল (6194)


6194 - عن معاذ بن جبل قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تؤذي امرأة زوجها إلا قالت زوجتُه من الحور العين: لا تؤذيه قاتلكِ اللَّه، فإنما هو عندك دخيل، أوشك أن يفارقكِ إلينا".

حسن: رواه الترمذي (1174) وابن ماجه (2014) وأحمد (22101) كلهم من حديث إسماعيل ابن عياش، عن بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير بن مرة، عن معاذ بن جبل فذكره.

وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عياش فإنه مختلف فيه إلا أن روايته عن الشامين حسن وهذا منها.

وقد قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من هذا الوجه، ورواية إسماعيل بن عياش عن الشاميين أصلح، وله عن أهل الحجاز وأهل العراق مناكير".




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখনই কোনো নারী তার স্বামীকে কষ্ট দেয়, তখনই তার (স্বামীর) জান্নাতের হুর (আইন) স্ত্রীরা বলতে থাকে: ‘তাকে কষ্ট দিও না, আল্লাহ তোমাকে অভিশাপ দিন। কেননা সে (স্বামী) তো তোমার কাছে কেবল একজন মেহমান মাত্র; শীঘ্রই সে তোমাকে ছেড়ে আমাদের কাছে চলে আসবে।’”









আল-জামি` আল-কামিল (6195)


6195 - عن عبد اللَّه بن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا استأذنت امرأة أحدكم المسجد فلا يمنعها".

وزاد في رواية: فقال بلال بن عبد اللَّه: واللَّه لنمنعهنّ، قال: فأقبل عليه عبد اللَّه فسبّه سبًّا سيئًا، ما سمعته سبّه مثله قط، وقال: أخبرُك عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وتقول: واللَّه لنمنعهنّ.

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5238)، ومسلم في الصلاة (134: 442) كلاهما من طريق ابن عيينة، حدثنا الزهري، سمع سالمًا يحدّث عن أبيه، فذكره.
والزيادة في رواية مسلم (442: 135) من طريق يونس، عن ابن شهاب الزهري، به.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কারো স্ত্রী মসজিদে যাওয়ার অনুমতি চায়, তখন সে যেন তাকে বাধা না দেয়।"

অন্য এক বর্ণনায় যোগ করা হয়েছে যে, তখন (তাঁর পুত্র) বিলাল ইবনে আব্দুল্লাহ বললেন: আল্লাহর কসম! আমরা অবশ্যই তাদেরকে বারণ করব। বর্ণনাকারী বলেন: তখন আব্দুল্লাহ (ইবনে উমার) তাঁর দিকে মুখ ফিরিয়ে এমন কঠোর গালি দিলেন, যা আমি তাঁকে ইতিপূর্বে আর কখনও দিতে শুনিনি। এবং তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে উমার) বললেন: আমি তোমাকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা বলছি, আর তুমি বলছো: ‘আল্লাহর কসম! আমরা অবশ্যই তাদেরকে বারণ করব’?!









আল-জামি` আল-কামিল (6196)


6196 - عن عائشة قالت: خرجت سودة بنت زمعة ليلًا، فرآها عمر فعرفها، فقال: إنّك واللَّه يا سودة، ما تخفَيْنَ علينا، فرجعتْ إلى النبي صلى الله عليه وسلم فذكرتْ ذلك له، وهو في حجرتي يتعشّى، وإنّ في يده لعَرْقًا فأُنزل عليه، فرُفع عنه، وهو يقول:"قد أذِنَ لكُنّ أن تخرُجْن لحوائجكنّ".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5237) من طريق علي بن مُسهر -ومسلم في السلام (17: 2170) من طريق أبي أسامة- كلاهما عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته، واللفظ للبخاري.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাওদা বিনত যাম‘আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাতে বের হলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখে চিনতে পারলেন এবং বললেন, 'আল্লাহর কসম হে সাওদা, তুমি আমাদের কাছ থেকে গোপন থাকতে পারো না।' অতঃপর তিনি (সাওদা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ফিরে এসে তাঁকে তা জানালেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার (আয়িশার) ঘরে রাতের খাবার খাচ্ছিলেন এবং তাঁর হাতে গোশতসহ একটি হাড় ছিল। এমতাবস্থায় তাঁর উপর ওহী নাযিল হলো। যখন ওহী শেষ হলো, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের প্রয়োজনে তোমাদেরকে বাইরে যাওয়ার অনুমতি দেওয়া হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6197)


6197 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تُباشر المرأةُ المرأةَ، فتنعتها لزوجها كأنه ينظر إليها".

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5240) عن محمد بن يوسف، حدثنا سفيان، عن منصور، عن أبي وائل، عن عبد اللَّه بن مسعود فذكره ورواه أيضًا (5241) من وجه آخر عن أبي وائل مثله.

وزاد النسائي من طريق مسروق، عن ابن مسعود:"ولا الرجلُ الرجلَ".

وفي حديث سعيد ذكر القيد وهو"الثوب الواحد" كما سيأتي وفي الحديث تحريم ملاقاة بشرتي المرأتين وكذلك الرجلين بغير حائل في ثوب واحد، لأن ذلك قد يُفضي إلى لمس عورة بعضهم من بعض، أو إثارة الشهوة بينهما. وفي النهاية يؤدي إلى التقاء ختان بعضهم من بعض.

وقوله:"تنعتها لزوجها" وذلك خشية أن يعجب الزوج الوصف المذكور، فيطلِّق زوجته، أو يفتن بالموصوفة.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “এক নারী যেন অন্য নারীর সাথে (এক কাপড়ের নিচে) সরাসরি চামড়ার স্পর্শ না ঘটায়, এরপর সে যেন তার স্বামীকে ওই নারীর বর্ণনা না দেয়, যাতে মনে হয় যেন সে (স্বামী) তাকে দেখছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6198)


6198 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تباشر المرأةُ المرأةَ، ولا الرجلُ الرجلَ".

حسن: رواه أحمد (8318) والطبراني في الصغير (653) والطحاوي في مشكله (3285) كلهم من حديث أبي بكر، عن هشام، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي بكر وهو ابن عياش الأسدي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقد جاء استثناء الولد والوالد في حديث الطفاوي، عن أبي هريرة رواه أحمد (9775) وابن حبان (5583) كلاهما من حديث سفيان، عن الجريري، عن أبي نضرة، عن الطفاوي، عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يُباشر الرجلُ الرجلَ، ولا تباشر المرأةُ المرأة إلا الولد والوالد" وسقط الطفاوي في إسناد ابن حبان.

وهذه زيادة منكرة، والطفاوي شيخ لأبي نضرة، لم يسم، ولا يعرف.
وأخرج نحوه أبو داود (2174) مطولا فقال: حدثنا مسدد، حدثنا بشر، حدثنا الجريري، ح وحدثنا مؤمل، حدثنا إسماعيل، ح وحدثنا موسى، حدثنا حماد كلهم عن الجريري، عن أبي نضْرة، حدثني شيخ من طفاة قال: تثوَّيتُ أبا هريرة بالمدينة، فلم أر رجلًا من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أشد تشميرًا، ولا أقوم على ضيف منه، فبينما أنا عنده يومًا وهو على سرير له، معه كيس فيه حصى، أو نوى، وأسفل منه جارية له سوداء، وهو يسبح بها، حتى إذا نفد ما في الكيس ألقاه إليها فجمعته فأعادته في الكيس، فرفعته إليها، فقال: ألا أحدّثك عني وعن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قال: قلت: بلى، قال: بينا أنا أوعك في المسجد، إذ جاء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى دخل المسجد، فأقبل يمشي حتى انتهى إليّ، فوضع يده عليّ، فقال لي معروفا، فنهضتُ، فانطلق يمشي حتى أتى مقامه الذي يصلي فيه، فأقبل عليهم ومعه صفان من رجال، وصف من نساء، أو: صفان من نساء وصف من رجال، فقال:"إن أنساني الشيطانُ شيئًا من صلاتي فليسبّح القوم وليصفق النساء" قال: فصلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ولم ينس شيئًا، فقال:"مجالسكم مجالسكم" زاد موسى:"هاهنا": ثم حمد اللَّه وأثنى عليه، ثم قال:"أما بعد:" ثم اتفقوا: ثم أقبل على الرجال، قال:"هل منكم الرجل إذا أتى أهله فأغلق عليه بابه وألقى عليه ستره. واستر بستر اللَّه؟ !" قالوا: نعم، قال:"ثم يجلس بعد ذلك فيقول: فعلت كذا، فعلت كذا؟ قال: فسكتوا. قال: فأقبل على النساء فقال:"هل منكنّ مَنْ تحدّث؟" فسكتنَ، فجئَتْ فتاةٌ -قال مؤمل في حديثه: فتاة كعاب- على إحدى ركبتيها، وتطاولت الرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليراها ويسمع كلامها، فقالت: يا رسول اللَّه، إنهم ليتحدثون، وإنهن ليتحدثنه، فقال:"هل تدرون ما مثل ذلك؟" فقال:"إنما مثل ذلك شيطانة لقيت شيطانًا في السكة، فقضى منها حاجته والناس ينظرون إليه، ألا إن طيب الرجال ما ظهر ريحه ولم يظهر لونه، ألا إن طيب النساء ما ظهر لونه ولم يظهر ريحه".

قال أبو داود: ومن هاهنا حفظته عن مؤمل وموسى:"ألا لا يفضين رجل إلى رجل، ولا امرأة إلى امرأة، إلا إلى ولد أو والده وذكر ثالثة فأنسيتها، وهو في حديث مسدد، ولكني لم أتقنه كما أحب، وقال موسى: حدثنا حماد، عن الجريري، عن أبي نضرة، عن الطفاوي.

وروى الإمام أحمد (10977) عن إسماعيل بن إبراهيم، عن سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن رجل من الطفاة قال: نزلت على أبي هريرة فذكر مطولا نحوه.

وروى الترمذي (2787) والنسائي (5117، 5118) بعضه من طريق سفيان، عن الجُريري، عن أبي نضرة، عن رجل، عن أبي هريرة، وفي إحدى الروايتين في النسائي"عن الطفاوي عن أبي هريرة" مختصرا.

قال الترمذي: هذا حديث حسن إلا أن الطفاوي لا نعرفه إلا في هذا الحديث، ولا تعرف اسمه، وحديث إسماعيل بن إبراهيم أتم وأطول".

قلت: لعله حسّنه لوجود شواهد صحيحة لبعض فقراته، وإلا ففيه الطفاوي لا يعرفه، ولا غيره
إلا في هذا الحديث.

والجريري هو سعيد بن إياس مختلط فيه، ولكن سمع منه سفيان قبل الاختلاط.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যেন কোনো নারী অন্য নারীকে স্পর্শ না করে, এবং যেন কোনো পুরুষ অন্য পুরুষকে স্পর্শ না করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6199)


6199 - عن وعن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يباشر الرجلُ الرجلَ، ولا المرأةُ المرأةَ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (2773) والطبراني في الكبير (11728) والبزار -كشف الأستار- (2074) وابن حبان (5582) كلهم من حديث إسرائيل، عن سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وسماك بن حرب اضطرب في حديث عكرمة، ولكنه ثبت أنه لم يضطرب في هذا الحديث لأنه تابعه أبو إسحاق الشيباني، فرواه عن عكرمة، عن عبد اللَّه بن عباس مثله.

ومن طريقه رواه الطبراني في الكبير (11794) والصغير (1094) والحاكم (4/ 288) وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري، فقد أجمعا على صحة هذا الحديث".




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পুরুষ যেন পুরুষের সাথে (দেহ) স্পর্শ না করে এবং নারী যেন নারীর সাথে (দেহ) স্পর্শ না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6200)


6200 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهى أن يباشر الرجلُ الرجلَ، في ثوب واحد، والمرأةُ المرأةَ في ثوب واحد.

حسن: رواه الحاكم (4/ 287) من حديث عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن موسى بن عقبة، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد فإنه حسن الحديث في الشواهد. ورواه أيضًا بإسناد آخر عن أحمد بن يونس، ثنا أبو شهاب، عن ابن أبي ليلى، عن أبي الزبير، عن جابر فذكر مثله.

قال: وقال ابن أبي ليلى: وأنا أرى فيه التعزير، ومحمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى من أجل بيت الصحابة من الأنصار، ومفت وفقيه بالكوفة، إذ رأى فيه التعزير، ففيه قدوة". انتهى.

وفي الباب ما روي عن أبي الحُصين الهيثم بن شَفيّ أنه سمعه يقول:

خرجت أنا وصاحب لي يسمى أبا عامر -رجل من المعافر- لنصلي بيلياء، وكان قاصُّهم رجلًا من الأزد، يقال له: أبو ريحانة من الصحابة. قال أبو الحصين: فسبقني صاحبي إلى المسجد، ثم أدركته، فجلست إلى جنبه، فسألني هل أدركت قصص أبي ريحانة؟ فقلت: لا. فقال: سمعته يقول: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن عشرة: عن الوشر، والوشم، والنتف، وعن مكامعة الرجل بغير شعار، ومكامعة المرأة المرأةَ بغير شعار، وأن يجعل الرجل في أسفل ثيابه حريرًا مثل الأعلام، وأن يجعل على منكبيه مثل الأعاجم، وعن التهبي، وركوب النّمور، ولبوس الخاتم إلا الذي سلطان.

رواه أبو داود (4049) والنسائي (5091) وأحمد (17209) والطحاوي في مشكله (3255) كلهم من حديث المفضل بن فضالة، حدثني عياش بن عباس، عن أبي الحصين فذكره، ورواه الطحاوي في مشكله (3253) من طريق آخر عن عبد اللَّه بن لهيعة، عن عياش بن عباس به.
أبو عامر الحَجْري المصري"مقبول" كما في التقريب أي عند المتابعة، وإلا فلين الحديث، وهو كذلك لأنه لم نجد له متابعة، وإن كان لبعض فقراته شواهد صحيحة، وقد رُوي من وجه آخر عن أبي الحصين، عن أبي ريحانة. رواه أحمد (17208) والنسائي (5111) مختصرا وفيه انقطاع فإن أبا الحصين لم يسمع من أبي ريحانة، وإنما سمعه من صاحبه أبي عامر، عنه، كما في الرواية الأولى.

وفي بعض فقراته شذوذ مثل قوله: وأن يجعل على منكبيه مثل الأعاجم، ومثل قوله: ولبوس الخاتم إلا لذي سلطان.

وقوله:"بغير شعار" أي بغير ثوب، لأن ذلك يثير الشهوة، فيقع الإنسان في المحظورات مثل الشذوذ الجنسي وغيره.

وأبو ريحانة: هو شمعون بن زيد بن خنافة الأزدي، وقيل الأنصاري، وقيل القرشي، وقيل: كان قرظيًا. وله حلف في الأنصار.

قال ابن السكن: سكن الشام، حديثه في المصريين.

وقال ابن يونس: شمعون الأزدي يكنى أبا ريحانة، وذكر فيمن قدم مصر من الصحابة، وما عرفنا وقت قدومه، روى عنه من أهل مصر كريب بن أبرهة، وعمرو بن مالك، وأبو عامر الحجْري.

وقال البخاري: نزل الشام، له صحبة.

وقال ابن البرقي: له خمسة أحاديث.

قوله:"مكامعة الرجلِ الرجلَ" فسر أبو عبيد: هي أن يضاجع الرجل الرجلَ في ثوب واحد، أخذ من الكميع، وهو الضجيع.

قال أبو عبيد: وقد روي هذا الحديث من حديث الليث، عن عياش بن عباس رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن المكاعمة.

وقال: والمكاعمة: أن يلثم الرجل صاحبه. أخذ من كعام البعير، وهو أن يُشَدّ فمُه إذا هاج. يقال: كعمتُه أكمعه كعما، فهو مكعوم. وكذلك كل مشدود الفم فهو مكعوم. انظر للمزيد:"غريب الحديث" (1/ 171 - 172).

وقوله: عن الوَشْر -بفتح الواو وسكون الشين-، وهو معالجة الأسنان بما يُحددها ويُرَقِّقُ أطرافها، تفعلها المرأة المُسنَة وتتشبّه بذلك بالفتيات.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিষেধ করতে শুনেছি যে, কোনো পুরুষ যেন একই কাপড়ের ভেতর অন্য কোনো পুরুষের সাথে সংলগ্ন (মিলেমিশে) না হয় এবং কোনো নারী যেন একই কাপড়ের ভেতর অন্য কোনো নারীর সাথে সংলগ্ন (মিলেমিশে) না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6201)


6201 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا ينظر الرجل إلى عورة الرجل، ولا المرأة إلى عورة المرأة، ولا يُفضي الرجل إلى الرجل في ثوب واحد، ولا تُفضي المرأة إلى المرأة في الثوب الواحد".
صحيح: رواه مسلم في الحيض (338) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا زيد بن الحُباب، عن الضحاك بن عثمان قال: أخبرني زيد بن أسلم، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد، عن أبيه فذكره.

لا خلاف بين أهل العلم في تحريم نظر الرجل إلى عورة الرجل، وتحريم نظر المرأة إلى عورة المرأة، وكذلك تحريم نظر الرجل إلى عورة المرأة، والمرأة إلى عورة الرجل، ويستثنى من ذلك الزوجان، فكل منهما يجوز له النظر إلى عورة صاحبه.

وأما نظر الرجل إلى محارمه ونظرهن إليه ففي قول: لا يحل إلا ما يظهر في حال الخدمة والتصرف كما ذكره النووي في شرح مسلم. وقال أيضًا: والصحيح أنه يباح فيما فوق السرة وتحت الركبة". اهـ.

قلت: والمرأة كلما تكون محتشمة حتى أمام المحارم تكون أفضل وأحفظ. لأن الشيطان يجري مجرى الدم، وقد كثُرَ الوقوعُ بين المحارم في عصر الانحلال الخلقي كما نسمع، نسأل اللَّه العافية والسلامة.

وقوله:"يُباح فيما فوق السرة وتحت الركبة" هذا التوسع أخذه من حديث ضعيف وهو قول غالب الفقهاء، وقد تكلّمتُ عليه في كتاب اللباس، فانظر هناك.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো পুরুষ যেন অপর পুরুষের সতর (লজ্জাস্থান) না দেখে, আর কোনো নারী যেন অপর নারীর সতর না দেখে। কোনো পুরুষ যেন অপর পুরুষের সাথে একই কাপড়ের নিচে (উলঙ্গ অবস্থায়) না শোয় এবং কোনো নারী যেন অপর নারীর সাথে একই কাপড়ের নিচে (উলঙ্গ অবস্থায়) না শোয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6202)


6202 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن من أشّر الناس يوم القيامة، الرجل يفضي إلى امرأته، وتفضي إليه ثم ينشر سرّها".

وفي لفظ:"إن من أعظم الأمانة عند اللَّه يوم القيامة، الرجل يفضي إلى امرأته وتفضي إليه، ثم ينشر سرّها".

حسن: رواه مسلم في النكاح (123: 1437) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا مروان بن معاوية، عن عمر بن حمزة العمري، حدثنا عبد الرحمن بن سعد، قال: سمعت أبا سعيد الخدري يقول: فذكره.

ورواه اللفظ الآخر من طريق أبي أسامة (هو حماد بن أسامة)، عن عمر بن حمزة، به.

وقد تكلم الناس في هذا الحديث من أجل عمر بن حمزة العمري فقال النسائي: ضعيف، وقال أحمد: أحاديثه مناكير، وقال ابن حبان: كان ممن يخطئ، وقال ابن معين: أضعف من عمر بن محمد بن زيد.

واستنتج ابنُ القطان من قول ابن معين بأن هذا تفضيل لعمر بن محمد بن زيد عليه، فإنه ثقة، وهو في الحقيقة تفضيل أحد ثقتين على الآخر، فالحديث به حسن. بيان الوهم والايهام (4/ 451) وهذا الحديث مما انتقاه مسلم من أحاديثه وإلا فهو ضعيف الحديث عند أئمة الحديث.
وأما الذهبي فذكر هذا الحديث في الميزان (3/ 192) فقال:"فهذا مما استنكر لعمر" وقال:"واحتج به مسلم".

ورُويَ بمعناه عن أسماء بنت يزيد أنها كانت عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، والرجال والنساء قعود عنده، فقال:"لعل رجلًا يقول: ما يفعل بأهله، ولعل امرأة تخبر بما فعلت مع زوجها" فأرمّ القوم، فقلت: إي واللَّه يا رسول اللَّه، إنهن ليقُلن، وإنهم ليفعلون قال:"فلا تفعلوا، فإنما مثل ذلك مثل الشيطان، لقي شيطانة في طريق فغشيها، والناس ينظرون".

رواه أحمد (27583) والطبراني في الكبير (24/ 162) كلاهما من طريق حفص السراج قال: سمعت شهرًا يقول: حدثتني أسماء بنت يزيد فذكرته.

وفيه شهر وهو ابن حوشب وفيه كلام معروف، وهو لا بأس به في الشواهد ولكن الراوي عنه حفص السراج وهو ابن أبي حفص السراج قال الذهبي: ليس بالقوي، وقال الدارقطني:"مجهول" وهو من رجال"التعجيل".

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي هريرة في حديث طويل كما ذُكِر، وجاء فيه:"هل فيكم رجل إذا أتى أهله أغلق بابه، وأرخى ستره، ثم يخرج فيحدث فيقول:"فعلت بأهلي كذا، وفعلت بأهلي كذا" فسكتوا، فأقبل على النساء فقال:"هل منكنّ تحدّث"، فجئت فتاة كعاب على إحدى ركبنيها، وتطاولت لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليراها ويسمع كلامها، فقالت: إي واللَّه إنهم ليتحدثون، وإنهن ليُحدثن، قال:"فهل تدرون ما مثل من فعل ذلك؟""إن مثل ذلك، مثل شيطان وشيطانة لقي أحدهما صاحبه بالسكة، فقضى حاجته منها والناس ينظرون إليه".

رواه أحمد (10977) وأبو داود (2174) والترمذي (2787) والنسائي (5117، 5118) وابن السني (615) كلهم من حديث سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن الطفاوي، عن أبي هريرة فذكره.

وفي إسناده الطفاوي. قال الترمذي:"هذا حديث حسن، إلا أن الطفاوي لا نعرفه إلا في هذا الحديث، ولا نعرف اسمه" يعني"لا يُعرف" كما قال ابن حجر.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় কিয়ামতের দিন নিকৃষ্টতম ব্যক্তি হলো সেই পুরুষ, যে তার স্ত্রীর সাথে মিলিত হয় এবং স্ত্রী তার সাথে মিলিত হয়, অতঃপর সে তাদের গোপন কথা ফাঁস করে দেয়।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: নিশ্চয় কিয়ামতের দিন আল্লাহর নিকট সবচেয়ে বড় খেয়ানত হলো সেই পুরুষের, যে তার স্ত্রীর সাথে মিলিত হয় এবং স্ত্রী তার সাথে মিলিত হয়, অতঃপর সে তাদের গোপন কথা প্রকাশ করে দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6203)


6203 - عن عبد اللَّه بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا تزوّج أحدكم امرأةً، أو اشترى خادمًا فليقل: اللَّهم إني أسألك خيرها، وخير ما جَبَلْتَها عليه، وأعوذُ بك من شرّها ومن شر ما جَبَلْتَها عليه، وإذا اشترى بعيرًا فليأخذْ بذروةِ سَنامه وليقلْ مثل ذلك".

وفي لفظ:"إذا أفاد أحدُكم امرأةً، أو خادمًا، أو دابةً، فليأخذ بناصيتها"، وليقُلْ: فذكر الحديث.

حسن: رواه أبو داود (2160) وابن ماجه (1918) وابن السني (100) والحاكم (2/ 185) والبيهقي (7/ 148) كلهم من حديث محمد بن عجلان، عن عمرو بن شعيب، بإسناده مثله.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على ما ذكرناه من رواية الأئمة الثقات عن عمرو بن شعيب، ولم يخرجاه عن عمرو في الكتابين".

وإسناده حسن من أجل الكلام على محمد بن عجلان وعلي شيخه عمرو. غير أنهما حسنا الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ কোনো মহিলাকে বিবাহ করে, অথবা কোনো খাদেম (ভৃত্য) ক্রয় করে, তখন সে যেন বলে: “আল্ল-হুম্মা ইন্নি- আসআলুকা খাইরাহা-, ওয়া খাইরা মা- জাবালতাহা- ‘আলাইহি, ওয়া আ‘ঊযু বিকা মিন শাররিহা-, ওয়া শাররি মা- জাবালতাহা- ‘আলাইহি।” (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আমি তোমার কাছে তার কল্যাণ এবং তার মাঝে তুমি যে স্বভাব তৈরি করেছ, তার কল্যাণ প্রার্থনা করছি। আর তার অনিষ্ট এবং তার মাঝে তুমি যে স্বভাব তৈরি করেছ তার অনিষ্ট থেকে তোমার কাছে আশ্রয় চাচ্ছি।) আর যখন সে কোনো উট ক্রয় করে, তখন যেন তার কুঁজের অগ্রভাগ ধরে অনুরূপ দো‘আ করে।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: যখন তোমাদের কেউ কোনো মহিলা, খাদেম অথবা জন্তু লাভ করে, তখন সে যেন তার কপাল ধরে এবং ঐ দো‘আ পড়ে।









আল-জামি` আল-কামিল (6204)


6204 - عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أما لو أن أحدكم يقول حين يأتي أهله: بسم اللَّه، اللَّهم جنّبني الشيطان، وجنّب الشيطان ما رزقتنا. ثم قدّر بينهما في ذلك أو قضي ولد لم يضُرّه شيطان أبدًا".

وفي لفظ:"لو أن أحدهم إذا أراد أن يأتي أهله. . .".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5165)، ومسلم في النكاح (166: 1434) كلاهما من طريق منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن كُريب، عن ابن عباس، فذكره. واللفظ للبخاري.

واللفظ الثاني لمسلم.

ودلّ اللفظ الثاني أن هذا القول يأتي به قبل الشروع في الجماع.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যখন তার স্ত্রীর নিকট গমন করে, তখন যদি সে বলে: 'বিসমিল্লাহ, হে আল্লাহ! আপনি আমাদের শয়তান থেকে দূরে রাখুন এবং শয়তানকে দূরে রাখুন যা আপনি আমাদের দান করবেন (সন্তান)।' এরপর যদি তাদের উভয়ের মাঝে (সেই মিলনে) কোনো সন্তান নির্ধারিত হয় বা প্রদান করা হয়, তবে শয়তান তাকে কখনো ক্ষতি করতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6205)


6205 - عن بهز بن الحكيم، عن أبيه، عن جده قال: قلت: يا رسول اللَّه، عوراتنا ما تأتي منها وما نذر؟ قال:"احفظْ عورتَك إلا مِنْ زوجتِك، أو ما ملكت يمينك". قلت: يا رسول اللَّه، أرأيت إن كان القوم بعضهم في بعض؟ قال:"إن استطعت أن لا يرينَّها أحد، فلا يرينّها". قلت: يا رسول اللَّه، إن كان أحدنا خاليا؟ قال:"فاللَّه أحق أن يستحيا منه من الناس".

حسن: رواه أبو داود (4017) والترمذي (2769، 2749) وابن ماجه (1929) والحاكم (4/ 179 - 180) والبيهقي (1/ 199) كلهم من هذا الوجه. وإسناده حسن من أجل بهز بن حكيم وأبيه حكيم بن معاوية فإنهما صدوقان.

وأما ما رُوي عن عتبة بن عبدٍ السُّلميّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أتى أحدكم أهله فليستتر، ولا يتجرد تجرد العيرين" فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (1921) عن الوليد بن القاسم الهمداني، ثنا الأحوص بن حكم، عن أبيه، وراشد بن سعد وعبد الأعلى بن عدي، عن عتبة بن عبد السلمي فذكره.

وفيه الوليد بن القاسم الهمداني مختلف فيه فضعفه ابن معين، وقال ابن حبان: انفرد عن الثقات بما لا يُشبه حديث الأثبات فخرج عن الاحتجاج بأفراده. وقال ابن عدي: إذا روى عن
ثقة، وروى عنه ثقة فلا بأس به.

قلت: وهذا مما روي عن غير ثقة، وهو الأحوص بن حكيم العنسي فإن الغالب على حديثه الضعف. ضعفه النسائي والجوزجاني، وقال أبو حاتم: ليس بقوي منكر الحديث. ولكن قال غير واحد من أهل العلم يعتبر حديثه. ولم أجد له من تابعه على ذلك، وبه أعله البوصيري في زوائد ابن ماجه.

وكذلك لا يصح ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أتى أحدكم فليستتر، ولا يتجردان تجرد العَيرين".

رواه البيهقي (7/ 193) وقال: تفرد به مندل بن علي وليس بالقوي. وهو وإن لم يكن ثابتا فمحمودٌ في الأخلاق.

قال الشافعي:"وأكره أن يَطأها، والأخرى تنظر، لأنه ليس من التستر، ولا محمود الأخلاق، ولا يشبه العشرة بالمعروف. وقد أمر أن يعاشرها بالمعروف".

وأما أن ينام الرجل بين المرأتين كما جاء عن ابن عباس أنه كان ينام بين جاريتين.

فقال أبو عبيد: هذا عندي على النوم، ليس على الجماع. ذكره البيهقي.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد اللَّه بن سَرْجِس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أتى أحدُكم أهلَه فليلق على عَجُزِه وعَجُزِها شيئًا، ولا يتجردا تجرد العَيرين".

رواه النسائي في الكبرى (9029) عن محمد بن عبد اللَّه بن عبد الرحيم قال: نا عمرو بن أبي سلمة، عن صدقة بن عبد اللَّه، عن زهير بن محمد، عن عاصم الأحول، عن عبد اللَّه بن سَرْجِس، فذكره.

قال النسائي:"هذا حديث منكر، وصدقة بن عبد اللَّه ضعيف، وإنما أخرجته لئلا يُجعل عمرو، عن زهير".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة قالت: ما نظرت إلى فرج النبي صلى الله عليه وسلم قط، أو ما رأيت فَرْج النبي صلى الله عليه وسلم قط.

رواه ابن ماجه (662، 1922) والترمذي في الشمائل (352) وأحمد (24344) وابن أبي شيبة (1/ 106) كلهم من طرق عن سفيان، عن منصور، عن موسى بن عبد اللَّه بن يزيد الخطمي، عن مولى لعائشة، عن عائشة فذكرته. وفيه مولى عائشة لم يسم، وفي بعض الروايات: عن مولاة العائشة في كلا الحالين فيه جهالة.

وقد روي بإسناد آخر عن سفيان الثوري من حديث أنس بن مالك عن عائشة ولكن فيه من يضع الحديث.




মু'আবিয়াহ ইবনু হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাদের সতর (গোপনীয় অঙ্গ) সম্পর্কে বলুন—কোন অংশ প্রকাশ করব এবং কোন অংশ আবৃত রাখব? তিনি বললেন: "তুমি তোমার সতরকে আবৃত রাখো, তবে তোমার স্ত্রী অথবা তোমার ডান হাতের অধিকারভুক্ত দাসীদের (ক্ষেত্রে আবৃত রাখা) ছাড়া।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি লোকজনেরা একত্রিত থাকে (তখন কী করব)? তিনি বললেন: "যদি তুমি সক্ষম হও যে কেউ যেন তা দেখতে না পায়, তবে কেউ যেন তা না দেখে।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি আমাদের কেউ একাকী থাকে? তিনি বললেন: "তবে মানুষের তুলনায় আল্লাহই অধিক হকদার যে তুমি তাঁকে লজ্জা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6206)


6206 - عن جابر قال: كانت اليهود تقول: إذا أتى الرجلُ امرأته من دُبُرها في قُبلها، كان الولد أحول فنزلت: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223].

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4528)، ومسلم في النكاح (117: 1435) كلاهما من طريق سفيان (هو الثوري)، عن ابن المنكدر، سمع جابرًا يقول (فذكره).




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়াহুদিরা বলত: যখন কোনো পুরুষ তার স্ত্রীর সাথে তার যোনীতে (সম্মুখপথে) পেছন দিক থেকে সহবাস করে, তখন সন্তান ট্যারা হয়। ফলে এই আয়াতটি অবতীর্ণ হয়: "তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের শস্যক্ষেত্র। অতএব তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা আসতে পারো।" (সূরা আল-বাকারা: ২২৩)।









আল-জামি` আল-কামিল (6207)


6207 - عن جابر قال: قالت اليهود: إن الرجل إذا أتى امرأته وهي مُجَبّية، جاء ولده أحول، فنزلت {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223] إن شاء مجَبّية وإن شاء غير مجَبّية إذا كان في صمام واحد.

صحيح: رواه مسلم في النكاح (119: 1435) وابن حبان في صحيحه (4161) كلاهما من حديث وهب بن جرير، قال: حدثنا أبي، قال: سمعت النعمان بن راشد، يحدث عن الزهري، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكره واللفظ لابن حبان. وأما مسلم فلم يذكر لفظ الحديث كاملا، وإنما أحال على السابق وقال: وزاد في حديث النعمان عن الزهري:"وإن شاء مُجبّية وإن شاء غير مجَبّية غير أن ذلك في صمام واحد".

إلا أن الحافظ ابن حجر ذهب إلى أن هذه الزيادة مدرجة فقال:"وهذه الزيادة يشبه أن تكون من تفسير الزهري، لخلوها من رواية غيره من أصحاب ابن المنكدر مع كثرتهم" الفتح (8/ 192).

قوله:"مُجبّية" أي منكبّة على وجهها تشبيهًا بهيئة السجود.

وقوله:"صمام واحد" أي ثقب واحد، والمراد به القُبُل.




জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইয়াহুদিরা বলত: যদি কোনো ব্যক্তি তার স্ত্রীর সাথে এমনভাবে মিলিত হয় যে, সে (স্ত্রী) উপুড় হয়ে থাকে, তবে তার সন্তান ট্যারা হবে। তখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের শস্যক্ষেত্র। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো।" (সূরা বাকারা: ২২৩)। যদি সে (স্বামী) চায়, তবে উপুড় হয়ে (স্ত্রী) থাকুক, আর যদি চায়, তবে অন্যভাবে (শুয়ে) থাকুক; যদি তা একই দ্বারপথ দিয়ে (অর্থাৎ যোনিপথ দিয়ে) হয়।