আল-জামি` আল-কামিল
6208 - عن ابن عباس قال: جاء عمر إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه، هلكت. قال:"وما أهلكك؟" قال: حوّلْتُ رحلي الليلة. قال: فلم يرد عليه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم شيئًا، قال: فأنزلتْ على رسول اللَّه هذه الآية {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223] أقبل وأدبر، واتّقِ الدبرَ والحيضةَ.
حسن: رواه الترمذي (2980) وأحمد (2703) والبيهقي (7/ 197) وصحّحه ابن حبان (4202) كلهم من طريق يعقوب بن عبد اللَّه القمي، قال: حدثنا جعفر بن المغيرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل يعقوب بن عبد اللَّه القمي فإنه مختلف فيه ضعّفه الدارقطني، ومشّاه غيره، غير أنه حسن الحديث.
وفي الإسناد أيضًا رجال من درجة"صدوق".
وقوله: حولت رحلي: كناية عن غشيان المرأة من ظهرها في قبلها.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন, হে আল্লাহর রাসূল, আমি ধ্বংস হয়ে গেছি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন, "কী তোমাকে ধ্বংস করেছে?" তিনি বললেন, আমি আজ রাতে আমার সওয়ারি (ভার) ঘুরিয়ে দিয়েছি। বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে কোনো উত্তর দিলেন না। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: {তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের শস্যক্ষেত্র, অতএব তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছে আগমন করো।} (সূরা আল-বাক্বারা: ২২৩)। (অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন,) সামনে থেকে বা পেছন দিক থেকে (যেকোনোভাবে আগমন করো), তবে পায়ুপথ (মলদ্বার) এবং হায়েয (ঋতুস্রাব)-এর সময় বর্জন করো।
6209 - عن ابن عباس قال: إن ابن عمر -واللَّه يغفر له- أوهم، إنما كان هذا الحي من
الأنصار -وهم أهل وثن- مع هذا الحي من يهود -وهم أهل الكتاب- وكانوا يرون لهم فضلا عليهم في العلم، فكانوا يقتدون بكثير من فعلهم. وكان من أمر أهل الكتاب أن لا يأتوا النساء إلا على حرف، وذلك أستر ما تكون للمرأة. فكان هذا الحي من الأنصار قد أخذوا بذلك من فعلهم، وكان هذا الحي من قريش يشرحون النساء شرحًا منكرًا، ويتلذذون منهن مقبلات ومدبرات ومستلقيات. فلما قدم المهاجرون المدينة. تزوج رجلٌ منهم امرأةً من الأنصار، فذهب يصنع بها ذلك، فأنكرته عليهم وقالت: إنما كنا نُؤتى على حرف فاصنع ذلك، وإلا فاجْتنبْني حتى شَري أمرهما. فبلغ ذلك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأنزل اللَّه عز وجل: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} [البقرة: 223] أي مقبلات، ومدبرات، ومستلقيات، يعني بذلك موضع الولد.
حسن: رواه أبو داود (2164) عن عبد العزيز بن يحيى أبي الأصبغ حدثني محمد -يعني ابن سلمة- عن محمد بن اسحاق، عن أبان بن صالح، عن مجاهد، عن ابن عباس فذكره.
ورواه البيهقي (7/ 195) من هذا الوجه كما رواه أيضًا عن عبد الرحمن بن محمد المحاربي، عن محمد بن إسحاق، سمع أبان بن صالح فذكر معناه وقال:"بعد أن يكون في الفرج".
وفيه تصريح ابن إسحاق بالسماع.
وقوله:"شري أمرهما" أي عظُمَ أمرهما وتفاقمَ.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—আল্লাহ তাকে ক্ষমা করুন—ভুল করেছেন। আসলে বিষয়টি হলো, আনসারদের এই গোত্রটি—যারা ছিল মূর্তিপূজক—তারা থাকত ইহুদিদের এই গোত্রের সাথে—যারা ছিল কিতাবি। তারা (আনসাররা) ইলম (জ্ঞান) এর ক্ষেত্রে তাদের (ইহুদিদের) জন্য নিজেদের উপর শ্রেষ্ঠত্ব দেখত এবং তাদের অনেক কাজ অনুকরণ করত।
আর কিতাবিদের রীতি ছিল যে, তারা নারীদের কাছে কেবল এক পাশ দিয়ে (কাত হয়ে) আসত (যৌন মিলন করত)। আর এটাই হলো নারীর জন্য সবচেয়ে বেশি আবরণকারী (শালীন) পদ্ধতি। ফলে আনসারদের এই গোত্রটি তাদের এই কাজটি গ্রহণ করে নিয়েছিল।
কিন্তু কুরাইশের এই গোত্রটি নারীদেরকে চরমভাবে উন্মুক্ত করত, আর তারা তাদের থেকে আনন্দ লাভ করত সম্মুখ দিক থেকে, পেছন দিক থেকে এবং চিৎ হয়ে শায়িত অবস্থায়ও।
যখন মুহাজিরগণ মদিনায় আগমন করলেন, তখন তাদের মধ্য থেকে একজন লোক আনসারদের এক মহিলাকে বিবাহ করল। সে তার সাথে ঐভাবে (কুরাইশী পদ্ধতিতে) সহবাস করতে গেল। মহিলাটি তাদের এই কাজকে অস্বীকার করল এবং বলল: আমাদের সাথে তো কেবল এক পাশ দিয়ে আসা হতো, তুমি সেটাই করো, অন্যথায় আমাকে ছেড়ে দাও। শেষ পর্যন্ত তাদের দুজনের বিষয়টি কঠিন হয়ে গেল।
এই বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে পৌঁছল। তখন আল্লাহ তা‘আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {তোমাদের স্ত্রীরা হলো তোমাদের শস্যক্ষেত্র। অতএব, তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা আসতে পারো।} [সূরা বাক্বারাহ: ২২৩]। অর্থাৎ সম্মুখ দিক থেকে, পেছন দিক থেকে, এবং চিৎ হয়ে শায়িত অবস্থায় (মিলন করতে পারো)। এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো সন্তানের উৎপত্তিস্থল (যোনি)।
6210 - عن خزيمة بن ثابت قال: إن سائلا سأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن إتيان النساء في أدبارهن. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حلال" ثم دعاه، أو أمر به، فدُعي فقال:"كيف قلت في أي الخربتين، أو في أي الخرزتين، أو في الخصفتين؟ أمن دبرها في قبلها فنعم، أم من دبرها في دبرها فلا، إن اللَّه لا يستحيي من الحق، لا تأتوا النساء في أدبارهن".
صحيح: رواه الشافعي في الأم (5/ 94) قال: أخبرنا عمي محمد بن علي بن شافع، عن عبد اللَّه بن علي بن السائب، عن عمرو بن أحيحة أو ابن فلان ابن أحيحة بن فلان الأنصار. قال: قال محمد بن علي وكان ثقة - عن خزيمة بن ثابت فذكره.
ورواه النسائي في الكبرى (8943) من طريق الحسن بن محمد بن أعين، قال: نا محمد بن علي الشافعي بإسناده وسماه عمرو بن أحيحة بن الْجُلاح ولم يشك فيه.
قال البيهقي (7/ 196) بعد أن أخرج الحديث من طريق الشافعي قال الشافعي:"عمي ثقة، وعبد اللَّه بن علي ثقة، وقد أخبرنا محمد عن الأنصاري المحدث بها أنه أثنى عليه خيرًا. وخزيمة ممن لا يشك عالم في ثقته، فلست أرخص فيه، بل أنهى عنه".
قلتُ: هذا إسناده صحيح. وله أسانيد أخرى.
منها: ما رواه ابن ماجه (1924) وأحمد (21854) والبيهقي كلهم من طريق حجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب، عن عبد اللَّه بن هرمي، عن خزيمة بن ثابت ولفظه:"إن اللَّه لا يستحيي من الحق، لا تأتوا النساء في أعجازهن" وعند البعض:"أدبارهن" وحجاج بن أرطاة مدلس وقد عنعن.
وعبد اللَّه بن هرمي هو: هرمي بن عبد اللَّه، لعله انقلب على حجاج بن أرطاة لأنه مع التدليس وصف بكثير الخطأ. به على ذلك البخاري في تاريخه (8/ 257) وأشار إليه البيهقي أيضًا ثم رواه من طريق المثنى بن صباح، عن عمرو بن شعيب، عن هرمي بن عبد اللَّه.
وكذلك رواه أيضًا عبد اللَّه بن علي (وهو ابن السائب) عن هرمي بن عمرو الخطمي. ومن طريقه رواه أحمد (21865) والنسائي في الكبرى (8940) فسماه هرمي بن عمرو، لأنه اختلف في اسم أبيه وجده. فقيل هكذا وقيل غير ذلك.
وكذلك رواه أيضًا عبد اللَّه بن عمرو بن قيس الخطْمي، عن هرمي بن عبد اللَّه فذكر الحديث.
رواه البيهقي من طريق الوليد بن كثير، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن الحصين الخطمي عن عبد الملك بن عمرو، ثم رواه أيضًا من طريق أبن أسامة بن الهاد، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن الحصين، عن هرمي بن عبد اللَّه وقال: قصر به ابن الهاد، فلم يذكر فيه عبد الملك بن عمرو. ورواه ابن عيينة عن ابن الهاد فأخطأ في إسناده.
ثم رواه من طريق الحميدي، ثنا سفيان بن عيينة، عن يزيد بن الهاد، عن عمارة بن خزيمة بن ثابت، عن أبيه فذكر الحديث.
ونقل عن الشافعي أنه قال: غلط سفيان في حديث ابن الهاد.
قال البيهقي: مدار هذا الحديث على هرمي بن عبد اللَّه، وليس العمارة بن خزيمة فيه أصل، إلا من حديث ابن عيينة، وأهل العلم بالحديث يرونه خطأ. انتهى.
قلت: وهرمي بن عبد اللَّه هذا اختلف فيه أهل العلم فقيل: كان له صحبة، وقيل هو غيره، وهما اثنان، فالراوي عن خزيمة بن ثابت ولد في عهد النبي صلى الله عليه وسلم وأدرك أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم منهم خزيمة بن ثابت، فقالوا: إنه مجهول، ولكنه توبع في الإسناد الأول الذي صحّحه الشافعي.
وأما الذي له الصحبة فهو غير هذا، فإنه حضر بعض المشاهد مع النبي صلى الله عليه وسلم مثل تبوك وغيرها.
والخلاصة في حديث خزيمة بن ثابت أنه حديث صحيح، صحّحه الشافعي وأحمد وابن حبان وغيرهم.
وقال المنذري في الترغيب والترهيب (3698):"رواه ابن ماجه واللفظ له، والنسائي في عشرة النساء بأسانيد، أحدها جيد".
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن عمر بن الخطاب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه لا يستحيي من الحق، لا تأتوا النساء في أدبارهن".
رواه البزار -كشف الأستار- (1456) عن محمد بن سعيد بن يزيد بن إبراهيم التستري، ثنا علاء بن اليمان، ثنا زمعة، عن سلمة بن وهرام، عن طاوس، عن ابن الهاد، عن عمر فذكره.
ورواه النسائي في الكبرى (8959) من وجه آخر عن عثمان بن اليمان وفيه انقطاع فإن ابن الهاد لم يدرك عمر بن الخطاب وأما المنذري فقال في الترغيب والترهيب (3697)"رواه أبو يعلى وإسناده جيد" فليس بجيد، فإنه رواه من هذا الطريق كما هو الظاهر من صنيع الحافظ الهيثمي في"المجمع" (4/ 289) فإنه قال:"رواه أبو يعلى، والطبراني في الكبير، والبزار، ورجال أبي يعلى رجال الصحيح خلا عثمان بن اليمان وهو ثقة" وأكد البزار بأنه لا يُروى عن عمر إلا من هذا الوجه.
وأما قول الهيثمي في عثمان بن اليمان بأنه ثقة فهو اعتمادًا على توثيق ابن حبان مع أنه قال:"يخطئ" وذكره ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا فهو في عداد المجاهيل حتى يُنص على توثيقه.
وفي الباب ما رُوي عن علي بن طلق قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا فسا أحدكم فليتوضأ، ولا تأتوا النساء في أعجازهن".
رواه أبو داود (205) والترمذي (1166) وأحمد (655) وابن حبان (2237) والبيهقي (2/ 255) كلهم من طريق عيسى بن حِطّان، عن مسلم بن سلّام، عن طلق بن علي فذكره.
وعيسى بن حطّان ومسلم بن سلّام مجهولان قاله غير واحد من أهل العلم، وإن كان ابن حبان ذكرهما في"الثقات" على قاعدته، وأخطأ من رواه عن عبد الملك بن مسلم بن سلام، عن أبيه (مسلم بن سلام) انظر تاريخ بغداد (10/ 398، 399) وعلي هو ابن طلْق، ولكن ظنَّ الإمام أحمد أنه علي بن أبي طالب، فأدخل حديثه هذا في مسند علي بن أبي طالب.
ورواه الترمذي (1164) في سياق أطول قال: أتي أعرابي النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه، الرجل يكون منا في الفلاة، فتكون فيه الرويحةُ، ويكون في الماء قلة؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا فسا أحدكم فليتوضأ، ولا تأتوا النساء في أعجازهن فإن اللَّه لا يستحيي من الحق".
قال الترمذي:"حديث علي بن طلق حديث حسن، وسمعت محمدا يقول: لا أعرف لعلي بن طلق، عن النبي صلى الله عليه وسلم غير هذا الحديث الواحد، ولا أعرف هذا الحديث من حديث طلق بن علي السحيمي".
قال الترمذي:"وكأنه رأي أن هذا رجل آخر من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم".
قلت: وكيف يكون إسناده حسنا وفيه رجلان لم يُوثَّقا، بل قال غير واحد من أهل العلم إنهما مجهولان كما سبق.
وفي الباب أيضًا عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا ينظر اللَّه إلى رجل أتى رجلًا، أو امرأةٌ في الدبر".
رواه الترمذي (1165) وأبو بكر بن أبي شيبة (4/ 251 - 252) وصحّحه ابن حبان (4203، 4204، 4418)
وابن الجارود (729) كلهم من حديث أبي خالد الأحمر، عن الضحاك ابن عثمان، عن مخرمة بن سليمان، عن كُريب، عن ابن عباس فذكره.
قال الترمذي:"حسن غريب"، ولكن قال البزار: لا نعلمه يُروي عن ابن عباس بإسناد أحسن من هذا، تفرد به ابو خالد الأحمر، عن الضحاك بن عثمان فذكره بإسناده وكذا قال أيضًا ابن عدي. ورواه النسائي في الكبرى (8953) عن هناد، عن وكيع عن الضحاك موقوفا وهو أصح عندهم من المرفوع. كذا في"التلخيص" (3/ 181).
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عبد اللَّه بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"تلك اللوطية الصغرى" يعني إتيان المرأة في دبرها.
رواه أبو داود الطيالسي في مسنده (2380) عن همام، عن قتادة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عمرو فذكره. ومن طريقه رواه البيهقي (7/ 198).
ورواه أيضًا الإمام أحمد (6706) والبزار (1455) والنسائي في الكبرى (8948) والطحاوي في شرح معاني الآثار (3/ 44) كلهم من طريق همام به.
ولكن رواه ابن أبي شيبة (4/ 252) والنسائي في الكبرى (8950) والطحاوي، كلهم من وجه آخر عن عبد اللَّه بن عمرو من قوله.
وقال البخاري في التاريخ الصغير (1/ 239): والمرفوع لا يصح وقال في التاريخ الكبير:"قال لي محمد بن بشار، نا ابن أبي عدي وعبد الأعلى عن سعيد، عن قتادة، عن أبي أيوب، عن عبد اللَّه بن عمرو قوله" وهذا الذي رجحه أيضًا ابن كثير في تفسيره، وابن حجر في"التلخيص" (3/ 181) وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"لا ينظر اللَّه إلى رجل جامع امرأته في دبرها".
رواه أبو داود (2162) وابن ماجه (1923) وأحمد (7684) وعبد الرزاق (20952) والبيهقي (7/ 198) كلهم من حديث سهيل بن أبي صالح، عن الحارث بن مُخلّد، عن أبي هريرة فذكره.
والحارث بن المخلد لم يوثقه أحد غير ابن حبان وقال البزار: ليس بمشهور، فإذا هو"مجهول" كما قال الحافظ في"التقريب" وللحديث أسانيد أخرى أضعف من هذا.
فالصحيح أن هذا الحديث لا يصح عن أبي هريرة. وقد رواه النسائي في الكبرى - عشرة النساء (8961) عن عثمان بن عبد اللَّه، عن سليمان بن عبد الرحمن من كتابه عن عبد الملك بن محمد الصنعاني، عن سعيد بن عبد العزيز، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"استحيوا من اللَّه حق الحياء، ولا تأتوا النساء في أدبارهن" قال المزي في تحفة الأشراف (11/ 25): قال حمزة بن محمد الكناني الحافظ:"هذا حديث منكر باطل، من حديث الزهري، ومن حديث أبي سلمة، ومن حديث سعيد. فإن كان عبد الملك سمعه من سعيد فإنما سمعه بعد
الاختلاط. وقد رواه الزهري، عن أبي سلمة أنه كان ينهى عن ذلك. فأما عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم فلا".
وفي الباب أيضًا عن جابر بن عبد اللَّه وعقبة بن عامر وغيرهما وهي كلها معلولة.
ولكن خلاصة القول في هذا الباب أنه ثبتت صحة بعض الأحاديث دون البعض، وهذه الأحاديث الضعيفة يقوي بعضها بعضا ولذا قال ابن حجر في"الفتح" (8/ 191 - 192): طرقها كثيرة، مجموعها صالح للاحتجاج به، ويؤيد القول بالتحريم".
ثم ذكر من الأحاديث الصالحة للاحتجاج حديث خزيمة بن ثابت، وحديث أبي هريرة، وحديث ابن عباس.
وإن كان نقل القول من البخاري، والذهلي، والبزار، والنسائي، وأبي علي النيسابوري، بأنه لا يثبت فيه شيء.
وقد ضرب عمر رجلًا أتى امرأة في دبرها، وسئل أبو الدرداء عن ذلك فقال: وهل يفعل ذلك إلا كافر، وذكر لابن عمر فقال: هل يفعله أحد من المسلمين. انظر للمزيد:"شرح السنة" (9/ 107).
খুযাইমা ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় একজন প্রশ্নকারী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মহিলাদের পশ্চাৎদ্বার দিয়ে সহবাস করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হালাল।" অতঃপর তিনি তাকে ডাকলেন, অথবা (অন্য কাউকে) তাকে ডাকার নির্দেশ দিলেন, অতঃপর যখন তাকে ডাকা হলো, তখন তিনি বললেন: "তুমি কীভাবে (কোথায় সহবাসের কথা) বলেছিলে—দুটি গর্তের, অথবা দুটি ছিদ্রের, অথবা দুটি স্থানের কোনটির মধ্যে? যদি তার পিছন দিক দিয়ে যোনিতে প্রবেশ করো, তবে হ্যাঁ; কিন্তু যদি তার পিছন দিক দিয়ে পশ্চাৎদ্বারেই প্রবেশ করো, তবে না। নিশ্চয়ই আল্লাহ সত্য প্রকাশ করতে লজ্জাবোধ করেন না। তোমরা মহিলাদের পশ্চাৎদ্বার দিয়ে সহবাস করো না।"
6211 - عن عائشة قالت: كانت إحدانا إذا كانت حائضا، فأراد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يباشرها أمرها أن تتَّزر في فور حيضتها، ثم يباشرها. قالت: وأيكم بملك إربه كما كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يملك إربه.
متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (302) ومسلم في الحيض (293) كلاهما من طريق علي بن مسهر قال: أخبرنا أبو إسحاق الشيباني، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের মধ্যে কেউ যখন ঋতুমতী হতো, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যদি তার সাথে ঘনিষ্ঠতা করতে চাইতেন, তবে তিনি তাকে ঋতুর (শুরুর) সময়েই ইযার (কোমরবন্ধনী) বেঁধে নিতে আদেশ করতেন, অতঃপর তার সাথে ঘনিষ্ঠতা করতেন। তিনি (আয়েশা) বললেন: তোমাদের মধ্যে এমন কে আছে, যে তার প্রবৃত্তিকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মতো নিয়ন্ত্রণ করতে পারে?
6212 - عن ميمونة قالت: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يباشر امرأة من نسائه أمرها فاتزرت، وهي حائض.
متفق عليه: رواه البخاري في الحيض (303) ومسلم في الحيض (294) كلاهما من طريق الشيباني، عن عبد اللَّه بن شداد، قال: سمعت ميمونة، قالت: فذكرته.
মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর কোনো স্ত্রীর সাথে সহবাস (শারীরিক ঘনিষ্ঠতা) করতে চাইতেন, আর সে ঋতুমতী থাকত, তখন তিনি তাকে ইযার (শরীরের নিচের অংশে জড়ানোর বস্ত্র) পরিধান করার নির্দেশ দিতেন।
6213 - عن أنس أن اليهودَ كانوا إذا حاضت المرأةُ فيهم لم يؤاكِلُوها ولم يُجامِعوهنّ في البيوت، فسأل أصحابُ النبي صلى الله عليه وسلم النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فأنزل اللَّه تعالى: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْمَحِيضِ قُلْ هُوَ أَذًى فَاعْتَزِلُوا النِّسَاءَ فِي الْمَحِيضِ} إلى آخر الآية [البقرة: 222] فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اصنَعُوا كلَّ شيءٌ إلّا النكاح".
فبلغ ذلك اليهودَ فقالوا: ما يريد هذا الرجل أن يَدَعَ من أمرنا شيئًا إلَّا خالَفَنا فيه. فجاء أسَيْدُ بن
حُضَيْر وعبّادُ بن بِشْر فقالا: يا رسول اللَّه، إن اليهود تقول: كذا وكذا، أفلا نُجامِعُهُنَّ؟ فَتغيَّر وجهُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حتى ظننّا أن قد وَجَدَ عليهما، فَخَرَجا فاستقبلهما هديَّةٌ من لَبَنٍ إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فأرسل في آثارهما فقاهما، فَعَرفا أن لم يَجِد عليهما.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (302) عن زهير بن حرب، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، حدَّثنا حمَّاد بن سلمة، حدثنا ثابت، عن أنسٍ، فذكره.
وفي الباب أحاديث أخرى، انظر: كتاب الحيض.
في قتادة وقد رأيت حاله، وكل من خالفه شاذ أو منكر.
فالصواب فيه أنه موقوف على ابن عباس رواه ابن أبي شيبة (12519) والدارمي (1153) كلاهما من حديث ابن أبي ليلى، عن عطاء، عن ابن عباس موقوفا بلفظ"يتصدق بدينار".
وابن أبي ليلي سيئ الحفظ، وله أسانيد أخرى، وقد روي بلفظ آخر:"إذا أتاها في دم فدينار، وإذا أتاها وقد انقطع الدم فنصف دينار".
رواه الدارمي (1148) وفيه رجل مجهول.
وقال إبراهيم: يستغفر اللَّه. رواه عبد الرزاق (1268) من طريق معمر، عن أيوب، عن منصور والأعمش، عن إبراهيم. وإسناده صحيح.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইহুদিদের মধ্যে কোনো নারী যখন ঋতুমতী হতো, তখন তারা তার সাথে একত্রে পানাহার করত না এবং একই ঘরে একত্রে বসবাসও করত না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তারা তোমাকে জিজ্ঞেস করে হায়েয সম্পর্কে। বলে দাও, তা কষ্টদায়ক। সুতরাং তোমরা হায়েয চলাকালে স্ত্রীগণ থেকে দূরে থাকো..." (সূরা বাকারা: ২২২ আয়াতের শেষ পর্যন্ত)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা যৌন মিলন ছাড়া (স্ত্রীদের সাথে) সবকিছুই করো।"
এই খবর ইহুদিদের কাছে পৌঁছালে তারা বলল: এই লোকটি আমাদের কোনো কিছুই ছাড়তে চায় না, যার বিরোধিতা সে না করে। তখন উসায়দ ইবনু হুযায়র এবং আব্বাদ ইবনু বিশর এলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল, ইহুদিরা তো এমন এমন কথা বলছে। আমরা কি তাদের (স্ত্রীদের) সাথে সহবাস করে ফেলব? এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা পরিবর্তিত হয়ে গেল। এমনকি আমরা ধারণা করলাম যে, তিনি হয়তো তাদের দুজনের প্রতি অসন্তুষ্ট হয়েছেন। অতঃপর তারা বেরিয়ে গেলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য দুধের একটি হাদিয়া (উপহার) এলো। তিনি তাদের দুজনের সন্ধানে লোক পাঠালেন এবং তাদের ডেকে আনালেন। তখন তারা বুঝতে পারলেন যে, তিনি তাদের প্রতি অসন্তুষ্ট হননি।
6214 - عن ابن محيريز، أنه قال: دخلت المسجد، فرأيت أبا سعيد الخدري، فجلست إليه، فسألته عن العزل؟ فقال: خرجنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في غزوة بني المصطلق، فأصبنا سبيا من سبي العرب، فاشتهينا النساء، واشتد علينا العُزْبة، وأحينا الفداء، فأردنا أن نعزل، فقلنا: نعزل ورسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بين أظهرنا قبل أن نسأله، فسألناه عن ذلك، فقال: ما عليكم أن لا تفعلوا، ما من نسمة كائنة إلى يوم القيامة إلا وهي كائنة".
متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (95)، عن ربيعة بن عبد الرحمن، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن ابن محيريز، فذكره. ورواه البخاري في العتق (2542) عن عبد اللَّه بن يوسف، عن مالك بإسناده.
ورواه أيضًا البخاري في المغازي (4138)، ومسلم في النكاح (125: 1438) كلاهما عن إسماعيل بن جعفر، أخبرني ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن محمد بن يحيى بن حبّان، عن ابن محيريز، به، بنحوه.
وفيه عند مسلم: كان مع ابن محيريز أبو صِرمة وهو الذي سأل أبا سعيد.
وفي رواية له (130) من طريق أيوب، عن محمد، عن عبد الرحمن بن بشر بن مسعود، عن أبي سعيد بلفظ:"لا عليكم أن لا تفعلوا ذاكم فإنما هو القدر".
قال محمد (هو ابن سيرين):"لا عليكم" أقرب إلى النهي.
وفي رواية عنده قال الحسن (هو البصري):"واللَّه لكأن هذا زجر".
وقال المبرّد: معنى قوله"لا عليكم أن لا تفعلوا" أي لا بأس عليكم أن تفعلوا، ومعنى"لا" الثانية طرحُها. ذكره البغوي في شرح السنة (9/ 103).
وقال:"ورخص فيه غير واحد من الصحابة والتابعين. منهم زيد بن ثابت، وروي عن أبي
أيوب وسعد بن أبي وقاص وابن عباس أنهم كانوا يعزلون".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনু মুহাইরিয (রহ.) বলেন: আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম এবং আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম। আমি তাঁর কাছে বসলাম এবং তাঁকে আযল (সহবাসের পর বীর্যপাত দেহের বাইরে ফেলা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি (আবূ সাঈদ) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বানু মুসতালিকের যুদ্ধে বের হলাম। আমরা আরবের কিছু বন্দিনী (দাসীরূপে) পেলাম। তখন আমরা মহিলাদের প্রতি আকৃষ্ট হলাম, আর অবিবাহিত থাকা আমাদের জন্য কঠিন ছিল। আমরা বন্দিনীদের মুক্তিপণ পাওয়ারও আকাঙ্ক্ষা করতাম। তাই আমরা আযল করতে চাইলাম। আমরা বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে উপস্থিত থাকতে তাঁকে জিজ্ঞাসা না করেই কি আমরা আযল করব? অতঃপর আমরা তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: তোমরা এমনটি (আযল) না করলে তোমাদের কোনো ক্ষতি নেই, কারণ কিয়ামত পর্যন্ত যত প্রাণ সৃষ্টি হওয়ার আছে, তার সবগুলোই সৃষ্টি হবে।
6215 - عن أبي سعيد الخدري قال: أصبنا سبايا، فكنا نعزل، فسألنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"أو إنكم لتفعلون؟ -قالها ثلاثا- ما من نسمة كائنة إلى يوم القيامة إلا هي كائنة".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5210)، ومسلم في النكاح (127: 1438) كلاهما عن عبد اللَّه بن محمد، حدثنا جويرية، عن مالك، عن الزهري، عن ابن مُحيريز، عن أبي سعيد الخدري، قال: فذكره.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা কিছু যুদ্ধবন্দী নারী পেলাম, অতঃপর আমরা আযল (সহবাসে বীর্যপাত বাইরে করা) করতাম। এরপর আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "তোমরা কি সত্যিই এটা করছো?" (কথাটি তিনি তিনবার বললেন)। "ক্বিয়ামাত দিবস পর্যন্ত যত আত্মার সৃষ্টি হওয়ার কথা, তা অবশ্যই সৃষ্টি হবে।"
6216 - عن أبي سعيد الخدري أن رجلا قال: يا رسول اللَّه، إن لي جارية، وأنا أعزل عنها، وأنا أكره أن تحمل، وأنا أريد ما يريد الرجال، وإن اليهود تحدث أن العزل موءودة صغرى. فقال:"كذبت يهود، ولو أراد اللَّه أن يخلقه ما استطعت أن تصرفه".
حسن: روي عن أبي سعيد الخدري من طرق:
منها: ما رواه يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبي مطيع بن رفاعة، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
رواه أبو داود (2171) ومن طريقه البيهقي (7/ 230) وأحمد (11477، 11288) والطحاوي في مشكله (1917) والنسائي في الكبرى (9079) كلهم من طرق عن هذا الوجه، وفيه أبو مطيع بن رفاعة، ويقال: أبو مطيع بن عوف، أحد بني رفاعة بن الحارث، وقيل: اسمه رفاعة، وقيل: فلان ابن رفاعة، ويقال: أبو رفاعة، لم يرو عنه سوى محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، وذكره البخاري وابن أبي حاتم، ولم يذكرا فيه جرحا ولا تعديلًا. كما لم يذكره أيضًا ابن حبان في"الثقات" فهو"مجهول" وفي التقريب"مقبول" أي عند المتابعة وهو كذلك.
وخالفه معمر فرواه عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن جابر قال: فذكره نحوه.
رواه الترمذي (1136) عن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب، قال: حدثنا يزيد بن زريع، قال: حدثنا معمر فذكره، ورواه النسائي في الكبرى (9078) من وجه آخر عن معمر، وسكت عليه الترمذي، ولم أقف من تابع معمرًا على هذا وظاهر إسناده صحيح.
ومنها: ما رواه محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن وأبي أمامة بن سهل عنهما جميعا عن أبي سعيد الخدري قال: لما أصبنا سَبْي بني المصطلق، استمتعنا من النساء، وعزلنا عنهن، قال: ثم إني وقفت على جارية في سوق بني قينقاع قال: فمر بي رجل من يهود فقال: ما هذه الجارية يا أبا سعيد؟ قلت: جارية لي أبيعها. قال: هل كنت تصيبُها؟ قال: قلت: نعم، قال: فلعلك تبيعها وفي بطنها منك سخلة؟ قال: قلت: أعزل عنها. قال: تلك الموءودة الصغرى. قال: فجئت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له فقال:"كذبت يهود،
كذبت يهود".
رواه ابن أبي شيبة (16870) والطحاوي في مشكله (1919) هما من حديث ابن إسحاق وهو مدلس وقد عنعن.
ومنها ما رواه عياش بن عقبة الحضرمي، عن موسى بن وَرْدان، عن أبي سعيد الخدري قال: بلغ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن اليهود يقولون: إن العزل هو الموءودة الصغرى، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كذبت يهود" وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو أفضيت لم يكن إلا بقدر" رواه البزار -كشف الأستار- (1453) والطحاوي في مشكله (1918) واللفظ له، كلاهما من حديث عياش بن عقبة الحضرمي بإسناده.
قال البزار:"لا نعلم روى موسى عن أبي سعيد الا هذا، وهو صالح الحديث".
وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 297):"وفيه موسى بن وردان، وهو ثقة وقد ضُعّف، وبقية رجاله ثقات".
ولحديث أبي سعيد أسانيد أخرى، وبها صار الحديث حسنًا، فإنه يُقوِّي بعضها بعضًا.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার একটি দাসী আছে, আমি তার সাথে আযল করি। আমি অপছন্দ করি যে সে গর্ভবতী হোক, আর আমি পুরুষরা যা চায়, তা চাই। আর ইয়াহুদীরা বলে যে, আযল হলো ছোট ওয়াদ (জীবন্ত কবরস্থ করা)। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইয়াহুদীরা মিথ্যা বলেছে। আল্লাহ যদি তাকে সৃষ্টি করতে চান, তবে তুমি তাকে ফিরিয়ে দিতে পারবে না।"
6217 - عن جابر بن عبد اللَّه، أن رجلًا أتى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"إن لي جارية هي خادمنا وسانيتُنا، وأنا أطوف عليها، وأنا أكره أن تحمل؟ فقال:"اعزل عنها إن شئت، فإنه سيأتيها ما قدّر لها" فلبث الرجل ثم أتاه فقال: إن الجارية قد حبلت؟ فقال:"قد أخبرتك أنه سيأتيها ما قدّر لها".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1439) عن أحمد بن عبد اللَّه بن يونس، حدثنا زهير، أخبرنا أبو الزبير، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره.
وفي رواية"إن ذلك لن يمنع شيئًا أراده اللَّه" قال: فجاء الرجل فقال: يا رسول اللَّه، إن الجارية التي كنت ذكرتها لك حملت. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنا عبد اللَّه ورسوله".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমার একজন দাসী আছে, যে আমাদের সেবিকা এবং পানি সেচকারিণী (বা পানি বহনকারিণী)। আমি তার সঙ্গে সহবাস করি, কিন্তু আমি চাই না যে সে গর্ভবতী হোক? তিনি বললেন: তুমি যদি চাও, তাহলে তার থেকে 'আযল' (বীর্য বাইরে ফেলা) করতে পারো। তবে তার ভাগ্যে যা লেখা আছে, তা তার নিকট অবশ্যই আসবে। এরপর লোকটি কিছু সময় থাকল। অতঃপর সে রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: ঐ দাসীটি গর্ভবতী হয়ে গেছে। তিনি বললেন: আমি তোমাকে আগেই জানিয়েছিলাম যে, তার ভাগ্যে যা লেখা আছে, তা তার নিকট অবশ্যই আসবে।
অন্য বর্ণনায় এসেছে: নিশ্চয়ই তা আল্লাহ যা চান, তা প্রতিরোধ করতে পারে না। বর্ণনাকারী বলেন: লোকটি এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল, আমি আপনাকে যে দাসীটির কথা বলেছিলাম, সে গর্ভবতী হয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি আল্লাহর বান্দা এবং তাঁর রাসূল।
6218 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: كنا نعزل والقرآن ينزل، لو كان شيئًا يُنهى عنه لنهانا عنه القرآن. وفي لفظ: كنا نعزل على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5208)، ومسلم في النكاح (1440) كلاهما من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، عن عمرو (هو ابن دينار) أخبرني عطاء، أنه سمع جابرًا، فذكره.
واللفظ الآخر عند البخاري (5207) من طريق ابن جريج، ومسلم من طريق معقل - كلاهما عن عطاء، عن جابر.
وفيه جواز الاستدلال بالتقرير من اللَّه ورسوله على حكم من الأحكام. لأن لو كان ذلك الشيء حراما لم يقروا عليه، فإذا أضاف الصحابي الحكم إلى زمن النبي صلى الله عليه وسلم فالأصل أنه اطلع عليه لتوفر دواعيه على سؤالهم إياه إلا إن ثبت بأنه صلى الله عليه وسلم لم يطلع عليه، فليس له حكم الرفع.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আযল (সহবাসের সময় বাইরে বীর্যপাত করা) করতাম, অথচ কুরআন নাযিল হচ্ছিল। যদি এটি এমন কোনো বিষয় হত যা নিষেধ করা হয়েছে, তবে কুরআন অবশ্যই আমাদেরকে তা থেকে নিষেধ করত।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে আযল করতাম।
6219 - عن جابر قال: كنا نعزل على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فبلغ ذلك نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم فلم ينْهنا.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (138: 1439) عن أبي غسّان المِسْمعي، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আযল (সহবাসের সময় বীর্য বাইরে ফেলা) করতাম। বিষয়টি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছল, কিন্তু তিনি আমাদের নিষেধ করলেন না।
6220 - عن عامر بن سعد، أن أسامة بن زيد أخبر والده سعد بن أبي وقاص، أن رجلًا جاء إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: إني أعزل عن امرأتي. فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لِمَ تفعل ذلك؟ فقال الرجل: أُشفق على ولدها أو على أولادها. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو كان ذلك ضارًّا لضر فارس والروم".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (143: 1443) من طريق عبد اللَّه بن يزيد المقبري، حدثنا حيوة، حدثني عياش بن عباس، أن أبا النضر حدثه عن عامر بن سعد، به، فذكره.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট এসে বললেন: আমি আমার স্ত্রীর সাথে 'আযল' করি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: তুমি কেন এমন করো? লোকটি বলল: আমি তার সন্তানের উপর অথবা তার সন্তানদের উপর স্নেহ করি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: যদি তা ক্ষতিকর হতো, তবে তা পারস্য ও রোমীয়দের ক্ষতি করত।
6221 - عن أبي ذر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لكَ في جماعِ زوجتِك أجرٌ" فقيل: يا رسول اللَّه، وفي شهوة يكون من أجر؟ قال: نعم أرأيتَ لو كان لكَ ولدٌ قد أدرك، ثم مات أكنتَ محتسبه؟ قال: نعم، قال"أنت كنت خلقتَه؟" قال: بل اللَّه خلقه. قال:"أنتَ كنت هديته؟" قال: بل اللَّه هداه، قال:"أكنتَ ترزقه؟" قال: بل اللَّه كان رزقه، قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فَضَعْه في حلاله وجنِّبْه حرامه، وأقرره، فإنْ شاء اللَّهُ أحياه، وإنْ شاء أماتَه، ولك أجرٌ".
حسن: رواه ابن حبان (4192)، عن ابن سلم، قال: حدثنا حرملة، قال: حدثنا ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، أن سعيد بن أبي هلال حدثه عن أبي سعيد مولى المهري، عن أبي ذر فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي سعيد مولى المهري، فإنه وثّقه العجلي، وابن حبان وأخرج له مسلم في صحيحه، وذكره النسوي في ثقات التابعين من أهل مصر، وروى عنه جمعٌ فهو لا ينزل عن درجة حسن الحديث.
وقد تابعه أبو سلام في بعض ما رواه كما في الحديث الآتي.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমার স্ত্রীর সাথে সহবাসের মধ্যেও তোমার জন্য প্রতিদান (ছওয়াব) রয়েছে।” তখন জিজ্ঞাসা করা হলো, হে আল্লাহর রাসূল! (এ তো হলো) প্রবৃত্তির চাহিদা, এর মধ্যেও কি কোনো প্রতিদান থাকতে পারে? তিনি বললেন: “হ্যাঁ। তুমি কি মনে করো না, যদি তোমার কোনো সন্তান সাবালক হওয়ার পর মারা যায়, তবে তুমি কি তার জন্য আল্লাহ্র কাছে প্রতিদান প্রত্যাশা করবে?” সে বললো, হ্যাঁ। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি কি তাকে সৃষ্টি করেছিলে?” সে বললো: না, বরং আল্লাহ্ তাকে সৃষ্টি করেছেন। তিনি বললেন: “তুমি কি তাকে সঠিক পথ দেখিয়েছিলে?” সে বললো: না, বরং আল্লাহ্ তাকে সঠিক পথ দেখিয়েছেন। তিনি বললেন: “তুমি কি তাকে রিযক দিতে?” সে বললো: না, বরং আল্লাহ্ তাকে রিযক দিয়েছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “সুতরাং তাকে হালাল স্থানে (স্ত্রীর গর্ভে) রাখো এবং হারাম থেকে বিরত থাকো। আর তাকে (আল্লাহর কাছে) সোপর্দ করো। আল্লাহ্ চাইলে তাকে জীবন দেবেন, আর চাইলে মৃত্যু দেবেন; আর তোমার জন্য প্রতিদান (ছওয়াব) রয়েছে।”
6222 - عن أبي ذر أنه قال: على كل نفس في كل يوم طلعت فيه الشمس صدقة منه على نفسه. قلت: يا رسول اللَّه، من أين أتصدق وليس لنا أموال؟ قال:"لأن من أبواب الصدقة التكبير، وسبحان اللَّه، والحمد للَّه، ولا إله إلا اللَّه، وأستغفر اللَّه، وتأمر بالمعروف وتنهى عن المنكر، وتعزل الشوكة عن طريق الناس والعظم والحجر، وتهدي الأعمى، وتسمع الصم والأبكم حتى يفقه، وتدل المستدل على حاجة له قد علمت مكانها، وتسعى بشدة ساقيك إلى اللَّهفان المستغيث، وترفع بشدة ذراعيك مع
الضعيف، كل ذلك من أبواب الصدقة منك على نفسك، ولك في جماعك زوجتك أجر".
قال أبو ذر: كيف يكون لي أجر في شهوتي؟ ! فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أرأيت لو كان لك ولد فأدرك ورجوت خيره فمات، أكنت تحتسب به؟" قلت: نعم. قال: فأنت خلقته؟" قال: بل اللَّه خلقه. قال:"فأنت هديته؟" قال: بل اللَّه هداه، قال: فأنت ترزقه؟" قال: بل اللَّه كان يرزقه، قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كذلك فضعْه في حلاله وجنّبه حرامه، فإن شاء اللَّه أحياه، وإن شاء أماته، ولك أجر".
صحيح: رواه أحمد (21484) عن عبد الملك بن عمرو، حدثنا علي -يعني ابن المبارك، عن يحيى، عن زيد بن سلّام، عن أبي سلّام، قال: قال أبو ذر فذكره.
وإسناده صحيح. ويحيى هو ابن أبي كثير، كان لعلي بن المبارك وهو الهنائي كتابان عن يحيى ابن أبي كثير، أحدهما سماع، والآخر إرسال، فحديث الكوفيين عنه فيه شيء، والراوي عنه عبد الملك بن عمرو وهو القيسي أبو عامر العقدي بصري.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: প্রত্যেক ব্যক্তির উপর, যে দিনটিতে সূর্য উদিত হয়, সেই দিন নিজের পক্ষ থেকে তার উপর সাদকা (দান) আবশ্যক। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাদের তো সম্পদ নেই, তাহলে আমরা কোথা থেকে সাদকা করব? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: সাদকার দরজাগুলোর মধ্যে হলো: 'আল্লাহু আকবার' বলা, 'সুবহানাল্লাহ' বলা, 'আলহামদুলিল্লাহ' বলা, 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলা এবং 'আস্তাগফিরুল্লাহ' বলা। আর তুমি সৎকাজের আদেশ করবে এবং অসৎকাজ থেকে নিষেধ করবে। তুমি মানুষের রাস্তা থেকে কাঁটা, হাড় ও পাথর সরিয়ে দেবে। তুমি অন্ধকে পথ দেখাবে। তুমি বধির ও বোবাকে (কথা) শোনানোর চেষ্টা করবে, যেন তারা বুঝতে পারে। তুমি পথ সন্ধানকারীকে তার প্রয়োজনীয় স্থানের পথ দেখিয়ে দেবে, যার স্থান তুমি জানো। তুমি তোমার শক্ত পায়ে বিপন্ন সাহায্যপ্রার্থী ব্যক্তির দিকে দ্রুত ছুটে যাবে। তুমি দুর্বল ব্যক্তির সাথে তোমার দু’হাত সবলে তুলে ধরবে। এই সব কিছুই হলো তোমার নিজের পক্ষ থেকে তোমার উপর সাদকার দরজা। আর তোমার স্ত্রীর সাথে সহবাস করার মধ্যেও তোমার জন্য প্রতিদান রয়েছে।
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আমার নিজের কামনাবাসনা পূরণ করব, এতে আমার জন্য কীভাবে প্রতিদান হবে? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: তুমি কি মনে করো, তোমার যদি কোনো সন্তান হয়, আর সে বড় হয় এবং তুমি তার কল্যাণ আশা করো, এরপর সে মারা যায়; তবে কি তুমি তার জন্য আল্লাহর কাছে প্রতিদান আশা করো? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তুমি কি তাকে সৃষ্টি করেছ? আমি বললাম: বরং আল্লাহই তাকে সৃষ্টি করেছেন। তিনি বললেন: তুমি কি তাকে পথ দেখিয়েছ? আমি বললাম: বরং আল্লাহই তাকে পথ দেখিয়েছেন। তিনি বললেন: তুমি কি তাকে রিযিক দিয়েছ? আমি বললাম: বরং আল্লাহই তাকে রিযিক দিয়েছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: ঠিক তেমনি, তুমি (সহবাসকে) হালাল পথে ব্যবহার করো এবং হারাম পথ পরিহার করো। অতঃপর যদি আল্লাহ চান, তবে তিনি তাকে (সন্তানকে) জীবন দেবেন, আর যদি চান, তবে তিনি তাকে মৃত্যু দেবেন। আর তোমার জন্য প্রতিদান রয়েছে।
6223 - عن أبي هريرة قال: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن العزل قالوا: إن اليهود تزعم أن العزل هو الموءودة الصغرى قال:"كذبت يهود".
حسن: رواه البزار -كشف الأستار- (1451) والبيهقي (7/ 230) كلاهما من حديث محمد بن عمرو، ثنا أبو سلمة، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو الليثي فإنه حسن الحديث.
ورواه البزار -كشف الأستار- (1452) والنسائي في الكبرى (9083) كلاهما من أبي عامر يحدث عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة أن اليهود كانت تقول: إن العزل هي الموءودة الصغرى فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم فقال: كذبت يهود، إذا أراد اللَّه أن يخلق خلقًا لم يمنعه -أحسبه قال: - شيء".
قال البزار:"لا نعلم رواه عن يحيى إلا أبو عامر".
تنبيه: تحرف في"السنن الكبرى" أبو عامر إلى عمر.
وفي الباب ما رُوي عن أنس بن مالك يقول: جاء رجل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وسأل عن العزل فقال:"لو أن الماء الذي يكون منه الولد أفرقته على صخرة لأخرج اللَّه منها -أو يخرج منها ولدًا. الشك منه- وليخلقن اللَّه نفْسًا هو خالقها".
رواه الإمام أحمد (12420) والبزار -كشف الأستار- (2163) كلاهما من حديث أبي عاصم الضحاك بن مخلد، أخبرنا أبو عمرو مبارك الخياط - جد ولد عباد بن كثير، قال: سألت تُمامة بن عبد اللَّه بن أنس عن العزل فقال: سمعت أنس بن مالك يقول: فذكره.
وفيه أبو عمرو مبارك الخياط في التقريب"مقبول". أي عند المتابعة، ولم يُتابع فهو ليّن الحديث. انظر للمزيد كتاب القدر باب"ما من نسمة كائنة إلى يوم القيامة إلا هي كائنة" وكذلك لا يصح ما روي عن عمر بن الخطاب قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يعزل عن الحرة إلا بإذنها.
رواه ابن ماجه (1928) عن الحسن بن علي الخلّال، قال: حدثنا إسحاق بن عيسى، قال: حدثنا ابن لهيعة، قال: حدثني جعفر بن ربيعة، عن الزهري، عن محرّر بن أبي هريرة، عن أبيه عن عمر بن الخطاب قال: فذكره، وفيه ابن لهيعة وفيه كلام معروف، وبه أعله البوصيري في زوائد ابن ماجه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ‘আযল’ (সহবাসের পর বাইরে বীর্যপাত করা) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো। তাঁরা বললেন: ইয়াহূদীরা দাবি করে যে, ‘আযল’ হলো ছোট 'মাওঊদাহ' (জীবন্ত কবরস্থ করা)। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “ইয়াহূদীরা মিথ্যা বলেছে।”
(অন্য বর্ণনায় তিনি বলেন): “আল্লাহ্ যখন কোনো কিছু সৃষ্টি করতে চান, তখন কোনো কিছুই তাকে বাধা দিতে পারে না।”
আর আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: একজন লোক রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে ‘আযল’ সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তিনি বললেন: "যে পানি থেকে সন্তান সৃষ্টি হয়, তুমি যদি তা কোনো পাথরের উপরও নিক্ষেপ করো, তবুও আল্লাহ্ তা থেকে একটি সন্তান বের করে আনবেন - অথবা তিনি বলেছেন: জন্ম দেবেন (সন্দেহ বর্ণনাকারীর) - এবং আল্লাহ্ অবশ্যই সেই ব্যক্তিকে সৃষ্টি করবেন, যাকে তিনি সৃষ্টি করতে চান।"
6224 - عن جدامة بنت وهب أخت عكاشة بن وهب قالت: حضرت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وسألوه عن العزل فقال:"الوأد الخفي".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (141: 1442) من طريق عن عبد اللَّه بن يزيد المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، حدثني أبو الأسود، عن عروة، عن عائشة، عن جدامة بنت وهب فذكرته.
وزاد عبيد اللَّه في حديثه عن المقرئ: {وَإِذَا الْمَوْءُودَةُ سُئِلَتْ} [التكوير: 8].
وجدامة: بالجيم، ومن قال بالذال المعجمة فقد صحف كما قال الدارقطني وأبو الأسود هو محمد بن عبد الرحمن بن نوفل.
وكان عمر وابنه عبد اللَّه ينهيان عن العزل.
وقد روي عن ابن عمر أنه كان يضرب بنيه على العزل.
وروي عن علي بن أبي طالب وعبد اللَّه بن مسعود أنهما كرها العزل، وروي عنهما الإباحة أيضًا. ذكره البيهقي (7/ 231).
وقال بعد أن أخرج حديث جدامة:"وقد روينا عن النبي صلى الله عليه وسلم في العزل خلاف هذا. ورواةُ الإباحة أكثر، وأحفظ. وأباحه من سمينا من الصحابة، فهي أولى، وتحتمل كراهية من كره منهم التنزيه دون التحريم".
وذهب الطحاوي إلى نسخ حديث جدامة، لأن حكمه كان على شريعة من قبله، لأنه صلى الله عليه وسلم أمر بإتباع أنبياء من تقدم بقوله: {فَبِهُدَاهُمُ اقْتَدِهْ} [الأنعام: 91] ثم أعلمه اللَّه تعالى بكذبهم، وأن الأمر في الحقيقة بخلاف ذلك، وأنزل عليه في كتابه ما يكون الوأد فيه وهو قوله تعالى: {وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنْ سُلَالَةٍ مِنْ طِينٍ (12) ثُمَّ جَعَلْنَاهُ نُطْفَةً فِي قَرَارٍ مَكِينٍ (13) ثُمَّ خَلَقْنَا النُّطْفَةَ عَلَقَةً فَخَلَقْنَا الْعَلَقَةَ مُضْغَةً فَخَلَقْنَا الْمُضْغَةَ عِظَامًا فَكَسَوْنَا الْعِظَامَ لَحْمًا ثُمَّ أَنْشَأْنَاهُ خَلْقًا آخَرَ فَتَبَارَكَ اللَّهُ أَحْسَنُ الْخَالِقِينَ} [المؤمنون: 12 - 14] فأعلمه عز وجل بذلك الوقت الذي يكون المخلوق من النطفة فيه الحياة. فيجوز أن يوأد حينئذ فيكون ميتًا. وأما قبل ذلك فليس بحي، وإنما هي كسائر الأشياء التي لا حياة فيها.
ثم ذكر أثر علي بن أبي طالب فقال:
حدثنا صالح بن عبد الرحمن، قال: حدثنا عبد اللَّه بن يزيد المقرئ قال: حدثت ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن معمر بن أبي حيَية قال: سمعت عبيد اللَّه بن رِفاعة الأنصاري قال: تذاكر أصحابُ النبي صلى الله عليه وسلم عند عمر بن الخطاب رضي الله عنه العزل، فاختلفوا فيه، فقال عمر رضي الله عنه: قد اختلفتم وأنتم أهل بدر الخيار، فكيفَ بالناسِ بعدَكم إذ تناجي رجلان؟ فقال عمر: ما هذه المناجاةُ؟ قال: إنّ اليهودَ تزعم أنها الموءودةُ الصغرى، فقال علي رضي الله عنه:"إنها لا تكون موءودةً حتى تمر بالتارات السَّبع {وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنْ سُلَالَةٍ مِنْ طِينٍ} [المؤمنون: 12] إلى آخر الآية، فعجب عمر من قوله وقال: جزاك اللَّه خيرا.
ولخّص ابن حجر كلام الطحاوي في الفتح (9/ 309) ثم قال: وتعقبه ابن رشد، ثم ابن العربي بأنه لا يجزم بشيء تبعا لليهود، ثم يصرح بتكذيهم فيه. . .
ثم قال:"وقد جمعوا بين تكذيب اليهود في قولهم"الموءودة الصغرى" وبين إثبات كونه"وأدا خفيا" في حديث جدامة بأن قولهم"الموءودة الصغرى" يقتضي أنه وأد ظاهر، لكنه صغير بالنسبة إلى دفن المولود بعد وضعه حيًا. فلا يعارض قوله إن العزل وأد خفي، فإنه يدل على أنه ليس في حكم الظاهر أصلًا. فلا يترتب عليه حكم، وإنما جعله وأدًا من جهة اشتراكها في قطع الولادة".
জুমামা বিনতে ওয়াহব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত ছিলাম, যখন লোকেরা তাঁকে আযল (সহবাসের সময় বীর্য বাইরে নিক্ষেপ করা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলো। তিনি বললেন: "এটা হলো গোপন ভ্রূণহত্যা।"
6225 - عن عائشة، عن جدامة بنت وهب الأسدية، أنها أخبرتها أنها سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لقد هممت أن أنهى عن الغيلة، حتى ذكرتُ أن الروم وفارس يصنعون ذلك، فلا يضر أولادهم".
صحيح: رواه مالك في الرضاع (16) عن محمد بن عبد الرحمن بن نوفل أنه قال: أخبرني عروة بن الزبير، عن عائشة أم المؤمنين، به.
ثم قال مالك: والغيلة أن يمسّ الرجل امرأته وهي ترضع.
ورواه مسلم في النكاح (140: 1442) من طريق مالك، به، مثله.
وقول مالك: أن يمس أي يجامع كما في التنزيل: {وَإِنْ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِنْ قَبْلِ أَنْ تَمَسُّوهُنَّ} [البقرة: 237] قال ابن عباس: المس: الجماع.
জুদামা বিনত ওয়াহব আল-আসাদিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমি প্রায় সংকল্প করেছিলাম যে আমি 'গিলা' (স্তন্যপানরত অবস্থায় স্ত্রীর সাথে সহবাস) করতে নিষেধ করব, কিন্তু আমার স্মরণ হলো যে রোম ও পারস্যের লোকেরা তা করে থাকে এবং এতে তাদের সন্তানদের কোনো ক্ষতি হয় না।"
6226 - عن جدامة بنت وهب أخت عكاشة قالت: حضرت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في أناس وهو يقول:"لقد هممت أن أنهى عن الغيلة، فنظرت في الروم وفارس، فإذا هم يُغيلون أولادهم، فلا يضرّ أولادهم ذلك شيئًا" ثم سألوه عن العزل؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ذلك الوأد الخفي".
زاد في رواية: وهي {وَإِذَا الْمَوْءُودَةُ سُئِلَتْ} [التكوير: 8].
صحيح: رواه مسلم في النكاح (141: 1442) من طريق المقرئ، حدثنا سعيد بن أبي أيوب، حدثني أبو الأسود، عن عروة، عن عائشة، عن جدامة بنت وهب فذكرته.
জুমাদাহ বিন্ত ওয়াহাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি উক্বাশার বোন, থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: আমি একদল লোকের মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত ছিলাম। তিনি তখন বলছিলেন: "আমার ইচ্ছা হয়েছিল যে, আমি 'গিলা' (স্তন্যদানকারী স্ত্রীর সাথে সহবাস) থেকে নিষেধ করি। কিন্তু আমি রোম এবং পারস্যের (মানুষের) দিকে তাকালাম। তারা তাদের সন্তানদের দুগ্ধদানের সময় সহবাস করে, কিন্তু তাতে তাদের সন্তানদের কোনো ক্ষতি হয় না।" এরপর লোকেরা তাঁকে 'আযল' (Coitus Interruptus) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওটা হলো গোপন জীবন্ত কবর দেওয়া (আল-ওয়া'দ আল-খাফী)।" অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত যোগ করা হয়েছে: আর তা (আযল) হলো, আল্লাহ্র বাণী: {আর যখন জীবন্ত প্রোথিত কন্যাকে জিজ্ঞেস করা হবে} (সূরা আত-তাকভীর: ৮)।
6227 - عن عبد اللَّه بن عباس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سئل عن الغيل فقال:"لو كان ضارًا أحدًا ضر فارس والروم".
صحيح: رواه البزار - كشف الأستار (1454) عن محمد بن أبي غالب، ثنا صفوان بن صالح، ثنا عيسى بن يونس، ثنا ابن جريج، عن عطاء، عن عبد اللَّه بن عباس فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 298):"بأن رجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال، وابنُ جريج مدلس وقد عنعن إلا أن عنعنته عن عطاء بن أبي رباح محمول على السماع منه لكثرة ملازمته.
وفي الباب ما رُوي عن أسماء بنت يزيد بن السكن، وكانت مولاته أنها سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تقتلوا أولادكم سرا، فوالذي نفسي بيده إن الغيل ليدرك الفارس على ظهر فرسه حتى يصرعه".
رواه أبو داود (3881) وابن ماجه (2021) وأحمد (27562) وصحّحه ابن حبان (5984) كلهم من حديث المهاجر بن أبي مسلم يحدث عن أسماء بنت يزيد فذكرته.
واللفظ لابن ماجه ولفظ أبي داود وابن حبان:"لا تقتلوا أولادكم سرا، فإن الغيل يدرك الفارس فيدعثره عن فرسه".
وفي الإسناد المهاجر بن أبي مسلم، لم يونقه غير ابن حبان ولذا قال الحافظ في القريب"مقبول" أي حيث يتابع، ولم يتابع فهو ليّن الحديث.
ثم في متنه نكارة لما صح من جواز الغيل في الحديث السابق، كما أنه يخالف المحسوس إلا في حالات خاصة.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ‘গাইল’ (দুগ্ধপান করানোর সময় সহবাস বা গর্ভধারণ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: “যদি এটি কারো ক্ষতি করত, তবে তা পারস্য ও রোমানদের ক্ষতি করত।”
