আল-জামি` আল-কামিল
6228 - عن عطاء قال: حضرنا مع ابن عباس جنازة ميمونة بسَرِف، فقال ابن عباس: هذه زوجة النبي صلى الله عليه وسلم، فإذا رفعتم نعشَها فلا تُزعزعوها، ولا تزلزلوها، وارفقوا، فإنه
كان عند النبي صلى الله عليه وسلم تسع، كان يقسم لثمان ولا يقسم لواحدة.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5067) من طريق هشام بن يوسف، ومسلم في الرضاع (1465: 51) من طريق محمد بن بكر - كلاهما عن ابن جريج قال: أخبرني عطاء، فذكره.
وزاد مسلم: قال عطاء: التي لا يقسم لها صفية بنت حييّ بن أخطب.
وقول عطاء: التي لا يقسم لها صفية. وهم، وإنما الصواب: سودة بنت زمعة، فإنها وهبت يومها لعائشة، كما سيأتي.
وأما ما رُوي في قصة صفية بنت حُيي فهو ضعيف.
وهي أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وجد على صفية في شيء. فقالت صفية: يا عائشة، هل لك أن تُرضي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ولك يومي، قالت: نعم. فأخذت خمارًا لها مصبوغا بزعفران، فرشّته بالماء ليفوح ريحُه. ثم قعدتُ إلى جنْب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا عائشة، إليك عنّي، إنه لي يومك" فقالت: ذلك فضل اللَّه يؤتيه من يشاء. فأخبرته بالأمر فرضيّ عنها.
رواه ابن ماجه (1973) وأحمد (24640) كلاهما من حديث عفان، حدثنا حماد بن سلمة، قال: أخبرنا ثابت عن شمة، عن عائشة فذكرته.
وإسناده ضعيف من أجل سمية فإنها مجهولة. لم يرو عنها إلا ثابت، وقد سميت أيضًا شُمية كما عند أحمد (25002) ويظهر من هذا أن اسمها لم يُضبط لعدم شُهرتها.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আতা (রহ.) বলেন: আমরা সারীফ নামক স্থানে মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাযায় ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে উপস্থিত হলাম। তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইনি হলেন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী। তোমরা যখন তাঁর খাটিয়া উঠাবে, তখন এটিকে ঝাঁকি দেবে না এবং নাড়াবেও না; বরং নম্রতা অবলম্বন করবে। কারণ, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মোট নয় জন স্ত্রী ছিলেন, তিনি আট জনের জন্য পালা বণ্টন করতেন, কিন্তু এক জনের জন্য পালা বণ্টন করতেন না।
6229 - عن أنس بن مالك قال: إن نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يطوف على نسائه في الليلة الواحدة، وله يومئذ تسعُ نسوة.
وفي رواية: كان النبي صلى الله عليه وسلم يدور على نسائه في الساعة الواحدة من الليل والنهار وهن إحدى عشرة. قالتُ: قل لأنس: أو كان يطيقه؟ قال: كنا نتحدث أنه أُعطي قوة ثلاثين".
صحيح: رواه البخاري في النكاح (5215) عن عبد الأعلى بن حماد، حدثنا يزيد بن زريع، حدثنا سعيد، عن قتادة، أن أنس بن مالك حدّثهم، فذكره.
والرواية الأخرى في الغسل (268) عن محمد بن بشار، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أبي وهو هشام الدستوائي، عن قتادة، قال: حدثنا أنس بن مالك قال: فذكره.
ثم أشار البخاري عقبه إلى الرواية السابقة بقوله: وقال سعيد عن قتادة إن أنسًا حدّثهم: تسع نسوة.
وقد جمع الحافظ ابن حجر بين الروايتين بحمل رواية هشام على أنه ضم مارية وريحانة إليهن، وأطلق عليهن لفظ"نسائه" تغليبًا. انظر فتح الباري (1/ 378).
(تنبيه) ذكر الروايتين الحميدي في أفراد البخاري في كتابه"الجمع بين الصحيحين" (2040) ثم قال: وأخرج مسلم طرقًا من هذا من حديث هشام بن زيد بن أنس، عن أنس:"أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يطوف على نسائه بغُسل واحد". قلت: رواه مسلم في الحيض (309).
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাতের মধ্যে তাঁর সকল স্ত্রীর কাছে গমন করতেন, আর তখন তাঁর নয় জন স্ত্রী ছিলেন।
অন্য এক বর্ণনায়: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিন বা রাতের এক ঘণ্টার মধ্যে তাঁর স্ত্রীদের কাছে গমন করতেন, আর তাঁরা ছিলেন এগারো জন। (বর্ণনাকারী) বললেন: আনাসকে জিজ্ঞেস করুন, তাঁর কি সেই সামর্থ্য ছিল? তিনি বললেন: আমরা আলোচনা করতাম যে তাঁকে ত্রিশ জনের শক্তি দেওয়া হয়েছিল।
6230 - عن أنس قال: كان للنبي صلى الله عليه وسلم تسع نسوة، فكان إذا قسم بينهن لا ينتهي إلى المرأة الأولى إلا في تسع، فكن يجتمعن كل ليلة في بيت التي يأتيها، فكان في بيت عائشة، فجاءت زينب فمدّ يده إليها. فقالت: هذه زينب فكفّ النبي صلى الله عليه وسلم يده، فتقاولتا حتى اسْتخبتا، وأقيمت الصلاة، فمرّ أبو بكر على ذلك، فسمع أصواتهما، فقال: اخرج يا رسول اللَّه، إلى الصلاة، واحْثُ في أفواههن التراب. فخرج النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت عائشة: الآن يقضي النبي صلى الله عليه وسلم صلاته، فيجيء أبو بكر فيفعل بي ويفعل، فلما قضى النبي صلاته أتاها أبو بكر، فقال لها قولًا شديدًا، وقال: أتصنعين هذا؟
صحيح: رواه مسلم في الرضاع (1462) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا شبابة بن سوّار، حدثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس، فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নয়জন স্ত্রী ছিলেন। যখন তিনি তাদের মধ্যে (রাত্রি) বণ্টন করতেন, তখন প্রথম স্ত্রীর কাছে ফিরতে নয় দিন লেগে যেত। তারা প্রত্যেকেই সেই রাতে তাঁর কাছে আসতেন যার পালা থাকত। একবার তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে ছিলেন। এমতাবস্থায় যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দিকে হাত বাড়ালেন। (আয়েশা) বললেন, ইনি তো যায়নাব! তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর হাত গুটিয়ে নিলেন। অতঃপর তারা দু’জন উচ্চৈঃস্বরে কথা কাটাকাটি করতে লাগলেন, এমনকি শোরগোল সৃষ্টি হলো। এমন সময় সালাতের জন্য ইকামত দেওয়া হলো। আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন সে পথ দিয়ে যাচ্ছিলেন এবং তাদের দুজনের কণ্ঠস্বর শুনতে পেলেন। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), সালাতের জন্য বের হোন এবং তাদের মুখে মাটি নিক্ষেপ করুন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বেরিয়ে গেলেন। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সালাত শেষ করবেন, আর আবু বকর এসে আমার সাথে এই এই করবেন। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সালাত শেষ করলেন, আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে এলেন এবং তাঁকে কঠোর কথা বললেন, আর জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কি এমন করেছ?
6231 - عن عائشة قالت: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا أراد سفرًا أقرع بين نسائه، فأيتهنّ خرج سهمُها خرج بها معه، وكان يقسم لكل امرأة منهنّ يومَها وليلتها، غير أن سودة بنت زمعة وهبَتْ يومها وليلتها لعائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم تبتغي بذلك رضا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البخاري في الهبة (2593) عن حِبّان بن موسى، أخبرنا عبد اللَّه، أخبرنا يونس، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة، قالت: فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো সফরে যাওয়ার ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে (কার সাথে যাবেন তা নির্ধারণের জন্য) লটারি করতেন। যার নাম লটারিতে উঠতো, তিনি তাকে সাথে নিয়ে সফরে যেতেন। তিনি তাদের প্রত্যেকের জন্য দিন ও রাত বণ্টন করে দিতেন। তবে সাওদাহ বিনতে যামআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিজের দিন ও রাত আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দান করে দিয়েছিলেন। তিনি এর দ্বারা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সন্তুষ্টি কামনা করতেন।
6232 - عن عائشة قالت: ما رأيت امرأة أحب إليّ أن أكون في مِسْلاخها من سودة بنت زمعة من امرأة فيها حدّة، قالت: فلمّا كبرت جعلتْ يومها من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لعائشة، قالت: يا رسول اللَّه، قد جعلت يومي منك لعائشة، فكان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقسم لعائشة يومين: يومَها، ويوم سودة".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5212)، ومسلم في الرضاع (47: 1463) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته، واللفظ لمسلم.
قولها: في"مسلاخها" أي في جلدها، والمعنى أن أكون أنا هي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাওদা বিনতে যাম‘আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত অন্য কোনো নারীকে আমি দেখিনি যার চরিত্রে (বা অবস্থানে) আমি থাকতে চাইতাম। যদিও তাঁর মধ্যে কিছুটা তেজস্বীতা ছিল। তিনি (আয়িশা) বলেন: যখন সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বৃদ্ধা হলেন, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তাঁর নির্ধারিত দিনটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দিয়ে দিলেন। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনার কাছে আমার যে দিনটি বরাদ্দ, তা আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য দিয়ে দিলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য দুই দিন ভাগ করে দিতেন: তাঁর নিজের দিন এবং সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিন।
6233 - عن معاذة، عن عائشة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يستأذن في يوم المرأة منا، بعد أن أنزلت هذه الآية {تُرْجِي مَنْ تَشَاءُ مِنْهُنَّ وَتُؤْوِي إِلَيْكَ مَنْ تَشَاءُ وَمَنِ ابْتَغَيْتَ مِمَّنْ عَزَلْتَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكَ} [الأحزاب: 51] فقلت لها: ما كنت تقولين؟ قالت: كنت أقول له: إن كان ذلك إلى فإني لا أريد يا رسول اللَّه، أن أوثر عليك أحدًا.
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4789) ومسلم في الطلاق (1476) كلاهما من حديث عاصم الأحول، عن معاذة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই আয়াতটি নাযিল হয়: "আপনি তাদের মধ্যে যাকে ইচ্ছা দূরে সরিয়ে রাখতে পারেন এবং যাকে ইচ্ছা নিজের কাছে স্থান দিতে পারেন। আর আপনি যাকে দূরে সরিয়ে রেখেছিলেন, তাকে যদি আবার চান, তবে তাতে আপনার কোনো পাপ নেই।" [সূরা আল-আহযাব: ৫১], তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের স্ত্রীদের যার দিন আসত, তার কাছে (যাওয়ার জন্য) অনুমতি চাইতেন। তখন আমি (মু'আযাহ) তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, আপনি (নবীকে) কী বলতেন? তিনি বললেন, আমি তাঁকে বলতাম: "হে আল্লাহর রাসূল! যদি এটি আমার ইচ্ছাধীন হয়, তবে আমি আপনার ওপর কাউকে অগ্রাধিকার দিতে চাই না।"
6234 - عن عائشة قالت: يا ابن أختي، كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يُفضّل بعضنا على بعض في القسم، من مكثه عندنا، وكان قلّ يوم إلا وهو يطوف علينا جميعًا، فيدنو من كل امرأة من غير مَسيس حتى يبلغ إلى التي هو يومُها فيبيت عندها. ولقد قالت سودة بنت زمعة حين أسنّت، وفَرقت أن يفارقها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: يا رسول اللَّه، يومي لعائشة، فقبل ذلك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم منها. قالت: نقول في ذلك: أنزل اللَّه عز وجل وفي أشباهها أُراه قال: {وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِنْ بَعْلِهَا نُشُوزًا} [النساء: 128].
حسن: رواه أبو داود (2135) ومن طريقه البيهقي (7/ 47) والحاكم (2/ 186) كلاهما من طريق أحمد بن يونس، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن هشام بن عروة، عن أبيه قال: قالت عائشة فذكرته. قال الحاكم: صحيح الإسناد.
قلت: إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزناد فإنه حسن الحديث، وحسنه أيضًا ابن حجر في الإصابة (13/ 506).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, "হে আমার বোনের ছেলে! আমাদের মাঝে (রাত্রিযাপনের) পালা বণ্টনের ক্ষেত্রে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের একজনকে অন্যজনের উপর প্রাধান্য দিতেন, তাঁর আমাদের কাছে অবস্থানের কারণে। এমন দিন খুব কমই যেত যেদিন তিনি আমাদের সকলের কাছে একবার চক্কর দিতেন না। তিনি সকল স্ত্রীর কাছে যেতেন এবং সহবাস ব্যতিরেকে প্রত্যেকের নিকটবর্তী হতেন, যতক্ষণ না তিনি তার পালাভুক্ত স্ত্রীর কাছে পৌঁছাতেন এবং তার কাছে রাত্রিযাপন করতেন। সাওদা বিনতে যামআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন বার্ধক্যে উপনীত হলেন এবং ভয় পেলেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হয়তো তাঁকে বিচ্ছিন্ন করে দেবেন, তখন তিনি বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমার পালাটি আয়িশার জন্য।' রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর থেকে তা গ্রহণ করলেন।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা বলতাম যে, এই ঘটনা প্রসঙ্গে এবং এর অনুরূপ (অন্যান্য ঘটনা প্রসঙ্গে), আমি মনে করি তিনি বলেছিলেন, আল্লাহ তাআলা নাযিল করেছেন: {আর যদি কোনো নারী তার স্বামীর পক্ষ থেকে কোনো ধরনের দুর্ব্যবহার বা উপেক্ষার ভয় করে...} (সূরা নিসা: ১২৮)।
6235 - عن ابن عباس قال: توفي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وعنده تسعُ نسوة يُصيبهن إلا سودة فإنها وهبت يومَها وليلتها لعائشة.
صحيح: رواه النسائي (3197) عن إبراهيم بن يعقوب، قال: ثنا ابن أبي مريم، قال: أخبرنا سفيان قال: حدثني عمرو بن دينار، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, তখন তাঁর কাছে নয়জন স্ত্রী ছিলেন, তিনি (নিয়মিত) তাদের সাথে পালাক্রমে থাকতেন। তবে সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত। কেননা তিনি তাঁর দিন ও রাত আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দান করে দিয়েছিলেন।
6236 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من كانت له امرأتان يميل مع إحداهما على الأخرى، جاء يوم القيامة وأحد شقيه ساقط".
صحيح: رواه أبو داود (2133) والترمذي (1141) والنسائي (3942) وابن ماجه (1969) وابن الجارود (722) وصحّحه ابن حبان (4207) والحاكم (2/ 186) كلهم من حديث همام بن يحيى، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نَهيك، عن أبي هريرة فذكره.
قال الترمذي: إنما أسند هذا الحديث همام بن يحيى، عن قتادة. ورواه هشام الدستوائي عن قتادة قال:"كان يقال: لا نعرف هذا الحديث مرفوعا إلا من حديث همام، وهمام ثقة حافظ". أي أن زيادته مقبولة.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: تفرد همام بن يحيى لا يضر فإنه ثقة حافظ كما قال الترمذي. وقال ابن عدي: أحاديثه مستقيمة، ولذا صحّحه جمعٌ من الأئمة منهم من ذُكروا، ومنهم: ابن دقيق العيد، وعبد الحق الأشبيلي، وغيرهم.
وفي الباب رُوي أيضًا عن أنس بن مالك إلا أنه لا يصح.
قوله:"يميل مع إحداهما على الأخرى" يعني في الحقوق في العشرة، من الأكل والشرب والملبس دون ميل القلب، فإن القلوب لا تملك، لأن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُسوي في القسم بين نسائه ويقول:"اللَّهم هذا قسمي فيما أملك، فلا تؤاخذني فيما لا أملك إلا أن الصحيح أنه مرسل كما في الآتي:
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার দু'জন স্ত্রী আছে, আর সে তাদের একজনের প্রতি অন্যজনের তুলনায় বেশি ঝুঁকে পড়ে (পক্ষপাতিত্ব করে), সে কিয়ামতের দিন এমন অবস্থায় উপস্থিত হবে যে, তার শরীরের এক পাশ ঝুলে পড়বে।"
6237 - عن عائشة قالت: {وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِنْ بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًا} [النساء: 128] قالت: هي المرأة تكون عند رجل لا يستكثر منها، فيريد طلاقها، ويتزوج غيرها تقول له: أمسكني ولا تطلقني، ثم تزوج غيري فأنت في حل من النفقة عليّ والقسمة لي، فذلك قوله تعالى: {فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا وَالصُّلْحُ خَيْرٌ} [النساء: 128].
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5206) عن ابن سلام، أخبرنا أبو معاوية، عن هشام، عن
أبيه، عن عائشة فذكرته. ورواه مسلم في التفسير (3021) من وجهين آخرين عن هشام مختصرًا.
আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহ তাআলার বাণী— {وَإِنِ امْرَأَةٌ خَافَتْ مِنْ بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًا} [সূরা আন-নিসা: ১২৮] (আর যদি কোনো স্ত্রী তার স্বামীর পক্ষ থেকে দুর্ব্যবহার বা উপেক্ষা করার আশংকা করে)— সম্পর্কে বলেন: এই আয়াত এমন স্ত্রী সম্পর্কে, যে কোনো পুরুষের বিবাহে আছে, কিন্তু সে পুরুষ তাকে যথেষ্ট মনে করে না (বা তার প্রতি সন্তুষ্ট নয়), তাই সে তাকে তালাক দিতে এবং অন্য নারীকে বিয়ে করতে চায়। তখন স্ত্রী তাকে বলে: আমাকে আপনার বিবাহবন্ধনে ধরে রাখুন (তালাক দেবেন না) এবং অন্য কাউকে বিয়ে করুন। আমার জন্য আপনার পক্ষ থেকে ভরণ-পোষণ (নাফাকা) দেওয়া এবং আমার জন্য রাতে থাকার (সমান অধিকার বা কিসমাতের) ক্ষেত্রে আপনাকে ছাড় দেওয়া হলো। আল্লাহ তাআলার বাণী— {فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا وَالصُّلْحُ خَيْرٌ} [সূরা আন-নিসা: ১২৮] (তবে তাদের উভয়ের জন্য কোনো দোষ নেই যে, তারা নিজেদের মধ্যে কোনো প্রকার আপোস-নিষ্পত্তি করে নেবে এবং আপোস-নিষ্পত্তিই উত্তম)— এর এটাই অর্থ।
6238 - عن ابن عباس قال: خشيت سودة أن يُطلِّقها النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: لا تُطلقني، وأمسِكني، واجعلْ يومي لعائشة. ففعل. فنزلت: {فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا أَنْ يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا وَالصُّلْحُ خَيْرٌ} [النساء: 128].
حسن: رواه الترمذي (3040) حدثنا محمد بن المثنى، حدثنا أبو داود الطيالسي، حدثنا سليمان بن معاذ، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. والحديث في مسند أبي داود (2805) ومن طريقه أخرجه أيضًا البيهقي (7/ 297).
قال الترمذي:"حسن صحيح غريب".
قلت: فيه سليمان بن معاذ وهو سليمان بن قرم بن معاذ الضبي، وقد نسبه أبو داود إلى جده، ثم هو مختلف فيه. فقال عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل: كان أبي يتتبع حديث قطبة بن عبد العزيز، وسليمان بن قرم، ويزيد بن عبد العزيز بن سياه وقال: هؤلاء قوم ثقات، وهم أتم حديثا من سفيان وشعبة، وهم أصحاب كتب، وإن كان سفيان وشعبة أحفظ منهم.
وقال محمد بن عوف عن أحمد: لا أرى به بأسًا لكنه كان يُفْرط في التشيع. وقال ابن عدي: له أحاديث حسان أفراد، وهو خير من سليمان بن أرقم بكثير. ولكنه ضعّفه ابن معين وأبو زرعة والنسائي. والخلاصة أنه يحسن حديثه إذا لم يخالفه.
وفيه شيخه سماك، وفي حديثه عن عكرمة اضطراب إلا أنه لم يضطرب في هذا الحديث لشهرته، ولكثرة شواهده، ولذا حسّنه الترمذي وصحّحه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আশঙ্কা করলেন যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হয়তো তাকে তালাক দিয়ে দেবেন। তখন তিনি বললেন: আপনি আমাকে তালাক দেবেন না, বরং আমাকে আপনার স্ত্রী হিসেবে রাখুন এবং আমার পালা (আমার সাথে রাত কাটানোর দিনটি) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দিয়ে দিন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাই করলেন। তখন এই আয়াত নাযিল হলো: {সুতরাং তাদের উভয়ের জন্য কোনো দোষ নেই যে, তারা আপোষে কোনো মীমাংসা করে নেয়। আর মীমাংসাই হচ্ছে উত্তম।} [সূরা নিসা: ১২৮]।
6239 - عن ابن عباس، عن عمر أنه دخل على حفصة، فقال: يا بُنية، لا يُغرّنك هذه التي أعجبها حُسنُها حبُّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إياها -يريد عائشة- فقصصت على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فتبسم.
متفق عليه: أخرجه البخاري في النكاح (5218) عن عبد العزيز بن عبد اللَّه، حدثنا سليمان، عن يحيى، عن عُبيد بن حُنين، سمع ابن عباس، فذكره.
وأخرجه مسلم في الطلاق (1479/ 31) من وجه آخر عن سليمان بن بلال بإسناده مطولا.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলেন এবং বললেন: হে আমার মেয়ে! ঐ মহিলা যেন তোমাকে প্রতারিত না করে, যার সৌন্দর্য তাকে মুগ্ধ করেছে এবং যাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভালোবাসেন। (তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে উদ্দেশ্য করেছিলেন)। অতঃপর আমি (উমর) তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বর্ণনা করলাম। তখন তিনি মুচকি হাসলেন।
6240 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: أرسل أزواج النبي صلى الله عليه وسلم فاطمة بنت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فاستأذنت عليه وهو مضطجع معي في مِرْطي. فأذن لها. فقالت: يا رسول اللَّه، إن أزواجك أرسلنني إليك يسألنك العدل في ابنة أبي قُحافة، وأنا ساكتة قالت: فقال لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أي بنية، ألست تحبين ما أحب؟"
فقالت: بلى، قال:"فأحبي هذه" قالت: فقامت فاطمة حين سمعت ذلك من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فرجعت إلى أزواج النبي صلى الله عليه وسلم فأخبرتهن بالذي قالت، وبالذي قال لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فقلت لها: ما نراك أغنيتِ عنا من شيء. فارجعي إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقولي له: إن أزواجك ينشدنك العدل في ابنة أبي قُحافة. فقالت فاطمة: واللَّه، لا أكلمه فيها أبدا. قالت عائشة: فأرسل أزواج النبي صلى الله عليه وسلم زينب بنت جحش، زوج النبي صلى الله عليه وسلم وهي التي كانت تُساميني منهن في المنزلة عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. ولم أر امرأة قط خيرا في الدين من زينب، وأتقى للَّه، وأصدقَ حديثا، وأوصلَ للرحم، وأعظمَ صدقة، وأشدَّ ابتذالا لنفسها في العمل الذي تصدق به، وتقرب به إلى اللَّه تعالى، ما عدا سورةً من حدَّةٍ كانت فيها تُسرع منها الفَيْئة. قالت: فاستأذنت على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ورسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مع عائشة في مِرطها، على الحالة التي دخلت فاطمة عليها وهو بها. فأذن لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول اللَّه، إن أزواجك أرسلْنَني إليك يسألنك العدل في ابنة أبي قُحافة. قالت ثم وقعت بي، فاستطالتْ علي، وأنا أرقب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وأرقب طرفه، هل يأذن لي فيها. قالت: فلم تبرحْ زينب حتى عرفتُ أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لا يكره أن أنتصر. قالت: فلما وقعتُ بها لم أنشبها حين أنحيتُ عليها قالت: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: وتبسم:"إنها ابنة أبي بكر".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2442) من طريق يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثني أبي، عن صالح، عن ابن شهاب، أخبرني محمد بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن عائشة، فذكرته. وصالح هو: ابن كيسان.
وكذلك رواه مسلم أيضًا من حديث يونس، كلاهما عن الزهري موصولا. إلا أن البخاري يُعِلّه بانقطاع في الحديث الآتي:
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতেমা বিনত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পাঠালেন। অতঃপর তিনি (ফাতেমা) অনুমতি চাইলেন। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার গায়ের চাদরের ভেতরে আমার সাথে শুয়ে ছিলেন। তিনি তাঁকে অনুমতি দিলেন। ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আপনার স্ত্রীগণ আমাকে আপনার কাছে পাঠিয়েছেন। তাঁরা আপনার কাছে আবু কুহাফার কন্যার (অর্থাৎ আয়িশার) ব্যাপারে ইনসাফ (ন্যায়বিচার) প্রার্থনা করছেন।’ (আয়িশা বললেন,) তখন আমি নীরব ছিলাম।
তিনি (আয়িশা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতেমাকে বললেন, "হে আমার প্রিয় কন্যা! আমি যা ভালোবাসি, তুমি কি তা ভালোবাসো না?" ফাতেমা বললেন, 'হ্যাঁ, অবশ্যই।' তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাহলে তুমিও এই (আয়িশা)-কে ভালোবাসো।"
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এই কথা শুনে ফাতেমা উঠে গেলেন। অতঃপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের কাছে ফিরে গেলেন এবং তাঁকে যা বলা হয়েছিল ও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে যা বলেছিলেন, সবই জানালেন।
আমি (আয়িশা) তাঁকে বললাম, 'আমরা দেখছি তুমি আমাদের জন্য কিছুই করে আসতে পারোনি। তুমি আবার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে যাও এবং তাঁকে বলো: আপনার স্ত্রীগণ আপনার কাছে আবু কুহাফার কন্যার ব্যাপারে ন্যায়বিচার কামনা করছেন।' ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'আল্লাহর কসম! আমি এ বিষয়ে তাঁর সাথে আর কখনো কথা বলব না।'
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী যয়নব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন। স্ত্রীদের মধ্যে তাঁর মর্যাদার দিক থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তিনি ছিলেন আমার প্রতিদ্বন্দ্বী। আমি যয়নবের চেয়ে দ্বীনের দিক থেকে উত্তম, আল্লাহকে অধিক ভয়কারিণী, কথায় অধিক সত্যবাদিনী, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষাকারিণী, সর্বাধিক দানশীলা এবং যে কাজ দিয়ে তিনি সাদকা করতেন ও আল্লাহ তা'আলার নৈকট্য অর্জন করতেন তাতে নিজেকে অধিক নিয়োজিতকারিণী আর কোনো নারী দেখিনি—তাঁর স্বভাবের কিছু তীব্রতা ব্যতীত, তবে তিনি দ্রুতই তা থেকে ফিরে আসতেন।
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর তিনি (যয়নব) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তাঁর চাদরের ভেতরেই ছিলেন, ঠিক যে অবস্থায় ফাতেমা প্রবেশ করেছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে অনুমতি দিলেন। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনার স্ত্রীগণ আমাকে আপনার কাছে পাঠিয়েছেন। তাঁরা আপনার কাছে আবু কুহাফার কন্যার (আমার) ব্যাপারে ইনসাফ প্রার্থনা করছেন।
তিনি (আয়িশা) বলেন, এরপর তিনি (যয়নব) আমার উপর আক্রমণাত্মক হলেন এবং আমার বিরুদ্ধে কড়া কথা বললেন। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে তাকিয়ে রইলাম এবং তাঁর চোখের দিকে লক্ষ্য করতে লাগলাম—তিনি কি আমাকে তার জবাব দেওয়ার অনুমতি দেন? তিনি (আয়িশা) বলেন, যয়নব ততক্ষণ পর্যন্ত বিরত হলেন না, যতক্ষণ না আমি বুঝতে পারলাম যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পক্ষ থেকে প্রতিহত করা অপছন্দ করছেন না।
তিনি (আয়িশা) বলেন, যখন আমি তাঁর ওপর পাল্টা আক্রমণ করলাম, তখন আমি তাঁকে চেপে ধরলাম এবং চুপ করিয়ে দিলাম। তিনি (আয়িশা) বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হেসে বললেন, "সে তো আবূ বাকরের মেয়ে!"
6241 - عن عائشة رضي الله عنها: أن نساء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كن حزبين، فحزب فيه عائشة وحفصة وصفية وسودة، والحزب الآخر أم سلمة وسائر نساء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وكان المسلمون قد علموا حُبَّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لعائشة، فإذا كانت عند أحدهم هدية، يريد أن يهديها إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أخرها، حتى إذا كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال في بيت عائشة بعث صاحب الهدية إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في بيت عائشة، فكلم حزب أم سلمة، فقلن لها: كلمي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يكلم الناس، فيقول: من أراد أن يهدي إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم هدية فليهده إليه حيث كان في بيوت نسائه، فكلمته أم سلمة بما قلن، فلم يقل لها شيئًا،
فسألنها، فقالت: ما قال لي شيئًا، فقلن لها: فكلميه، قالت: فكلمته حين دار إليها أيضًا فلم يقل لها شيئًا، فسألنها فقالت: ما قال لي شيئًا، فقلت لها: كلميه حتى يكلمك، فدار إليها فكلمته، فقال لها:"لا تؤذيني في عائشة، فإن الوحي لم يأتني وأنا في ثوب امرأة إلا عائشة". قالت: فقالت: أتوب إلى اللَّه من أذاك يا رسول اللَّه، ثم إنهن دعون فاطمةَ بنت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأرسلت إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم تقول: إن نساءك ينْشدنَك اللَّه العدل في بنت أبي بكر، فكلمته فقال:"يا بنية، ألا تحبين ما أحب؟" قالت: بلى، فرجعت إليهن فأخبرتهن فقلت لها: ارجعي إليه، فأبت أن ترجع، فأرسلن زينب بنت جحش، فأتته فأغلظت، وقالت: إن نساءك ينشدنك اللَّه العدل في بنت ابن أبي قحافة، فرفعت صوتها حتى تناولت عائشة وهي قاعدة فسبتها، حتى إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لينظر إلى عائشة هل تكلم؟ قال: فتكلمت عائشة ترد على زينب حتى أسكتتها، قالت: فنظر النبي صلى الله عليه وسلم إلى عائشة، وقال:"إنها بنت أبي بكر".
صحيح: رواه البخاري في الهبة (2581) عن إسماعيل، قال حدثني أخي، عن سليمان، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
قال البخاري: الكلام الأخير قصة فاطمة يُذكر عن هشام بن عروة، عن رجل، عن الزهري، عن محمد بن عبد الرحمن، وقال أبو مروان، عن هشام، عن عروة: كان الناس يتحرون بهداياهم يوم عائشة. وعن هشام، عن رجل من قريش، ورجل من الموالي، عن الزهري، عن محمد بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، قالت عائشة: كنت عند النبي صلى الله عليه وسلم فاستأذنت فاطمة.
كذا أعله البخاري حديث عائشة في قصة فاطمة، بالانقطاع، وقد صح موصولًا في رواية مسلم السابقة من وجهين.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ দুটি দলে বিভক্ত ছিলেন। এক দলে ছিলেন আয়িশা, হাফসা, সাফিয়্যা ও সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আর অন্য দলে ছিলেন উম্মু সালামাহ এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অন্যান্য স্ত্রীগণ। মুসলমানগণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ভালোবাসার বিষয়টি জানতেন। তাই যখন তাদের কারো কাছে কোনো উপহার থাকত, যা তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিতে চাইতেন, তখন তিনি তা বিলম্বিত করতেন। অতঃপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে থাকতেন, তখন উপহার প্রদানকারী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তা পাঠিয়ে দিত।
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দলটি তখন তাঁকে (উম্মু সালামাহকে) বলল: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলুন, যেন তিনি লোকজনের সাথে কথা বলেন এবং বলেন যে, যে কেউ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উপহার দিতে চায়, সে যেন তাঁর যেকোনো স্ত্রীর ঘরে থাকাবস্থায় তা পাঠায়। উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কথামতো তাঁর সাথে কথা বললেন, কিন্তু তিনি তাঁকে কিছুই বললেন না।
তারা তাঁকে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: তিনি আমাকে কিছুই বলেননি। তখন তারা তাঁকে বললেন: আপনি আবার কথা বলুন। তিনি বলেন: যখন তিনি আমার ঘরে আসলেন, তখন আমি আবার তাঁর সাথে কথা বললাম, তবুও তিনি আমাকে কিছুই বললেন না। তারা তাঁকে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: তিনি আমাকে কিছুই বলেননি। তখন তারা তাঁকে বললেন: আপনি তাঁর সাথে কথা বলতে থাকুন যতক্ষণ না তিনি আপনাকে কিছু বলেন।
অতঃপর যখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (উম্মু সালামাহ) কাছে এলেন, তখন তিনি তাঁর সাথে কথা বললেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: “আয়িশা সম্পর্কে আমাকে কষ্ট দিয়ো না। কেননা, আয়িশা ছাড়া কোনো স্ত্রীর কাপড়ের নিচে (অর্থাৎ বিছানায়) থাকা অবস্থায় আমার কাছে ওয়াহী আসেনি।”
তিনি (উম্মু সালামাহ) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনার কষ্ট দেওয়া থেকে আমি আল্লাহর কাছে তাওবা করছি।
অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডাকলেন এবং তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পাঠালেন। ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনার স্ত্রীগণ আবূ বকরের কন্যার ব্যাপারে আপনার কাছে আল্লাহর ওয়াস্তে ন্যায়বিচার কামনা করছেন। তিনি (ফাতিমা) তাঁর সাথে কথা বললেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হে আমার কন্যা! আমি যা ভালোবাসি, তা কি তুমিও ভালোবাসো না?” তিনি বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই বাসি।
অতঃপর ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে ফিরে এসে ঘটনা জানালেন। তখন তারা তাঁকে বললেন: তাঁর কাছে আবার যাও। কিন্তু তিনি যেতে অস্বীকার করলেন।
তখন তারা যায়নাব বিনত জাহাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন এবং কঠোর ভাষায় কথা বললেন। তিনি বললেন: আপনার স্ত্রীগণ আবূ কুহাফার কন্যার (আবূ বকরের) ব্যাপারে আপনার কাছে আল্লাহর ওয়াস্তে ন্যায়বিচার কামনা করছেন। তিনি (যায়নাব) উচ্চস্বরে কথা বলতে থাকলেন এবং বসে থাকা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লক্ষ্য করে কটূক্তি করলেন ও গালমন্দ করলেন। এমনকি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে তাকাচ্ছিলেন যে, তিনি কি কিছু বলবেন? রাবী বলেন: তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথার জবাব দিতে শুরু করলেন এবং তাঁকে চুপ করিয়ে দিলেন। তিনি (আয়িশা) বলেন: অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে তাকালেন এবং বললেন: “নিশ্চয়ই সে আবূ বকরের কন্যা।”
6242 - عن عائشة قالت: ما علمت حتى دخلتْ عليّ زينب بغير إذن، وهي غضْبى، ثم قالت: يا رسول اللَّه، أحسبك إذا قَلبَتْ لك بُنيّة أبي بكر ذُرَيْعتَيْها ثم أقْبلتْ عليّ. فأعرضتُ عنها. حتى قال النبي صلى الله عليه وسلم:"دونك فانتصري" فأقبلتُ عليها حتى رأيتُها وقد يبس ريقُها في فيها، ما ترُدُّ عليَّ شيئًا، فرأيت النبي صلى الله عليه وسلم يتهلَّلُ وجهه.
حسن: رواه ابن ماجه (1918) والإمام أحمد (24620) والبخاري في الأدب المفرد (558) كلهم من طريق خالد بن سلمة، عن البهي، عن عروة بن الزبير، قال: قالت عائشة فذكرته. واللفظ لهما، واختصره البخاري بقوله:"دونك فانتصري".
وإسناده حسن من أجل البهي وهو عبد الرحمن البهي -بفتح الباء يقال اسم أبيه يسار، والبهي لقب، وثّقه ابن سعد وابن حبان وروى عنه عدد وهو من رجال مسلم.
وقولها:"ذُريْعتيْها" تصغير ذراع.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জানতাম না, এমনকি যায়নাব অনুমতি ছাড়াই আমার কাছে রাগান্বিত অবস্থায় প্রবেশ করল। এরপর সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি কি মনে করব যে আবু বকরের কন্যা আপনার জন্য তার দুটি কচি হাত (দ্বারা ইঙ্গিত করে) ঘুরিয়ে আমার দিকে মনোযোগ দেবে? আমি তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলাম। অবশেষে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি তাকে উপযুক্ত জবাব দাও এবং প্রতিশোধ নাও।" তখন আমি তার দিকে এগিয়ে গেলাম (জবাব দিতে), এমনকি আমি দেখলাম যে তার মুখের লালা শুকিয়ে গেছে, সে আমাকে আর কোনো জবাব দিতে পারছিল না। তখন আমি দেখলাম যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের চেহারা আনন্দে ঝলমল করছে।
6243 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يمكث عند زينب بنت جحش ويشرب عندها عسلا، فتواصيت أنا وحفصة أن أيتنا دخل عليها النبي صلى الله عليه وسلم فلتقل: إني أجد فيك ربح مغافير، أكلت مغافير؟ فدخل على إحداهما، فقالت له ذلك، فقال:"بل شربتُ عسلا عند زينب بنت جحش، ولن أعودَ له" فنزلت: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكَ تَبْتَغِي مَرْضَاتَ أَزْوَاجِكَ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [التحريم: 1] لعائشة وحفصة {وَإِذْ أَسَرَّ النَّبِيُّ إِلَى بَعْضِ أَزْوَاجِهِ} [التحريم: 3] لقوله:"بل شربتُ عسلا".
متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5267)، ومسلم في الطلاق (20: 1474) كلاهما من طريق حجاج بن محمد، عن ابن جريج، قال: زعم عطاء أنه سمع عبيد بن عمير يقول: سمعت عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যয়নাব বিনতে জাহশের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে অবস্থান করতেন এবং তাঁর কাছে মধু পান করতেন। তখন আমি ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পরামর্শ করলাম যে, আমাদের দুজনের মধ্যে যার কাছেই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যাবেন, সে যেন বলে: আমি আপনার কাছে মাগাফীরের (এক প্রকার দুর্গন্ধযুক্ত ফল বা আঠার) গন্ধ পাচ্ছি। আপনি কি মাগাফীর খেয়েছেন? অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের একজনের কাছে গেলেন। সে তাঁকে ঐ কথা বলল। তিনি বললেন: "না, বরং আমি যয়নাব বিনতে জাহশের কাছে মধু পান করেছি এবং আমি আর তা কখনো পান করব না।" তখন এই আয়াত নাযিল হলো: {হে নবী, আল্লাহ আপনার জন্য যা হালাল করেছেন, আপনি আপনার স্ত্রীদের সন্তুষ্টি কামনায় কেন তা হারাম করছেন? আর আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।} [সূরা তাহরীম: ১] (এই আয়াত) আয়িশা ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিষয়ে নাযিল হয়েছিল। আর (এই আয়াতও নাযিল হয়): {এবং যখন নবী তাঁর কোনো এক স্ত্রীকে গোপনে একটি কথা বলেছিলেন} [সূরা তাহরীম: ৩] যা নাযিল হয়েছিল তাঁর এই কথার কারণে: "বরং আমি মধু পান করেছি।"
6244 - عن عائشة قالت: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا خرج، أقرع بين نسائه، فطارت القرعة على عائشة وحفصة، فخرجتا معه جميعًا، وكان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا كان بالليل، سار مع عائشة، يتحدث معها، فقالت حفصة لعائشة: ألا تركبين الليلة بعيري وأركب بعيرك، فتنظرين وأنظر؟ قالت: بلي، فركبت عائشة على بعير حفصة. وركبت حفصة على بعير عائشة. فجاء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى جمل عائشة، وعليه حفصة، فسلّم ثم سار معها حتى نزلوا، فافتقدتْه عائشةُ فغارتْ. فلما نزلوا جعلت تجعل رجلها بين الإذخر، وتقول: يا ربّ، سلط عليّ عقربًا أو حية تلدغني. رسولك ولا أستطيع أن أقول له شيئًا.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5211)، ومسلم في فضائل الصحابة (2445) كلاهما عن أبي نعيم، حدثنا عبد الواحد بن أيمن، حدثني ابن أبي مُليكة، عن القاسم بن محمد، عن عائشة قالت (فذكرته) والسياق لمسلم.
وقولها:"رسولُك" بالرفع على أنه خبر لمبتدأ محذوف تقديره: هو رسولُك، ولا أستطيع أن أقول في حقه شيئًا، وكأنها خُدعت فدعتْ على نفسها لكثرة غيرتها على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ولم تقل في حفصة شيئًا؛ لأنها هي التي أجابتها طائعة فعادتْ على نفسها باللوم.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (কোন সফরে) বের হতেন, তখন তিনি তাঁর স্ত্রীদের মাঝে লটারি করতেন। লটারিতে আয়েশা ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উঠলো। ফলে তাঁরা উভয়ে তাঁর সাথে সফরে বের হলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে পথ চলতেন, তখন তিনি আয়েশার সাথে পথ চলতেন এবং তার সাথে কথা বলতেন। হাফসা আয়েশাকে বললেন: "তুমি কি আজ রাতে আমার উটে চড়বে না আর আমি তোমার উটে চড়ব? ফলে তুমি (আমার উট থেকে) দেখবে এবং আমি (তোমার উট থেকে) দেখব?" তিনি (আয়েশা) বললেন: "হ্যাঁ।" অতঃপর আয়েশা হাফসার উটের পিঠে আরোহণ করলেন এবং হাফসা আয়েশার উটের পিঠে আরোহণ করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়েশার উটের কাছে এলেন—যার উপরে হাফসা ছিলেন। তিনি সালাম দিলেন, অতঃপর তার সাথে পথ চলতে লাগলেন, যতক্ষণ না তাঁরা অবতরণ করলেন। আয়েশা তাঁকে (রাসূলকে) দেখতে না পেয়ে ঈর্ষান্বিত হলেন। যখন তাঁরা অবতরণ করলেন, তখন আয়েশা (তাঁবুতে) 'ইজখির' (নামক ঘাস)-এর মাঝে নিজের পা রাখতে লাগলেন এবং বলতে লাগলেন: "হে আল্লাহ, আমার উপর একটি বিচ্ছু বা সাপ প্রেরণ করো, যা আমাকে দংশন করবে। তিনি তো আপনার রাসূল, আর আমি তাঁকে (এই বিষয়ে) কিছু বলতেও সক্ষম নই।"
6245 - عن عائشة قالت: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يحب العسل والحلواء، وكان إذا أنصرف من العصر دخل على نسائه فيدنو من إحداهن، فدخل على حفصة بنت عمر فاحتبس أكثر ما كان يحتبس فغِرتُ فسألتُ عن ذلك، فقيل: أهدت لها امرأة من قومها عُكّةً
من عسل، فسقت النبي صلى الله عليه وسلم منه شربة، فقلتُ: أما واللَّه لنحتالن له، فقلتُ لسودة بنت زمعة: إنه سيدنو منك فإذا دنا منك فقولي أكلتَ مغافير؟ فإنه سيقول لك: لا، فقولي له: ما هذه الريح التي أجد منك؟ فإنه سيقول لك: سفتي حفصة شربة عسل، فقولي له: جرست نعلة العرفط، وسأقولُ ذلك وقولي أنتِ يا صفية ذاك. قالت: تقول سودة فواللَّه ما هو إلا أن قام على الباب فأردتُ أن أباديه بما أمرتني به فرقا منك، فلما دنا منها قالت له سودة: يا رسول اللَّه، أكلت مغافير؟ قال:"لا". قالت: فما هذه الريح التي أجد منك؟ قال:"سقتني حفصة شربة عسل" فقالت: جرست نعلة العرفط، فلما دار إلي قلت له نحو ذلك، فلما دار إلى صفية قالت له مثل ذلك، فلما دار إلى حفصة قالت: يا رسول اللَّه، ألا أسقيك منه؟ قال:"لا حاجة لي فيه" قالت: تقول سودة واللَّه لقد حرَّمناه، قلت لها: اسكتي.
متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5268) من طريق علي بن مسهر، ومسلم في الطلاق (21: 1474) من طريق أبي أسامة - كلاهما عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
وقولها:"جرستْ": أي أكلتْ.
وقع الخلاف بين سياق الحديثين. ففي الحديث الأول أن النبي صلى الله عليه وسلم شرب العسل عند زينب بنت جحش، وأن المتظاهرتين عليه عائشة وحفصة وهو الصحيح. وكذلك ثبت في حديث عمر بن الخطاب وابن عباس.
وفي الحديث الثاني أن النبي صلى الله عليه وسلم شرب العسل عند حفصة، وإن عائشة وسودة وصفية من اللواتي تظاهرن عليه. والأول أصح، رجّحه القاضي عياض وغيره. وقال النسائي: إسناد حديث حجاج صحيح جيّد غاية.
وقد انقلبت الأسماء على الراوي في الرواية الأخرى ذكره النووي في شرح مسلم. وأما حمله على التعدد كما قال ابن حجر في الفتح (9/ 379) فهو بعيد.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মধু ও মিষ্টি পছন্দ করতেন। তিনি আসরের (সালাত) পর যখন ফিরতেন, তখন তাঁর স্ত্রীদের কাছে যেতেন এবং তাদের কারো কারো নিকটবর্তী হতেন। তিনি হাফসা বিনতে উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট গেলেন এবং সাধারণত তিনি যত সময় থাকতেন, তার চেয়ে বেশি সময় সেখানে থাকলেন। এতে আমি ঈর্ষান্বিত হলাম এবং এ ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলাম। তখন বলা হলো: তার গোত্রের এক মহিলা তাকে এক পাত্র মধু উপহার দিয়েছিল, তাই সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এক চুমুক পান করিয়েছিল।
আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমরা অবশ্যই এর জন্য একটি ফন্দি করব। আমি সাওদা বিনতে যাম‘আকে বললাম: তিনি তোমার কাছে যাবেন। যখন তিনি তোমার কাছে যাবেন, তখন তুমি বলবে: আপনি কি মাগাফির (এক প্রকার দুর্গন্ধযুক্ত আঠা) খেয়েছেন? তিনি তোমাকে বলবেন: 'না।' তখন তুমি তাকে বলবে: আমি আপনার কাছ থেকে এই কিসের গন্ধ পাচ্ছি? তিনি তোমাকে বলবেন: হাফসা আমাকে এক চুমুক মধু পান করিয়েছে। তখন তুমি তাকে বলবে: (এটি মনে হয়) 'উরফুত্ব গাছের আঠা চেটে খাওয়ার গন্ধ'। আমিও অনুরূপ কথা বলব এবং হে সাফিয়াহ! তুমিও তাই বলো।
সাওদা বলেন: আল্লাহর কসম! তিনি দরজার কাছে দাঁড়াতেই আমি আপনার নির্দেশের কারণে ভয় পেয়ে দ্রুত তাকে সেই কথা বলতে চাইলাম। যখন তিনি তার নিকটবর্তী হলেন, সাওদা তাকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি মাগাফির খেয়েছেন? তিনি বললেন: "না।" তিনি বললেন: তাহলে আমি আপনার কাছ থেকে এই কিসের গন্ধ পাচ্ছি? তিনি বললেন: "হাফসা আমাকে এক চুমুক মধু পান করিয়েছে।" তখন তিনি (সাওদা) বললেন: (এটি মনে হয়) 'উরফুত্ব গাছের আঠা চেটে খাওয়ার গন্ধ'।
এরপর যখন তিনি আমার দিকে ফিরলেন, আমি তাকে অনুরূপ কথা বললাম। তারপর তিনি যখন সাফিয়াহর দিকে গেলেন, তিনিও তাকে অনুরূপ কথা বললেন। এরপর যখন তিনি হাফসার দিকে গেলেন, তিনি (হাফসা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি আপনাকে তা (মধু) পান করাব না? তিনি বললেন: "এতে আমার কোনো প্রয়োজন নেই।" সাওদা বললেন, আল্লাহর কসম! আমরা তাঁকে তা থেকে বঞ্চিত করলাম। আমি তাকে বললাম: চুপ করো।
6246 - عن عائشة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خرج من عندها ليلا قالت: فغرتُ عليه فجاء فرأى ما أصنع فقال:"مالكِ؟ يا عائشة؟ أغرتِ؟" فقلت: وما لي لا يُغار مثلي على مثلك؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أقد جاءك شيطانكِ؟" قالت: يا رسول اللَّه، أو معي شيطان؟ قال:"نعم" قلت: ومع كل إنسان؟ قال:"نعم". قلت: ومعك يا رسول اللَّه؟ قال:"نعم، ولكن ربي أعانني عليه حتى أسلم".
صحيح: رواه مسلم في صفة القيامة والجنة والنار (2815) عن هارون بن سعيد الأيلي، حدثنا ابن وهب، أخبرني أبو صخر، عن ابن قسيط، حدثه أن عروة، حدثه أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم-
حدثته فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে তাঁর কাছ থেকে বের হলেন। তিনি (আয়িশা) বললেন: তখন আমার তাঁর প্রতি ঈর্ষা হলো। এরপর তিনি ফিরে এলেন এবং আমি যা করছিলাম তা দেখে বললেন: "আয়িশা! তোমার কী হয়েছে? তুমি কি ঈর্ষান্বিত হয়েছ?" আমি বললাম: আমার মতো কেউ আপনার মতো ব্যক্তিত্বের ওপর কেন ঈর্ষান্বিত হবে না? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার কাছে কি তোমার শয়তান এসেছে?" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার সাথেও কি শয়তান আছে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আমি বললাম: আর প্রত্যেক মানুষের সাথেই কি? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আমি বললাম: আর আপনার সাথেও কি, হে আল্লাহর রাসূল? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তবে আমার রব আমাকে তার বিরুদ্ধে সাহায্য করেছেন, ফলে সে ইসলাম গ্রহণ করেছে।"
6247 - عن عائشة قالت: التمستُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأدخلت يدي في شعره. فقال:"قد جاءك شيطانُكِ، فقلتُ: أما لك شيطان؟ قال:"بلى ولكن اللَّه أعانني عليه فأسلم".
صحيح: رواه النسائي (3690) عن قتيبة قال: حدثنا الليث، عن يحيى وهو ابن سعيد الأنصاري، عن عبادة بن الوليد بن عبادة بن الصامت، أن عائشة قالت: فذكرته. وإسناده صحيح.
وقولها:"فأدخلت يدي في شعره" لأعلم هل هي مبلولة بالغسل أو لا؟
وقوله:"جاءك شيطانك" أي أوقع عليك أني قد ذهبت إلى بعض أزواجي في نوبتك وليلتك.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খুঁজছিলাম এবং তাঁর চুলে হাত বুলালাম। তিনি বললেন: "তোমার শয়তান তোমার কাছে এসেছে।" আমি বললাম: আপনার কি কোনো শয়তান নেই? তিনি বললেন: "আছে। কিন্তু আল্লাহ আমাকে তার উপর সাহায্য করেছেন, ফলে সে ইসলাম গ্রহণ করেছে।"
