আল-জামি` আল-কামিল
6261 - عن عبد الله بن زمعة أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يخطب وذكر الناقة، والذي عَقَر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم {إِذِ انْبَعَثَ أَشْقَاهَا} [الشمس: 12] انبعث لها رجل عزيز عارم منيع في رهطه، مثل أبي زمعة، وذكر النساء فقال:"يعمد أحدكم يجلد امرأته جلد العبيد، فلعله يُضاجعها من آخر يومه" ثم وعظهم في ضحكهم من الضرطة وقال:"لم يضحك أحدكم مما يفعل".
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4942) ومسلم في كتاب الجنة (2855) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن عبد الله بن زمعة فذكره. واللفظ للبخاري، وفي لفظ مسلم:"إلام يجلد أحدكم امرأته؟" وفي رواية:"جلد الأمة".
وأبو زمعة: هو الأسود بن المطلب بن أسد، مات على الكفر، وابنه زمعة قتل يوم بدر، وعبد الله بن زمعة هو ولده.
আব্দুল্লাহ ইবনে যামআহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে খুতবা দিতে শুনেছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উটনী এবং যে তাকে আঘাত করেছিল (হত্যা করেছিল), তার কথা উল্লেখ করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “{যখন তাদের মধ্যে সবচেয়ে হতভাগ্য ব্যক্তি (তাকে হত্যা করতে) তৎপর হলো} [সূরা আশ-শামস: ১২]— এর জন্য একজন শক্তিশালী, উদ্ধত এবং নিজ গোত্রের মধ্যে ক্ষমতাধর ব্যক্তি তৎপর হয়েছিল, যেমন আবু যামআহ ছিল।
তিনি নারীদের কথা উল্লেখ করে বললেন: "তোমাদের কেউ কেউ তার স্ত্রীকে ক্রীতদাসের মতো প্রহার করে, অথচ দিনের শেষে সে হয়তো তার সাথে একই বিছানায় শয়ন করে (সহবাস করে)।”
এরপর তিনি তাদের উপদেশ দিলেন তাদের পায়ু নির্গত বায়ু নিয়ে হাসি-তামাশা করা প্রসঙ্গে। তিনি বললেন: "তোমাদের কেউ কেউ এমন কাজ (নিজেও) করে, তাহলে সে (অন্যেরটা দেখে) হাসে কেন?"
6262 - عن عائشة قالت: ما ضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم شيئا قط بيده، ولا امرأة، ولا خادما، إلا أن يجاهد في سبيل الله، وما نيل منه شيء قط، فينتقم من صاحبه، إلا أن يُنتهك شيء من محارم الله عز وجل، فينتقم الله عز وجل.
صحيح: رواه مسلم في كتاب الرؤيا (2328) عن أبي كريب، حدثنا أبو أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও তাঁর নিজ হাতে কাউকে বা কোনো কিছুকে আঘাত করেননি—না কোনো নারীকে, না কোনো খাদেমকে—তবে আল্লাহর পথে জিহাদ করা ভিন্ন। আর তাঁর ওপর কখনও কোনো আঘাত আসেনি (ক্ষতি করা হয়নি), যার কারণে তিনি সেই ব্যক্তির ওপর প্রতিশোধ গ্রহণ করেন, তবে যদি আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কোনো নিষিদ্ধ বিষয় (সীমা) লংঘিত হতো, তখন তিনি আল্লাহর জন্য প্রতিশোধ নিতেন।
6263 - عن إياس بن أبي ذُباب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم"لا تضربوا إماء الله، قال: فذَئِرَ النساءُ، وساءت أخلاقُهن على أزواجهن، فقال عمر بن الخطاب: ذئر النساء،
وساءت أخلاقهن على أزواجهن منذ نهيتَ عن ضربهن، فقال النبي"فاضربوا" فضرب الناس نساءهم تلك الليلة، فأتي نساء كثير يشتكين الضرب، فقال النبي صلى الله عليه وسلم حين أصبح:"لقد طاف بآل محمد الليلة سبعون امرأة كلهن يشتكين الضرب، وأيم الله لا تجدون أولئك خيارَكم".
صحيح: رواه أبو داود (2145) وابن ماجه (1985) وصححه ابن حبان (4189) والحاكم (2/ 188، 191) والبيهقي (7/ 304) كلهم من حديث سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن عبد الله بن عبد الله بن عمر بن الخطاب، عن إياس بن أبي ذباب فذكره.
واختلف في صحبة إياس بن أبي ذُباب والراجح أن له صحبة، ولذا ترجمه الحافظ في القسم الأول في الإصابة، ونقل عن ابن حبان كلاما متناقضا وهو قوله: يقال له صحبة، ثم أعاده في التابعين وقال: لا يصح عندي أن له صحبة. وكذا نقل عن البخاري أنه قال: لا نعرف له صحبة، ولكن قال ابن أبي حاتم:"مدني له صحبة، سمعت أبي وأبا زرعة يقولان ذلك". فقولهما مقدم لما فيه من زيادة علم.
ইয়াস ইবনে আবী যুবাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমরা আল্লাহর বান্দীদের (নারীদের) প্রহার করো না।" তিনি (ইয়াস) বললেন: এরপর স্ত্রীরা উদ্ধত হয়ে উঠল এবং তাদের স্বামীদের প্রতি তাদের আচরণ খারাপ হয়ে গেল। তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নারীরা উদ্ধত হয়েছে এবং তাদের স্বামীদের প্রতি তাদের আচরণ খারাপ হয়ে গেছে, যেহেতু আপনি তাদের প্রহার করতে নিষেধ করেছেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তোমরা প্রহার করো।" সেই রাতে লোকেরা তাদের স্ত্রীদের প্রহার করল। ফলে বহু নারী প্রহারের অভিযোগ নিয়ে (নবীর কাছে) এলো। যখন সকাল হলো, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "গত রাতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারবর্গের কাছে সত্তর জন স্ত্রী এসেছিল, যারা প্রত্যেকেই প্রহারের অভিযোগ করছিল। আল্লাহর কসম! তোমরা তাদেরকে (যারা প্রহার করে) তোমাদের মধ্যে উত্তম লোক হিসেবে পাবে না।"
6264 - عن علي أن امرأة الوليد بن عقبة أتت النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله، إن الوليد يضربها فقال لها:"قولي له: قد أجارني" قال علي: فلم تلبث إلا يسيرا حتى رجعت فقالت: ما زادني إلا ضربا، فأخذ هدية من ثوبه، فدفعها إليها وقال:"قولي له: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أجارني" فلم تلبث إلا يسيرا حتى رجعت فقالت: ما زادني إلا ضربا. فرفع يديه وقال:"اللَّهم عليك الوليد، أثِمَ بي مرتين".
حسن: رواه الإمام أحمد (1304) وأبو يعلى (351) والبزار - كشف الأستار - (767) كلهم من حديث عبد الله بن داود، عن نعيم بن حكيم، عن أبي مريم، عن علي فذكره.
وفيه أبو مريم هو الثقفي، واسمه قيس بن المدايني مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، والراوي عنه نعيم بن حكيم المدائني مختلف فيه أيضا فوثقه ابن معين وابن حبان وغيرهما، وتكلم فيه غيرُ واحد، إلا أنه حسن الحديث، وقد صحّح البوصيري في الإتحاف (5/ 6).
وأما ما رُوي عن عمر بن الخطاب أنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يُسأل الرجلُ فيم يَضرِبُ امرأته، ولا تنمْ إلا على وتر" ونسيت الثالثة، فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (1986) واللفظ له، وأبو داود (2147) وأحمد (122) والحاكم (4/ 175) كلهم من حديث أبي عوانة، عن داود بن عبد الله الأودي، عن عبد الرحمن المُسْلي، عن أشعث بن قيس قال: ضِفْتُ عمرَ ليلةً، فلما كان في جوف الليل، قام إلى امرأته يضربها، فحجزت بينهما. فلما آوى إلى فراشه قال لي: يا أشعث، احفظ عني شيئا سمعته عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل عبد الرحمن المُسْلي؛ فإنه لم يرو عنه سوى داود بن عبد الله الأَوْدي، قال الذهبي:"لا يُعرف إلا في هذا الحديث، تفرد عنه داود بن عبد الله الأودي".
وأما الحاكم فقال: صحيح الإسناد. فهذا وهمٌ منه.
وفي معناه ما روي عن الزبير قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ألا عسى أحدكم أن يضرب امرأته ضرب الأمة، ألا خيركم خيركم لأهله".
رواه البزار - كشف الأستار - (1484) عن زكريا بن يحيى الضرير، ثنا شبابة بن سوار، ثنا المغيرة بن مسلم، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن الزبير، فذكره.
قال البزار: رواه غير واحد في قصة:"خيركم خيركم لأهله عن هشام، عن أبيه مرسلا. وأسنده بعضهم، وأما قصة ضرب النساء فرواه هشام، عن أبيه، عن عبد الله بن زمعة، هكذا رواه جماعة، ورواه الضحاك بن عثمان، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، ولا نعلم أحدا قال فيه: عن الزبير إلا مغيرة، ولم نسمعه إلا من زكريا، عن شبابة، عن مغيرة". انتهى.
وقال الهيثمي في المجمع (4/ 303):"رواه البزار عن شيخه زكريا بن يحيى بن أيوب الضرير، ولم أعرفه، وبقية رجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال، فإن ابن حبان لم يذكر في ثقاته زكريا بن يحيى، وكان الحافظ الهيثمي يعتمد كثيرا على ثقات ابن حبان في معرفة الرجال.
وزكريا بن يحيى هذا ترجم له الخطيب في تاريخه (8/ 457) ولم يقل فيه شيئا خلافا لعادته، إذ لو علمه لحكم عليه. فهو مجهول الحال عند المحدثين المحققين لرواية عدد عنه، فإن رواية العدد عنه لا ترفع جهالة الحال كما هو معلوم.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে ওয়ালীদ ইবনু উকবাহ-এর স্ত্রী রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল, ওয়ালীদ তাকে প্রহার করে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি তাকে বলো: আমাকে আশ্রয় দেওয়া হয়েছে।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অল্প সময় যেতে না যেতেই সে ফিরে এসে বলল: সে আমাকে আরও বেশি প্রহার করেছে। অতঃপর তিনি তাঁর কাপড়ের একটি অংশ নিলেন এবং তাকে দিয়ে বললেন: "তুমি তাকে বলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অবশ্যই আমাকে আশ্রয় দিয়েছেন।" অল্প সময় যেতে না যেতেই সে ফিরে এসে বলল: সে আমাকে আরও বেশি প্রহার করেছে। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু’হাত তুলে বললেন: "হে আল্লাহ! ওয়ালীদকে তুমি ধরো, সে দু’বার আমার সাথে কৃত অপরাধ করেছে।"
6265 - عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال في خطبة حجة الوداع:"اتقوا الله في النساء، فإنكم أخذتموهن بأمان الله، واستحللتم فروجهن بكلمة الله، ولكم عليهن أن لا يوطئن فرشكم أحدا تكرهونه، فإن فعلن ذلك فاضربوهن ضربا غير مبرح".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طرق عن حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر بن عبد الله فذكره.
وفي معناه حديث عمرو بن الأحوص قال: حدثني أبي أنه شهد حجة الوداع مع رسول الله صلى الله عليه
فذكر خطبة حجة الوداع وجاء فيه:"استوصوا بالنساء خيرا، فإنهن عندكم عوان، ليس تملكون منهن شيئا غير ذلك، إلا أن يأتين بفاحشة مبينة، فإن فعلن فاهجروهن في المضاجع، واضربوهن ضرب غير مبرح، فإن أطعنكم فلا تبغوا عليهن سبيلا، إن لكم من نسائكم حقا ولنسائكم عليكم حقا، فأما حقكم على نسائكم، فلا يوطئن فرشكم من تكرهون، ولا يأذن في بيوتكم لمن تكرهون، ألا وحقهن عليكم أن تحسنوا إليهن في كسوتهن وطعامهن.
رواه أبو داود (3334) والترمذي (1163) وابن ماجه (1851) وفي إسناده كلام. انظر كتاب الحج.
وفي سنن البيهقي (7/ 303) عن ابن عباس في هذه الآية: قال: تلك المرأة تنشزه، وتستخف بحق زوجها، ولا تطيع أمره، فأمر الله عز وجل أن يعظها، ويذكرها بالله، وتعظم حقه عليها، فإن قبلت وإلا هجرها في المضجع، ولا يكلمها من غير أن يذر نكاحها، وذلك عليها شديد، فإن راجعت وإلا ضربها ضربا غير مبرح، ولا يكسر لها عظما، ولا يجرح لها جرحًا.
قال تعالى: {فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلَا تَبْغُوا عَلَيْهِنَّ سَبِيلًا} [النساء: 34].
يقول:"إذا أطاعتك فلا تتجن عليها العلل". انتهى.
وأخرجه ابن جرير الطبري في تفسيره (6/ 711) مختصرا وزاد في آخره:"فإن قبلت، وإلا فقد حل لك منها الفدية".
ولا يصح ما رواه أبو داود (2144) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن علي بن زيد، عن أبي حرة الرقاشي، عن عمه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"فإن خفتم نشوزهن فاهجروهن في المضاجع" قال حماد: يعني النكاح.
فإن علي بن زيد وهو ابن جدعان ضعيف، وقد رواه الإمام أحمد (20695) من حديث حماد بن سلمة عن علي بن زيد مطولا في خطبة أوسط أيام التشريق وجاء فيه: ...."فاتقوا الله في النساء، فإنهن عندكم عوان لا يملكن لأنفسهن شيئا، فإن لهن عليكم، ولكم عليهن حقا أن لا يوطئن فرشكم أحدا غيركم، ولا يأذنّ في بيوتكم لأحد تكرهونه، فإن خفتم نشوزهن فعظوهن، وهجروهن في المضاجع، واضربوهن ضربًا غير مبرح" ....
والضرب غير المبرح: هو الضرب الخفيف غير مؤثر.
وأما ما روي عن الأعشى عبد الله بن الأعور في قصة نشوز زوجته فهو ضعيف مضطرب الإسناد.
رواه عبد الله بن أحمد في مسند أبيه (6886) قال: حدثني العباس بن عبد العظيم العنبري، حدثنا أبو سلمة عبيد بن عبد الرحمن الحنفي، حدثني الجنيد بن أمين بن ذروة، عن أبيه ذروة بن نضلة، عن أبيه نضلة بن طريف: أن رجلا منهم، يقال له: الأعشى، واسمه: عبد الله بن الأعور، كان عنده امرأة يقال لها: معاذة، خرج في رجب يَمِير أهله من هجر، فهربت امرأته بعده، ناشزا عليه، فعاذت برجل منهم، يقال له: مُطرِّف بن بُهْصل بن كعب بن قَمَيْشع بن دُلَف بن أهْصَم بن
عبد الله بن الحِرماز، فجعلها خلف ظهره، فلما قدم ولم يجدها في بيته، وأخبر أنها نشزت عليه، وأنها عادت بمطرِّف بن بُهْصل، فأتاه، فقال: يا ابن عم، أعندك امرأتي معاذة؟ فادفعها إلي، قال: ليست عندي، ولو كانت عندي لم أدفعها إليك، قال: وكان مطرّف أعز منه، فخرج حتى أتى النبي صلى الله عليه وسلم فعاذ به وأنشأ يقول:
يا سيدَ الناس وديَّان العرب … إليك أشكو ذِربةً من الذِّربْ
كالذئبة الغَبْشاء في ظل السربْ … خرجتُ أبغيها الطعام في رجبْ
فخلفتني بنزاع وهربْ … أخلفتِ العهدَ ولطَّت بالذنبْ
وقذفتني بن عِيْص مؤتشبْ … وهن شر غالب لمن غلبْ
فقال النبي صلى الله عليه وسلم عند ذلك:"وهن شر غالب لمن غلب"، فشكا إليه امرأته وما صنعت به، وأنها عند رجل منهم يقال له: مطرف بن بهصل، فكتب له النبي صلى الله عليه وسلم: إلى مطرف، انظر امرأة هذا معاذة فادفعها إليه، فأتاه كتاب النبي صلى الله عليه وسلم، فقريء عليه، فقال لها: يا معاذة، هذا كتاب النبي صلى الله عليه وسلم فيك، فأنا دافعك إليه، قالت: خذ لي عليه العهد والميثاق وذمة نبيه: لا يعاقبني فيما صنعت، فأخذ لها ذاك عليه، ودفعها مطرف إليه، فأنشاء يقول:
لعمرك ما حبي معاذة بالذي … يُغيره الواشي ولا قِدمُ العهد
ولا سوء ما جاءت به إذ أزالها … غُواة الرجال، إذ يُناجونها بعدي
ورجاله كلهم مجهولون غير شيخ عبد الله وهو العباس بن عبد العظيم العنبري أبو الفضل البصري حافظ ثقة من رجال مسلم.
وإليه أشار الهيثمي في"المجمع" (4/ 330 - 331) وفيه جماعة لم أعرفهم.
وله طريق آخر عنده (6885) وعند أبي يعلى (6871) والبيهقي (10/ 240) وفيه أيضا مجهولون مع اضطراب في إسناده.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের ভাষণে বলেছেন: তোমরা মহিলাদের ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করো, কেননা তোমরা তাদের গ্রহণ করেছো আল্লাহর আমানত হিসেবে, এবং আল্লাহর কালেমা দ্বারা তাদের লজ্জাস্থান হালাল করেছো। তাদের উপর তোমাদের অধিকার হলো যে, তোমরা অপছন্দ করো এমন কাউকে যেন তারা তোমাদের বিছানায় (ঘরে) আসতে না দেয়। যদি তারা তা করে, তবে তোমরা তাদেরকে প্রহার করো, এমন প্রহার যা আঘাতযুক্ত (মারাত্মক) নয়।
6266 - عن علي قال: لما تزوجت فاطمة فقلت: يا رسول الله، ابن لي، قال:"أعطها شيئا" قلت: ما عندي من شيء. قال: فأين درعك الحطمية" قلت: هي عندي. قال:"فأعطها إياه".
صحيح: رواه النسائي (3375) والبيهقي (7/ 252) كلاهما من حديث هشام بن عبد الملك، قال: حدثنا حماد، عن أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس، أن عليًّا قال: فذكره. وإسناده صحيح. وحماد هو ابن سلمة.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আমি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহ করলাম, তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমার জন্য (দাম্পত্য জীবনের) ব্যবস্থা করে দিন। তিনি বললেন: "তাকে কিছু দাও।" আমি বললাম: আমার কাছে তো কিছুই নেই। তিনি বললেন: "তাহলে তোমার 'হাতামিয়্যাহ' (Hutamiyyah) বর্মটি কোথায়?" আমি বললাম: সেটি আমার কাছেই আছে। তিনি বললেন: "তবে সেটি তাকে দিয়ে দাও।"
6267 - عن عبد الله بن عباس قال: لما تزوج علي فاطمة قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أعطها شيئا. قال: ما عندي شيء. قال:"أين درعك الحطمية؟".
صحيح: رواه أبو داود (2125) والنسائي (3376) كلاهما من حديث عبدة، عن سعيد، عن أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده صحيح. وسعيد هو ابن أبي عروبة اختلط في آخره ولكن سماع عبدة. وهو ابن سليمان - كان قبل اختلاطه. قال ابن معين: كان أثبت الناس سماعا منه.
وأما ما روي عن غيلان بن أنس قال: حدثني محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أن عليا لما تزوج فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم أراد أن يدخل بها، فمنعه رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى يعطيها شيئا. فقال: يا رسول الله، ليس لي شيء. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"فأعطها درعك" فأعطاها درعه، ثم دخل بها. فهو لا يصح.
رواه أبو داود (2166) عن كثير بن عبيد الحمصي، حدثنا أبو حيوة، عن شعيب - يعني ابن أبي حمزة - حدثنا غيلان فذكره.
وغيلان بن أنس ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل، وكذلك البخاري في التاريخ الكبير ولم يذكرا فيه شيئا، ولذا قال الحافظ في التقريب"مقبول" وهو ليس بمقبول؛ لأنه لم يُتابع على قوله: فمنعه الرسول صلى الله عليه وسلم حتى يعطيها شيئا.
ثم هو اضطرب في الإسناد فمرة قال: حدثني محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، وأخرى قال: عن عكرمة، عن ابن عباس، رواه أبو داود (2127) عن كثير - يعني ابن عبد. حدثنا أبو حيوة، عن شعيب، عن غيلان، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره مثله.
فرجع الحديث إلى ابن عباس، وليس في حديثه المنع من الدخول قبل أن يعطيها شيئا.
وكذلك لا يصح ما روي عن خيثمة بن عبد الرحمن أن رجلا تزوج في عهد النبي صلى الله عليه وسلم نجهزها إليه قبل أن ينقد شيئا.
رواه البيهقي (7/ 253) من حديث أبي العباس محمد بن يعقوب، ثنا هارون بن سليمان الأصبهاني، ثنا عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن منصور، عن طلحة، عن خيثمة فذكره.
ورواه أيضا عن أبي العباس، ثنا محمد بن إسحاق الصغاني، أنا عبد الله بن بكر، ثنا سعيد، عن طلحة بن مصرف، عن خيثمة أن رجلًا تزوج امرأة، وكان معسرًا فأمر نبي الله صلى الله عليه وسلم أن يرفق به، فدخل بها ولم ينقدها شيئا، ثم أيسر بعد ذلك فساق.
هذا هو الصحيح مرسلا. ورواه شريك عن منصور، عن طلحة، عن خيثمة، عن عائشة موصولا. رواه أبو داود (2128) وابن ماجه (1992) والبيهقي (7/ 253) قال أبو داود:"خيثمة لم يسمع من عائشة". وقال ابن القطان:"الشك ممن سمعه من عائشة". وقال البيهقي:"وصله
شريك، وأرسله غيره".
قلت: شريك هو ابن عبد الله النخعي سيء الحفظ، فلا يحتج به، لا سيما إذا خالف، ولذا عده ابن عدي هذا الحديث من مناكير شريك.
فقه الحديث: وقد كره بعض السلف أن يدخل الرجل على زوجته قبل أن يدفع شيئا من المهر. منهم ابن عباس. وكان ابن عمر يقول: لا يحل لمسلم أن يدخل على امرأته حتى يقدم إليها ما قل أو كثر.
وقد كره مالك والشافعي أيضا الدخول قبل أن يعطيها شيئا من صداق. ورخص فيه أحمد وإسحاق.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতিমাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিয়ে করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তাকে কিছু দাও।" তিনি বললেন: "আমার কাছে কিছুই নেই।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার হাতামিইয়্যা নামক বর্মটি কোথায়?"
6268 - عن المسور بن مخرمة أن علي بن أبي طالب خطب بنت أبي جهل على فاطمة. فسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يخطب الناس في ذلك، على منبره هذا، وأنا يومئذ محتلم، فقال:"إن فاطمة مني، وإني أتخوف أن تفتن في دينها".
قال: ثم ذكر صهرًا له من بني عبد شمس، فأثنى عليه في مُصاهرته إياه فأحسن. قال:"حدثني فصدقَني ووعدَني فأوفى لي. وإني لست أحرم حلالًا ولا أحل حراما. ولكن والله لا تجمع بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم وبنت عدو الله مكانا واحدا أبدا".
متفق عليه: رواه البخاري في فرض الخمس (3110) ومسلم في فضائل الصحابة (2449 - 95) كلاهما من طريق يعقوب بن إبراهيم ثنا أبي عن الوليد بن كثير ثني محمد بن عمرو بن حلحلة الأولى، أن ابن شهاب حدثه أن علي بن الحسين حدثه عن المسور بن مخرمة. فذكره وفيه قصة.
وهذا لفظ مسلم، ولفظ البخاري نحوه.
মিসওয়ার ইবনে মাখরামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহে থাকা সত্ত্বেও আবূ জাহেলের কন্যাকে বিবাহ করার প্রস্তাব দিলেন। এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে দাঁড়িয়ে লোকজনকে ভাষণ দিতেছিলেন, তখন আমি তা শুনতে পেলাম। তখন আমি সাবালক ছিলাম। তিনি বললেন: “নিশ্চয়ই ফাতিমা আমার অংশ। আমি ভয় পাচ্ছি যে, সে তার দ্বীনের ব্যাপারে ফিতনায় পড়ে যাবে।” তিনি (মিসওয়ার) বললেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বানু আব্দে শামস গোত্রের তাঁর এক জামাতার কথা উল্লেখ করলেন এবং তার সাথে বৈবাহিক সম্পর্কের ব্যাপারে তার প্রশংসা করলেন, আর উত্তম প্রশংসা করলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সে আমাকে যা বলেছিল, তাতে সত্য বলেছিল এবং আমার কাছে যে অঙ্গীকার করেছিল, তা পূর্ণ করেছিল। আর আমি কোনো হালালকে হারাম করি না এবং কোনো হারামকে হালাল করি না। কিন্তু আল্লাহর কসম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যার সাথে আল্লাহর শত্রুর কন্যাকে এক স্থানে কখনো একত্র করা যাবে না।”
6269 - عن المسور بن مخرمة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول وهو على المنبر:"إن بني هشام بن المغيرة استأذنوا في أن ينكحوا ابنتهم عليَّ بن أبي طالب، فلا آذنُ، ثم لا آذنُ، ثم لا أذنُ إلا أن يريد ابن أبي طالب أن يطلق ابنتي، وينكح ابنتهم؛ فإنما هي بَضْعة مني، يُريبُني ما أرابها ويُؤذيني ما آذاها".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5230)، ومسلم في الفضائل (2249: 93) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن ابن أبي مليكة، عن المسور بن مخرمة فذكره. وقوله:"ابنتهم" وهي ابنة أبي جهل وهو عمرو بن هشام بن المغيرة عدو الله ورسوله، وأخواه الحارث بن هشام وسلمة بن هشام أسلما عام الفتح، وحسُنَ إسلامهما.
قال ابن التين:"أصح ما تُحمل هذه القصة أن النبي صلى الله عليه وسلم حرّم على علي أن يجمع بين ابنته وبين ابنة أبي جهل؛ لأنه علل بأن ذلك يؤذيه، وأذيّتُه حرام بالاتفاق، ومعنى قوله:"لا أُحرِّمُ حلالا" أي هي له حلال لو لم تكن عنده فاطمة".
وفي المسألة أقوال أخرى انظر: الفتح (9/ 329).
মিসওয়ার ইবনে মাখরামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিম্বরে থাকা অবস্থায় বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় বনু হিশাম ইবনে মুগীরাহ তাদের মেয়েকে আলী ইবনে আবী তালিবের সাথে বিবাহ দিতে অনুমতি চেয়েছে। কিন্তু আমি অনুমতি দেব না, আমি কিছুতেই অনুমতি দেব না, আমি কক্ষনো অনুমতি দেব না, যদি না আবূ তালিবের পুত্র (আলী) আমার কন্যাকে তালাক দিয়ে তাদের কন্যাকে বিবাহ করতে চায়; কারণ সে (ফাতিমা) আমার শরীরেরই একটি অংশ। যা তাকে কষ্ট দেয়, তা আমাকেও কষ্ট দেয় এবং যা তাকে যন্ত্রণা দেয়, তা আমাকেও যন্ত্রণা দেয়।"
6270 - عن جابر بن عبد الله أن النبي صلى الله عليه وسلم رأى امرأة فأتى امرأته زينب، وهي تمعسُ منيئة لها. فقضى حاجته، ثم خرج إلى أصحابه فقال:"إن المرأة تقبل في صورة شيطان، وتدبر في صورة شيطان، فإذا أبصر أحدكم امرأة فليأت أهله، فإن ذلك يرد ما في نفسه".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1403) عن عمرو بن علي، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا هشام بن أبي عبد الله، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وفي رواية:"فليعمد إلى امرأته فليواقعها، فإن ذلك يرد ما في نفسه".
وقوله:"تمعسُ منيئة لها" المعس الدلك، والمنيئة هو أول دباغ الجلد.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবীজি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন মহিলাকে দেখে তাঁর স্ত্রী যয়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলেন, যখন তিনি তাঁর জন্য একটি চামড়া ডলছিলেন (বা প্রস্তুত করছিলেন)। অতঃপর তিনি তাঁর প্রয়োজন পূর্ণ করলেন। এরপর তিনি তাঁর সাহাবীগণের কাছে বের হয়ে এলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই নারী শয়তানের রূপে আগমন করে এবং শয়তানের রূপে প্রস্থান করে। সুতরাং তোমাদের কেউ যখন কোনো মহিলাকে দেখে, তখন সে যেন তার স্ত্রীর নিকট গমন করে। কারণ এটি তার মনের (উৎকণ্ঠা/উদ্দীপনা) দূর করে দেয়।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "সে যেন তার স্ত্রীর নিকট যায় এবং তার সাথে সহবাস করে। কারণ এটি তার মনের (উদ্দীপনা) দূর করে দেয়।"
6271 - عن أبي كبشة الأنصاري قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم جالسا في أصحابه، فدخل، ثم خرج وقد اغتسل. فقلنا: يا رسول الله، قد كان شيء؟ قال:"أجل، قد مرت بي فلانة، فوقع في قلبي شهوة النساء، فأتيت بعض أزواجي فأصبتُها، فكذلك فافعلوا، فإنه من أماثل أعمالكم إتيان الحلال".
حسن: رواه الإمام أحمد (18028) والطبراني في الكبير (22/ 338 - 339) وفي الأوسط (3275) كلهم من طريق معاوية بن صالح، عن أزهر بن سعيد الحرازي، قال: سمعت أبا كبشة فذكره.
وإسناده حسن من أجل أزهر بن سعيد الحرازي فإنه حسن الحديث.
وقوله:"إن من أماثل أعمالكم إتيان الحلال" وهو بمعني"وفي بضع أحدكم صدقة".
وفي الباب ما روي عن عبد الله بن مسعود قال: رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم امرأة فأعجبه، فأتى سودة وهي تصنع طيبا، وعندها نساء، فأخْلَينَه، فقضى حاجته ثم قال: وأيما رجل رأى امرأة تعجبه فليقُمْ إلى أهله، فإن معها مثل الذي معها" الصواب أنه موقوف.
رواه الدارمي (2261) عن قبيصة، أنبأنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن حلّام، عن عبد الله بن مسعود فذكره.
قال البخاري في التاريخ الكبير (5/ 69)"أن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن عبد الله ولم يرفعه، وأبو نعيم، وابن مهدي، عن سفيان، عن أبي إسحاق".
فتفرد قبيصة فرفعه، وغيرُه أوقفوه، ووقّفه أيضا أبو حاتم (1/ 394) والدارقطني في العلل (5/ 197). وفيه عبد الله بن حلّام لم يوقه غير ابن حبان.
আবূ কাবশা আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণের মাঝে বসা ছিলেন। অতঃপর তিনি (ভেতরে) গেলেন, এরপর গোসল করে বেরিয়ে আসলেন। তখন আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! (ভিতরে) কি কিছু হয়েছিল? তিনি বললেন: “হ্যাঁ, এক মহিলা আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। ফলে আমার অন্তরে নারীর প্রতি আকাঙ্ক্ষা সৃষ্টি হলো। তাই আমি আমার কোনো এক স্ত্রীর কাছে গিয়ে তার সাথে সহবাস করলাম। সুতরাং তোমরাও তাই করো, কেননা হালালভাবে স্ত্রী সহবাস করা তোমাদের শ্রেষ্ঠতম কাজগুলোর অন্তর্ভুক্ত।”
6272 - عن ابن عباس قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يخطب يقول:"لا يخلون رجل بامرأة إلا ومعها ذو محرم، ولا تسافر المرأة إلا مع ذي محرم". فقام رجل فقال: يا رسول الله، إن امرأتي خرجت حاجّة، وإني اكتتبت في غزوة كذا وكذا. قال:"انطلق فجُجَّ مع امرأتك".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5233)، ومسلم في الحج (1314) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، حدثنا عمرو بن دينار، عن أبي معبد، قال سمعت ابن عباس يقول: فذكره. والسياق لمسلم.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খুতবা দিতে শুনে বলতে শুনেছি: "কোনো পুরুষ যেন কোনো নারীর সাথে নির্জনে অবস্থান না করে, যদি না তার সাথে কোনো মাহরাম থাকে। আর কোনো নারী যেন সফর না করে, যদি না তার সাথে কোনো মাহরাম থাকে।" তখন এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার স্ত্রী হজ্জের উদ্দেশ্যে বের হয়েছে, আর আমাকে অমুক অমুক যুদ্ধের জন্য তালিকাভুক্ত করা হয়েছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, তোমার স্ত্রীর সাথে হজ্জ করো।"
6273 - عن عقبة بن عامر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إياكم والدخول على النساء". فقال رجل من الأنصار: يا رسول الله، أفرأيت الحمو؟ قال:"الحمو الموت".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5232)، ومسلم في السلام (2172) كلاهما عن قتيبة بن سعد، حدثنا ليث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر، فذكره.
উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মহিলাদের নিকট প্রবেশ করা থেকে সাবধান থেকো।" তখন আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! দেবর (স্বামীর নিকটাত্মীয়) সম্পর্কে আপনি কী বলেন? তিনি বললেন: "দেবর হলো মৃত্যু।"
6274 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أن نفرًا من بني هاشم دخلوا على أسماء بنت عميس، فدخل أبو بكر الصديق - وهي تحته - فرآهم فكره ذلك، فذكر ذلك لرسول الله، صلى الله عليه وسلم وقال: لم أر إلا خيرًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله قد برأها من ذلك". ثم قام رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنبر فقال:"لا يدخلن رجل بعد يومي هذا على مغيبة إلا ومعه رجل أو اثنان".
صحيح: رواه مسلم في السلام (2173) من طريق عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، أن بكر بن سوادة حدثه، أن عبد الرحمن بن جُبير حدثه، أن عبد الله بن عمرو بن العاص حدثه، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনু হাশিম গোত্রের কিছু লোক আসমা বিনতে উমাইসের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট প্রবেশ করলেন। অতঃপর আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—তখন তিনি তাঁর (আসমা'র) স্ত্রী ছিলেন—ঘরে প্রবেশ করলেন এবং তাদের দেখে তা অপছন্দ করলেন। এরপর তিনি বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন এবং বললেন: আমি তো ভালো ব্যতীত কিছু দেখিনি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ তাকে এ থেকে মুক্ত করেছেন (দোষমুক্ত করেছেন)।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে দাঁড়িয়ে বললেন: "আজকের দিনের পর থেকে কোনো পুরুষ যেন এমন নারীর নিকট প্রবেশ না করে, যার স্বামী অনুপস্থিত, তবে যদি তার সাথে একজন বা দুজন পুরুষ থাকে।"
6275 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا لا يبيتن رجل عند امرأةٍ ثيّب، إلا أن يكون ناكحا، أو ذا محرم".
صحيح: رواه مسلم في السلام (2171) من طريق هشيم، أخبرنا أبو الزبير، عن جابر، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সাবধান! কোনো পুরুষ যেন কোনো বিধবা মহিলার সাথে রাত্রিযাপন না করে, যদি না সে তার স্বামী হয় অথবা তার মাহরাম হয়।"
6276 - عن عبد الله بن عباس أن رجلا قدم من سفر، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: نزلتَ على فلانة، وأغلقتَ عليك بأبها" قال: نعم، فكره ذلك النبي صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البزار - كشف الأستار (1488) عن محمد بن معمر، ثنا أبو عاصم، قال: ثنا محمد بن مسلم، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة، عن عبد الله بن عباس فذكره.
ورجاله رجال الصحيح كما قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 326).
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি সফর থেকে আগমন করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি অমুক নারীর কাছে অবস্থান করেছ এবং তোমার ওপর দরজা বন্ধ করে নিয়েছিলে?" সে বলল: হ্যাঁ। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিষয়টি অপছন্দ করলেন।
6277 - عن أنس بن مالك قال: جاءت امرأة من الأنصار إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فخلا بها رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"والذي نفسي بيده إنكم لأحب الناس إليَّ" ثلاث مرات.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5234) ومسلم في فضائل الصحابة (2509/ 175) كلاهما عن محمد بن بشار، حدثنا محمد بن جعفر غندر، حدثنا شعبة، عن هشام بن زيد، قال: سمعت أنس بن مالك، قال: فذكره.
قوله:"خلا بها، أي: ابتعد عن مجلس الناس.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন আনসারী মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে নির্জনে কথা বললেন এবং বললেন, "যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! নিশ্চয়ই তোমরা আমার কাছে মানুষের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়।" কথাটি তিনি তিনবার বললেন।
6278 - عن أم سلمة قالت: دخل عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وعندي مخنث، فسمعته يقول العبد الله بن أمية: يا عبد الله، أرأيت إن فتح الله عليكم الطائف غدًا، فعليكم بابنة غيلان. فإنها تُقبل بأربع وتُدبر بثمان.
فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا يدخلن هؤلاء عليكن".
متفق عليه: رواه البخاري في اللباس (5887) ومسلم في السلام (2180) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن زينب ابنة أبي سلمة، عن أمها أم سلمة فذكرته.
قال ابن عيينة: وقال ابن جريج: المخنث: اسمه هِيت - بكسر الهاء. هذا هو الأشهر، وقيل: اسمه"هنب" بالنون والباء، والهنب هو الأحمق، وقيل اسمه:"ماتع" وقيل غير ذلك.
قال أبو عبد الله البخاري:"تقبل بأربع" يعني أربع عُكن بطنها، فهي تُقبل بهن، وقوله:"تدبر بثمانه يعني أطراف هذه العكن الأربع، لأنها محيطة بالجنبين حتى لحقتْ".
قلت: والعكن هو الطي الذي في البطن من السمن.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশ করলেন, আর আমার কাছে একজন স্ত্রী-স্বভাবাপন্ন পুরুষ (মুখান্নাস) ছিল। আমি তাকে আব্দুল্লাহ ইবনে উমাইয়ার সাথে কথা বলতে শুনলাম। সে বলছিল: "হে আব্দুল্লাহ! দেখ তো, আল্লাহ যদি আগামীকাল তোমাদের জন্য তায়েফ জয় করে দেন, তবে তোমরা অবশ্যই গায়লান-এর মেয়ের প্রতি মনোযোগী হয়ো। কারণ সে সামনে আসে চারটি ভাঁজ নিয়ে এবং পিছু ফেরে আটটি ভাঁজ নিয়ে।"
অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই ধরনের লোকেরা যেন তোমাদের কাছে আর প্রবেশ না করে।"
6279 - عن عائشة قالت: قال: كان يدخل على أزواج رسول الله صلى الله عليه وسلم مخنث. فكانوا يعدونه من غير أولي الإرْبة. قال: فدخل النبي صلى الله عليه وسلم يوما، وهو عند بعض نسائه. وهو ينعت امرأة قال: إذا أقبلت أقبلت بأربع، وإذا أدْبرت أدْبرتْ بثمان.
فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ألا أرى هذا يعرف ما هنا لا يدخلنّ عليكن" قالت: فحجبوه.
صحيح: رواه مسلم في السلام (2181) عن عبد الله بن حميد، أخبرنا عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
وقد جاء اسمه في بعض الآثار: أنجسة وهو العبد الأسود الذي كان يحدو بالنساء.
والتخنث أمر خَلْقي، بخلاف التشبه كما يأتي. وفي الحديث من الفقه: أن المخنث يُمنع من
الدخول على النساء، ومنعهن من الظهور عليه، وبيان أن له حكم الرجال الفحول الراغبين في النساء. شرح مسلم للنووي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর স্ত্রীদের কাছে একজন স্বভাবগতভাবে মেয়েলী পুরুষ (মخنস) প্রবেশ করত। তারা তাকে এমন পুরুষদের মধ্যে গণ্য করতেন যাদের নারীদের প্রতি কোনো আকর্ষণ বা প্রয়োজন নেই (غير أولي الإرْبة)।
বর্ণনাকারী বলেন: একদিন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর কোনো এক স্ত্রীর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন সে সেখানে উপস্থিত ছিল। সে একজন মহিলার বর্ণনা দিচ্ছিল। সে বলল: "যখন সে সামনে আসে, তখন চার (মাংসপেশি) নিয়ে সামনে আসে এবং যখন সে পেছন ফেরে, তখন আট (মাংসপেশি) নিয়ে পেছন ফেরে।"
তখন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "আমি দেখছি যে এ ব্যক্তি নারীদের বিষয়াদি সম্পর্কে জানে। সে যেন আর তোমাদের কাছে প্রবেশ না করে।" তিনি (আয়িশা) বললেন: অতঃপর তারা তাকে পর্দা করে দিলেন (অর্থাৎ, তার প্রবেশ নিষিদ্ধ করলেন)।
6280 - عن ابن عباس قال: لعن النبي صلى الله عليه وسلم المخنثين من الرجال، والمترجلات من النساء. وقال:"أخرجوهن من بيوتكم" قال: فأخرج النبي صلى الله عليه وسلم فلانا، وأخرج عمر فلانا.
صحيح: رواه البخاري في اللباس (5886) عن معاذ بن فضالة، حدثنا هشام، عن يحيى، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وفي رواية:"المتشبهين من الرجال بالنساء، والمتشبهات من النساء بالرجال" رواه البخاري (5885) عن محمد بن بشار، حدثنا غندر، حدثنا شعبة عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وقال:"تابعه عمرو" أخبرنا شعبة.
وهشام هو الدستوائي، ويحيى هو ابن أبي كثير.
والتشبه يكون في اللباس والزينة التي تختص بالنساء والعكس.
ومن التشبه أيضا أن يؤتي الرجل في دبره من الرجال، والمرأة تتعاطى السحق بغيرها من النساء. وإخراج هؤلاء من البيوت لئلا يفضي الأمر بالتشبه إلى تعاطي ذلك الأمر. واللعن خاص بالمتشبهين والمتشبهات دون المخنث الخَلْقي.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পুরুষদের মধ্যে যারা নারীদের ভাবাপন্ন (মুকান্নাছīn) এবং নারীদের মধ্যে যারা পুরুষদের ভাবাপন্ন (মুতারা জ্জিলāt), তাদের অভিশাপ দিয়েছেন। তিনি বললেন: "তাদেরকে তোমাদের ঘর থেকে বের করে দাও।" তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অমুককে বের করে দিলেন এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অমুককে বের করে দিলেন।