হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6281)


6281 - عن أبي هريرة قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم الرجل يلبس لبسة المرأة، والمرأة تلبس لبسة الرجل.

صحيح: رواه أبو داود (4098) وابن ماجه (1903) وأحمد (8309) وصحّحه ابن حبان (5751) والحاكم (4/ 194) كلهم من طريق سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

وأما ما رُوي عن أبي هريرة قال:"لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم مخنث الرجال الذين يتشبهون بالنساء، والمترجلات من النساء، المتشبهات بالرجال".

وزاد في رواية:"أنه لعن المتبتلين والمتبتلات، والبائت وحد".

رواه الإمام أحمد (7855) عن أيوب بن النجار أبي إسماعيل اليمامي، عن طيب بن محمد، عن عطاء بن أبي رباح، عن أبي هريرة فذكره.

والرواية الثانية عند البخاري في التاريخ الكبير (4/ 362).

وإسناده ضعيف من أجل طيب بن محمد فإنه"مجهول" فإنه لم يرو عنه غير أيوب بن النجار، ولم يوثقه أحد إلا ابن حبان، وهو معروف بالتساهل.
قال البخاري:"لا يصح".

وذكره العقيلي في الضعفاء الكبير (2/ 232) وقال:"يخالف في حديثه".

وقوله:"والبائت وحده" لم يتابع عليه، وهو من منكراته.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই পুরুষকে লা'নত করেছেন যে নারীর পোশাক পরিধান করে এবং সেই নারীকে লা'নত করেছেন যে পুরুষের পোশাক পরিধান করে।









আল-জামি` আল-কামিল (6282)


6282 - عن عبد الله بن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ثلاثة لا يدخلون الجنة، ولا ينظر الله إليهم يوم القيامة: العاق بوالديه، والمرأة المترجلة المتشبهة بالرجال، والديوث. وثلاثة لا ينظر الله إليهم يوم القيامة: العاق بوالديه، والمدمن الخمر، والمنان بما أعطى".

حسن: رواه النسائي (2562)، وأحمد (6180) والبزار - كشف الأستار - (187) وأبو يعلى (5551) وصححه ابن حبان (7340) والحاكم (1/ 72) كلهم من حديث عبد الله بن يسار مولى ابن عمر، قال: أشهد لقد سمعت سالما يقول: قال عبد الله: فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن يسار فإنه حسن الحديث. وسبق الكلام عليه.

وفي الباب ما رُوي عن ابن عمر قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم المخنثين من الرجال، والمترجلات من النساء.

رواه أحمد (5328) والبزار - كشف الأستار - (2075) والطبراني في الكبير (13477) كلهم من طريق إسرائيل، عن ثُوير، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل ثُوير وهو ابن أبي فاختة الكوفي أبو الجهم من رجال التهذيب ضعّفه جمهور أهل العلم قال ابن حبان:"كان يقلب الأسانيد حتى يجيء في روايته أشياء كأنها موضوعة".

وفي الباب أيضا عن رجل من هُذيل قال: رأيت عبد الله بن عمرو بن العاص، ومنزله في الحل، ومسجده في الحرم، قال: فبينا أنا عنده رأى أم سعيد ابنة أبي جهل متقلدّة قوسا، وهي تمشي مشية الرجل، فقال عبد الله: من هذه؟ قال الهذلي: فقلت: هذه أم سعيد بنت أبي جهل فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ليس منا من تشبه بالرجال من النساء، ولا من تشبه بالنساء من الرجال".

رواه الإمام أحمد (6875) عن عبد الرزاق، أخبرنا عمر بن حوشب - رجل صالح - أخبرني عمرو بن دينار، عن عطاء، عن رجل من هذيل فذكره. وفيه رجل من هذيل لم يُسم. وفيه أيضا عمر بن حوشب هو الصنعاني قال فيه ابن القطان:"لا يعرف حاله كما في"التهذيب" ولكن قول عبد الرزاق:"رجل صالح" يدل على أنه كان معروفا عنده. فانحصرت العلة على الهذيل المبهم وبه أعله ابن حجر وغيره.

وفي الباب ما رُوي عن ابن أبي مليكة قال: قيل لعائشة: إن امرأة تلبس النعل. فقالت:"لعن رسول الله الرجلة من النساء".
رواه أبو داود (4099) عن محمد بن سليمان لُوين، وبعضه قراءة عليه، عن سفيان، عن ابن جريج، عن ابن أبي مليكة فذكره.

وابن جريج مدلس، قال أحمد في العلل (5265):"رواه حجاج الأعور، عن ابن جريج بإسناد آخر وليس هو عن ابن أبي مليكة"، فتبين أنه دلّس فيه.

قلت: التشبه في اللباس بعضه منصوص لأنه كان معمولا به في عهد النبي صلى الله عليه وسلم وعهد الصحابة، فجاء النهي عنه، والأخرى مجتهد فيه، فعلى المجتهد أو المفتي أن يُراعي في فتواه حاجة البلاد، وعادات الناس، وكلما كان اللباس أستر فهو الأفضل، وإنْ كان فيه بعض التشابه في طوله وعرضه مثل القميص الطويل للرجال الذي يُسمى اليوم"الثوب" وفستان النساء الطويل، فهما في الطول سواء، ولكنهما يختلفان في اللون والحرفة.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তিন প্রকারের লোক জান্নাতে প্রবেশ করবে না এবং আল্লাহ কিয়ামতের দিন তাদের দিকে তাকাবেনও না: পিতা-মাতার অবাধ্য সন্তান, পুরুষের বেশ ধারণকারী (পুরুষের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ) নারী এবং দাইয়ূস। আর তিন প্রকারের লোক, আল্লাহ কিয়ামতের দিন তাদের দিকে তাকাবেন না: পিতা-মাতার অবাধ্য সন্তান, সর্বদা মদ পানকারী এবং দান করার পর খোঁটা দাতা।"









আল-জামি` আল-কামিল (6283)


6283 - عن صفية بنت حيي زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها جاءت رسول الله صلى الله عليه وسلم تزوره، وهو معتكف في المسجد في العشر الغوابر من رمضان، فتحدثت عنده ساعة من العشاء، ثم قامت تنقلب، فقام معها النبي صلى الله عليه وسلم يقلبها حتى إذا بلغت باب المسجد الذي عند مسكن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، مر بهما رجلان من الأنصار، فسلما على رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم نفذا، فقال لهما رسول الله صلى الله عليه وسلم:"على رسلكما، إنما هي صفية بنت حيي" قالا: سبحان الله! يا رسول الله، وكبر عليهما ما قال، قال:"إن الشيطان يجري من ابن آدم مبلغ الدم، وإني خشيت أن يقذف في قلوبكما".

متفق عليه: رواه البخاري في الأدب (6219) ومسلم في السلام (2175/ 25) كلاهما من طريق أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، أخبرنا علي بن الحسين، أن صفية زوج النبي صلى الله عليه وسلم أخبرته، فذكرته.

قال ابن خزيمة:"في الحديث دليل على أن محادثة الزوجة زوجها في اعتكافه ليلا جائز، وهو السمر نفسه".

روي عن عائشة قالت: حدّث رسول الله صلى الله عليه وسلم نساءه ذات ليلة حديثا. فقالت امرأة منهن: يا رسول الله، كأن الحديث حديث خرافة؟ فقال:"أتدرين ما خرافة؟ إن خرافة كنت رجلا من عُذرة، أسرتْه الجن في الجاهلية. فمكث فيهن دهرًا طويلًا، ثم ردوه إلى الإنس، فكان يُحدث الناس بما رأى فيهم من الأعاجيب. فقال الناس: حديث خرافة".

رواه الإمام أحمد (25344) والترمذي في الشمائل (250) والبزار - كشف الأستار - (2475) وأبو يعلى (4442) كلهم من طريق أبي النضر، حدثنا أبو عقيل يعني الثقفي، حدثنا مجالد بن
سعيد، عن عامر، عن مسروق، عن عائشة فذكرته.

ومجالد بن سعيد أبو عمرو الكوفي ضعيف، ضعفه النسائي، وابن سعد، وابن حبان. وقال ابن معين: لا يحتج به. إلا أن البخاري كان حسن الرأي فيه.

وأخرجه ابن الجوزي في"العلل المتناهية" من طريق الإمام أحمد، وأعله به.

فقال:"مجالد ليس بشيء. قال ابن حبان: كان يقلب الأسانيد، ويرفع المراسيل، لا يجوز الاحتجاج به". ثم اختلف في وصله وإرساله.

قال الدارقطني في"العلل" (14/ 292):"يرويه مجالد، واختلف عليه".

فرواه أبو عقيل الثقفي، واسمه عبد الله بن عقيل - أحد الثقات - عن مجالد، عن الشعبي، عن مسروق، عن عائشة. وكذلك قال أحمد بن أبي بديل، عن أبي أسامة، عن مجالد، وغيرهما يرويه عن أبي أسامة، عن مجالد، عن الشعبي مرسلًا. والمرسل أشبه بالصواب".




সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী ছিলেন, তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখতে এসেছিলেন। তখন তিনি রমজানের শেষ দশকে মসজিদে ইতিকাফরত ছিলেন। তিনি ইশার পর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কিছুক্ষণ কথা বললেন, এরপর ফিরে যাওয়ার জন্য দাঁড়ালেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে পৌঁছে দেওয়ার জন্য তাঁর সাথে দাঁড়ালেন। যখন তিনি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অপর সহধর্মিণী ছিলেন, তাঁর ঘরের নিকটস্থ মসজিদের দরজার কাছে পৌঁছলেন, তখন আনসারদের দুজন লোক তাঁদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তারা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিয়ে দ্রুত চলে গেলেন। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদেরকে বললেন: "তোমরা দ্রুত যেও না, ইনি সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াই।" তাঁরা বললেন: "সুবহানাল্লাহ! ইয়া রাসূলুল্লাহ!"— রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথা তাঁদের কাছে খুব কঠিন মনে হলো। তিনি বললেন: "নিশ্চয় শয়তান মানুষের দেহে রক্তের শিরা-উপশিরায় চলাফেরা করে। আমি আশঙ্কা করলাম যে, সে তোমাদের হৃদয়ে কোনো কুধারণা ঢুকিয়ে দিতে পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6284)


6284 - عن أم كلثوم بنت عقبة أنها سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ليس الكذاب الذي يُصلح بين الناس، فينْمي خيرًا أو يقول خيرًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الصلح (2692)، ومسلم في البر والصلة والآداب (2605) كلاهما من طريق صالح، عن ابن شهاب، أن حميد بن عبد الرحمن أخبره، أن أمه أمّ كلثوم بنت عقبة أخبرته، فذكرته، والسياق للبخاري، ولم يسق مسلم متنه، وإنما أحال فيه على حديث يونس عن ابن شهاب وقال مثله.

وزاد فيه: وقالت:"ولم أسمعه يرخّص في شيء مما يقول الناس إلا في ثلاث" بمثل ما جعله يونس من قول ابن شهاب.

يعني قوله:"ولم أسمع يرخّص في شيء مما يقول الناس كذب إلا في ثلاث: الحرب، والإصلاح بين الناس، وحديث الرجل امرأته وحديث المرأة زوجها".

والصواب فيه: أنه من كلام الزهري، فإنه مدرج في الحديث كما نبَّه عليه الخطيب في الفصل لوصل المدرج في النقل (1/ 258 - 275)، والدارقطني في العلل (15/ 358).

وفي معناه ما روي عن أسماء بنت يزيد قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ولا يحل الكذب إلا في ثلاث، يحدث الرجل امرأته يُرضيها، والكذب في الحرب، والكذب ليُصْلِح بين الناس".

رواه الترمذي (1939) وأحمد (27570) كلاهما من حديث عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن شهر بن حوشب، عن أسماء بنت يزيد، فذكرته.

وشهر بن حوشب فيه كلام معروف، غير أنه حسن الحديث إذا لم يضطرب، وقد اضطرب في
هذا الحديث اضطرابا شديدا، فرواه مرة هكذا، وأخرى مرسلا لم يذكر فيه أسماء، كما قال الترمذي، وثالثة عن أبي هريرة، ورابعة عن النواس بن سمعان، واجتماع هذه الأمور تجعل حديثه ضعيفا، والأشبه بالصواب أن يكون مرسلا، والله تعالى أعلم.




উম্মে কুলসুম বিনতে উকবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: ঐ ব্যক্তি মিথ্যাবাদী নয়, যে মানুষের মাঝে মীমাংসা করে দেয়, আর সে কল্যাণের কথা বাড়িয়ে বলে অথবা ভালো কথা বলে।









আল-জামি` আল-কামিল (6285)


6285 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كلكم راع وكلكم مسئوول عن رعيته، والمرأة راعية في بيت زوجها، ومسؤولة عن رعيتها". .

متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (893) ومسلم في الإمارة (1829) كلاهما من حديث عبد الله بن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، عن سالم، عن عبد الله بن عمر فذكره في حديث طويل وهو مذكور في موضعه.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা প্রত্যেকেই দায়িত্বশীল এবং তোমাদের প্রত্যেককেই তোমাদের অধীনস্থদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসিত হতে হবে। আর নারী তার স্বামীর ঘরের দায়িত্বশীল, এবং সে তার অধীনস্থদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসিত হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6286)


6286 - عن جابر أن امرأة قالت: يا رسول الله، صلّ عليّ وعلى زوجي صلى الله عليك. فقال:"صلى الله عليك وعلى زوجكِ".

صحيح: رواه أبو داود (1533) وأحمد (15281) كلاهما من حديث أبي عوانة، عن الأسود بن قيس، عن نُبيح العنزي، عن جابر فذكره اختصره أبو داود واللفظ له، وأطاله أحمد، وإسناده صحيح، ونُبيح - مصغرا - ابن عبد الله العنزي ثقة، وثّقه أبو زرعة والعجلي، وذكره ابن حبان في"الثقات".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন মহিলা বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি আমার উপর এবং আমার স্বামীর উপর সালাত (দু'আ) বর্ষণ করুন। আল্লাহ আপনার উপর রহমত বর্ষণ করুন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহ আপনার উপর এবং আপনার স্বামীর উপর রহমত বর্ষণ করুন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6287)


6287 - عن عروة بن الزبير: أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أخبرته أن النكاح في الجاهلية كان على أربعة أنحاء: فنكاح منها نكاح الناس اليوم: يخطب الرجل إلى الرجل وليته أو ابنته، فيُصْدِقُها ثم ينكحها. ونكاح آخر: كان الرجل يقول لامرأته إذا طهرتْ من طمثها: أرسلي إلى فلان فاستبضعي منه، ويعتزلها زوجها ولا يمسها أبدا، حتى يتبين حملها من ذلك الرجل الذي تستبضع منه، فإذا تبين حملُها أصابها زوجها إذا أحب، وإنما يفعل ذلك رغبةً في نجابة الولد، فكان هذا النكاح نكاحَ الاستبضاع، ونكاح آخر: يجتمع الرهط ما دون العشرة، فيدخلون على المرأة كلهم يُصيبها، فإذا حملت ووضعت، ومرَّ عليها ليالي بعد أن تضع حملها، أرسلت إليهم، فلم يستطع رجل منهم أن يمتنع، حتى يجتمعوا عندها، تقول لهم: قد عرفتم الذي كان من أمركم، وقد ولدتُ، فهو ابنك يا فلان، تُسمي من أحبتْ باسمه فيلحق به ولدها، لا يستطيع أن يمتنع به الرجل، ونكاح الرابع: يجتمع الناس الكثير، فيدخلون على المرأة، لا تمتنع ممن جاءها، وهن البغايا، كن يَنْصِبْنَ على أبوابهن رايات تكون علمًا، فمن أرادهن، دخل عليهن، فإذا حملت إحداهن ووضعت حملها جمعوا لها، ودعوا لهم القافة، ثم ألحقوا ولدها بالذي يرون، فالتاطته به، ودعي ابنه، لا يمتنع من ذلك، فلما بعث محمد صلى الله عليه وسلم بالحق، هدم نكاح الجاهلية كله إلا نكاح الناس اليوم.

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5127) من طريق ابن وهب، وعنبسة - كلاهما عن يونس (هو ابن يزيد الأيلي)، عن ابن شهاب قال أخبرني عروة بن الزبير، فذكره.

وقولها:"فالتاطته" أي استلحقته به. وأصل اللّوط: اللصوق.



أَبْنَائِكُمُ الَّذِينَ مِنْ أَصْلَابِكُمْ وَأَنْ تَجْمَعُوا بَيْنَ الْأُخْتَيْنِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ … } [النساء: 23].

وقال تعالى: {وَلَا تَنْكِحُوا مَا نَكَحَ آبَاؤُكُمْ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ} [النساء: 22] وهذه السبعة من المهر، وتفاصيل ذلك ما يليه:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে জানিয়েছেন যে, জাহেলী যুগে বিবাহ (নিকাহ) চার প্রকার ছিল:

১. তার মধ্যে এক প্রকার বিবাহ আজকের দিনে প্রচলিত বিবাহের মতোই ছিল: যখন কোনো পুরুষ অন্য পুরুষের কাছে তার অধীনস্থ নারীকে বা কন্যাকে বিবাহের প্রস্তাব দিত, অতঃপর মোহর প্রদান করত এবং তাকে বিবাহ করত।

২. আরেক প্রকার বিবাহ ছিল: যখন কোনো পুরুষ তার স্ত্রীকে হায়িয (মাসিক) থেকে পবিত্র হওয়ার পর বলত: 'অমুকের কাছে লোক পাঠাও এবং তার কাছ থেকে গর্ভধারণের জন্য (বীর্য/বীজ) গ্রহণ করো।' আর তার স্বামী তাকে পরিত্যাগ করত এবং তার সাথে কখনো সহবাস করত না, যতক্ষণ না ঐ ব্যক্তি, যার কাছ থেকে সে গর্ভধারণের জন্য (বীজ) গ্রহণ করেছে, তার গর্ভ প্রকাশ পেত। যখন তার গর্ভ প্রকাশ পেত, তখন তার স্বামী ইচ্ছা করলে তার সাথে সহবাস করত। তারা কেবল উত্তম সন্তানের আগ্রহেই এরূপ করত। এই বিবাহকে 'নিকাহুল ইসতিবদা' (গর্ভধারণের জন্য বীজ গ্রহণের বিবাহ) বলা হতো।

৩. আরেক প্রকার বিবাহ ছিল: দশ জনের কম সংখ্যক পুরুষ একত্র হতো এবং তারা সবাই ঐ মহিলার কাছে যেত এবং তার সাথে সহবাস করত। অতঃপর সে যখন গর্ভবতী হতো এবং প্রসব করত, এবং প্রসবের পর যখন কিছু রাত অতিবাহিত হতো, তখন সে তাদের কাছে লোক পাঠাত। তাদের মধ্যে কেউ বিরত থাকতে পারত না, যতক্ষণ না তারা সকলে তার কাছে একত্র হতো। সে তাদের বলত: 'তোমরা তোমাদের ব্যাপারটি অবগত আছ, আমি সন্তান প্রসব করেছি। হে অমুক, এই সন্তান তোমার।' সে যার নাম পছন্দ করত, তার নাম উল্লেখ করত, আর সেই সন্তান তার সাথে সম্পর্কিত হয়ে যেত। সেই পুরুষ অস্বীকার করতে পারত না।

৪. আর চতুর্থ প্রকার বিবাহ ছিল: অনেক লোক একত্র হতো এবং সেই মহিলার কাছে যেত। যে আসত, তাকে সে বারণ করত না। এরাই ছিল ব্যভিচারিণী। তারা তাদের দরজায় নিশানা হিসেবে পতাকা টাঙিয়ে রাখত। যে তাদের চাইত, সে তাদের কাছে প্রবেশ করত। তাদের মধ্যে কেউ যখন গর্ভবতী হতো এবং সন্তান প্রসব করত, তখন তারা তার জন্য লোক জমায়েত করত এবং তাদের জন্য 'কাফা'দের (চেহারা দেখে বংশ নির্ধারণকারী) ডাকত। এরপর তারা যার প্রতি ইঙ্গিত করত, সেই পুরুষের সাথে তার সন্তানকে সম্পর্কিত করে দিত। সেই সন্তান তার সাথে সংযুক্ত হয়ে যেত এবং তাকে তার পুত্র বলে ডাকা হতো। সে তা অস্বীকার করতে পারত না।

অতঃপর যখন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্যসহ প্রেরিত হলেন, তখন তিনি জাহেলী যুগের এই সব বিবাহ প্রথা বাতিল করে দিলেন—তবে কেবল সেই বিবাহ প্রথাটি ব্যতীত, যা আজকের দিনে প্রচলিত আছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6288)


6288 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يجمع بين المرأة وعمتها، ولا بين المرأة وخالتها".

متفق عليه: رواه مالك في النكاح (20) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاري في النكاح (5109)، ومسلم في النكاح (33: 1408) كلاهما من طريق مالك، به، مثله. ورواه البخاري (5110)، ومسلم (35) كلاهما من طريق الزهري، عن قبيصة بن ذؤيب، عن أبي هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تُنكح العمةُ على بنت الأخ، ولا ابنةُ الأخت على الخالة" واللفظ لمسلم.

قال ابن شهاب:"فنُري خالة أبيها وعمة أبيها بتلك المنزلة".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মহিলাকে তার ফুফুর সাথে একত্রে বিবাহ করা যাবে না, আর না কোনো মহিলাকে তার খালার সাথে একত্রে বিবাহ করা যাবে।"

অন্য এক বর্ণনায় (যা ইমাম মুসলিমের শব্দ) আছে, তিনি (আবু হুরায়রা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ফুফুকে ভ্রাতুষ্পুত্রীর (ভাইয়ের মেয়ের) উপর বিবাহ করা যাবে না, আর না খালাকে ভাগিনীর (বোনের মেয়ের) উপর বিবাহ করা যাবে।"

ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "সুতরাং আমরা তার পিতার খালা এবং তার পিতার ফুফুকেও সেই একই মর্যাদার অন্তর্ভুক্ত মনে করি।"









আল-জামি` আল-কামিল (6289)


6289 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تنكح المرأة على عمتها أو خالتها.

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5108) عن عبدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا عاصم، عن الشعبي، سمع جابرا يقول: فذكره.

قال البخاري عقبه:"وقال داود وابن عون عن الشعبي، عن أبي هريرة".

وفي قول البخاري:"وقال داود وابن عون … الخ" إشارة منه إلى الاختلاف على الشعبي، وإخراجه حديث جابر دليل على ثبوته عنده، وأن الاختلاف المشار إليه لا يضر ولا يقدح، ولذلك قال الحافظ ابن حجر:"وهذا الاختلاف لم يقدح عند البخاري، لأن الشعبي أشهر بجابر منه بأبي هريرة".

وقال في موضع آخر:"والذي يظهر أن الطريقين محفوظان"، الفتح (9/ 161).

وهو كما قال كما في الحديث الآتي:




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নিষেধ করেছেন যে, কোনো নারীকে তার ফুফুর উপর অথবা তার খালার উপর বিবাহ করা হোক।









আল-জামি` আল-কামিল (6290)


6290 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن تُنكح المرأة على عمتها، أو العمة على ابنة أخيها، أو المرأة على خالتها، أو الخالة على ابنة أختها، ولا تُنكح الصغرى على الكبرى، ولا الكبرى على الصغرى.

صحيح: رواه أبو داود (2065) والترمذي (1126) والنسائي (3296) وابن أبي شيبة (4/ 246) وابن نصر المروزي في السنة (239) وابن الجارود (685) وصححه ابن حبان (4117) كلهم من حديث داود بن أبي هند حدثنا عامر الشعبي، عن أبي هريرة فذكره.

قال الترمذي:"حسن صحيح" وقال:"أدرك الشعبي أبا هريرة وروى عنه". سألت محمدا
عن هذا فقال: صحيح.

وقال الترمذي:"وروى الشعبي عن رجل، عن أبي هريرة". انتهى.

وحديث ابن عون، عن الشعبي، عن أبي هريرة رواه البيهقي (7/ 166) وقال:"وقد أخرج البخاري رواية عاصم الأحول، عن الشعبي، عن جابر بن عبد الله، إلا أنهم يرون أنها خطأ، وأن الصواب رواية داود بن أبي هند وعبد الله بن عون، عن الشعبي، عن أبي هريرة".

وردّه ابن التركماني فقال:"يحتمل أن الشعبي سمعه منهما أعني أبا هريرة وجابرًا، وهذا أولى من تخطئة أحد الطريقين، إذ لو كان كذلك لم يخرجه البخاري في صحيحه، على أن داود بن أبي هند اختلف عنه فيه، فرُويَ عنه، عن الشعبي كما ذكره البيهقي، وأخرجه مسلم من حديثه عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، ولا يلزم من كون الشيخين لم يخرجاه أن لا يكون صحيحا كما عرف".

ولحديث أبي هريرة طريق آخر وهو ما ساقه الترمذي في العلل الكبير (1/ 443 - 444) عن محمد بن العلاء، نا محمد بن الصلت، عن مندل، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

قال الترمذي: سألت محمدا عن هذا الحديث فقال:"مندل ضعيف الحديث، أنا لا أكتب حديثه"كأنه لم يعرف هذا الحديث من حديث الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة من غير هذا الوجه. انتهى.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যে, কোনো নারীকে তার ফুফুর সাথে (একই বিবাহ বন্ধনে) আনা যাবে না, অথবা ফুফুকে তার ভাইঝির সাথে; অথবা কোনো নারীকে তার খালার সাথে, অথবা খালাকে তার ভাগ্নীর সাথে। আর ছোটকে বড়র সাথেও বিবাহ দেওয়া যাবে না এবং বড়কেও ছোটর সাথে (একত্রে আনা) যাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (6291)


6291 - عن عبد الله بن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن تُزوج المرأة على عمتها، أو على خالتها.

صحيح: رواه الترمذي (1125) عن نصر بن علي، ثنا عبد الأعلى بن عبد الأعلى، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن أبي حريز، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

قال الترمذي:"أبو حريز اسمه: عبد الله بن حسين".

قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: ليس بصحيح، ولكن يحتمل أن يكون حسنا، فإن أبا حريز عبد الله بن حسين مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وسعيد بن أبي عروبة اختلط بآخره، ولكن رواه عنه عبد الأعلى بن عبد الأعلى قبل الاختلاط، وكذلك رواه أحمد (3530) عن روح، عن سعيد بن أبي عروبة، وروح هو ابن عبادة روى أيضا عن سعيد بن أبي عروبة قبل الاختلاط. كما أن سعيد بن أبي عروبة توبع، تابعه الفُضيل بن مبسرة، عن أبي حريز، رواه ابن حبان في صحيحه (4116) ولكنه زاد في آخره:"إنكن إذا فعلتنّ ذلك قطعتن أرحامكنّ" والفضيل بن ميسرة صدوق، وزيادته شاذة ثم يتابع عليها ولكن رواه أبو داود في مراسيله (197) عن عيسى بن طلحة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تنكح المرأة على قرابتها مخافة القطيعة. ورجاله بين ثقات وصدوق.

وأما ما روي عن ابن عباس" أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُجمع بين العمة والخالة، وبين الحالتين
والعمتين" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (2067) وأحمد (1878) كلاهما من حديث خُصيف عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وخصيف هو ابن عبد الرحمن الجزري مختلف فيه. ضقفه أحمد وقال:"روى أحاديث منكرة وقال النسائي:"ليس بالقوي". وقال أبو حاتم:"صالح يخلط، وتكلم في سوء حفظه".

وقال ابن حبان:"كان شيخا صالحا فقيها عابدا إلا أنه كان يخطئ كثيرا فيما يروي، يتفرد عن المشاهير بما لا يتابع عليه، وهو صدوق في روايته.

والخلاصة كما في التقريب"صدوق سيء الحفظ، خلط بآخره".

قلت: ومما انفرد به، وأخطأ قوله:"بين الخالتين والعمتين" فإنه لم يتابع عليه، وقد خالفه أبو حريز فرواه عن عكرمة، عن ابن عباس، ولم يذكر هذه اللفظة، فهي منكرة، وقد أشكل على أهل العلم فهم معناه. فكل فسّره بخلاف غيره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিষেধ করেছেন যে, কোনো নারীকে যেন তার ফুফুর উপর অথবা তার খালার উপর বিবাহ করা না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6292)


6292 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: لما فُتحت مكة على رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكر الحديث بطوله وفيه"ولا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها".

حسن: رواه أحمد (6681، 6712) وابن أبي شيبة (4/ 247) وعبد الرزاق (10750) والمروزي في السنة (245، 246) كلهم من حديث عمرو بن شعيب بإسناده.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.




তাঁর দাদা থেকে বর্ণিত, যখন মক্কা বিজিত হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন—এরপর তিনি পুরো হাদীসটি বর্ণনা করলেন এবং তাতে এ কথাটিও ছিল: "কোনো নারীকে তার ফুফুর ওপর (একই সাথে সতীন রূপে) অথবা তার খালার ওপর (একই সাথে সতীন রূপে) বিবাহ করা যাবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6293)


6293 - عن أبي سعيد الخدري قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى أن يجمع بين المرأة وخالتها، وبين المرأة وعمتها.

حسن: رواه ابن ماجه (1930) وأحمد (11637) وابن نصر المروزي في السنة (242) وابن أبي شيبة (4/ 646) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، عن يعقوب بن عبد الله بن عتبة، عن سليمان بن يسار، عن أبي سعيد الخدري فذكره في حديث طويل.

ومحمد بن إسحاق صرح بالتحديث عند المروزي، وهو حسن الحديث إذا صرح وهذا منه.

وفي معناه ما روي عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: لا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها.

رواه ابن حبان (5996) في سياق طويل من حديث سنان بن الحارث بن مصرف، عن طلحة بن مصرف، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكره.

وسنان بن الحارث ذكره المؤلف في"الثقات" (6/ 44) وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (4/ 254) ولم يقل فيه شيئا، فهو في عداد المجهولين، ولكن رواه البزار - كشف الأستار - (1436) والترمذي في العلل الكبير (1/ 441) والمروزي في السنة (250) كلهم من حديث كثير بن هشام، قال: حدثنا جعفر بن برقان، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم
عن نكاحين: أن تتزوج المرأة على عمتها، أو على خالتها.

قال البزار:"لا نعلم رواه عن الزهري هكذا إلا أبو جعفر، ولا عنه إلا كثير".

وقال الترمذي:"سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: هو غلط، إنما هو عن الزهري، عن قبيصة بن ذُؤيب، عن أبي هريرة".

قلت: رواية الزهري عن قبيصة، عن أبي هريرة في الصحيحين كما سبق.

وقال ابن أبي حاتم:"سألت أبي عن حديث رواه كثير بن هشام، عن جعفر بن برقان، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أنه نهى أن يجلس الرجل على مائدة يشرب عليها الخمر، وأن تنكح المرأة على عمتها، قال أبي: هذان الحديثان خطأ. يرويه عن جعفر، عن رجل، عن الزهري هكذا. وليس هذا من حديث الزهري. وأما حديث"نهى أن تنكح المرأة على عمتها، وعلى خالتها"، فإن عقيلا رواه عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله، وقبيصة بن ذؤيب، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم وهو أشبه، وأما قصة المائدة، فهو مفتعل، ليس من حديث الثقات" العلل (1/ 402 - 403).

قلت: آفة هذا الحديث جعفر بن برقان الكلابي وهو ثقة من ثقات المسلمين كما قال ابن عيينة، ولكنه مضطرب في حديث الزهري وقد نص على ذلك الإمام أحمد، وابن معين، والنسائي، وابن عدي، والعقيلي، وغيرهم من أئمة هذا الشأن. وقد خالفه في هذه الرواية الثقاتُ الضابطون فرووه عن الزهري عن قبيصة، عن أبي هريرة.

وفي الباب أيضا ما رُوي عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها".

رواه ابن ماجه (1931) عن جبارة بن المغلّس، قال: حدثنا أبو بكر النهشلي، قال: حدثني أبو بكر بن أبي موسى، عن أبيه قال: فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل شيخ ابن ماجه وهو جبارة بن المغلس فقد اتفق أئمة النقد على تضعيفه حتى قال الدارقطني:"متروك".

وفي الباب أيضا عن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها".

رواه أحمد (577) والبزار - كشف الأستار - (1434) وأبو يعلى (360) والمروزي في السنة (249) كلهم من حديث عبد الله بن لهيعة، ثنا عبد الله بن هبيرة، عن عبد الله بن رزين، عن علي بن أبي طالب فذكره.

قال البزار: لا نعلمه عن علي إلا بهذا الإسناد.

قلت: في الإسناد عبد الله بن لهيعة، وفيه كلام معروف.

وفي الباب أيضا عن عتاب بن أسيد وسعد بن أبي وقاص وغيرهما وكلها معلولة.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিষেধ করতে শুনেছি যে, যেন কোনো নারীকে তার খালা এবং কোনো নারীকে তার ফুফুর সঙ্গে একত্রে (বিবাহ বন্ধনে) রাখা না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6294)


6294 - عن عائشة قالت: وجدت في قائم سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم كتابًا:"إن أشد الناس عُتوّا من ضرب غير ضاربه، ورجل قتل غير قاتله، ورجل تولّى غير أهل نعمته، فمن فعل ذلك فقد كفر بالله ورسوله، لا يقبل الله منه صرفًا، ولا عدلًا، وفي الأجر المؤمنون تكافأ دماؤهم، ويسعى بذمتهم أدناهم، لا يُقتل مسلم بكافر، ولا ذو عهد في عهده، ولا يتوارث أهلُ ملتين، ولا تُنكح المرأة على عمتها، ولا على خالتها، ولا صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس، ولا تسافر المرأة ثلاث ليال مع غير ذي محرم".

حسن: رواه أبو يعلى (4757) والدارقطني (3/ 131) والحاكم (4/ 349) والبيهقي (8/ 29 - 30) والمروزي في السنة (248) كلهم من طرق عن عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، قال: سمعت مالك بن محمد بن عبد الرحمن، قال: سمعت عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة قالت: فذكرته واختصره البعض. قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: إسناده حسن من أجل عبيد الله بن عبد الله بن موهب فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তলোয়ারের খাপে একটি লেখা পেলাম: “নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সীমালঙ্ঘনকারী সে, যে আঘাত করে এমন ব্যক্তিকে, যে তাকে আঘাত করেনি; আর সে ব্যক্তি, যে হত্যা করে এমন ব্যক্তিকে, যে তাকে হত্যা করেনি; আর সে ব্যক্তি, যে আনুগত্য করে এমন কারো, যে তার প্রতি অনুগ্রহ করেনি। সুতরাং যে ব্যক্তি এমন কাজ করে, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের সাথে কুফরি (অকৃতজ্ঞতা বা অবাধ্যতা) করল। আল্লাহ তার কাছ থেকে কোনো নফল ইবাদত বা ফরয ইবাদত কিছুই কবুল করবেন না। আর (এতে আরও রয়েছে) মুমিনদের রক্ত সমান (পরস্পর সমান মূল্য রাখে), তাদের মধ্যেকার সর্বনিম্ন ব্যক্তিও তাদের পক্ষ থেকে নিরাপত্তা দিতে পারে, কোনো মুসলিমকে কোনো কাফিরের বিনিময়ে হত্যা করা হবে না, আর চুক্তিবদ্ধ কোনো ব্যক্তিকে তার চুক্তির মধ্যে থাকা অবস্থায় (হত্যা করা হবে না), দুই ভিন্ন ধর্মের অনুসারীরা একে অপরের উত্তরাধিকারী হবে না, কোনো নারীকে তার ফুফুর উপর বা তার খালার উপর বিবাহ দেওয়া যাবে না, আর আসরের পর সূর্য ডোবা পর্যন্ত কোনো সালাত (নামাজ) নেই, আর কোনো নারী যেন তিন রাতের দূরত্বে তার মাহরাম ছাড়া ভ্রমণ না করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6295)


6295 - عن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حدثتها أنها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم يا رسول الله! انكح أختي عزَّة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتحبين ذلك؟". فقالت: نعم، يا رسول الله! لست لك بمُخْلِية. وأحب من شركني في خير أختي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فإن ذلك لا يحل لي" قالت: فقلت: يا رسول الله! فإنا نتحدث أنك تريد أن تنكح دُرّة بنت أبي سلمة. قال:"بنت أبي سلمة؟" قالت: نعم. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو أنها لم تكن ربيبتي في حجري ما حلت لي. إنها ابنة أخي من الرضاعة، أرضعتني وأبا سلمة ثويبة. فلا تعرضنَّ علي بناتِكنَّ ولا أخواتِكنَّ".

متفق عليه: رواه مسلم في الرضاعة (16: 1449) عن محمد بن رمح بن المهاجر، أخبرنا الليث، عن يزيد بن أبي حبيب، أن محمد بن شهاب كتب يذكر أن عروة حدثه، أن زينب بنت أبي سلمة حدثته، أن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم وحدثتها فذكرته.

ورواه البخاري في النكاح (5107) من حديث الليث، عن عُقيل، عن ابن شهاب بإسناده نحوه ولم يسم"غَزّة". قال مسلم:"لم يُسم أحد منهم في حديثه"عزّة" غير يزيد بن أبي حبيب.



أيهما شئت".

رواه أبو داود (2243) والترمذي (1130) وابن ماجه (1951) والدارقطني (3/ 273) والبيهقي (7/ 184) وصحّحه ابن حبان (4155) كلهم من طريق وهب بن جرير، قال: حدثنا أبي، قال: سمعت يحيى بن أيوب، يحدث عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي وهب الجيشاني، عن الضحاك بن فيروز، عن أبيه فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن".

قلت: فيه الضحاك بن فيروز من تابعي أهل اليمن كان معروفا عند ابن معين وخليفة بن خياط.

ولكن قال البخاري كما في"تهذيب الكمال":"الضحاك بن فيروز، عن أبيه، روى عنه أبو وهب الجيشاني، لا يُعرف سماع بعضهم من بعض".

وأبو وهب الجيشاني قال البخاري في إسناده نظر، وقال ابن القطان:"مجهول".

ثم هو اضطرب، فمرة رواه هكذا، وأخرى عن أبي خراش الرُعيني، عن الديلمي. رواه ابن ماجه (1950) وأبو خراش"مجهول".

قال ابن عبد البر في"التمهيد" في إسناد هذا الحديث نظر. كذا قال البخاري. بل أحاديث هذا الباب كلها معلولة، وليست أسانيدها قوية" ذكره ابن التركماني في"الجوهر النقي".

ولكن يساندها عمل الخلفاء ففي مصنف ابن أبي شيبة (4/ 316) عن ابن علية، عن عوف، قال: ثنا أشياخ عمريين - من جلساء قيامة بن زهير أن هنّام بن عمير - رجلا من بني تيم الله - كان جمع بين أختين في الجاهلية. فلم يفرّق بين واحدة منهما حتى كان في خلافة عمر، أنه رُفِع شأنه إلى عمر، فأرسل إليه فقال:"اخترْ إحداهما، والله لئن قربت الأخرى لأضربن رأسك".

وإسناده ضعيف من أجل جهالة أشياخ عمريين، وقسامة بن زهير المازني وإن كان ثقة إلا أنه لم يدرك عمرَ بن الخطاب، وكذلك أشياخ لم يدركوا عمر بن الخطاب.

وكذلك رُوي عن علي في رجل أسلم وتحته أختان فقال:"لتفارقهما أو لأضربن عنقك" رواه عبد الرزاق (12630).

وقال الشافعي:"إذا أسلم وتحته أختان، خُيّر أيهما شاء، فإن اختار واحدة ثبت نكاحها، وانفسخ نكاح الأخرى، وسواء كان نكحها في عقدة أو عقدتين". ذكره الدارقطني (3/ 274).

وقال غيره:"إن كان في عقد واحد فهو كما قال الشافعي، وإن كان في عقدين مختلفين فتبقى التي عقد عليها أولا، وتنفسخ التي عقد عليها بعدها، ولا يخير، وأما الأولاد فهم يُلحقون به.



وهو التحريم.




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ছিলেন, তিনি তাঁকে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমার বোন আযযাকে বিবাহ করুন।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এটা পছন্দ করো?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো আপনার জন্য একা নই (অর্থাৎ আপনার প্রতি ঈর্ষান্বিতা নই)। আর যে আমার বোনের কল্যাণে আমার শরীক হবে, তাকে আমি পছন্দ করি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই এটা আমার জন্য হালাল নয়।"

তিনি (উম্মে হাবীবা) বললেন: আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা বলাবলি করছি যে আপনি আবূ সালামাহর কন্যা দুররাকে বিবাহ করতে চান।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আবূ সালামাহর কন্যা?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যদি আমার প্রতিপালিত না-ও হতো এবং আমার তত্ত্বাবধানে না-ও থাকতো, তবুও সে আমার জন্য হালাল হতো না। কারণ সে হলো আমার দুধভাইয়ের মেয়ে। সুওয়াইবা (নামক দাসী) আমাকে এবং আবূ সালামাকে দুধ পান করিয়েছিল। সুতরাং তোমরা তোমাদের কন্যাদের বা তোমাদের বোনদের আমার কাছে বিবাহের জন্য প্রস্তাব করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6296)


6296 - عن البراء بن عازب قال: لقيت عمي ومعه راية، فقلت له: أين تريد؟ قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى رجل نكح امرأة أبيه، فأمرني أن أضرب عنقه، وآخذ ماله.

صحيح: رواه أبو داود (4457) والنسائي (3332) وابن الجارود (681) والحاكم (4/ 357) ومن طريقه البيهقي (7/ 162) والدارقطني في"العلل" (6/ 22) كلهم من طريق زيد بن أبي أنيسة، عن عدي بن ثابت، عن يزيد بن البراء، عن أبيه فذكره.

وإسناده صحيح. وهذا الذي صوبه أبو حاتم وأبو زرعة كما في"العلل" (1/ 403) وقالا: وخاله: أبو بردة، ومنهم من يقول: عن عمه أبي بردة".

وأبو بردة هو ابن نبار - بكسر النون - صحابي اسمه هانئ، وقيل: الحارث بن عمرو، وقيل: مالك بن هبيرة.

وقد اختلف على عدي بن ثابت كما قال الترمذي (1362) بعد أن رواه عن أشعث، عن عدي بن ثابت، عن البراء قال: مرَّ بي خالي أبو بردة بن نبار، ومعه لواء فذكر الحديث. ومن هذا الوجه رواه أيضا ابن ماجه (2607).

وقال الترمذي:"حديث البراء حديث حسن غريب، وقد روي محمد بن إسحاق هذا الحديث عن عدي بن ثابت، عن عبد الله بن يزيد، عن البراء.

وقد رُوي هذا الحديث عن أشعث، عن عدي، عن يزيد بن البراء، عن أبيه.

ورُوي عن أشعث، عن عدي، عن يزيد بن البراء، عن خاله، عن النبي صلى الله عليه وسلم". انتهى كلام الترمذي.

وحديث عدي بن يزيد بن البراء رواه البيهقي (8/ 238).

وقد تبين من هذا أن أشعث وهو ابن سوار الكندي وهو ضعيف باتفاق أهل العلم - اضطرب في إسناده. فلا أدري هل الترمذي وقف على أسانيد أخرى أم لا؟

وكذلك ذكر الدارقطني في"العلل" (6/ 20) الاختلاف إلا أنه لم يرجح كما رجح أبو حاتم وأبو زرعة.

وللحديث إسناد آخر وهو ما أخرجه النسائي (3331) وابن حبان (4112) والحاكم (2/ 191) كلهم من حديث السدي، عن عدي بن ثابت، عن البراء وفيه: لقيت خالي أبا بردة فذكر الحديث.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

وقوله: عمي، وفي رواية خالي لا منافاة بينهما، فهو قد يكون عمه من جهة النسب، وخاله من جهة الرضاعة، وكون اسمه جاء صريحا بأنه الحارث بن عمرو، أو أبو بردة بن نيار فالظاهر أنه خاله لا عمه.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার চাচার সাথে সাক্ষাত করলাম। তাঁর সাথে একটি পতাকা ছিল। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, ‘আপনি কোথায় যাচ্ছেন?’ তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে এমন এক ব্যক্তির কাছে পাঠিয়েছেন, যে তার পিতার স্ত্রীকে বিবাহ করেছে। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন যেন আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই (বা তাকে মৃত্যুদণ্ড দেই) এবং তার সম্পদ গ্রহণ করি।









আল-জামি` আল-কামিল (6297)


6297 - عن البراء بن عازب قال: بينا أنا أطوف على إبل لي ضلّت، إذ أقبل ركب، أو
فوارس، معهم لواء. فجعل الأعراب يطوفون بي لمنزلتي من النبي صلى الله عليه وسلم إذ أتوا قبة. فاستخرجوا منها رجلًا فضربوا عنقه. فسألت عنه فذكروا أنه أعرس بامرأة أبيه.

صحيح: رواه أبو داود (4456) وأحمد (18609) والطحاوي في شرحه (3/ 149) وسعيد بن منصور (943) كلهم من حديث مطرف، عن أبي الجهم، عن البراء بن عازب فذكره مثله. إلا عند أحمد:"دخل بأم امرأته".

وإسناده صحيح. ومطرف هو ابن عبد الله الشخير، وأبو الجهم هو سليمان بن أبي الجهم مولى البراء.

وقد قيل: إن قوله تعالى: {وَلَا تَنْكِحُوا مَا نَكَحَ آبَاؤُكُمْ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ} [النساء: 22] نزل في منظور بن زبّان، خلف على امرأة أبيه، واسمها مليكة.

وقد قيل: وهو الذي أرسل إليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم خال البراء بن عازب في قتله.

وقيل: إنه غير ذلك، لأن منظور بن زبان بني في عهد أبي بكر الصديق، وإنه وجده في البحرين، فأقدمه المدينة، وفرق بينه وبين امرأة أبيه، وأراد عمر أن يقتله فحلف بالله أنه ما علم أن الله حرم ذلك فتركهـ.

وأعلّه المنذري في مختصر أبي داود بكثرة اختلافه، وسكت بدون بيان الترجيح.

وأهل العلم يعلمون أن كثرة المخارج لا تُعل الحديث، وقد روي عن بعض السلف: إذا ما جاء الحديث من مائة وجه ما فقهناه.

ولذا رد الحافظ ابن القيم على المنذري بعد أن ساق كلامه كاملًا. فقال: وهذا كله يدل على أن الحديث محفوظ، ولا يوجب هذا تركهـ بوجه. ثم قال: فأي علة في هذا توجب ترك الحديث؟ والحديث له طرق حسان يؤيد بعضها بعضا ثم ذكر هذه الطرق. انتهى ملخصا.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার হারিয়ে যাওয়া উট খুঁজতে বের হয়ে তা তাওয়াফ (ঘোরাফেরা) করছিলাম। হঠাৎ একদল আরোহী অথবা অশ্বারোহী আসলো, তাদের সাথে একটি ঝাণ্ডা ছিল। বেদুঈনরা আমার আশেপাশে ঘুরতে লাগল—নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমার মর্যাদার কারণে। যখন তারা একটি তাঁবুর কাছে পৌঁছাল, তখন সেখান থেকে একজনকে বের করে আনল এবং তার গর্দান কেটে দিল। আমি তার (পরিচয়) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, তখন তারা উল্লেখ করল যে, সে তার পিতার স্ত্রীকে বিবাহ করেছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (6298)


6298 - عن قرة قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى رجل تزوج امرأة أبيه، أن أضرب عنقه، وأُصفّي ماله.

حسن: رواه ابن ماجه (2608) والدارقطني (3/ 200) والبيهقي (8/ 208) كلهم من حديث عبد الله بن إدريس، عن خالد بن أبي كريمة، عن معاوية بن قرة، عن أبيه فذكره.

وإسناده حسن من أجل خالد بن أبي كريمة فإنه حسن الحديث.

وقد اختلف في علة قتله. فقيل: إنما هو زنا محصن فكل من نكح ذات محرم يقام عليه حد الزنا، الرجم أو الجلد وهو قول مالك والشافعي وصاحبي أبي حنيفة، ورواية عن الإمام أحمد.

وقال أبو حنيفة، وسفيان الثوري:"يعزر ولا يُجلد".

وقال أحمد:"يقتل على كل حال ويؤخذ ماله". وهي الرواية الثانية عنده أن النبي صلى الله عليه وسلم إنما أمر بقتله.

ولعل هذا يعود إلى استحلاله نكاح امرأة أبيه على رسم أهل الجاهلية.
فكان الرجل منهم يرى أنه أولى بامرأة أيه من الأجنبي فيرثها كما يرث ماله، وفاعل هذا مرتد عن الدين، فكان جزاؤه القتل لردته وأخذ ماله.




কুররা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এমন এক ব্যক্তির কাছে পাঠালেন, যে তার বাবার স্ত্রীকে বিবাহ করেছিল। (তিনি নির্দেশ দিলেন) যেন আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই (তাকে হত্যা করি) এবং তার সম্পদ বাজেয়াপ্ত করি।









আল-জামি` আল-কামিল (6299)


6299 - عن أم حبيبة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حدثتها أنها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله! انكح أختي عزّة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتحبين ذلك؟". فقالت: نعم، يا رسول الله! لست لك بمُخْلِية. وأحب من شركني في خير أختي! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فإن ذلك لا يحل لي" قالت: فقلت: يا رسول الله! فإنا نتحدث أنك تريد أن تنكح درة بنت أبي سلمة. قال:"بنت أبي سلمة؟" قالت: نعم. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو أنها لم تكن ربيبتي في حجري ما حلت لي. إنها ابنة أخي من الرضاعة، أرضعتني وأبا سلمة ثويبة. فلا تعرضنَّ عليَّ بناتكنَّ ولا أخواتكنَّ".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5107) ومسلم في الرضاعة (16: 1449) كلاهما من طريق محمد بن شهاب الزهري، أن عروة أخبره أن زينب بنت أبي سلمة أخبرته أن أم حبيبة قالت: فذكرته. وفي الآثار الأخرى أن حمزة أيضا ممن أرضعنه ثويبة.

فصار النبي صلى الله عليه وسلم وأبو سلمة وحمزة إخوة من الرضاعة.




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, বর্ণনা করেছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আমার বোন আয্‌যাকে বিবাহ করুন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এটা পছন্দ কর?" তিনি বললেন: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! (আপনার স্ত্রী হিসেবে) আমি আপনার জন্য একাকী নই (অন্য স্ত্রীরাও আছে)। আর আমি চাই যে আমার বোন আমার সাথে কল্যাণে শরীক হোক! তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিন্তু এটা আমার জন্য হালাল নয়।" তিনি বললেন: আমি তখন বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা তো আলাপ করি যে, আপনি আবূ সালামার কন্যা দুররাকে বিবাহ করতে চান। তিনি বললেন: "আবূ সালামার কন্যা?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে আমার লালন-পালনে থাকা আমার পালিতা কন্যা (রবীবা) না-ও হতো, তবুও সে আমার জন্য হালাল হতো না। কারণ সে হলো আমার দুধ-ভাইয়ের মেয়ে। সুওয়াইবা আমাকে ও আবূ সালামাকে দুধ পান করিয়েছেন। সুতরাং তোমরা তোমাদের কন্যাদেরকে অথবা তোমাদের বোনদেরকে আমার কাছে (বিয়ের জন্য) পেশ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6300)


6300 - عن عروة أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب عائشة إلى أبي بكر، فقال له أبو بكر: إنما أنا أخوك، فقال:"أنت أخي في دين الله، وكتابه، وهي لي حلال".

صحيح: رواه البخاري في النكاح (5081) عن عبد الله بن يوسف، حدثنا الليث، عن يزيد، عن عراك، عن عروة فذكره.

وصورته مرسل كما قال جماعة من أهل العلم منهم: الإسماعيلي والدارقطني وأبو نعيم وأبو مسعود وغيرهم. ولكن ظاهره أنه حمل ذلك عن خالته عائشة، أو عن أمه أسماء بنت أبي بكر.

ولذا قال ابن عبد البر:"إذا علم لقاء الراوي لمن أخبر عنه، ولم يكن مدلسا، حمل ذلك على سماعه ممن أخبر عنه ولو لم يأت بصيغة تدل على ذلك."انظر"الفتح"
رواه الترمذي (1117) عن قتيبة، حدثنا ابن لهيعة، عن عمرو بن شعيب بإسناده مثله.

قال الترمذي:"هذا حديث لا يصح من قبل إسناده، وإنما رواه ابن لهيعة والمثنى بن الصباح، عن عمرو بن شعيب. والمثنى بن الصباح وابن لهيعة بضعفان في الحديث".

وقال الحافظ في التلخيص (3/ 166) عقب قول الترمذي:"وقال غيره: يُشبه أن يكون ابن لهيعة أخذه عن المثنى، ثم أسقطه، فإن أبا حاتم قال: لم يسمع ابن لهيعة من عمرو بن شعيب".

ثم قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم، قالوا: إذا تزوج الرجل امرأة، ثم طلقها قبل أن يدخل بها حلّ له أن ينكح ابنتَها. وإذا تزوج الرجل الابنة، فطلّقها قبل أن يدخل بها لم يحل نكاح أمها لقوله تعالى: {وَأُمَّهَاتُ نِسَائِكُمْ} [النساء: 23] وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق.

وقد روى مالك عن غير واحد أن عبد الله بن مسعود استُفتي وهو بالكوفة عن نكاح الأم بعد الابنة إذا لم تكن الابنة مُسّت، فأرخص في ذلك، ثم إن ابن مسعود قدم المدينة فأل عن ذلك، فأخبر أنه ليس كما قال، وإنما الشرط في الربائب. فرجع ابن مسعود إلى الكوفة، فلم يصل إلى منزله حتى أتى الرجل الذي أفتاه بذلك، فأمره أن يفارق امرأته. مالك في النكاح (24).




উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: “আমি তো আপনার ভাই।” নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আপনি আল্লাহর দ্বীন ও তাঁর কিতাবের ক্ষেত্রে আমার ভাই, আর সে (আইশা) আমার জন্য হালাল।”

[এরপর হাদীসের যাচাই, বিভিন্ন সনদ ও ফিকহ বিষয়ক দীর্ঘ আলোচনা রয়েছে, যা মূল হাদীসের অংশ নয়।]