হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6301)


6301 - عن ابن عمر أن غيلان بن سلمة الثقفي أسلم وعنده عشر نسوة، فأمره النبي صلى الله عليه وسلم أن يمسك منهن أربعًا. فلما كان زمان عمر طلقهنَّ، فأمره عمر أن يرتجعهن. وقال: لو مت لورثتهن منك، ولأمرت بقبرك يرجم كما رجم قبر أبي رغال.

حسن: رواه النسائي كما ذكره الحافظ في التلخيص (3/ 169) ولم أجده في"الكبرى" ولا في"المجتبى" كما لم يذكره أيضا ابن الملقن في"البدر المنير" ورواه الدارقطني (3/ 271) والبيهقي (7/ 183) كلهم من طريق سيف بن عبد الله الجرمي، حدثنا سرّار بن مُجشّر أبو عبيدة العنزي، عن أيوب، عن نافع وسالم، عن ابن عمر فذكره واللفظ للدارقطني.

قال الحافظ:"رجاله ثقات". وقال الدارقطني في"العلل" (13/ 124): تفرد به سيف بن عبد الله، عن سرّار".

قلت: لا يضر تفرده، فإنه ثقة كما قال البزار في مسنده، وقال الذهبي: ثّقة صالح، ووثقه ابن حبان، وأما سرّار بن مجشّر أبو عبيدة فهو أيضا ثقة من أهل البصرة.

وأما ما رواه الترمذي (1128) وابن ماجه (1953) والإمام أحمد (4631) وصحّحه ابن حبان (4156) والحاكم (2/ 192 - 193) كلهم من طريق معمر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه أن غيلان بن سلمة الثقفي أسلم وتحته عشرُ نسوة فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"خذ منهن أربعا" فذكر الحديث
فهو معلول. والصحيح أنه مرسل، وهم فيه معمر فجعله موصولًا لأنه حدّث في العراق من حفظه فأخطأ، وإذا روى في اليمن من كتبه لم يقع منه الوهم. وهذا مما رواه في العراق.

قال الترمذي:"هكذا رواه معمر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه".

وسمعت محمد بن إسماعيل يقول: هذا حديث غير محفوظ. والصحيح ما روي شُعيب بن أبي حمزة، وغيرُه عن الزهري وحمزة قال: حُدثت عن محمد بن سويد الثقفي، أن غيلان بن سلمة أسلم وعنده عشر نسوة.

قال محمد (البخاري):"وإنما حديث الزهري، عن سالم، عن أبيه أن رجلًا من ثقيف طلّق نساءه. فقال له عمر: لتراجعنّ نساءك، أو لأرجمنَّ قبرك كما رُجم قبر أبي رغال". انتهى.

ورده ابن القطان في الوهم والإيهام (3/ 500) فبعد أن ذكر وجوه العلل على الزهري قال:"وهذا عندي غير مستبعد أن يحدث به على هذه الوجوه كلها، فيعلق كل واحد من الرواة عنه منها بما تيسر له حفظه، فربما اجتمع كل ذلك عند أحدهم، أو أكثر، أو أقله".

ثم قال:"والمتحصل من هذا، هو أن هذا حديث الزهري، عن سالم، عن أبيه، من رواية معمر في قصة غيلان صحيح، ولم يعتلَّ عليه من ضعّفه بأكثر من الاختلاف على الزهري فاعلمْ ذلك. انتهى.

قال الحافظ ابن حجر في التلخيص (3/ 169) معلقا على كلام ابن القطان:"ومما يقوي نظر ابن القطان أن الإمام أحمد أخرجه في مسنده عن ابن علية ومحمد بن جعفر جميعا عن معمر بالحديثين معا. حديثه المرفوع، وحديثه الموقوف على عمر. ثم ذكر لفظ الحديث.

قلت: وهو ما أخرجه الإمام أحمد (4631) حدثنا إسماعيل ومحمد بن جعفر، قالا: حدثنا معمر، عن الزهري. قال ابن جعفر في حديثه: أخبرنا ابن شهاب، عن سالم، عن أبيه، أن غيلان بن سلمة الثقفي أسلم، وتحته عشر نسوة. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"اختر منهن أربعا" فلما كان في عهد عمر طلّق ناءه، وقسم ماله بين بنيه. فبلغ ذلك عمر فقال: إني لأظن الشيطان فيما يسترق من السمع، سمع بموتك، فقفزه في نفسك، ولعلك أن لا تمكث إلا قليلا. وأيم الله لتراجعن نساءك، ولتراجعن في مالك، أو لأورثهن منك، ولأمرنّ بقبرك فيرجم كما رُجم قبر أبي رغال".

قال ابن حجر: الموقوف على عمر هو الذي حكم البخاري بصحته عن الزهري، عن سالم، عن أبيه بخلاف أول القصة. كان إنكار عمر على غيلان رجوعًا منه إلى عادات أهل الجاهلية بحرمان النساء من الميراث.

تنبيه: قوله: غيلان بن سلمة. وقد وقع في اسم هذا الرجل ثلاثة أقوال.

أحدها: أنه غيلان بن سلمة المذكور.

وثانيها: عروة بن مسعود (وحديثه في البيهقي (7/ 184) وفي إسناده محمد بن عبد الله الثقفي
لم يدرك عروة.

وثالثها: مسعود بن عبد ياليل بن عمرو بن عمرو بن عبيد.

ذكره الخطيب في الأسماء المبهمة (5/ 363) وابن الملقن في"البدر المنير" (7/ 610 - 611).

ونقل عن الأثرم قال: ذكرت لأبي عبد الله هذا الحديث فقال:"ما هو صحيح، هذا حديث معمر بالبصرة، فأسنده لهم، وقد حدث بأشياء بالبصرة أخطأ فيها، والناس يهمون. وقال: سألت الإمام أحمد عن هذا الحديث فقال:"ليس بصحيح والعمل عليه". انتهى.

وقال الترمذي عقب تخريج الحديث:"والعمل على حديث غيلان بن سلمة عند أصحابنا منهم: الشافعي وأحمد وإسحاق.

وأبو رغال - بكسر الراء - كان من ثمود. وكان بالحرم حين أصاب قومه الصيحة، فلما خرج من الحرم أصابه من الهلاك ما أصاب قومه فدفن هناك. وهو بين مكة والطائف. وكان عشارا في الزمن الأول فرجم الناس قبره.

قال جرير:"إذا مات الفرزدق فارجموه كما ترجمون قبر أبي رغال".

وأما ما يروي عن عبد الله بن عمرو يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول حين خرجنا معه إلى الطائف، فمررنا بقبر فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذا قبر أبي رغال، وكان بهذا الحرم يدفع عنه، فلما خرج أصابته النقمة التي أصابت قومه بهذا المكان فدفن فيه، وآية ذلك أنه دفن معه غُصن من ذهب، إن أنتم نبشتموه أصبتموه معه" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (3088) عن يحيى بن معين، حدثنا وهب بن جرير، حدثنا أبي قال: سمعت محمد بن إسحاق يحدث عن إسماعيل بن أمية، عن بجير بن أبي بجير، قال: سمعت عبد الله بن عمرو فذكره.

وفيه محمد بن إسحاق مدلس ولم يصرح ولكنه توبع. رواه الطحاوي في مشكله (3753) والبيهقي في الدلائل (6/ 296) وفي السنن (4/ 156) كلاهما من طريق روح بن القاسم، عن إسماعيل بن أمية بإسناده فذكره.

وله متابع آخر وهو معمر، عن إسماعيل بن أمية قال: مر النبي صلى الله عليه وسلم بقبره فذكره. رواه عبد الرزاق (20989) عنه إلا أن فيه إعضالا.

ومداره على بُجير بن أبي بجير، وهو لم يوثّقه أحد غير ابن حبان (4/ 82) وقد سبقه ابن معين فقال: لم أسمع أحدا يحدث عنه غير إسماعيل بن أمية. وقال مرة: لا أدري من هو؟ لا أعرفه. لذا قال ابن حجر فيه:"مجهول" وأما المزي فقال في ترجمته:"هو حديث حسن عزيز" لعله اعتمد على توثيق ابن حبان.

وسيأتي مزيد من الكلام في أخبار الأنبياء.
وقول النبي صلى الله عليه وسلم:"اختر منهن أربعا" استدل به الجمهور على تحريم الزيادة على أربع، هو مستفاد من قوله تعالى: {مَثْنَى وَثُلَاثَ وَرُبَاعَ} [النساء: 23].

والزيادة على أربع من اختصاص النبي صلى الله عليه وسلم قال الشافعي رحمه الله تعالى:"دلّت سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم المبينة عن الله أن انتهاءه إلى أربع تحريما منه، لا يجمع أحد غير النبي صلى الله عليه وسلم بين أكثر من أربع" ذكره البيهقي (7/ 139) وفي الباب أحاديث أخرى إلا أنها كلها معلولة.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, গাইলান ইবনু সালামাহ আস-সাকাফী ইসলাম গ্রহণ করেন, যখন তার অধীনে দশজন স্ত্রী ছিলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তাদের মধ্য থেকে চারজনকে বেছে নাও।" অতঃপর যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগ এলো, তখন তিনি তার স্ত্রীদের তালাক দিলেন এবং তার সম্পদ পুত্রদের মাঝে ভাগ করে দিলেন। এই সংবাদ উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছালে তিনি বললেন: "আমার মনে হচ্ছে, নিশ্চয় শয়তান কান পেতে যে খবর শোনে, তার মাধ্যমে তোমার মৃত্যুর খবর শুনে তোমার মনে (এই ধারণা) ঢুকিয়ে দিয়েছে, আর হয়তো তুমি অল্প সময়ই বাঁচবে। আল্লাহর কসম! তুমি অবশ্যই তোমার স্ত্রীদের ফিরিয়ে নেবে এবং অবশ্যই তোমার সম্পদের মাঝে প্রত্যাবর্তন করবে, অন্যথায় আমি তাদের তোমার সম্পত্তির ওয়ারিশ বানিয়ে দেব এবং তোমার কবরকে পাথর মেরে রজম করার আদেশ দেব, যেমন আবূ রিগালের কবরকে রজম করা হয়েছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (6302)


6302 - عن عبد الله بن مسعود قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليس لنا نساء، فقلنا: ألا نستخصي؟ فنهانا عن ذلك. ثم رخّص لنا أن ننْكح المرأة بالثوب إلى أجل. ثم قرأ عبد الله {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُحَرِّمُوا طَيِّبَاتِ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ} [سورة المائدة: 87].

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5075) ومسلم في النكاح (11: 1404) كلاهما من طريق إسماعيل (هو ابن أبي خالد)، عن قيس، قال: سمعت عبد الله يقول: فذكره. واللفظ لمسلم.

ولفظ البخاري نحوه غير أنه لم يقل:"إلى أجل".

وقيس هو ابن أبي حازم.

ومعنى الآية: إن المتعة كانت مباحة مشروعة في صدر الإسلام للسبب الذي ذكره ابن مسعود. ولكن أشار الترمذي (1122) إلى سبب آخر وهو ما رواه عن محمد بن غيلان، حدثنا سفيان بن عقبة أخر قبيصة بن عقبة، حدثنا سفيان الثوري، عن موسى بن عُبيدة، عن محمد بن كعب، عن ابن عباس قال: إنما كانت المتعة في أول الإسلام، كان الرجل يقدم البلدة، ليس له بها معرفة، فيتزوج المرأة بقدر ما يرى أنه يُقيم، فتحفظ له متاعه وتُصلح له شيئه حتى إذا نزلت الآية: {إِلَّا عَلَى أَزْوَاجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ} [المعارج: 30] قال ابن عباس:"فكل فرج سوى هذين فهو حرام". انتهى.

ورواه البيهقي (7/ 205) من طريق موسى بن عبيدة بإسناده وجاء فيه: وتُصلح له شأنه حتى نزلت هذه الآية: {حُرِّمَتْ عَلَيْكُمْ أُمَّهَاتُكُمْ} [النساء: 23] إلى آخر الآية. فنسخ الله عز وجل الأولى، فحُرمت المتعة. وتصديقها من القرآن {إِلَّا عَلَى أَزْوَاجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُمْ} [المعارج: 30] وما سوى ذلك من الفرج فهو حرام، ولكن إسناده ضعيف من أجل موسى بن عبيدة وهو الرَبذي ضعّفه جمهور أهل العلم.

وقال الترمذي:"إنما روي عن ابن عباس شيء من الرخصة في المتعة، ثم رجع عن قوله حيث أُخبرَ عن النبي صلى الله عليه وسلم.

وفيه دليل على أن ابن عباس رجع إلى قول الجمهور.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধে যেতাম, অথচ আমাদের সাথে কোনো স্ত্রী ছিল না। তখন আমরা বললাম: আমরা কি খাসী হয়ে যাব না? তখন তিনি আমাদেরকে তা করতে নিষেধ করলেন। অতঃপর তিনি আমাদেরকে নির্দিষ্ট মেয়াদের জন্য কাপড়ের বিনিময়ে নারীদের বিবাহ করার অনুমতি দিলেন। এরপর আব্দুল্লাহ (ইবনু মাসউদ) এই আয়াতটি পাঠ করলেন: "হে মুমিনগণ, আল্লাহ তোমাদের জন্য যে সকল পবিত্র বস্তু হালাল করেছেন, সেগুলোকে হারাম করো না এবং সীমালঙ্ঘন করো না। নিশ্চয় আল্লাহ সীমালঙ্ঘনকারীদের পছন্দ করেন না।" (সূরা আল-মায়িদাহ: ৮৭)।









আল-জামি` আল-কামিল (6303)


6303 - عن ابن مسعود قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فتطول غُربتنا. فقلنا: ألا
نستخصي يا رسول الله، فنهانا، ثم رخص أن نتزوج المرأة إلى أجل بالشيء، ثم نهانا عنها يوم خيبر، وعن لحوم الحمر الأهلية.

صحيح: رواه عبد الرزاق (14048) عن ابن عيينة، عن إسماعيل، عن قيس، عن عبد الله بن مسعود فذكره. وإسناده صحيح.

وكان الترخيص في المتعة قبل خبير.




ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে যুদ্ধ করতাম, ফলে আমাদের প্রবাস দীর্ঘ হতো। আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আমরা কি খাসি (বন্ধ্যা) হয়ে যাব না? তিনি আমাদের তা থেকে নিষেধ করলেন। এরপর তিনি নির্দিষ্ট সময়ের জন্য কিছু বিনিময়ের মাধ্যমে নারীকে বিবাহ করার অনুমতি দিলেন। এরপর খাইবারের দিন তিনি আমাদেরকে তা (মুতা বিবাহ) এবং গৃহপালিত গাধার গোশত খেতে নিষেধ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6304)


6304 - عن عبد الله بن مسعود قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن شباب، وليس لنا نساء، فقلنا: يا رسول الله ألا نستخصي؟ فنهانا عن ذلك.

صحيح: رواه أحمد (3706) عن يزيد، حدثنا إسماعيل، عن قيس، عن ابن مسعود فذكره.

ورواه مسلم (12: 1404) عن أبي بكر بن أبي شية، حدثنا وكيع، عن إسماعيل بإسناده مثله غير أنه لم يقل فيه:"نغزو".

وقد سبق أن الترخيص كان قبل خيبر، ويدل عليه أيضا قوله:"نحن شباب" وقد يكون ذلك في غزوة بني المصطلق التي وقعت في عام خمسة من الهجرة، وفيها غنم المسلمون غنائم كثيرة وأسروا، وكانت منها جويرية بنت الحارث. فأعتقها رسول الله صلى الله عليه وسلم، وتزوج بها وكان عتقها صداقُها.

ثم جاء النهي عن المتعة في غزوة خيبر كما تدل عليه أيضا الأحاديث الآتية، إلا أني لم أقف على أحد من أهل السير نص على ذلك، وقد أشار السهيلي في"الروض الأنف" إلى اختلاف تحريم نكاح المتعة فراجعه.

إلا أنه لم يأت بخبر يقين، والجمع الذي ذكره في تحريمها في غزوة خيبر لا يتفق مع الروايات الصحيحة عند الشيخين. راجع أيضا نصب الراية (3/ 178 - 179).




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যুবক অবস্থায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধে অংশ নিতাম, অথচ আমাদের সাথে কোনো স্ত্রীলোক ছিল না। তখন আমরা বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরা কি খাসি হয়ে যাব না? (অর্থাৎ, নিজেদের পুরুষত্বহানি ঘটাব না?) তিনি আমাদেরকে তা থেকে বারণ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6305)


6305 - عن علي بن أبي طالب، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن متعة النساء يوم خيبر، وعن أكل لحوم الحمر الإنسيّة.

متفق عليه: رواه مالك في النكاح (41) عن ابن شهاب، عن عبد الله والحسن ابْني محمد بن علي بن أبي طالب، عن أبيهما، عن علي بن أبي طالب، فذكره. ورواه البخاري في المغازي (4216)، ومسلم في النكاح (29: 1407) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

ورواه البخاري في النكاح (5115)، ومسلم (30: 1407) من طريق سفيان بن عينة، عن الزهري، به، مثله.




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন নারীদের মুত‘আ (সাময়িক বিবাহ) করতে এবং গৃহপালিত গাধার মাংস খেতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6306)


6306 - عن علي بن أبي طالب أنه سمع ابن عباس يُليّن في متعة النساء. فقال: مهلًا يا ابن عباس! فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عنها يوم خيبر، وعن لحوم الحمر الأهلية.

متفق عليه: رواه مسلم في النكاح (31: 1407) عن محمد بن عبد الله بن نمير، قال: حدثنا
أبي، حدثنا عبد الله، عن ابن شهاب، عن الحسن وعبد الله ابني محمد بن علي، عن أبيهما، عن علي فذكره.

ورواه البخاري في الحيل (6961) عن يحيى، عن عبيد الله بإسناده وفيه: إن ابن عباس لا يرى بمتعة النساء بأسًا فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عنها يوم خيبر، وعن لحوم الحمر الأهلية.

قال البخاري: وقال بعض الناس: إن احتال حتى تمتع فالنكاح فاسد. وقال بعضهم: النكاح جائز، والشرط باطل.

وفي صحيح مسلم: قال علي بن أبي طالب لابن عباس: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن متعة النساء يوم خيبر. رواه يونس، عن الزهري.




আলী ইবন আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইবন আব্বাসকে মহিলাদের মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) সম্পর্কে শিথিলতা প্রদর্শন করতে শুনলেন। তখন তিনি বললেন: "হে ইবন আব্বাস, ক্ষান্ত হও! নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খায়বারের দিনে তা (মুত'আ) এবং গৃহপালিত গাধার গোশত নিষিদ্ধ করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6307)


6307 - عن علي بن أبي طالب يقول لابن عباس: إنك رجل تائه، إن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن متعة النساء.

صحيح: رواه الطحاوي في شرحه (3/ 24) من طريق جويرية عن مالك، عن الزهري، أن عبد الله بن محمد بن علي بن أبي طالب، والحسن بن محمد بن علي أخبراه، أن أباهما أخبرهما، أنه سمع علي بن أبي طالب يقول ذلك فذكره.




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইবনে আব্বাসকে বলছিলেন: আপনি একজন পথহারা (বা: ভ্রান্ত) মানুষ। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নারীদের সাথে মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6308)


6308 - عن جابر بن عبد الله وسلمة بن الأكوع قالا: كنا في جيش، فأتانا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنه قد أذن لكم أن تستمتعوا فاستمتعوا". زاد مسلم:"يعني متعة النساء".

متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5117: 5118) من طريق سفيان، ومسلم في النكاح (13: 1405) من طريق شعبة - كلاهما عن عمرو بن دينار، قال: سمعت الحسن بن محمد يحدّث عن جابر بن عبد الله وسلمة بن الأكوع. فذكراه، واللفظ للبخاري.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ ও সালামাহ ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: আমরা একটি সেনাদলে ছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের কাছে আসলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদেরকে ইস্তিমতা’ (উপভোগ) করার অনুমতি দেওয়া হয়েছে। অতএব তোমরা তা উপভোগ করো।" মুসলিম-এর বর্ণনায় অতিরিক্ত রয়েছে: "অর্থাৎ মহিলাদের সাথে মুত'আ (সাময়িক বিবাহ)।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (6309)


6309 - عن سلمة بن الأكوع قال: رخص رسول الله صلى الله عليه وسلم عام أوْطاس في المتعة ثلاثا، ثم نهى عنها.

صحيح: رواه مسلم في النكاح (18: 1405) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا يونس بن محمد، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا أبو عُميس، عن إياس بن سلمة، عن أبيه، قال: فذكره.

وعام أوطاس وعام الفتح واحد، فإن أوطاسا هي غزوة حنين التي كانت بعد الفتح بيسير، وهي تسمى أيضا غزوة هوازن لأنهم أتوا لقتال رسول الله صلى الله عليه وسلم، فالتحليل والتحريم ينسب إليهما جميعا فقول من قال: استمتعنا في أوطاس يقصد به الفتح.




সালামা ইবনুল আকওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আওতাসের যুদ্ধের বছর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন [দিনের জন্য] মুত’আ (সাময়িক বিবাহ)-এর অনুমতি দিয়েছিলেন, অতঃপর তিনি তা নিষেধ করে দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6310)


6310 - عن سلمة بن الأكوع، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أيما رجل وامرأة أيم تراضيا بعشرتهما ثلاث ليال، فإن أرادا أن يتزايدا تزايدا، وإن أرادا أن يتشاركا شاركا".

صحيح: رواه الطبراني في"المعجم الكبير" (7/ 27) من طريق محمد بن عباد المكي، ثنا حاتم
ابن إسماعيل، عن ابن أبي ذئب، عن إياس بن سلمة بن الأكوع، عن أبيه، فذكره. وإسناده صحيح.

والحديث علقه البخاري في النكاح (5119) فقال:"وقال ابن أبي ذئب حدثني إياس بن سلمة بن الأكوع، به، ولفظه: أيما رجل وامرأة توافقا فيشرة ما بينهما ثلاث ليال، فإن أحبا أن يتزايدا أو يتشاركا تشاركا" فما أدري أَشيءٌ كان لنا خاصة، أم للناس عامة.

قال البخاري عقبه: وقد بيّنه علي عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه منسوخ.

قال الحافظ في الفتح (9/ 173):"وصله الطبراني، والإسماعيلي، وأبو نعيم من طرق عن ابن أبي ذئب".




সালামাহ ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে কোনো পুরুষ ও কোনো আইম (বিধবা, তালাকপ্রাপ্তা বা অবিবাহিতা) নারী যদি তিন রাতের জন্য তাদের সহাবস্থান নিয়ে সন্তুষ্ট হয়, তবে যদি তারা (সময়) বাড়াতে চায়, তারা বাড়াতে পারে, আর যদি তারা অংশীদারিত্ব করতে চায়, তবে তারা অংশীদারিত্ব করতে পারে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6311)


6311 - عن سبرة الجهني أنه أذن لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بالمتعة، فانطلقت أنا ورجل إلى امرأة من بني عامر، كأنها بكْرة عيْطاء، فعرضنا عليها أنفسنا. فقالت: ما تُعطي؟ فقلت: ردائي. وقال صاحبي: ردائي، وكان رداء صاحبي أجود من ردائي. وكنت أشبّ منه، فإذا نظرت إلى رداء صاحبي أعجبها، وإذا نظرت إلي أعجبتُها. ثم قالت: أنت ورداؤك يكفيني، فمكثت معها ثلاثًا. ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من كان عنده شيء من هذه النساء التي يتمتع، فليخلّ سبيلها".

صحيح: رواه مسلم في النكاح (19: 1406) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ليث، عن الربيع بن سبرة الجهني، عن أبيه سبرة، فذكره.

قوله:"كأنها بكرة عطاء" البكرة: الشابة القوية.

والعيطاء: هي الطويلة العنق في اعتدال وحسن قوام.




সিবরা আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) করার অনুমতি দিয়েছিলেন। তখন আমি ও অন্য একজন লোক বনু 'আমির গোত্রের এক মহিলার নিকট গেলাম। সে ছিল যেন একটি শক্ত-সামর্থ্য, দীর্ঘ গ্রীবার উটনীর মতো। আমরা তার কাছে নিজেদেরকে পেশ করলাম। সে বললো: তোমরা কী দেবে? আমি বললাম: আমার চাদর। আমার সঙ্গী বললো: আমার চাদর। আমার সঙ্গীর চাদর আমার চাদরের চেয়ে উন্নত মানের ছিল। আর আমি তার চেয়ে তরুণ ছিলাম। যখন সে আমার সঙ্গীর চাদরের দিকে তাকাতো, তা তার পছন্দ হতো; আর যখন সে আমার দিকে তাকাতো, আমাকে তার পছন্দ হতো। অতঃপর সে বললো: তুমি এবং তোমার চাদরই আমার জন্য যথেষ্ট। এরপর আমি তিন দিন তার সাথে থাকলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি এই মহিলাদের কাউকে মুত'আ হিসেবে গ্রহণ করেছে, সে যেন তার পথ মুক্ত করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6312)


6312 - عن الربيع بن سبرة، أن أباه غزا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فتح مكة. قال: فأقمنا بها خمس عشرة. (ثلاثين بين ليلة ويوم) فأذن لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في متعة النساء. فخرجت أنا ورجل من قومي، ولي عليه فضل في الجمال. وهو قريب من الدمامة. مع كل واحد منا بُرد. فبردي خَلَقٌ. وأما برد ابن عمي فبرد جديد. غضٌّ. حتى إذا كنا بأسفل مكة، أو بأعلاها فتلقتنا فتاة مثل البَكرة العَنَطْنطة. فقلنا: هل لك أن يستمتع منك أحدنا؟ قالت: وماذا تبذلان؟ فنشر كل واحد منا برده. فجعلت تنظر إلى الرجلين. ويراها صاحبي ينظر إلى عِطْفها. فقال: إن بُرد هذا خلَقٌ وبُردي جديدٌ غضٌّ. فتقول: برد هذا لا بأس به. ثلاث مرار أو مرتين. ثم استمتعت منها. فلم أخرج حتى حرمها رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه مسلم في النكاح (20: 1406) عن أبي كامل فضيل بن حُسين الجحدري، حدثنا بشر (يعني ابن مفضل) حدثنا عمارة بن غزية، عن الربيع بن سبرة فذكره.
وقوله:"الدمامة" - أي قبيح الصورة.

و"خلق" - أي قريب من البالي، وهو قديم.

و"العنطنطة" - طويلة القامة.




সাবরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে মক্কা বিজয়ে অংশ নিয়েছিলেন। তিনি বলেন: আমরা সেখানে পনেরো দিন (রাত ও দিন মিলিয়ে ত্রিশটি) অবস্থান করেছিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের নারীদের সাথে মুত'আ (অস্থায়ী বিবাহ)-এর অনুমতি দিলেন। তখন আমি এবং আমার গোত্রের একজন লোক বেরিয়ে পড়লাম। সৌন্দর্যের দিক থেকে আমি তার চেয়ে উত্তম ছিলাম এবং সে কিছুটা কদাকার ছিল। আমাদের প্রত্যেকের কাছে একটি করে চাদর ছিল। আমার চাদরটি ছিল পুরাতন (জীর্ণ), আর আমার গোত্রীয় লোকটির চাদর ছিল নতুন ও উজ্জ্বল। আমরা মক্কার নিম্নভাগে অথবা উচ্চভাগে পৌঁছালে এক দীর্ঘাঙ্গী, টাটকা যুবতী নারীর সাথে আমাদের সাক্ষাৎ হলো। আমরা বললাম: তুমি কি আমাদের কারো সাথে মুত'আ করতে প্রস্তুত আছো? সে বলল: তোমরা কী দিতে পারো? তখন আমাদের প্রত্যেকে তার চাদরটি বিছিয়ে ধরল। সে তখন দু'জনের দিকে তাকাতে লাগল। আমার সঙ্গী দেখল যে সে তার (নিজস্ব) পছন্দের দিকে ঝুঁকছে। তখন আমার সঙ্গী বলল: এর চাদরটি পুরাতন আর আমার চাদরটি নতুন ও উজ্জ্বল। তখন সে (নারীটি) বলল: এর চাদরটি (অর্থাৎ, বর্ণনাকারীর চাদরটি) মন্দ নয়। সে এই কথা তিনবার অথবা দুইবার বলল। অতঃপর আমি তার সাথে মুত'আ করলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মুত'আ হারাম ঘোষণা করার আগ পর্যন্ত আমি মক্কা ত্যাগ করিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (6313)


6313 - عن عبد الملك بن الربيع بن سبرة الجهني، عن أبيه، عن جده قال: أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بالمتعة عام الفتح، حين دخلنا مكة، ثم لم نخرج منها حتى نهانا عنها.

صحيح: رواه مسلم في النكاح (22: 1406) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا يحيى بن آدم، حدثنا إبراهيم بن سعيد، عن عبد الملك بن الربيع بن سبرة الجهني بإسناده فذكره.




সাবরাহ আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদেরকে মক্কা বিজয়ের বছর মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) করার আদেশ দিয়েছিলেন, যখন আমরা মক্কায় প্রবেশ করি, এরপর আমরা সেখান থেকে বের হইনি যতক্ষণ না তিনি আমাদেরকে তা থেকে নিষেধ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6314)


6314 - عن سيرة الجهني أنه كان مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أيها الناس، إني قد كنت أذنت لكم في الاستمتاع من النساء. وإن الله قد حرم ذلك إلى يوم القيامة، فمن كان عنده منهن شيء فليخلّ سبيله، ولا تأخذوا مما آتيتموهن شيئا".

وفي لفظ: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم قائما بين الركن والباب، وهو يقول: فذكره.

صحيح: رواه مسلم في النكاح (21: 1406) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حدثنا أبي، حدثنا عبد العزيز بن عمر، حدثني الربيع بن سبرة الجهني أن أباه حدثه، فذكره.

ولحديث سبرة الجهني أسانيد أخرى عند مسلم وغيره وخلاصته أن المتعة رُخّصت عام الفتح لأيام، ثم جاء التحريم إلى الأبد. هذا الذي يرويه جماعة من أصحاب الربيع بن سبرة الجهني.

وخالفهم عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز فجعل في حجة الوداع كما رواه ابن ماجه (1962) وأحمد (15345) وابن حبان (4147) والبيهقي (7/ 203).

وجعل البيهقي أن الوهم من عبد العزيز بن عمر لمخالفته رواية الجمهور عن الربيع بن سيرة بأن ذلك كان زمن الفتح.

قلت: وهو كما قال، فإن عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز الأموي وُصف بأنه كان يخطئ، وهذا من خطئه، وتنبه إليه مسلم، فساق الحديث من طريقه (21: 1406) ولم يذكر لفظه كاملًا، كما لم يذكر الزمن الذي ورد فيه هذا الحديث، وقد ذكر قبله وبعده أنه زمن الفتح.




সাবরাহ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে লোক সকল! আমি তোমাদেরকে নারীদের সাথে মুতা'আ (সাময়িক বিবাহ) করার অনুমতি দিয়েছিলাম। কিন্তু আল্লাহ তা'আলা কিয়ামত পর্যন্ত তা হারাম করে দিয়েছেন। সুতরাং যার কাছে তাদের মধ্য থেকে কেউ থাকে, সে যেন তাকে মুক্ত করে দেয়। আর তোমরা তাদেরকে যা কিছু দিয়েছিলে, তা থেকে কিছুই ফিরিয়ে নিও না।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রুকন (কা'বার কোণ) এবং দরজার মাঝখানে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখেছি, আর তিনি এ কথা বলছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6315)


6315 - عن عروة بن الزبير أن عبد الله بن الزبير قام بمكة فقال: إن ناسًا أعمى الله قلوبَهم كما أعمى أبصارهم يُفْتون بالمتعة - يُعرّض برجل - فناداه فقال: إنك لجِلْفُ جافٍ، فلعمري لقد كانت المتعة تفعل على عهد إمام المتقين (يريد رسول الله صلى الله عليه وسلم) فقال له ابن الزبير: فجرِّبْ بنفسك، فوالله لئن فعلتها لأرجمنك بأحجارك.

قال ابن شهاب: فأخبرني خالد بن المهاجر بن سيف الله، أنه بينما هو جالس عند رجل. فاستفتاه في المتعة. فأمره بها. فقال له ابن أبي عمْرة الأنصاري: مهلًا! قال: ما هي؟ والله لقد
فُعِلتْ في عهد إمام المتقين. قال ابن أبي عمرة: إنها كانت رخصة في أول الإسلام لمن اضطرّ إليها كالميتة والدم ولحم الخنزير، ثم أحكم الله الدين ونهي عنها.

صحيح: رواه مسلم في النكاح (27: 1406) عن حرملة بن يحيى، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، قال ابن شهاب: أخبرني عروة بن الزبير، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মাক্কায় দাঁড়িয়ে বললেন: কিছু লোক, যাদের অন্তরকে আল্লাহ তাআলা অন্ধ করে দিয়েছেন যেমন তাদের চোখকে অন্ধ করেছেন, তারা মুত'আর (অস্থায়ী বিবাহের) ফতোয়া দিচ্ছে – (তিনি একজন লোককে উদ্দেশ্য করে একথা বলছিলেন) – তখন সেই লোকটি তাকে ডেকে বললেন: তুমি তো রূঢ় ও শুষ্ক প্রকৃতির লোক। আমার জীবনের শপথ! মুত্তাকীদের ইমামের (তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বুঝিয়েছেন) সময়েও মুত'আ করা হতো। তখন ইবনুয যুবাইর তাকে বললেন: তুমি নিজেই চেষ্টা করে দেখো! আল্লাহর কসম, যদি তুমি তা করো, তবে আমি তোমার পাথর দিয়েই তোমাকে পাথর মেরে হত্যা করব (রজম করব)।

ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: খালিদ ইবনুল মুহাজির ইবনু সাইফুল্লাহ আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি এক ব্যক্তির কাছে বসেছিলেন। তখন তিনি (খালিদ) মুত'আ (অস্থায়ী বিবাহ) সম্পর্কে ফতোয়া চাইলেন। তখন সেই ব্যক্তি তাকে মুত'আ করার অনুমতি দিলেন। তখন ইবনু আবী আম্রাহ আল-আনসারী তাকে বললেন: থামুন! (ঐ ব্যক্তি) বললেন: কী হয়েছে? আল্লাহর কসম! মুত্তাকীদের ইমামের সময়েও তো তা করা হয়েছিল। ইবনু আবী আম্রাহ বললেন: এটি ইসলামের প্রথম দিকে কেবল তাদের জন্য অনুমতি ছিল যারা এতে বাধ্য হতো, যেমন মৃত জন্তু, রক্ত এবং শূকরের গোশত (খেতে বাধ্য হলে)। এরপর আল্লাহ দ্বীনকে সুপ্রতিষ্ঠিত করলেন এবং তা নিষিদ্ধ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6316)


6316 - عن ابن عمر قال: لما ولى عمر بن الخطاب، خطب الناس فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم أذن في المتعة ثلاثا، ثم حرمها. والله لا أعلم أحدا يتمتع وهو محصن إلا رجمتُه بالحجارة، إلا أن يأتيني بأربعة يشهدون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أحلها بعد إذ حرمها.

حسن: رواه ابن ماجه (1963) عن محمد بن خلف العسقلاني، قال: حدثنا الفريابي، عن أبان بن أبي حازم، عن أبي بكر بن حفص، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبان وهو ابن عبد الله بن أبي حازم الأحمسي الكوفي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، إذا لم يخالف، أو لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.

وأبو بكر بن حفص هو عبد الله بن حفص بن عمر بن سعد بن أبي وقاص الزهري، أبو بكر المدني، مشهور بكنيته من رجال الجماعة.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি (ইবনু উমর) বলেন, যখন উমার ইবনু খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খিলাফতের দায়িত্ব নিলেন, তখন তিনি জনগণের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: নিশ্চয় আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনবার মুত‘আ (সাময়িক বিবাহ)-এর অনুমতি দিয়েছিলেন, অতঃপর তিনি তা হারাম (নিষিদ্ধ) করে দেন। আল্লাহর কসম! আমি এমন কোনো ব্যক্তিকে জানি না যে মুহসান (বিবাহিত) হওয়া সত্ত্বেও মুত‘আ করে, আর আমি তাকে পাথর নিক্ষেপ করে রজম (পাথর মেরে মৃত্যুদণ্ড) করব না— তবে যদি সে আমার কাছে চারজন সাক্ষী নিয়ে আসে যারা সাক্ষ্য দেবে যে আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা হারাম করার পরে আবার হালাল করেছেন (তবে ভিন্ন কথা)।









আল-জামি` আল-কামিল (6317)


6317 - عن سالم بن عبد الله، أن رجلا سأل عبد الله بن عمر عن المتعة، فقال: حرام، قال: فإن فلانا يقول فيها. فقال: والله لقد عُلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حرّمها يوم خيبر، وما كنا مسافحين.

صحيح: رواه البيهقي (7/ 202) من طرق عن أبي العباس محمد بن يعقوب، أنبأ محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، أنبأ ابن وهب، أخبرني عمر بن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب، عن ابن شهاب قال: أخبرني سالم بن عبد الله فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله: إن فلانا يقول فيها كذا: هو ابن عباس.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক তাঁকে মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: তা হারাম। লোকটি বলল: অমুক ব্যক্তি তো এ ব্যাপারে অন্য কথা বলেন। তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! এটি অবশ্যই জানা আছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম খায়বার যুদ্ধের দিন তা নিষিদ্ধ করেছেন এবং আমরা ব্যভিচারী ছিলাম না।









আল-জামি` আল-কামিল (6318)


6318 - عن سالم بن عبد الله قال: أتي عبد الله بن عمر فقيل له، إن ابن عباس يأمر بنكاح المتعة، فقال ابن عمر: سبحان الله. ما أظن ابن عباس يفعل هذا. قالوا: بلي إنه يأمر به، فقال: وهل كان ابن عباس إلا غلامًا صغيرا إذ كان رسول الله صلى الله عليه وسلم.

ثم قال ابن عمر: نهانا عنها رسول الله صلى الله عليه وسلم وما كنا مسافحين.

حسن: رواه الطبراني في الأوسط (9291) عن هاشم بن مرثد قال: حدثنا المعاني بن سليمان، قال حدثنا موسى بن أعين، عن إسحاق بن راشد، عن الزهري، عن سالم بن عبد الله فذكره.

وإسناده حسن من أجل المعافي بن سليمان وهو الجزري فإنه حسن الحديث، سئل أبو زرعة عنه فذكره بجميل، وفي"التقريب":"صدوق".
وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 265):"رجاله رجال الصحيح خلا المعافي بن سليمان وهو ثقة".

وأما ما روي عن عبد الرحمن بن نُعيم، أو نعيم الأعرجي - قال: سأل رجل ابن عمر عن المتعة - وأنا عنده - متعة النساء، فقال: والله ما كنا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم زانين ولا مسافحين". فهو ضعيف.

رواه الإمام أحمد (5694) وأبو يعلى (5706) كلاهما من حديث عبد الله بن إياد بن لقيط، حدثنا إياد، عن عبد الرحمن بن نعيم، أو نعيم الأعرجي - شك أبو الوليد - شيخ أحمد - قال: سأل رجل فذكره.

وعبد الرحمن بن نُعيم ويقال: نُعيم الأزدي الأعرجي من رجال التعجيل (650) قال: فيه جهالة. قاله الحسيني.

وفي الباب ما رُوي أيضا عن أبي سعيد الخدري قال: كنا نستمتع على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم بالثوب".

رواه الإمام أحمد (11165) والبزار - كشف الأستار - (1441) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن زيد أبي الحواري قال: سمعت أبا الصديق، يحدث عن أبي سعيد الخدري فذكره.

قال البزار:"إنما كان الإذن في المتعة ساعة، أذن فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم نهى عنها، وحرّمها إلى يوم القيامة".

إسناده ضعيف من أجل زيد أبي الحواري العمي البصري، يقال: اسم أبيه مرة، وهو ضعيف باتفاق أهل العلم، إلا أن البزار والدارقطني كانا يحسنان الظن به، فقالا: صالح.

وأما قول الهيثمي في"المجمع" (4/ 264):"رواه أحمد والبزار، ورجال أحمد رجال الصحيح". فيشعر أن البزار رواه من غير طريق أحمد، والصحيح أنهما روياه من طريق واحد، ثم زيد العمي هذا ليس من رجال الصحيح، وإنما روي له أصحاب السنن فقط.

وفي الباب ما رُوي أيضا عن أبي هريرة قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، فنزلنا ثنية الوداع، فرأى رسول الله صلى الله عليه وسلم مصابيح، ورأى نساء يبكين، فقال:"ما هذا؟" فقيل: نساء تمتع بهن أزواجهن، ثم فارقوهن، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حرَّم أو هَدم المتعةَ النكاحُ، والطلاقُ، والعدةُ، والميراثُ".

رواه أبو يعلى (6625) وابن حبان في صحيحه (4149) والبيهقي (7/ 207) كلهم من طرق عن مُؤمل بن إسماعيل، حدثنا عكرمة بن عمار، قال: أخبرني سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.

وفيه مؤمل بن إسماعيل البصري مختلف فيه فوثّقه ابن معين والدارمي وابن حبان وقال ابن سعد:"ثقة كثير الغلط"، وقال الدارقطني:"ثقة كثير الخطأ" وقال البخاري:"منكر الحديث".

هذا مما لم يتابعه عليه أحدٌ، وهو إلى الضعف أقرب إذا انفرد.
وقد رُوي نحوه موقوفا على ابن مسعود، وفي إسناده الحجاج بن أرطاة. رواه البيهقي وغيره.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সালিম বিন আব্দুল্লাহ বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বলা হলো যে, ইবনে আব্বাস মুত‘আ বিবাহের (সাময়িক বিবাহ) নির্দেশ দেন। তখন ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সুবহানাল্লাহ! আমি মনে করি না যে ইবনে আব্বাস এমনটি করতে পারেন। লোকেরা বলল: হ্যাঁ, তিনি অবশ্যই এর নির্দেশ দেন। তখন তিনি (ইবনে উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ইবনে আব্বাস তো একজন ছোট বালক ছাড়া আর কিছু ছিলেন না। এরপর ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এটি (মুত‘আ) থেকে নিষেধ করেছেন, আর আমরা ব্যভিচারীও ছিলাম না।









আল-জামি` আল-কামিল (6319)


6319 - عن أبي الزبير قال: سمعت جابر بن عبد الله يقول: كنا نستمتع بالقبضة من التمر والدقيق الأيام على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر، حتى نهي عنه عمر في شأن عمرو بن حريث.

صحيح: رواه مسلم في النكاح (16: 1405) عن محمد بن رافع، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير فذكره.

وقصة عمرو بن حريث هي ما أخرجه عبد الرزاق (14029) عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: قدم عمرو بن حريث من الكوفة، فاستمتع بمولاة، فأتي بها عمر، وهي حبلى، فسألها، فقالت: استمتع بي عمرو بن حريث، فسأله، فأخبره بذلك أمرا ظاهرا. قال: فهلَّا غيرها، فذلك حين نهي عنها.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে কয়েকদিনের জন্য এক মুষ্টি খেজুর ও আটা দিয়ে মুতআ (সাময়িক বিবাহ) করতাম। অবশেষে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমর ইবনে হুরাইসের ঘটনার প্রেক্ষিতে তা নিষিদ্ধ করেন।

আর আমর ইবনে হুরাইসের ঘটনা হলো, আবূ যুবাইর জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শুনেছেন যে, আমর ইবনে হুরাইস কুফা থেকে আগমন করল এবং একজন ক্রীতদাসী নারীর সাথে মুতআ করল। তাকে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আনা হলো, যখন সে গর্ভবতী ছিল। তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন। সে বলল: আমর ইবনে হুরাইস আমার সাথে মুতআ করেছে। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জিজ্ঞেস করলেন। সেও খোলাখুলিভাবে বিষয়টি স্বীকার করল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘তুমি কেন তাকে স্থায়ীভাবে বিবাহ করলে না?’ আর এটাই হলো যখন মুতআ নিষিদ্ধ করা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (6320)


6320 - عن عاصم بن أبي نضْرة قال: كنت عند جابر بن عبد الله فأتاه آت فقال: ابن عباس وابن الزبير اختلفا في المستمتعين. فقال جابر: فعلناهما مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم نهانا عنهما عمر، فلم نَعُد لهما.

صحيح: رواه مسلم في النكاح (17: 1405) عن حامد بن عمر البكراوي، حدثنا عبد الواحد (يعني ابن زياد) عن عاصم، عن أبي نضرة، فذكره.

وفي الحديث دليل على أن جابر بن عبد الله لم يبلغه النسخ، وكذا ابن عباس، إلا أن الأخير ثبت رجوعه عنه، وإن لم يثبت رجوعه فهو للضرورة كما جاء في صحيح البخاري (5116) عن أبي جمْرة قال: سمعت ابن عباس: سئل عن متعة النساء فرخّص، فقال له مولى له: إنما ذلك في الحال الشديد، وفي النساء قلة، أو نحوه، فقال ابن عباس: نعم.

أو لعل ابن عباس فهم من تحريم النبي صلى الله عليه وسلم عند الاستغناء عنها، وإباحتها عند الحاجة، فكان يفتي بها ويقول، هي كالميتة والدم ولحم الخنزير، تباح عند الضرروة، وخشية العنت، ففهم الناس أنه أباحها إباحة مطلقة، وشبّبوا في ذلك بالأشعار، فلما رأى ذلك ابن عباس رجع إلى القول بالتحريم كما قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (3/ 345).

قلت: لأنه روى الطبراني في الكبير (10/ 315) عن سعيد بن جبير قال: قلت لابن عباس: هل تدري ما صنعت؟ وبما أفتيت، سارت بفتيك الركبان، وقالت فيه الشعراء.

قال: وما قالوا؟ قلت: قالوا:

قد قال لي الشيخ لما طال مجلسه … يا صاح هل لك في فتيان ابن عباس
هل لك في رخصة الأطراف … آنسة يكون مثواك حتى يصدر الناس

قال:"إنا لله وإنا إليه راجعون، لا والله ما بهذا أفتيتُ، ولا هذا أردتُ، ولا أحللت منها إلا ما أحل الله من الميتة ولحم الخنزير".

ولكن في الإسناد حجاج وهو ابن أرطاة، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (4/ 265) فقال: هو ثقة، ولكنه مدلس، وبقية رجاله الصحيح.

ثم اعلم أن متعة النساء كانت معروفة في الجاهلية فرخص فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم في بعض الغزوات كما سبق في حديث عبد الله بن مسعود، ثم منع عنها يوم خيبر، ثم رخص فيها عام الفتح وأوطاس كما سبق لفترة قصيرة، ثم نهى عنها نهيا عاما يوم الفتح قبل الخروج من مكة فهي حرام إلى قيام الساعة.

وقد أشار الشافعي إلى الأدوار التاريخية لمتعة النساء بقوله:

"لا أعلم شيئا أحله الله، ثم حرّمه، ثم أحله، ثم حرّمه إلا المتعة".

ثم استقر تحريمها إلى يوم القيامة، ولذا توعد عمر بن الخطاب أمير المؤمنين ربيعة بن أمية حين أخبرته خولةُ بنت حكيم أنه استمتع بامرأة، فحملت منه، فخرج عمر فزعًا يجر رداءه فقال: هذه المتعة، ولو كنت تقدمت فيها لرجمت.

رواه مالك في نكاح المتعة (44) عن عروة بن الزبير، أن خولة بنت حكيم دخلت على عمر بن الخطاب فأخبرته به.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আছিম ইবনে আবী নাদরাহ বলেন: আমি জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট ছিলাম। তখন একজন লোক তাঁর নিকট এসে বলল: ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুত'আ (সাময়িক বিবাহ) নিয়ে মতবিরোধ করেছেন। তখন জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তা (মুত'আ) করেছি। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের তা থেকে নিষেধ করলেন। এরপর আমরা তা আর করিনি।