আল-জামি` আল-কামিল
6321 - عن عبد الله بن عمر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن الشغار. والشغار أن يُزوّج الرجل ابنته على أن يُزوّجه الآخر ابنته. ليس بينهما صداق.
متفق عليه: رواه مالك في النكاح (24) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره. ورواه البخاري في النكاح (5112)، ومسلم في النكاح (57: 1415) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ورواه البخاري في الحيل (1960)، ومسلم في النكاح (58) من طريق عبيد الله بن عمر، عن نافع، به، مثله.
وفيه: قلت لنافع: ما الشغار؟ قال:"ينكح ابنة الرجل، ويُنْكحه ابْنته بغير صداق، وينكحُ أخت الرجل ويُنكحُه أخته بغير صداق".
فتبيّن بهذا أن تفسير الشغار في طريق مالك أنه من قول نافع، وبذلك جزم عبد الحق الإشبيلي في"الجمع بين الصحيحين" (2/ 388).
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিগার করতে নিষেধ করেছেন। আর শিগার হলো, একজন ব্যক্তি তার মেয়েকে এই শর্তে অন্যজনের কাছে বিবাহ দেবে যে, অন্যজন তার মেয়েকে এর বিনিময়ে এই প্রথম ব্যক্তির কাছে বিবাহ দেবে। তাদের উভয়ের মাঝে কোনো মোহর থাকবে না।
6322 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الشغار.
زاد ابن نُمير: والشغار أن يقول الرجل للرجل: زوِّجني ابنتك، وأزوّجك ابتي، أو زوّجني أختك، وأزوّجك أختي.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1416) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا ابن نمير وأبو أسامة، عن عبيد الله، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه النسائي (3338) من وجه آخر عن عبيد الله بإسناده وجاء فيه:
قال عبيد الله: والشغار كان الرجل يزوّج ابنته على أن يزوجه أختَه. فتبين من هذا أن هذا التفسير من عبيد الله، وليس هو بمرفوع، ولا من قول الصحابي.
ولم يقف عليه القرطبي فقال في"المفهم" (4/ 112).
"وقد جاء تفسير الشغار في حديث ابن عمر من قول نافع، وجاء في حديث أبي هريرة من كلام رسول الله صلى الله عليه وسلم وفي مساقه. وظاهره: الرفع إلى النبي صلى الله عليه وسلم ويحتمل أن يكون من تفسير أبي هريرة، أو غيره من الرواة، أعني: في حديث أبي هريرة. وكيفما كان فهو تفسير صحيح موافق لما حكاه أهل اللسان. فإن كان من قول رسول الله صلى الله عليه وسلم فهو المقصود، وإن كان من قول صحابي فمقبول، لأنهم أعلم بالمقال وأقعدُ بالحال".أهـ.
وأما قول أهل العلم في حكم نكاح الشغار فانظر"المنة الكبرى" (6/ 190 - 191).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ‘শিগার’ (বিনিময় বিবাহ) থেকে নিষেধ করেছেন। ইবনু নুমাইর (রাহিমাহুল্লাহ) অতিরিক্ত বর্ণনা করেন: আর ‘শিগার’ হলো, কোনো ব্যক্তি অন্য ব্যক্তিকে বলবে: তুমি আমার সাথে তোমার কন্যার বিবাহ দাও, আর আমি আমার কন্যার বিবাহ তোমার সাথে দেব; অথবা তুমি আমার সাথে তোমার বোনের বিবাহ দাও, আর আমি আমার বোনের বিবাহ তোমার সাথে দেব।
6323 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الشغار.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1417) من طريق حجاج بن محمد، وعبد الرزاق - فرقهما - كلاهما عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: فذكره.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিগার (বিনিময় বিবাহ) করতে নিষেধ করেছেন।
6324 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا شغار في الإسلام".
صحيح: رواه ابن ماجه (1885) عن الحُسين بن مهدي، قال: أنبأنا عبد الرزاق، عن معمر، عن ثابت، عن أنس فذكره. وكذا رواه أيضا ابن حبان في صحيحه (4154) عن عبد الرزاق.
ولكن رواه عبد الرزاق في مصنفه (10434) عن معمر، عن ثابت وأبان، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا شغار في الإسلام" والشغار أن يُبدل الرجلُ الرجلَ أخته بأخته بغير صداق. ولا إسعاد في الإسلام، ولا جلب في الإسلام، ولا جنَبَ.
فزاد في الإسناد أبان وهو ابن أبي عياش متروك. كذلك رواه الإمام أحمد (12686) عن عبد الرزاق مقتصرا على حديث"لا شغار في الإسلام".
وإسناده صحيح، بدون أبان بن عياش.
ولكن رواه أيضا الإمام أحمد (13032) عن عبد الرزاق، عن معمر، عن ثابت، عن أنس بطوله الذي ذكرته، ولم يذكر من الإسناد"أبان".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে শিগার (বিনিময় বিবাহ) নেই।"
6325 - عن عمران بن حصين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا شغار في الإسلام".
صحيح: رواه الإمام أحمد (19962) عن إبراهيم بن خالد، حدثنا رباح، عن معمر، عن ابن سيرين، عن عمران بن حصين فذكره.
وإسناده صحيح. ورباح هو ابن زيد القرشي مولاهم الصنعاني ثقة فأضل، وثّقه أبو حاتم والنسائي وغيرهما. وهو من رجال أبي داود والنسائي.
وللحديث طرق أخرى معللة:
منها: ما رواه النسائي (3591) وأحمد (19855) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أبي قزعة، عن الحسن، عن عمران بن حصين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا جلب، ولا جنب، ولا شغار" والحسن لم يسمع من عمران بن حصين. ورواه أبو داود الطيالسي في مسنده وقال: لا أحفظه عن شعبة مرفوعًا.
ومنها: ما رواه أيضا النسائي (3335) والترمذي (1123) من وجه آخر عن بشر بن المفضّل قال: حدثنا حميد، عن الحسن، عن عمران بن حصين فذكر مثله. وزاد فيه:"من انتهب نُهبة فليس منا".
ومنها: ما رواه أيضا النسائي (3336) عن محمد بن كثير، عن الفزاري، عن حميد، عن أنس فذكر الحديث مثله وقال:"هذا خطأ فاحش والصواب حديث بشر". انتهى.
قلت: والحسن البصري مدلس، ولم يسمع من عمران بن حصين إلا أنه توبع في الإسناد الأول، كما أنه توبع في قصة طويلة سبق ذكرها في كتاب المظالم في النهي عن النهبى.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ইসলামে শিগার (বিনিময় বিবাহ) নেই।"
6326 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا شغار في الإسلام".
حسن: رواه أحمد (7027) عن يعقوب وسعد قالا: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق - بعني محمدًا - حدثني عبد الرحمن بن الحارث، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق لأنه صرّح بالتحديث، كما أنه توبع.
وهو ما رواه أحمد (7012) من وجه آخر عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عباس بن أبي ربيعة بإسناده في سياق طويل وفيه:"ألا ولا شغار في الإسلام.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফায়সালা দিয়েছেন (এবং) বলেছেন: ইসলামে শিগার (বিয়ে) নেই।
6327 - عن العباس بن عبد الله بن عباس أنه أنكح عبد الرحمن بن الحكم ابنته، وأنكحه عبد الرحمن ابنته، وقد كانا جعلا صداقًا. فكتب معاوية بن أبي سفيان - وهو خليفة - إلى مروان يأمره بالتفريق بينهما. وقال في كتابه: هذا الشعار الذي نهى عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أبو داود (2075) ومن طريقه البيهقي (7/ 200) عن محمد بن يحيى بن فارس، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الرحمن بن هرمز الأعرج، أن العباس بن عبد الله بن عباس أنكح عبد الرحمن بن الحكم ابنته فذكره بقية القصة.
ورواه أيضا أحمد (1656) وابن حبان (44153) كلهم من طريق يعقوب بن إبراهيم به مثله - وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق وهو مدلس إلا أنه صرح فزالت تهمة التدليس.
وقوله:"وقد كانا جعلا صداقا" أي جعلا الشغار صداقة. ولكن إنْ أنكح ابنته وأنكحه ابنته مع الصداق فخرج من الشغار المنهي عنه.
আব্বাস ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস থেকে বর্ণিত, তিনি আব্দুর রহমান ইবনুল হাকামের সাথে তাঁর মেয়ের বিয়ে দিলেন, আর আব্দুর রহমানও তাঁর মেয়ের বিয়ে দিলেন। আর তারা উভয়েই মোহর ধার্য করেছিল। অতঃপর খলীফা মুআবিয়া ইবনে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারওয়ানের কাছে লিখলেন এবং তাদের দু'জনের মধ্যে বিচ্ছেদ ঘটানোর নির্দেশ দিলেন। এবং তিনি (মুআবিয়া) তাঁর চিঠিতে বললেন: এটিই সেই শিগার, যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিষেধ করেছেন।
6328 - عن نبيه بن وهب - أخي بني عبد الدار -: أن عمر بن عبيد الله أرسل إلى أبان بن عثمان - وأبان يومئذ أمير الحاج وهما محرمان -: إني قد أردت أن أنكح طلحةَ بنَ عمر بنت شيبة بن جبير وأردت أن تحضر، فأنكر ذلك عليه أبان وقال: سمعت عثمان بن عفان يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يَنكح المحرم، ولا يُنكح، ولا يخطب".
صحيح: رواه مالك في الحج (70) عن نافع، عن نبيه بن وهب، به، فذكره. ورواه مسلم في النكاح (1409) من طريق مالك، به.
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি ইহরাম অবস্থায় আছে, সে বিবাহ করবে না, অন্যকে বিবাহ দেবে না এবং বিবাহের প্রস্তাবও করবে না।”
6329 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يَنكح المحرم ولا يخطبُ، ولا يُخطبَ عليه، ولا يبع أحدُكم على بيع أخيه، ولا يخطبْ على خِطْبة أخيه حتى يأذن له".
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط (514) عن أحمد بن القاسم، ثنا محمد بن يوسف الغضيضي، قال: حدثنا عبد الله بن وهب، عن عمر بن محمد، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
وإسناده صحيح، إلا أن الهيثمي قال في"المجمع" (4/ 268):"رواه الطبراني في الأوسط عن أحمد بن القاسم، فإن كان أحمد بن القاسم بن عطية فهو ثقة، وإن كان غيره فلم أعرفه، وبقية رجاله لم يتكلم فيهم أحد".
قلت: أحمد بن القاسم هو ابن مساور الجوهري كما هو ظاهر من عمل الطبراني، فإنه بدأ مسند شيخه أحمد بن القاسم بن مساور قبل عدة أحاديث. فكيف خفي هذا على الحافظ الهيثمي.
ثم هو البغدادي ثقة له ترجمة في تاريخ بغداد (4/ 349) توفي سنة ثلاث وتسعين ومائتين كما أن شيخه محمد بن يوسف الغضيضي وبقية رجاله ثقات.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ইহরামকারী ব্যক্তি (বিবাহ) বন্ধনে আবদ্ধ হবে না, (বিবাহের) প্রস্তাব দেবে না এবং তার কাছে (বিয়ের) প্রস্তাবও দেওয়া হবে না। আর তোমাদের কেউ যেন তার ভাইয়ের বিক্রির উপর বিক্রি না করে, আর তোমাদের কেউ যেন তার ভাইয়ের বিবাহের প্রস্তাবের উপর প্রস্তাব না দেয়, যতক্ষণ না সে (প্রথম প্রস্তাবদাতা) তাকে অনুমতি দেয়।"
6330 - عن عائشة قالت: جاءت امرأة رفاعة إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: كنت عند رفاعة، فطلقني فبتّ طلاقي، فتزوجت عبد الرحمن بن الزبير، وإن ما معه مثل هدية الثوب، فتبسم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"أتريدين أن ترجعي إلى رفاعة، لا، حتى تذوقي
عُسيلتَه، ويذوق عُسيلتَكِ".
قالت: وأبو بكر عنده، وخالد بالباب ينتظر أن يؤذن له. فنادى: يا أبا بكر، ألا تسمعُ هذه ما تجهر به عند رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5260)، ومسلم في النكاح (111: 1433) كلاهما من طريق الزهري، قال أخبرني عروة بن الزبير، أن عائشة أخبرته، فذكرته واللفظ لمسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রিফা‘আর স্ত্রী নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তিনি বললেন, আমি রিফা‘আর কাছে ছিলাম, অতঃপর তিনি আমাকে তালাক দিলেন এবং আমার তালাককে চূড়ান্ত (বায়িন) করে দিলেন। এরপর আমি ‘আবদুর রহমান ইবনুয-যুবাইরকে বিয়ে করলাম। কিন্তু তার কাছে যা আছে তা কাপড়ের আঁচলের মতো (অত্যন্ত দুর্বল)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুচকি হাসলেন এবং বললেন, "তুমি কি রিফা‘আর কাছে ফিরে যেতে চাও? না। যতক্ষণ না তুমি তার (নতুন স্বামীর) মিষ্টতা আস্বাদন কর এবং সেও তোমার মিষ্টতা আস্বাদন করে।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এ সময় আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে ছিলেন, আর খালিদ দরজায় ছিলেন, প্রবেশের অনুমতির অপেক্ষা করছিলেন। তিনি (খালিদ) ডেকে বললেন, হে আবূ বকর! আপনি কি শুনছেন না, এ মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে কী জোরে জোরে প্রকাশ করছে?
6331 - عن عائشة قالت: طلّق رجلٌ امرأته ثلاثًا. فتزوجها رجل ثم طلّقها قبل أن يدخل بها، فأراد زوجُها الأول أن يتزوّجها. فسئلَ رسول الله عن ذلك صلى الله عليه وسلم فقال:"لا، حتى يذوق الآخرُ من عُسيلتها ما ذاق الأولُ".
متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5261)، ومسلم في النكاح (115: 1433) كلاهما من طريق عبيد الله بن عمر، قال: حدثني القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته، واللفظ لمسلم.
تنبيه: ورواه مالك في النكاح (18) عن يحيى بن سعيد، عن القاسم بن محمد، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها سئلت عن رجل طلّق امرأته البتة، فتزوجها بعده رجل آخر، فطلّقها قبل أن يمسّها، هل يصلُحُ لزوجها الأول أن يتزوجها؟ فقالت عائشة:"لا، حتى يذوق عسيلتَها".
هكذا رواه مالك موقوفا على عائشة، ولا تعارض بين الروايتين، فعائشة رضي الله عنها كانت تحدث به، وإذا سئلتْ تفتي به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি তার স্ত্রীকে তিন তালাক দিলো। অতঃপর আরেকজন পুরুষ তাকে বিবাহ করল, কিন্তু তার সাথে সহবাস করার পূর্বেই তাকে তালাক দিলো। তখন তার প্রথম স্বামী তাকে পুনরায় বিবাহ করতে চাইল। এই বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "না, যতক্ষণ না অন্যজন (দ্বিতীয় স্বামী) তার (স্ত্রীর) মিষ্টতা (যৌন স্বাদের) আস্বাদ গ্রহণ করে, যেমনটি প্রথমজন (স্বামী) আস্বাদ গ্রহণ করেছিল।"
6332 - عن عكرمة، أن رفاعة طلق امرأته، فتزوجها عبد الرحمن بن الزبير القرظي، قالت عائشة: وعليها خمار أخضر، فشكتْ إليها، وأرتها خضرة بجلدِها، فلما جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم والنساء ينصر بعضُهن بعضا، قالت عائشة:"ما رأيتُ مثل ما يلقى المؤمناتُ، لجلدُها أشدُّ خضرة من ثوبها. قال: وسمع أنها قد أتتْ رسول الله صلى الله عليه وسلم فجاء، ومعه ابنان له من غيرها. قالت: والله ما لي إليه من ذنب، إلا أن ما معه ليس بأغنى عني من هذه، وأخذت هدية من ثوبها. فقال: كذبتْ والله يا رسول الله، إني لأنفضها نفض الأديم، ولكنها ناشزٌ، تريد رفاعة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فإن كان ذلك لم تحِلّي له، أو: لم تصْلُحي له، حتى يذوقَ من عسيلتك". قال: وأبصر معه ابنين، فقال:"بنوك هؤلاء؟" قال: نعم، قال: هذا الذي تزعمين ما تزعمين، فوالله، لهم أشبه به من الغراب بالغراب".
صحيح: رواه البخاري في اللباس (5825) عن محمد بن بشار، حدثنا عبد الوهاب، أخبرنا أيوب، عن عكرمة، به.
تنبيه: تفرد به البخاري من هذا الوجه وبهذا السياق.
تنبيه آخر: جاء في النسخة التي بين أيدينا والذي عليها شرح ابن حجر:"قالت عائشة: وعليها خمار أخضر …" فهو صريح أنه مسند من حديث عائشة رضي الله عنها. ولكن وقع في الجمع بين الصحيحين للحميدي (4/ 32):"فأتت عائشة وعليها خمار أخضر" فساق الحديث ثم نقل عن أبي بكر البرقاني قوله:"هكذا رواه البخاري مرسلا عن بندار، وكذلك رواه حماد بن زيد، ووهيب عن أيوب مرسلا، وقد أسنده سويد بن سعيد، عن عبد الوهاب الثقفي فقال فيه:"عن ابن عباس:"أن رفاعة طلق امرأته، فتزوجها عبد الرحمن بن الزبير … وذكر الحديث اهـ.
لكن أعلّ ابن حجر رواية سويد، فقال في الفتح (10/ 282) إثر قوله:"قالت عائشة: وعليها خمار …" قال:"وفي قوله:"قالت عائشة ما يبين وهم رواية سويد، وأن الحديث من رواية عكرمة عن عائشة". اهـ.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রিফাআহ তার স্ত্রীকে তালাক দিলেন। এরপর আবদুর রহমান ইবনে যুবাইর আল-কুরাযী তাকে বিবাহ করেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেই মহিলার পরনে ছিল সবুজ ওড়না। সে তাঁর নিকট এসে অভিযোগ করল এবং নিজের চামড়ার সবুজ দাগ দেখালো। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এলেন এবং মহিলারা একে অপরকে সাহায্য করছিল, তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি মু'মিন নারীদের উপর যা কিছু ঘটে, তার মতো আর কিছু দেখিনি। তার (ঐ মহিলার) চামড়ার সবুজ দাগ তার পোশাকের চেয়েও বেশি গাঢ় ছিল। বর্ণনাকারী বলেন: (আবদুর রহমান) যখন শুনল যে সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসেছে, তখন সেও এল। তার সাথে তার অন্য স্ত্রীর গর্ভজাত দু’টি পুত্রসন্তান ছিল। মহিলাটি বলল: আল্লাহর কসম! তার প্রতি আমার কোনো অভিযোগ নেই, তবে তার কাছে যা আছে (অর্থাৎ তার পুরুষাঙ্গ), তা এই কাপড়ের ঝালর থেকেও আমার জন্য যথেষ্ট নয়। এই কথা বলে সে তার কাপড়ের একটি ঝালর ধরে দেখাল। তখন সে (আবদুর রহমান) বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আল্লাহর কসম, সে মিথ্যা বলেছে। আমি তো তাকে চামড়ার মতো পূর্ণ উদ্যমে সহবাস করি। কিন্তু সে বিদ্রোহী (নাশিয), সে রিফাআহকে চায়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: যদি এমনটিই হয়, তবে তুমি তার (প্রথম স্বামী রিফাআহর) জন্য হালাল হবে না—কিংবা বললেন, তার জন্য তুমি উপযোগী হবে না—যতক্ষণ না সে (তোমার বর্তমান স্বামী) তোমার মধু (অর্থাৎ সহবাসের স্বাদ) আস্বাদন করে। বর্ণনাকারী বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার সাথে দু’টি সন্তান দেখে বললেন: এরা কি তোমার পুত্র? সে বলল: হ্যাঁ। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এই সেই ব্যক্তি, যার সম্পর্কে তুমি যা বলছো, তা বলছো? আল্লাহর কসম, তারা তার (আবদুর রহমানের) সাথে কাকের সাথে কাকের সাদৃশ্যের চেয়েও বেশি সাদৃশ্যপূর্ণ।
6333 - عن ابن عباس: كان المشركون على منزلتين من النبي صلى الله عليه وسلم والمؤمنين، كانوا مشركي أهل حرب يقاتلهم ويقاتلونه، ومشركي أهل عهد لا يقاتلهم ولا يقاتلونه. وكان إذا هاجرتْ امرأة من أهل الحرب لم تُخطب حتى تحيض وتطْهر، فإذا طهرتْ حل لها النكاح، فإن هاجر زوجُها قبل أن تنكح رُدّت إليه، وإن هاجر عبد منه أو أمة فهما حُرّان، ولهما ما للمهاجرين، وإن هاجر عبد أو أمة للمشركين أهل العهد لم يردوا، ورُدّت أثمانهم.
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5286) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام، عن ابن جريج. وقال عطاء عن ابن عباس، فذكره.
وقوله في الإسناد:"وقال عطاء". قال ابن حجر: هو معطوف على شيء محذوف، كأنه كان في جملة أحاديث حدث بها ابن جريج عن عطاء، ثم قال: وقال عطاء". فتح الباري (9/ 418). تنبيه: وهذا الإسناد أعله أبو مسعود الدمشقي وغيره، ودافع عنه ابن حجر كما في المصدر المذكور.
عن ابن جريج به.
وممن رخّص في نساء أهل الكتاب عطاء بن أبي رباح، وطاوس، وسعيد بن المسيب، والحسن، والزهري، وسفيان الثوري، والشافعي، وأحمد، وهو قول عامة أهل المدينة، وعوام أهل الكوفة. انظر: الأوسط لابن المنذر (8/ 472).
وكان ابن عمر يكره نساء أهل الكتاب، وقد سئل عن نكاح النصرانية واليهودية فقال: إن الله حرّم المشركات على المؤمنين، ولا أعلم من الإشراك شيئا أكبر من أن تقول المرأة: ربها عيسى، وهو عبد من عباد الله.
رواه البخاري في الطلاق (5285) عن قتيبة، حدثنا الليث، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وذهب الجمهور إلى أن آية {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِكُمْ} مخصصة للآية التي في سورة البقرة {وَلَا تَنْكِحُوا الْمُشْرِكَاتِ حَتَّى يُؤْمِنَّ}.
ولكن يجوز لإمام المسلمين أن ينهي عن تزويج نساء أهل الكتاب سياسةً كما كتب عمر بن الخطاب أمير المؤمين إلى حذيفة الذي تزوّج يهودية أن يفارقها وقال: إني أخشى أن تدعوا المسلمات، وتنكحوا المؤسسات.
رواه البيهقي (7/ 172) من طريق علي بن الحسن قال: حدثنا عبد الله، عن سفيان قال: حدثنا الصلت بن بهرام قال: سمعت أبا وائل يقول: تزوج حذيفة يهودية فكتب إليه عمر بن الخطاب فذكره.
قال ابن المنذر: كراهية عمر بن الخطاب نكاحَهن ليس تحريم من عمر، ألا ترى أن في بعض ما رويناه من الأخبار أن حذيفة كتب إليه لما عزم عليه أن يطلقها أحرام هي؛ فقال: لا. وكذلك قول ابن عمر يدل على ذلك ألا تراه يقول: قد أكثر الله المسلمات، ولو كان نكاحهن حرام عند الله كان حراما بكل وجه كثرت المسلمات، أو لم يكثرن". انتهى.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মূর্তিপূজক (মুশরিক) লোকেরা নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং মুমিনদের সাথে দুই স্তরে বিভক্ত ছিল। তারা ছিল হয় যুদ্ধরত মুশরিক (আহলু হারব), যাদের সাথে তিনি যুদ্ধ করতেন এবং তারাও তাঁর সাথে যুদ্ধ করত; অথবা চুক্তিবদ্ধ মুশরিক (আহলু আহদ), যাদের সাথে তিনি যুদ্ধ করতেন না এবং তারাও তাঁর সাথে যুদ্ধ করত না।
যখন কোনো যুদ্ধরত মুশরিকদের এলাকার নারী হিজরত করে আসত, তখন সে ঋতুমুক্ত হয়ে পবিত্র না হওয়া পর্যন্ত তাকে বিয়ের প্রস্তাব দেওয়া হতো না। যখন সে পবিত্র হতো, তখন তার জন্য বিবাহ হালাল হতো। যদি সে বিবাহ করার আগে তার স্বামী হিজরত করে আসত, তবে তাকে তার স্বামীর কাছে ফিরিয়ে দেওয়া হতো।
আর যদি সেই (যুদ্ধরত) মুশরিকদের কোনো পুরুষ দাস বা নারী দাসী হিজরত করে আসত, তবে তারা স্বাধীন হয়ে যেত এবং হিজরতকারীদের জন্য যে মর্যাদা ছিল, তাদের জন্যও সেই মর্যাদা নির্ধারিত ছিল। পক্ষান্তরে, যদি চুক্তিবদ্ধ মুশরিকদের কোনো পুরুষ দাস বা নারী দাসী হিজরত করে আসত, তবে তাদের (মুশরিকদের কাছে) ফিরিয়ে দেওয়া হতো না, বরং তাদের মূল্য ফিরিয়ে দেওয়া হতো।
6334 - عن أبي الدرداء، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه أتي بامرأة مُجِحٍّ على باب فسطاط، فقال:"لعله يريد أن يلمّ بها؟" فقالوا: نعم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقد هممت أن ألعنه لعنًا يدخل معه قبره، كيف يورثه وهو لا يحل له، كيف يستخدمه وهو لا يحل له".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1441) عن محمد بن المثنى، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن يزيد بن خُمير، قال: سمعت عبد الرحمن بن جبير يحدث عن أبيه، عن أبي الدرداء، فذكره.
قوله:" مُجِح" - الحامل المقرب. وفيه بيان أن وطء الحبالى من السبايا لا يجوز حتى يضعن حملهن.
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি তাঁবুর দরজার সামনে একজন আসন্ন প্রসবের গর্ভবতী নারীকে আনা হলো। তখন তিনি বললেন: "সম্ভবত সে তার সাথে সহবাস করতে চায়?" লোকেরা বলল: হ্যাঁ। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তাকে এমন অভিশাপ দিতে চেয়েছিলাম যা তার কবরে তার সাথে প্রবেশ করবে। কীভাবে সে তার উত্তরাধিকারী হবে যখন সে (নারীটি) তার জন্য হালাল নয়? কীভাবে সে তাকে (সন্তানকে) ব্যবহার করবে যখন সে তার জন্য হালাল নয়?"
6335 - عن أبي سعيد الخدري، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين بعث جيشًا إلى أوطاس، فلقوا عدوّا فقاتلوهم، فظهروا عليهم، وأصابوا لهم سبايا، فكأن ناسًا من أصحاب
رسول الله صلى الله عليه وسلم تحرّجوا من غشيانهن من أجل أزواجهن من المشركين، فأنرل الله عز وجل في ذلك {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ} [النساء: 24] أي فهن لكم حلال إذا انقضت عدتهن".
صحيح: رواه مسلم في الرضاع (1456) عن عبيد الله بن عمر بن ميسرة القواريري، حدثنا يزيد بن زُريع، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن صالح أبي الخليل، عن أبي علقمة الهاشمي، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হুনাইনের যুদ্ধের দিন আওতাসের দিকে একদল সৈন্য প্রেরণ করলেন। তারা শত্রুর মোকাবেলা করলো এবং তাদের সাথে যুদ্ধ করলো। এরপর তারা তাদের ওপর বিজয়ী হলো এবং তাদের কিছু যুদ্ধবন্দিনী (দাসী) লাভ করলো। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীদের মধ্যে কিছু লোক মুশরিক স্বামীদের কারণে ঐ দাসীদের সাথে সহবাস করতে সংকোচ বোধ করলেন। তখন আল্লাহ্ তা'আলা এ বিষয়ে নাযিল করলেন: "আর নারীদের মধ্যে যারা বিবাহিত (তাদেরকে তোমাদের জন্য হারাম করা হয়েছে), তবে তোমাদের ডান হাত যাদের অধিকারভুক্ত করেছে (দাসী) তারা ব্যতীত।" (সূরা নিসা: ২৪) অর্থাৎ, যখন তাদের ইদ্দত শেষ হয়ে যাবে, তখন তারা তোমাদের জন্য হালাল।
6336 - عن ابن عباس قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن بيع المغانم حتى تُقسم، وعن الحبالى أن يُوطأن، حتى يضعن ما في بطونهن، وعن لحم كل ذي ناب من السباع.
حسن: رواه النسائي (4645) والدارقطني (3/ 68 - 69) والحاكم (2/ 137) كلهم من حديث أحمد بن حفص بن عبد الله، حدثني أبي، حدثني إبراهيم بن طهمان، عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن عمرو بن شعيب، عن عبد الله بن أبي نّجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السياقة".
قلت: إسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الإسناد.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন: গনীমতের মাল বন্টন করার পূর্বে বিক্রি করতে; এবং গর্ভবতী নারীদের (দাসীদের) সাথে সহবাস করতে, যতক্ষণ না তারা তাদের গর্ভের সন্তান প্রসব করে; আর সমস্ত হিংস্র প্রাণীর দাঁতওয়ালা (ক্যানাইন) অংশের গোশত খেতে।
6337 - عن رويفع بن ثابت الأنصاري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحل لامرئ يؤمن بالله واليوم الآخر أن يقع على امرأة من السبي حتى يستبرئها".
حسن: رواه أبو داود (2708) والترمذي (1131) وأحمد (16992) وابن حبان (4850) والبيهقي (7/ 449) وسعيد بن منصور في سننه (2722) كلهم من طرق عن رويفع فذكره في سياق أطول وهو مخرج في كتاب البيوع.
وقد زاد البعض فقال:"حتى يستبرئها بحيضة".
فقال أبو داود:"الحيضة" ليست بمحفوظة.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن وقد روي من غير وجه عن رويفع بن ثابت، والعمل على هذا عند أهل العلم لا يرون للرجل إذا اشترى جارية وهي حامل أن يطأها حتى تضع".
وفي الباب ما رُوي عن أبي سعيد الخدري أن النبي صلى الله عليه وسلم قال في سبي أوطاس: لا توطأ حامل حتى تضع، ولا غير ذات حمل حتى تحيض حيضة".
رواه أبو داود (2157) وأحمد (11596) والحاكم (2/ 195) والبيهقي (7/ 449) كلهم من طريق شريك، عن قيس بن وهب، عن أبي الوداك، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: بل إسناده ضعيف من أجل شريك وهو ابن عبد الله النخعي سيء الحفظ، وأما مسلم
فروى له مقرونا، وله أسانيد أخرى كلها تدور على شريك بن عبد الله.
وفي الباب أيضا عن عرباض بن سارية: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى أن توطأ السبايا حتى يضعن ما في بطونهن".
رواه الترمذي (1474، 1514) وأحمد (17153) كلاهما من حديث أبي عاصم، حدثنا وهب بن خالد الحمصي، حدثتني أم حبيبة بنت العرباض، قالت: حدثني أبي: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حرّم يوم خيبر كل ذي مخْلب من الطير، ولحوم الحمر الأهلية، والخليسة، والمجثمة، وأن توطأ السبايا حتى يضعن ما في بطونهن".
قال الترمذي:"حديث عرباض حديث غريب".
قلت: أي ضعيف، لأن فيه أم حبيبة بنت العرباض لم يوثّقها أحد، ولم يرو عنها إلا وهب بن خالد، فتكون هي"مجهولة العين".
রুওয়াইফি ইবনু সাবেত আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহ ও আখেরাতের প্রতি বিশ্বাস রাখে, তার জন্য কোনো যুদ্ধবন্দিনী (দাসী) নারীর সাথে ততক্ষণ পর্যন্ত সহবাস করা বৈধ নয়, যতক্ষণ না সে তার গর্ভাশয় পবিত্র করে নেয়।"
6338 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أن مَرْثد بن أبي مرثد الغنوي، وكان رجلًا شديدًا، وكان يحمل الأسارى من مكة إلى المدينة، قال: فدعوتُ رجلًا لأحملَه، وكان بمكة بغيٌّ يقال لها: عناق وكانت صديقتَه خرجتْ فرأتْ سوادي في ظل الحائط. فقالت: من هذا مَرْثد مرحبًا وأهلًا يا مرثد. انطلقِ الليلةَ فبتْ عندنا في الرحل. قلتُ يا عناق: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم حرّم الزنا. قالت: يا أهل الخيام، هذا الدُلْدُل الذي يحمل أُسراءكم من مكة إلى المدينة. فسلك الخَنْدمة فطلبني ثمانيةٌ، فجاؤوا حتى قاموا على رأسي، فبالوا فطار بولهم عليَّ وأعماهم الله عني، فجئتُ إلى صاحبي فحملتُه، فلما انتهيتُ به إلى الأراك، فككتُ عنه كَبْلَه، فجئتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول الله، أنكِح عناق؟ فسكت عني فنزلت {وَالزَّانِيَةُ لَا يَنْكِحُهَا إِلَّا زَانٍ أَوْ مُشْرِكٌ} [النور: 3] فقرأها علي وقال: لا تَنْكحها".
حسن: رواه أبو داود (2051) مختصرا، والنسائي (3228) والترمذي (6317) والطحاوي في مشكله (4552) والبيهقي (7/ 153) كلهم من حديث عبيد الله بن الأخنس، عن عمرو بن شعيب بإسناده فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من هذا الوجه".
و"الدُلْدُل": القنفذ الذي أكثر ما يظهر في الليل، ويُخفي رأسه.
و"الخندمة": جبل في ظهر أبي قيس كما قال الأزرقي
মারসাদ ইবনে আবি মারসাদ আল-গানাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ছিলেন অত্যন্ত শক্তিশালী একজন লোক। তিনি মক্কা থেকে মদীনায় বন্দীদের বহন করে নিয়ে আসতেন। তিনি বলেন: আমি একজনকে (বন্দীকে) ডেকেছিলাম তাকে বহন করে আনার জন্য। মক্কায় আন্নাক (عناق) নামে একজন পতিতা ছিল, যে ছিল তার পরিচিত। সে বেরিয়ে এসে প্রাচীরের ছায়ায় আমার কালো ছায়া দেখতে পেল। সে বলল, এ কে? মারসাদ! স্বাগতম হে মারসাদ! আজ রাতে তুমি চলো, আমাদের আস্তানায় রাত কাটাও। আমি বললাম, হে আন্নাক! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেনা (ব্যভিচার) হারাম করেছেন। সে তখন চিৎকার করে বলল, হে তাঁবুবাসীরা! এ হলো দুলদুল (যে লোক নিশাচর প্রাণীর মতো গোপনে চলাচল করে), যে তোমাদের বন্দীদের মক্কা থেকে মদীনায় নিয়ে যায়। তখন আমি খানদামাহ (নামক গিরিপথ) পথে প্রবেশ করলাম। আটজন লোক আমাকে খুঁজতে বের হলো। তারা এসে আমার মাথার ওপরে দাঁড়াল এবং পেশাব করল। তাদের পেশাবের ছিটা আমার ওপর এসে পড়ল, কিন্তু আল্লাহ তাদের আমাকে দেখতে পাওয়া থেকে অন্ধ করে দিলেন। আমি আমার সাথীর (বন্দীর) কাছে ফিরে এলাম এবং তাকে বহন করলাম। যখন তাকে নিয়ে 'আরাক' নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন তার বাঁধন (শিকল) খুলে দিলাম। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি কি আন্নাককে বিবাহ করব? তিনি আমার কথায় নীরব থাকলেন। এরপর নাযিল হলো: "ব্যভিচারী পুরুষ ব্যভিচারিণী নারী অথবা মুশরিক নারী ব্যতীত অন্য কাউকে বিবাহ করে না..." [সূরা নূর: ৩]। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এই আয়াত পড়ে শোনালেন এবং বললেন: "তুমি তাকে বিবাহ করবে না।"
6339 - عن عبد الله بن عمرو أن رجلًا من المسلمين استأذن رسول الله صلى الله عليه وسلم في امرأة يقال لها:"أم مهزول" وكانت تُسافح، وتشترط للرجل يتزوجها أن تكفيه النفقة، فاستأذن رسول الله صلى الله عليه وسلم، أو ذكر له أمرها. قال: فقرأ عليه نبي الله صلى الله عليه وسلم: {وَالزَّانِيَةُ لَا يَنْكِحُهَا إِلَّا زَانٍ أَوْ مُشْرِكٌ} [النور: 3].
حسن: رواه أحمد (6480) والحاكم (2/ 193 - 194) والبيهقي (7/ 153) كلهم عن معتمر بن سليمان، قال أبي: حدثنا الحضرمي، عن القاسم بن محمد، عن عبد الله بن عمرو فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
والحضرمي: هو القاصّ كان بالبصرة، وليس بحضرمي بن لاحق اليمامي. قال فيه ابن معين: ليس به بأس، وقال ابن عدي بعد أن ساق له ثلاثة من أحاديثه وهذا منها"أرجو أنه لا بأس به".
وأما قول ابن المديني بأنه مجهول فيحمل على قلة روايته.
وأما الحضرمي بن لاحق اليمامي الذي جاء في إسناد الحاكم فهو صدوق معروف.
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন মুসলিম ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে উম্মে মাহযূল নামে এক মহিলার বিষয়ে অনুমতি চাইলেন। সে ব্যভিচারিণী ছিল এবং সে তার বিবাহকারী পুরুষের উপর এই শর্তারোপ করত যে, তাকে যেন ভরণপোষণ দিতে না হয়। অতঃপর সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে (তাকে বিবাহের) অনুমতি চাইল, অথবা তার বিষয়টি তাঁর নিকট উল্লেখ করল। তিনি বলেন: তখন আল্লাহর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার সামনে তিলাওয়াত করলেন: "ব্যভিচারিণীকে ব্যভিচারী অথবা মুশরিক ছাড়া কেউ বিবাহ করে না।" (সূরা নূর: ৩)
6340 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا ينكح الزاني المجلود إلا مثله".
حسن: رواه أبو داود (2052) وأحمد (8300) والحاكم (2/ 166) ومن طريقه البيهقي (7/ 156) كلهم من حديث عبد الوارث، عن حبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث. وجوّد إسناده ابن عبد الهادي في تنقيح التحقيق (2/ 324).
وذكر الطحاوي في شرح مشكل الآثار (4550) والحاكم كلاهما من حديث يزيد بن زريع، حدثنا حبيب المعلم قال: قلت لعمرو بن شعيب: إن فلانا يقول: إن الزاني لا ينكح إلا زانية مثله. قال: وما يُعَجّبك من ذلك؟ حدثني سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: الزاني لا ينكح إلا زانية مثله، والمجلود لا ينكح إلا مجلودة مثله".
وفي الحديث دليل على أن المرأة يحرم عليها أن تتزوج بالزاني المجلود - أي بمن ظهر زناه - وكذلك يحرم على الرجل أن يتزوج بالمرأة المجلودة - أي بمن ظهر زناها - لقوله تعالى: {وَحُرِّمَ ذَلِكَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ} [النور: 3] أي إلا إذا تابوا يجوز يُزوج بعضُهم ببعض.
قال الإمام أحمد: لا يصح العقد من الرجل العفيف على المرأة البغي، ما دامت كذلك حتى تُستتاب، فإن تابتْ صحّ العقد عليها، وإلا فلا، وكذلك لا يصح تزويج المرأة الحرة العفيفة بالرجل الفاجر المسافح حتى يتوب توبة صحيحة". المغني (9/ 562).
ولكن ذهب سعيد بن المسبب إلى أن هذه الآية منسوخة بقوله تعالى بعده: {وَأَنْكِحُوا الْأَيَامَى مِنْكُمْ وَالصَّالِحِينَ مِنْ عِبَادِكُمْ وَإِمَائِكُمْ إِنْ يَكُونُوا فُقَرَاءَ يُغْنِهِمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ} [النور: 32].
ذكره ابن الجوزي في نواسخ القرآن (ص 405) بإسناده عن أبي داود السجستاني قال: ثنا وهب بن بقية، عن هُشيم، قال: أنبا يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب فذكره.
قال الشافعي:"القول كما قال ابن المسيب إن شاء". انتهي
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যভিচারীকে বেত্রাঘাত করা হয়েছে, সে তার অনুরূপ ব্যতীত অন্য কাউকে বিবাহ করে না।”