আল-জামি` আল-কামিল
6341 - عن جابر بن عبد الله قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أيما عبد تزوج بغير إذن سيده، فهو عاهر".
حسن: رواه أبو داود (2078) والترمذي (1111، 1112) وابن ماجه (1959) وصحّحه الحاكم (2/ 194) كلهم من حديث عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر فذكره إلا ابن ماجه فقال فيه"عن ابن عمر" وهو غير محفوظ.
قال الترمذي:"في الموضع الأول: حسن، وفي الموضع الثاني: حسن صحيح" وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الله بن محمد بن عقيل غير أنه حسن الحديث كما بينت في مواضع من الكتاب.
وأما ما روي عن ابن عمر مرفوعا مثله فهو ضعيف. رواه أبو داود (2079) عن عقبة بن مكْرم، حدثنا أبو قتيبة، عن عبد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
قال أبو داود:"هذا الحديث ضعيف، وهو موقوف، وهو قول ابن عمر".
قلت: لأن فيه عبد الرحمن بن عمر العمري وهو ضعيف باتفاق أهل العلم.
ورواه أيضا ابن ماجه (1960) عن محمد بن يحيى وصالح بن محمد بن يحيى بن سعيد، قالا: حدثنا أبو غسان مالك بن إسماعيل قال: حدثنا مندل، عن ابن جريج، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيما عبد تزوج بغير إذن مواليه فهو زان".
وفيه مندل وهو: ابن علي العنزي"ضعيف" كما في التقريب وشيخه ابن جريج مدلس، وقد عنعن.
وأما الموقوف على ابن عمر فهو ما رواه البيهقي (7/ 127) عن عبد الله بن نُمير، عن عبد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر أنه كان يرى أن نكاح العبد بغير إذن سيده زنا، يعاقب من زوّجه. وفيه عبد الله بن عمر العمري أيضا وهو ضعيف كما مضى.
والخلاصة أنه لا يصح عن ابن عمر مرفوعا ولا موقوفا.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে কোনো দাস তার মালিকের অনুমতি ছাড়া বিবাহ করবে, সে ব্যভিচারী।”
6342 - عن أنس أن عبد الرحمن بن عوف تزوج امرأة على وزن نواة، فرأى النبي صلى الله عليه وسلم بشاشة العُرس، فسأله، فقال: إني تزوجت امرأة على وزن نواة.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5148)، ومسلم في النكاح (82: 1427) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا عبد العزيز بن صهيب قال: سمعت أنسا يقول: فذكره.
وزاد البخاري من طريق عن قتادة، عن أنس: أن عبد الرحمن بن عوف تزوج امرأة على وزن نواة من ذهب.
ونواة: قيمتها خمسة دراهم.
وفي رواية قال أنس: فلقد رأيته قسّم لكل امرأة من نسائه بعد موته مائة ألف.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আব্দুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক মহিলাকে ‘নওয়াত’ (খেজুরের বীজ) পরিমাণ মোহরের বিনিময়ে বিবাহ করেছিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মধ্যে বিবাহের (আনন্দের) সজীবতা দেখতে পেলেন। তিনি তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, তখন তিনি বললেন: আমি ‘নওয়াত’ পরিমাণ মোহরের বিনিময়ে এক মহিলাকে বিবাহ করেছি।
(বুখারীর অন্য এক বর্ণনায়, কতাদাহ, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন যে,) আব্দুর রহমান ইবনে আওফ এক মহিলাকে স্বর্ণের ‘নওয়াত’ পরিমাণ মোহরের বিনিময়ে বিবাহ করেছিলেন।
আর ‘নওয়াত’ এর মূল্য হলো পাঁচ দিরহাম।
অন্য এক বর্ণনায় আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি তাঁকে (আব্দুর রহমান ইবনে আওফকে) দেখেছি, তাঁর মৃত্যুর পর তাঁর প্রত্যেক স্ত্রীকে এক লক্ষ (মুদ্রা) করে বণ্টন করে দেওয়া হয়েছিল।
6343 - عن سهل بن سعد قال: جاءت امرأة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله، جئتُ أهبُ لك نفسي. فنظر إليها رسول الله صلى الله عليه وسلم فصعّد النظر فيها وصوّبه، ثم طأطأ رأسه، فلما رأت المرأةُ أنه لم يقض فيها شيئا جلستْ، فقام رجلٌ من أصحابه فقال: يا رسول الله، إن لم يكنْ لك بها حاجة فزوّجنيها فقال:"هل عندك شيء؟" قال: لا والله يا رسول الله. قال:"اذهبْ إلى أهلك فانظرْ هل تجد شيئا؟" فذهب ثم رجع، فقال: لا والله، ما وجدت شيئا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"انظر ولو خاتما من حديد"، فذهب ثم رجع، فقال: لا والله يا رسول الله، ولا خاتما من حديد، ولكن هذا إزاري - قال سهل: ما له رداء - فلها نصفه. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما تصنع بإزارك، إن لبسته لم يكن عليها منه شيء، وإن لبسته لم يكن عليك منه شيء". فجلس الرجلُ حتى
إذا طال مجلسُه قام، فرآه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مولّيا، فأمر به فدعي له، فلما جاء، قال:"ما معك من القرآن؟" قال: معي سورة كذا، وسورة كذا عدّدها. فقال: تقرؤهن عن ظهر قلب؟ قال: نعم. قال: اذهب لقد ملّكتُكها بما معكَ من القرآن".
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5087) ومسلم في النكاح (1425) كلاهما عن قتيبة بن سعيد الثقفي، حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد الساعدي فذكره. ولفظهما سواء.
وفي لفظ مسلم:"انطلق فقد زوّجتكها، فعلِّمها من القرآن".
قال الترمذي بعد أن أخرج هذا الحديث:"هذا حديث حسن صحيح، وقد ذهب الشافعي إلى هذا الحديث فقال: إن لم يكن شيء يصدقها، فتزوجها على سورة من القرآن، فالنكاح جائزٌ، يُعلمها سورة من القرآن".
قال: وقال بعض أهل العلم:"النكاح جائز، ويجعل لها صداق مثلها. وهو قول أهل الكوفة وأحمد وإسحاق". انتهى.
وأما ما روي عن أبي هريرة نحو هذه القصة، لم يذكر الإزار والخاتم وقال فيه:"ما تحفظ من القرآن؟" قال: سورة البقرة، أو التي تليها. قال:"قم فعلِّمها عشرين آية، وهي امرأتك" فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2112) عن أحمد بن حفص بن عبد الله، حدثني أبي: حفص بن عبد الله، حدثني إبراهيم بن طهمان، عن الحجاج بن الحجاج الباهلي، عن عسل، عن عطاء بن أبي رباح، عن أبي هريرة فذكره.
وعسل هو: ابن سفيان التميمي اليربوعي أبو قرة البصري ضعيف. ضعّفه يحيى بن معين، والنسائي، وقال البخاري:"عنده مناكير" وقال أبو حاتم:"منكر الحديث"، وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال:"يُخطئ ويخالف على قلة روايته، وقال في"المجروحين":"كان قليل الحديث، كثير التفرد عن"الثقات" ما لا يُشبه حديث الأثبات على قلة روايته. ولا يتهيأ الاحتجاج بانفراد من لم يسلك سنن العدول في الروايات على قلة روايته، ودخوله في جملة الثقات إن أدخل فيهم، وهو ممن استخير الله فيه" أي أنه لم يطمئن على توثيقه.
সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলেন এবং বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি আমার নিজেকে আপনার নিকট হেবা (দান) করতে এসেছি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার দিকে তাকালেন, তাকে উপর থেকে নীচ পর্যন্ত দেখলেন, অতঃপর মাথা নিচু করলেন। যখন মহিলাটি দেখলেন যে তিনি তার বিষয়ে কোনো সিদ্ধান্ত দিলেন না, তখন তিনি বসে পড়লেন। তখন তাঁর সাহাবীদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি আপনার তাকে প্রয়োজন না হয়, তাহলে তাকে আমার সাথে বিয়ে দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার কি (মোহরানা দেওয়ার মতো) কোনো জিনিস আছে?" সে বলল: আল্লাহর কসম, না, ইয়া রাসূলুল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমার পরিবারের কাছে যাও এবং দেখো, কোনো কিছু পাও কি না?" সে গেল এবং ফিরে এসে বলল: আল্লাহর কসম, আমি কিছুই পাইনি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "খুঁজে দেখো, লোহার একটি আংটি হলেও।" সে গেল এবং ফিরে এসে বলল: আল্লাহর কসম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! লোহার আংটিও না। তবে এই হলো আমার তহবন্দ (লুঙ্গি) – সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তার কোনো চাদর ছিল না – এর অর্ধেক তার জন্য (মোহরানা হিসেবে)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমার তহবন্দ দিয়ে কী করবে? যদি তুমি তা পরিধান করো, তবে তার জন্য তা থেকে কিছুই থাকবে না; আর যদি সে পরিধান করে, তবে তোমার জন্য তা থেকে কিছুই থাকবে না।" তখন লোকটি বসে রইল। তার বসা দীর্ঘ হলে সে উঠে চলে যেতে লাগল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে ফিরে যেতে দেখে তাকে ডেকে আনার নির্দেশ দিলেন। যখন সে এল, তিনি বললেন: "তোমার সাথে (তোমার মুখস্থ) কুরআন কতটুকু আছে?" সে বলল: আমার সাথে অমুক অমুক সূরা আছে, সেগুলোর নাম উল্লেখ করল। তিনি বললেন: "তুমি কি সেগুলো মুখস্থ পড়তে পারো?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "যাও, তোমার মুখস্থ কুরআনের বিনিময়ে আমি তাকে তোমার মালিকানায় দিয়ে দিলাম (তোমার সাথে তার বিবাহ দিলাম)।"
6344 - عن أبي هريرة قال: جاء رجل إلى النبي فقال: إني تزوجت امرأة من الأنصار. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"هل نظرت إليها؟ فإن في عيون الأنصار شيئا" قال: قد نظرت إليها. قال:"على كم تزوجتها؟" قال: على أربع أواق فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"على أربع أواق، كأنما تَنْحتون الفضة من عُرض هذا الجبل، ما عندنا ما نعطيك، ولكن عسى أن نبعثك في بعث تصيب منه" قال: فبعث بعثًا إلى بني عبس. بعث ذلك الرجل فيهم.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (75: 1424) عن يحيى بن معين، حدّثنا مروان بن معاوية
الفزاري، حدثنا يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
وفيه كراهية إكثار المهر بالنسبة إلى حال الزوج.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমি আনসার গোত্রের একজন নারীকে বিবাহ করেছি। নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি তাকে দেখেছ? কেননা আনসারদের চোখে (দৃষ্টিতে) কিছু একটা থাকে।" সে বলল: হ্যাঁ, আমি তাকে দেখেছি। তিনি বললেন: "কত মোহরের বিনিময়ে তাকে বিবাহ করেছ?" সে বলল: চার উকিয়া (আওক্ব) মোহরের বিনিময়ে। নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "চার উকিয়া? তোমরা যেন এই পাহাড়ের পাশ থেকে রৌপ্য খোদাই করে নিচ্ছ! আমাদের কাছে এমন কিছু নেই যা আমরা তোমাকে দিতে পারি, তবে আশা করা যায় আমরা তোমাকে এমন কোনো অভিযানে পাঠাবো যেখান থেকে তুমি (কিছু সম্পদ) অর্জন করতে পারবে।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি (নাবী) বনু আবসের দিকে একটি যুদ্ধাভিযান পাঠালেন এবং সেই লোকটিকে তাদের সাথে পাঠালেন।
6345 - عن أبي هريرة قال: كان الصداق إذ كان رسول الله صلى الله عليه وسلم فينا عشرة أواق. وطبق بيديه وذلك أربع مائة.
صحيح: رواه النسائي (3348) وأحمد (8807) والدارقطني (3/ 222) وصحّحه ابن حبان (4097) والحاكم (2/ 175) كلهم من طريق داود بن قيس، عن موسى بن يسار، عن أبي هريرة. فذكره، واختصره البعض إلى قوله: عشرة أواق. وإسناده صحيح.
قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে ছিলেন, তখন মোহরানা ছিল দশ ‘আওয়াক্ব’ (ঊকিয়া)। আর তিনি নিজ দুই হাত দ্বারা ইশারা করলেন (বা চাপড়ালেন) এবং বললেন, এটাই হলো চারশত (দিরহাম)।
6346 - عن عقبة بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أحق الشروط أن توفوا بها ما استحللتم به الفروج".
صحيح: رواه البخاري في الشروط (2721) عن عبد الله بن يوسف، حدثنا الليث قال: حدثني يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر فذكره.
أي من المهور الخاصة.
وقد روي عن عامر بن ربيعة:"أن رجلًا من بني فزارة تزوج على نعلين. فأجاز النبي صلى الله عليه وسلم نكاحه".
رواه ابن ماجه (1888) والترمذي (1113) وأحمد (15676) والبيهقي (7/ 238 - 239) كلهم من حديث عاصم بن عبيد الله، عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل عاصم بن عبيد الله وهو العمري المدني ضعيف باتفاق من أهل العلم.
قال ابن أبي حاتم في"العلل" (1/ 44):"سألت أبي عن عاصم بن عبد الله فقال: منكر الحديث. يقال: إنه ليس له حديث يعتمد عليه. قلت: ما أنكروا عليه، قال: روي عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه أن رجلًا تزوج امرأة على نعلين فأجازه النبي صلى الله عليه وسلم وهو منكر".
ومع هذا قال الترمذي:"حسن صحيح".
وأما ما روي عن جابر بن عبد الله، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أعطى في صداق امرأة ملء كفيه سويقًا أو تمرًا فقد استحل" فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2110) عن إسحاق بن جبريل البغدادي، أخبرنا يزيد، أخبرنا موسى بن مسلم بن رومان، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
ورواه أيضا الدارقطني (3/ 243) والبيهقي (7/ 238) كلاهما من طريق يزيد - وهو ابن هارون بإسناده.
قال أبو داود:"ورواه عبد الرحمن بن مهدي، عن صالح بن رومان عن أبي الزبير، عن جابر موقوفًا".
قال عبد الحق:"لا يُعول على من أسنده".
وفي نصب الراية (3/ 200) قال الذهبي في"الميزان": إسحاق هذا (ابن جبريل) لا يُعرف، وضعّفه الأزدي.
ومسلم بن رومان يقال: إن اسمه، صالح وهو مجهول، روي عن أبي الزبير، وعنه يزيد بن هارون فقط". انتهى.
ولم أجد ترجمة إسحاق بن جبريل في"الميزان".
قلت: وقال الآجري: قال أبو داود:"أخطأ يزيد بن هارون فقال: موسى بن رومان".
قلت: الصواب، أنه صالح بن مسلم بن رومان كما قال الذهبي، فقد رواه يونس بن محمد، فسماه صالح بن مسلم بن رومان، قال: أخبرني أبو الزبير بإسناده ومن هذا الطريق رواه الإمام أحمد (14824) والدارقطني والبيهقي وغيرهم.
وصالح بن مسلم بن رومان هذا"مجهول" والصحيح عن جابر في هذا المعنى هو حديث المتعة. وهو مخرج في موضعه.
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, “যেসব শর্তের মাধ্যমে তোমরা স্ত্রী-জাতিকে তোমাদের জন্য হালাল করে নাও, সেগুলোই হচ্ছে পূর্ণ করার জন্য সর্বাধিক উপযুক্ত শর্ত।”
6347 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه قال: سألت عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم كم كان صداق رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قالت: كان صداقه لأزواجه ثنتي عشرة أوقيةً ونشّا. قالت: أتدري ما النشّ؟ قال: قلت: لا. قالت: نصف أوقية، فتلك خمسمائة درهم، فهذا صداق رسول الله صلى الله عليه وسلم لأزواجه.
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1426) من طريق يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن فذكره.
وقوله:"نشًّا" هو اسم لعشرين درهما، أو هو بمعنى النصف من كل شيء.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সালামাহ ইবনু আবদুর রহমান (রহ.) বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মোহর কত ছিল? তিনি বললেন: তাঁর স্ত্রীদের জন্য তাঁর মোহর ছিল বারো উকিয়াহ এবং এক নাশ। তিনি [আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)] জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কি জানো, নাশ কী? আবু সালামাহ বলেন: আমি বললাম: না। তিনি বললেন: তা হলো অর্ধেক উকিয়াহ। মোট মিলে তা ছিল পাঁচশ’ দিরহাম। আর এটাই ছিল তাঁর স্ত্রীদের জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মোহর।
6348 - عن أم حبيبة أنها كانت تحت عبيد الله بن جحش فمات بأرض الحبشة فزّوجها النجاشي النبي صلى الله عليه وسلم، وأمهرها عنه أربعة آلاف، وبعث بها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم مع شرحبيل بن حسنة. ولم يبعث إليها رسول الله صلى الله عليه وسلم بشيء، وكان مهر نسائه أربعمائة درهم.
قال أبو داود: حسنة هي أمه.
صحيح: رواه أبو داود (2107) والنسائي (3350) وأحمد (27408) والحاكم (2/ 181) والبيهقي (7/ 232) كلهم من حديث معمر، عن الزهري، عن عروة، عن أم حبيبة فذكرته.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وقد خولف على الزهري وهذا أصحها، وروي عنه مرسلًا.
وأما ما روي عن أبي سعيد الخدري:"أن النبي صلى الله عليه وسلم تزوج عائشة على متاع بيت، قيمته خسمون درهما". فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (1890) عن أبي هشام الرفاعي محمد بن يزيد، حدثنا يحيى بن يمان، حدثنا الأغر الرقاشي، عن عطية العوفي، عن أبي سعيد فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل عطية العوفي وهو ابن سعيد بن جنادة ضعّفه أبو زرعة وأبو حاتم والنسائي وغيرهم.
قلت: ومثله لا يُقبل إذا انفرد.
وأما ما رُوي عن أبي حدرد الأسلمي أنه أتى النبي صلى الله عليه وسلم يستعينُه في مهر امرأة فقال:"كم أمهرتَها؟" قال: مئتي درهم فقال:"لو كنتم تعرفون من بُطْحان ما زدتم" ففيه انقطاع.
رواه الإمام أحمد (15706) والطبراني في الكبير (22/ 352) والحاكم (2/ 178) وعنه البيهقي (7/ 235) كلهم من طرق عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي حدرد الأسلمي فذكره.
وفيه انقطاع، فإن محمد بن إبراهيم التيمي لم يسمع من أبي حدرد الأسلمي، كما نص عليه أهل العلم، بل قال أبو حاتم:"لم يسمع من جابر (ت 70 هـ) ولا من أبي سعيد، ولا من عائشة. وروي عن أنس حديثا واحدًا، ورأى ابن عمر. وذكر العلائي من أرسل عنهم، ولم يذكر أبا حدرد منهم.
وأما قول الهيثمي في"المجمع" (4/ 282): رواه أحمد والطبراني في الكبير والأوسط ورجال أحمد رجال الصحيح" فهو الحكم على الرجال، لا على الإسناد، فتنبه فقد اغتر به الكثير.
ومعنى الحديث: لو كان حصول الدراهم مثل ما تعرفون الماء بأيديكم لما كان لكم أن تزيدوا في المهور، فكيف وأنتم تحصلون الدراهم بالتعب والمشقة.
উম্মু হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু জাহাশের বিবাহবন্ধনে ছিলেন। এরপর তিনি আবিসিনিয়ার (হাবশা) ভূমিতে মারা যান। অতঃপর নাজাশী (বাদশাহ) তাঁকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিবাহ দেন এবং তাঁর পক্ষ থেকে তাঁকে চার হাজার (দিরহাম) মোহর প্রদান করেন। আর তাঁকে শুরাহবিল ইবনু হাসনাহর সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাঠিয়ে দেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে কোনো কিছু প্রেরণ করেননি। আর তাঁর (নবীজীর) স্ত্রীদের মোহর ছিল চারশত দিরহাম।
6349 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم غزا، فصلينا عندها صلاةَ الغداة بغلسٍ، فركب نبي الله صلى الله عليه وسلم وركب أبو طلحة، وأنا رديفُ أبي طلحةَ، فأجرى نبي الله صلى الله عليه وسلم في زقاق خيبر، وإنَّ ركبتي لتمسُّ فخذ نبي الله صلى الله عليه وسلم، ثم حسَر الإزار عن فخذه، حتى إني أنظرُ إلى بياض فخذ نبي الله صلى الله عليه وسلم، فلما دخل القرية قال:"الله أكبر خربتْ خيبر، إنا إذا نزلنا بساحة قومٍ، فساء صباحُ المنذرين". قالها ثلاثا، قال: وخرج القومُ إلى أعمالهم، فقالوا: محمد - قال عبد العزيز، وقال بعض أصحابنا: والخميس، يعني الجيش - فأصبناها عَنْوةً، فجُمعَ السبيُ، فجاء دحيةُ، فقال: يا نبي الله، أعطني جارية من السبْي، قال:"اذهبْ فخُذْ جاريةً" فأخذ صفيةَ بنت حُيَيّ، فجاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا نبيّ الله، أعطيتَ
دحيةَ صفيةَ بنت حيي، سيدةَ قريظة والنضير؟ لا تَصلح إلا لك، قال:"ادعُوه بها" فجاء بها، فلما نظر إليها النبي صلى الله عليه وسلم قال:"خُذْ جاريةً من السبْي غيرها، قال: فأعتقها النبي صلى الله عليه وسلم وتزوّجها. فقال له ثابت: يا أبا حمزة، ما أصدقها؟ قال: نفسها، أعتقها وتزوّجها، حتى إذا كان بالطريق جهّزتْها له أمُّ سُليم، فأهدتْها له من الليل، فأصبح النبي صلى الله عليه وسلم عروسًا فقال:"من كان عنده شيء فليجئْ به" وبسط نِطْعا، فجعل الرجل يجيء بالأقِط، وجعل الرجل يجيء بالتمر، وجعل الرجل يجيء بالسمن، قال: وأحسبه قد ذكر السويق، قال: فحاسوا حيْسا، فكانتْ وليمة رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (371)، ومسلم في النكاح (84: 1365) كلاهما من طريق إسماعيل ابن علية، حدثنا عبد العزيز بن صهيب، عن أنس فذكره.
وممن قال بهذا الحديث سفيان الثوري وأبو يوسف صاحب أبي حنيفة.
وقال غيرهم:"هذا خاص بالنبي صلى الله عليه وسلم لأن الله جعل له أن يتزوج بغير صداق، ولم يجعل ذلك لأحد من المؤمنين، قال تعالى: {وَامْرَأَةً مُؤْمِنَةً إِنْ وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِيِّ إِنْ أَرَادَ النَّبِيُّ أَنْ يَسْتَنْكِحَهَا خَالِصَةً لَكَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ} [الأحزاب: 50] وهو قول أبي حنيفة.
وقوله:"العروس": يطلق على الزوج والزوجة جميعا.
وفيه جواز الوليمة بغير الشاة.
والحيس: هو نوع من الطعام بصنع من الأقط والتمر والسمن يخلط ويُعجن، وربما يخلط فيه أيضا السويق.
وفيه أيضا: إن وليمة العرس تكون بعد الدخول، ويجوز قبله أيضا بدون خلاف.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার যুদ্ধে গেলেন। আমরা সেই অবস্থায় ভোরের (ফজরের) সালাত আদায় করলাম যখন সবেমাত্র রাত শেষ হয়ে আসছিল (গলাস)। অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরোহণ করলেন এবং আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও আরোহণ করলেন, আর আমি ছিলাম আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পেছনে আরোহী। অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বারের সংকীর্ণ গলির মধ্যে দ্রুত চলছিলেন। আমার হাঁটু আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উরুকে স্পর্শ করছিল। এরপর তিনি তাঁর লুঙ্গি উরু থেকে সরিয়ে নিলেন, এমনকি আমি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উরুর শুভ্রতা দেখতে পাচ্ছিলাম।
যখন তিনি গ্রামে প্রবেশ করলেন, তখন বললেন: “আল্লাহু আকবার! খায়বার ধ্বংস হলো! যখন আমরা কোনো জাতির আঙ্গিনায় অবতরণ করি, তখন যাদেরকে সতর্ক করা হয়েছে, তাদের সকাল বড়ই মন্দ হয়।” তিনি এ কথা তিনবার বললেন।
তিনি (আনাস) বলেন: গ্রামবাসী তাদের নিজ নিজ কাজে বেরিয়ে এসেছিল এবং (তখন তাদের কেউ কেউ) বলতে লাগল, "মুহাম্মাদ!" (বর্ণনাকারী আব্দুল আযীয বলেন, আর আমাদের সাথীদের কেউ কেউ বলেছেন: "আল-খামীস", অর্থাৎ সেনাবাহিনী।) এরপর আমরা যুদ্ধ করে তা জয় করে নিলাম। বন্দীদের একত্রিত করা হলো।
তখন দিহিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহর নবী! আমাকে একজন দাসী দিন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, একজন দাসী নিয়ে নাও।" দিহিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাফিয়্যাহ বিনত্ হুয়াইকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিলেন। তখন এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "হে আল্লাহর নবী! আপনি দিহিয়াকে কুরায়যা ও নাযীর গোত্রের সর্দার সাফিয়্যাহ বিনত হুয়াইকে দিয়ে দিয়েছেন? তিনি তো আপনার ছাড়া অন্য কারও জন্য উপযুক্ত নন!"
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাঁকে (সাফিয়্যাহকে) ডেকে আনো।" যখন সাফিয়্যাহকে আনা হলো এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে দেখলেন, তখন বললেন: "এর পরিবর্তে বন্দীদের মধ্য থেকে অন্য একজন দাসী নিয়ে নাও।" রাবী বলেন: অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (সাফিয়্যাহকে) মুক্ত করে দিলেন এবং তাঁকে বিবাহ করলেন।
তখন সাবিত (অন্য একজন রাবী) আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন: "হে আবূ হামযা! তার মোহর কী ছিল?" আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "তাঁর নিজেকেই (তাঁর মোহর বানানো হয়েছিল)। তিনি তাঁকে মুক্ত করে দিলেন এবং তাঁকে বিবাহ করলেন।"
পথিমধ্যে উম্মু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (সাফিয়্যাহকে) সজ্জিত করলেন এবং রাতের বেলায় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তাঁকে সমর্পণ করলেন। এভাবে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সকালে কনেসহ বর (আরূস) হলেন। এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার কাছে কোনো কিছু আছে, সে যেন তা নিয়ে আসে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি চামড়ার দস্তরখান বিছালেন।
একজন ব্যক্তি পনির নিয়ে আসতে শুরু করলেন, অন্যজন খেজুর নিয়ে আসতে শুরু করলেন, আরেকজন ঘি নিয়ে আসতে শুরু করলেন। রাবী বলেন: আমি মনে করি তিনি (আনাস) সাভীক (সাতু) এর কথাও উল্লেখ করেছেন। অতঃপর তারা (এই সব উপাদান দিয়ে) 'হাইস' (এক প্রকার খাদ্য) তৈরি করলেন। এটাই ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওয়ালীমা (বিয়ের ভোজ)।
6350 - عن جويرية بنت الحارث قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: إن أزواجك يفخرن عليّ، يقلن: لم يتزوجك رسول الله صلى الله عليه وسلم إنما أنت ملك يمين. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألم أعظم صداقك، ألم أعتق أربعين من قومك".
صحيح: رواه إسحاق في مسنده (4/ 255) عن سفيان، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، قال: قالت جويرية بنت الحارث فذكره.
ورواه عبد الرزاق (7/ 271 - 272) والحاكم (4/ 25) كلاهما من حديث ابن عيينة بإسناده. وإسناده صحيح.
জুওয়াইরিয়া বিনত আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বললেন: "আপনার অন্য স্ত্রীগণ আমার ওপর গর্ব (তাচ্ছিল্য) করেন, তারা বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে বিবাহ করেননি, বরং আপনি তো শুধু ডান হাতের মালিকানাধীন (দাসী/বন্দী) ছিলেন।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি তোমার মোহরকে মহান করিনি? আমি কি তোমার সম্প্রদায়ের চল্লিশজনকে মুক্ত করিনি?"
6351 - عن أبي موسى قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ثلاثة لهم أجران" منهم:"رجل كانت عنده
أمةٌ فأدَّبَها فأحسن تأديبها، وعلّمها فأحسن تعليمها، ثم أعتَقها، فتزوَّجها، فله أجران".
متفق عليه: رواه البخاري في العلم (97) ومسلم في الإيمان (154) كلاهما عن الشعبي، عن أبي بردة بن أبي موسى، عن أبيه فذكره.
وقوله: أفتزوّجها: أي بالمهر.
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তিন শ্রেণির লোক রয়েছে, যাদের জন্য রয়েছে দ্বিগুণ সওয়াব (প্রতিদান)। তাদের মধ্যে একজন হলো: যে ব্যক্তির মালিকানায় কোনো দাসী ছিল, অতঃপর সে তাকে উত্তমরূপে শিষ্টাচার শিক্ষা দিয়েছে, ভালোভাবে জ্ঞান শিক্ষা দিয়েছে, তারপর তাকে মুক্ত করে দিয়েছে এবং তাকে বিবাহ করেছে, তার জন্য রয়েছে দ্বিগুণ সওয়াব।”
6352 - عن عائشة قالت: أتتْ جويريةُ بنت الحارث رسولَ الله صلى الله عليه وسلم نستعينه في كتابتها، فوالله ما هو إلا أن وقفت على باب الحجرة. فرأيتها كرهتُها. وعرفتُ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سيري منها مثل ما رأيتُ. فقالت جويرية: يا رسول الله: كان من الأمر ما قد عرفت. فكاتبت نفسي فجئت أستعينه فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أو ما هو خير من ذلك؟" قالت: ما هو؟ قال:"أتزوجك وأقضي عنك كتابك" فقالت: نعم. قال:"قد فعلتُ" قالت: فبلغ المسلمين ذلك فقالوا: أصهار رسول الله صلى الله عليه وسلم فأرسلوا ما كان في أيديهم من سبايا بني المصطلق. قالت: فلقد عُتِق بتزويجه مائة أهل بيت من بني المصطلق. قالت: فما أعلم امرأة كانت أعظم بركة على قومها منها.
حسن: رواه أبو داود (3931) وأحمد (26165) وابن حبان (4054) والحاكم (4/ 26) كلهم من حديث محمد بن إسحاق قال: حدثني محمد بن جعفر بن الزبير، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق لأنه صرّح بالتحديث.
وقعت جويرية بنت الحارث بن المصطلق في سهم ثابت بن قيس بن شماس، أو ابن عم له، فكاتبْ على نفسها وكانت امرأةً مُلاحةً تأخذها العينُ.
مُلاحة ومليحة أي: حلوة وجميلة.
فلما غزا النبي صلى الله عليه وسلم بني المصطلق غزوة المريسيع في سنة خمس، أو ست وقعت جويرية في السبي من سبايا بني المصطلق، وقُتِل زوجُها مسافعُ بن صفوان المصطلقي، فتزوّجها رسول الله صلى الله عليه وسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জুওয়াইরিয়াহ বিনত আল-হারিস রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, যাতে তিনি তার মুকাতাবা (স্বাধীনতার জন্য চুক্তিকৃত মূল্য) পরিশোধে সাহায্য করেন। আল্লাহর কসম, তিনি (জুওয়াইরিয়াহ) কক্ষের দরজায় এসে দাঁড়ানো মাত্রই আমি তাকে (তার সৌন্দর্য দেখে ঈর্ষার কারণে) অপছন্দ করলাম এবং আমি বুঝতে পারলাম যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার প্রতি তেমনই আকৃষ্ট হবেন যেমনটা আমি দেখলাম।
তখন জুওয়াইরিয়াহ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! যা ঘটেছে, তা তো আপনি জানেন। আমি নিজেকে মুকাতাবা করেছি, তাই আপনার সাহায্য চাইতে এসেছি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি এর চেয়ে উত্তম কিছু করব না?" তিনি (জুওয়াইরিয়াহ) বললেন: "তা কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে বিবাহ করব এবং তোমার পক্ষ থেকে তোমার মুকাতাবার মূল্য পরিশোধ করে দেব।" তিনি বললেন: হ্যাঁ। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তা করলাম।"
তিনি (আয়িশা) বলেন: এই সংবাদ মুসলিমদের কাছে পৌঁছালে তারা বলল: এরা তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শ্বশুরগোষ্ঠী! ফলে তারা বনু মুসতালিক গোত্রের যে সমস্ত বন্দী তাদের হাতে ছিল, তাদের মুক্তি দিয়ে দিল। তিনি বলেন: আল্লাহর কসম, তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বিবাহের কারণে বনু মুসতালিক গোত্রের একশ পরিবারকে মুক্ত করা হলো। তিনি (আয়িশা) বলেন: আমি জুওয়াইরিয়াহর চেয়ে বেশি বরকতময় কোনো নারীকে তার গোত্রের জন্য দেখিনি।
6353 - عن عقبة بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خيرُ النكاح أيسرُه".
صحيح: رواه أبو داود (2117) وابن حبان في صحيحه (4072) والحاكم (2/ 181 - 182) وعنه البيهقي (7/ 232) والقُضاعي في مسند الشهاب (1226) كلهم من حديث محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم خالد بن أبي يزيد، عن زيد بن أبي أنيسة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد الله، عن عقبة بن عامر فذكره.
وفيه قصة (انظر باب ينعقد النكاح بغير مهر).
وإسناده صحيح، وصحّحه الحاكم على شرط الشيخين.
قلت: وهو على شرط مسلم وحده، فإن البخاري لم يخرج لمحمد بن سلمة وشيخه خالد بن أبي يزيد.
উকবা ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সর্বোত্তম বিবাহ হলো যা সবচেয়ে সহজসাধ্য।"
6354 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن يُمنِ يمين المرأة تيسيرُ خِطبتها، وتيسيرُ صداقها، وتيسيرُ رحمِها".
حسن: رواه أحمد (24478) والبزار - كشف الأستار - (1417) وابن حبان (4095) والحاكم (2/ 181) وعنه البيهقي (7/ 235) كلهم من حديث أسامة بن زيد، عن صفوان بن سليم، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
قال عروة كما عند البعض: يتيسر رحِمُها للولادة. وقال: وأنا أقول من عندي: من أول شُؤمها أن يكثر صداقها.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وإسناده حسن من أجل الكلام في أسامة بن زيد وهو الليثي غير أنه حسن الحديث وقد روى له مسلم في المتابعات والشواهد، والحاكم لا يرى الفرق بين الأصل والشواهد.
وأما رُوي عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن أعظم النكاح بركة أيسره مؤنة" فهو ضعيف.
رواه أحمد (24529) والحاكم (2/ 178) وعنه البيهقي (7/ 235). كلهم من حديث حماد بن سلمة، قال: أخبرني ابن الطفيل بن سَخْبرة، عن القاسم بن محمد، عن عائشة فذكرته.
قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
قلت: ليس كما قال، فإن ابن الطفيل بن سخْبرة هذا لا يعرف من هو. وإن كان سماه الحاكم"عمر" والبيهقي"عمرو" ولم يتابع على ذلك أحد، والصحيح أنه لا يُعرف من هو. وقد يقال: هو عيسى بن ميمون كما في"التهذيب" وكذا سماه القُضاعي في مسند الشهاب (123) فإن كان هو فهو ضعيف، وإن كان غيره فهو"مجهول" وضعّفه أيضا السخاوي في المقاصد الحسنة (453).
وقد وقفت على قصة طريفة لسفيان بن عيينة.
قال يحيى بن يحيى النيسابوري: كنت عند سفيان بن عيينة، إذ جاءه رجل فقال: يا أبا محمد، أشكو إليك من فلانة - يعني امرأته - أنا أذل الأشياء عندها وأحقرها. فأطرق سفيان مليا، ثم رفع رأسه فقال: لعلك رغبتَ إليها لتزداد بذلك عزا؟ فقال: نعم يا أبا محمد. فقال: من ذهب إلى العز ابتلي بالذل، ومن ذهب إلى المال ابتلي بالفقر، ومن ذهب إلى الدين يجمع الله له العز والمال مع الدين. ثم أنشأ يُحدّثه فقال: كنا إخوةً أربعةً: محمد، وعمران، وإبراهيم، وأنا، فمحمد أكبرنا وعمران أصغرنا، وكنت أوسطهم، فلما أراد محمد أن يتزوج رغب في الحسب، فتزوج من هي
أكبر منه حسبا، فابتلاه الله بالذُّلِّ، وعمران رغب في المال فتزوج من هي أكبر منه مالا فابتلاه الله بالفقر، أخذوا ما في يديه ولم يعطوه شيئا، فنقبت في أمرهما، فقدم علينا معمر بن راشد فشاورتُه، وقصصتُ عليه قصة أخويّ، فذكرني حديث يحيى بن جُعدة وحديث عائشة، فأما حديث يحيى بن جعدة: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"تنكح المرأة على أربع: دينها، وحسبها، ومالها، وجمالها، فعليك بذات الدين تربت يداه" وحديث عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أعظم النساء بركة أيسرهن مؤنة". فاخترتُ لنفسي الدين وتخفيف الظهر اقتداءً بسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم فجمع اللهُ لي العِزَّ والمالَ مع الدين.
ذكرها المزي في"تهذيب الكمال" في ترجمة سفيان بن عيينة، فهل كان ابن عيينة عنده إسناد آخر لحديث عائشة يرويه معمر بن راشد، أو هو ذكره كحكاية بدون إسناد.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই কোনো নারীর বরকত হলো তার বিবাহের প্রস্তাব সহজ হওয়া, তার মোহরানা সহজ হওয়া এবং তার গর্ভধারণ সহজ হওয়া।”
6355 - عن أبي العَجْفاء السُّلمي قال: خطبنا عمر فقال: ألا لا تغالوا بصُدق النساء، فإنها لو كانت مكرمةً في الدنيا، أو تقوى عند الله كان أولاكم بها النبي صلى الله عليه وسلم. ما أصدق رسولُ الله صلى الله عليه وسلم امرأةً من نسائه، ولا أُصدِقتْ امرأة من بناته أكثر من ثنتي عشرة أوقية.
حسن: رواه أبو داود (2106) والنسائي (3349) والترمذي (1114) وابن ماجه (1887) وأحمد (340) وصححه ابن حبان (4620) والحاكم (2/ 175 - 176) والبيهقي (7/ 234) كلهم من حديث محمد بن سيرين، عن أبي العجفاء السلمي فذكره.
ووقع في بعض طرق الحديث قال ابن سيرين: نُبئت، ولكن جاء التصريح بالسماع في طرق أخرى فزال الانقطاع.
وزاد بعضهم: وإن الرجل ليثقّل صدقة امرأته حتى يكون لها عداوة في نفسه ويقول: قد كلفتْ إليك على القرية، أو عرَق القربة.
وكنت رجلًا عربيا مولدًا ما أدري ما علَقُ القربة؟
قال الترمذي:"حسن صحيح. وأبو العجفاء اسمه: هرِم".
قلت: إسناده حسن من أجل أبي العَجْفاء السلمي، فإنه مختلف فيه. فوثّقه ابن معين والدارقطني ولكن قال البخاري:"في حديثه نظر"، وقال أبو أحمد الحاكم: حديثه ليس بالقائم. وجرحُهم هذا مجمل، فيقدم توثيق من وثّقه، فمثله يحسن حديثه إذا لم يُخالف، ولم يأت في حديثه ما يُنكر عليه.
وأما قول الحافظ ابن حجر:"مقبول" فالحق أنه"صدوق" وهو لا يحتاج إلى المتابعة.
وقال الحاكم: صحيح الإسناد - وأبو العُجْفاء السلمي اسمه: هَرِم بن حيّان، وهو من الثقات، ونقل عن عبد الرحمن بن مهدي:"أن اسمه هرم".
وتعقبه الذهبي فقال:"بل هرم بن نسيب".
وأما ما روي عن الشعبي قال: خطب عمر بن الخطاب رضي الله عنه الناس فحمد الله تعالى وأثنى عليه، وقال: ألا لا تغالوا في صداق النساء، فإنه يبلغني عن أحد ساق أكثر من شيء ساقه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، أو سبق إليه إلا جعلتُ فضل ذلك في بيت المال، ثم نزل، فعرضت له امرأة من قريش، فقالت: يا أمير المؤمنين، أكتاب الله تعالى أحقُّ أن يُتّبع أو قولك؟ قال: بل كتاب الله تعالى فما ذاك؟ قالت: نهيتَ الناس آنفا أن يغالوا في صداق النساء والله تعالى يقول في كتابه: {وَآتَيْتُمْ إِحْدَاهُنَّ قِنْطَارًا فَلَا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئًا} [النساء: 20] فقال عمر رضي الله عنه:"كل أحد أفقه من عمر مرتين أو ثلاثا، ثم رجع إلى المنبر، فقال للناس: إني كنت نَهيتُكم أن تغالوا في صداق النساء، ألا فليفعلْ رجل في ماله ما بدا له. فهو ضعيف.
رواه البيهقي (7/ 233) من حديث سعيد بن منصور - وهو في سننه (1/ 166) قال: ثنا هُشيم، ثنا مجالد، عن الشعبي فذكره.
قال البيهقي:"هذا منقطع". يعني أن الشعبي لم يدركْ عمر بن الخطاب.
وروي من وجه آخر عن قيس بن الربيع، عن أبي حصين، عن أبي عبد الرحمن السلمي قال: قال عمر بن الخطاب:"لا تغالوا في مهور النساء". فقالت امرأة: ليس ذلك لك يا عمر، إن الله يقول: {وَآتَيْتُمْ إِحْدَاهُنَّ قِنْطَارًا} [النساء: 10] قال: وكذلك هي في قراءة عبد الله (فلا يحل لكم أن تأخذوا منه شيئا)، فقال عمر: إن امرأة خاصمت عمر، فخصمته.
رواه عبد الرزاق (10420) عن قيس بن الربيع.
وقيس بن الربيع ضعيف باتفاق أهل العلم.
وأبو عبد الرحمن السلمي هو عبد الله بن حبيب بن ربيعة السلمي الكوفي المقرئ ثقة ثبت، ولأبيه صحبة، إلا أنه لم يدرك عمر بن الخطاب.
ورُوي عن عمر بن الخطاب أيضا أنه قال: لقد خرجت أنا أريد أن أنهى عن كثرة مهور النساء حتى قرأت هذه الآية {وَآتَيْتُمْ إِحْدَاهُنَّ قِنْطَارًا فَلَا تَأْخُذُوا مِنْهُ شَيْئًا} [النساء: 20] رواه سعيد بن منصور في سننه (1/ 167) والبيهقي وقال:"هذا مرسل جيد".
وفي الباب أحاديث لا تصح:
منها: ما رُوي عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خيرهن أيسرهن صداقًا" رواه ابن حبان في صحيحه (4034) والعقيلي في الضعفاء (499) والطبراني في الكبير (11/ 78) كلهم من حديث رجاء بن الحارث، عن مجاهد، عن ابن عباس فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 281): وفيه رجاء بن الحارث ضعفه ابن معين وغيره، وبقية رجاله ثقات.
قلت: وهو كما قال. فقد نقل العقيلي عن البخاري قال: رجاء بن الحارث حديثه ليس بالقائم. وقال العقيلي:"وهو لا يتابع عليه".
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের মাঝে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: তোমরা মহিলাদের মোহর নিয়ে বাড়াবাড়ি করো না। কারণ, যদি এটি (বেশি মোহর) দুনিয়াতে কোনো সম্মানজনক বিষয় হতো অথবা আল্লাহর নিকট তাকওয়া বৃদ্ধি করত, তবে তোমাদের মধ্যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামই এর সবচেয়ে বেশি হকদার হতেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর স্ত্রীদের কাউকে বারো উকিয়ার (১২ উকিয়া) বেশি মোহর দেননি এবং তাঁর কন্যাদেরও কাউকে এর চেয়ে বেশি মোহর দেওয়া হয়নি।
6356 - عن عقبة بن عامر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لرجل:"أترضى أن أزوجك فلانة؟". قال: نعم، وقال للمرأة:"أترضين أن أزوجك فلانًا" قالت: نعم، فزوج أحدهما صاحبه، فدخل بها الرجل، ولم يفرض لها صداقًا. ولم يعطها شيئًا. وكان ممن شهد الحديبية له سهم خيبر. فلما حضرتْه الوفاةُ قال: إن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم زوجني فلانة، ولم أفرض لها صداقًا، ولم أُعطها شيئًا. وإني أُشْهِدكم أني أعطيتُها من صداقها سهْمي بخيبر، فأخذتْ سهمًا فباعته بمائة ألف.
صحيح: رواه أبو داود (2117) وصححه ابن حبان (4072) والحاكم (2/ 181 - 182) وعنه البيهقي (7/ 232) كلهم من طريق محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم خالد بن أبي يزيد، عن زيد بن أبي أنيسة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد الله، عن عقبة بن عامر فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: هو على شرط مسلم وحده، لأن البخاري لم يخرج لمحمد بن سلمة ولا لشيخه خالد بن أبي يزيد، وإنما أخرج لهما مسلم فقط.
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে বললেন: "তুমি কি এতে সম্মত যে, আমি তোমাকে অমুক (নারীর) সাথে বিবাহ দেব?" লোকটি বলল: হ্যাঁ। এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মহিলাটিকে বললেন: "তুমি কি এতে সম্মত যে, আমি তোমাকে অমুক (পুরুষের) সাথে বিবাহ দেব?" সে বলল: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি তাদের একজনকে অন্যের সাথে বিবাহ দিলেন। অতঃপর লোকটি তার সাথে সহবাস করল, কিন্তু সে তার জন্য কোনো মোহর নির্ধারণ করেনি এবং তাকে কিছুই দেয়নি। আর সে (ঐ লোকটি) হুদায়বিয়ার সাক্ষীদের অন্তর্ভুক্ত ছিল এবং তার জন্য খায়বারের অংশ (সম্পত্তি) বরাদ্দ ছিল। যখন তার মৃত্যুর সময় ঘনিয়ে এলো, তখন সে বলল: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে অমুক মহিলার সাথে বিবাহ দিয়েছিলেন, কিন্তু আমি তার জন্য কোনো মোহর নির্ধারণ করিনি এবং তাকে কিছুই দেইনি। আর আমি তোমাদেরকে সাক্ষী রাখছি যে, আমি আমার খায়বারস্থিত অংশ তাকে মোহর হিসাবে দিলাম। অতঃপর সে (ঐ মহিলা) অংশটি গ্রহণ করল এবং তা এক লক্ষের বিনিময়ে বিক্রি করল।
6357 - عن عبد الله بن مسعود في رجل تزوج امرأةً فمات عنها، ولم يَدخُل بها، ولم يَفْرِضْ لها الصداقَ. فقال: لها الصداقُ كاملًا، وعليها العدة، ولها الميراث.
قال معقل بن سنان: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى في بروَع بنت واشق.
صحيح: رواه أبو داود (2114) والنسائي (3356) وابن ماجه (1891) وصححه ابن حبان (4098) والحاكم (2/ 180 - 181) كلهم من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن فراس، عن الشعبي، عن مسروق، عن عبد الله فذكره.
قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين".
ورواه أبو داود (2115) والنسائي (3355) والترمذي (1145) وابن حبان (4099) كلهم من حديث منصور، عن إبراهيم، عن علقمة، عن ابن مسعود فذكر الحديث.
وفي لفظ النسائي:"فاختلفوا إليه قريبا من شهر لا يُفتيهم".
قال الترمذي: حسن صحيح.
ورواه أيضا النسائي (3358) وابن حبان (4101) والحاكم (2/ 180) وعنه البيهقي (7/ 245) عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله أتم من هذا. وهذا لفظه: أتاه قوم فقالوا إن رجلا منا تزوج امرأة، ولم يفرض لها صداقا، ولم يجمعها إليه حتى مات، فقال عبد الله: ما سُئلت منذ فارقت رسول الله صلى الله عليه وسلم أشد عليّ من هذه، فأتوا غيري، فاختلفوا إليه فيها شهرا، ثم قالوا: له في آخر ذلك: من نسأل إن لم نسألك وأنت من جلة أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم بهذا البلد ولا نجد غيرك؟ قال: سأقولُ فيها بجهد رأيي، فإن كان صوابا فمن الله وحده لا شريك له، وإن كان خطأ فمني ومن الشيطان، والله ورسوله منه براء، أرى أن أجعلَ لها صداقَ نسائها، لا وكسَ ولا شططَ، ولها الميراثُ وعليها العدة أربعة أشهر وعشرا، قال: وذلك بسمع أناس من أشجع فقاموا فقالوا: نشهد أنك قضيتَ بما قضي به رسول الله في امرأة منا يقال لها: بروع بنت واشق، قال: فما رؤي عبد الله فرح فرحه يومئذ إلا بإسلامه. واللفظ للنسائي.
ورواه أبو داود (2116) وأحمد (4276) والبيهقي (7/ 246) كلهم من حديث سعيد بن أبي عروة، عن قتادة عن خلاس وأبي حسان، عن عبد الله بن عتبة بن مسعود أن عبد الله بن مسعود أتي في رجل بهذا الخبر. قال: فاختلفوا إليه شهرا، أو قال: مرات. قال: فإني أقول فيها فذكر مثله.
فقام أناس من أشجع فيهم: الجراح وأبو سنان فقالوا: يا ابن مسعود، نحن نشهد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضاها فينا في بروَع بنت واشق، وزوجِها هلال بن مرة الأشجعي كما قضيت. قال: ففرِحَ عبد الله بن مسعود فرحًا شديدًا حين وافق قضاؤُه قضاءَ رسول الله صلى الله عليه وسلم. وإسناده صحيح أيضا.
وللحديث طرق أخرى. وإليها أشار الترمذي بقوله:"حديث ابن مسعود حسن صحيح، وقد رُوي عنه من غير وجه".
وقال البيهقي:"هذا الاختلاف في تسمية من روي قصة بروع بنت واشق، عن النبي صلى الله عليه وسلم، لا يُوهن الحديث. فإن جميع هذه الروايات أسانيدها صحاح، وفي بعضها ما دل على أن جماعة من أشجع شهدوا بذلك.
فكأن بعض الرواة سقى منهم واحدا، وبعضهم سمّى اثنين، وبعضهم أطلق لم يسم، ومثله لا يرد الحديث. ولولا ثقة من رواه عن النبي صلى الله عليه وسلم لما كان نفرح عبد الله بن مسعود معني. انتهى.
ورُوي عن علي بن أبي طالب خلاف هذا. وهو ما رواه عبد خير عن علي أنه كان يقول في الرجل: تزوج المرأةَ، فيموت عنها، ولم يفرضْ لها، ولم يدخل بها، أنه كان يجعل لها الميراثَ، وعليها العدة، ولا يجعل لها الصداق.
رواه عبد الرزاق (11738) عن الثوري، عن عطاء بن السائب، عن عبد خير، عن علي فذكره.
وعطاء بن السائب اختلط بآخره، ولكن الثوري وهو سفيان بن سعيد الثوري سمع منه قبل الاختلاط. ورواه عبد الرزاق (11737) أيضا من وجه آخر نحوه.
وبهذا قال جمع من الصحابة وهم زيد بن ثابت وعبد الله بن عباس وعبد الله بن عمر، وهو قول الشافعي في القديم. ثم رجع عنه بعد ما بلغه حديث بروع بنت واشق بأن لها الصداق.
وإلى هذا الخلاف يشير الترمذي عقب حديث ابن مسعود فقال:
والعمل على هذا عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم. وبه يقول الثوري وأحمد وإسحاق.
وقال بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، منهم: علي بن أبي طالب وزيد بن ثابت، وابن عباس، وابن عمر: إذا تزوج الرجل المرأة ولم يدخل بها، ولم يفرض لها صداقا حتى مات، قالوا: لها الميراث، ولا صداق لها، وعليها العدة. وهو قول الشافعي. قال: لو ثبت حديث بروع بنت واشق لكانت الحجة فيما روي عن النبي صلى الله عليه وسلم. وروي عن الشافعي أنه رجع بمصر بعد هذا القول، وقال بحديث بروع بنت واشق". انتهى.
وفي الحديث من الفقه: جواز الاجتهاد في الحوادث من الأحكام فيما لم يوجد فيه نص مع إمكان أن يكون فيها نص وتوقيف. قاله الخطابي.
فإذا وقف على نص يخالف اجتهاده يرجع إلى النص ويترك اجتهاده، وإليه أشار الشافعي:"يُقبل الخبر في الوقت الذي يثبت فيه" وقال:"إن حديث رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يثبت بنفسه، لا بعمل غيره بعده".
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে বলেছেন, যে একজন নারীকে বিবাহ করেছে, কিন্তু তার সাথে মিলিত হওয়ার (দুখুল) আগেই মৃত্যুবরণ করেছে এবং তার জন্য মোহরও নির্ধারণ করেনি। তিনি বললেন: তার জন্য পূর্ণ মোহর রয়েছে, তাকে ইদ্দত পালন করতে হবে এবং সে মীরাসের (উত্তরাধিকার) হকদার হবে।
মা‘কিল ইবনু সিনান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বারওয়া বিনতু ওয়াশিক-এর ব্যাপারে অনুরূপ ফয়সালা দিতে শুনেছি।
(অন্য একটি বর্ণনায় ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই বিষয়ে জিজ্ঞেস করা হলে) তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে বিচ্ছিন্ন হওয়ার পর এর চেয়ে কঠিন প্রশ্ন আমাকে করা হয়নি। তোমরা অন্য কারো নিকট যাও। তারা এই বিষয়ে এক মাস যাবৎ তাঁর কাছে আসা-যাওয়া করতে লাগলো। অবশেষে তারা বললো: আমরা যদি আপনাকে না জিজ্ঞেস করি তবে কাকে জিজ্ঞেস করবো? আপনিই তো এই শহরে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শ্রেষ্ঠতম সাহাবীদের একজন, আমরা আপনার ছাড়া অন্য কাউকে পাচ্ছি না। তিনি বললেন: আমি আমার নিজের বিচার-বুদ্ধির সর্বোচ্চ চেষ্টা করে এর ফায়সালা দেবো। যদি তা সঠিক হয় তবে তা একমাত্র আল্লাহর পক্ষ থেকে, যার কোনো শরীক নেই। আর যদি ভুল হয় তবে তা আমার পক্ষ থেকে ও শাইতানের পক্ষ থেকে, আর আল্লাহ ও তাঁর রাসূল এর থেকে মুক্ত। আমার মত হলো: আমি তার সমাজের অন্য নারীদের মতো মোহর তার জন্য নির্ধারণ করবো—না কম, না বেশি। এবং সে মীরাস পাবে আর তাকে চার মাস দশ দিন ইদ্দত পালন করতে হবে।
বর্ণনাকারী বলেন: আশজা গোত্রের লোকজন তখন সেখানে ছিল। তারা দাঁড়িয়ে বললো: আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি সেই ফয়সালা দিয়েছেন, যা রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের গোত্রের বারওয়া বিনতু ওয়াশিক নামক এক মহিলা ও তার স্বামী হিলাল ইবনু মুররাহ আল-আশজা‘ঈর ব্যাপারে দিয়েছিলেন, ঠিক যেমন আপনি ফয়সালা দিলেন।
বর্ণনাকারী বলেন: ইসলাম গ্রহণের পরে আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সেদিনকার মতো এতটা আনন্দিত আর কখনও দেখা যায়নি, যখন তাঁর ফায়সালা রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ফায়সালার সাথে মিলে গিয়েছিল।
(অন্যান্য সাহাবীগণের মতভেদও রয়েছে। যেমন) আলী ইবনু আবী তালিব, যায়দ ইবনু সাবিত, ইবনু ‘আব্বাস ও ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: যদি কোনো ব্যক্তি কোনো নারীকে বিবাহ করে এবং তার সাথে মিলিত না হয় এবং মোহর নির্ধারণ করার আগেই মারা যায়, তাহলে তার জন্য মীরাস রয়েছে, তাকে ইদ্দত পালন করতে হবে, কিন্তু তার জন্য মোহর নেই।
(ইমাম) তিরমিযী বলেন: ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি ‘হাসান সহীহ’। এই হাদীসের উপরই কিছু সাহাবী এবং পরবর্তী আলিমগণের আমল রয়েছে। আর এই মতই সওরী, আহমাদ ও ইসহাক গ্রহণ করেছেন।
তবে (ইমাম) শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) পূর্বের মত থেকে সরে এসে এই বারওয়া বিনতু ওয়াশিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস জানার পর বলেন যে, তার জন্য পূর্ণ মোহর রয়েছে।
এই হাদীস থেকে ফিকহী মাসআলা পাওয়া যায় যে, যে সকল বিষয়ে স্পষ্ট নস (দলীল) পাওয়া যায় না, সে ক্ষেত্রে ইজতিহাদ (গবেষণামূলক ফায়সালা) করার সুযোগ রয়েছে, তবে যখন ইজতিহাদের বিপরীত কোনো নস (রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী বা কাজ) পাওয়া যায়, তখন অবশ্যই নসের দিকে প্রত্যাবর্তন করতে হবে এবং নিজের ইজতিহাদ ত্যাগ করতে হবে। ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) এটাই বলেছেন: "যে সময়ে রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীস প্রমাণিত হয়, তখনই তা গ্রহণ করতে হবে।"
6358 - عن عروة بن الزبير يحدث أنه سأل عائشة: {وَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تُقْسِطُوا فِي الْيَتَامَى فَانْكِحُوا مَا طَابَ لَكُمْ مِنَ النِّسَاءِ} [النساء: 3] قالت: هي اليتيمة في حجر وليها، فيرغب في جمالها ومالها ويريد أن يتزوجها بأدنى من سنة نسائها، فنهوا عن نكاحهن، إلا أن يُقسطوا لهن في إكمال الصداق، وأمروا بنكاح من سواهن من النساء.
قالت عائشة: ثم استفتي الناس رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد: فأنزل الله عز وجل: {وَيَسْتَفْتُونَكَ فِي النِّسَاءِ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِيهِنَّ} [النساء: 127] قالت: فبين الله في هذه أن اليتيمة إذ كانت ذات جمال ومال، ورغبوا في نكاحها، ولم يُلحقوها بسنتها بإكمال الصداق، فإذا كانت مرغوبة عنها في قلة المال والجمال تركوها، والتمسوا غيرها من النساء. قال: فكما يتركونها حين يرغبون عنها، فليس لهم أن ينكحِوها إذا رغبوا فيها إلا أن يُقسِطوا لها الأوفى من الصداق، ويُعطوها حقها.
متفق عليه: رواه البخاري في الوصايا (2763) ومسلم في التفسير (6: 3018) كلاهما من حديث الزهري، قال: أخبرني عروة بن الزبير، أنه سأل عائشة فأخبرته. واللفظ للبخاري، ولفظ
مسلم نحوه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁকে এই আয়াত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিলেন: "আর যদি তোমরা ভয় করো যে, ইয়াতীম মহিলাদের প্রতি ইনসাফ করতে পারবে না, তবে নারীদের মধ্যে হতে যাদের তোমাদের ভালো লাগে তাদের বিবাহ করো।" (সূরা নিসা, ৪:৩) তিনি (আয়িশা রাঃ) বললেন: এটি হলো সেই ইয়াতীম বালিকা, যে তার অভিভাবকের তত্ত্বাবধানে থাকে। অভিভাবক তার সৌন্দর্য ও সম্পদের প্রতি আগ্রহী হয়ে তাকে তার সমপর্যায়ের মহিলাদের প্রচলিত মোহর অপেক্ষা কম মোহরে বিবাহ করতে চায়। তাই তাদেরকে নিষেধ করা হয়েছে যে, তারা যেন তাদেরকে বিবাহ না করে; তবে হ্যাঁ, যদি তারা পূর্ণাঙ্গ মোহর প্রদান করে তাদের প্রতি ইনসাফ করে। আর তাদেরকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে, তারা যেন এদের ব্যতীত অন্য নারীদের বিবাহ করে।
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এ বিষয়ে ফাতওয়া জানতে চাইল। তখন আল্লাহ তা‘আলা এ আয়াত নাযিল করলেন: "তারা তোমার কাছে নারীদের ব্যাপারে ফাতওয়া চায়। বলো, আল্লাহ তোমাদেরকে তাদের সম্পর্কে ফাতওয়া দিচ্ছেন।" (সূরা নিসা, ৪:১২৭) তিনি বললেন: এই আয়াতে আল্লাহ তা‘আলা পরিষ্কার করে দিয়েছেন যে, ইয়াতীম বালিকা যখন রূপসী ও সম্পদশালিনী হতো, তখন তারা তাকে বিবাহ করতে আগ্রহ দেখাতো, কিন্তু পূর্ণ মোহর দিয়ে তার প্রতি ইনসাফ করত না। পক্ষান্তরে, যদি সে কম সম্পদ বা সৌন্দর্যের কারণে অনাগ্রহের পাত্রী হতো, তবে তারা তাকে ছেড়ে দিত এবং অন্য নারীদের সন্ধান করত। (উরওয়াহ বলেন): তারা যেভাবে অনীহা প্রকাশ করে তাকে পরিত্যাগ করে, তাই যখন তারা তার প্রতি আগ্রহী হয়, তখনও তাদের তাকে বিবাহ করার অনুমতি নেই—তবে যদি তারা তাকে পূর্ণাঙ্গ মোহর দিয়ে তার প্রতি ইনসাফ করে এবং তার প্রাপ্য হক পুরোপুরি আদায় করে।
6359 - عن أنس بن مالك، أن عبد الرحمن بن عوف جاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وبه أثر صفرة، فسأله رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبره أنه تزوج. فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"كم سُقت إليها؟". فقال: زنة نواة من ذهب. فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أوْلِمْ ولو بشاةٍ".
متفق عليه: رواه مالك في النكاح (47) عن حميد الطويل، عن أنس بن مالك، فذكره. ورواه البخاري في النكاح (81: 1427) من طريق مالك، به.
ورواه مسلم في النكاح (81: 1427) من طريق شعبة، عن قتادة وحميد عن أنس، نحوه.
وقوله:"كم سُقْتَ إليها": أي ما أمهرتها، وقيل للمهر: سوق؛ لأن العرب كانت أموالهم المواشي، فكان الرجل إذا تزوج ساق إليها الإبل والغنم مهرًا.
وفي الحديث رخصة في استعمال الصفرة من الزعفران وغيره للعَريس.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তার শরীরে হলুদ রঙের চিহ্ন লেগেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন এবং তিনি জানালেন যে তিনি বিবাহ করেছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি তাকে মোহর হিসেবে কী পরিমাণ দিয়েছ?" তিনি বললেন: এক আঁটি পরিমাণ ওজনের সোনা। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি একটি ছাগল দিয়ে হলেও ওলিমা (বিবাহ ভোজ) করো।"
6360 - عن ثابت قال: ذُكرَ تزويجُ زينبِ بنت جحش عند أنس، فقال: ما رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم أولمَ على أحد من نسائه ما أولمَ عليها، أولمَ بشاة.
متفق عليه: رواه البخاري في النكاح (5171) ومسلم في النكاح (90: 1428) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن ثابت، به. واللفظ للبخاري. وفي لفظ مسلم من طريق عبد العزيز بن صهيب قال: سمعت أنس بن مالك يقول: ما أوْلَم رسول الله صلى الله عليه وسلم على امرأة من نسائه أكثرَ وأفضلَ مما أولَم على زينب. فقال ثابت البناني: بما أولَم؟ قال:"أطعمهم خبزًا ولحما حتى تركوه".
وتفصيله عند البخاري (4793) من طريق عبد العزيز بن صهيب، عن أنس قال: بُني على النبي صلى الله عليه وسلم بزينب بخبز ولحم، فأرسل على الطعام داعيًا، فيجيء قوم فيأكلون ويخرجون، ثم يجيء قوم فيأكلون ويخرجون. فدعوت حتى ما أجد أحدًا أدعو. فقلت: يا نبي الله، ما أجد أحدًا أدعوه. قال:"ارفعوا طعامكم".
وفيه دليل على أنه يجوز عند الضرورة دعوة قوم يأكلون ويخرجون، ثم يأتي قوم آخرون فيأكلون ويخرجون.
وفي الباب ما رُوي عن بريدة قال: لما خطب عليٌّ فاطمةَ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنه لا بد للعُرس من وليمة" فقال سعد: عليَّ كبش. وقال فلان: عليَّ كذا وكذا من ذُرة.
رواه أحمد (23035) واللفظ له، والبزار - كشف الأستار - (1407) والطبراني في الكبير (1153)
كلهم من طريق حميد بن عبد الرحمن الرؤاسي، حدثنا أبي، عن عبد الكريم بن سليط، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره مطولًا.
وعبد الكريم بن سليط لم يوثِّقه غير ابن حبان، وقد روى عنه عدد، ولكن قال ابن معين:"لم يرو عنه إلا الحسن (بن صالح).
وذكره الحافظ في مرتبة"مقبول" أي إذا توبع وإلا فليِّنُ الحديث.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিবাহের ভোজ (ওয়ালিমা) প্রসঙ্গে আলোচনা উঠলে তিনি বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে আর কারো জন্য এমন অনাড়ম্বর ওয়ালিমা করেননি, যেমনটি তিনি যায়নাবের জন্য করেছিলেন। তিনি একটি ছাগল (ভেড়া) দ্বারা ওয়ালিমা করেছিলেন।
(সহীহ মুসলিমের অন্য বর্ণনায় আছে: আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে আর কারো জন্য যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে বেশি বা উত্তম ওয়ালিমা করেননি। তখন সাবেত আল-বুনানী জিজ্ঞাসা করলেন: তিনি কী দ্বারা ওয়ালিমা করেছিলেন? আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি তাদের রুটি ও গোশত খাওয়ালেন যতক্ষণ না তারা (খাওয়া শেষ করে) তা রেখে দিলেন।)
(সহীহ বুখারীর বিস্তারিত বর্ণনায় আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মিলিত হলে রুটি ও গোশত দ্বারা ওয়ালিমা করলেন। তিনি খাবারের জন্য লোকদের কাছে আহ্বানকারী পাঠালেন। একদল লোক আসত, খেত এবং বের হয়ে যেত। এরপর আরেক দল লোক আসত, খেত এবং বের হয়ে যেত। আমি লোকদের দাওয়াত করতে থাকলাম যতক্ষণ না আমি আর কাউকে দাওয়াত করার মতো পেলাম না। আমি বললাম, হে আল্লাহর নবী! আমি আর কাউকে দাওয়াত করার জন্য পাচ্ছি না। তিনি বললেন: ‘তোমরা তোমাদের খাবার উঠিয়ে নাও।’)
বুরায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফাতেমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বিবাহের জন্য ওয়ালিমা অপরিহার্য।" তখন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: একটি ভেড়ার দায়িত্ব আমার। আরেকজন বললেন: অমুক পরিমাণ ভুট্টার দায়িত্ব আমার।