আল-জামি` আল-কামিল
6428 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو أن امرأة قالت: يا رسول الله! إن ابني هذا كان بطني له وعاءً، وثديي له سقاءً، وحجري له حواءً. وإن أباه طلّقني، وأراد أن ينتزعه مني! فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنت أحق به ما لم تنكحي".
حسن: رواه أبو داود (2276) وأحمد (6707) والدارقطني (3/ 305) والحاكم (2/ 207)
وعنه البيقهي (8/ 4 - 5) كلهم من طرق عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
لا خلاف بين أهل العلم أن الأم لها حضانة الطفل ما لم تتزوج، فإذا تزوجت فلا حق لها في حضانته، فإن كانت لها أم فأمها تقوم مقامها، ثم الجدات من قبل الأم أحق به ما بقيت منهن واحدة.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন নারী বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! নিশ্চয় আমার এই সন্তানের জন্য আমার পেট ছিল পাত্রস্বরূপ, আমার স্তন ছিল তার জন্য পানীয় স্বরূপ, আর আমার কোল ছিল তার জন্য আশ্রয়স্থল। আর তার পিতা আমাকে তালাক দিয়েছে, এখন সে তাকে আমার কাছ থেকে ছিনিয়ে নিতে চায়! তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "তুমি তার অধিক হকদার, যতক্ষণ না তুমি বিবাহ করো।"
6429 - عن البراء قال: اعتمر النبي صلى الله عليه وسلم في ذي القعدة … الحديث وفيه قصة ابنة حمزة وأنها تبعتهم حين الخروج من مكة، فتناولها عليّ فأخذ بيدها وقال لفاطمة: دونك ابنة عمك احمليها، فاختصم فيها علي، وزيد، وجعفر، فقال علي: أنا أحق بها، وهي ابنة عمي، وقال جعفر: ابنة عمي وخالتها تحتي، وقال زيد: ابنة أخي، فقضى بها النبي صلى الله عليه وسلم لخالتها وقال:"الخالة بمنزلة الأم" وقال لعلي:"أنت مني وأنا منك" وقال لجعفر:"أشبهتَ خَلْقي وخُلُقي"، وقال لزيد:"أنت أخونا ومولانا".
صحيح: رواه البخاري في الصلح (2699) عن عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، عن أبي
إسحاق، عن البراء قال: فذكره.
বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যুল-ক্বাদাহ মাসে উমরাহ আদায় করেন... এবং হাদীসটিতে হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কন্যা সম্পর্কিত ঘটনা রয়েছে। তিনি মক্কা থেকে বের হওয়ার সময় তাঁদের অনুসরণ করেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে গ্রহণ করলেন এবং তার হাত ধরলেন। তিনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: এ তোমার চাচাতো বোন, একে তোমার সাথে নিয়ে নাও। অতঃপর আলী, যায়দ এবং জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার (অভিভাবকত্ব) নিয়ে বিবাদ করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিই তার ব্যাপারে অধিক হকদার, কারণ সে আমার চাচাতো বোন। আর জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে আমার চাচাতো বোন এবং তার খালা আমার অধীনে (আমার স্ত্রী)। আর যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে আমার ভাইয়ের মেয়ে (ভ্রাতুষ্পুত্রী)। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার খালার পক্ষে রায় দিলেন এবং বললেন: "খালা মায়ের সমতুল্য।" তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমার এবং আমি তোমার।" আর জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমার দৈহিক আকৃতি ও চরিত্রের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ।" আর যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমাদের ভাই এবং আমাদের মাওলা।"
6430 - عن علي قال: لما خرجنا من مكة اتبعتْنا ابنة حمزة تنادي: يا عمّ يا عمّ. قال: فتناولتها بيدها، فدفعتها إلى فاطمة، فقلت: دونك ابنة عمك. قال: فلما قدمنا المدينة اختصمنا فيها أنا وجعفر وزيد بن حارثة. فقال جعفر: ابنة عمي، وخالتها عندي، يعني أسماء بنت عميس، وقال زيد: ابنة أخي، وقلت: أنا أخذتها وهي ابنة عمي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما أنت يا جعفر فأشْبهت خلقي وخلقي، وأما أنت يا على فمني وأنا منك، وأما أنت يا زيد فأخونا ومولانا. والجارية عند خالتها، فإن الخالة والدة" قلت: يا رسول الله! ألا تتزوجها؟ قال:"إنها ابنة أخي من الرضاعة".
حسن: رواه أبو داود (2280) وأحمد (770) واللفظ له، وصحّحه الحاكم (3/ 120) كلهم من طريق أبي إسحاق، عن هانئ بن هانئ وهبيرة بن يريم، عن علي فذكره.
وإسناده حسن من أجل هانئ بن هانئ وهبيرة فإنهما مقبولان لأنه يقوي أحدهما الآخر.
وقد رويت هذه القصة عن علي من وجه آخر أيضا في سنن أبي داود وغيرها، والحديثان محفوظان عن البراء، وعلي بن أبي طالب، وقد رُوي أيضا عن الصحابة الآخرين.
والصحيح منها ما جاء عن البراء وعلي فقط.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমরা মক্কা থেকে বের হলাম, হামযার মেয়ে আমাদের পিছু নিল এবং ‘হে চাচা! হে চাচা!’ বলে ডাকতে লাগল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকে হাত দিয়ে ধরলাম এবং ফাতিমার কাছে অর্পণ করে বললাম: এই নাও তোমার চাচাতো বোনকে। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমরা মদীনায় পৌঁছলাম, তখন আমি, জাফর এবং যায়িদ ইবনু হারিসা তার (হামযার মেয়ের) অভিভাবকত্ব নিয়ে বিবাদ করলাম। জাফর বললেন: সে আমার চাচাতো বোন, আর তার খালা (আসমা বিনত উমাইস) আমার কাছে আছে। যায়িদ বললেন: সে আমার ভাইঝি। আর আমি বললাম: আমিই তাকে নিয়েছি এবং সে আমার চাচাতো বোন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "হে জাফর! তুমি আমার দৈহিক আকৃতি ও চারিত্রিক বৈশিষ্ট্যের সাথে সবচেয়ে বেশি সাদৃশ্যপূর্ণ। আর হে আলী! তুমি আমার এবং আমি তোমার। আর হে যায়িদ! তুমি আমাদের ভাই এবং আমাদের মাওলা (সহযোগী)। আর এই বালিকা তার খালার কাছে থাকবে। কারণ খালা মায়ের সমতুল্য।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি তাকে বিয়ে করবেন না? তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সে আমার দুধ-ভাইয়ের মেয়ে।"
6431 - عن ابن عباس قال في هذه الآية: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَنْ تَرِثُوا النِّسَاءَ كَرْهًا} [النساء: 19] كانوا إذا مات الرجل كان أولياؤه أحقّ بامرأته. إن شاء بعضهم تزوّجها، وإن شاؤوا زوّجوها، وإن شاؤوا لم يُزوّجوها، فهم أحق بها من أهلها. فنزلت هذه الآية بذلك.
صحيح: رواه البخاري في الإكراه (6948)، عن حسين بن منصور، حدثنا أسباط بن محمد، حدثنا الشيباني سليمان بن فيروز، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
قال الشيباني:"وحدثني عطاء أبو الحسن السوائي، ولا أظنه إلا ذكره عن ابن عباس فذكره".
ورواه أبو داود (2089) من حديث أسباط مثله، ورواه أيضا عن أحمد بن محمد بن ثابت المروزي، حدثني علي بن حسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: {لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَنْ تَرِثُوا النِّسَاءَ كَرْهًا وَلَا تَعْضُلُوهُنَّ لِتَذْهَبُوا بِبَعْضِ مَا آتَيْتُمُوهُنَّ إِلَّا أَنْ يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ} [النساء: 19] وذلك أن الرجل كان يرث امرأة ذي قرابته، فيعضلها حتى تموت، أو ترد إليه صداقها، فأحكم الله عن ذلك ونهي عن ذلك.
وإسناده حسن من أجل علي بن حسين بن واقد، وأبيه حسين بن واقد فهما"صدوقان". ويزيد
النحوي هو: ابن أبي سعيد المروزي.
وقوله:"فأحكم الله عن ذلك" معناه: منع.
قال جرير بن الخطفي: أبني حنيفة أُحكِموا سُفهاءَهم إني أخاف عليكم أن أَغْضبا.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এই আয়াত সম্পর্কে বলেন: "হে মুমিনগণ! তোমাদের জন্য নারীদেরকে জবরদস্তিভাবে উত্তরাধিকার সূত্রে গ্রহণ করা বৈধ নয়।" [সূরা নিসা: ১৯] (জাহিলিয়াতের যুগে) যখন কোনো লোক মারা যেত, তখন তার উত্তরাধিকারীরা তার স্ত্রীর উপর সবচেয়ে বেশি হকদার হতো। যদি তাদের কেউ চাইত, তবে তাকে বিবাহ করত; আর যদি চাইত, তবে তাকে (অন্য কারও সাথে) বিবাহ দিত; আর যদি চাইত, তবে তাকে বিবাহ দিত না। অর্থাৎ, তার পরিবারের (অন্যান্য) লোকদের চেয়ে তারা (উত্তরাধিকারীরাই) তার উপর বেশি হকদার ছিল। এই প্রেক্ষিতেই আয়াতটি নাযিল হয়।
অন্য এক বর্ণনায় তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: "(আয়াতে বলা হয়েছে) 'তোমাদের জন্য নারীদেরকে জবরদস্তিভাবে উত্তরাধিকার সূত্রে গ্রহণ করা বৈধ নয়, আর তোমরা তাদেরকে আটকে রেখো না, যাতে তাদের যা কিছু তোমরা দিয়েছ, তার কিছু অংশ তোমরা নিয়ে নিতে পারো, যদি না তারা কোনো প্রকাশ্য অশ্লীল কাজ করে।' [সূরা নিসা: ১৯]" এর কারণ হলো, কোনো লোক তার আত্মীয়ের স্ত্রীকে উত্তরাধিকার সূত্রে পেত এবং তাকে আটক করে রাখত (বিবাহ না দিয়ে) যতক্ষণ না সে মারা যায় বা তার মোহরানা তাকে ফিরিয়ে দেয়। অতঃপর আল্লাহ এ বিষয়ে (এমন কাজ) কঠোরভাবে নিষিদ্ধ করলেন এবং তা থেকে নিষেধ করলেন।
6432 - عن معقل بن يسار قال: كانت أخته تحت رجل فطلقها ثم خلّى عنها حتى انقضت عدتها، ثم خطبها، فحمي معقل من ذلك أنفًا. فقال: خلّى عنها، وهو يقدر عليها. ثم يخطبها. فحال بينه وبينها فأنزل الله: {وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ} [البقرة: 232] إلى آخر الآية. فدعاه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقرأ عليه. فترك الحمية، واستقاد لأمر الله.
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5331) عن محمد بن المثنى، حدثنا عبد الأعلى، حدثنا سعيد، عن قتادة، حدثنا الحسن، أن معقل بن يسار قال: فذكره.
মা'কিল ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তার (মা'কিলের) এক বোন এক ব্যক্তির অধীনে ছিল। সে তাকে তালাক দিল এবং তাকে ছেড়ে দিল যতক্ষণ না তার ইদ্দত শেষ হলো। অতঃপর লোকটি তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিল। এতে মা'কিল আত্মমর্যাদাবশত অত্যন্ত রাগান্বিত হলেন। তিনি বললেন: সে তাকে তালাক দিয়ে ছেড়ে দিয়েছে, যখন সে তাকে ফিরিয়ে নিতে পারত। আর এখন আবার তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিচ্ছে! সুতরাং তিনি ঐ ব্যক্তি ও তার বোনের মাঝে প্রতিবন্ধকতা সৃষ্টি করলেন (তাদের বিবাহে বাধা দিলেন)। তখন আল্লাহ তা‘আলা এ আয়াত নাযিল করলেন: "আর যখন তোমরা স্ত্রীদেরকে তালাক দাও, আর তারা তাদের ইদ্দত পূর্ণ করে ফেলে, তখন তাদের (পূর্বের স্বামীদের সাথে) বিবাহে বাধা দিও না..." [সূরা আল-বাক্বারাহ: ২৩২] শেষ পর্যন্ত। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মা'কিলকে ডাকলেন এবং তাকে (আয়াতটি) পাঠ করে শোনালেন। ফলে তিনি (মা'কিল) তার আত্মমর্যাদা পরিহার করলেন এবং আল্লাহর নির্দেশের কাছে আত্মসমর্পণ করলেন।
6433 - عن ابن عباس في قوله: {مَا نَنْسَخْ مِنْ آيَةٍ أَوْ نُنْسِهَا نَأْتِ بِخَيْرٍ مِنْهَا أَوْ مِثْلِهَا} [البقرة: 106] وقال: {وَإِذَا بَدَّلْنَا آيَةً مَكَانَ آيَةٍ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ} [النحل: 101] الآية وقال: {يَمْحُو اللَّهُ مَا يَشَاءُ وَيُثْبِتُ وَعِنْدَهُ أُمُّ الْكِتَابِ} [الرعد: 39] فأول ما نسخ من القرآن القبلة، وقال: {وَالْمُطَلَّقَاتُ يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ ثَلَاثَةَ قُرُوءٍ} [البقرة: 228] وقال: {وَاللَّائِي يَئِسْنَ مِنَ الْمَحِيضِ مِنْ نِسَائِكُمْ إِنِ ارْتَبْتُمْ فَعِدَّتُهُنَّ ثَلَاثَةُ أَشْهُرٍ} [الطلاق: 4] فنسخ من ذلك فقال تعالي: {ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِنْ قَبْلِ أَنْ تَمَسُّوهُنَّ فَمَا لَكُمْ عَلَيْهِنَّ مِنْ عِدَّةٍ تَعْتَدُّونَهَا} [الأحزاب: 49].
حسن: رواه النسائي (3499) واللفظ له، وأبو داود (2282) كلاهما من حديث علي بن الحسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وأعله المنذري بقوله:"في إسناده علي بن الحسين بن واقد وهو ضعيف".
قلت: علي بن الحسين ليس بضعيف، ولكنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث.
وروي مثل هذا عن قتادة أيضا كما ذكره ابن الجوزي في نواسخ القرآن (ص 206) ولكنه قال:"إن القول الصحيح المعتمد عليه أن هذه الآية محكمة، لأن أولها عام في المطلقات. وما ورد في الحامل، والآيسة، والصغيرة، فهو مخصوص من جملة العموم، وليس على سبيل النسخ" انتهى قوله.
قلت: تخصيص العموم هو نوع من النسخ عند بعض الفقهاء فلا مشاحة في الاصطلاح وفي الباب ما روي عن أسماء بنت يزيد بن السكن الأنصارية أنها طُلِّقتْ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يكن للمطلقة عدة، فأنزل الله عز وجل حين طُلِّقتْ أسماء بالعدة للطلاق، فكانت أول من أنزلت فيها العدة للمطلقات.
رواه أبو داود (2281) ومن طريقه البيهقي (7/ 414) عن سليمان بن عبد الحميد البهراني، حدثنا يحيى بن صالح، حدثنا إسماعيل بن عياش، حدثني عمرو بن مهاجر، عن أبيه، عن أسماء بنت يزيد فذكرته.
وأعله المنذري بقوله:"في إسناده إسماعيل بن عياش، وقد تكلم فيه غير واحد".
قلت: وهو كما قال، ولكن التحرير فيه أن روايته عن الشاميين مستقيمة وهذا منها.
ولكن فيه مهاجر وهو ابن أبي مسلم الشافعي الأنصاري مولى أسماء بنت يزيد روي عنه جمعٌ، ولم يوثّقه أحدٌ غير ابن حبان ولذا قال الحافظ في التقريب"مقبول" أي عند المتابعة وإلا فليّن الحديث.
وقال ابن كثير في تفسيره بعد أن ساقه من تفسير ابن أبي حاتم:"حديث غريب من هذا الوجه".
أي ضعيف من هذا الوجه، وأنه لم يجد له وجها آخر.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তা‘আলার বাণী: “আমি কোনো আয়াত (বিধান) রহিত করলে অথবা ভুলিয়ে দিলে তার চেয়ে উত্তম অথবা তার সমপর্যায়ের কোনো বিধান আনয়ন করি।” [সূরাহ আল-বাকারাহ: ১০৬] এবং তাঁর বাণী: “আর যখন আমি এক আয়াতের স্থলে অন্য আয়াত বদলে দেই, আল্লাহই ভালো জানেন তিনি কী নাযিল করেন।” [সূরাহ আন্-নাহল: ১০১] এবং তাঁর বাণী: “আল্লাহ যা ইচ্ছা করেন মুছে দেন এবং যা ইচ্ছা করেন বহাল রাখেন; আর তাঁর কাছেই রয়েছে উম্মুল কিতাব (মূল কিতাব)।” [সূরাহ আর-রা‘দ: ৩৯]। কুরআনে সর্বপ্রথম যে বিধানটি রহিত করা হয়েছিল, তা হলো ক্বিবলাহ (পরিবর্তন)। এবং (তাঁর বাণী): “আর তালাকপ্রাপ্তা নারীগণ তাদের নিজেদেরকে নিয়ে তিন কুরু’ (মাসিক/পবিত্রতার সময়) অপেক্ষা করবে।” [সূরাহ আল-বাকারাহ: ২২৮] এবং (তাঁর বাণী): “তোমাদের স্ত্রীদের মধ্যে যারা মাসিকের ব্যাপারে নিরাশ হয়ে গেছে, তাদের ব্যাপারে সন্দেহ হলে, তাদের ইদ্দতকাল (অপেক্ষা করার সময়) হবে তিন মাস।” [সূরাহ আত্ব-ত্বালাক্ব: ৪] অতঃপর এর থেকে কিছু রহিত করা হয়েছে। আল্লাহ তা‘আলা বলেন: “অতঃপর তোমরা তাদেরকে স্পর্শ করার আগে যদি তালাক দাও, তবে তোমাদের জন্য তাদের উপর কোনো ইদ্দতকাল নেই যা তোমরা গণনা করবে।” [সূরাহ আল-আহযাব: ৪৯]।
6434 - عن ابن عباس قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم رجل فقال: يا رسول الله، إن سيدي زوّجني أمته، وهو يريد أن يفرق بيني وبينها. قال: فصعد رسول الله صلى الله عليه وسلم المنبر فقال:"يا أيها الناس، ما بالُ أحدكم يُزوج عبده أمته ثم يريد أن يفرق بينهما، إنما الطلاق لمن أخذ بالساق".
حسن: رواه ابن ماجه (2081) عن محمد بن يحيى، قال: حدثنا يحيى بن عبد الله بن بكير، قال: حدثنا ابن لهيعة، عن موسى بن أيوب الغافقي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل ابن لهيعة، ولكن له متابعات تقوّيه.
منها: ما رواه الدارقطني (4/ 37) والبيهقي (7/ 360) كلاهما من وجه آخر عن بقية بن الوليد، نا أبو الحجاج المهري، عن موسى بن أيوب الغافقي. فذكره.
وأبو الحجاج المهري هو رشدين بن سعد المصري وهو ضعيف أيضا.
قال البيهقي:"وخالفه ابن لهيعة فرواه عن موسى بن أيوب مرسلًا"، وهو ما رواه الدارقطني
والبيهقي كلاهما من طريق موسى بن داود، نا ابن لهيعة، عن موسى بن أيوب، عن عكرمة أن مملوكا أتى النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث. ولم يذكر فيه ابن عباس.
ومنها: ما رواه الطبراني في المعجم الكبير من حديث يحيى الحماني، نا يحيى بن يعلى، عن موسى بن أيوب مرفوعا.
ويحيى الحماني وشيخه يحيى بن يعلى وهو الأسلمي الكوفي ضعيفان.
وفي معناه ما رُوي عن عصمة بن مالك قال: جاء مملوك إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إن مولاي زوّجني، وهو يريد أن يفرّق بيني وبين امرأتي. قال: فصعد النبي صلى الله عليه وسلم المنبر فقال:"يا أيها الناس، إنما الطلاق لمن أخذ بالساق".
رواه الدارقطني (4/ 37) وفيه الفضل بن المختار، عن عبيد الله بن موهب، عن عصمة بن مالك فذكره.
والفضل بن المختار هو أبو سهل البصري ضعيف جدًّا، ذكره الذهبي في الميزان (3/ 358) وقال: قال أبو حاتم: أحاديثه منكرة، يحدث بالأباطيل. وقال ابن عدي: أحاديثه منكرة، عامتها لا يتابع عليها.
وأما ما رُوي عن أبي الحسن مولى بني نوفل أنه استفتى ابن عباس في مملوكٍ كانت تحته مملوكة، فطلّقها تطليقتين، ثم عُتقا بعد ذلك: هل يصلح له أن يخطبها؟ قال: نعم، قضى بذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2187) والنسائي (3427) وابن ماجه (2082) وأحمد (2031) والبيهقي (7/ 370 - 371) كلهم من حديث يحيى بن أبي كثير، عن عمر بن معتّب، عن أبي الحسن فذكره.
وعمر بن معتِّب ضعيف جدا.
قال فيه ابن المديني: منكر الحديث. وقال النسائي:"ليس بالقوي".
قال أبو داود:"سمعت أحمد بن حنبل قال: قال عبد الرزاق: قال ابن المبارك لعمر: من أبو الحسن هذا؟ لقد تحمل صخرة عظيمة. قال أبو داود: أبو الحسن هذا، روى عنه الزهري، قال الزهري: وكان من الفقهاء، روي الزهري عن أبي الحسن أحاديث. قال أبو داود: أبو الحسن معروف، وليس العمل على هذا الحديث". انتهى.
وقال البيهقي بعد أن نقل كلام ابن المديني في عمر بن معتب:"مجهول، لم يرو عنه غير يحيى".
قوله:"الطلاق لمن أخذ بالساق" معناه أن الطلاق حقّ الزوج الذي له أن يأخذ بساق المرأة، وليس ذلك بحقّ المولي.
رواه أبو داود (2189) والترمذي (1182) وابن ماجه (2080) والدارقطني (2/ 39) والحاكم (2/ 205). كلهم من حديث أبي عاصم قال: حدثنا ابن جريج، عن مظاهر بن أسلم، عن القاسم، عن عائشة فذكرته.
وإسناده ضعيف من أجل مظاهر بن أسلم، فإنه ضعيف باتفاق أهل العلم.
ولذا قال الترمذي:"حديث عائشة حديث غريب لا نعرفه مرفوعًا إلا من حديث مظاهر بن أسلم. ومظاهر لا يعرف له في العلم غير هذا الحديث".
وقال أبو داود:"هو حديث مجهول". وذكر البخاري في"التاريخ الأوسط" (2038) أن أبا عاصم يُضعف مظاهرًا.
وأما الحاكم فقال:"مظاهر بن أسلم شيخ من أهل البصرة، لم يذكره أحد من متقدمي مشايخنا بجرح، فإذا الحديث صحيح".
وقول الحاكم عجيب، فقد سبق القول فيه عن يحيى بن معين فقال: ليس بشيء. وقال أبو حاتم:"منكر الحديث". وقال أبو داود:"مجهول، وحديث في طلاق الأمة منكر". وقال النسائي:"ضعيف".
وأعجب منه صنيع ابن حبان فإنه ذكره في الثقات (7/ 528) ولم يلتفت إلى كلام هؤلاء في مظاهر بن أسلم.
وجاء في التاريخ الأوسط (874): حدثنا محمد: قال: نا يحيى بن سليمان، قال: حدثنا ابن وهب، قال: حدثني أسامة بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن القاسم وسالم: عدّةُ الأمة حيضتان، وطلاقُ الحرِّ الأمةَ ثلاثٌ، وطلاقُ العبدِ الحرةّ تطليقتان.
وقال: ليس هذا في كتاب الله ولا سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكن عمل بها المسلمون وهذا يرد حديث مظاهر. انتهى.
ففي هذا نفي عن القاسم أن يكون ما رواه من عائشة مرفوعا إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وإنما الصحيح أنه موقوف على أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومنهم أخذ المسلمون.
وذكر الدارقطني عن أبي عاصم قال:"ليس بالبصرة حديث أنكر من حديث مظاهر بن أسلم هذا، وعن أبي بكر النيسابوري قال:"الصحيح عن القاسم خلاف هذا".
ثم روى بإسناده عن زيد بن أسلم قال: سئل القاسم عن عدة الأمة. فقال: الناس يقولون: حيضتان، وإنا لا نعلم ذلك، أو قال: لا نجد ذلك في كتاب الله، ولا في سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكن عمل به المسلمون" باختصار.
وهذا دليل على أن الحديث ليس للقاسم، وإنما أخطأ فيه مظاهر بن أسلم، وقد يكون قول أحد من التابعين فجعله مرفوعًا.
وقد أشار الترمذي إلى عمل المسلمين بهذا الأثر بقوله:
"والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم. وهو قول سفيان الثوري والشافعي وأحمد وإسحاق".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عمر موقوفًا:"طلاق الأمة اثنتان وعدتها حيضتان".
رواه ابن ماجه (2079) والدارقطني (4/ 38) كلاهما من حديث عمر بن شيب المُسْلي، عن عبد الله بن عيسى، عن عطية، عن ابن عمر فذكره.
وأُعِلَّ بعطية: وهو ابن سعد العوفي، وهو يُضعَّف إذا انفرد، مع التدليس.
وعمر بن شبيب هو المُسْلي الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم.
قال الدارقطني:"تفرد به عمر بن شبيب مرفوعًا، وكان ضعيفًا، والصحيح عن ابن عمر ما رواه سالم ونافع عنه من قوله".
وقال:"وحديث عبد الله بن عيسى، عن عطية، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم منكر غير ثابت من وجهين: أحدهما أن عطية ضعيف، وسالم ونافع أثبت منه وأصح رواية.
والوجه الآخر: أن عمر بن شبيب ضعيف الحديث، لا يحتج بروايته.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার মনিব আমাকে তার দাসীর সাথে বিবাহ দিয়েছেন, আর এখন তিনি আমার ও তার মাঝে বিচ্ছেদ ঘটাতে চাচ্ছেন। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং বললেন: হে লোক সকল! তোমাদের কারো কী হয়েছে যে, সে তার গোলামকে তার দাসীর সাথে বিবাহ দেয়, তারপর তাদের মাঝে বিচ্ছেদ ঘটাতে চায়? নিশ্চয়ই তালাকের অধিকার কেবল তার, যে ساق (পায়ের গোছা/স্বামীত্ব) ধরেছে।
6435 - عن ابن مسعود قال: لعن رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المُحِلّ والمُحَلَّل له.
صحيح: رواه الترمذي (120) والنسائي (3411) وأحمد (4248) والبيهقي (7/ 208) كلهم من حديث سفيان الثوري، عن أبي قيس، عن هُزيل، عن عبد الله فذكره.
والهزيل هو ابن شرحبيل الأودي من رجال البخاري ثقة مخضرم.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، وأبو قيس الأودي اسمه عبد الرحمن بن ثروان، وقد رُوي هذا الحديث، عن النبي صلى الله عليه وسلم من غير وجه، والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم منهم: عمر بن الخطاب، وعثمان بن عفان، وعبد الله بن عمرو، وغيرهم. وهو قول الفقهاء من التابعين، وبه يقول سفيان الثوري، وابن المبارك، والشافعي، وأحمد، وإسحاق. وسمعت الجارود بن معاذ يذكر عن وكيع أنه قال بهذا وقال: ينبغي أن يُرمي بهذا الباب من قول أصحاب الرأي. قال وكيع: وقال سفيان:"إذا تزوج المرأةَ ليحللها، ثم بدا له أن يمسكها فلا يحل له أن يُمسكها إلا بنكاح جديد". انتهى.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হিল্লাকারী এবং যার জন্য হিল্লা করা হয় (প্রথম স্বামী) উভয়কে অভিশাপ দিয়েছেন।
6436 - عن أبي هريرة قال: لعن رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المُحِلّ والمُحَلَّل له.
حسن: رواه أحمد (8287) وابن الجارود (684) والبزار - كشف الأستار - (1442) والبيهقي (7/ 208) والترمذي في العمل الكبير (1/ 437) من حديث عبد الله بن جعفر المخزومي، عن
عثمان بن محمد الأخنسي، عن المقبري، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن جعفر المخزومي، وشيخه عثمان بن محمد الأخنسي فإنهما حسنا الحديث.
قال الترمذي:"سألت محمدا عن هذا الحديث فقال: هو حديث حسن، وعبد الله بن جعفر المخزومي صدوق ثقة، وعثمان بن محمد الأخنسي ثقة، وكنت أظن أن عثمان لم يسمع من سعيد المقبري".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই ব্যক্তিকে লা’নত (অভিশাপ) করেছেন, যে (তালাকপ্রাপ্ত স্ত্রীকে হালাল করার জন্য সাময়িকভাবে) বিয়ে করে (মুহাল্লিল) এবং যার জন্য হালাল করা হয় (মুহাল্লাল লাহু)।
6437 - عن عقبة بن عامر، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا أخبركم بالتَّيْس المستعار؟". قالوا: بلى يا رسول الله. قال:"هو المحلِّل. لعن الله المحلِّل والمحلَّل له"
حسن: رواه ابن ماجه (1936) عن يحيى بن عثمان بن صالح المصري قال: حدثنا أبي، قال: سمعت الليث بن سعد يقول: قال لي أبو مصعب مشرح بن هاعان، قال عقبة بن عامر فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أيضا الحاكم (2/ 198 - 199) وقال:"صحيح الإسناد" وقال:"وقد ذكر أبو صالح كاتب الليث، عن الليث سماعه من مشرح بن هاعان" ثم قال بعد سياق الإسناد الذي فيه سماع الليث من مشرح:"صحيح الإسناد".
كأنه يريد الرد على قول أبي زرعة إذ قال كما في"العلل" (1/ 411) لابن أبي حاتم: ذكرت هذا الحديث ليحيى بن عبد الله بن بكير، وأخبرته برواية عبد الله بن صالح وعثمان بن صالح فأنكر ذلك إنكارًا شديدًا وقال: لم يسمع الليث من مشرح شيئًا، ولا روى عنه شيئا، وإنما حدثني الليث ابن سعد بهذا الحديث عن سليمان بن عبد الرحمن أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال.
قال أبو زرعة:"الصواب عندي: حديث يحيي يعني ابن عبد الله بن بكير". انتهى.
قلت: والمثبت مقدم على النافي، والإسناد حسن من أجل أبي مصعب مشرح بن هاعان، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وثّقه ابن معين، والعجلي، وابن حبان، وروى عنه عدد كبير، ثم أعاد ابن حبان ذكره في المجروحين فقال:"يروي عن عقبة بن عامر أحاديث مناكير لا يتابع عليها، والصواب في أمره ترك ما انفرد من الروايات، والاعتبار بما يوافق الثقات".
ولكن كلام ابن عدي أكثر صوابًا إذ قال بعد أن سبر رواياته:"أرجو أنه لا بأس به".
উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: আমি কি তোমাদেরকে 'ভাড়া করা ষাঁড়' সম্পর্কে অবহিত করব না? তাঁরা বললেন: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন: সে হলো 'মুহাল্লিল' (হালালকারী)। আল্লাহ তা‘আলা লা‘নত (অভিসম্পাত) করেছেন 'মুহাল্লিল' (হালালকারীর) উপর এবং যার জন্য হালাল করানো হলো (মুহাল্লাল লাহুর) উপর।
6438 - عن نافع أنه قال: جاء رجل إلى ابن عمر فسأله عن رجل طلّق امرأته ثلاثا، فتزوجها أخ له من غير موامرة منه ليُحلّها لأخيه، هل تحل للأول؟ قال: لا إلا نكاح رغبة. كنا نعد هذا سفاحًا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط - مجمع البحرين - (2367) والحاكم (2/ 199) وعنه البيهقي (7/ 208) من طريق أبي غسان محمد بن مطرف، عن عمر بن نافع، عن أبيه فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين" ـ
وفي معناه ما روي عن ابن عباس قال:"لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم المحلّل والمحلَّل له" رواه ابن ماجه (1934) عن محمد بن بشار قال: حدثنا أبو عامر، عن زمعة بن صالح، عن سلمة بن وهرام، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وزمعة بن صالح ضعيف باتفاق أهل العلم، ضعّفه الإمام أحمد وابن معين وأبو داود وأبو حاتم والنسائي وغيرهم. وقال ابن حبان: كان رجلًا صالحًا يهم ولا يعلم، ويُخطئ ولا يفهم، حتى غلب في حديثه المناكير التي يرويها عن المشاهير. وبه أعله أيضا البوصيري.
وأما شيخه سلمة بن وهرام فهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وأما ما روي عن علي قال:"لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم عشرة: آكلَ الربا، وموكله، وكاتبه، وشاهديه، والمحل والمحلل له، ومانع الصدقة، والواشمة والمستوشمة" فهو ضعيف.
انظر تخريجه في كتاب البيوع، وكذلك لا يصح حديث جابر.
قال الترمذي:"حديث علي وجابر حديث معلول هكذا رواه أشعث بن عبد الرحمن، عن مجالد، عن عامر الشعبي، عن الحارث، عن علي، وعامر عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وهذا حديث ليس إسناده بالقائم. لأن مجالد بن سعيد قد ضعَّفه بعضُ أهل العلم، منهم أحمد بن حنبل. وروى عبد الله بن نُمير هذا الحديث عن مجالد، عن عامر، عن جابر بن عبد الله، عن علي. وهذا قد وهم فيه ابنُ نمير، والحديث الأول أصح، وقد رواه مغيرة، وابن أبي خالد وغير واحد عن الشعبي، عن الحارث، عن علي". انتهى.
قلت: وأما حديث علي بن أبي طالب فرواه أبو داود (2076) والترمذي (1119) والنسائي (8/ 147) وابن ماجة (1935) وأحمد (635) كلهم عن الشعبي، عن الحارث، عن علي فذكر الحديث. ذكر بعضهم مطولًا، وبعضهم مختصرًا. والحارث هو الأعور وهو ضعبف باتفاق أهل العلم.
قوله: والمحلّ: من الإحلال، والمحلَّل له: من التحليل، وهما بمعني، ولذا روي المُحِلّ والمُحَلّ له بلام واحد مشددة، والمحلل والمحلل له، بلامين أولهما مشددة، ثم المحلل من تزوج مطلقة الغير ثلاثا لتُحِل له، والمحلل له: هو المُطَلِّق، وإنما لعن، لأنه هتكُ مروءةٍ وقلةُ حميةٍ، وخِسَّة نفسٍ، وهو بالنسبة إلى المحلل له ظاهر، وأما المحلِّل فإنه كالتيس يُعير نفسه بالوطء لغرض الغير، وتسميته محلِّلا عند من يقول بصحة نكاحه ظاهرة، ومن لا يقول بها، لأنه قصد التحليل وإن كانت لا تحل، والله تعالى أعلم. قاله السندي.
حسن: رواه أبو داود (2195) ومن طريقه البيهقي (7/ 337) والنسائي (3554) من حديث علي بن حسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام الخفيف في علي بن حسين وأبيه.
وفي الباب ما رويَ عن عائشة قالت: كان الناس، والرجل يطلق امرأته ما شاء أن يطلقها، وهي امرأته إذا ارتجعها وهي في العدة، وإن طلقها مئة مرة، أو أكثر، حتى قال الرجل لامرأته: والله لا أطلِّقك فتَبِيني مني، ولا آويكِ أبدًا. قالت: وكيف ذاك؟ قال: أُطَلِّقُكِ، فكلما همَّت عدتُك أن تنقضي، راجعتُك، فذهبتِ المرأة حتى دخلتْ على عائشة فأخبرتها. فسكتت عائشة حتى جاء النبي صلى الله عليه وسلم فأخبرته، فسكتَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم، حتى نزل القرآن: {الطَّلَاقُ مَرَّتَانِ فَإِمْسَاكٌ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌ بِإِحْسَانٍ} [البقرة: 229].
قالت عائشة: فاستأنف الناس الطلاقَ مستقبِلا، من كان طلّق ومن لم يكن طلق.
رواه الترمذي (1192) عن قتيبة بن سعيد، قال: حدثنا يعلى بن شبيب، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
وفيه يعلى بن شبيب المكي لم يوثقه أحد غير ابن حبان فهو مجهول، أو"مقبول" عند ابن حجر، إلا أنه قال في التقريب:"لين الحديث".
وخالفه عبد الله بن إدريس فرواه عن هشام بن عروة عن أبيه نحو هذا الحديث بمعناه ولم يذكر فيه: عن عائشة أخرجه الترمذي عقبه وقال: وهذا أصح من حديث يعلى بن شبيب".
وأما الحاكم فأخرجه في المستدرك (2/ 279) من وجه آخر عن يعلى بن شبيب وقال: هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يتكلم أحد في يعقوب بن حميد بن كاسب بحجة.
تعقَّبه الذهبي فقال:"قد ضعَّفه غير واحد".
قلت: وفيه علة أخرى وهي يعلى بن شبيب مجهول كما مضى.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর নিকট এক ব্যক্তি এসে সেই লোক সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলো, যে তার স্ত্রীকে তিন তালাক দিয়েছে। এরপর তার এক ভাই কোনো প্রকার পরামর্শ ছাড়াই তাকে এই উদ্দেশ্যে বিয়ে করলো যাতে সে তার ভাইয়ের জন্য হালাল হয়ে যায়। সে কি প্রথম স্বামীর জন্য হালাল হবে? তিনি বললেন: না, যতক্ষণ না তা (স্বাভাবিক) প্রকৃত বিবাহের উদ্দেশ্যে হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা এই কাজকে ব্যভিচার (সফাহান/অবৈধ কাজ) হিসেবে গণ্য করতাম।
6439 - عن أبي أسيد قال: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم حتى انطلقنا إلى حائط يقال له: الشوط، حتى انتهينا إلى حائطين فجلس بينهما، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اجلسوا هاهنا" ودخل، وقد أتى بالجونية، فأُنزلتْ في بيت في نخل في بيت أميمة بنت النعمان بن شراحيل، ومعها دايتها حاضنة لها. فلما دخل عليها النبي صلى الله عليه وسلم قال:"هبي نفسك لي" فقالت: وهل تَهَبُ الملكة نفسها للسوقة؟ قال: فأهوى بيده يضع يده عليها لتسكن. فقالت: أعوذ بالله منك، فقال:"قد عُذتِ بمعاذ" ثم خرج علينا فقال:"يا أبا أسيد،
اكسُها رازقيتين، وألْحِقها بأهلها".
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5255) أبي نعيم، حدثنا عبد الرحمن بن غَسيل، عن حمزة بن أبي أسيد، عن أبي أسيد فذكره.
وقال البخاري (5256) وقال الحسين بن الوليد النيسابوري، عن عبد الرحمن، عن عباس بن سهل، عن أبيه، وأبي أسيد قالا: تزوج النبي صلى الله عليه وسلم أميمة بنت شراحيل، فلما أُدخلتْ عليه بسط يده إليها. فكأنها كرهت ذلك. فأمر أبا أسيد أن يُجهزها، ويكسوها ثوبين رازقيين.
وقوله:"داية": معرب يقال للممرضة والقابلة. والمراد هنا من كانت معها لاصلاح شأنها.
وقولها:"للسوقة": أي لواحد من الرعية. وهي جَهِلَتْ كونَه نبي الله صلى الله عليه وسلم ولما علمت ذلك تأسفت وقالت: خَدِعتُ وأنا شَقية.
আবূ উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে বের হলাম এবং ‘আশ-শাওত’ নামক একটি বাগানের দিকে গেলাম। আমরা দুটি বাগানের কাছে পৌঁছালাম। তিনি সেগুলোর মাঝে বসলেন এবং বললেন: "তোমরা এখানেই বসো।" এরপর তিনি ভিতরে প্রবেশ করলেন। ইতিপূর্বে জাওনিয়্যাহকে (বিয়ের জন্য) আনা হয়েছিল এবং তাঁকে উমাইমাহ বিনত নু‘মান বিন শুরাহীলের ঘরে খেজুর গাছের কাছে অবস্থিত একটি ঘরে নামানো হলো। তাঁর সাথে তাঁর সেবিকা (দায়াহ) ছিল, যে তাঁকে লালন-পালন করত। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন, তিনি বললেন: "তুমি নিজেকে আমার কাছে সমর্পণ করো।" তিনি বললেন: রাণী কি নিজেকে বাজারের সাধারণ প্রজার কাছে সমর্পণ করে? বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে শান্ত করার জন্য তাঁর দিকে হাত বাড়ালেন। তিনি বললেন: আমি তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই। তিনি বললেন: "তুমি তো আশ্রয় পাওয়ার যোগ্য (আল্লাহর) নিকট আশ্রয় চেয়েছো।" এরপর তিনি আমাদের কাছে বেরিয়ে এলেন এবং বললেন: "হে আবূ উসাইদ, তাকে দুটি রাযিকীয়াহ পোশাক পরিয়ে দাও এবং তাকে তার পরিবারের কাছে পৌঁছে দাও।"
6440 - عن جابر بن عبد الله قال: لما طلَّق حفص بن المغيرة امرأته فاطمة أتت النبي صلى الله عليه وسلم، فقال لزوجها:"مَتِّعها" قال: لا أجد ما أمتعها. قال:"فإنه لا بد من المتاع" قال:"مَتِّعْهَا ولو نصف صاع من تمر".
حسن: رواه البيهقي (7/ 257) عن أبي عبد الله الحافظ، أنبأ أبو بكر أحمد بن إسحاق، أنبأ علي بن عبد الصمد، ثنا أبو همام الوليد بن شجاع السكوني، ثنا مصعب بن سلَّام، ثنا شعبة، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل علي بن عبد الصمد، وهو أبو الحسن الطيالسي يعرف بعلان ماغمه، كان ثقة كما قال الخطيب في ترجمته (12/ 28)، وقال أيضا: وكان كثير الحديث قليل المروءة.
وفيه أيضا عبد الله بن محمد بن عقيل مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.
ونقل البيهقي قصة ظريفة عن القاضي شريح أن رجلا طَلَّق امرأته عنده فقال: مَتِّعْها. فقالت المرأة: إنه ليس لي عليه متعة، إنما قال الله: {وَلِلْمُطَلَّقَاتِ مَتَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ حَقًّا عَلَى الْمُتَّقِينَ} [البقرة: 241] وللمطلقات متاع بالمعروف حقا على المحسنين، وليس من أولئك.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন হাফস ইবনুল মুগীরাহ তার স্ত্রী ফাতিমাহকে তালাক দিলেন, তখন তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার স্বামীকে বললেন, "তাকে কিছু উপহার (মুতাআ) দাও।" সে বলল, তাকে উপহার দেওয়ার মতো আমার কাছে কিছু নেই। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "অবশ্যই তাকে মুতাআ দিতে হবে।" তিনি বললেন, "তাকে উপহার দাও, অন্ততপক্ষে অর্ধ 'সা' পরিমাণ খেজুর হলেও।"
6441 - عن عبد الله بن عباس أن امرأة ثابت بن قيس أتتِ النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله، ثابت بن قيس ما أعتبُ عليه في خُلُق ولا دين، ولكني أكره الكفر في الإسلام، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتردين عليه حديقتَه؟" قالت: نعم. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أقبل الحديقة وطلِّقها تطليقة".
صحيح: رواه البخاري في الطلاق (5273) عن أزهر بن جميل، حدثنا عبد الوهاب الثقفي، حدثنا خالد، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وفي رواية (5277) سماها"جميلة".
وأخرج عبد الرزاق (11759)، عن معمر، قال: بلغني أنها قالت: يا رسول الله! لي من الجمال ما ترى، وثابت رجل دميم.
وفي رواية معتمر بن سليمان، عن فضيل، عن أبي جرير، عن عكرمة، عن ابن عباس: أول خلع كان في الإسلام امرأة ثابت بن قيس، أتت النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! لا يجتمع رأسي ورأس ثابت أبدًا، إني رفعت جانب الخباء، فرأيته أقبل في عدة، فإذا هو أشدُّهم سوادا، وأقصرُهم قامة، وأقبحهم وجهًا. رواه ابن جرير في تفسيره عن محمد بن عبد الأعلى، عن المعتمر به.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাবেত ইবনে কায়সের স্ত্রী নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! সাবেত ইবনে কায়সের চরিত্র বা দ্বীন সম্পর্কে আমার কোনো অভিযোগ নেই, কিন্তু আমি ইসলামে (থাকাবস্থায়) কুফরি (অকৃতজ্ঞতা) অপছন্দ করি।’ তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘তুমি কি তাকে তার বাগান ফিরিয়ে দেবে?’ সে বলল, ‘হ্যাঁ।’ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘তুমি বাগান গ্রহণ করো এবং তাকে এক তালাক দাও।’
[সহীহ: ইমাম বুখারী এটি ‘কিতাবুত তালাক’ (৫২৭৩)-এ আযহার ইবনে জামিল থেকে, তিনি আব্দুল ওয়াহহাব সাকাফী থেকে, তিনি খালিদ থেকে, তিনি ইকরিমা থেকে এবং তিনি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। অপর এক বর্ণনায় (৫২৭৭)-এ তার নাম ‘জামীলা’ বলে উল্লেখ করা হয়েছে। আব্দুর রাযযাক (১১৭৫৯) মা‘মার থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমার নিকট খবর পৌঁছেছে যে, স্ত্রী বলেছিলেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার যে সৌন্দর্য আছে তা আপনি দেখতে পাচ্ছেন, কিন্তু সাবেত একজন কুৎসিত চেহারার মানুষ। মুতামির ইবনে সুলাইমানের অন্য বর্ণনায় ফুযাইল থেকে, তিনি আবূ জারীর থেকে, তিনি ইকরিমা থেকে, তিনি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, ইসলামের সর্বপ্রথম খুল‘আ ছিল সাবেত ইবনে কায়সের স্ত্রীর। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার মাথা আর সাবেতের মাথা কখনও একত্রিত হতে পারে না। আমি একবার পর্দার এক পাশ তুলে দেখি যে, সে কয়েকজন লোকের সাথে আসছে। সে ছিল তাদের মধ্যে সবচেয়ে কালো, সবচেয়ে বেঁটে এবং সবচেয়ে কুৎসিত চেহারার। ইবনে জারীর তার তাফসীরে এটি মুহাম্মাদ ইবনে আবদুল আ’লা থেকে, তিনি মুতামির থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।]
6442 - عن حبيبة بنت سهل الأنصاري، أنها كانت تحت ثابت بن قيس بن شماس. وأن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج إلى الصبح. فوجد حبيبة بنت سهل عند بابه في الغَلَس، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من هذه؟" فقالت: أنا حبيبة بنت سهل يا رسول الله. قال:"ما شأنك؟" قالت: لا أنا ولا ثابت بن قيس لزوجها، فلما جاء زوجُها ثابت بن قيس، قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذه حبيبة بنت سهل، قد ذكرت ما شاء الله أن تذكر" فقالت حبيبة: يا رسول الله، كل ما أعطاني عندي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لثابت بن قيس:"خذ منها" فأخذ منها وجلست في بيت أهلها.
صحيح: رواه مالك في الطلاق (21) عن يحيى بن سعيد، عن عمرة بنت عبد الرحمن، أنها أخبرته عن حبيبة بنت سهل الأنصاري، فذكرته.
ومن طريق مالك رواه الإمام أحمد (27444)، وأبو داود (4280)، والنسائي (4280) وابن ماجه (3462) وابن حبان (3462) وابن الجارود (749) وغيرهم. وإسناده صحيح.
وفي قوله:"جلستْ في بيت أهلها": دليل على أنه لا سكن للمختلعة على الزوج.
হাবীবা বিনত সাহল আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ছিলেন সাবিত ইবনে কায়স ইবনে শাম্মাসের স্ত্রী। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের (নামাজের) জন্য বের হলেন। তিনি ভোর রাতে (অন্ধকারের মধ্যে) তাঁর দরজার কাছে হাবীবা বিনত সাহলকে দেখতে পেলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "কে তুমি?" সে বলল: আমি হাবীবা বিনত সাহল, ইয়া রাসূলাল্লাহ। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার কী হয়েছে?" সে তার স্বামী সম্পর্কে বলল: আমি ও আমার স্বামী সাবিত ইবনে কায়স একসাথে থাকতে পারব না। যখন তার স্বামী সাবিত ইবনে কায়স আসলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "এই হল হাবীবা বিনত সাহল, সে যা বলার তা বলেছে।" তখন হাবীবা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ, তিনি আমাকে যা কিছু দিয়েছেন, তার সবকিছুই আমার কাছে আছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাবিত ইবনে কায়সকে বললেন: "তার কাছ থেকে তা গ্রহণ করো।" এরপর তিনি তার কাছ থেকে তা গ্রহণ করলেন এবং হাবীবা তার পরিবারের ঘরে গিয়ে অবস্থান করল।
6443 - عن عائشة أن حبيبة بنت سهل كانت عند ثابت بن قيس بن شماس، فضربها، فكسر بعضها، فأتت النبي صلى الله عليه وسلم بعد الصبح، فاشتكته إليه. فدعا النبي صلى الله عليه وسلم ثابتا فقال:"خذ بعض مالها وفارقها"، فقال: ويصلح ذلك يا رسول الله؟ قال:"نعم"، قال: فإني أصدقتها حديقتين وهما بيدها. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"خذهما وفارقها" ففعل.
صحيح: رواه أبو داود (2228) عن محمد بن معمر، حدثنا أبو عامر عبد الملك بن عمرو، حدثنا أبو عمرو السدوسي المديني، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن عمرة، عن عائشة فذكرته.
ولكن رواه البيهقي (7/ 315) من وجه آخر عن سعيد بن سلمة بن أبي الحسام، عن عبد الله بن أبي بكر وفيه: فأخذ إحداهما ففارقها، ثم تزوجها أُبَيُّ بن كعب بعد ذلك، فخرج بها إلى الشام فتوفيت هنالك.
وإسناده صحيح. والحديثان صحيحان سمعت عمرة بنت عبد الرحمن هذا الحديث أولا من عائشة، ثم تيسر لها السماع من حبيبة بنت سهل صاحبة القصة.
وفي قوله:"خذهما وفارقها": دليل على أن يأخذ الرجل كل ما أعطاها، ولكن في الرواية الثانية أنه أخذ إحداهما فلعله أخذ في أول الأمر كلتيهما ثم رد إحداهما تنزها منه.
وفي معناه ما روي عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: كانت حبيبة بنت سهل تحت ثابت بن قيس بن شماس. وكان رجلًا دميمًا فقالت: يا رسول الله! والله! لولا مخافة الله إذا دخل عليّ لبصقت في وجهه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتردين عليه حديقته؟" قالت: نعم. قال: فردت عليه حديقتَه قال: ففرق بينهما رسولُ الله صلى الله عليه وسلم.
رواه ابن ماجه (2057) عن أبي كريب، قال: حدثنا أبو خالد الأحمر، عن حجاج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره. والحجاج هو ابن أرطاة مدلس معروف، وقد ضُعِّف من غير التدليس أيضا.
ورواه الإمام أحمد (16095) من وجهين أحدهما من طريق الحجاج بإسناده السابق، والثاني من طريق الحجاج، عن محمد بن سليمان بن أبي حثمة، عن عمه سهل بن أبي حثمة قال: كانت حبيبة بنت سهل تحت ثابت بن قيس بن شماس الأنصاري فذكره مثله. وقال في آخره: فكان ذلك أول خلع في الإسلام. وفي الطريقين الحجاج بن أرطاة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হাবীবাহ বিন্ত সাহল ছিলেন সাবেত ইবনু ক্বায়স ইবনু শাম্মাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী। সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে মেরে তাঁর (শরীরের) কিছু অংশ ভেঙে দেন। তিনি ফজরের পর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এসে তাঁর (সাবেত)-এর বিরুদ্ধে অভিযোগ করলেন। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সাবেতকে ডাকলেন এবং বললেন: "তুমি তার কিছু সম্পদ নিয়ে তাকে বিচ্ছিন্ন (তালাক) করে দাও।" সাবেত বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! এটা কি ঠিক হবে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" সাবেত বললেন, আমি তাকে মোহরানা হিসেবে দু'টি বাগান দিয়েছিলাম এবং তা এখন তার দখলে আছে। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তুমি সে দুটি নিয়ে নাও এবং তাকে তালাক দাও।" এরপর তিনি তা-ই করলেন।
6444 - عن ثوبان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيما امرأة سألت زوجَها الطلاق في غير ما بأس، فحرام عليها رائحةُ الجنة".
صحيح: رواه أبو داود (2226) والترمذي (1187) وابن ماجه (2055) وابن الجارود (748) وصحّحه ابن حبان (4184) والحاكم (2/ 200) والبيهقي (7/ 316) كلهم من طرق عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء، عن ثوبان فذكره. وإسناده صحيح، وأبو أسماء اسمه: عمرو بن مرثد الرحبي إلا أن الترمذي رواه عن أبي قلابة، عمن حدّثه، عن ثوبان. وقال:"هذا حديث حسن، ويروى هذا الحديث عن أيوب عن أبي قلابة، عن أبي أسماء، عن ثوبان، ورواه بعضهم عن أيوب بهذا الإسناد، ولم يرفعه". انتهى.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: قول أبي قلابة: عمن حدثه عن ثوبان.
جاء التصريح به في روايات أخرى أنه أبو أسماء الرحبي، وبذكره زال هذا الإبهام والإعلال به، وهو ثقة.
وقول الترمذي: رواه بعضهم عن أيوب، بهذا الإسناد ولم يرفعه. إشارة إلى ما رواه ابن أبي شيبة (5/ 271) عن وكيع، عن سفيان الثوري، عن خالد الحذاء، وأيوب، عن أبي قلابة، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا.
والحكم لمن وصله. وقد وصله ابن أبي شيبة نفسه بعده بذكر أبي أسماء، عن ثوبان كما مضى.
وقوله: سألتْ زوجَها الطلاق. أي الخلع، لأن الطلاق بيد الرجل، وهو حق من حقوقه. وله أن يستعمله إذا لزم الأمر.
والخلع من حقوق المرأة، فإن رأت أن الحياة الزوجية لا تَستقيم فلها أن تطلب الخلع من زوجها، ويجوز للزوج أن يطلب منها ما أنفق عليها من المهر لقوله تعالى: {فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ اللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا افْتَدَتْ بِهِ} [البقرة: 229].
وأما ما رُوي عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تسأل المرأةُ زوجها الطلاقَ في غير كنهه، فتجد رائحة الجنة، وإن ريحها ليوجد من مسيرة أربعين عامًا" فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (2054) عن بكر بن خلف أبي عاصم، عن جعفر بن يحيى بن ثوبان، عن عمه عمارة بن ثوبان، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
وفيه جعفر بن يحيى بن ثوبان وعمه، وهو شيخه عمارة بن ثوبان مجهولان، وعطاء هو: ابن أبي رباح.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ثوبان، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"المختلعات هن المنافقات". رواه
الترمذي (1186) عن أبي كريب، حدثنا مزاحم بن ذُوّاد بن عُلْية، عن أبيه، عن ليث، عن أبي الخطاب، عن أبي زرعة، عن أبي إدريس، عن ثوبان فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، وليس إسناده بالقوي".
قلت: فيه سلسلة الضعفاء والمجاهيل فوالد مزاحم وهو ذُوّاد بن علبة الحارثي ضعيف عند أكثر أهل العلم، وشيخه ليث وهو: ابن أبي سليم وفيه كلام معروف. وهو ضعيف أيضا عند أكثر أهل العلم، وشيخه أبو الخطاب مجهول.
وروى معناه أيضا في حديث أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المختلعات والمنتزعات هن المنافقات".
رواه النسائي (3461) وأحمد (9358) والبيهقي (7/ 316) كلهم من حديث وُهيب بن خالد، عن أيوب، عن الحسن، عن أبي هريرة فذكره.
وجاء في سنن النسائي. قال الحسن: لم أسمعه من غير أبي هريرة.
وعلق عليه النسائي بقوله: الحسن لم يسمع من أبي هريرة شيئًا.
قلت: وعليه جمهور أهل العلم. منهم بهز بن أسد يقول: لم يسمع من أبي هريرة، ولم يره.
وقال يونس بن عبيد:"الحسن ما رآه قط".
وقال أحمد بن حنبل:"قال بعضُهم عن الحسن، ثنا أبو هريرة".
فقال ابن أبي حاتم:"إنكارًا عليه أنه لم يسمع من أبي هريرة".
وقال علي بن المديني:"لم يسمع من أبي هريرة شيئًا".
وقال أبو حاتم: لم يسمع الحسن من أبي هريرة".
وقال أبو زرعة:"لم يسمع من أبي هريرة ولم يره، قيل له: فمن قال: ثنا أبو هريرة، قال: يخطئ.
قال ابن أبي حاتم:"قلت لأبي: إن سالمًا الخياط روي عن الحسن قال: سمعت أبا هريرة. فقال: هذا مما يُبين ضعفَ سالم".
وعلى آراء أقوال أهل العلم يحمل قول الحسن على أنه ما نفى علمه بأن يكون هذا الحديث قد روي عن غير أبي هريرة، لا أنه سمع منه.
ومعنى الحديث: أن اللاتي يطلبنَ الخلق والطلاقَ بدون عذر مقبول هن كالمنافقات اللاتي يدّعين الإسلام، ولا يعملن ما يدعو إليه الإسلام من المصالحة والمصابرة على الحياة الزوجية.
ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো নারী কোনো বৈধ কারণ বা অসুবিধা ছাড়া তার স্বামীর কাছে তালাক চায়, তার উপর জান্নাতের সুঘ্রাণ হারাম।"
6445 - عن ابن عباس أن جميلة بنت سلول أتتِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقالت: والله ما أعتبُ ثابتا في دِين ولا خلق، ولكني أكره الكفر في الإسلام. لا أطيقه بغْضًا. فقال لها النبي
- صلى الله عليه وسلم:"أتردين عليه حديقتَه؟" قالت: نعم. فأمره النبي صلى الله عليه وسلم أن يأخذ منها حديقته ولا يزداد.
حسن: رواه ابن ماجه (2056) عن أزهر بن مروان، قال: حدثنا عبد الأعلى بن عبد الأعلى، قال: حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
ورواه البيهقي (7/ 313) من وجه آخر عن همام، عن قتادة مختصرا فإنه لم يذكر فيه: ولا يزداد.
وإسناده حسن من أجل أزهر بن مروان فإنه حسن الحديث، وصحّحه ابن حجر في الدراية (ص 75) ورواه البيهقي (7/ 313) من طريق همام، نا قتادة مختصرا، ومن طريق عبد الأعلى بن عبد الأعلى مفسرًا. وقال: كذا رواه عبد الأعلى بن عبد الأعلى، عن سعيد بن أبي عروبة موصولًا، وأرسله غيره منه.
وفي الباب ما روي عن أبي الزبير أن ثابت بن قيس بن شماس كانت عنده زينب بنت عبد الله بن سلول، وكان أصدقّها حديقه. فكرهته، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أتردين عليه حديقته التي أعطاك؟" قالت: نعم وزيادة. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أما الزيادة فلا، ولكن حديقته"، قالت: نعم، فأخذها له، وخلا سبيلها، فلما بلغ ذلك ثابت بن قيس قال: قد قبلتُ قضاءَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم.
رواه الدارقطني (3/ 255) من حديث حجاج، عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير فذكره. قال الدارقطني: سمعه أبو الزبير من غير واحد.
وقال ابن الجوزي في التحقيق (4/ 394): إسناده صحيح، وأقرّه ابن عبد الهادي. وحجاج هو: ابن محمد المصيصي. إلا أن البيهقي قال: (7/ 314):"وهذا أيضا مرسل". وقال ابن حجر في الفتح (9/ 402):"رجال إسناده ثقات، وقد وقع في بعض طرقه: سمعه أبو الزبير من غير واحد، فإن كان فيهم صحابي فهو صحيح، وإلا فيعتضد بما سبق".
يعني حديث ابن عباس عند ابن ماجه، ومرسل عطاء.
قلت: ومرسل عطاء رواه أبو داود في مراسيله (227) وعبد الرزاق (6/ 502) كلاهما من طريق ابن جريج، قال: أخبرني عطاء قال: جاءت امرأة إلى النبي صلى الله عليه وسلم تشكو زوجها قال:"أتردين عليه حديقته؟" قالت: نعم، وزيادة. قال:"أما الزيادة فلا، قال الدارقطني (3/ 321): وخالفه الوليد، عن ابن جريج فأسنده عن عطاء، عن ابن عباس. والمرسل أصح. وكذا صحّح المرسل أبو حاتم. في"العلل" (1/ 429).
فقه الحديث:
يستفاد من أحاديث الباب أن طلب الزيادة على المهر غير جائز، وبه قال جمهور أهل العلم منهم أبو حنيفة، وأحمد، وإسحاق، وسعيد بن المسيب، وغيرهم قالوا: لا يأخذ أكثر من الصداق، فإذا أخذ أكثر مما أعطاها لم يُسَرِّح بالإحسان الذي أمر الله به.
وقال مالك، والشافعي، وجماعة من التابعين: لا بأس بأخذ الزيادة. إلا أن مالكا يقول: أخذ
الزيادة ليس من مكارم الأخلاق.
وأما ما رُوي عن أبي سعيد الخدري قال: كانت أُختي تحت رجل من الأنصار. تزوجها على حديقة، فكان بينهما كلام، فارتفعا إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"تردين عليه حديقته، ويطلقك؟" قالت: نعم، قال:"ردي عليه حديقته وزيديه" فهو ضعيف.
رواه الدارقطني (3/ 254) من طريق الحسن بن عمارة، عن عطية العوفي، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
والحسن بن عمارة كذاب كما قال شعبة. وقال يحيي: يكذب. وشيخه عطية العوفي ضعّفه الثوري، وهشيم، وأحمد، ويحيى وغيرهم.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জামীলা বিনতে সালূল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন: আল্লাহর কসম! আমি দীন বা চরিত্রের দিক থেকে সাবেতের (আমার স্বামীর) কোনো দোষ দেখি না। কিন্তু আমি ইসলামে কুফরি (অকৃতজ্ঞতা বা অমান্যতা) অপছন্দ করি। ঘৃণার কারণে আমি তাকে (সাংসারিক জীবনে) সহ্য করতে পারি না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি তাকে তার বাগানটি ফিরিয়ে দেবে?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সাবেতকে) নির্দেশ দিলেন যে, সে যেন তার (স্ত্রীর) কাছ থেকে বাগানটি নিয়ে নেয়, তবে এর বেশি কিছু যেন দাবি না করে।
6446 - عن الربيع بنت معوذ بن عفراء أنها اختلعت على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، فأمرها النبي صلى الله عليه وسلم أو أُمِرَتْ أن تعتد بحيضة.
صحيح: رواه الترمذي (1185) عن محمود بن غيلان قال: أخبرنا الفضل بن موسى، عن سفيان، قال: أخبرنا محمد بن عبد الرحمن وهو مولى آل طلحة، عن سليمان بن يسار. عن الرُبيع فذكرته.
قال الترمذي:"حديث الربيع الصحيح: أنها أمرت أن تعتد بحيضة".
ورواه البيهقي (7/ 450) من طريق الفضل بن موسى بإسناده مثله كما رواه أيضا من وجه آخر عن وكيع، عن سفيان بإسناده وجاء فيه:"أنها اختلعت من زوجها، فأُمِرَتْ أن تعتد بحيضة".
قال البيهقي:"هذا أصح، وليس فيه مَن أمرها، ولا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم".
قلت: هذا الترجيح منه بدون مرجع، والفضل بن موسى ثقة ثبت، وذكر أن الآمر هو النبي صلى الله عليه وسلم لوقوع ذلك في عهده صلى الله عليه وسلم وهذه زيادة يجب قبولها، لا سيما سيأتي حديث عبادة بن الوليد بن عبادة بن الصامت ما يؤكد صحة ذلك.
وقد سبقه الدارقطني فأشار في العلل (15/ 420 - 421) إلى هذا الاختلاف وقال:"فأُمرت أن تعتد بحيضة وهو الصحيح".
রুবাইয়্যি' বিনত মুআওবিয বিন আফরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সময়কালে খুলা' (স্বামী থেকে বিচ্ছেদ) করেছিলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নির্দেশ দেন, অথবা তাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল যে সে যেন এক ঋতুস্রাবের (সময়কাল) দ্বারা ইদ্দত পালন করে।
6447 - عن عبادة بن الوليد بن عبادة بن الصامت، عن الربيع بنت معوذ بن عفراء قال: قلت لها: حدِّثِيني حديثك قالت: اختلعتُ من زوجي ثم جئتُ عثمان فسألته: ماذا علي من العدة؟ فقال: لا عدة عليك، إلا أن يكون حديث عهد بك، فتمكثين عنده حتى تحيضين حيضة. قالت: وإنما تبع ذلك قضاء رسول الله صلى الله عليه وسلم في مريم المغالية، وكانت تحت ثابت بن قيس فاختلعت منه.
حسن: رواه النسائي (3498) وابن ماجه (2058) كلاهما من حديث إبراهيم بن سعد، عن
محمد بن إسحاق قال: حدثني عبادة بن الوليد بن عبادة بن الصامت فذكره. وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.
وقوله: لا عدة عليك إلا أن يكون حديث عهد بك: أي ليس على المختلعة عدة مثل عدة المطلقة إلا حيضة واحدة للاستبراء إن كانت حديث عهد بالزواج بدخوله عليك، أو بالجماع فتمكثين عنده، وإلا فلا عدة عليك، ولكن يعارض هذا ما جاء في حديث ابن عباس عند أبي داود وغيره أمرها أن تعتد بحيضة. فيحمل هذا على الحكم الغالب بأن قد جامعها، فتعتد بحيضة للاستبراء.
রুবাইয়্যি' বিনত মু'আব্বিয ইবনু আফরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (বর্ণনাকারী উবাদাকে) বললেন: আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম, আপনার ঘটনাটি আমাকে বলুন। তিনি বললেন: আমি আমার স্বামীর কাছ থেকে খোলা (তালাক) নিয়েছিলাম, এরপর আমি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম: আমার উপর ইদ্দত কী? তিনি (উসমান) বললেন: তোমার উপর কোনো ইদ্দত নেই, তবে যদি সে সম্প্রতি তোমার সাথে মিলিত হয়ে থাকে (সহবাস করে থাকে), তাহলে তুমি তার কাছে তত দিন থাকবে যতক্ষণ না তোমার একটি ঋতুস্রাব আসে। তিনি (রুবাইয়্যি) বললেন: এটা ছিল মূলত মারইয়াম আল-মুগ্বালিয়্যাহ-এর ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই ফায়সালার অনুগামী, যিনি সাবিত ইবনু কাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন এবং তাঁর কাছ থেকে খোলা নিয়েছিলেন।
