আল-জামি` আল-কামিল
6561 - عن عمرو بن العاص أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا حكم الحاكم فاجتهد ثمّ أصاب فله أجران، وإذا حكم فاجتهد ثمّ أخطأ فله أجر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الاعتصام بالكتاب والسنة (7352) ومسلم في الأقضية (15: 1716) كلاهما من طريق يزيد بن عبد الله بن أسامة بن العماد، عن محمد بن إبراهيم بن
الحارث، عن بُسر بن سعيد، عن أبي قيس مولى عمرو بن العاص، عن عمرو بن العاص فذكره.
قال يزيد: فحدثت بهذا الحديث أبا بكر بن عمرو بن حزم فقال: هكذا حَدَّثَنِي أبو سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة.
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "যখন কোনো বিচারক বিচার করেন এবং ইজতিহাদ (প্রচেষ্টা) করার পর সঠিক সিদ্ধান্ত দেন, তখন তার জন্য রয়েছে দু’টি পুরস্কার। আর যখন তিনি বিচার করেন এবং ইজতিহাদ করার পর ভুল করেন, তখন তার জন্য রয়েছে একটি পুরস্কার।"
6562 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا حكم الحاكم فاجتهد فأصاب فله أجران، وإذا حكم فأخطأ فله أجر واحد".
صحيح: رواه الترمذيّ (1326)، والنسائي (5381)، وابن الجارود (996)، وصحّحه ابن حبَّان (5060)، والدارقطني (4/ 204)، والبيهقي (10/ 119) كلّهم من حديث عبد الرزّاق، قال: أخبرنا معمر، عن سفيان الثوريّ، عن يحيى بن سعيد، عن أبي بكر بن عمرو بن حزم، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
قال الترمذيّ:"حديث حسن غريب من هذا الوجه لا نعرفه من حديث سفيان الثوريّ، عن يحيى بن سعيد إِلَّا من حديث عبد الرزّاق، عن معمر، عن سفيان الثوري".
وقال ابن الجارود:"لا نعلم أحدًا روي هذا الحديث عن الثوري غير معمر".
قلت: لا يضر ذلك فإن معمرا ثقة، وفيه كلام خفيف في روايته عن العراقيين إِلَّا أنه لا يؤثّرُ في صحة الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো বিচারক বিচার করে, অতঃপর সে ইজতিহাদ (গবেষণা) করে এবং সঠিক সিদ্ধান্তে পৌঁছায়, তখন তার জন্য দুটি সওয়াব রয়েছে। আর যদি সে বিচার করে কিন্তু ভুল করে ফেলে, তবে তার জন্য একটি সওয়াব রয়েছে।"
6563 - عن بريدة بن الحُصيب عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"القضاة ثلاثة، واحد في الجنّة، واثنان في النّار، فأما الذي في الجنّة فرجل عرف الحق فقضى به، ورجل عرف الحق فجار في الحكم فهو في النّار، ورجل قضى للناس على جهل فهو في النّار".
حسن: رواه أبو داود (3573)، وابن ماجة (2315)، والطحاوي في مشكله (55)، والبيهقي (10/ 116) كلّهم من حديث خلف بن خليفة، عن أبي هاشم، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره.
قال أبو داود:"هذا أصح شيء فيه" يعني حديث ابن بريدة.
قلت: إسناده حسن من أجل خلف بن خليفة فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وقد توبع لما رواه الترمذيّ (1322)، والطحاوي في مشكله (54)، وصحّحه الحاكم (4/ 90)، والبيهقي (10/ 117) كلّهم من حديث شريك، عن الأعمش، عن سعد بن عُبيدة، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكر نحوه.
وشريك هو ابن عبد الله النخعي سيء الحفظ، وأنه لم يُخطِئُ فيه لمتابعته.
وللحاكم إسناد آخر رواه عن أبي بكر بن إسحاق، أنبأ محمد بن غالب، ثنا شهاب بن عباد، ثنا عبد الله بن بكير، عن حكيم بن جبير، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكر نحوه.
قال الحاكم:"وله شاهد بإسناد صحيح على شرط مسلم" وهو يقصد به رواية شريك بن عبد الله
النخعي. وأمّا هذا الإسناد ففيه حكيم بن جبير الأسدي"ضعيف".
وأمّا ما رُوي عن عقبة بن عامر قال: جاء خصمان إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يختصمان فقال لي:"قُمْ يا عقبة! فاقضِ بينهما". قلت: يا رسول الله! أنت أولى بذلك مني. قال:"وإن كان اقض بينهما، فإن اجتهدت فأصبت فلك عشرة أجور، وإن اجتهدت فأخطأت فلك أجر واحد" فهو ضعيف.
رواه الدَّارقطنيّ (4/ 204) فيه الفرج بن فضالة بن النعمان التنوخي الشّاميّ مختلف فيه غير أن جمهور أئمة الحديث ذهبوا إلى تضعيفه.
ومعنى الاجتهاد من الحاكم إنّما يكون بعد أن لا يكون فيما يريد القضاء فيه كتاب ولا سنة، ولا أمر مجتمع عليه، فأما وشيء من ذلك موجود فلا. الأم (6/ 200).
وكذلك لا يصح ما رُويَ عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من طلب قضاء المسلمين حتَّى يناله ثمّ غلب عدلُه جورَه فله الجنّة، ومن غلب جورُه عدلَه فله النّار".
رواه أبو داود (3575) عن عباس العنبريّ، حَدَّثَنَا عمر بن يونس، حَدَّثَنَا ملازم بن عمرو، حَدَّثَنِي موسى بن نجدة، عن جده يزيد بن عبد الرحمن - وهو أبو كثير - حَدَّثَنِي أبو هريرة فذكره.
وموسى بن نجدة الحنفي اليمامي"مجهول" كما قال الحافظ في التقريب.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসায়ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিচারক হলো তিন প্রকার। তাদের মধ্যে একজন জান্নাতে যাবে এবং দুজন জাহান্নামে যাবে। জান্নাতে সে ব্যক্তি যাবে, যে হক (সত্য) চিনল এবং তদনুযায়ী ফায়সালা করল। আর যে ব্যক্তি হক চিনল কিন্তু ফায়সালার ক্ষেত্রে জুলুম (অবিচার) করল, সে জাহান্নামে যাবে। আর যে ব্যক্তি অজ্ঞতা সহকারে মানুষের মধ্যে ফায়সালা করল, সেও জাহান্নামে যাবে।"
6564 - عن عبد الرحمن بن سمرة قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"يا عبد الرحمن بن سمرة! لا تسأل الإمارة، فإنك إن أوتيتها عن مسألة وكلت إليها، وإن أوتيتها من غير مسألة أعنت عليها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6622) ومسلم في الأيمان (1652) كلاهما من حديث جرير بن حازم، حَدَّثَنَا الحسن، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن سمرة فذكره.
আব্দুর রহমান ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আব্দুর রহমান ইবনে সামুরা! তুমি ইমারতের (নেতৃত্বের) পদ চেয়ো না। কেননা যদি তুমি তা চাওয়ার কারণে প্রাপ্ত হও, তবে তোমাকে এর উপর সোপর্দ করে দেওয়া হবে (অর্থাৎ আল্লাহর সাহায্য থেকে বঞ্চিত হবে)। আর যদি তুমি তা না চেয়েই প্রাপ্ত হও, তবে এর জন্য তোমাকে সাহায্য করা হবে।"
6565 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أراد الله بالأمير خيرًا جعل له وزير صدق، إن نسي ذكّره، وإن ذكر أعانه، وإذا أراد الله به غير ذلك جعل له وزير سوء، إن نسي لم يذكّره، وإن ذكر لم يُعنه".
صحيح: رواه أبو داود (2932) واللّفظ له، والنسائي (4204) وأحمد (24414) وابن حبَّان (4494) والبيهقي (10/ 111 - 112) كلّهم من طرق عن القاسم بن محمد، عن عائشة فذكرته.
وفي بعض طرقه ضعف يسير يتقوى بمجيئه من طرق أخرى.
وقد رُوي عن عائشة قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ليأتين على القاضي العدل يوم القيامة ساعة يتمنى أنه لم يقض بين الاثنين في تمرة قط".
رواه أحمد (24464) والطَّبرانيّ في الأوسط (2640) وصحّحه ابن حبَّان (5055) والبيهقي (10/ 96)
كلّهم من طرق عن عمرو بن العلاء الشنّي من عبد القيس قال: حَدَّثَنِي صالح بن سرج، حَدَّثَنِي عمران بن حطَّان قال: دخلت على عائشة فذاكرتها حتَّى ذكرنا القاضي فذكرته.
وفيه صالح بن سرج مجهول، لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبَّان في ثقاته (6/ 460) واعتمده الهيثميّ في"المجمع" (4/ 192) فحسَّن إسناده.
روي أيضًا عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من كان قاضيا فقضى بالعدل فبالحري أن ينقلب منه كفافًا".
رواه الترمذيّ (1322) عن محمد بن عبد الأعلى الصنعانيّ، قال: حَدَّثَنَا المعتمر بن سليمان، قال: سمعت عبد الملك يحدث عن عبد الله بن موهب أن عثمان قال لابن عمر: اذهب فاقضِ بين الناس. قال: أو تُعافيني يا أمير المؤمنين! ، قال: فما تكره من ذلك؟ وقد كان أبو بكر يقضي؟ قال: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.
قال الترمذيّ: حديث ابن عمر حديث غريب، وليس إسناده عندي بمتصل".
قلت: لأن عبد الله بن موهب وهو الشّاميّ أبو خالد لم يسمع من عثمان.
قال أبو حاتم كما في العلل (1/ 468):"عبد الملك بن أبي جميلة مجهول، وعبد الله هو ابن موهب الرملي على ما أرى وهو عن عثمان مرسل".
وفي الباب ما روي أيضًا عن أنس بن مالك قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من طلب القضاء، واستعان عليه وُكل إليه، ومن لم يطلبه، ولم يستعن عليه أنزل الله ملكًا يسدّده".
رواه أبو داود (3578) والتِّرمذيّ (1323) وابن ماجة (2309) والحاكم (4/ 92) والبيهقي (10/ 100) وأحمد (12184) كلّهم من طرق عن إسرائيل، عن عبد الأعلى الثعلبيّ، عن بلال بن أبي موسى، عن أنس بن مالك فذكره.
وإسناده ضعيف فإن عبد الأعلى الثعلبي ضعيف باتفاق أهل العلم.
وأمّا الحاكم فصحَّحه. وهو تساهل منه كما أنه لا معنى لقول الترمذيّ (1324) رواه من حديث أبي عوانة، عن عبد الأعلى الثعلبيّ، عن بلال بن مرداس الفزاريّ، عن خيثمة وهو البصريّ، عن أنس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"من ابتغى القضاء وسأل فيه شفعاء وُكل إلى نفسه. ومن أكره عليه أنزل الله عليه ملكًا يسدده" قال: هذا حديث حسن غريب، وهو أصح من حديث إسرائيل، عن عبد الأعلى".
لأن مداره على عبد الأعلى الثعلبيّ، ثمّ هو اضطرب فيه فمرة رواه عن بلال بن مرداس وهو ابن أبي موسى الفزاريّ، عن أنس، وأخرى أدخل بينهما"خيثمة" ومرداس الفزاري نفسه لم يوثقه أحد غير ابن حبَّان، ولذا جعله الحافظ في درجة"مقبول" أي عند المتابعة، ولم يتابع فيكون لين الحديث. وكذلك خيثمة هو ابن أبي خيثمة"لين الحديث" كما في التقريب.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ যখন কোনো শাসকের জন্য কল্যাণ চান, তখন তিনি তার জন্য একজন বিশ্বস্ত মন্ত্রী নির্ধারণ করে দেন। শাসক ভুলে গেলে সে তাকে স্মরণ করিয়ে দেয় এবং শাসক স্মরণ রাখলে সে তাকে সাহায্য করে। আর আল্লাহ যখন তার জন্য অন্য কিছু (অকল্যাণ) চান, তখন তিনি তার জন্য একজন মন্দ মন্ত্রী নির্ধারণ করে দেন। শাসক ভুলে গেলে সে তাকে স্মরণ করিয়ে দেয় না এবং শাসক স্মরণ রাখলে সে তাকে সাহায্য করে না।"
6566 - عن عائشة أنها قالت: كان عتبة بن أبي وقَّاص، عهد إلى أخيه سعد بن أبي وقَّاص، أن ابن وليدة زمعة مني، فاقبضه إليك، قالت: فلمّا كان عام الفتح أخذه سعد. وقال: ابن أخي. قد كان عهد إلي فيه. فقام إليه عبد بن زمعة فقال: أخي. وابن وليدة أبي. ولد على فراشه. فتساوقا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال سعد: يا رسول الله! ابن أخيّ، قد كان عهد إليَّ فيه. وقال عبد بن زمعة: أخي وابن وليدة أبي. ولد على فراشه. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هو لك يا عبد بن زمعة" ثمّ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الولد للفراش وللعاهر الحجر" ثمّ قال لسودة بنت زمعة:"احتجبي منه" لما رأى من شبهه بعتبة بن أبي وقَّاص. قالت: فما رآها حتَّى لقي الله عز وجل.
متفق عليه: رواه مالك في الأقضية (20) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزُّبير، عن عائشة، فذكرته.
ورواه البخاريّ في الأحكام (7182) من طريق مالك، به، مثله. ورواه مسلم في الرضاع (36: 1457) من طريق اللّيث، عن ابن شهاب، به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উতবা ইবনু আবী ওয়াক্কাস তার ভাই সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাসকে ওসিয়ত করেছিলেন যে, যাম'আর বাঁদির সন্তানটি আমার, তুমি তাকে তোমার কাছে নিয়ে নিও। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যখন মক্কা বিজয়ের বছর আসলো, তখন সা'দ তাকে গ্রহণ করলেন এবং বললেন, এ আমার ভাতিজা। আমাকে এর ব্যাপারে ওসিয়ত করা হয়েছে। তখন আব্দুল্লাহ ইবনু যাম'আ তার কাছে দাঁড়িয়ে বললেন, এ আমার ভাই, আমার পিতার বাঁদির সন্তান, সে আমার পিতার বিছানায় (বৈধভাবে) জন্ম নিয়েছে। এরপর তারা উভয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। সা'দ বললেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! এ আমার ভাতিজা, আমাকে এর ব্যাপারে ওসিয়ত করা হয়েছে। আর আব্দুল্লাহ ইবনু যাম'আ বললেন, এ আমার ভাই, আমার পিতার বাঁদির সন্তান, সে আমার পিতার বিছানায় জন্ম নিয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আব্দুল্লাহ ইবনু যাম'আ, এ তোমারই।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সন্তান বৈধ শয্যার অধিকারীর এবং ব্যভিচারীর জন্য রয়েছে পাথর।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাউদা বিনতু যাম'আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি তার থেকে পর্দা করো," কারণ তিনি উতবা ইবনু আবী ওয়াক্কাসের সাথে তার সাদৃশ্য দেখতে পেলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা-র সাথে মিলিত হওয়া পর্যন্ত (মৃত্যু পর্যন্ত) সে তাকে আর দেখেনি।
6567 - عن أم سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّما أنا بشر، وإنكم تختصمون إليّ، فلعل بعضكم أن يكون ألحن بحجته من بعض، فأقضي له على نحو ما أسمع منه، فمن قضيت له بشيء من حق أخيه، فلا يأخذن منه شيئًا، فإنما أقطع له قطعة من النّار".
متفق عليه: رواه مالك في الأقضية (1) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أم سلمة، فذكرته.
ورواه البخاريّ في الأحكام (7169) من طريق مالك، به، مثله.
ورواه مسلم في الأقضية (4: 1713) من طريق أبي معاوية، عن هشام بن عروة، به، فذكره.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি একজন মানুষ মাত্র, আর তোমরা আমার কাছে তোমাদের বিবাদ নিয়ে আসো। হয়তো তোমাদের কেউ কেউ অন্যের তুলনায় যুক্তিতর্কে অধিক পটু হতে পারে। সুতরাং আমি যা শুনি, সেই অনুযায়ী তার পক্ষে ফায়সালা করে দিই। সুতরাং, আমি যদি কোনো ব্যক্তির জন্য তার অন্য ভাইয়ের প্রাপ্য অধিকার থেকে কোনো কিছুর ফায়সালা করে দেই, তবে সে যেন তা থেকে কিছুই গ্রহণ না করে। কেননা আমি তাকে কেবল এক টুকরা আগুন কেটে দিলাম।"
6568 - عن أم سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سمع خصومة بباب حجرته، فخرج إليهم فقال: إنّما أنا بشر، وإنه يأتيني الخصم، فلعلَّ بعضكم أن يكون أبلغ من بعض، فأحسب أنه صادق فأقضي له بذلك، فمن قضيت له بحق مسلم، فإنما هي قطعة من النّار، فليأخذها أو ليتركها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأحكام (7181)، ومسلم في الأقضية (5: 1713) كلاهما من طريق ابن شهاب الزّهريّ، أخبرني عروة بن الزُّبير، أن زينب ابنة أبي سلمة أخبرته، أن أم سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أخبرته، فذكرته.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কক্ষের দরজার কাছে ঝগড়ার শব্দ শুনলেন। তখন তিনি তাদের দিকে বেরিয়ে আসলেন এবং বললেন: আমি তো একজন মানুষ মাত্র। আমার কাছে বাদী-বিবাদী আসে। হয়তো তোমাদের কেউ কেউ (যুক্তি উপস্থাপনে) অন্যের চেয়ে বেশি বাকপটু হবে, ফলে আমি তাকে সত্যবাদী মনে করে তার পক্ষেই ফয়সালা দিয়ে দেই। অতএব, আমি যাকে কোনো মুসলিমের হক (অধিকার) দিয়ে ফয়সালা করে দেই, তবে তা (আসলে) আগুনের একটি টুকরা মাত্র। সে যেন তা গ্রহণ করে অথবা ছেড়ে দেয়। (মুক্তাফাকুন আলাইহি)
6569 - عن أم سلمة رضي الله عنها قالت: جاء رجلان من الأنصار إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يختصمان في مواريث بينهما قد درست، ليس بينهما بينة، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إنكم تختصمون إليّ، وإنما أنا بشر، ولعل بعضكم أن يكون ألحن بحجته من بعض، وإنما أقضي بينكم على نحو ما أسمع منكم، فمن قضيت له من أخيه شيئًا فلا يأخذه، فإنما أقطع له قطعة من النّار، يأتي به إسطاما في عنقه يوم القيامة، قال: فبكى الرجلان، وقال كل واحد منهما: حقي لأخي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما إذ فعلتما هذا، فأذهبا فاقتسما وتوخيا الحق ثمّ استهما، ثمّ يتحلل كل واحد منكما صاحبه".
حسن: رواه أبو داود (3584، 3585) وأحمد (26717) والدارقطني (4/ 238 - 239) والحاكم (4/ 95) وابن الجارود (1000) والبيهقي (10/ 26) والطحاوي في مشكله (755) كلّهم من حديث أسامة بن زيد، ثنا عبد الله بن رافع مولى أم سلمة، عن أم سلمة فذكرته واللّفظ لأحمد.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: هو حسن من أجل الكلام في أسامة بن زيد الليثي مولاهم، غير أنه حسن الحديث.
উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আনসারদের দুইজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসেছিল। তারা তাদের মধ্যকার উত্তরাধিকার সংক্রান্ত সম্পত্তি নিয়ে বিবাদ করছিল, যা অনেক পুরাতন হয়ে গিয়েছিল এবং তাদের কাছে কোনো প্রমাণ (সাক্ষ্য) ছিল না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা আমার নিকট বিবাদ নিয়ে এসেছো, কিন্তু আমি একজন মানুষ মাত্র। আর হতে পারে তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার যুক্তি প্রমাণে অন্যের চেয়ে বেশি পারদর্শী (বাগ্মী বা চতুর)। আমি কেবল তোমাদের থেকে যা শুনি, সে অনুযায়ী তোমাদের মাঝে বিচার করি। সুতরাং আমি যদি তোমাদের কারো পক্ষে তার ভাইয়ের কোনো কিছু নিয়ে ফয়সালা করে দেই, তবে সে যেন তা গ্রহণ না করে। কারণ আমি তাকে আগুনেরই একটি টুকরা কেটে দিচ্ছি। কিয়ামতের দিন সে তা তার গলায় বেড়ি হিসেবে নিয়ে আসবে।” বর্ণনাকারী বলেন: তখন লোক দু’জন কেঁদে ফেলল এবং তাদের প্রত্যেকে বলল: আমার প্রাপ্য হক আমার ভাইয়ের জন্য (ছেড়ে দিলাম)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা যেহেতু এরূপ করেছো, সুতরাং তোমরা যাও, সম্পত্তি ভাগ করে নাও এবং ন্যায় ও সত্যের সন্ধান করো। এরপর লটারি (শেয়ার ড্র) করো, আর তোমাদের প্রত্যেকে যেন তার সাথীকে (ক্ষমা করে) মুক্ত করে দেয়।”
6570 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كانت امرأتان معهما ابناهما، جاء الذئب، فذهب بابن إحداهما، فقالت لصاحبتها: إنّما ذهب بابنك، وقالت الأخرى: إنّما ذهب بابنك، فتحاكما إلى داود عليه السلام، فقضى به للكبرى، فخرجتا على سليمان بن داود عليهما السلام، فأخبرتاه، فقال: ائتوني بالسّكين أشقه بينهما، فقالت الصغرى: لا تفعلْ يرحمك الله هو ابنها، فقضى به للصغرى".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحدود (6769)، ومسلم في الأقضية (1720) كلاهما من حديث أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
قال ابن الجوزي:"استنبط سليمان لما رأى الأمر محتملًا فأجاد، وكلاهما حكما بالاجتهاد، لأنه لو كان داود حكم بالنص لما ساغ لسليمان أن يحكم بخلافه". فتح الباري (6/ 465).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দুইজন মহিলা ছিল, তাদের সাথে তাদের সন্তানদ্বয়ও ছিল। একদিন নেকড়ে এসে তাদের একজনের সন্তানকে নিয়ে চলে গেল। তখন সে (হারিয়ে যাওয়া সন্তানের মা) তার সঙ্গিনীকে বলল: নেকড়ে তোমার সন্তানকেই নিয়ে গেছে। অপরজন বলল: বরং নেকড়ে তোমার সন্তানকে নিয়ে গেছে। এরপর তারা উভয়েই দাঊদ (আঃ)-এর কাছে বিচার চাইল। তিনি বড় মহিলার পক্ষে ফায়সালা দিলেন। অতঃপর তারা (দাঊদ আঃ-এর পুত্র) সুলায়মান ইবনু দাঊদ (আঃ)-এর কাছে গেল এবং তাঁকে এ ঘটনা জানাল। তখন তিনি বললেন: তোমরা আমার কাছে ছুরি নিয়ে এসো, আমি শিশুটিকে দু'জনের মধ্যে ভাগ করে দেবো। ছোট মহিলাটি বলল: আল্লাহ আপনাকে রহম করুন, এমন করবেন না। সে তার (বড় মহিলার) সন্তান। তখন তিনি শিশুটিকে ছোট মহিলার পক্ষে ফায়সালা দিলেন।
6571 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّما أنا بشر، ولعل بعضكم أن يكون ألحن بحجته من بعض، فمن قطعت له من حق أخيه قطعة فإنما أقطع له قطعة من النّار".
حسن: رواه ابن ماجة (2318) وأحمد (8394) وصحّحه ابن حبَّان (5071) كلّهم من حديث
محمد بن عمرو، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو الليثي فإنه حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি তো কেবল একজন মানুষ। আর সম্ভবত তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার যুক্তির ক্ষেত্রে অন্যের চেয়ে বেশি বাকপটু। সুতরাং আমি যার পক্ষে তার ভাইয়ের অধিকারের কিছু অংশ ফায়সালা করে দেই, তবে আমি যেন তার জন্য জাহান্নামের একটি টুকরা কেটে দিচ্ছি।”
6572 - عن أبي ذرّ قال: قلت: يا رسول الله! ألا تستعملني؟ قال: فضرب بيده على منكبي ثمّ قال:"يا أبا ذرّ! إنك ضعيف، وإنها أمانة، وإنها يوم القيامة خزي وندامة إِلَّا من أخذها بحقها، وأدى الذي عليه فيها".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1825) عن عبد الملك بن شعيب بن اللّيث، حَدَّثَنِي أبي، شعيب بن اللّيث، حَدَّثَنِي اللّيث بن سعد، حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن بكر بن عمرو، عن الحارث بن يزيد الحضرميّ، عن ابن حُجيرة الأكبر، عن أبي ذرّ فذكره.
আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি আমাকে (কোনো প্রশাসনিক পদে) নিয়োগ করবেন না? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন নিজ হাত দিয়ে আমার কাঁধে আঘাত করলেন, অতঃপর বললেন: “হে আবূ যর! নিশ্চয় তুমি দুর্বল, আর নিশ্চয় এটি একটি আমানত (বিশ্বাস), এবং নিশ্চয় এটি কিয়ামতের দিন অপমান ও অনুশোচনার কারণ হবে, তবে সে ছাড়া, যে তা ন্যায্যভাবে গ্রহণ করেছে এবং এতে তার উপর যা কর্তব্য ছিল তা পালন করেছে।”
6573 - عن أبي ذرّ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يا أبا ذرّ! إني أراك ضعيفا، وإني أحب لك ما أحب لنفسيّ، لا تأمرنّ على اثنين، ولا تُولينّ مال يتيم".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1826) من طرق عن عبد الله بن يزيد المقرئ، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي أيوب، عن عبيد الله بن أبي جعفر القرشيّ، عن سالم بن أبي سالم الجيشانيّ، عن أبيه، عن أبي ذرّ فذكره.
قال النوويّ رحمه الله تعالى:"هذا الحديث أصل عظيم في اجتناب الولايات، لا سيما لمن كان فيه ضعف عن القيام بوظائف تلك الولاية. وأمّا الخزي والندامة فهو في حق من لم يكن أهلًا لها، أو كان أهلًا ولم يعدل فيها، فيخزيه الله تعالى يوم القيامة ويفضحه، ويندم على ما فرّط. وأمّا من كان أهلا للولاية، وعدلَ فيها فله فضل عظيم، تظاهرت به الأحاديث الصحيحة". انتهى.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আবূ যার! আমি তোমাকে দুর্বল মনে করি (বা দেখছি)। আর আমি তোমার জন্য তাই পছন্দ করি যা আমি আমার নিজের জন্য পছন্দ করি। তুমি অবশ্যই দু’জনের উপরও নেতৃত্ব দেবে না এবং তুমি কোনো ইয়াতীমের সম্পদের দায়িত্ব গ্রহণ করবে না।"
6574 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الناس كالإبل المائة لا يجد الرّجل فيها راحلة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6498) ومسلم في فضائل الصّحابة (2547) كلاهما من حديث الزّهريّ، عن سالم بن عبد الله، عن ابن عمر فذكره.
قال البيهقيّ (10/ 135):"هذا الحديث قد يتأول على أن الناس في أحكام الدين سواء، لا فضل فيها الشريف على مشروف، ولا لرفيع منهم على وضيع، كالإبل المائة، لا تكون فيها راحلة، وهي الذلول التي ترحل وتركب، وجاءت فاعلة بمعني مفعولة".
وقيل: معناه أن الناس كثير، والمرضي منهم قليل قاله ابن بطال أي الذين يتحملون عن الناس، ويكشفون كربهم وهم قليلون.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "মানুষ একশটি উটের মতো; যার মধ্যে একজন লোকও একটি বাহন (রাহিলা) খুঁজে পায় না।"
6575 - عن عبد الرحمن بن أبي بكرة قال: كتب أبو بكرة إلى ابنه - وكان بسجستان - بأن لا تقضي بين اثنين وأنت غضبان، فإني سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقضين حكم بين اثنين وهو غضبان".
متفق علية: رواه البخاريّ في الأحكام (7158)، ومسلم في الأقضية (16: 1717) من طريق عبد الملك بن عمير، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، فذكره.
আবু বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রকে—যখন সে সিজিস্তানে ছিল—এই মর্মে পত্র লিখেছিলেন যে, তুমি ক্রুদ্ধ অবস্থায় দুইজনের মাঝে বিচার করবে না। কারণ আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: “ক্রুদ্ধ অবস্থায় কোনো বিচারক যেন দুই ব্যক্তির মাঝে বিচার না করে।”
6576 - عن أم سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا ابتلي أحدكم بالقضاء بين المسلمين فلا يقضين وهو غضبان، فليسوّ بينهم بالنظر والمجلس والإشارة، ولا يرفع صوته على أحد الخصمين".
حسن: رواه الدَّارقطنيّ (4/ 205) والبيهقي (10/ 135) وأبو يعلي (5867) والطَّبرانيّ في الكبير (23/ 284) كلّهم من طرق عن عباد بن كثير، عن أبي عبد الله، عن عطاء بن يسار، عن أم سلمة فذكرته. وبعضهم اختصره.
قلت: قال البيهقيّ:"هذا إسناد فيه ضعف"، وهو يقصد به عباد بن كثير الثقفي البصري فإنه ضعيف عند أهل العلم إِلَّا أنه توبع.
رواه إسحاق بن راهويه (1846) عن بقية بن الوليد، حَدَّثَنِي أبو محمد، عن أبي بكر مولى بني تميم، عن عطاء بن يسار بإسناده فذكره نحوه.
وأبو محمد لا يُعرف من هو؟ وبقية بن الوليد إذا كنّى فالغالب أنه ضعيف، والإسنادان يقوي أحدهما الآخر.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: “তোমাদের কারো উপর যখন মুসলমানদের মধ্যে বিচার করার দায়িত্ব অর্পিত হয়, তখন সে যেন রাগান্বিত অবস্থায় বিচার না করে। সে যেন দৃষ্টিপাত, বসার স্থান ও ইশারা-ইংগিতে তাদের (বিবাদমান পক্ষগুলোর) মধ্যে সমতা বজায় রাখে এবং সে যেন দুই বিবাদমান পক্ষের কারো উপরই নিজের আওয়াজ উঁচু না করে।”
6577 - عن عليّ بن أبي طالب قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن قاضيًا. فقلت: يا رسول الله! ترسلني، وأنا حديث السن، ولا علم لي بالقضاء فقال:"إنَّ الله عز وجل سيهدي قلبك، ويثبّت لسانك، فإذا جلس بين يديك الخصمان فلا تقضين حتَّى تسمع من الآخر كما سمعت من الأوّل. فأنه أحرى أن يتبين لك القضاء" قال: فما زلت قاضيًا، أو ما شككت في قضاء بعد.
حسن: رواه أبو داود (3582) واللّفظ له، والتِّرمذيّ (1331) والبيهقي (10/ 137) كلهم من طرق عن حنش، عن عليّ فذكره. وحنش هو ابن المعمّر مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وللحديث طريق آخر وهو ما رواه أحمد (666) والبزّار (721) كلاهما من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرّب، عن عليّ فذكره مختصرًا.
قال البزّار:"وهذا الحديث لا نعلم رواه عن حارثة بن مضرب إِلَّا أبو إسحاق، ولا عن أبي إسحاق إِلَّا إسرائيل. ورواه عن عليّ غير واحد، وأحسن إسنادًا يروى عن عليّ هذا الإسناد".
وأمّا ما رواه ابن ماجة (2310) وأحمد (636) والحاكم (3/ 135) كلّهم من طريق الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري قال: قال عليّ فذكره.
فأبو البختري لم يسمع من عليّ شيئًا. ومع ذلك قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".
شرح الحديث: قال الخطّابي:"وفيه دليل على أن الحاكم لا يقضى على غائب، وذلك لأنه إذا منعه أن يقضي لأحد الخصمين وهما حاضران حتَّى يسمع كلام الآخر، فقد دلّ على أنه في الغائب الذي لم يحضره، ولم يسمع قوله أولى بالمنع، وذلك لإمكان أن يكون معه حجّة تبطل دعوى الحاضر، وهذا قول أبي حنيفة، وقال مالك، والشافعي:"يجوز القضاء على الغائب إذا تبين للحاكم أن فراره واستخفاءه إنّما هو فرار من الحق ومعاندة للخصم". انتهى.
وقالوا: إن حديث عليّ يحمل على الخصمين الحاضرين الذين يمكن سماع كلامهما، فلا يقضي لأحدهما حتَّى يسمع كلام الآخر، فإذا كان الخصم غائبًا، فلا يترك استماع كلام الحاضر حتَّى لا يكون ذريعة لإبطال الحقوق.
واستدل البيهقيّ على قضاء الغائب بحديث هند زوجة أبي سفيان، قال فيه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"خذي ما يكفيك وبنيك" بأنه صلى الله عليه وسلم قضى على أبي سفيان في غيابه، ولكن اعتذر ابن التركماني وغيره بأنه من الفتيا، لم يكن من القضاء، لأن مذهب أبي حنيفة وأصحابه لا يجوز القضاء على الغائب.
ذكره الطحاويّ في اختلاف العلماء (المختصر) (3/ 386) وفيه كلام آخر راجع"المنة الكبرى" (9/ 45).
كما أنه أرسل عن جده عبد الله بن الزُّبير.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ইয়েমেনে বিচারক (কাযী) হিসেবে প্রেরণ করলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমাকে পাঠাচ্ছেন, অথচ আমি বয়সে তরুণ এবং বিচারকার্য (কাযা) সম্পর্কে আমার কোনো জ্ঞান নেই। তখন তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা তোমার হৃদয়কে সঠিক পথে পরিচালিত করবেন এবং তোমার জিহ্বাকে মজবুত করবেন। যখন দু'জন বিবাদমান পক্ষ তোমার সামনে বসবে, তখন তুমি প্রথমজনের কথা শোনার পর যতক্ষণ পর্যন্ত অন্যজনের কথা না শুনবে, ততক্ষণ কোনো ফয়সালা দেবে না। কারণ, এতেই তোমার কাছে সঠিক বিচার স্পষ্ট হয়ে ওঠার সম্ভাবনা বেশি।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এরপর থেকে আমি বিচারকাজে কখনো সন্দেহ পোষণ করিনি।
6578 - عن أبي هريرة وزيد بن خالد الجهنيّ، أنهما أخبراه أن رجلين اختصما إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال أحدهما: يا رسول الله اقض بيننا بكتاب الله. وقال الآخر، وهو أفقههما: أجل يا رسول الله! فاقض بيننا بكتاب الله. وائذن لي أن أتكلم قال:"تكلم" فقال: إن ابني كان عسيفا على هذا فزني بامرأته. فأخبرني أن على ابني الرجم. فافتديت منه بمائة شاة وبجارية لي. ثمّ إني سألت أهل العلم فأخبروني: أن ما على ابني جلدُ مائة، وتغريب عام. وأخبروني أنما الرجم على امرأته. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما والذي نفسي بيده، لأقضين بينكما بكتاب الله. أما غنمك وجاريتك فرد عليك" وجلد ابنه مائة. وغرَّبه عامًا. وأمر أنيسًا الأسلمي أن يأتي امرأة الآخر. فإن اعترفت، رجمها، فاعترفت فرجمها.
متفق عليه: رواه مالك في الحدود (6) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن أبي هريرة وزيد بن خالد الجهنيّ، فذكراه.
ورواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6633، 6634) من طريق مالك، به.
ورواه مسلم في الحدود (1697، 1698) من وجه آخر عن ابن شهاب.
وأمّا ما رُوي عن أناس من أهل حمص من أصحاب معاذ بن جبل أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما أراد أن يبعث معاذًا إلى اليمن قال:"كيف تقضي إذا عرض لك فضاء؟" قال: أقضي بكتاب الله، قال:"فإن لم تجد في كتاب الله؟" قال: فبسنة رسول الله، قال:"فإن لم تجد في سنة رسول الله؟ ولا في كتاب الله؟ قال: أجتهد رأيي ولا آلو. فضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم صدره وقال:"الحمد لله الذي وفق رسولَ رسولِ الله لما يرضي رسول الله" فهو معلول.
رواه أبو داود (3592) والتِّرمذيّ (1327) من وجهين عن شعبة، عن أبي عون، عن الحارث بن عمرو ابن أخي المغيرة بن شعبة، عن أناس من أهل حمص فذكره. وفيه إرسال، والحارث بن عمرو لا يعرف.
روي موصولًا بذكر معاذ رواه أبو داود (3593) والتِّرمذيّ (1328) وأحمد (22007) والبيهقي (10/ 114) من طريق أبي داود.
ونقل العقيلي في الضعفاء الكبير (1/ 215) عن البخاريّ قال:"ولا يصح، ولا يعرف إِلَّا مرسلًا".
قلت: وإن فيه أصحاب معاذ لا يعرفون.
قال الترمذيّ:"هذا حديث لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه، وليس إسناده عندي بمتصل".
وقال ابن حزم:"هذا حديث ساقط". وضعّفه أيضًا الدارقطنيّ، وعبد الحق الإشبيليّ، والذّهبيّ وغيرهم من جهابذة هذا الفن.
وقال ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (2/ 273): هذا حديث لا يصح، وإن كان الفقهاء كلّهم يذكرونه في كتبهم، ويعتمدون عليه، ولعمري إن كان معناه صحيحًا، إنّما ثبوته لا يُعرف، لأن الحارث بن عمرو مجهول، وأصحاب معاذ من أهل حمص لا يعرفون، وما هذا طريقه فلا وجه لثبوته". انتهى كلامه.
قلت: وهو كما قالوا، وقد ثبت معنى هذا الحديث أيضًا عن عمر بن الخطّاب وغيره من الصّحابة ففي مصنف ابن أبي شيبة (23444) والنسائي (5399) كلاهما من حديث شريح أن عمر بن الخطّاب كتب إليه:"إذا جاءك شيء في كتاب الله فاقض به، ولا يلفتنَّك عنه الرجال، فإن جاءك أمر ليس في كتاب الله فانظر سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم فاقض بها، فإن جاءك ما ليس في كتاب الله وليس فيه سنة من رسول الله صلى الله عليه وسلم فانظر ما اجتمع الناس عليه فخذ به، فإن جاءك ما ليس في كتاب الله، ولم يكن فيه سنة من رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولم يتكلم فيه أحد قبلك، فاختر أي الأمرين شئت: إن شئت أن تجتهد برأيك وتقدم فتقدم، وإن شئت أن تتأخر فتأخر، ولا أرى التأخر إِلَّا خيرًا لك. انتهى، واللّفظ لابن شيبة.
ولفظ النسائي: عن شريح أنه كتب إلى عمر يسأله فكتب إليه: أن اقض بما في كتاب الله، فإن لم يكن في كتاب الله فبسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإن لم يكن في كتاب الله ولا في سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم فاقض بما قضى به الصالحون، فإن لم يكن في كتاب الله ولا في سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يقض به الصالحون فإن شئت فتقدم وإن شئت فتأخر ولا أرى التأخر إِلَّا خيرًا لك. والسّلام عليكم. وإسناده صحيح. وفي سير الصّحابة آثار أخرى مثله.
وقوله:"أجتهد رأيي ولا آلو": أي أجتهد للبلوغ إلى الحق، ولا أقصر فيه إذا لم أجد نصًا من الكتاب والسنة، وقد جوَّز النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم للحاكم أن يجتهد، وجعل له على إصابته أجرين، وعلى خطته أجرًا واحدًا. وبالله التوفيق.
আবূ হুরায়রা ও যায়দ ইবনু খালিদ জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, দুজন লোক রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট বিচার প্রার্থী হলো। তাদের একজন বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করুন। আর অপরজন, যিনি তাদের দু'জনের মধ্যে অপেক্ষাকৃত অধিক জ্ঞানী ছিলেন, তিনি বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! হ্যাঁ, আপনি আমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করুন। আর আমাকে কথা বলার অনুমতি দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি বলো।" সে (দ্বিতীয় ব্যক্তি) বলল: আমার পুত্র তার (প্রথম ব্যক্তির) কাছে শ্রমিক হিসেবে ছিল। সে তার স্ত্রীর সাথে যিনা (ব্যভিচার) করেছে। তখন আমাকে জানানো হলো যে, আমার পুত্রের উপর রজম (পাথর মেরে মৃত্যুদণ্ড) হবে। তাই আমি তার থেকে মুক্তিপণ হিসেবে একশো বকরী ও আমার এক দাসী দিয়েছি। এরপর আমি আলিমদের (জ্ঞানীদের) নিকট জিজ্ঞাসা করলাম। তারা আমাকে জানালেন যে, আমার পুত্রের শাস্তি হলো একশো দোররা মারা এবং এক বছরের জন্য নির্বাসন। আর তারা আমাকে জানালেন যে, রজম (মৃত্যুদণ্ড) হবে তার (প্রথম ব্যক্তির) স্ত্রীর উপর। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "শোনো! যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! আমি তোমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করবই। তোমার বকরী ও তোমার দাসী তোমাকে ফেরত দেওয়া হবে।" অতঃপর তিনি তার (যুবকের) পুত্রকে একশো দোররা মারলেন এবং এক বছরের জন্য নির্বাসিত করলেন। এরপর তিনি উনায়স আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন যে, সে যেন অন্য লোকটির স্ত্রীর নিকট যায়; যদি সে স্বীকার করে তবে যেন তাকে রজম করে। সুতরাং সে (ঐ মহিলা) স্বীকার করল এবং উনায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে রজম করলেন।
6579 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللَّهُمَّ إني أحرّج حق الضعيفين: اليتيم والمرأة". وفي رواية:"مال الضعيفين".
حسن: رواه ابن ماجة (3678) وصحّحه ابن حبَّان (5565) والحاكم (1/ 63، 4/ 128)
والبيهقي (10/ 134) وأحمد (9666) كلّهم من حديث ابن عجلان، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة فذكره؟
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: إسناده حسن من أجل ابن عجلان فإنه حسن الحديث واستشهد به مسلم.
وقوله:"أحرج حق الضعيفين" أي أحرم مالهما على من ظلمهما.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হে আল্লাহ! আমি দুই দুর্বল শ্রেণির অধিকারের ব্যাপারে কঠোরতা আরোপ করছি (তাদের অধিকার লঙ্ঘন করাকে গুরুতর পাপ গণ্য করছি): তারা হলো ইয়াতিম ও নারী।" অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "দুই দুর্বল শ্রেণির সম্পদ।"
6580 - عن شريح بن هانئ، عن أبيه، أنه لما وفد إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وسمعه وهم يكنون هانئا أبا الحكم. فدعاه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال له:"إنَّ الله هو الحكم، وإليه الحكم، فلم تكنى أبا الحكم؟" قال: إن قومي إذا اختلفوا في شيء أتوني فحكمت بينهم، فرضي كلا الطرفين. قال:"ما أحسن من هذا، فما لك من الولد؟". قال: لي شريح، وعبد الله، ومسلم، قال:"فمن أكبرهم؟" قال: شريح، قال:"فأنت أبو شريح" فدعا له ولولده.
صحيح: رواه النسائيّ (5387)، عن قُتَيبة قال: حَدَّثَنَا يزيد وهو ابن المقدام بن شريح، عن أبيه، عن شريح بن هانئ، عن أبيه فذكره.
وإسناده صحيح. قد ثبت التحكيم في شأن الزوجين، وجزاء الصيد، وتحكيم سعد في قضية بني قريظة.
والتحكيم جائز غير لازم، وإنما هو فتوى للطرفين إذا شاؤوا أخذوا به، وإن لم يشاؤوا لجأوا إلى السلطان.
হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুনলেন যে লোকেরা হানীকে 'আবুল হাকাম' নামে ডাকে, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডেকে বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ই হলেন আল-হাকাম (চূড়ান্ত বিচারক) এবং বিচার তাঁরই দিকে প্রত্যাবর্তন করে। তাহলে তুমি কেন আবুল হাকাম উপনাম ধারণ করলে?" তিনি বললেন, "যখন আমার কওমের লোকেরা কোনো বিষয়ে মতবিরোধ করে, তখন তারা আমার কাছে আসে। আমি তাদের মাঝে ফয়সালা করে দেই এবং উভয় পক্ষই সন্তুষ্ট হয়।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এটা কতই না উত্তম! তোমার কি কোনো সন্তান আছে?" তিনি বললেন, "আমার সন্তান হলো শুরাইহ, আবদুল্লাহ এবং মুসলিম।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাদের মধ্যে সবচেয়ে বড় কে?" তিনি বললেন, "শুরাইহ।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাহলে তুমি হলে আবূ শুরাইহ।" অতঃপর তিনি তার জন্য এবং তার সন্তানদের জন্য দু‘আ করলেন।