আল-জামি` আল-কামিল
6581 - عن وائل بن حجر قال: إني لقاعد مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذ جاء رجل يقود آخر بنسعة فقال: يا رسول الله! هذا قتل أخي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أقتلته؟" قال: نعم قتلته. قال:"كيف قتلته؟" قال: كنت أنا وهو نتخبط من شجرة، فسبَّني فأغضبني فضربته بالفأس على قرنه فقتلته. فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: هل لك من شيء تؤديه عن نفسك؟" قال: ما لي إِلَّا كسائي وفاسي: قال:"فترى قومك يشترونك؟" قال: أنا أهون على قومي من ذاك. فرمى إليه بنسعته وقال:"دونك صاحبك" فانطلق به الرّجل. فلمّا ولّى قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن قتله فهو مثله" فرجع فقال: يا رسول الله! إنه بلغني أنك قلت:"إن قتله فهو مثله"، وأخذته بأمرك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما تريد أن يبوء
بإثمك وإثم صاحبك؟". قال: يا نبي الله، بلى. قال:"فإن ذاك كذاك، قال: فرمي بنسعته وخلّى سبيله.
صحيح: رواه مسلم في القسامة (1680) عن عبيد الله بن معاذ العنبريّ، حَدَّثَنَا أبيّ، حَدَّثَنَا أبو يونس، عن سماك بن حرب، عن علقمة بن وائل، حدَّثه أن أباه حدَّثه فذكره.
وقوله:"نسعة": وهي حبل من جلود.
وقوله:"نتخبط": أي نجمع الخبط، وهو ورق الشجر.
وقوله:"إن قتله فهو مثله": أي أنه لا فضل ولا منة لأحدهما على الآخر، لأنه استوفي حقه منه بخلاف ما لو عفا عنه، فإنه كان له الفضل والمنة وجزيل ثواب الآخرة، وجميل الثناء في الدُّنيا.
ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ওয়াইল) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উপবিষ্ট ছিলাম, এমন সময় এক ব্যক্তি তার হাতে চামড়ার রশি বাঁধা অবস্থায় আরেক ব্যক্তিকে টেনে নিয়ে আসলো এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এ ব্যক্তি আমার ভাইকে হত্যা করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি তাকে হত্যা করেছো?" সে বলল: হ্যাঁ, আমি তাকে হত্যা করেছি। তিনি বললেন: "কীভাবে তাকে হত্যা করলে?" সে বলল: আমি ও সে একটি গাছ থেকে পাতা ঝরাচ্ছিলাম (খাবার সংগ্রহের জন্য)। তখন সে আমাকে গালি দিল এবং আমাকে রাগান্বিত করল। ফলে আমি কুড়াল দিয়ে তার কানের ওপর আঘাত করলাম এবং তাকে হত্যা করে ফেললাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার পক্ষ থেকে (রক্তপণ) পরিশোধ করার মতো কিছু কি তোমার আছে?" সে বলল: আমার একটি মাত্র পোশাক আর এই কুড়ালটি ছাড়া আর কিছুই নেই। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার গোত্রের লোকেরা কি তোমাকে (মুক্তিপণ দিয়ে) কিনতে রাজি হবে?" সে বলল: তাদের কাছে আমি এর চেয়েও নগণ্য। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (নিহত ব্যক্তির ভাইয়ের দিকে) রশিটি ছুঁড়ে দিলেন এবং বললেন: "এই নাও তোমার সাথীকে।" লোকটি তাকে নিয়ে চলে গেল। যখন লোকটি চলে গেল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে তাকে হত্যা করে, তবে সেও তার (সমান) মতোই হবে।" লোকটি ফিরে আসলো এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে আপনি বলেছেন: "যদি সে তাকে হত্যা করে, তবে সেও তার (সমান) মতোই হবে," অথচ আমি আপনার নির্দেশেই তাকে ধরে নিয়েছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি চাও না যে সে তোমার এবং তোমার সাথীর গুনাহ নিয়ে ফিরে যাক?" সে বলল: হে আল্লাহর নবী, অবশ্যই চাই। তিনি বললেন: "তবে এটাই তার জন্য উপযুক্ত।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন লোকটি রশিটি ছুঁড়ে ফেলে দিল এবং তাকে মুক্তি দিয়ে দিল।
6582 - عن ابن عباس قال: كان زوج بريرة عبدًا يقال له: مُغيث، كأني أنظر إليه يطوف خلفها يبكي، ودموعه تسيل على لحيته. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لعباس:"يا عباس! ألا تعجب من حب مغيث لبريرة، ومن بغض بريرة مغيثًا"، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لو راجعتِه" قالت: يا رسول الله! تأمرني؟ قال:"إنَّما أنا أشفع" قالت: لا حاجة لي فيه.
صحيح: رواه البخاريّ في الطلاق (5283) عن محمد، أخبرنا عبد الوهّاب، حَدَّثَنَا خالد، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: বারীরাহর স্বামী ছিলেন একজন গোলাম, যার নাম ছিল মুগীস। আমি যেন এখনো তাকে দেখছি যে, সে তার (বারীরার) পিছনে পিছনে ঘুরছে, আর কাঁদছে। তার অশ্রু তার দাড়ির উপর দিয়ে গড়িয়ে পড়ছিল। তখন নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "হে আব্বাস! তুমি কি মুগীসের বারীরাহর প্রতি ভালোবাসা এবং বারীরাহর মুগীসের প্রতি বিদ্বেষ দেখে আশ্চর্য হচ্ছ না?" এরপর নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (বারীরাহকে) বললেন: "যদি তুমি তাকে (স্বামীরূপে) গ্রহণ করতে!" বারীরাহ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি আমাকে আদেশ করছেন? তিনি বললেন: "আমি তো শুধু সুপারিশ করছি।" বারীরাহ বললেন: তাকে আমার কোনো প্রয়োজন নেই।
6583 - عن ابن عمر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من حالت شفاعته دون حد من حدود الله فهو مضاد لله في أمره".
صحيح: رواه أبو داود (3597) وأحمد (5385) والحاكم (3/ 27) كلّهم من طريق زهير بن معاوية، ثنا عمارة بن غزية، عن يحيى بن راشد قال: جلسنا لعبد الله بن عمر، فخرج إلينا فجلس فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث في سياق أطول وجاء فيه:"ومن مات وعليه دين فليس بالدينار ولا بالدرهم ولكنها الحسنات والسيئات. ومن خاصم في باطل وهو يعلمه لم يزل في سخط الله حتَّى ينزع، ومن قال في مؤمن ما ليس فيه أسكنه الله ردغة الخبال حتَّى يخرج مما قال" وإسناده صحيح.
وجاء في سياق هذا الحديث أيضًا:"من أعان على خصومة بظلم - أو يعين على ظلم - لم يزل في سخط الله حتَّى ينتزعه.
رواه ابن ماجة (2320) من طريق حسين المعلم وأبو داود (3598) من طريق المثنى بن يزيد، كلاهما عن مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
والمثنى بن يزيد مجهول، ولكن تابعه حسين المعلم، ومطر الوراق مختلف فيه، وقد تابعه
عطاء بن أبي مسلم الخراسانيّ، عن نافع. رواه الحاكم (4/ 99) وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد".
ورواه ابن الأعرابي في معجمه (640) من وجه آخر عن عطاء الخراسانيّ، عن عمران، عن عبد الله بن عمر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من قال سبحان الله، ولا إله إِلَّا الله، والله أكبر، والحمد لله كتب الله له بكل حرف عشر حسنات، ومن أعان على خصومة باطل لم يزل في سخط الله حتَّى ينزع، ومن حالت شفاعته دون حد من حدود الله فقد ضاد الله في أمره، ومن بهت مؤمنًا أو مؤمنة حبسه الله في ردغة الخبال يوم القيامة حتَّى يخرج مما قال، وليس بخارج".
وهذا السياق ذكره ابن أبي حاتم في العلل (2/ 183) وقال:"رواه عمر بن يونس اليماميّ، عن عاصم بن محمد، عن يزيد، عن المثني بن يزيد، عن مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر، وقال: قال أبي: هذا خطأ، الصَّحيح عن ابن عمر موقوف".
قلت: ورواه ابن أبي شيبة (28661) عن عبدة، عن يحيى بن سعيد، عن عبد الوهّاب (وهو ابن بخت المكي) عن ابن عمر من قوله مقتصرا على قوله"من حالت شفاعته دون حد من حدود الله فهو مضاد لله في أمره".
والذي يظهر من هذه الأسانيد ومتونها أن ابن عمر أو من دونه كان يروي الحديث مرة بكامله، وأخرى مجزأة. ويشير إليه اختلاف مخرج الحديث، فصحَّ بعض طرقه دون البعض، ولا يبعد أن يكون ابن عمر أو من دونه رواه مرة موقوفًا عليه كما أشار إليه أبو حاتم في قوله وابن أبي شيبة في روايته. وبالله التوفيق.
وقوله:"من حالت شفاعته: أي من ثبت في حقه من حقوق الله، وبلغ ذلك إلى السلطان، وأمّا قبل البلوغ إلى السلطان أو ما كان من حق الآدميين فللحاكم أن يشفع، بل يستحب له ذلك ولو ببذل المال، كما كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يفعل.
قيل لعلي: وقد شفع لسارق: أتشفع لسارق؟ فقال: نعم، إن ذلك يفعل ما لم يبلغ به الإمام. فإذا بُلغ به الإمام فلا أعفاه الله إن أعفاه. رواه ابن أبي شيبة (28659).
وعن الزبيد بن الصلت قال: سمعت أبا بكر الصديق يقول: لو أخذت شاربًا لأحببت أن يستره الله، ولو أخذت سارقًا لأحبت أن يستره الله. رواه ابن أبي شيبة
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তির সুপারিশ আল্লাহর নির্ধারিত কোনো দণ্ডের (হদ্দের) পথে বাধা সৃষ্টি করে, সে যেন আল্লাহর আদেশের বিরোধিতা করল।”
6584 - عن بهز بن حكيم بن معاوية، عن أبيه، عن جده قال: أخذ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ناسًا من قومي في تهمة فحبسهم، فجاء رجلٌ من قومي إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يخطب، فقال: يا محمد! علامَ تحبس جيرتي؟ فصمت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إن ناسا ليقولون إنك تنهى عن الشر، وتستخلي به! فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما يقول؟" قال: فجعلت أُعرِّض بينهما بالكلام
مخافة أن يسمَعها، فيدعوَ على قومي دعوةً لا يفلحون بعدها أبدًا، فلم يزل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم به حتَّى فهِمَها فقال:"قد قالوها أو قائلُها منهم؟ ، والله لو فعلت لكان عليّ وما كان عليهم، خلوا له عن جيرانه".
حسن: رواه أبو داود (3630)، والتِّرمذيّ (1417)، والنسائي (4875)، وأحمد (20019)، والحاكم (1/ 125)، والبيهقي (6/ 53) كلّهم من حديث معمر، عن بهز بن حكيم بن معاوية، عن أبيه، عن جده قال: فذكره. واختصره البعض.
قال الحكم:"وقد تقدّم القول في صحيفة بهز بن حكيم ما أغنى عن إعادته على أن شواهد هذا الحديث في الصحيحين.
قلتُ: إسناده حسن من أجل بهز بن حكيم وأبيه فإنهما حسنا الحديث.
মু'আবিয়া ইবনু হায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার গোত্রের কিছু লোককে সন্দেহের বশে ধরে নিয়ে তাদের আটক করে রাখলেন। তখন আমার গোত্রের এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন, যখন তিনি খুতবা দিচ্ছিলেন। সে বলল: হে মুহাম্মাদ! আপনি আমার প্রতিবেশীদেরকে কেন আটক করে রেখেছেন? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব রইলেন। লোকটি বলল: কিছু লোক তো বলছে যে আপনি মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করেন, অথচ আপনি নিজেই গোপনে তা করেন! তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে কী বলছে?" বর্ণনাকারী বলেন: আমি তখন তাদের উভয়ের মধ্যে কথাটি পৌঁছাতে গিয়ে ইঙ্গিতে বলতে লাগলাম (স্পষ্টভাবে বললাম না), এই ভয়ে যে, তিনি (নবী) যেন তা শুনতে না পান এবং আমার গোত্রের বিরুদ্ধে এমন বদ-দু'আ না করে বসেন যার পরে তারা কখনো সফল হবে না। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে বারবার কথা বলতে থাকলেন যতক্ষণ না তিনি বিষয়টি বুঝতে পারলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "তারা কি এই কথা বলেছে, নাকি তাদের কেউ এই কথা বলেছে? আল্লাহর শপথ! যদি আমি তা করতাম, তবে তার ভার আমার উপরই আসত, তাদের উপর নয়। তার প্রতিবেশীদের ছেড়ে দাও।"
6585 - عن * *
* হতে...
6586 - عن عمر بن الخطّاب قال: إن أناسًا كانوا يؤخذون بالوحي في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وإن الوحي قد انقطع، وإنما نأخذ الآن بما ظهر لنا من أعمالكم، فمن أظهر لنا خيرًا آمنَّاه وقرَّبناه، وليس لنا من سريرته شيء، الله يحاسبه في سريرته، ومن أظهر لنا سوءا لم نأمنه ولم نصدقه، وإن قال: إن سريرته حسنة.
صحيح: رواه البخاريّ في الشهادات (2641) عن الحكم بن نافع، أخبرنا شعيب، عن الزّهريّ، قال: حَدَّثَنِي حميد بن عبد الرحمن بن عوف، أن عبد الله بن عتبة، قال: سمعت عمر بن الخطّاب، قال: فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে কিছু লোক ওহীর মাধ্যমে (তাদের দোষ-ত্রুটির জন্য) পাকড়াও হতেন। আর ওহী এখন বন্ধ হয়ে গেছে। এখন আমরা কেবল তোমাদের প্রকাশ্য আমল দ্বারা তোমাদের বিচার করব। অতএব, যে আমাদের কাছে ভালো কিছু প্রকাশ করবে, আমরা তাকে নিরাপদ মনে করব এবং তাকে আমাদের কাছে স্থান দেব। তার ভেতরের (গোপন) বিষয়ে আমাদের কিছুই করার নেই; আল্লাহই তার গোপন বিষয়ের হিসাব নেবেন। আর যে আমাদের কাছে মন্দ কিছু প্রকাশ করবে, আমরা তাকে নিরাপদ মনে করব না এবং বিশ্বাসও করব না, যদিও সে দাবি করে যে তার ভেতরের অবস্থা ভালো।
6587 - عن أنس قال: مرَّ على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بجنازة فأثنوا عليها خيرًا، فقال:"وجبتْ" ثمّ مُرَّ بأخرى فأثنوا عليها شرًّا أو قال غير ذلك فقال:"وجبتْ" فقيل: يا رسول الله! قلت لهذا وجبتْ ولهذا وجبتْ؟ ! قال:"شهادة القوم، المؤمنون شهداء الله في الأرض".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2642)، ومسلم في الجنائز (60: 949) كلاهما من طريق حمّاد بن زيد وزاد مسلم غيره عن ثابت، عن أنس، فذكره، والسياق للبخاريّ ولم يذكر مسلم لفظه وإنما أحال على رواية ابن علية، عن عبد العزيز بن صُهَيب، عن أنس، فذكره بنحوه وبسياق أطول، وفيه أن الذي سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم هو عمر بن الخطّاب رضي الله عنه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে একটি জানাযা নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল। লোকেরা তার প্রশংসা করল (ভালো বলল)। তখন তিনি বললেন: "ওয়াজিব হয়ে গেল (অবধারিত হলো)।" এরপর অন্য একটি জানাযা নিয়ে যাওয়া হলো। লোকেরা তার নিন্দা করল (মন্দ বলল) অথবা তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: 'অন্যরকম কিছু বলল'। তখন তিনি বললেন: "ওয়াজিব হয়ে গেল (অবধারিত হলো)।" তখন জিজ্ঞাসা করা হলো: "ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি এর (প্রথমজনের) ক্ষেত্রেও বললেন, 'ওয়াজিব হলো' এবং এর (দ্বিতীয়জনের) ক্ষেত্রেও বললেন, 'ওয়াজিব হলো'?" তিনি বললেন: "এ হলো লোকদের সাক্ষ্য। মু'মিনগণ পৃথিবীতে আল্লাহর সাক্ষী।"
6588 - عن عمران بن حصين قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"خيركم قرني ثمّ الذين يلونهم، ثمّ الذين يلونهم" قال عمران: لا أدريّ، أذكر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعد قرنين أو ثلاثة، قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إن بعدكم قومًا يخونون ولا يؤتمنون، ويشهدون ولا يستشهدون، وينذرون ولا يفون، ويظهر فيهم السمن".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2651) ومسلم في فضائل الصّحابة (214: 2535) كلاهما من طريق شعبة سمعت أبا حمزة، حَدَّثَنِي زهدم بن مضرّب قال: سمعت عمران بن حصين، فذكره.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে সর্বোত্তম হলো আমার যুগ (আমার সাহাবীগণ), অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী হবে, অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী হবে।" ইমরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার জানা নেই, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই যুগ না তিন যুগের কথা উল্লেখ করেছিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরো বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের পরে এমন কিছু লোকের আগমন ঘটবে যারা খিয়ানত করবে, কিন্তু তাদের বিশ্বস্ত মনে করা হবে না; তারা সাক্ষ্য দেবে কিন্তু তাদের সাক্ষী হওয়ার জন্য ডাকা হবে না (তারা নিজেরাই সাক্ষ্য দিতে আগ্রহী হবে); তারা মান্নত করবে কিন্তু তা পূর্ণ করবে না; এবং তাদের মধ্যে স্থূলতা প্রকাশ পাবে।"
6589 - عن عبد الله بن مسعود، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"خير الناس قرنيّ، ثمّ الذين يلونهم، ثمّ الذين يلونهم، ثمّ يجيء أقوام: تسبق شهادة أحدهم يمينه، ويمينه شهادته".
قال إبراهيم: وكانوا يضربوننا على الشهادة والعهد.
رواه البخاريّ في الشهادات (2652) ومسلم في فضائل الصّحابة (21: 2533) من طريق منصور، عن إبراهيم بن يزيد، عن عبيدة السلمانيّ، عن عبد الله، فذكره.
وأمّا ما رُوي عن جابر بن سمرة قال: خطبنا عمر بن الخطّاب بالجابية فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام فينا مثل مقامي فيكم فقال:"احفظوني في أصحابي، ثمّ الذين يلونهم، ثمّ الذين يلونهم، ثمّ يفشو الكذب حتَّى يشهد الرّجل وما يستشهد، ويحلف وما يستحلف" فهو مضطرب.
رواه ابن ماجة (2363) وأحمد (177) وابن حبَّان (5586) كلّهم من طريق جرير بن عبد الحميد، عن عبد الملك بن عمير، عن جابر بن سمرة فذكره بأطول منه. ظاهره الصحة لثقة رجاله، ولكن وقع فيه اضطراب من قبل عبد الملك بن عمير، فقد روى عنه عدد من الثّقات بألوان مختلفة ذكره الدَّارقطنيّ في العلل (2/ 122 - 125) بالتفصيل.
منهم جرير بن عبد الحميد، وجرير بن حازم، ومحمد بن شبيب الزهرانيّ، وقرة بن خالد، وقيل عن شعبة بن الحجاج فقالوا: عن عبد الملك بن عمير بإسناده.
وخالفهم جماعة ثقات منهم: عبد الله بن المختار، ويونس بن أبي إسحاق وابنه إسرائيل، ومعمر، وعبد الحكيم بن منصور، وحبان ومندل ابنا عليّ، وسفيان الثوريّ، وقيل عن شعبة والمسعوديّ، وداود بن الزبرقان، والحسين بن واقد، والحصين بن واقد شيخ رُوي عن أبي بكر بن عَيَّاش وقزعة بن سويد، وأبو عوانة، فرووه عن عبد الملك بن عمير، عن عبد الله بن الزُّبير عن عمر.
ورواه شيبان بن عبد الرحمن، وشعيب بن صفوان، وزائدة، وعبيد الله بن عمر الراقي، عن عبد الملك بن عمير، عن رجل لم يسم، عن عبد الله بن الزُّبير.
وقال عبد الحميد بن موسى، عن عبيد الله بن عمرو، عن عبد الملك بن عمير، عن مجاهد، عن ابن الزُّبير، عن عمر. ولم يصنع شيئًا، وذكر غير هؤلاء الدَّارقطنيّ ثمّ قال:"ويُشبه أن الاضطراب في هذا الإسناد من معبد الملك بن عمير لكثرة اختلاف الثّقات عنه في الإسناده".
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: "সর্বশ্রেষ্ঠ মানুষ আমার প্রজন্ম, এরপর তারা যারা তাদের অনুসরণ করবে, এরপর তারা যারা তাদের অনুসরণ করবে। এরপর এমন লোকেরা আসবে, যাদের একজনের সাক্ষ্য তার শপথের আগে হয়ে যাবে এবং তার শপথ তার সাক্ষ্যের আগে হয়ে যাবে।" ইবরাহীম (রাবী) বলেন: তারা সাক্ষ্য এবং অঙ্গীকারের বিষয়ে আমাদের মারধর করতেন।
6590 - عن زيد بن خالد الجهنيّ، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ألا أخبركم بخير الشهداء؟ الذي يأتي بشهادته قبل أن يُسألها، أو يخبر بشهادته قبل أن يسألها".
صحيح: رواه مالك في الأقضية (3) عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو بن عثمان، عن أبي عمرة الأنصاريّ، عن زيد بن خالد الجهنيّ، فذكره.
ورواه مسلم في الأقضية (1719) من طريق مالك به، باللفظ الأوّل.
ورواه ابن عبد البر في"التمهيد" (17/ 295) من طريق ابن وهب عن مالك، به، مثله. ثمّ قال ابن وهب:"وسمعت مالكًا يقول في تفسير هذا الحديث: إنه الرّجل تكون عنده الشهادة في الحق يكون للرجل لا يعلم بذلك قبل. فيخبر بشهادته ويرفعها إلى السلطان".
قال ابن وهب:"وبلغني عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاري شيخ مالك) أنه قال: من دُعي لشهادة عنده، فعليه أن يجيب إذا علم أنه ينتفع بها الذي يشهد له بها، وعليه أن يؤديها، ومن كانت عنده شهادة لا يعلم بها صاحبها، فليؤدها قبل أن يسأل عنها، فإنه كان يقول: من أفضل الشهادات شهادة أداها صاحبها قبل أن يسألها".
قال ابن عبد البر: تفسير مالك ويحيى بن سعيد لهذا الحديث أولي ما قيل به فيه".
قلت: وعلى ضوء تفسير مالك وشيخه يحيى الأنصاري يجمع بين هذا الحديث وحديث عمران بن حصين السابق النذين ظاهرهما التعارض، فيكون المراد بحديث زيد بن خالد هذا من عنده شهادة الإنسان بحق لا يعلم بها صاحبها فيأتي إليه فيخبره بها أو يخبر السلطان بها.
قال الحافظ:"وهذا من أحسن الأجوبة". الفتح
যায়দ ইবন খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি কি তোমাদেরকে শ্রেষ্ঠ সাক্ষীদের সম্পর্কে অবহিত করব না? সে হলো ঐ ব্যক্তি, যে তার সাক্ষ্য প্রদানের জন্য জিজ্ঞাসিত হওয়ার পূর্বেই তা পেশ করে, অথবা জিজ্ঞাসিত হওয়ার পূর্বেই তার সাক্ষ্য সম্পর্কে জানায়।"
6591 - عن ابن مسعود، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إن من بين يدي الساعة، التسليم على الخاصة، وفشو التجارة، وظهور شهادة الزور، وكتمان شهادة الحق".
حسن: رواه البخاريّ في الأدب المفرد (1049) وأحمد (3982) والطحاوي في مشكله (1590) والحاكم (4/ 445) كلّهم من حديث بشير بن سليمان، عن سيار أبي حمزة، عن طارق بن
شهاب، عن ابن مسعود فذكره، وهذا مختصر.
وإسناده حسن من أجل أبي حمزة فإنه حسن الحديث كما سبق بيان ذلك في كتاب البيوع باب من أشراط الساعة يفشو المال.
وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (7/ 329):"رجاله رجال الصَّحيح" فهو ظن منه أن سيارا هو أبو الحكم وهذا خطأ، وإنما هو سار أبو حمزة.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘নিশ্চয় কিয়ামতের আগে কেবল বিশেষ পরিচিত লোকেদেরকেই সালাম দেওয়া হবে, ব্যবসা-বাণিজ্যের ব্যাপক প্রসার ঘটবে, মিথ্যা সাক্ষ্য প্রকাশ পাবে এবং সত্য সাক্ষ্য গোপন করা হবে।’
6592 - عن أنس قال: سئل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن الكبائر قال:"الإشراك بالله، وعقوق الوالدين، وقتل النفس، وشهادة الزور".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2653) ومسلم في الإيمان (144: 88) كلاهما من طريق شعبة، أخبرنا عبيد الله بن أبي بكر بن أنس، عن أنس، فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কবীরা গুনাহ (মহাপাপ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, পিতা-মাতার অবাধ্য হওয়া, কোনো প্রাণ হত্যা করা এবং মিথ্যা সাক্ষ্য দেওয়া।"
6593 - عن أبي بكرة قال: كنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"ألا أُنبِّئكم بأكبر الكبائر؟ ثلاثًا: الإشراك بالله، وعقوق الوالدين، وشهادة الزور أو قول الزور".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2654) من طريق بشر بن المفضل، ومسلم في الإيمان (143/ 87) من طريق إسماعيل ابن علية كلاهما عن سعيد الجريريّ، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه، قال (فذكره) واللّفظ لمسلم.
وأمّا ما رُوي عن رجل، قال: كنا جلوسًا مع أبي هريرة قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من شهد على مسلم شهادة ليس لها بأهل فليتبوأ مقعده من النّار" فهو ضعيف.
رواه أحمد (10617) عن يزيد (ابن هارون) أخبرنا جُهير بن يزيد العبديّ، عن خداش بن عَيَّاش، قال: كنت في حلقة بالكوفة، فإذا رجل يحدث قال: فذكره.
ورواه أبو داود الطيالسي (2717) عن جهير بن يزيد، عن عباس بن خُليس، عن رجل من أهل الكوفة قال: كنتُ في حلقة أبي هريرة. فذكر الحديث. وفيه رجل مبهم، وعباس بن خُليس ضعيف.
ولكن رواه الخطيب في تاريخ بغداد (5/ 69) وابن أبي الدُّنيا في كتاب"الصمت وحفظ اللسان" (258) كلاهما من طريق يزيد بن هارون، عن جهير بن يزيد، عن خداش، عن أبي هريرة فذكره بدون الواسطة.
وخداش بن عَيَّاش لا يعرف من هو؟ ولم يوثقه غير ابن حبَّان، وليّنه ابن حجر في التقريب، وقد قال الترمذيّ: لا يُعرف كما في المغني (1/ 209) فهو دائر بين الانقطاع وبين الضعيف.
وقوله: شهد على مسلم شهادة .. أي شهد بأنه فاسق أو نحو ذلك وهو بريء منه فهو أيضًا
شهادة الزور.
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "আমি কি তোমাদেরকে কবিরা গুনাহসমূহের মধ্যে সবচেয়ে বড়গুলি সম্পর্কে অবহিত করব না?" তিনি এই কথাটি তিনবার বললেন। (তা হলো:) আল্লাহর সাথে শরীক করা, পিতা-মাতার অবাধ্যতা এবং মিথ্যা সাক্ষ্য দেওয়া, অথবা (তিনি বললেন) মিথ্যা কথা বলা।
6594 - عن عائشة قالت في حديث الإفك: فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بريرة، فقال:"يا بريرة، هل رأيتِ فيها شيئًا يريبكِ؟" فقالت بريرة: لا والذي بعثك بالحق، إن رأيت منها أمرًا أغمضه عليها قطّ أكثرَ من أنها جارية حديثة السن، تنام عن العجين، فتأتي الداجن فتأكله. وجاء في آخره: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يسأل زينبَ بنت جحش عن أمريّ، فقال:"يا زينبُ، ما علمتِ ما رأيتِ؟" فقالت: يا رسول الله، أحمي سمعي وبصري، والله ما علمتُ عليها إِلَّا خيرًا، قالت (أي عائشة): وهي التي كانت تساميني، فعصمها الله بالورع.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2661)، ومسلم في التوبة (2770) من طريق الزّهريّ، عن عروة بن الزُّبير، وسعيد بن المسيب، وعلقمة بن وقَّاص الليثيّ، وعبيد الله بن عبد الله بن عتبة كلّهم من عائشة رضي الله عنها زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في حين قال لها أهل الإفك ما قالوا فبرَّأها الله منه، فذكرت قصة الإفك بتمامها.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইফকের (অপবাদের) ঘটনার সময় বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারীরাহকে ডাকলেন এবং বললেন, "হে বারীরাহ, তুমি কি তার (আয়িশার) মধ্যে এমন কিছু দেখেছো যা তোমাকে সন্দেহজনক মনে হয়?" বারীরাহ উত্তর দিলেন: না, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে পাঠিয়েছেন তার কসম, আমি তার মধ্যে এমন কোনো বিষয় কখনো দেখিনি যা আমি তার জন্য গোপন করে রাখব—শুধু এতটুকু ছাড়া যে সে অল্পবয়সী বালিকা, রুটি বানানোর জন্য আটার খামির রেখে ঘুমিয়ে পড়ে, আর গৃহপালিত পশু এসে তা খেয়ে ফেলে। এর শেষাংশে এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার ব্যাপারটি সম্পর্কে যায়নাব বিনত জাহশকেও জিজ্ঞেস করেছিলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে যায়নাব, তুমি কী জানো? তুমি কী দেখেছো?" তিনি (যায়নাব) বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আমার শ্রবণশক্তি ও দৃষ্টিশক্তিকে রক্ষা করছি (মিথ্যা অপবাদ থেকে আশ্রয় চাচ্ছি)। আল্লাহর কসম! আমি তার (আয়িশার) মধ্যে কল্যাণ ছাড়া আর কিছুই জানি না।" তিনি (আয়িশা) বললেন: সে (যায়নাব) ছিল আমার প্রতিদ্বন্দ্বী (সতীন), কিন্তু আল্লাহ তাকে পরহেযগারিতার মাধ্যমে রক্ষা করলেন।
6595 - عن عبد الله بن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"يا معشر النساء! تصدقن وأكثرن الاستغفار، فإني رأيتكن أكثر أهل النّار" فقالت امرأة منهن، جزلة: وما لنا يا رسول الله! أكثر أهل النّار؟ ! قال:"تكثرن اللعن، وتكفرن العشير، وما رأيت من ناقصات عقل ودين أغلب الذي لبّ منكن" قالت: يا رسول الله! وما نقصان العقل والدين؟ قال:"أما نقصان العقل فشهادة امرأتين تعدل شهادة رجل، فهذا نقصان العقل، وتمكث الليالي ما تصلي وتفطر في رمضان، فهذا نقصان الدين".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (79) عن محمد بن رمح بن المهاجر المصريّ، أخبرنا اللّيث، عن ابن الهاد، عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে নারী সমাজ! তোমরা সাদাকা করো এবং বেশি বেশি ইস্তিগফার (ক্ষমাপ্রার্থনা) করো। কেননা, আমি তোমাদেরকে জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী হিসেবে দেখেছি।" তখন তাদের মধ্য থেকে একজন বুদ্ধিমতী নারী বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাদের কী হয়েছে যে আমরা জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী হব?! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা বেশি বেশি লানত (অভিশাপ) করো এবং তোমরা তোমাদের সঙ্গীর (স্বামীর) নাশুকরি (অকৃতজ্ঞতা) করো। জ্ঞান ও ধর্মের দিক থেকে দুর্বল হওয়া সত্ত্বেও আমি তোমাদের চেয়ে বেশি বুদ্ধিমান ব্যক্তিকে কাবু করতে আর কাউকে দেখিনি।" তিনি বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! জ্ঞান ও ধর্মের সেই দুর্বলতা কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জ্ঞানের দুর্বলতা হলো এই যে, দুজন নারীর সাক্ষ্য একজন পুরুষের সাক্ষ্যের সমান। আর এটা হলো জ্ঞানের দুর্বলতা। আর তোমরা রাতের পর রাত নামাজ পড়ো না এবং রমযান মাসে রোযা রাখো না, আর এটা হলো ধর্মের দুর্বলতা।"
6596 - عن أبي سعيد الخدريّ، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أليس شهادة المرأة مثل نصف شهادة الرّجل؟ قلنا: بلي" قال:"فذلك من نقصان عقلها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2658)، ومسلم في الإيمان (80) كلاهما من طريق ابن أبي مريم، أخبرنا محمد بن جعفر، أخبرني زيد بن أسلم، عن عياض بن عبد الله، عن أبي
سعيد الخدريّ، فذكره، والسياق للبخاريّ.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নারীর সাক্ষ্য কি পুরুষের সাক্ষ্যের অর্ধেক নয়?" আমরা বললাম: "হ্যাঁ, অবশ্যই।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটাই তার জ্ঞানের স্বল্পতার কারণ।"
6597 - عن عقبة بن الحارث أنه تزوج أم يحيى بنت أبي إهاب، قال: فجاءت أمة سوداء فقالت: قد أرضعنكما، فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فأعرض عني، قال: فتنحيت فذكرت ذلك له، قال:"وكيف وقد زعمت أن قد أرضعتكما" فنهاه عنها.
وفي رواية:"وكيف وقد قيل! دَعْها عنك".
صحيح: رواه البخاريّ في الشهادات (2659) من طريق ابن جريج، عن ابن أبي مليكة، عن عقبة بن الحارث.
والرّواية الأخرى (2660) من طريق عمر بن سعيد، عن ابن أبي مليكة، به.
وفي الحديث دليل على قبول شهادة المرأة الواحدة فيما لا يطلع عليه الرجال مثل الرضاعة، وشهادة القابلة في الاستهلال وغيرها. انظر الكلام المتصل في"المنة الكبرى" (9/ 89).
উকবাহ ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উম্মু ইয়াহইয়া বিন্ত আবি ইহাবকে বিবাহ করলেন। তিনি বলেন, তখন একজন কালো দাসী এসে বলল, আমি তোমাদের উভয়কে স্তন্যপান করিয়েছি। আমি বিষয়টি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট উল্লেখ করলাম। তিনি আমার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন। তিনি বলেন, এরপর আমি একপাশে সরে গেলাম এবং পুনরায় তাঁর কাছে বিষয়টি উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন, "কীভাবে (তুমি তাকে রাখবে) যখন সে দাবি করেছে যে, সে তোমাদের উভয়কে স্তন্যপান করিয়েছে?" এরপর তিনি তাকে (সেই স্ত্রীকে গ্রহণ করা থেকে) নিষেধ করলেন।
অন্য বর্ণনায় এসেছে, তিনি বললেন, "কীভাবে (তুমি তাকে রাখবে) যখন এ কথা বলা হয়েছে? তাকে ত্যাগ করো।"
6598 - عن النعمان بن بشير قال: سألت أمي أبي بعض الموهبة لي من ماله، ثمّ بدا له فوهبها لي، فقالت: لا أرضى حتَّى تشهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأخذ بيدي وأنا غلام، فأتى بي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إن أمه بنت رواحة سألتني بعض الموهبة لهذا؟ قال:"ألك ولد سواه؟" قال: نعم. قال: فأراه قال:"لا تُشهدوني على جَور".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2650)، ومسلم في الهيات (14: 1623) كلاهما من طريق أبي حيان التيميّ، عن الشعبيّ، عن النعمان بن بشير، فذكره.
নু'মান ইবনে বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার মা আমার পিতার কাছে তাঁর সম্পদ থেকে আমার জন্য কিছু দান (উপহার) চাইলেন। অতঃপর তিনি সম্মত হলেন এবং আমাকে তা দান করলেন। কিন্তু আমার মা বললেন: আমি সন্তুষ্ট নই, যতক্ষণ না আপনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এর সাক্ষী বানান। তখন তিনি আমার হাত ধরলেন, আমি তখন ছোট বালক ছিলাম, এবং তিনি আমাকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন। অতঃপর তিনি (পিতা) বললেন: এর (নু'মানের) মা, যিনি বিনতে রাওয়াহা, তিনি আমার কাছে এর জন্য কিছু দান চেয়েছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "এ ছাড়া কি তোমার অন্য কোনো সন্তান আছে?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" (নু'মান) বলেন, আমার মনে হয় তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমাকে কোনো অন্যায়ের (পক্ষপাতিত্বের) সাক্ষী করো না।"
6599 - عن عروة بن الزُّبير: أن امرأة سرقت في غزوة الفتح، فأتي بها رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمّ أمر فقطعت يدها. قالت عائشة: فحسنت توبتها وتزوّجت، وكانت تأتي بعد ذلك فأرفع حاجتها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2648) ومسلم في الحدود (9: 1688) كلاهما من طريق ابن وهب، عن يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، أخبرني عروة، عن عائشة والسياق للبخاريّ ولفظ مسلم أتم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মক্কা বিজয়ের সময় একজন মহিলা চুরি করেছিল। তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আনা হলো। অতঃপর তিনি নির্দেশ দিলেন এবং তার হাত কেটে দেওয়া হলো। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর তার তাওবা উত্তম হলো এবং সে বিবাহ করলো। এরপরও সে আসত, আর আমি তার প্রয়োজন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পেশ করতাম।
6600 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم رد شهادة الخائن والخائنة، وذي الغِمرة على أخيه، ورد شهادة القانع لأهل البيت، وأجازها لغيرهم.
حسن: رواه أبو داود (3600) وأحمد (6898) والدارقطني (4/ 243) والبيقهي (10/ 200) كلّهم من طريق محمد بن راشد، عن سليمان بن موسى، عن عمرو بن شعيب بإسناده فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب وأبيه فهما حسنا الحديث.
قال أبو داود: الغِمْر: الحنة والشحناء.
والقانع: الأجير التابع مثل الأجير الخاص.
ورواه ابن ماجة (2366) من وجه آخر عن حجَّاج بن ارطاة، عن عمرو بن شعيب بإسناده وزاد فيه:"ولا محدود في الإسلام".
والحجاج بن أرطاة مدلِّس وقد عنعن إِلَّا أنه توبع في أصل الحديث.
ورواه أبو داود (2601) من وجه آخر عن سعيد بن عبد العزيز، عن سليمان بن موسى بإسناده وزاد فيه:"ولا زان ولا زانية".
وأمّا ما رُوي عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تجوز شهادة خائن ولا خائنة، ولا مجلود حدًّا ولا مجلودة، ولا ذي غِمْرٍ لأخيه، ولا مجرّب شهادة، ولا القانع أهل البيت لهم، ولا ظنين في ولاء، ولا قرابة" فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (2298) والدارقطني (4/ 244) والبغوي (2510) والبيهقي (10/ 155، 202) كلّهم من حديث يزيد بن أبي زياد الدمشقيّ، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب، لا نعرفه إِلَّا من حديث يزيد بن زياد الدمشقيّ، ويزيد يُضعف في الحديث، ولا يعرف هذا الحديث من حديث الزهري إِلَّا من حديثه".
وقال البغوي:"هذا حديث غريب، ويزيد بن زياد الدّمشقيّ منكر الحديث".
وقال البيهقيّ:"يزيد بن أبي زياد، ويقال ابن زياد الشّاميّ هذا ضعيف".
وقال البيهقيّ في المعرفة (14/ 344): تفرّد به محمد بن عمرو بن عطاء، عن عطاء".
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিশ্বাসঘাতক পুরুষ ও বিশ্বাসঘাতক নারীর সাক্ষ্য প্রত্যাখ্যান করেছেন, এবং তার (দ্বীনি) ভাইয়ের বিরুদ্ধে শত্রুতা বা বিদ্বেষ পোষণকারীর সাক্ষ্য প্রত্যাখ্যান করেছেন। তিনি গৃহস্থলীর সদস্যদের জন্য (সেবাকারী বা নির্ভরশীল) কানি'-এর সাক্ষ্যও প্রত্যাখ্যান করেছেন, তবে অন্যদের জন্য তার সাক্ষ্য অনুমোদন করেছেন।