হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6568)


6568 - عن أم سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سمع خصومة بباب حجرته، فخرج إليهم فقال: إنّما أنا بشر، وإنه يأتيني الخصم، فلعلَّ بعضكم أن يكون أبلغ من بعض، فأحسب أنه صادق فأقضي له بذلك، فمن قضيت له بحق مسلم، فإنما هي قطعة من النّار، فليأخذها أو ليتركها".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأحكام (7181)، ومسلم في الأقضية (5: 1713) كلاهما من طريق ابن شهاب الزّهريّ، أخبرني عروة بن الزُّبير، أن زينب ابنة أبي سلمة أخبرته، أن أم سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أخبرته، فذكرته.




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কক্ষের দরজার কাছে ঝগড়ার শব্দ শুনলেন। তখন তিনি তাদের দিকে বেরিয়ে আসলেন এবং বললেন: আমি তো একজন মানুষ মাত্র। আমার কাছে বাদী-বিবাদী আসে। হয়তো তোমাদের কেউ কেউ (যুক্তি উপস্থাপনে) অন্যের চেয়ে বেশি বাকপটু হবে, ফলে আমি তাকে সত্যবাদী মনে করে তার পক্ষেই ফয়সালা দিয়ে দেই। অতএব, আমি যাকে কোনো মুসলিমের হক (অধিকার) দিয়ে ফয়সালা করে দেই, তবে তা (আসলে) আগুনের একটি টুকরা মাত্র। সে যেন তা গ্রহণ করে অথবা ছেড়ে দেয়। (মুক্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (6569)


6569 - عن أم سلمة رضي الله عنها قالت: جاء رجلان من الأنصار إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يختصمان في مواريث بينهما قد درست، ليس بينهما بينة، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إنكم تختصمون إليّ، وإنما أنا بشر، ولعل بعضكم أن يكون ألحن بحجته من بعض، وإنما أقضي بينكم على نحو ما أسمع منكم، فمن قضيت له من أخيه شيئًا فلا يأخذه، فإنما أقطع له قطعة من النّار، يأتي به إسطاما في عنقه يوم القيامة، قال: فبكى الرجلان، وقال كل واحد منهما: حقي لأخي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما إذ فعلتما هذا، فأذهبا فاقتسما وتوخيا الحق ثمّ استهما، ثمّ يتحلل كل واحد منكما صاحبه".

حسن: رواه أبو داود (3584، 3585) وأحمد (26717) والدارقطني (4/ 238 - 239) والحاكم (4/ 95) وابن الجارود (1000) والبيهقي (10/ 26) والطحاوي في مشكله (755) كلّهم من حديث أسامة بن زيد، ثنا عبد الله بن رافع مولى أم سلمة، عن أم سلمة فذكرته واللّفظ لأحمد.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: هو حسن من أجل الكلام في أسامة بن زيد الليثي مولاهم، غير أنه حسن الحديث.




উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আনসারদের দুইজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসেছিল। তারা তাদের মধ্যকার উত্তরাধিকার সংক্রান্ত সম্পত্তি নিয়ে বিবাদ করছিল, যা অনেক পুরাতন হয়ে গিয়েছিল এবং তাদের কাছে কোনো প্রমাণ (সাক্ষ্য) ছিল না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা আমার নিকট বিবাদ নিয়ে এসেছো, কিন্তু আমি একজন মানুষ মাত্র। আর হতে পারে তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার যুক্তি প্রমাণে অন্যের চেয়ে বেশি পারদর্শী (বাগ্মী বা চতুর)। আমি কেবল তোমাদের থেকে যা শুনি, সে অনুযায়ী তোমাদের মাঝে বিচার করি। সুতরাং আমি যদি তোমাদের কারো পক্ষে তার ভাইয়ের কোনো কিছু নিয়ে ফয়সালা করে দেই, তবে সে যেন তা গ্রহণ না করে। কারণ আমি তাকে আগুনেরই একটি টুকরা কেটে দিচ্ছি। কিয়ামতের দিন সে তা তার গলায় বেড়ি হিসেবে নিয়ে আসবে।” বর্ণনাকারী বলেন: তখন লোক দু’জন কেঁদে ফেলল এবং তাদের প্রত্যেকে বলল: আমার প্রাপ্য হক আমার ভাইয়ের জন্য (ছেড়ে দিলাম)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা যেহেতু এরূপ করেছো, সুতরাং তোমরা যাও, সম্পত্তি ভাগ করে নাও এবং ন্যায় ও সত্যের সন্ধান করো। এরপর লটারি (শেয়ার ড্র) করো, আর তোমাদের প্রত্যেকে যেন তার সাথীকে (ক্ষমা করে) মুক্ত করে দেয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (6570)


6570 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كانت امرأتان معهما ابناهما، جاء الذئب، فذهب بابن إحداهما، فقالت لصاحبتها: إنّما ذهب بابنك، وقالت الأخرى: إنّما ذهب بابنك، فتحاكما إلى داود عليه السلام، فقضى به للكبرى، فخرجتا على سليمان بن داود عليهما السلام، فأخبرتاه، فقال: ائتوني بالسّكين أشقه بينهما، فقالت الصغرى: لا تفعلْ يرحمك الله هو ابنها، فقضى به للصغرى".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحدود (6769)، ومسلم في الأقضية (1720) كلاهما من حديث أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

قال ابن الجوزي:"استنبط سليمان لما رأى الأمر محتملًا فأجاد، وكلاهما حكما بالاجتهاد، لأنه لو كان داود حكم بالنص لما ساغ لسليمان أن يحكم بخلافه". فتح الباري (6/ 465).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দুইজন মহিলা ছিল, তাদের সাথে তাদের সন্তানদ্বয়ও ছিল। একদিন নেকড়ে এসে তাদের একজনের সন্তানকে নিয়ে চলে গেল। তখন সে (হারিয়ে যাওয়া সন্তানের মা) তার সঙ্গিনীকে বলল: নেকড়ে তোমার সন্তানকেই নিয়ে গেছে। অপরজন বলল: বরং নেকড়ে তোমার সন্তানকে নিয়ে গেছে। এরপর তারা উভয়েই দাঊদ (আঃ)-এর কাছে বিচার চাইল। তিনি বড় মহিলার পক্ষে ফায়সালা দিলেন। অতঃপর তারা (দাঊদ আঃ-এর পুত্র) সুলায়মান ইবনু দাঊদ (আঃ)-এর কাছে গেল এবং তাঁকে এ ঘটনা জানাল। তখন তিনি বললেন: তোমরা আমার কাছে ছুরি নিয়ে এসো, আমি শিশুটিকে দু'জনের মধ্যে ভাগ করে দেবো। ছোট মহিলাটি বলল: আল্লাহ আপনাকে রহম করুন, এমন করবেন না। সে তার (বড় মহিলার) সন্তান। তখন তিনি শিশুটিকে ছোট মহিলার পক্ষে ফায়সালা দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6571)


6571 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّما أنا بشر، ولعل بعضكم أن يكون ألحن بحجته من بعض، فمن قطعت له من حق أخيه قطعة فإنما أقطع له قطعة من النّار".

حسن: رواه ابن ماجة (2318) وأحمد (8394) وصحّحه ابن حبَّان (5071) كلّهم من حديث
محمد بن عمرو، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو الليثي فإنه حسن الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি তো কেবল একজন মানুষ। আর সম্ভবত তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার যুক্তির ক্ষেত্রে অন্যের চেয়ে বেশি বাকপটু। সুতরাং আমি যার পক্ষে তার ভাইয়ের অধিকারের কিছু অংশ ফায়সালা করে দেই, তবে আমি যেন তার জন্য জাহান্নামের একটি টুকরা কেটে দিচ্ছি।”









আল-জামি` আল-কামিল (6572)


6572 - عن أبي ذرّ قال: قلت: يا رسول الله! ألا تستعملني؟ قال: فضرب بيده على منكبي ثمّ قال:"يا أبا ذرّ! إنك ضعيف، وإنها أمانة، وإنها يوم القيامة خزي وندامة إِلَّا من أخذها بحقها، وأدى الذي عليه فيها".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1825) عن عبد الملك بن شعيب بن اللّيث، حَدَّثَنِي أبي، شعيب بن اللّيث، حَدَّثَنِي اللّيث بن سعد، حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، عن بكر بن عمرو، عن الحارث بن يزيد الحضرميّ، عن ابن حُجيرة الأكبر، عن أبي ذرّ فذكره.




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি আমাকে (কোনো প্রশাসনিক পদে) নিয়োগ করবেন না? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন নিজ হাত দিয়ে আমার কাঁধে আঘাত করলেন, অতঃপর বললেন: “হে আবূ যর! নিশ্চয় তুমি দুর্বল, আর নিশ্চয় এটি একটি আমানত (বিশ্বাস), এবং নিশ্চয় এটি কিয়ামতের দিন অপমান ও অনুশোচনার কারণ হবে, তবে সে ছাড়া, যে তা ন্যায্যভাবে গ্রহণ করেছে এবং এতে তার উপর যা কর্তব্য ছিল তা পালন করেছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6573)


6573 - عن أبي ذرّ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يا أبا ذرّ! إني أراك ضعيفا، وإني أحب لك ما أحب لنفسيّ، لا تأمرنّ على اثنين، ولا تُولينّ مال يتيم".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1826) من طرق عن عبد الله بن يزيد المقرئ، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي أيوب، عن عبيد الله بن أبي جعفر القرشيّ، عن سالم بن أبي سالم الجيشانيّ، عن أبيه، عن أبي ذرّ فذكره.

قال النوويّ رحمه الله تعالى:"هذا الحديث أصل عظيم في اجتناب الولايات، لا سيما لمن كان فيه ضعف عن القيام بوظائف تلك الولاية. وأمّا الخزي والندامة فهو في حق من لم يكن أهلًا لها، أو كان أهلًا ولم يعدل فيها، فيخزيه الله تعالى يوم القيامة ويفضحه، ويندم على ما فرّط. وأمّا من كان أهلا للولاية، وعدلَ فيها فله فضل عظيم، تظاهرت به الأحاديث الصحيحة". انتهى.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আবূ যার! আমি তোমাকে দুর্বল মনে করি (বা দেখছি)। আর আমি তোমার জন্য তাই পছন্দ করি যা আমি আমার নিজের জন্য পছন্দ করি। তুমি অবশ্যই দু’জনের উপরও নেতৃত্ব দেবে না এবং তুমি কোনো ইয়াতীমের সম্পদের দায়িত্ব গ্রহণ করবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6574)


6574 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الناس كالإبل المائة لا يجد الرّجل فيها راحلة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6498) ومسلم في فضائل الصّحابة (2547) كلاهما من حديث الزّهريّ، عن سالم بن عبد الله، عن ابن عمر فذكره.

قال البيهقيّ (10/ 135):"هذا الحديث قد يتأول على أن الناس في أحكام الدين سواء، لا فضل فيها الشريف على مشروف، ولا لرفيع منهم على وضيع، كالإبل المائة، لا تكون فيها راحلة، وهي الذلول التي ترحل وتركب، وجاءت فاعلة بمعني مفعولة".

وقيل: معناه أن الناس كثير، والمرضي منهم قليل قاله ابن بطال أي الذين يتحملون عن الناس، ويكشفون كربهم وهم قليلون.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "মানুষ একশটি উটের মতো; যার মধ্যে একজন লোকও একটি বাহন (রাহিলা) খুঁজে পায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (6575)


6575 - عن عبد الرحمن بن أبي بكرة قال: كتب أبو بكرة إلى ابنه - وكان بسجستان - بأن لا تقضي بين اثنين وأنت غضبان، فإني سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يقضين حكم بين اثنين وهو غضبان".

متفق علية: رواه البخاريّ في الأحكام (7158)، ومسلم في الأقضية (16: 1717) من طريق عبد الملك بن عمير، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، فذكره.




আবু বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রকে—যখন সে সিজিস্তানে ছিল—এই মর্মে পত্র লিখেছিলেন যে, তুমি ক্রুদ্ধ অবস্থায় দুইজনের মাঝে বিচার করবে না। কারণ আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: “ক্রুদ্ধ অবস্থায় কোনো বিচারক যেন দুই ব্যক্তির মাঝে বিচার না করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6576)


6576 - عن أم سلمة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا ابتلي أحدكم بالقضاء بين المسلمين فلا يقضين وهو غضبان، فليسوّ بينهم بالنظر والمجلس والإشارة، ولا يرفع صوته على أحد الخصمين".

حسن: رواه الدَّارقطنيّ (4/ 205) والبيهقي (10/ 135) وأبو يعلي (5867) والطَّبرانيّ في الكبير (23/ 284) كلّهم من طرق عن عباد بن كثير، عن أبي عبد الله، عن عطاء بن يسار، عن أم سلمة فذكرته. وبعضهم اختصره.

قلت: قال البيهقيّ:"هذا إسناد فيه ضعف"، وهو يقصد به عباد بن كثير الثقفي البصري فإنه ضعيف عند أهل العلم إِلَّا أنه توبع.

رواه إسحاق بن راهويه (1846) عن بقية بن الوليد، حَدَّثَنِي أبو محمد، عن أبي بكر مولى بني تميم، عن عطاء بن يسار بإسناده فذكره نحوه.

وأبو محمد لا يُعرف من هو؟ وبقية بن الوليد إذا كنّى فالغالب أنه ضعيف، والإسنادان يقوي أحدهما الآخر.




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: “তোমাদের কারো উপর যখন মুসলমানদের মধ্যে বিচার করার দায়িত্ব অর্পিত হয়, তখন সে যেন রাগান্বিত অবস্থায় বিচার না করে। সে যেন দৃষ্টিপাত, বসার স্থান ও ইশারা-ইংগিতে তাদের (বিবাদমান পক্ষগুলোর) মধ্যে সমতা বজায় রাখে এবং সে যেন দুই বিবাদমান পক্ষের কারো উপরই নিজের আওয়াজ উঁচু না করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (6577)


6577 - عن عليّ بن أبي طالب قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن قاضيًا. فقلت: يا رسول الله! ترسلني، وأنا حديث السن، ولا علم لي بالقضاء فقال:"إنَّ الله عز وجل سيهدي قلبك، ويثبّت لسانك، فإذا جلس بين يديك الخصمان فلا تقضين حتَّى تسمع من الآخر كما سمعت من الأوّل. فأنه أحرى أن يتبين لك القضاء" قال: فما زلت قاضيًا، أو ما شككت في قضاء بعد.

حسن: رواه أبو داود (3582) واللّفظ له، والتِّرمذيّ (1331) والبيهقي (10/ 137) كلهم من طرق عن حنش، عن عليّ فذكره. وحنش هو ابن المعمّر مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وللحديث طريق آخر وهو ما رواه أحمد (666) والبزّار (721) كلاهما من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرّب، عن عليّ فذكره مختصرًا.

قال البزّار:"وهذا الحديث لا نعلم رواه عن حارثة بن مضرب إِلَّا أبو إسحاق، ولا عن أبي إسحاق إِلَّا إسرائيل. ورواه عن عليّ غير واحد، وأحسن إسنادًا يروى عن عليّ هذا الإسناد".

وأمّا ما رواه ابن ماجة (2310) وأحمد (636) والحاكم (3/ 135) كلّهم من طريق الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري قال: قال عليّ فذكره.

فأبو البختري لم يسمع من عليّ شيئًا. ومع ذلك قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".

شرح الحديث: قال الخطّابي:"وفيه دليل على أن الحاكم لا يقضى على غائب، وذلك لأنه إذا منعه أن يقضي لأحد الخصمين وهما حاضران حتَّى يسمع كلام الآخر، فقد دلّ على أنه في الغائب الذي لم يحضره، ولم يسمع قوله أولى بالمنع، وذلك لإمكان أن يكون معه حجّة تبطل دعوى الحاضر، وهذا قول أبي حنيفة، وقال مالك، والشافعي:"يجوز القضاء على الغائب إذا تبين للحاكم أن فراره واستخفاءه إنّما هو فرار من الحق ومعاندة للخصم". انتهى.

وقالوا: إن حديث عليّ يحمل على الخصمين الحاضرين الذين يمكن سماع كلامهما، فلا يقضي لأحدهما حتَّى يسمع كلام الآخر، فإذا كان الخصم غائبًا، فلا يترك استماع كلام الحاضر حتَّى لا يكون ذريعة لإبطال الحقوق.

واستدل البيهقيّ على قضاء الغائب بحديث هند زوجة أبي سفيان، قال فيه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"خذي ما يكفيك وبنيك" بأنه صلى الله عليه وسلم قضى على أبي سفيان في غيابه، ولكن اعتذر ابن التركماني وغيره بأنه من الفتيا، لم يكن من القضاء، لأن مذهب أبي حنيفة وأصحابه لا يجوز القضاء على الغائب.

ذكره الطحاويّ في اختلاف العلماء (المختصر) (3/ 386) وفيه كلام آخر راجع"المنة الكبرى" (9/ 45).



كما أنه أرسل عن جده عبد الله بن الزُّبير.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ইয়েমেনে বিচারক (কাযী) হিসেবে প্রেরণ করলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমাকে পাঠাচ্ছেন, অথচ আমি বয়সে তরুণ এবং বিচারকার্য (কাযা) সম্পর্কে আমার কোনো জ্ঞান নেই। তখন তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা তোমার হৃদয়কে সঠিক পথে পরিচালিত করবেন এবং তোমার জিহ্বাকে মজবুত করবেন। যখন দু'জন বিবাদমান পক্ষ তোমার সামনে বসবে, তখন তুমি প্রথমজনের কথা শোনার পর যতক্ষণ পর্যন্ত অন্যজনের কথা না শুনবে, ততক্ষণ কোনো ফয়সালা দেবে না। কারণ, এতেই তোমার কাছে সঠিক বিচার স্পষ্ট হয়ে ওঠার সম্ভাবনা বেশি।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এরপর থেকে আমি বিচারকাজে কখনো সন্দেহ পোষণ করিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (6578)


6578 - عن أبي هريرة وزيد بن خالد الجهنيّ، أنهما أخبراه أن رجلين اختصما إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال أحدهما: يا رسول الله اقض بيننا بكتاب الله. وقال الآخر، وهو أفقههما: أجل يا رسول الله! فاقض بيننا بكتاب الله. وائذن لي أن أتكلم قال:"تكلم" فقال: إن ابني كان عسيفا على هذا فزني بامرأته. فأخبرني أن على ابني الرجم. فافتديت منه بمائة شاة وبجارية لي. ثمّ إني سألت أهل العلم فأخبروني: أن ما على ابني جلدُ مائة، وتغريب عام. وأخبروني أنما الرجم على امرأته. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما والذي نفسي بيده، لأقضين بينكما بكتاب الله. أما غنمك وجاريتك فرد عليك" وجلد ابنه مائة. وغرَّبه عامًا. وأمر أنيسًا الأسلمي أن يأتي امرأة الآخر. فإن اعترفت، رجمها، فاعترفت فرجمها.

متفق عليه: رواه مالك في الحدود (6) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن أبي هريرة وزيد بن خالد الجهنيّ، فذكراه.

ورواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6633، 6634) من طريق مالك، به.

ورواه مسلم في الحدود (1697، 1698) من وجه آخر عن ابن شهاب.

وأمّا ما رُوي عن أناس من أهل حمص من أصحاب معاذ بن جبل أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما أراد أن يبعث معاذًا إلى اليمن قال:"كيف تقضي إذا عرض لك فضاء؟" قال: أقضي بكتاب الله، قال:"فإن لم تجد في كتاب الله؟" قال: فبسنة رسول الله، قال:"فإن لم تجد في سنة رسول الله؟ ولا في كتاب الله؟ قال: أجتهد رأيي ولا آلو. فضرب رسول الله صلى الله عليه وسلم صدره وقال:"الحمد لله الذي وفق رسولَ رسولِ الله لما يرضي رسول الله" فهو معلول.

رواه أبو داود (3592) والتِّرمذيّ (1327) من وجهين عن شعبة، عن أبي عون، عن الحارث بن عمرو ابن أخي المغيرة بن شعبة، عن أناس من أهل حمص فذكره. وفيه إرسال، والحارث بن عمرو لا يعرف.

روي موصولًا بذكر معاذ رواه أبو داود (3593) والتِّرمذيّ (1328) وأحمد (22007) والبيهقي (10/ 114) من طريق أبي داود.
ونقل العقيلي في الضعفاء الكبير (1/ 215) عن البخاريّ قال:"ولا يصح، ولا يعرف إِلَّا مرسلًا".

قلت: وإن فيه أصحاب معاذ لا يعرفون.

قال الترمذيّ:"هذا حديث لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه، وليس إسناده عندي بمتصل".

وقال ابن حزم:"هذا حديث ساقط". وضعّفه أيضًا الدارقطنيّ، وعبد الحق الإشبيليّ، والذّهبيّ وغيرهم من جهابذة هذا الفن.

وقال ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (2/ 273): هذا حديث لا يصح، وإن كان الفقهاء كلّهم يذكرونه في كتبهم، ويعتمدون عليه، ولعمري إن كان معناه صحيحًا، إنّما ثبوته لا يُعرف، لأن الحارث بن عمرو مجهول، وأصحاب معاذ من أهل حمص لا يعرفون، وما هذا طريقه فلا وجه لثبوته". انتهى كلامه.

قلت: وهو كما قالوا، وقد ثبت معنى هذا الحديث أيضًا عن عمر بن الخطّاب وغيره من الصّحابة ففي مصنف ابن أبي شيبة (23444) والنسائي (5399) كلاهما من حديث شريح أن عمر بن الخطّاب كتب إليه:"إذا جاءك شيء في كتاب الله فاقض به، ولا يلفتنَّك عنه الرجال، فإن جاءك أمر ليس في كتاب الله فانظر سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم فاقض بها، فإن جاءك ما ليس في كتاب الله وليس فيه سنة من رسول الله صلى الله عليه وسلم فانظر ما اجتمع الناس عليه فخذ به، فإن جاءك ما ليس في كتاب الله، ولم يكن فيه سنة من رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولم يتكلم فيه أحد قبلك، فاختر أي الأمرين شئت: إن شئت أن تجتهد برأيك وتقدم فتقدم، وإن شئت أن تتأخر فتأخر، ولا أرى التأخر إِلَّا خيرًا لك. انتهى، واللّفظ لابن شيبة.

ولفظ النسائي: عن شريح أنه كتب إلى عمر يسأله فكتب إليه: أن اقض بما في كتاب الله، فإن لم يكن في كتاب الله فبسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإن لم يكن في كتاب الله ولا في سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم فاقض بما قضى به الصالحون، فإن لم يكن في كتاب الله ولا في سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يقض به الصالحون فإن شئت فتقدم وإن شئت فتأخر ولا أرى التأخر إِلَّا خيرًا لك. والسّلام عليكم. وإسناده صحيح. وفي سير الصّحابة آثار أخرى مثله.

وقوله:"أجتهد رأيي ولا آلو": أي أجتهد للبلوغ إلى الحق، ولا أقصر فيه إذا لم أجد نصًا من الكتاب والسنة، وقد جوَّز النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم للحاكم أن يجتهد، وجعل له على إصابته أجرين، وعلى خطته أجرًا واحدًا. وبالله التوفيق.




আবূ হুরায়রা ও যায়দ ইবনু খালিদ জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, দুজন লোক রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট বিচার প্রার্থী হলো। তাদের একজন বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করুন। আর অপরজন, যিনি তাদের দু'জনের মধ্যে অপেক্ষাকৃত অধিক জ্ঞানী ছিলেন, তিনি বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! হ্যাঁ, আপনি আমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করুন। আর আমাকে কথা বলার অনুমতি দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি বলো।" সে (দ্বিতীয় ব্যক্তি) বলল: আমার পুত্র তার (প্রথম ব্যক্তির) কাছে শ্রমিক হিসেবে ছিল। সে তার স্ত্রীর সাথে যিনা (ব্যভিচার) করেছে। তখন আমাকে জানানো হলো যে, আমার পুত্রের উপর রজম (পাথর মেরে মৃত্যুদণ্ড) হবে। তাই আমি তার থেকে মুক্তিপণ হিসেবে একশো বকরী ও আমার এক দাসী দিয়েছি। এরপর আমি আলিমদের (জ্ঞানীদের) নিকট জিজ্ঞাসা করলাম। তারা আমাকে জানালেন যে, আমার পুত্রের শাস্তি হলো একশো দোররা মারা এবং এক বছরের জন্য নির্বাসন। আর তারা আমাকে জানালেন যে, রজম (মৃত্যুদণ্ড) হবে তার (প্রথম ব্যক্তির) স্ত্রীর উপর। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "শোনো! যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! আমি তোমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করবই। তোমার বকরী ও তোমার দাসী তোমাকে ফেরত দেওয়া হবে।" অতঃপর তিনি তার (যুবকের) পুত্রকে একশো দোররা মারলেন এবং এক বছরের জন্য নির্বাসিত করলেন। এরপর তিনি উনায়স আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন যে, সে যেন অন্য লোকটির স্ত্রীর নিকট যায়; যদি সে স্বীকার করে তবে যেন তাকে রজম করে। সুতরাং সে (ঐ মহিলা) স্বীকার করল এবং উনায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে রজম করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6579)


6579 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللَّهُمَّ إني أحرّج حق الضعيفين: اليتيم والمرأة". وفي رواية:"مال الضعيفين".

حسن: رواه ابن ماجة (3678) وصحّحه ابن حبَّان (5565) والحاكم (1/ 63، 4/ 128)
والبيهقي (10/ 134) وأحمد (9666) كلّهم من حديث ابن عجلان، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة فذكره؟

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: إسناده حسن من أجل ابن عجلان فإنه حسن الحديث واستشهد به مسلم.

وقوله:"أحرج حق الضعيفين" أي أحرم مالهما على من ظلمهما.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হে আল্লাহ! আমি দুই দুর্বল শ্রেণির অধিকারের ব্যাপারে কঠোরতা আরোপ করছি (তাদের অধিকার লঙ্ঘন করাকে গুরুতর পাপ গণ্য করছি): তারা হলো ইয়াতিম ও নারী।" অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "দুই দুর্বল শ্রেণির সম্পদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (6580)


6580 - عن شريح بن هانئ، عن أبيه، أنه لما وفد إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وسمعه وهم يكنون هانئا أبا الحكم. فدعاه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال له:"إنَّ الله هو الحكم، وإليه الحكم، فلم تكنى أبا الحكم؟" قال: إن قومي إذا اختلفوا في شيء أتوني فحكمت بينهم، فرضي كلا الطرفين. قال:"ما أحسن من هذا، فما لك من الولد؟". قال: لي شريح، وعبد الله، ومسلم، قال:"فمن أكبرهم؟" قال: شريح، قال:"فأنت أبو شريح" فدعا له ولولده.

صحيح: رواه النسائيّ (5387)، عن قُتَيبة قال: حَدَّثَنَا يزيد وهو ابن المقدام بن شريح، عن أبيه، عن شريح بن هانئ، عن أبيه فذكره.

وإسناده صحيح. قد ثبت التحكيم في شأن الزوجين، وجزاء الصيد، وتحكيم سعد في قضية بني قريظة.

والتحكيم جائز غير لازم، وإنما هو فتوى للطرفين إذا شاؤوا أخذوا به، وإن لم يشاؤوا لجأوا إلى السلطان.




হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুনলেন যে লোকেরা হানীকে 'আবুল হাকাম' নামে ডাকে, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডেকে বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ই হলেন আল-হাকাম (চূড়ান্ত বিচারক) এবং বিচার তাঁরই দিকে প্রত্যাবর্তন করে। তাহলে তুমি কেন আবুল হাকাম উপনাম ধারণ করলে?" তিনি বললেন, "যখন আমার কওমের লোকেরা কোনো বিষয়ে মতবিরোধ করে, তখন তারা আমার কাছে আসে। আমি তাদের মাঝে ফয়সালা করে দেই এবং উভয় পক্ষই সন্তুষ্ট হয়।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এটা কতই না উত্তম! তোমার কি কোনো সন্তান আছে?" তিনি বললেন, "আমার সন্তান হলো শুরাইহ, আবদুল্লাহ এবং মুসলিম।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাদের মধ্যে সবচেয়ে বড় কে?" তিনি বললেন, "শুরাইহ।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তাহলে তুমি হলে আবূ শুরাইহ।" অতঃপর তিনি তার জন্য এবং তার সন্তানদের জন্য দু‘আ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6581)


6581 - عن وائل بن حجر قال: إني لقاعد مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذ جاء رجل يقود آخر بنسعة فقال: يا رسول الله! هذا قتل أخي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أقتلته؟" قال: نعم قتلته. قال:"كيف قتلته؟" قال: كنت أنا وهو نتخبط من شجرة، فسبَّني فأغضبني فضربته بالفأس على قرنه فقتلته. فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: هل لك من شيء تؤديه عن نفسك؟" قال: ما لي إِلَّا كسائي وفاسي: قال:"فترى قومك يشترونك؟" قال: أنا أهون على قومي من ذاك. فرمى إليه بنسعته وقال:"دونك صاحبك" فانطلق به الرّجل. فلمّا ولّى قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن قتله فهو مثله" فرجع فقال: يا رسول الله! إنه بلغني أنك قلت:"إن قتله فهو مثله"، وأخذته بأمرك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما تريد أن يبوء
بإثمك وإثم صاحبك؟". قال: يا نبي الله، بلى. قال:"فإن ذاك كذاك، قال: فرمي بنسعته وخلّى سبيله.

صحيح: رواه مسلم في القسامة (1680) عن عبيد الله بن معاذ العنبريّ، حَدَّثَنَا أبيّ، حَدَّثَنَا أبو يونس، عن سماك بن حرب، عن علقمة بن وائل، حدَّثه أن أباه حدَّثه فذكره.

وقوله:"نسعة": وهي حبل من جلود.

وقوله:"نتخبط": أي نجمع الخبط، وهو ورق الشجر.

وقوله:"إن قتله فهو مثله": أي أنه لا فضل ولا منة لأحدهما على الآخر، لأنه استوفي حقه منه بخلاف ما لو عفا عنه، فإنه كان له الفضل والمنة وجزيل ثواب الآخرة، وجميل الثناء في الدُّنيا.




ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ওয়াইল) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উপবিষ্ট ছিলাম, এমন সময় এক ব্যক্তি তার হাতে চামড়ার রশি বাঁধা অবস্থায় আরেক ব্যক্তিকে টেনে নিয়ে আসলো এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এ ব্যক্তি আমার ভাইকে হত্যা করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি তাকে হত্যা করেছো?" সে বলল: হ্যাঁ, আমি তাকে হত্যা করেছি। তিনি বললেন: "কীভাবে তাকে হত্যা করলে?" সে বলল: আমি ও সে একটি গাছ থেকে পাতা ঝরাচ্ছিলাম (খাবার সংগ্রহের জন্য)। তখন সে আমাকে গালি দিল এবং আমাকে রাগান্বিত করল। ফলে আমি কুড়াল দিয়ে তার কানের ওপর আঘাত করলাম এবং তাকে হত্যা করে ফেললাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার পক্ষ থেকে (রক্তপণ) পরিশোধ করার মতো কিছু কি তোমার আছে?" সে বলল: আমার একটি মাত্র পোশাক আর এই কুড়ালটি ছাড়া আর কিছুই নেই। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার গোত্রের লোকেরা কি তোমাকে (মুক্তিপণ দিয়ে) কিনতে রাজি হবে?" সে বলল: তাদের কাছে আমি এর চেয়েও নগণ্য। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (নিহত ব্যক্তির ভাইয়ের দিকে) রশিটি ছুঁড়ে দিলেন এবং বললেন: "এই নাও তোমার সাথীকে।" লোকটি তাকে নিয়ে চলে গেল। যখন লোকটি চলে গেল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে তাকে হত্যা করে, তবে সেও তার (সমান) মতোই হবে।" লোকটি ফিরে আসলো এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে আপনি বলেছেন: "যদি সে তাকে হত্যা করে, তবে সেও তার (সমান) মতোই হবে," অথচ আমি আপনার নির্দেশেই তাকে ধরে নিয়েছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি চাও না যে সে তোমার এবং তোমার সাথীর গুনাহ নিয়ে ফিরে যাক?" সে বলল: হে আল্লাহর নবী, অবশ্যই চাই। তিনি বললেন: "তবে এটাই তার জন্য উপযুক্ত।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন লোকটি রশিটি ছুঁড়ে ফেলে দিল এবং তাকে মুক্তি দিয়ে দিল।









আল-জামি` আল-কামিল (6582)


6582 - عن ابن عباس قال: كان زوج بريرة عبدًا يقال له: مُغيث، كأني أنظر إليه يطوف خلفها يبكي، ودموعه تسيل على لحيته. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لعباس:"يا عباس! ألا تعجب من حب مغيث لبريرة، ومن بغض بريرة مغيثًا"، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لو راجعتِه" قالت: يا رسول الله! تأمرني؟ قال:"إنَّما أنا أشفع" قالت: لا حاجة لي فيه.

صحيح: رواه البخاريّ في الطلاق (5283) عن محمد، أخبرنا عبد الوهّاب، حَدَّثَنَا خالد، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: বারীরাহর স্বামী ছিলেন একজন গোলাম, যার নাম ছিল মুগীস। আমি যেন এখনো তাকে দেখছি যে, সে তার (বারীরার) পিছনে পিছনে ঘুরছে, আর কাঁদছে। তার অশ্রু তার দাড়ির উপর দিয়ে গড়িয়ে পড়ছিল। তখন নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "হে আব্বাস! তুমি কি মুগীসের বারীরাহর প্রতি ভালোবাসা এবং বারীরাহর মুগীসের প্রতি বিদ্বেষ দেখে আশ্চর্য হচ্ছ না?" এরপর নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (বারীরাহকে) বললেন: "যদি তুমি তাকে (স্বামীরূপে) গ্রহণ করতে!" বারীরাহ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি আমাকে আদেশ করছেন? তিনি বললেন: "আমি তো শুধু সুপারিশ করছি।" বারীরাহ বললেন: তাকে আমার কোনো প্রয়োজন নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (6583)


6583 - عن ابن عمر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من حالت شفاعته دون حد من حدود الله فهو مضاد لله في أمره".

صحيح: رواه أبو داود (3597) وأحمد (5385) والحاكم (3/ 27) كلّهم من طريق زهير بن معاوية، ثنا عمارة بن غزية، عن يحيى بن راشد قال: جلسنا لعبد الله بن عمر، فخرج إلينا فجلس فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث في سياق أطول وجاء فيه:"ومن مات وعليه دين فليس بالدينار ولا بالدرهم ولكنها الحسنات والسيئات. ومن خاصم في باطل وهو يعلمه لم يزل في سخط الله حتَّى ينزع، ومن قال في مؤمن ما ليس فيه أسكنه الله ردغة الخبال حتَّى يخرج مما قال" وإسناده صحيح.

وجاء في سياق هذا الحديث أيضًا:"من أعان على خصومة بظلم - أو يعين على ظلم - لم يزل في سخط الله حتَّى ينتزعه.

رواه ابن ماجة (2320) من طريق حسين المعلم وأبو داود (3598) من طريق المثنى بن يزيد، كلاهما عن مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

والمثنى بن يزيد مجهول، ولكن تابعه حسين المعلم، ومطر الوراق مختلف فيه، وقد تابعه
عطاء بن أبي مسلم الخراسانيّ، عن نافع. رواه الحاكم (4/ 99) وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد".

ورواه ابن الأعرابي في معجمه (640) من وجه آخر عن عطاء الخراسانيّ، عن عمران، عن عبد الله بن عمر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من قال سبحان الله، ولا إله إِلَّا الله، والله أكبر، والحمد لله كتب الله له بكل حرف عشر حسنات، ومن أعان على خصومة باطل لم يزل في سخط الله حتَّى ينزع، ومن حالت شفاعته دون حد من حدود الله فقد ضاد الله في أمره، ومن بهت مؤمنًا أو مؤمنة حبسه الله في ردغة الخبال يوم القيامة حتَّى يخرج مما قال، وليس بخارج".

وهذا السياق ذكره ابن أبي حاتم في العلل (2/ 183) وقال:"رواه عمر بن يونس اليماميّ، عن عاصم بن محمد، عن يزيد، عن المثني بن يزيد، عن مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر، وقال: قال أبي: هذا خطأ، الصَّحيح عن ابن عمر موقوف".

قلت: ورواه ابن أبي شيبة (28661) عن عبدة، عن يحيى بن سعيد، عن عبد الوهّاب (وهو ابن بخت المكي) عن ابن عمر من قوله مقتصرا على قوله"من حالت شفاعته دون حد من حدود الله فهو مضاد لله في أمره".

والذي يظهر من هذه الأسانيد ومتونها أن ابن عمر أو من دونه كان يروي الحديث مرة بكامله، وأخرى مجزأة. ويشير إليه اختلاف مخرج الحديث، فصحَّ بعض طرقه دون البعض، ولا يبعد أن يكون ابن عمر أو من دونه رواه مرة موقوفًا عليه كما أشار إليه أبو حاتم في قوله وابن أبي شيبة في روايته. وبالله التوفيق.

وقوله:"من حالت شفاعته: أي من ثبت في حقه من حقوق الله، وبلغ ذلك إلى السلطان، وأمّا قبل البلوغ إلى السلطان أو ما كان من حق الآدميين فللحاكم أن يشفع، بل يستحب له ذلك ولو ببذل المال، كما كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يفعل.

قيل لعلي: وقد شفع لسارق: أتشفع لسارق؟ فقال: نعم، إن ذلك يفعل ما لم يبلغ به الإمام. فإذا بُلغ به الإمام فلا أعفاه الله إن أعفاه. رواه ابن أبي شيبة (28659).

وعن الزبيد بن الصلت قال: سمعت أبا بكر الصديق يقول: لو أخذت شاربًا لأحببت أن يستره الله، ولو أخذت سارقًا لأحبت أن يستره الله. رواه ابن أبي شيبة




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তির সুপারিশ আল্লাহর নির্ধারিত কোনো দণ্ডের (হদ্দের) পথে বাধা সৃষ্টি করে, সে যেন আল্লাহর আদেশের বিরোধিতা করল।”









আল-জামি` আল-কামিল (6584)


6584 - عن بهز بن حكيم بن معاوية، عن أبيه، عن جده قال: أخذ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ناسًا من قومي في تهمة فحبسهم، فجاء رجلٌ من قومي إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يخطب، فقال: يا محمد! علامَ تحبس جيرتي؟ فصمت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إن ناسا ليقولون إنك تنهى عن الشر، وتستخلي به! فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما يقول؟" قال: فجعلت أُعرِّض بينهما بالكلام
مخافة أن يسمَعها، فيدعوَ على قومي دعوةً لا يفلحون بعدها أبدًا، فلم يزل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم به حتَّى فهِمَها فقال:"قد قالوها أو قائلُها منهم؟ ، والله لو فعلت لكان عليّ وما كان عليهم، خلوا له عن جيرانه".

حسن: رواه أبو داود (3630)، والتِّرمذيّ (1417)، والنسائي (4875)، وأحمد (20019)، والحاكم (1/ 125)، والبيهقي (6/ 53) كلّهم من حديث معمر، عن بهز بن حكيم بن معاوية، عن أبيه، عن جده قال: فذكره. واختصره البعض.

قال الحكم:"وقد تقدّم القول في صحيفة بهز بن حكيم ما أغنى عن إعادته على أن شواهد هذا الحديث في الصحيحين.

قلتُ: إسناده حسن من أجل بهز بن حكيم وأبيه فإنهما حسنا الحديث.




মু'আবিয়া ইবনু হায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার গোত্রের কিছু লোককে সন্দেহের বশে ধরে নিয়ে তাদের আটক করে রাখলেন। তখন আমার গোত্রের এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন, যখন তিনি খুতবা দিচ্ছিলেন। সে বলল: হে মুহাম্মাদ! আপনি আমার প্রতিবেশীদেরকে কেন আটক করে রেখেছেন? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব রইলেন। লোকটি বলল: কিছু লোক তো বলছে যে আপনি মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করেন, অথচ আপনি নিজেই গোপনে তা করেন! তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে কী বলছে?" বর্ণনাকারী বলেন: আমি তখন তাদের উভয়ের মধ্যে কথাটি পৌঁছাতে গিয়ে ইঙ্গিতে বলতে লাগলাম (স্পষ্টভাবে বললাম না), এই ভয়ে যে, তিনি (নবী) যেন তা শুনতে না পান এবং আমার গোত্রের বিরুদ্ধে এমন বদ-দু'আ না করে বসেন যার পরে তারা কখনো সফল হবে না। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে বারবার কথা বলতে থাকলেন যতক্ষণ না তিনি বিষয়টি বুঝতে পারলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "তারা কি এই কথা বলেছে, নাকি তাদের কেউ এই কথা বলেছে? আল্লাহর শপথ! যদি আমি তা করতাম, তবে তার ভার আমার উপরই আসত, তাদের উপর নয়। তার প্রতিবেশীদের ছেড়ে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (6585)


6585 - عن * *




* হতে...









আল-জামি` আল-কামিল (6586)


6586 - عن عمر بن الخطّاب قال: إن أناسًا كانوا يؤخذون بالوحي في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وإن الوحي قد انقطع، وإنما نأخذ الآن بما ظهر لنا من أعمالكم، فمن أظهر لنا خيرًا آمنَّاه وقرَّبناه، وليس لنا من سريرته شيء، الله يحاسبه في سريرته، ومن أظهر لنا سوءا لم نأمنه ولم نصدقه، وإن قال: إن سريرته حسنة.

صحيح: رواه البخاريّ في الشهادات (2641) عن الحكم بن نافع، أخبرنا شعيب، عن الزّهريّ، قال: حَدَّثَنِي حميد بن عبد الرحمن بن عوف، أن عبد الله بن عتبة، قال: سمعت عمر بن الخطّاب، قال: فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে কিছু লোক ওহীর মাধ্যমে (তাদের দোষ-ত্রুটির জন্য) পাকড়াও হতেন। আর ওহী এখন বন্ধ হয়ে গেছে। এখন আমরা কেবল তোমাদের প্রকাশ্য আমল দ্বারা তোমাদের বিচার করব। অতএব, যে আমাদের কাছে ভালো কিছু প্রকাশ করবে, আমরা তাকে নিরাপদ মনে করব এবং তাকে আমাদের কাছে স্থান দেব। তার ভেতরের (গোপন) বিষয়ে আমাদের কিছুই করার নেই; আল্লাহই তার গোপন বিষয়ের হিসাব নেবেন। আর যে আমাদের কাছে মন্দ কিছু প্রকাশ করবে, আমরা তাকে নিরাপদ মনে করব না এবং বিশ্বাসও করব না, যদিও সে দাবি করে যে তার ভেতরের অবস্থা ভালো।









আল-জামি` আল-কামিল (6587)


6587 - عن أنس قال: مرَّ على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بجنازة فأثنوا عليها خيرًا، فقال:"وجبتْ" ثمّ مُرَّ بأخرى فأثنوا عليها شرًّا أو قال غير ذلك فقال:"وجبتْ" فقيل: يا رسول الله! قلت لهذا وجبتْ ولهذا وجبتْ؟ ! قال:"شهادة القوم، المؤمنون شهداء الله في الأرض".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2642)، ومسلم في الجنائز (60: 949) كلاهما من طريق حمّاد بن زيد وزاد مسلم غيره عن ثابت، عن أنس، فذكره، والسياق للبخاريّ ولم يذكر مسلم لفظه وإنما أحال على رواية ابن علية، عن عبد العزيز بن صُهَيب، عن أنس، فذكره بنحوه وبسياق أطول، وفيه أن الذي سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم هو عمر بن الخطّاب رضي الله عنه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে একটি জানাযা নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল। লোকেরা তার প্রশংসা করল (ভালো বলল)। তখন তিনি বললেন: "ওয়াজিব হয়ে গেল (অবধারিত হলো)।" এরপর অন্য একটি জানাযা নিয়ে যাওয়া হলো। লোকেরা তার নিন্দা করল (মন্দ বলল) অথবা তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: 'অন্যরকম কিছু বলল'। তখন তিনি বললেন: "ওয়াজিব হয়ে গেল (অবধারিত হলো)।" তখন জিজ্ঞাসা করা হলো: "ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি এর (প্রথমজনের) ক্ষেত্রেও বললেন, 'ওয়াজিব হলো' এবং এর (দ্বিতীয়জনের) ক্ষেত্রেও বললেন, 'ওয়াজিব হলো'?" তিনি বললেন: "এ হলো লোকদের সাক্ষ্য। মু'মিনগণ পৃথিবীতে আল্লাহর সাক্ষী।"