হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (661)


661 - عن مسروق قال: ذكرُوا ابنَ مسعود عند عبد اللَّه بن عمرو فقال: ذاك رجلٌ لا أزال أحبُّه بعدما سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"استقرؤوا القرآن من أربعة: من ابن مسعود، وسالم مولي حذيفة، وأُبي بن كعب، ومعاذ بن جبل".

متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4999)، ومسلم في فضائل الصحابة (2464) كلاهما من حديث شعبة، عن عمرو بن مرّة، عن إبراهيم، عن مسروق، فذكره، واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন (আমার সামনে) ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা করা হয়, তখন আমি তাকে সর্বদা ভালোবাসব, কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমরা চার ব্যক্তির নিকট থেকে কুরআন শিক্ষা করো: ইবনে মাসঊদ, হুযাইফার আযাদকৃত গোলাম সালেম, উবাই ইবনে কা'ব এবং মু'আয ইবনে জাবাল।"









আল-জামি` আল-কামিল (662)


662 - عن قتادة، قال: سألت أنس بن مالك: من جمع القرآن على عهد النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: أربعة كلّهم من الأنصار: أُبي بن كعب، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، وأبو زيد".

متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5003) عن حفص بن عمر، حدّثنا همام: حدّثنا قتادة، قال: سألتُ أنسًا، فذكره.

ورواه البخاريّ (3810)، ومسلم في فضائل الصحابة (2465) كلاهما من حديث شعبة، عن قتادة، قال: سمعت أنسًا يقول (فذكره).

قال قتادة:"قلت لأنس بن مالك: من أبو زيد؟ قال: أحد عمومتي".

وهؤلاء أربعة من الأنصار، وسبق قبله اثنان من المهاجرين واثنان من الأنصار، وفيه دليل على أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال ذلك في أوقات مختلفة، فلا تعارض بين هذه الأحاديث.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (কাতাদা বলেন): আমি আনাস ইবনে মালিককে জিজ্ঞেস করেছিলাম, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে কারা কুরআন সংকলন করেছিলেন? তিনি বললেন: চারজন, তাদের সকলেই ছিলেন আনসারী: উবাই ইবনে কা'ব, মু'আয ইবনে জাবাল, যায়দ ইবনে সাবেত এবং আবূ যায়দ।

কাতাদা বলেন: আমি আনাস ইবনে মালিককে জিজ্ঞেস করলাম, আবূ যায়দ কে? তিনি বললেন: তিনি আমার চাচা/জ্ঞাতিদের মধ্যে একজন।









আল-জামি` আল-কামিল (663)


663 - عن أنس بن مالك قال:"مات النبيُّ صلى الله عليه وسلم ولم يجمع القرآن غير أربعة: أبو الدرداء، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، وأبو زيد. قال: ونحن ورثناه".

صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5004) عن معلى بن أسد: حدّثنا عبد اللَّه بن المثنى، قال: حدّثني ثابت البنانيّ وثمامة، عن أنس بن مالك، فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যখন ওফাত হলো, তখন চারজন ব্যতীত কেউ সম্পূর্ণ কুরআন একত্রে (বুকস্থ বা লিখিতভাবে) জমা করেননি: আবুদ দারদা, মু'আয ইবনে জাবাল, যায়েদ ইবনে ছাবিত এবং আবূ যায়েদ। আবূ যায়েদ বললেন: আমরা তার (কুরআনের) উত্তরাধিকারী হয়েছি।









আল-জামি` আল-কামিল (664)


664 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قام أحدكم من اللّيل، فاستعجم القرآن على لسانه فلم يدر ما يقول فليضطجع".

صحيح: رواه مسلم في المسافرين (787) عن محمد بن رافع، حدّثنا عبد الرزاق، حدّثنا معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ রাতে (সালাতের জন্য) দাঁড়ায়, আর তার জিহ্বায় কুরআন পাঠ অস্পষ্ট হয়ে যায় এবং সে বুঝতে পারে না যে সে কী বলছে, তখন সে যেন শুয়ে পড়ে।"









আল-জামি` আল-কামিল (665)


665 - عن ابن عمر، قال:"نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يسافر بالقرآن إلى أرض العدو".
قال مالك: وإنّما ذلك مخافة أن يناله العدو.

متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (6) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.

ورواه البخاريّ في الجهاد والسير (2990)، ومسلم في الإمارة (1896) كلاهما من حديث مالك بإسناده، مثله.

وقول مالك:"وإنّما ذلك مخافة أن يناله العدو". هذا التعليل جعله أكثر الرّواة عن مالك عنه، ولم يرفعوه، وتفرّد ابن وهب برفعه كما قال الحافظ ابن حجر، وقد صحَّ رفعه من غير مالك.

رفعه اللّيث بن سعد، عن نافع، ولفظه:"كان النبيّ صلى الله عليه وسلم ينهى أن يسافر بالقرآن إلى أرض العدو مخافة أن يناله العدو". رواه مسلم عن قتيبة، حدّثنا اللّيث.

ورفعه أيوب عن نافع، ولفظه:"لا تسافروا بالقرآن، فإني لا آمن أن يناله العدو". رواه مسلم من طرق عن حماد، عن أيوب.

ولعلّ مالكًا شكّ في رفعه فجعله من نفسه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কুরআন নিয়ে শত্রুদের ভূমিতে সফর করতে নিষেধ করেছেন। ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এ নিষেধাজ্ঞা কেবল এই আশঙ্কায় যে, শত্রুরা তা হস্তগত করে ফেলতে পারে।









আল-জামি` আল-কামিল (666)


666 - عن * *
أصحاب بدر".

رواه تمّام في"فوائده" (1431) عن أبي الحسن خيثمة بن سليمان: نا أبو عبد اللَّه محمد بن عيسى بن حيان بالمدائن: نا محمد بن الفضل بن عطية، عن زيد العمّي، عن معاوية بن قرّة، عن أنس بن مالك، فذكره.

وفيه محمد بن الفضل بن عطية العبديّ مولاهم الكوفيّ، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، بل أكثر أهل العلم كذّبوه.

وشيخه زيد العمي هو: ابن الحواري البصريّ، اسم أبيه: مرّة، وهو ضعيف أيضًا.

ورُوي عنه أيضًا مرفوعًا:"بعث اللَّه ثمانية آلاف نبي: أربعة آلاف إلى بني إسرائيل، وأربعة آلاف إلى سائر النّاس".

رواه أبو يعلى (1377) عن أحمد بن إسحاق أبي عبد اللَّه الجوهريّ البصريّ، حدّثنا مكّي بن إبراهيم: حدّثنا موسى بن عبيدة الرّبذيّ، عن يزيد الرَّقاشيّ، عن أنس بن مالك، فذكره.

ومن طريقه أورده الحافظ ابنُ كثير في"تفسيره" وقال:"وهذا أيضًا إسناد ضعيف، فيه الرّبذيّ ضعيف، وشيخه الرّقاشي أضعف منه أيضًا" انتهى.

والهيثمي أورده في"المجمع" (8/ 210) وأعلّه بموسى بن عبيدة الرّبذيّ فقط، وهو تقصير منه، فإنّ شيخه أضعف منه كما قال الحافظ ابن كثير.

وذكر عنه حديثًا آخر، وعزاه إلى الطبرانيّ في"الأوسط"، وفيه إبراهيم بن مهاجر بن مسمار وهو ضعيف.

ورُوي عنه أيضًا مرفوعًا:"كان فيمن خلا من إخواني من الأنبياء ثمانية آلاف نبي، ثم كان عيسى ابن مريم، ثم كنتُ أنا".

رواه أبو يعلى (1337) عن أبي الرّبيع الزّهرانيّ، حدّثنا محمد بن ثابت العبديّ، حدّثنا معبد بن خالد الأنصاريّ، عن يزيد الرّقاشيّ، عن أنس بن مالك، فذكره.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (8/ 211) وأعلّه بمحمد بن ثابت العبديّ وقال:"وهو ضعيف".

وفيه معبد بن خالد الأنصاريّ مجهول، ويزيد الرّقاشي أضعف من الجميع.

وذكره الحافظ ابن كثير عنه من وجه آخر ولفظه:"بُعْثْتُ على إثر من ثمانية آلاف نبي من بني إسرائيل". وقال:"وهذا غريب من هذا الوجه، وإسناده لا بأس به، ورجاله كلّهم معروفون إلّا أحمد بن طارق هذا، فإني لا أعرفه بعدالة ولا جرح". انتهى.

وفي الباب أيضًا عن أبي ذرّ في حديث طويل، وفيه أنّه سأل النّبيّ صلى الله عليه وسلم عن أشياء منها قوله:"قلت: يا رسول اللَّه، كم الأنبياء؟ قال:"مائة ألف وعشرون ألفًا". قلت: يا رسول اللَّه: كم الرّسل من ذلك؟ قال:"ثلاثمائة وثلاثة عشر جمًّا غفيرًا".
وإليكم الحديث بطوله، ولبعض فِقْراته شواهد صحيحة.

عن أبي ذر، قال:"دخلتُ المسجدَ، فإذا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جالس وحده. قال:"يا أبا ذرّ إنّ للمسجد تحيَّةً، وإنّ تحيتَه ركعتان فقُمْ فاركعْهُمَا". قال: فقُمتُ فركعتهما، ثم عُدْتُ فجلستُ إليه، فقلت: يا رسول اللَّه إنّك أمرتني بالصّلاة فما الصّلاة؟ قال:"خير موضوع، استَكْثِرْ أو اسْتَقِلَّ". قال: قلت: يا رسول اللَّه، أيُّ العمل أفضل؟ قال:"إيمان باللَّه، وجهاد في سبيل اللَّه". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ المؤمنين أكمل إيمانًا؟ قال:"أحسنهم خُلْقًا". فقلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ المؤمنين أَسْلم؟ قال:"مَنْ سَلِم النَّاسُ من لسانه ويده". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ الصّلاة أفضل؟ قال:"طُول القنوت". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ الهجرة أفضل؟ قال:"مَنْ هجر السِّيئات". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فما الصّيام؟ قال:"فَرْضٌ مُجْزِئٌ، وعند اللَّه أضعافٌ كثيرةٌ". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ الجهاد أفضل؟ قال:"مَنْ عُقِرَ جَوادُه، وأُهْريقَ دَمُه". قال: قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ الصدقة أفضل؟ قال:"جَهْدُ المُقِل يُسَرُّ إلى فَقِيرٍ". قلت: يا رسول اللَّه، فأيُّ ما أَنْزلَ اللَّهُ عليك أَعْظَمُ؟ قال:"آيةُ الكُرْسِي". ثم قال: يا أبا ذر، ما السّماواتُ السّبعُ مع الكرسي إلّا كَحَلْقَةِ مُلْقَاةٍ بأرض فَلاة، وفَضْلُ العرش على الكرسي كفضل الفَلاة على الحَلْقة". قال: قلت: يا رسول اللَّه، كم الأنبياء؟ قال:"مائةُ ألْفٍ وعشرون ألفًا". قلت: يا رسول اللَّه كم الرّسل من ذلك؟ قال:"ثلاثُمائة وثلاثةَ عَشَرَ جَمًّا غَفِيرًا". قال: قلت: يا رسول اللَّه، من كان أوّلُهم؟ قال:"آدم". قلت: يا رسول اللَّه، أَنَبيٌّ مُرسل؟ قال:"نعم، خلقه اللَّه بيده ونفخ فيه من روحه وكلَّمَه قِبَلًا". ثم قال: يا أبا ذر، أربعةٌ سُرْيانِيون: آدمُ، وشِيثُ، وأُخْنُوخُ -وهو إدريس، وهو أول من خط بالقلم- ونُوحٌ. وأربعةٌ من العرب: هودٌ، وشُعيبٌ، وصَالِحٌ، ونَبيُّك محمّد صلى الله عليه وسلم". قلت: يا رسول اللَّه كم كتابًا أنزله اللَّه؟ قال:"مائةُ كتابٍ وأربعةُ كُتُب، أُنزلَ على شِيث خمسون صَحيفةً، وأُنْزِلَ على أُخْنوخَ ثلاثون صَحيفةً، وأُنزلَ على إبراهيم عَشْرُ صَحائف، وأُنزل على موسى قَبْل التّوراة عَشْرُ صحائفَ، وأُنْزل التَّوراة والإنجيلُ، والزّبور، والقرآن". قال: قلت: يا رسول اللَّه، ما كانتْ صحيفةُ إبراهيم؟ قال:"كانت أمثالًا كلُّها: أَيُّها الملك المسَلَّطُ المبتلى المغرورُ، إنّي لم أَبْعَثْك لتجمع الدّنيا بعضها على بعض، ولكني بعَثْتُك لترد عنْي دعوةَ المظلوم، فإني لا أَرُدُّها ولو كانت من كافر، وعلى العَاقِل ما لم يكن مغلوبًا على عقله أن تكونَ له ساعاتٌ: ساعةٌ يناجي فيها ربَّه، وساعة يحاسب فيها نفسَه، وساعةٌ يَتَفَكَّرُ فيها في صُنع اللَّه، وساعةٌ يخلو فيها لحاجته من المطعم والمشرب. وعلى العاقل أن لا يكونَ ظَاعِنًا إلّا لثلاثٍ: تَزَوُّد لِمَعَادٍ، أو مَرَمَّةٍ لِمَعاش، أو لَذَّةٍ في غير مُحَرَّم. وعلى العاقل أن يكون بصيرًا بزمانه، مُقبلًا على شَأنِه، حافظا للسانه، ومَنْ حَسَبَ كَلامَهُ مِنْ عَمَلِه قَلَّ كَلامُه إلَّا فيما يَعْنِيه".

قلتُ: يا رسول اللَّه، فما كانت صُحُف موسى؟ قال:"كانتْ عِبَرًا كُلُّها: عَجِبْتُ لمن أيقن بالموت ثم هو يفرح، وعجبت لمن أيقن بالنار ثم هو يضحك، وعجبت لمن أيقن بالقدر ثم هو
يَنْصِبُ، عجبت لمن رأى الدّنيا وتقلبها بأهلها ثم اطمأن إليها، وعجبت لمن أيقن بالحساب غدًا ثم لا يعمل". قلت: يا رسول اللَّه، أَوْصِني. قال:"أوصيك بتقوى اللَّه؛ فإنّه رأس الأمر كلِّه". قلت: يا رسول اللَّه، زِدْني. قال:"عليك بتلاوة القرآن، وذكر اللَّه فإنّه نُورٌ لك في الأرض، وذُخْرٌ لك في السّماء". قلت: يا رسول اللَّه، زِدْني. قال:"إيَّاك وكثرَة الضَّحِك، فإنه يُميتُ القلب، ويَذْهبُ بنور الوجه". قلت: يا رسول اللَّه زِدْني. قال:"عليك بالصَّمت إلّا من خير؛ فإنّه مطردةٌ للشّيطان عنك، وعونٌ لك على أمر دينك". قلت: يا رسول اللَّه زدْني. قال:"عليك بالجهاد فإنّه رَهْبانيةُ أُمَّتِي". قلت: يا رسول اللَّه، زدني. قال:"أَحِبَّ المساكين وجَالِسْهم". قلت: يا رسول اللَّه زدني. قال:"انظر إلى من تحتك ولا تنظر إلى من فوقك؛ فإنّه أجدر أن لا تُزْدَرَى نِعْمهُ اللَّه عندك". قلت: يا رسول اللَّه، زِدْني. قال:"قلِ الحقَّ وإِنْ كان مُرًّا". قلت: يا رسول اللَّه، زدني. قال:"لِيرُدَّكَ عن النّاس ما تَعرفُ مِنْ نفسك، ولا تجد عليهم فيما تأتي، وكفى بك عَيْبًا أن تعرف من الناس ما تجهل من نفسك، أو تجدَ عليهم فيما تأتي". ثم ضرب بيده على صدري فقال:"يا أبا ذر، لا عَقْل كالتَّدْبِير، وَلا وَرَعَ كالكَفِّ، ولا حَبَبَ كحُسْن الخُلُقِ".

إسناده ضعيف جدًّا. رواه ابن حبان في"صحيحه" (361)، وأبو نعيم في الحلية (1/ 166)، والطبراني في الكبير (2/ 167)، والآجري -كما ذكره ابن كثير في تفسيره (2/ 472) - كلّهم من طرق عن إبراهيم بن هشام بن يحيى بن يحيى الغسّانيّ، قال: حدّثني أبي، عن جدّي، عن أبي إدريس الخولانيّ، عن أبي ذرّ، فذكر الحديث بطوله، واللّفظ لابن حبان.

ذكره ابن كثير في"تفسيره" في سورة النساء (آية: 164) عن ابن مردويه بهذا الإسناد أيضًا وزاد فيه بعد قوله:"ونبيك محمد صلى الله عليه وسلم"."وأوّل نبي من أنبياء بني إسرائيل: موسى، وآخرهم عيسى. وأوَل النّبيين آدم، وآخرهم نبيّك".

وقال:"روى هذا الحديث بطوله أبو حاتم بن حبان البُستيّ في كتابه، وقد وَسَمه بالصِّحة، وخالفه أبو الفرج بن الجوزيّ، فذكر هذا الحديث في كتابه"الموضوعات"، واتّهم به إبراهيم بن هشام، ولا شك أنه قد تَكلّم فيه غير واحد من أئمة الجرح والتعديل من أجل هذا الحديث". انتهى

وإبراهيم بن هشام بن يحيى بن يحيى الغسّانيّ، قال فيه أبو حاتم:"قلت لأبي زرعة: لا تحدّث عن إبراهيم بن هشام بن يحيى، فإنّي ذهبتُ إلى قريته فذكر حكاية وقال: وأظنّه لم يطلب العلم وهو كذّاب.

قال عبد الرحمن بن أبي حاتم: ذكرتُ لعلي بن الحسين بن الجنيد بعض هذا الكلام عن أبي، فقال: صدق أبو حاتم، ينبغي أن لا يُحَّدث عنه". انتهى"الجرح والتعديل" (2/ 143).

قال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 216):"فيه إبراهيم بن هشام بن يحيى الغسّانيّ، وثّقه ابنُ حبان، وضعّفه أبو حاتم وأبو زرعة".

وقال الذّهبي في"الميزان" (1/ 72 - 73):"هو صاحب حديث أبي ذرّ الطّويل، انفرد به عن
أبيه، عن جدّه".

ونقل قول أبي حاتم بأنّه كذّاب، كما نقل أيضًا عن ابن الجوزيّ أنه قال: قال أبو زرعة: كذّاب.

كما نقل عن الطبرانيّ قوله:"لم يرو هذا عن يحيى إلّا ولده وهم ثقات". وذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 79)، وأخرج حديثه في الأنواع.

وقال في موضع آخر من"الميزان" (4/ 378):"إبراهيم بن هشام أحد المتروكين الذين مشّاهم ابنُ حبان فلم يُصبْ".

قلت: وفي قوله هذا دليلٌ واضح على تساهل ابن حبان، وإدخاله الضعفاء والمجاهيل في كتابه"الثقات" وإخراج أحاديثهم في"صحيحه" فتنبّه إلى ذلك! .

والحافظ ابن حجر هو الآخر أيضًا من تساهل، فنقل تصحيح ابن حبان ولم يتعقبه عليه، بل عضّده بقول مجاهد، أخرجه سعيد بن منصور في"تفسيره" بسند صحيح عنه. انظر:"الفتح" (13/ 411).

ورواه الإمام أحمد (21546) عن وكيع، حدّثنا المسعوديّ، أنبأني أبو عمر الدّمشقيّ، عن عبيد بن الخشخاش، عن أبي ذرّ، قال (فذكر قطعًا من الحديث).

والمسعوديّ هو عبد الرحمن بن عبد اللَّه. ومن طريقه أخرجه النسائيّ (8/ 275) ما يتعلّق بتعوّذ من شرّ شياطين الجنّ والإنس فقط.

وإسناده ضعيف أيضًا، عبيد بن الخشخاش قال فيه البخاريّ:"لم يذكر سماعًا من أبي ذرّ". وضعّفه الدّارقطني، وفي التقريب:"ليّن".

وأبو عمر، ويقال: أبو عمرو الدّمشقيّ، قال الدّارقطنيّ:"متروك". كما في"اللّسان" (7/ 87).

والمسعوديّ هو عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن عتبة وهو إن كان صدوقًا إلّا أنه اختلط قبل موته.

وكذلك لا يصح ما رواه الحاكم (2/ 597) من طريق يحيى بن سعيد السّعديّ البصريّ، ثنا عبد الملك بن جريج، عن عطاء، عن عبيد بن عمير اللّيثيّ، عن أبي ذرّ، فذكر فيه بعض الجمل من الحديث. ومن طريقه رواه البيهقيّ في"السنن" (9/ 4) وقال:"تفرّد به يحيى بن سعيد السّعديّ".

وقال الذهبيّ في"تلخيص المستدرك":"السّعديّ ليس بثقة".

وللحديث أسانيد أخرى ولم يسلم منها شيء.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي أمامة قال:"كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في المسجد جالسًا وكانوا يظنون أنّه ينزل عليه فانصروا عنه، حتى جاء أبو ذرّ فاقتحم فأتى فجلس إليه فأقبل عليه النّبيُّ صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أبا ذر، هلْ صليتَ اليوم؟". قال: لا قال:"قُمْ فَصلُ". فلمّا صلّى أربع ركعات الضُّحى أقبل عليه، فقال:"يا أبا ذر، تعوَّذْ منْ شَرِّ شياطين الجنّ والأنس". قال: يا نبي اللَّه، وهل للإنس شياطين؟ قال:"نعم شياطين الإنس والجن يوحي بعضُهم إلى بعض زخرف القول غرورًا". ثم
قال:"يا أبا ذر، ألا أُعلّمُكَ كلمة من كنز الجنّة؟". قال: بلى جعلني اللَّه فداءك. قال:"قُلْ لا حول ولا قوَّة إلّا باللَّه". قال: فقلت: لا حول ولا قوّة إلا باللَّه. قال: ثم سكت عنّى فاستبطأتُ كلامَه، قال: قلتُ: يا نبي اللَّه، إنّا كنّا أهل جاهليّة وعبادة أوثان فبعثك اللَّه رحمة للعالمين، أرأيت الصلاة ماذا هي؟ قال:"خيرٌ موضوعٌ من شاء استقَلَّ ومن شاء اسْتَكْثَر". قال: قلت: يا نبي اللَّه، أرأيتَ الصِّيام ماذا هو؟ قال:"فَرْضٌ مُجْزئٌ". قال: قلت: يا نبي اللَّه، أرأيتَ الصَّدقة ماذا؟ قال:"أضعاف مضاعفة، وعند اللَّه المزيد". قال: قلت: يا نبي اللَّه، فأيُّ الصّدقة أفضل؟ قال:"سِرٌّ إلى فقير، وجُهْدٌ مِنْ مُقِلٍّ"، قال: قلت: يا نبي اللَّه، أيُّما أُنزل عليك أعظم؟ قال: [آية الكرسي]. قال: قلتُ: يا نبي اللَّه أيُّ الشهداء أفضل؟ قال: من سُفك دَمُه وعُقِر جَوادُه. قال: قلت: يا نبي اللَّه، فأيُّ الرِّقاب أفضل؟ قال:"أغلاها ثمنًا، وأنفسها عند أهلها". قال: قلت: يا نبي اللَّه، فأيُّ الأنبياء كان أَولَّ؟ قال:"آدم عليه السلام". قال: قلتُ: يا نبي اللَّه أو نبيٌّ كان آدم؟ قال:"نعم نبيٌّ مُكلَّم، خلقه اللَّه بيده، ثم نفخ فيه رُوحَه، ثم قال له: يا آدمُ، -قُبلًا-". قال: قلتُ: يا رسول اللَّه كم وَفَي عِدَّةُ الأنبياء؟ قال:"مائةُ ألف وأربعةٌ وعشرون ألفًا، الرّسلُ من ذلك ثلاثُمائة وخمسةَ عَشَر جمًّا غفيرًا".

رواه الإمام أحمد (22288)، والطّبراني في الكبير (7871) كلاهما من حديث أبي المغيرة، حدّثنا مُعان بن رفاعة، حدّثني علي بن يزيد، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة، مثله.

وفيه سلسلة من الضّعفاء: فمعان بن رفاعة السلاميّ وشيخه: علي بن يزيد -وهو ابن أبي زياد الألهاني- وشيخه القاسم أبو عبد الرحمن كلّهم متكلّم فيهم، ويهم أعلّه الحافظ ابن كثير في تفسيره في سورة النساء (آية: 164).

وأمّا الهيثميّ فأورده في"المجمع" (1/ 159) وأعلَّه بعلي بن يزيد وحده فقال:"مداره عليه" وهو تقصير منه.

والقاسم هو: ابن عبد الرحمن الدّمشقيّ أبو عبد الرحمن صاحب أبي أمامة.

قال ابن حبان:"يروي عن الصّحابة المعضلات، ولكن وثّقه ابن معين، والعجليّ، وقال أبو حاتم: حديث الثقات عنه مستقيم لا بأس به".

قلت: هنا يروي عنه علي بن زيد وهو مالك، وقد سبق أنّ أبا ذرّ، روى هذا الحديث، أو بعضه بنفسه.

وفي الباب أيضًا عن أبي الودّاك قال: قال لي أبو سعيد:"هل يُقِرُّ الخوارج بالدّجّال؟ فقلتُ: لا، فقال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّي خاتمُ ألْف نبيٍّ أو أكْثر، ما بُعث نبيٌّ يتبع إلا قد حذَّر أمَّته الدّجال، وإنّي قد بيَّن لي من أمره ما لم يُبيّن لأحد، وإنّه أعور، وإنّ ربَّكم ليس بأعور، وعينُه اليُمنى عوراءُ جاحظةٌ ولا تخفى، كأنّها نُخامةٌ في حائط فجُصّص، وعينُه اليُسرى كأنّها نُخامة في
حائطٍ فجصَّص، وعينُه البشرى كأنّها كوكب دُرّي معه من كلّ لسانٍ، ومعه صورةُ الجنّة خضراءُ، يجري فيها الماء، وصور النار سوداءُ تدخنُ".

رواه عبد اللَّه بن الإمام أحمد في مسند أبيه (11752) قال:"وحدث هذا الحديث في كتاب أبي بخط يده: حدثنا عبد المتعال بن عبد الوهّاب، حدثنا يحيى بن سعيد الأمويّ، حدثنا مجالد، عن أبي الوداك". فذكر مثله.

وأخرجه الحاكم (2/ 597) من طريق مجالد، وسكت عليه.

ولكن قال الذّهبيّ: مجالد ضعيف.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (7/ 347) وقال:"رواه أحمد وفيه مجالد بن سعيد وثّقه النسائيّ في رواية، وقال في أخرى ليس بالقوي، وضعّفه جماعة".

قلت: مجالد هو ابن سعيد بن عمر الهمْداني ضعّفه أكثر أهل العلم، وقال فيه البخاريّ: صدوق.

وقد رُوي من حديث جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّي لخاتم ألف نبيّ أو أكثر، وإنّه ليس منهم نبيٌّ إِلَّا وقد أنذر قومه الدَّجال، وإنّه قد تبيّن لي ما لم يتبيّن لأحد منهم، وإنه أعور، وإنّ ربَّكم ليس بأعور".

رواه البزّار -كشف الأستار (3380) - عن عمرو بن علي، ثنا يحيى بن سعيد، ثنا مجالد، عن الشّعبيّ، عن جابر، فذكر مثله.

قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 347):"رواه البزّار، وفيه مجالد بن سعيد، وقد ضعّفه الجمهور، وفيه توثيق".

قلت: مجالد هذا تغيّر في آخر عمره، ولعلّه لم يضبط اسم الصّحابيّ فمرّة رواه عن أبي سعيد، وأخرى عن جابر بن عبد اللَّه مع ضعف فيه.

والخلاصة: ليس في عدد الأنبياء والرّسل حديث صحيح، فال سماحة الشيخ ابن باز رحمه الله بعد أن ذكر عدة أحاديث منها: حديث أبي ذر وغيره:"والمقصود أنه ليس في عدد الأنبياء والرسل خبر يُعتمد عليه".

انظر: مجموع فتاواه




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম। দেখলাম রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একা বসে আছেন। তিনি বললেন: "হে আবু যর, মসজিদের একটি তাহিয়্যা (অভিবাদন) আছে, আর এর তাহিয়্যা হলো দু'রাকাত সালাত, সুতরাং ওঠো এবং তা আদায় করো।" তিনি (আবু যর) বলেন: আমি দাঁড়ালাম এবং দু'রাকাত সালাত আদায় করলাম। এরপর আমি ফিরে এসে তাঁর কাছে বসলাম।

আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আপনি আমাকে সালাত আদায় করার নির্দেশ দিলেন, সালাত কী? তিনি বললেন: "এটি সর্বোত্তম কাজ, তুমি চাইলে অল্প করো অথবা বেশি করো।"
তিনি (আবু যর) বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন আমল সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "আল্লাহর প্রতি ঈমান এবং আল্লাহর পথে জিহাদ।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, মুমিনদের মধ্যে কার ঈমান সবচেয়ে পরিপূর্ণ? তিনি বললেন: "যার চরিত্র সবচেয়ে উত্তম।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, মুমিনদের মধ্যে কে সবচেয়ে নিরাপদ? তিনি বললেন: "যার মুখ ও হাত থেকে মানুষ নিরাপদ থাকে।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন সালাত সবচেয়ে উত্তম? তিনি বললেন: "দীর্ঘ কুনুত (দাঁড়িয়ে থাকা)।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন হিজরত সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "যে মন্দ কাজ ত্যাগ করে।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, সিয়াম কী? তিনি বললেন: "একটি সন্তোষজনক ফরয এবং আল্লাহর কাছে রয়েছে বহু গুণ বেশি প্রতিদান।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন জিহাদ সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "যার ঘোড়া ক্ষতবিক্ষত হয়েছে এবং যার রক্ত ঝরেছে।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, কোন সদকা সবচেয়ে উত্তম? তিনি বললেন: "অভাবীর পক্ষ থেকে দেওয়া সেই কষ্টসাধ্য বস্তু, যা কোনো দরিদ্রের নিকট আনন্দের সাথে পৌঁছানো হয়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আপনার প্রতি যা নাযিল করা হয়েছে তার মধ্যে সবচেয়ে মহান কোনটি? তিনি বললেন: "আয়াতুল কুরসি।"
অতঃপর তিনি বললেন: হে আবু যর, সাত আসমান কুরসির তুলনায় এমন, যেমন কোনো বিস্তীর্ণ প্রান্তরে ফেলে রাখা একটি আংটি। আর আরশের শ্রেষ্ঠত্ব কুরসির উপর এমন, যেমন সেই প্রান্তরের শ্রেষ্ঠত্ব ওই আংটির উপর।
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, নবীদের সংখ্যা কত? তিনি বললেন: "এক লক্ষ চব্বিশ হাজার।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, তাদের মধ্যে রাসূলের সংখ্যা কত? তিনি বললেন: "তিনশো তের জন, যা এক বিশাল দল।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, তাদের মধ্যে প্রথম কে ছিলেন? তিনি বললেন: "আদম।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, তিনি কি প্রেরিত নবী (রাসূল) ছিলেন? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, আল্লাহ তাঁকে নিজ হাতে সৃষ্টি করেছেন, তাতে তাঁর রূহ ফুঁকে দিয়েছেন এবং সামনাসামনি তাঁর সাথে কথা বলেছেন।"
অতঃপর তিনি বললেন: হে আবু যর, চারজন নবী সিরিয়ানী: আদম, শীস, উখনুখ—যিনি ইদরীস এবং তিনিই প্রথম ব্যক্তি যিনি কলম দ্বারা লিখেছিলেন—ও নূহ। আর চারজন নবী আরবী: হুদ, শুআইব, সালিহ এবং আপনার নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আল্লাহ কতটি কিতাব নাযিল করেছেন? তিনি বললেন: "একশো চারটি কিতাব। শীসের উপর পঞ্চাশটি সহীফা নাযিল হয়েছিল, উখনুখের উপর ত্রিশটি সহীফা নাযিল হয়েছিল, ইব্রাহীমের উপর দশটি সহীফা নাযিল হয়েছিল এবং তাওরাত নাযিলের পূর্বে মূসার উপর দশটি সহীফা নাযিল হয়েছিল। আর নাযিল হয়েছিল তাওরাত, ইনজীল, যাবূর এবং কুরআন।"
তিনি বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, ইব্রাহীমের সহীফাসমূহে কী ছিল? তিনি বললেন: "তা পুরোটাই ছিল দৃষ্টান্তমূলক উপদেশ: 'হে ক্ষমতাবান, পরীক্ষিত, প্রবঞ্চিত রাজা! আমি তোমাকে দুনিয়ার কিছু অংশ একত্রিত করার জন্য প্রেরণ করিনি। বরং আমি তোমাকে প্রেরণ করেছি যেন তুমি আমার নিকট থেকে মজলুমের ফরিয়াদ ফিরিয়ে দাও। কেননা, আমি তা ফিরিয়ে দেই না, যদিও তা কাফেরের পক্ষ থেকে হয়। বুদ্ধিমান ব্যক্তির জন্য উচিত, যতক্ষণ না সে তার বুদ্ধি হারানোর মতো পরিস্থিতিতে পড়ে, ততক্ষণ তার কিছু সময় যেন থাকে: একটি সময় তার রবের সাথে নিভৃতে কথা বলার জন্য, একটি সময় তার নিজের হিসাব নেওয়ার জন্য, একটি সময় আল্লাহর সৃষ্টি নিয়ে চিন্তা করার জন্য এবং একটি সময় পানাহার জনিত নিজের প্রয়োজন পূরণের জন্য। আর বুদ্ধিমান ব্যক্তির উচিত নয় যে, সে তিনটি উদ্দেশ্য ছাড়া ভ্রমণ করবে: আখেরাতের জন্য পাথেয় সংগ্রহ, জীবনধারণের জন্য ব্যবস্থা করা, অথবা হারামমুক্ত আনন্দ উপভোগ করা। আর বুদ্ধিমান ব্যক্তির উচিত হলো সে যেন তার সময় সম্পর্কে সজাগ থাকে, নিজের বিষয়ে মনোযোগী হয়, তার জিহবাকে নিয়ন্ত্রণ করে। যে তার কথাকে আমলের অংশ হিসেবে গণ্য করে, তার কথাবার্তা অপ্রয়োজনীয় বিষয় ছাড়া কমে যায়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, মূসার সহীফাসমূহে কী ছিল? তিনি বললেন: "তা পুরোটাই ছিল উপদেশমূলক: আমি অবাক হই তার জন্য, যে মৃত্যুকে নিশ্চিত জেনেও আনন্দ করে! আমি অবাক হই তার জন্য, যে জাহান্নামকে নিশ্চিত জেনেও হাসে! আমি অবাক হই তার জন্য, যে ভাগ্যকে নিশ্চিত জেনেও কষ্ট করে (অতিরিক্ত)। আমি অবাক হই তার জন্য, যে দুনিয়া এবং এর অধিবাসীদের পরিবর্তন দেখেও এর প্রতি নিশ্চিন্ত হয়! এবং আমি অবাক হই তার জন্য, যে আগামীকাল হিসাব-নিকাশ হবে জেনেও কাজ করে না!"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আমাকে উপদেশ দিন। তিনি বললেন: "আমি তোমাকে আল্লাহর তাকওয়া অবলম্বন করার উপদেশ দিচ্ছি, কারণ এটি সবকিছুর মূল।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "তোমার উপর কুরআন তিলাওয়াত করা ও আল্লাহকে স্মরণ করা অপরিহার্য; কারণ এটি তোমার জন্য পৃথিবীতে নূর এবং আসমানে সঞ্চিত সম্পদ।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "তুমি অতিরিক্ত হাসি থেকে দূরে থেকো, কারণ তা অন্তরকে মেরে ফেলে এবং চেহারার নূর দূর করে দেয়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "নেক কথা ছাড়া তুমি নীরবতা অবলম্বন করো; কারণ তা তোমার থেকে শয়তানকে তাড়িয়ে দেয় এবং তোমার দ্বীনের বিষয়ে তোমাকে সাহায্য করে।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "তোমার উপর জিহাদ অপরিহার্য, কারণ এটি আমার উম্মতের বৈরাগ্য।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "দরিদ্রদের ভালোবাসো এবং তাদের সাথে বসো।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "তোমার নিচের লোকের দিকে তাকাও, তোমার উপরের লোকের দিকে তাকিয়ো না; কারণ এটিই বেশি উপযোগী যে, আল্লাহ তোমাকে যে নেয়ামত দিয়েছেন, তা যেন তোমার কাছে তুচ্ছ না মনে হয়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "সত্য বলো, যদিও তা তেতো হয়।"
আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আরো বাড়িয়ে দিন। তিনি বললেন: "মানুষের কাছ থেকে তোমাকে যেন বিরত রাখে সেই বিষয় যা তুমি নিজের সম্পর্কে জানো, আর যে কাজ তুমি করো তার জন্য তাদের প্রতি যেন দোষারোপ না করো। তোমার জন্য এতটুকুই ত্রুটি হিসেবে যথেষ্ট যে, তুমি মানুষের মধ্যে এমন কিছু দেখ যা তুমি নিজের মধ্যে জানো না, অথবা যে কাজ তুমি করো তার জন্য তাদের প্রতি অভিযোগ করো।"
এরপর তিনি তাঁর হাত আমার বুকে মারলেন এবং বললেন: "হে আবু যর, সুচিন্তিত পরিকল্পনার (তাদবীর) চেয়ে উত্তম কোনো বুদ্ধি নেই, পাপ থেকে বিরত থাকার (কাফ্ফ) চেয়ে উত্তম কোনো পরহেযগারী নেই, আর উত্তম চরিত্রের চেয়ে শ্রেষ্ঠ কোনো ভালোবাসা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (667)


667 - عن أبي هريرة، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"ما من الأنبياء نبيٌّ إِلَّا أعطي ما مثلُه آمن عليه البشر، وإنَّما الذي أوتيت وحْيًا، أوحاه اللَّه إليَّ، فأرجو أن أكون أكثرهم تابعًا يوم القيامة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4981)، ومسلم في الإيمان (152) كلاهما من
حديث اللّيث، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره. واللّفظ للبخاريّ.

وفي لفظ مسلم:"ما من الأنبياء من نبي إِلَّا قد أُعطي من الآيات ما مثله آمن عليه البشر". ثم ذكر مثله.

أي كلّ نبي أُعطي من المعجزات ما كان مثله لمن كان قبله من الأنبياء، فآمن به البشر، وأمّا معجزني العظيمة الظّاهرة فهي القرآن الذي لم يُعط أحد قبله.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবীগণের মধ্যে এমন কোনো নবী নেই, যাঁকে এমন কিছু দেওয়া হয়নি যার অনুরূপ বিষয় দেখে মানুষ ঈমান এনেছে। আর আমাকে যা দেওয়া হয়েছে, তা হলো ওহী (প্রত্যাদেশ), যা আল্লাহ তাআলা আমার কাছে অবতীর্ণ করেছেন। তাই আমি আশা করি যে, কিয়ামতের দিন তাঁদের (নবীগণের) মধ্যে আমারই অনুসারী সবচেয়ে বেশি হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (668)


668 - عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"عرضت علي الأمم، فرأيت النبي، ومعه الرهيط، والنبي ومعه الرجل والرجلان، والنبي ليس معه أحد".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6541)، ومسلم في الإيمان (220: 374) كلاهما من حديث هشيم، أخبرنا حصين بن عبد الرحمن قال: كنت عند سعيد بن جبير، فقال: حدثني ابن عباس قال: فذكره. واللّفظ لمسلم.

ولفظ البخاريّ:"عرضت علي الأمم، فأخذ النبي يمر معه الأمة، والنبي يمر معه النفر، والنبي يمر معه العشرة، والنبي يمر معه الخمسة، والنبي يمر وحده".




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার সামনে সকল উম্মতকে পেশ করা হলো। তখন আমি একজন নবীকে দেখলাম, তাঁর সাথে রয়েছে একটি ছোট দল, আর একজন নবীকে দেখলাম, তাঁর সাথে রয়েছে একজন কিংবা দুজন লোক, আর এমন নবীকেও দেখলাম, যার সাথে কেউ নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (669)


669 - عن أنس قال: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"أنا أوّل شفيع في الجنّة، لم يُصدَّق نبيٌّ من الأنبياء ما صُدِّقتُ، وإنّ من الأنبياء نبيًّا ما يصدّقه من أمّته إِلَّا رجلٌ واحد".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (196: 332) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا حسين بن علي، عن زائدة، عن المختار بن فُلفل، قال: قال أنس بن مالك، فذكر الحديث.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমিই জান্নাতের প্রথম সুপারিশকারী। আমার প্রতি যেমন বিশ্বাস স্থাপন করা হয়েছে, অন্য কোনো নবীর প্রতি তেমন বিশ্বাস স্থাপন করা হয়নি। আর নিশ্চয়ই নবীদের মধ্যে এমন নবীও রয়েছেন, যাঁর উম্মতের মধ্য থেকে মাত্র একজন লোকই তাঁর প্রতি বিশ্বাস স্থাপন করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (670)


670 - عن أبي موسى قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه إذا أراد رحمة أمةٍ من عباده قبض نبيها قبلها، فجعله لها فرطا وسلفا، وإذا أراد هلكة أمةٍ عذَّبها، ونبيها حيّ، فأقر عينه بهلكتها حين كذبوه، وعصوا أمره".

صحيح: رواه ابن حبان (7664) عن محمد بن المسيب بن إسحاق قال: حدثنا إبراهيم بن سعيد الجوهري، حدثنا أبو أسامة، حدثنا بُريد، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره.

وذكر مسلم في الفضائل (2288) فقال: وحُدِّثتُ عن أبي أسامة، وممن روى ذلك عنه، إبراهيم بن سعيد الجوهري: حدثنا أبو أسامة، حدثني بُريد بن عبد اللَّه بإسناده نحوه.

قال المازري والقاضي:"هذا من الأحاديث المنقطعة فإنه لم يسمّ الذي حدّثه عن أبي أسامة".
قلت: إبراهيم بن سعيد من شيوخه، لكنه لمّا لم يسمع منه هذا الحديث ذكره منقطعا، ووصله ابن حبان كما ترى.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ যখন তাঁর বান্দাদের মধ্য থেকে কোনো জাতিকে অনুগ্রহ করার ইচ্ছা করেন, তখন তাদের নবীর ওফাত তাদের পূর্বে ঘটান। ফলে তাকে (নবীকে) তাদের জন্য অগ্রবর্তী পাথেয় ও অগ্রগামী হিসেবে তৈরি করেন। আর যখন কোনো জাতিকে ধ্বংস করার ইচ্ছা করেন, তখন তাদের নবী জীবিত থাকতেই তাদেরকে শাস্তি দেন। ফলে তারা যখন তাঁকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করে এবং তাঁর আদেশ অমান্য করে, তখন সেই জাতির ধ্বংসের মাধ্যমে তিনি তাঁর (নবীর) চোখ জুড়িয়ে দেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (671)


671 - عن أنس بن مالك، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"مررتُ على موسى ليلة أُسري بي عند الكثيب الأحمر - وهو قائم يُصلّي في قبره".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2375) من طرق عن حمّاد بن سلمة، عن ثابت البنانيّ، وسليمان التيميّ، عن أنس بن مالك، فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি মি‘রাজের রাতে মুসা (আঃ)-এর পাশ দিয়ে অতিক্রম করেছিলাম লাল বালুর টিবির কাছে। তখন তিনি তাঁর কবরে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (672)


672 - عن أنس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الأنبياء أحياءٌ في قبورهم يصلّون".

صحيح: رواه أبو يعلى (3425) عن أبي الجهم الأزرق بن علي: ثنا يحيى بن أبي بكير: ثنا المستلم بن سعيد، عن الحجّاج، عن ثابت، عن أنس، فذكره.

ومن طريق أبي يعلى أخرجه البيهقي في"حياة الأنبياء" (ص 72)، والأزرق وهو أبو الجهم الحنفيّ الأزرق بن علي، قال الحافظ في"التقريب":"صدوق يغرب".

قلت: إِلَّا أنه لم يتفرّد به، فقد رواه الحسن بن عرفة، قال: حدّثني الحسن بن قتيبة المدائنيّ: ثنا المستلم بن سعيد، بإسناده مثله.

ومن طريقه رواه البيهقيّ في"حياة الأنبياء" (ص 70) وقال:"هذا يُعد في أفراد الحسن بن قتيبة المدائنيّ".

كذا قال! مع أنّه رواه من طريق أبي الجهم الأزرق بن علي كما مضى، ومن طرق أخرى، وإن كان في بعضها من يُتَّهم.

وللحديث طريق آخر أخرجه أبو نعيم في"أخبار أصبهان" (2/ 83) من طريق عبد اللَّه بن إبراهيم ابن الصباح، عن عبد اللَّه بن محمد بن يحيى بن أبي بكير: ثنا يحيى بن أبي بكير، بإسناده، مثله.

وقد تبيّن من هذه المتابعات بأنّ الأزرق بن علي لم يُغربْ فيه، كما أنّ الحسن بن قتيبة المدائنيّ لم ينفردْ به.

والحياة هذه حياة برزخية، وليست من حياة الدّنيا في شيء، فلا يجوز تشبيه حياتهم بحياة الدنيا.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবীগণ তাঁদের কবরে জীবিত এবং সালাত আদায় করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (673)


673 - عن أوس بن أوس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: إنّ من أفضل أيامكم يومَ الجمعة، فيه خلق آدم، وفيه قبض، وفيه النفخة، وفيه الصعقة، فأكثروا عليَّ من الصلاة فيه، فإنّ صلاتكم معروضة عليَّ". قال: قالوا: يا رسول اللَّه، كيف تُعرض
صلاتنا عليك وقد أَرِمتَ؟ يقولون: بَليتَ؟ فقال:"إنّ اللَّه عز وجل حرَّمَ على الأرض أجسادَ الأنبياء".

صحيح: رواه أبو داود (1047) والنسائي (1374) وابن ماجه (1636) كلهم من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس، فذكره.

وإسناده صحيح، وصحّحه ابن خزيمة (1733) وابن حبان (910) والحاكم (1/ 278) فأخرجوه من طريق عبد الرحمن بن يزيد به.

قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ، ولم يُخرجاه". ووافقه الذّهبيّ. وليس كما قالا، بل هو على شرطهما عنده، فقد أخرجا لجميع رواته، إِلَّا أَنَّ البخاريّ لم يخرج لأبي الأشعث الصنعاني (واسمه: شرحبيل بن آدة) إِلَّا تعليقًا، والحاكم لا يُفرِّق بين الإخراج للراوي تعليقًا أو متابعة، أو أصلًا.

وفي الباب عن أبي الدَّرداء، رواه ابن ماجه (1637) إِلَّا أنّ فيه انقطاعًا في موضعين، يأتي تفصيله في كتاب الجنائز.




আওস ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিঃসন্দেহে তোমাদের দিনগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ দিন হলো জুমুআর দিন। এই দিনে আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এই দিনেই তাঁর রূহ কবয করা হয়েছে, এই দিনেই শিঙ্গায় ফুঁক দেওয়া হবে এবং এই দিনেই মূর্ছা যাবে (কেয়ামত হবে)। অতএব, এই দিনে তোমরা আমার উপর বেশি করে দরূদ পাঠ করো। কারণ তোমাদের দরূদ আমার সামনে পেশ করা হয়। বর্ণনাকারী বলেন: সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন, হে আল্লাহর রাসূল, আপনার উপর আমাদের দরূদ কীভাবে পেশ করা হবে যখন আপনি জীর্ণ হয়ে যাবেন? (অর্থাৎ, তারা বললো: আপনি তো মাটিতে মিশে যাবেন।) তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা জমিনের জন্য নবীদের দেহ ভক্ষণ করা হারাম করে দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (674)


674 - عن أنس قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"إنّ الأنبياء تنام أعينهم، ولا تنام قلوبهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7517)، ومسلم في الإيمان (162) كلاهما من حديث سليمان بن بلال، عن شريك بن عبد اللَّه، أنه قال: سمعتُ أنس بن مالك، فذكر الحديث بطوله في قصة الإسراء والمعراج، وسيأتي بكامله.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই নবীদের চোখ ঘুমায়, কিন্তু তাঁদের অন্তর ঘুমায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (675)


675 - عن عائشة، قالت: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم: يا عائشة، إنّ عينيي تنامان، ولا ينام قلبي".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة اللّيل (9) عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، أنّه سأل عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم:"كيف كانت صلاة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في رمضان؟ فقالت: (فذكرت الحديث بطوله)، وسيأتي في موضعه.

ورواه البخاريّ في صلاة التراويح (1147)، ومسلم في صلاة المسافرين (738)، كلاهما من حديث مالك بإسناده.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আয়িশা, নিশ্চয় আমার চোখ দুটি ঘুমায়, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (676)


676 - عن ابن عباس، أنه قال:"لما صلّى النبيُّ صلى الله عليه وسلم الفجر اضطجع حتى نفخ فكنا نقول لعمرو: إنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"تنام عينايَ ولا ينام قلبي".

صحيح: رواه الإمام أحمد (1911) عن سفيان، عن عمرو، قال: أخبرنيّ كريب، عن ابن عباس، فذكره. وأصله في الصّحيحين، وسيأتي في كتاب الصّلاة.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজর সালাত আদায় করলেন, তখন তিনি শুয়ে আরাম করতেন যতক্ষণ না তিনি নিঃশ্বাস ফেলতেন (নাক ডাকতেন)। আমরা তখন আমরকে বলতাম: 'রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'আমার চোখ ঘুমায়, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।'









আল-জামি` আল-কামিল (677)


677 - عن ابن عباس: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"النبيّ تنام عيناه، ولا ينام قبله".
حسن: رواه الإمام أحمد (2514) عن هاشم بن القاسم، حدثنا عبد الحميد، حدّثنا شهر، قال: قال ابن عباس، فذكر الحديث مطوَّلًا وقد مضى في الإيمان بالملائكة. وشهر فيه كلام إِلَّا أنه توبع.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবীর চক্ষুদ্বয় ঘুমায়, কিন্তু তাঁর অন্তর ঘুমায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (678)


678 - عن أبي هريرة، قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تنام عيني، ولا ينام قلبي".

حسن: رواه الإمام أحمد (7417) عن يحيى بن سعيد، عن ابن عجلان، قال: سمعت أبي، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن خزيمة (48)، وابن حبان (6386).

وإسناده حسن من أجل الكلام في ابن عجلان وهو محمد بن عجلان المدني غير أنه حسن الحديث. وأبوه عجلان مولي فاطمة بنت عتبة المدني، لا بأس به من رجال مسلم.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার চোখ ঘুমায়, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (679)


679 - عن أبي أمامة:"أنّ رجلًا قال: يا رسول اللَّه، أنبيٌّ كان آدم؟ قال:"نعم مكلَّمٌ". قال: فكم بينه وبين نوح؟ قال:"عشرة قرون".

صحيح: رواه ابن حبان في صحيحه (6190) عن محمد بن عمر بن يوسف، حدثنا محمد بن عبد الملك بن زنجويه، حدثنا أبو توبة، حدثنا معاوية بن سلام، عن أخيه زيد بن سلام، قال: سمعت أبا سلام، قال: سمعت أبا أمامة، فذكر الحديث.

ورواه ابن منده في التوحيد (571) من طريق أبي حاتم الرّازيّ، حدّثنا أبو توبة، بإسناده، مثله. وقال:"هذا إسناد صحيح على رسم مسلم والجماعة إِلَّا البخاريّ، وروي من حديث القاسم أبي عبد الرحمن وغيره عن أبي أمامة، عن أبي ذرّ، بأسانيد فيها مقال". انتهى.

وأورده ابن كثير في البداية والنهاية (1/ 94) وقال:"على شرط مسلم".

فهؤلاء وغيرهم لم يذكروا في حديث أبي أمامة عدد الأنبياء.

ولكن رواه الحاكم (2/ 262) من وجه آخر عن عثمان بن سعيد الدارميّ، والطبراني في الكبير (8/ 139) عن أحمد بن خليد الحلبيّ، كلاهما عن أبي توبة الرّبيع بن نافع الحلبيّ، بإسناد، وزادا فيه:"قالوا: يا رسول اللَّه، كم كانتِ الرَّسل؟ قال: ثلاثة مائة وخمس عشرة جمًّا غفيرًا". وقال:"صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه".

وقال الهيثمي في المجمع (8/ 210) بعد أن عزاه إلى الطبرانيّ:"رجاله رجال الصّحيح غير أحمد بن خليد الحلبي، وهو ثقة".

قلت: أحمد بن خليد الحلبيّ لم يوثقه غير ابن حبان (8/ 53) وعليه اعتمده الهيثميّ.

وأمّا عثمان بن سعيد الدَّارميّ فهو إمام معروف، ولكن رواه الحاكم عن إبراهيم بن إسماعيل القاري عنه، وإبراهيم هذا لم يُذكر من تلاميذه المشهورين، فالأمر يحتاج إلى التثبت في كتب
الدَّارميّ رحمه الله.

ثم وقفت على الحديث في كتاب الدَّارميّ في"الرّد على الجهمية" (299) رواه عن الرّبيع بن نافع (أبي توبة)، بإسناده، ولم يذكر فيه عدد الرّسل بأنّهم"ثلاثمائة وخمسة عشر".




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আদম কি নবী ছিলেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, (তিনি ছিলেন) যার সাথে (আল্লাহ) কথা বলেছিলেন। সে বলল: তাঁর (আদম) এবং নূহের (আঃ) মাঝে সময়ের ব্যবধান কত ছিল? তিনি বললেন: দশটি প্রজন্ম।









আল-জামি` আল-কামিল (680)


680 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا ينبغي لعبد أن يقول: أنا خير من يونس بن متّى".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3416)، ومسلم في الفضائل (2376) كلاهما من حديث شعبة، عن سعد بن إبراهيم، سمعت حميد بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وفي رواية:"من قال: أنا خير من يونس بن متّى فقد كذب".

رواه البخاري (4604) من وجه آخر عن أبي هريرة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো বান্দার জন্য এটা সমীচীন নয় যে, সে বলবে: আমি ইউনুস ইবনু মাত্তা (আঃ)-এর চেয়ে উত্তম।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যে ব্যক্তি বলল: আমি ইউনুস ইবনু মাত্তা (আঃ)-এর চেয়ে উত্তম, সে মিথ্যা বলল।"