হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6621)


6621 - عن ثعلبة بن أبي مالك أنه سمع كبراءهم يذكرون أن رجلًا من قريش كان له سهم في بني قريظة، فخاصم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم مهزور - يعني السيل الذي يقتسمون ماءه.

فقضي بينهم رسول الله صلى الله عليه وسلم أن الماء إلى الكعبين، ولا يحبس الأعلى على الأسفل.

حسن: رواه أبو داود (3638) عن محمد بن العلاء، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن الوليد يعني ابن كثير، عن أبي مالك بن ثعلبة، عن أبيه ثعلبة بن مالك فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي مالك بن ثعلبة وهو مالك بن ثعلبة بن أبي مالك القرظي رُوي عنه اثنان وفي التقريب"مقبول" وهو كذلك لأنه تابعه محمد بن عقبة بن أبي مالك القرظي. ومن طريقه رواه ابن ماجة (2481) ولكن الراوي عنه زكريا بن منظور بن ثعلبة القرظي ضعيف.

ويقويه ما رواه مالك عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم أنه بلغه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"في سيل مهزور ومذينب يُمسك حتَّى الكعبين ثمّ يرسل الأعلى على الأسفل" رواه في الأقضية (30).




সা'লাবা ইবন আবি মালিক থেকে বর্ণিত, তিনি তাদের প্রবীণদেরকে বলতে শুনেছেন যে, কুরাইশ গোত্রের একজন লোকের বনু কুরাইযা গোত্রের মধ্যে (পানি সেচের) অংশ ছিল। এরপর তিনি মাহযূর নামক জলধারা—যার পানি তারা ভাগ করে নিত—সেটির বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বিচারপ্রার্থী হলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মাঝে ফায়সালা দিলেন যে, পানি টাখনু পর্যন্ত ধরে রাখা হবে এবং উপরের (জমির মালিক) নীচের (জমির মালিকের) জন্য (পানি) আটকে রাখবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (6622)


6622 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى في سيل مهزور أن يُمسك حتَّى يبلغ الكعبين، ثمّ يرسل الماء.

حسن: رواه أبو داود (3639) وابن ماجة (2482) عن أحمد بن عبدة، قال: أنبأنا المغيرة بن عبد الرحمن، قال: حَدَّثَنِي أبي، عن عمرو بن شعيب فذكره.

ووالد المغيرة هو: عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عَيَّاش المخزومي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وفيه أيضًا عمرو بن شعيب حسن الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মাহযূর উপত্যকার স্রোতস্বিনী (বা নদী)-এর ব্যাপারে এই ফায়সালা দিলেন যে, তা দুই গোড়ালি পর্যন্ত পৌঁছা পর্যন্ত আটকে রাখা হবে, অতঃপর পানি ছেড়ে দেওয়া হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (6623)


6623 - عن أنس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان عند بعض نسائه، فأرسلت إحدى أمهات المؤمنين مع خادم بقصعة فيها طعام، فضربت بيدها فكسرت القصعة، فضمنها وجعل فيها الطعام. وقال:"كلوا" وحبس الرسولَ والقصعةَ حتَّى فرغوا. فدفع القصعة الصحيحة، وحبس المكسورة.

صحيح: رواه البخاريّ في موضعين: الشركة (2481) عن مسدد، حَدَّثَنَا يحيى بن سعيد، وفي النكاح (5225) عن عليّ، حَدَّثَنَا ابن علية كلاهما عن حميد، عن أنس فذكره.

وما رواه عمران بن خالد الواسطيّ، عن ثابت، عن أنس قال: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في بيت عائشة، ومعه أصحابه، فأرسلت حفصة بقصعة فكسرتها عائشة.
قال أبو زرعة: هذا خطأ. رواه حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أبي المتوكل أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. وقال: وهذا الصَّحيح."العلل" (1/ 466) أي المرسل. ولكن لا يعل هذا المرسل، ما ثبت في الصَّحيح.

ولهذه القصة أسانيد أخرى، ولا تصح إِلَّا ما ذكرته. ومنها ما رواه شريك، عن قيس بن وهب، عن رجل من بني سواءة قال: سألت عائشة عن خلق رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: أما تقرأ القرآن؟ {وَإِنَّكَ لَعَلَى خُلُقٍ عَظِيمٍ} [القلم: 4] قال: قلت: حدثيني عن ذلك قالت: صنع له طعاما، وصنعتُ له حفصة طعامًا، فقلت لجاريتي: اذهبي، فإن جاءت هي بالطعام فوضعته قبل فاطرحي الطعام. قالت: فجاءت بالطعام. قالت: فألقتْه الجارية، فوضعت القصعة فانكسرت. وكان نِطْع قالت: فجمعه رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"اقتصوا - أو اقتصّي - شك أسود - ظرفا مكان ظرفك" فما قال شيئًا.

رواه أحمد (24800) عن أسود، قال: حَدَّثَنَا شريك، فذكره، ورواه ابن أبي شيبة (14/ 214) وعنه ابن ماجة (2333) قال: حَدَّثَنَا شريك بن عبد الله بإسناده نحوه. وفيه شريك بن عبد الله سيء الحفظ، وفيه أيضًا التابعي مجهول. وبه أعلّه البوصيري في زوائد ابن ماجة.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোনো এক স্ত্রীর নিকট অবস্থান করছিলেন। তখন উম্মুল মু'মিনীনদের অন্য একজন খাদেমের মাধ্যমে খাবার ভর্তি একটি থালা পাঠালেন। (প্রথম স্ত্রী) হাত দিয়ে আঘাত করলেন এবং থালাটি ভেঙে দিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থালাটির ক্ষতিপূরণ নিশ্চিত করলেন এবং তার মধ্যে খাবার রাখলেন। তিনি বললেন, “তোমরা খাও।” আর তিনি খাদেম এবং থালাটিকে আটকে রাখলেন যতক্ষণ না তারা (খাবার গ্রহণকারীরা) খাওয়া শেষ করলেন। অতঃপর তিনি (যার থালা ভেঙেছিল তাকে) ভালো থালাটি দিয়ে দিলেন এবং ভাঙা থালাটি রেখে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6624)


6624 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يمنع أحدكم جاره خشبة يغرزها في جداره". ثمّ يقول أبو هريرة: ما لي أراكم عنها معرضين، والله لأرمين بها بين أكتافكم.

متفق عليه: رواه مالك في الأقضية (34) عن ابن شهاب، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره. وأخرجه البخاريّ في المظالم (2463) ومسلم في المساقاة (1609) كلاهما من حديث مالك.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন তার প্রতিবেশীকে তার দেয়ালে কাঠ পুঁততে (ব্যবহার করতে) বাধা না দেয়।" অতঃপর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: "কী হলো! আমি তোমাদেরকে এ থেকে মুখ ফিরিয়ে নিতে দেখছি কেন? আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই তা তোমাদের কাঁধের মাঝখানে নিক্ষেপ করব (অর্থাৎ এ মাসআলা তোমাদের সামনে পেশ করব)।"









আল-জামি` আল-কামিল (6625)


6625 - عن ابن عباس أن رسول الله قال:"لا يمنع أحدكم أخاه مَرفِقة أن يضعه على جداره".

حسن: رواه أحمد (2307) عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا ابن لهيعة، عن أبي الأسود، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة فإنه صدوق إذا روى عنه العبادلة، وقتيبة بن سعيد.

ورواه ابن ماجة (2337) من وجه آخر عن عبد الله بن وهب، قال: أخبرني ابن لهيعة بإسناده. ولفظُه:"لا يمنع أحدكم جاره أن يغرز خشبة على جداره" وعبد الله بن وهب من أحد العبادلة ممن سمع ابن لهيعة قبل احتراق كتبه. وقال قتيبة بن سعيد: كنا نكتب من كتاب عبد الله بن وهب، ثمّ نسمعه من ابن لهيعة.

وقوله: المرفق هو كل ما يرتفق أي ينتفع به.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن مجمع بن يزيد ورجال من الأنصار رواه ابن ماجة (2336) وأحمد (15938) وفيه رجال مجهولون.
وقضى بين أهل البادية أنه لا يمنع فضل ماء ليمنع فضل الكلأ.

وقضى في دية الكبرى المغلظة ثلاثين ابنة لبون، وثلاثين حقة، وأربعين خلفة.

وقضى في دية الصغرى ثلاثين ابنة لبون، وثلاثين حقة، وعشرين ابنة مخاض، وعشرين بني مخاض ذكور.

ثمّ غلت الإبل بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم وهانت الدراهم، فقوم عمر بن الخطّاب إبل الدية ستة آلاف درهم حساب أوقية لكل بعير، ثمّ غلت الإبل، وهانت الورق، فزاد عمر بن الخطّاب ألفين حساب أوقيتين لكل بعير، ثمّ غلت الإبل وهانت الدراهم، فأتمها عمر اثني عشر ألفا حساب ثلاث أواق لكل بعير.

قال: فزاد ثلث الدية في الشهر الحرام، وثلث آخر في البلد الحرام، قال: فتمت دية الحرمين عشرين ألفًا.

قال: فكان يقال: يؤخذ من أهل البادية من ماشيتهم لا يكلفون الورِق ولا الذهب، ويؤخذ من كل قوم ما لهم قيمة العدل من أموالهم.

رواه عبد الله بن أحمد في مسند أبيه (22778) عن أبي كامل الجحدريّ، حَدَّثَنَا الفُضيل بن سليمان، حَدَّثَنَا موسى بن عقبة، عن إسحاق بن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصَّامت، عن عبادة قال: فذكره.

وفيه فُضيل بن سليمان النميري البصري وثَّقه ابن حبَّان، وضعّفه أكثر أهل العلم.

وإسحاق بن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصَّامت لم يدرك جد أبيه عبادة بن الصَّامت. إِلَّا أن أكثر هذه الأقضية رُويت بأسانيد صحيحة في مواضعها.

ومن الأقضية ما رُوي عن سمرة بن جندب أنه قال: كانت له عضد من نخل في حائط رجل من الأنصار. قال: ومع الرّجل أهله. قال: فكان سمرة يدخل إلى نخله، فيتأذى به، ويشق عليه، فطلب إليه أن يبيعه فأبى، فطلب إليه أن يناقله فأبى، فأتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، فطلب إليه النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن يبيعه فأبى، فطلب إليه أن يناقله فأبى، قال:"فهبه له، ولك كذا وكذا" أمرا رغّبه فيه فأبى، فقال:"أنت مضار" فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم للأنصاري:"اذهب فاقلع نخله".

رواه أبو داود (3636) عن سليمان بن داود العتكيّ، حَدَّثَنَا حمّاد، حَدَّثَنَا واصل مولى أبي عيينة، قال: سمعت أبا جعفر محمد بن عليّ، عن سمرة بن جندب فذكره.

وأبو جعفر هو الباقر محمد بن عليّ بن الحسين بن عليّ بن أبي طالب الإمام المعروف وروايته عن جماعة من الصّحابة مرسلة منهم سمرة بن جندب.

انظر مزيدًا من أقضية النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في كتاب ابن الطلاع بتحقيقي.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমাদের কেউ যেন তার ভাইকে তার প্রাচীরের উপর ভর দেওয়ার বা অবলম্বনের কোনো কিছু রাখতে বাধা না দেয়।”

(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:) “তোমাদের কেউ যেন তার প্রতিবেশীকে তার প্রাচীরের উপর একটি কাঠ (বা খুঁটি) গাড়তে বাধা না দেয়।”

আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বেদুঈনদের (গ্রামবাসীদের) মাঝে এই বলে ফায়সালা করলেন যে, ঘাস (উদ্ভিদ) আটকানোর জন্য কেউ যেন অতিরিক্ত পানি দিতে বাধা না দেয়।

আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কঠিন (গুরুতর) রক্তপণ (দিয়াহ আল-মুগাল্লাজাহ)-এর ক্ষেত্রে ত্রিশটি ইবনাতে লাবুন (দুই বছর পূর্ণ হওয়া উষ্ট্রী), ত্রিশটি হিক্কাহ (তিন বছর পূর্ণ হওয়া উষ্ট্রী), এবং চল্লিশটি খালফাহ (গর্ভবতী উষ্ট্রী)-এর ফায়সালা করলেন।

আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লঘু (সাধারণ) রক্তপণের ক্ষেত্রে ত্রিশটি ইবনাতে লাবুন, ত্রিশটি হিক্কাহ, বিশটি ইবনাতে মাখাদ (এক বছর পূর্ণ হওয়া উষ্ট্রী), এবং বিশটি বানি মাখাদ (এক বছর পূর্ণ হওয়া উটশাবক, পুরুষ)-এর ফায়সালা করলেন।

এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মৃত্যুর পর উটের দাম বৃদ্ধি পেল এবং দিরহামের মান কমে গেল। তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রক্তপণের উটগুলোর মূল্য নির্ধারণ করলেন ছয় হাজার দিরহাম—প্রতিটি উটের জন্য এক উকিয়া হিসেবে। অতঃপর উটের দাম আরও বাড়ল এবং রৌপ্যমুদ্রার মান আরও কমল, তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও দুই হাজার বৃদ্ধি করলেন—প্রতিটি উটের জন্য দুই উকিয়া হিসেবে। অতঃপর উটের দাম আবারও বাড়ল এবং দিরহামের মান কমল, তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটিকে পূর্ণ বারো হাজার দিরহাম করলেন—প্রতিটি উটের জন্য তিন উকিয়া হিসেবে।

তিনি (উমার) বলেন, তিনি হারাম মাসে রক্তপণের এক-তৃতীয়াংশ বৃদ্ধি করেন এবং হারাম শহরে আরও এক-তৃতীয়াংশ বৃদ্ধি করেন। তিনি বলেন, এরপর দুই হারামের (হারাম মাস ও হারাম শহরের) রক্তপণ বিশ হাজার পূর্ণ হলো।

তিনি বলেন: বলা হতো, বেদুঈনদের থেকে তাদের চতুষ্পদ জন্তু নেওয়া হবে, তাদের উপর রৌপ্যমুদ্রা বা স্বর্ণমুদ্রার বোঝা চাপানো হবে না। আর প্রতিটি গোত্রের সম্পদ থেকে ন্যায্য মূল্যের বিনিময়ে তাদের কাছে যা আছে তা নেওয়া হবে।

(অন্যান্য ফায়সালার মধ্যে) সামুরা ইবন জুন্দুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তাঁর (সামুরার) একটি খেজুর গাছের শাখা এক আনসারী ব্যক্তির প্রাচীরের উপর ছিল। তিনি বললেন: ঐ ব্যক্তি তার পরিবারের সাথে সেখানে বাস করত। সামুরা তার খেজুরের কাছে যাওয়ার জন্য ভেতরে প্রবেশ করতেন, এতে ঐ ব্যক্তি কষ্ট পেত এবং তার জন্য তা কষ্টকর ছিল। লোকটি তাকে (সামুরাকে) গাছটি বিক্রি করে দিতে বলল, কিন্তু তিনি অস্বীকার করলেন। লোকটি তাকে (অন্য গাছের বিনিময়ে) গাছটি পরিবর্তন করে নিতে বলল, কিন্তু তিনি অস্বীকার করলেন। এরপর সে বিষয়টি নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো এবং তাকে তা অবহিত করল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (সামুরাকে) গাছটি বিক্রি করে দিতে বললেন, কিন্তু তিনি অস্বীকার করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে গাছটি পরিবর্তন করে নিতে বললেন, কিন্তু তিনি অস্বীকার করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তবে তাকে তা দান করে দাও, এর বিনিময়ে তোমার জন্য এত এত থাকবে”—এমন কিছু যা তাকে প্রলুব্ধ করে, কিন্তু তিনি আবারও অস্বীকার করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি ক্ষতিকর ব্যক্তি।” এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারী লোকটিকে বললেন: “যাও, তার খেজুর গাছ উপড়ে ফেলো।”









আল-জামি` আল-কামিল (6626)


6626 - عن ابن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يحل دم امرئ مسلم يشهد أن لا إله إِلَّا الله، وأني رسول الله إِلَّا بإحدى ثلاث: النفس بالنفس، والثيِّب الزاني، والتارك لدينه المفارق للجماعة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الديات (6878) ومسلم في القسامة (1676) كلاهما من طريق الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن مسروق، عن عبد الله بن مسعود فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি সাক্ষ্য দেয় যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল, সেই মুসলিম ব্যক্তির রক্তপাত (হত্যা করা) হালাল নয়, তবে তিনটি কারণের কোনো একটির ক্ষেত্রে ছাড়া: (১) প্রাণের বদলে প্রাণ (হত্যার অপরাধে), (২) বিবাহিত ব্যভিচারী এবং (৩) যে ব্যক্তি তার দ্বীন ত্যাগ করে জামাআত থেকে বিচ্ছিন্ন হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6627)


6627 - عن أبي أمامة بن سهل قال: كنا مع عثمان وهو محصور في الدار، وكان في الدار مدخل من دخله سمع كلام من على البلاط، فدخله عثمان، فخرج إلينا وهو متغير لونه، فقال: إنهم ليتواعدوني بالقتل آنفا، قلنا: يكفيكهم الله يا أمير المؤمنين. قال: ولم يقتلوني؟ سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يحل دم امرئ مسلم إِلَّا بإحدى ثلاث: كفر بعد إسلام، أو زنا بعد إحصان، أو قتل نفس بغير نفس" فوالله ما زنيت في جاهلية ولا إسلام قطّ، ولا أحببت أن لي بديني بدلًا منذ هداني الله، ولا قتلت نفسًا. فبم يقتلوني؟

صحيح: رواه أبو داود (4502) والتِّرمذيّ (2158) والنسائي (4019) وابن ماجة (2533) وابن الجارود (836) وأحمد (437) وصحّحه الحاكم (4/ 350) كلّهم من حديث حمّاد بن زيد، عن يحيى بن سعيد الأنصاريّ، عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف فذكره.

قال الترمذيّ: هذا حديث حسن، ورواه حمّاد بن سلمة، عن يحيى بن سعيد فرفعه. وروي يحيى بن سعيد القطان وغير واحد عن يحيى بن سعيد هذا الحديث فأوقفوه، ولم يرفعوه. وقد روي هذا الحديث من غير وجه عن عثمان، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرفوعًا. انتهى

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".




আবূ উমামাহ ইবনু সাহল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম, যখন তিনি তাঁর বাড়িতে অবরুদ্ধ ছিলেন। বাড়িতে একটি প্রবেশপথ ছিল, যেখান দিয়ে প্রবেশ করলে মেঝেতে যারা ছিল তাদের কথা শোনা যেত। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই পথে প্রবেশ করলেন। এরপর তিনি আমাদের কাছে এমন অবস্থায় বেরিয়ে এলেন যে, তাঁর চেহারার রং পরিবর্তিত ছিল। তিনি বললেন: এইমাত্র তারা আমাকে হত্যার হুমকি দিচ্ছিল। আমরা বললাম: হে আমীরুল মুমিনীন, আল্লাহই আপনার জন্য তাদের যথেষ্ট। তিনি বললেন: তারা আমাকে কেন হত্যা করবে? আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তিনটি কারণের কোনো একটি ব্যতীত কোনো মুসলিম ব্যক্তির রক্তপাত বৈধ নয়: ইসলামের পর কুফরি করা, অথবা বিবাহিত অবস্থায় যেনা করা, অথবা প্রাণের বিনিময়ে প্রাণ হত্যা করা ব্যতীত।" আল্লাহর কসম, আমি জাহেলিয়াত (অজ্ঞতার যুগ) বা ইসলামের যুগে কখনো যেনা করিনি। আল্লাহ আমাকে হিদায়াত দেয়ার পর থেকে আমি কখনো চাইনি যে আমার দীনের পরিবর্তে অন্য কিছু গ্রহণ করি। আর আমি কোনো প্রাণ হত্যাও করিনি। তাহলে তারা আমাকে কেন হত্যা করবে?









আল-জামি` আল-কামিল (6628)


6628 - عن ابن عمر أن عثمان أشرف على أصحابه وهو محصور فقال: علامَ تقتلوني؟ فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يحل دم امرئ مسلم إِلَّا بإحدى ثلاث: رجل زني بعد إحصانه فعليه الرجم، أو قتل عمدًا فعليه القود، أو ارتدَّ بعد إسلامه فعليه القتل".
فوالله ما زنيت في جاهلية ولا في إسلام، ولا قتلت أحدًا فأقيد نفسي منه، ولا ارتددت منذ أسلمت إني أشهد أن لا إله إِلَّا الله، وأن محمدًا عبده ورسوله.

حسن: رواه أحمد (452) واللّفظ له، والنسائي (4057) والبزّار في مسنده (3/ 9) وأبو عاصم في الديات (111) مختصرًا - كلّهم من حديث إسحاق بن سليمان الرازيّ، قال: سمعت المغيرة بن مسلم، يحدث عن مطر الوراق، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ومطر الوراق مختلف فيه غير أنه يعتبر به. وقد تابعه يعلى بن حكيم، عن نافع، رواه البزّار في مسنده عن محمد بن معمر، قال: نا روح بن عبادة، قال: نا سعيد بن أبي عروبة، عن يعلى بن حكيم بإسناده.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন অবরুদ্ধ ছিলেন, তখন তিনি তাঁর সাথীদের দিকে দৃষ্টি দিলেন এবং বললেন: তোমরা আমাকে কেন হত্যা করবে? আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তিনটি কারণ ব্যতীত কোনো মুসলিম ব্যক্তির রক্ত (হত্যা) বৈধ নয়: (১) বিবাহিত অবস্থায় কোনো ব্যক্তি ব্যভিচার করলে, তাকে রজম (পাথর নিক্ষেপ) করতে হবে। (২) কেউ ইচ্ছাকৃতভাবে কাউকে হত্যা করলে, তার উপর কিসাস (প্রতিশোধমূলক মৃত্যুদণ্ড) প্রযোজ্য হবে। অথবা (৩) ইসলাম গ্রহণের পর কেউ মুরতাদ (ধর্মত্যাগ) হলে, তাকে হত্যা করতে হবে।"

আল্লাহর কসম! আমি জাহিলিয়াত বা ইসলাম—কোনো অবস্থাতেই ব্যভিচার করিনি। আমি এমন কাউকে হত্যা করিনি, যার জন্য আমাকে কিসাসের সম্মুখীন হতে হবে। আর ইসলাম গ্রহণের পর থেকে আমি কখনোই মুরতাদ হইনি। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল।









আল-জামি` আল-কামিল (6629)


6629 - عن عقبة بن مالك قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم سرية، قال: فأغارت على قوم، قال: فشذ من القوم رجل، قال: فأتبعه رجل من السرية شاهرًا سيفه، قال: فقال الشاذ من القوم، إني مسلم، قال: فلم ينظر فيما قال، فضربه فقتله، قال: فنمي الحديث إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فقال فيه قولًا شديدًا، فبلغ القاتل، قال: فبينا رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب إذ قال القائل: يا رسول الله، والله ما قال الذي قال إِلَّا تعوذًا من القتل. قال: فأعرض عنه، وعمن قبله من الناس، وأخذ في خطبته، ثمّ قال أيضًا: يا رسول الله، ما قال الذي قال إِلَّا تعوذًا من القتل. فأعرض عنه وعمن قبله من الناس وأخذ في خطبته، ثمّ لم يصبر، فقال الثالثة: يا رسول الله، والله ما قال إِلَّا تعوذًا من القتل. فأقبل عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم تُعرف المساءة في وجهه. فقال له:"إن الله عز وجل أبى عليّ أن أقتل مؤمنًا".

صحيح: رواه الإمام أحمد (22490) وأبو يعلى (6829) والطَّبرانيّ (17/ 355) وابن أبي عاصم في الديات (40) وصحّحه ابن حبَّان (5972) كلّهم من حديث سليمان بن المغيرة، حَدَّثَنَا حميد بن هلال، قال: أتاني أبو العالية وصاحب ليّ، فقال: هلّما، فإنكما أشب شبابًا، وأوعي للحديث مني. فانطلقنا حتَّى أتينا بشر بن عاصم الليثي. قال أبو العالية: حدَّث هذين. قال بشر: حَدَّثَنَا عقبة بن مالك وكان من رهطه قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم سرية. فذكر الحديث.

وتصحف في مسند أبي يعلى: عقبة بن خالد.

وله طرق أخرى جاء الحديث هكذا مطوَّلًا ومختصرًا ذكر في موضعه.




উকবাহ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সেনাবাহিনী (সারিয়্যাহ) প্রেরণ করলেন। তারা একটি গোত্রের উপর আক্রমণ করল। তখন সেই গোত্রের একজন লোক বিচ্ছিন্ন হয়ে গেল। সেনাবাহিনীর একজন লোক তার খোলা তলোয়ার নিয়ে তাকে অনুসরণ করল। সেই বিচ্ছিন্ন লোকটি বলল: "আমি মুসলিম।" কিন্তু সে (সেনাবাহিনীর লোকটি) তার কথায় কোনো মনোযোগ না দিয়ে তাকে আঘাত করে হত্যা করল। ঘটনাটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছানো হলো। তিনি এ বিষয়ে কঠোর মন্তব্য করলেন, যা হত্যাকারীর কাছে পৌঁছল।

একবার যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিচ্ছিলেন, তখন সেই হত্যাকারী বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর কসম, সে তো কেবল হত্যা থেকে বাঁচার জন্যই ঐ কথা বলেছিল।" তখন তিনি তার থেকে এবং তার সামনে থাকা লোকদের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন এবং তার ভাষণ চালিয়ে গেলেন। এরপর লোকটি আবারও বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! সে তো কেবল হত্যা থেকে বাঁচার জন্যই ঐ কথা বলেছিল।" তিনি তার থেকে এবং তার সামনে থাকা লোকদের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন এবং তার ভাষণ চালিয়ে গেলেন।

এরপর সে ধৈর্য রাখতে পারল না এবং তৃতীয়বার বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর কসম, সে তো কেবল হত্যা থেকে বাঁচার জন্যই বলেছিল!" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে মুখ ফেরালেন, এমতাবস্থায় তাঁর চেহারা মুবারকে অসন্তুষ্টি প্রকাশ পাচ্ছিল। অতঃপর তিনি তাকে বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল আমার জন্য মু'মিনকে হত্যা করা নিষিদ্ধ করে দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6630)


6630 - عن عبد الله بن عدي الأنصاري حدَّث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بينا هو جالس بين ظهراني الناس جاءه رجل يستأذنه أو يشاوره يسارّه في قتل رجل من المنافقين يستأذن فيه. فجهر رسول الله صلى الله عليه وسلم بكلامه فقال:"أليس يشهد أن لا إله إِلَّا الله، قال:
بلى، ولكن لا شهادة له، قال:"أليس يشهد أني رسول الله؟ قال: بلى، ولا شهادة له، قال:"أليس يُصَلِّي؟" قال: بلى، ولا صلاة له، قال:"أولئك الذين نُهيت عنهم".

صحيح: رواه الإمام أحمد (23671) والبيهقي (8/ 196) وصحّحه ابن حبَّان (5971) كلّهم من حديث عبد الرزّاق (18688) عن معمر، عن الزّهريّ، عن عطاء بن يزيد، عن عبد الله بن عليّ بن الخيار، عن عبد الله بن عدي فذكره. وإسناده صحيح.

وذكر ابن عبد البر أن الرّجل المتهم بالنفاق هو مالك بن الدُّخشم.




আব্দুল্লাহ ইবনে আদী আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন মানুষের মাঝখানে উপবিষ্ট ছিলেন, তখন একজন লোক তাঁর কাছে এসে কানে কানে একজন মুনাফিককে হত্যা করার অনুমতি চাইল অথবা এ বিষয়ে তাঁর সাথে পরামর্শ করতে চাইল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উচ্চস্বরে তার কথা প্রকাশ করে বললেন: "সে কি সাক্ষ্য দেয় না যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই?" লোকটি বলল, "হ্যাঁ, দেয়। কিন্তু তার (সেই) সাক্ষ্যের কোনো মূল্য নেই।" তিনি (নবী) বললেন, "সে কি সাক্ষ্য দেয় না যে আমি আল্লাহর রাসূল?" লোকটি বলল, "হ্যাঁ, দেয়। কিন্তু তার (সেই) সাক্ষ্যের কোনো মূল্য নেই।" তিনি (নবী) বললেন, "সে কি সালাত আদায় করে না?" লোকটি বলল, "হ্যাঁ, করে। কিন্তু তার (সেই) সালাতের কোনো মূল্য নেই।" তিনি বললেন, "এরা হলো তারা, যাদের ব্যাপারে (হত্যা করা থেকে) আমাকে নিষেধ করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6631)


6631 - عن أبي هريرة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أتي بمخنث قد خضب يديه، ورجليه بالحناء، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما بال هذا؟" فقيل: يا رسول الله! يتشبه بالنساء، فأمر به فنُفي إلى النقيع. قالوا: يا رسول الله! ألا نقتله. قال:"إني نهيت عن قتل المصلين".

حسن: رواه أبو داود (4928) وأبو يعلى (6126) والبيهقي (8/ 222) كلّهم من حديث أبي أسامة أخبرهم، عن مفضل بن يونس، عن الأوزاعيّ، عن أبي يسار القرشيّ، عن أبي هاشم، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي يسار وشيخه أبي هاشم فإنهما حسنا الحديث.

وفي الباب ما رواه أبو يعلى (88) عن أبي بكر، وأحمد (22154) والطَّبرانيّ في الكبير (8057) والبخاري في الأدب المفرد (163) عن أبي أمامة، وفي إسناديهما ضعف وإن قال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 237) عن حديث أبي أمامة: رواه أحمد ومداره على أبي غالب، وهو ثقة وقد ضُعّف. فالصحيح أنه ضعيف. ضعَّفه أبو حاتم والنسائي وقال ابن حبَّان في"المجروحين" (1/ 267):"منكر الحديث على قلته لا يجوز الاحتجاج به إِلَّا فيما يوافق الثّقات".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একজন 'মুখান্নাছ' (নারীর বেশ ধারণকারী পুরুষ) কে আনা হলো, যে তার দুই হাত ও দুই পা মেহেদি দ্বারা রাঙিয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এর কী হয়েছে?" উত্তরে বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! সে নারীদের সাথে সাদৃশ্য অবলম্বন করে। অতঃপর তিনি তার সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন, ফলে তাকে নকী' নামক স্থানে নির্বাসিত করা হলো। সাহাবীগণ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কি তাকে হত্যা করব না? তিনি বললেন: "আমি সালাত আদায়কারীদের হত্যা করতে নিষেধপ্রাপ্ত হয়েছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (6632)


6632 - عن سعيد بن جبير قال: أمرني عبد الرحمن بن أبزى قال: سل ابن عباس عن هاتين الآيتين ما أمرهما: {وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ} [الأنعام: 151، الإسراء: 33] {وَمَنْ يَقْتُلْ مُؤْمِنًا مُتَعَمِّدًا} [النساء: 93] فسألت ابن عباس فقال: لما أنزلت التي في الفرقان وهي قوله تعالى: {وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي
حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ يَلْقَ أَثَامًا} [الفرقان: 68]. قال مشركوا أهل مكة: فقد قتلنا النفس التي حرم الله، ودعونا مع الله إلها آخر، وقد أتينا الفواحش فأنزل الله تعالى: {إِلَّا مَنْ تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ عَمَلًا صَالِحًا فَأُولَئِكَ يُبَدِّلُ اللَّهُ سَيِّئَاتِهِمْ حَسَنَاتٍ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَحِيمًا} [الفرقان: 70] فهذه لأولئك، وأمّا التي في النساء: [93] فالرجل إذا عرف الإسلام وشرائعه، ثمّ قتل فجزاؤه جهنّم. فذكرته لمجاهد فقال: إِلَّا من ندم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3855)، عن عثمان بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا جرير، عن منصور، حَدَّثَنِي سعيد بن جبير أو قال: حَدَّثَنِي الحكم عن سعيد بن جبير قال: أمرني عبد الرحمن بن أبزى فذكره.

ورواه مسلم في التفسير (18: 3023) من حديث منصور، عن سعيد بن جبير بدون شك مختصرًا. ولم يذكر مسلم قول مجاهد.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন, আব্দুল রহমান ইবনু আবযা আমাকে নির্দেশ দিলেন, তুমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই দুটি আয়াত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করো— এদের বিধান কী: “আর তোমরা সেই জীবনকে হত্যা করো না, যাকে আল্লাহ হারাম করেছেন...” [সূরা আন‘আম: ১৫১, ইসরা: ৩৩] এবং “আর যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে কোনো মু‘মিনকে হত্যা করবে...” [সূরা নিসা: ৯৩]। আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন, যখন সূরা ফুরকানে উল্লেখিত আয়াতটি নাযিল হলো— মহান আল্লাহর বাণী: “আর তারা আল্লাহর সাথে অন্য কোনো উপাস্যকে ডাকে না এবং তারা সেই জীবনকে হত্যা করে না, যাকে আল্লাহ হারাম করেছেন, তবে ন্যায়সঙ্গত কারণ ব্যতীত, আর তারা ব্যভিচারও করে না। আর যে কেউ তা করবে, সে প্রতিফল ভোগ করবে।” [সূরা ফুরকান: ৬৮]। তখন মক্কার মুশরিকরা বলল, আমরা তো সেই জীবনকে হত্যা করেছি যাকে আল্লাহ হারাম করেছেন, আমরা আল্লাহর সাথে অন্য উপাস্যকেও ডেকেছি এবং আমরা অশ্লীল কাজও করেছি। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: “তবে যে ব্যক্তি তাওবা করে, ঈমান আনে এবং সৎকর্ম করে, আল্লাহ তাদের মন্দ কাজগুলোকে নেক কাজ দ্বারা পরিবর্তন করে দেবেন। আর আল্লাহ অতি ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।” [সূরা ফুরকান: ৭০] এই আয়াতটি তাদের (ঐসব মুশরিকদের) জন্য। আর সূরা নিসার [৯৩] আয়াতটি হলো, ঐ ব্যক্তির জন্য, যে ইসলাম ও এর শরীয়তের বিধিবিধান জানার পর (ইচ্ছাকৃতভাবে) হত্যা করে। তার প্রতিফল হলো জাহান্নাম। সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন, আমি মুজাহিদকে এ কথা জানালে তিনি বললেন: তবে যে ব্যক্তি লজ্জিত হয়/অনুশোচনা করে (সে ভিন্ন)।









আল-জামি` আল-কামিল (6633)


6633 - عن سعيد بن جبير قال: اختلف أهل الكوفة في هذه الآية: {وَمَنْ يَقْتُلْ مُؤْمِنًا مُتَعَمِّدًا فَجَزَاؤُهُ جَهَنَّمُ} [النساء: 93] فرحلت إلى ابن عباس فسألته عنها فقال: لقد أنزلت آخر ما أنزل، ثمّ ما نسخها شيء.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4590) ومسلم في التفسير (3032) كلاهما من حديث شعبة، حَدَّثَنَا مغيرة بن النعمان، قال: سمعت سعيد بن جبير فذكره.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঁর ছাত্র) সাঈদ ইবন জুবাইর (রহ.) বলেন: কূফাবাসীরা এই আয়াত সম্পর্কে মতবিরোধ করছিল— {আর যে ব্যক্তি কোনো মু'মিনকে ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করবে, তার প্রতিফল হবে জাহান্নাম...} [সূরা নিসা: ৯৩]। তখন আমি ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট ভ্রমণ করে গেলাম এবং তাঁকে এই আয়াত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: এটি সর্বশেষ যা অবতীর্ণ হয়েছে, এরপর কোনো কিছুই এটিকে রহিত (মানসূখ) করেনি।









আল-জামি` আল-কামিল (6634)


6634 - عن سعيد بن جبير قال: قلت لابن عباس: ألمن قتل مؤمنًا متعمِّدًا من توبة؟ قال: لا. قال: فتلوت عليه هذه الآية التي في الفرقان: {وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ} [الفرقان: 68] إلى آخر الآية قال: هذه آية مكية، نسختها آية مدنية {وَمَنْ يَقْتُلْ مُؤْمِنًا مُتَعَمِّدًا فَجَزَاؤُهُ جَهَنَّمُ خَالِدًا} [النساء: 93].

متفق عليه: رواه مسلم في التفسير (20: 3023) من طريق يحيى بن سعيد القطان، عن ابن جريج، حَدَّثَنِي القاسم بن أبي بزّة، عن سعيد بن جبير قال: فذكره. ورواه البخاريّ في التفسير (4762) من وجه آخر عن ابن جريج مختصرًا.

قال النوويّ في شرح مسلم: هذا هو المشهور عن ابن عباس. ورُوي عنه أن له توبة، وجواز المغفرة لقوله تعالى: {وَمَنْ يَعْمَلْ سُوءًا أَوْ يَظْلِمْ نَفْسَهُ ثُمَّ يَسْتَغْفِرِ اللَّهَ يَجِدِ اللَّهَ غَفُورًا رَحِيمًا} [النساء: 110] وهذه الرواية الثانية هي مذهب جميع أهل السنة والصحابة والتابعين ومن بعدهم. وما رُوي عن بعض السلف مما يخالف هذا محمول على التغليظ والتحذير من القتل والتورية في المنع منه. وليس في هذه الآية التي احتج بها ابن عباس نصريح بأنه يخلد، وإنما فيها أنه جزاؤه، ولا يلزم منه أنه يجازي.

وقال غيره: إن قوله تعالى: {وَمَنْ يَقْتُلْ مُؤْمِنًا مُتَعَمِّدًا … } [النساء: 93] مطلق، فيحمل
على من لم يتب، لأن الآية الأخرى مقيدة بالتوبة، ثمّ إن الله تعالى قال: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ} [النساء: 48] فقصر عدم المغفرة بالشرك وحده.




সাঈদ ইবন জুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে কোনো মু'মিনকে হত্যা করে, তার কি তাওবা আছে? তিনি (ইবন আব্বাস) বললেন: না। তিনি (সাঈদ ইবন জুবাইর) বললেন: তখন আমি তাঁর (ইবন আব্বাস-এর) কাছে সূরা ফুরকানের এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলাম: "আর যারা আল্লাহ্‌র সাথে অন্য কোনো ইলাহকে ডাকে না, আর আল্লাহ্‌ যার হত্যা নিষিদ্ধ করেছেন, তাকে যথার্থ কারণ ব্যতীত হত্যা করে না..." [আল-ফুরকান: ৬৮] আয়াতের শেষ পর্যন্ত। তিনি (ইবন আব্বাস) বললেন: এটি মাক্কী আয়াত, যা মাদানী আয়াত দ্বারা মানসূখ (রহিত) হয়ে গেছে: "আর যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে কোনো মু'মিনকে হত্যা করবে, তার শাস্তি হলো জাহান্নাম, সেখানে সে চিরকাল থাকবে।" [আন-নিসা: ৯৩]।









আল-জামি` আল-কামিল (6635)


6635 - عن ابن عباس أن قومًا كانوا قتلوا - فأكثروا، وزنوا فأكثروا، وانتهكوا، فأتوا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالوا: يا محمد! إن الذي تقول وتدعو إليه لحسن، أو تُخبرنا أن لما عملنا كفارةٌ. فأنزل الله عز وجل: {وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ يَلْقَ أَثَامًا (68) يُضَاعَفْ لَهُ الْعَذَابُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَيَخْلُدْ فِيهِ مُهَانًا (69) إِلَّا مَنْ تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ عَمَلًا صَالِحًا فَأُولَئِكَ يُبَدِّلُ اللَّهُ سَيِّئَاتِهِمْ حَسَنَاتٍ} [الفرقان: 68 - 70] قال:"يبدل الله شركهم إيمانًا، وزناهم إحصانًا".

ونزلت: {قُلْ يَاعِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ} [سورة الزمر: 53].

حسن: أخرجه النسائيّ (4003) عن حاجب بن سليمان المنبجيّ، قال: حَدَّثَنَا ابن أبي روَّاد، قال: حَدَّثَنَا ابن جريج، عن عبد الأعلى الثعلبيّ، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن أبي رواد وهو عبد المجيد بن عبد العزيز بن أبي روَّاد مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقد رُويَ من وجه آخر فقال ابنُ جريج: أخبرني يعلى، عن سعيد بن جبير فذكر نحوه أخرجه النسائيّ (4004) عن الحسن بن محمد الزعفرانيّ، قال: حَدَّثَنَا حجَّاج بن محمد، قال: ابن جريج - أخبرني يعلى فذكره وأخرجه الحاكم (2/ 403) من وجه آخر عن ابن جريج بإسناده وقال: صحيح على شرط الشّيخين.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিছু লোক ছিল যারা প্রচুর হত্যা করেছে, প্রচুর ব্যভিচার করেছে এবং সীমালঙ্ঘন করেছে। তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে মুহাম্মাদ! আপনি যা বলেন এবং যেদিকে আহ্বান করেন তা অবশ্যই উত্তম। আপনি কি আমাদের জানাতে পারেন যে আমরা যা করেছি তার কোনো কাফফারা (প্রায়শ্চিত্ত) আছে?

অতঃপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {আর যারা আল্লাহ্‌র সাথে অন্য কোনো উপাস্যকে ডাকে না, আল্লাহ্‌ যার হত্যা নিষিদ্ধ করেছেন, যথার্থ কারণ ছাড়া তাকে হত্যা করে না এবং ব্যভিচার করে না। আর যে ব্যক্তি এগুলো করে সে শাস্তি ভোগ করবে। কিয়ামতের দিন তার শাস্তি দ্বিগুণ করা হবে এবং সেখানে সে লাঞ্ছিত অবস্থায় চিরকাল থাকবে। তবে যারা তওবা করে, ঈমান আনে এবং সৎকাজ করে, আল্লাহ্ তাদের পাপগুলিকে নেকি দ্বারা পরিবর্তন করে দেবেন...} [সূরা আল-ফুরকান: ৬৮-৭০]।

তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: আল্লাহ তাদের শিরককে ঈমানে এবং তাদের যিনাকে (ব্যভিচারকে) সতীত্বে (বা পবিত্রতায়) পরিণত করে দেবেন।

আর (তখন) নাযিল হল: {বলুন, ‘হে আমার বান্দাগণ, যারা নিজেদের ওপর বাড়াবাড়ি করেছ—তোমরা আল্লাহর রহমত থেকে নিরাশ হয়ো না। নিশ্চয় আল্লাহ সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেন। নিশ্চয় তিনি ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।} [সূরা আয-যুমার: ৫৩]।









আল-জামি` আল-কামিল (6636)


6636 - عن عبد الله بن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لن يزال المؤمن في فسحة من دينه ما لم يصب دمًا حرامًا".

صحيح: رواه البخاريّ في الديات (6862)، عن عليّ (هو ابن الجعد) حَدَّثَنَا إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، عن أبيه، عن ابن عمر، فذكره، ورواه البخاريّ أيضًا من قول ابن عمر: إن من ورطات الأمور التي لا مخرج لمن أوقع نفسه فيها الدم الحرام بغير حله.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "মু'মিন ব্যক্তি সর্বদা তার দ্বীনের প্রশস্ততা বা স্বাচ্ছন্দ্যের মধ্যে থাকে, যতক্ষণ না সে কোনো হারাম (অবৈধ) রক্তপাত করে।"

(ইমাম বুখারী আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি হিসেবেও বর্ণনা করেছেন: "নিঃসন্দেহে গুরুতর কঠিন বিষয়সমূহের মধ্যে যা থেকে কেউ নিজেকে রক্ষা করতে পারে না, তা হলো অন্যায়ভাবে রক্তপাত করা।")









আল-জামি` আল-কামিল (6637)


6637 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أكبر الكبائر الإشراك بالله، وقتل النفس، وعقوق الوالدين".

صحيح: رواه البخاريّ في الديات (6870) عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن فراس، عن الشعبيّ، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وفي معناه ما رُوي عن رجل قال: يا رسول الله! ما الكبائر؟ قال:"هن سبع، أعظمهن إشراك
بالله، وقتل النفس بغير حق، وفرار يوم الزحف".

رواه أبو داود (2875) والنسائي (4012) كلاهما من حديث معاذ بن هانئ قال: حدثنا حرب بن شداد، قال: حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن عبد الحميد بن سنان، عن عبيد بن عمير، عن أبيه، أنه حدثه، وكانت له صحبة، أن رجلا قال: فذكره، واللفظ للنسائي، وفي إسناده عبد الحميد بن سنان مجهول.

وأما أبو داود فأحال على حديث أبي هريرة، وقال:"هن تسع". وحديث أبي هريرة:"اجتنبوا السبع الموبقات" وزاد أبو داود:"وعقوق الوالدين المسلمَين، واستحلال البيت الحرام قبلتكم أحياء وأمواتا".




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সবচেয়ে বড় কবীরা গুনাহ হলো আল্লাহর সাথে শরীক করা, কোনো প্রাণকে হত্যা করা এবং পিতামাতার অবাধ্য হওয়া।"









আল-জামি` আল-কামিল (6638)


6638 - عن أبي أيوب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من جاء يعبد الله، لا يشرك به شيئًا، ويقيم الصلاة، ويؤتي الزكاة، ويصوم رمضان، ويجتنب الكبائر فإن له الجنة" وسألوه ما الكبائر؟ قال:"الإشراك بالله، وقتل النفس المسلمة، وفرار يوم الزحف".

حسن: رواه النسائي (4009) وأحمد (23502) والطحاوي في مشكله (896) كلهم من طرق عن بقية بن الوليد، حدثني بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، حدثنا أبو رُهم السمعي، أن أبا أيوب حدثه فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد، وقد توبع في أصل الحديث. رواه ابن حبان في صحيحه (3247) والحاكم (1/ 23) من حديث فُضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة، حدثنا عبد الله بن سلمان الأغرّ، عن أبيه، عن أبي أيوب فذكر الحديث. إلا أن ابن حبان لم يذكر السؤال عن الكبائر. وفي الحاكم: عبيد الله بن سلمان.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولا أعرف له علة" وتعقبه الذهبي فقال:"عبيد الله بن سلمان الأغر خرج له البخاري فقط". وعبد الله وعبيد الله كلاهما يرويان عن أبيه سلمان الأغر، إلا أن عبد الله من رجال مسلم، وعبيد الله من رجال البخاري فتنبه.




আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর ইবাদত করার জন্য আসে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করে না, আর সালাত কায়েম করে, যাকাত প্রদান করে, রমযানের সাওম পালন করে এবং কবীরা গুনাহসমূহ থেকে দূরে থাকে, তার জন্য জান্নাত রয়েছে।" সাহাবীগণ তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: কবীরা গুনাহসমূহ কী? তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শরীক করা, কোনো মুসলিমকে হত্যা করা এবং যুদ্ধের দিন (ময়দান থেকে) পলায়ন করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (6639)


6639 - عن الأحنف بن قيس قال: ذهبت لأنصر هذا الرجل فلقيني أبو بكرة فقال: أين تريد؟ قلت: أنصر هذا الرجل. قال: أرجع، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا التقى المسلمان بسيفيهما فالقاتل والمقتول في النار، فقلت: يا رسول الله! هذا القاتل، فما بال المقتول؟ قال:"إنه كان حريصًا على قتل صاحبه".

متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (31) ومسلم في الفتن (2888) كلاهما من حديث حماد بن زيد، حدثنا أيوب ويونس، عن الحسن، عن الأحنف بن قيس فذكره.

ورواه مسلم من حديث محمد بن جعفر غندر، عن شعبة، عن منصور، عن ربعي بن حراش، عن أبي بكرة عن النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا المسلمان حمل أحدهما على أخيه السلاح، فهما في حر جهنم،
فإذا قتل أحدهما صاحبه دخلاها جميعا" ولكن قال البخاري (7083) وقال غندر حدثنا شعبة، عن منصور، عن ربعي بن حراش، عن أبي بكرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم. ولم يرفعه سفيان عن منصور.

يقول النووي رحمه الله تعالى في شرح مسلم:"واعلم أن الدماء التي جرت بين الصحابة، رضي الله عنهم ليست بداخلة في هذا الوعيد. ومذهب أهل السنة والحق إحسان الظن بهم، والإمساك عما شجر بينهم، وتأويل قتالهم أنهم مجتهدون".




আবু বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঁর নিকট) আহনাফ ইবনে কাইস বলেন: আমি এক ব্যক্তিকে সাহায্য করার জন্য যাচ্ছিলাম। তখন আবু বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার সাথে দেখা করে বললেন, তুমি কোথায় যাচ্ছো? আমি বললাম: আমি এই ব্যক্তিকে সাহায্য করতে যাচ্ছি। তিনি (আবু বাকরা) বললেন: ফিরে যাও, কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন দুই মুসলিম তাদের তলোয়ার নিয়ে মুখোমুখি হয়, তখন হত্যাকারী এবং নিহত—উভয়ই জাহান্নামে যাবে।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এ তো হত্যাকারী (তাই জাহান্নামে যাবে), কিন্তু নিহতের কী হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কারণ সেও তার সঙ্গীকে হত্যা করতে আগ্রহী ছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (6640)


6640 - عن عمرو بن الحَمِق الخزاعي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أمن رجلًا على دمه، فقتله، فإنه يحمل لواء غدْر يوم القيامة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2688)، وأحمد (21946) كلاهما من حديث عبد الملك بن عمير، عن رفاعة بن شداد الفِتياني قال: لولا كلمة سمعتها من عمرو بن الحمق المشبت فيما بين رأس المختار وجسده. فذكر الحديث. هذا لفظ ابن ماجه.

وأما لفظ أحمد: فلما تبينت كذابته هممت، وأيم الله أن أسل سيفي، فأضرب عنقه، حتى ذكرت حديثا حدثنيه عمرو بن الحمق فذكر الحديث.

والكذبة التي أشار إليها رفاعة هي كما رواه أحمد (21947) عن السدي، عن رفاعة الفتياني قال: دخلت على المختار. فألقى لي وسادة، وقال: لولا أن أخي جبريل قام عن هذه الألقيتها لك قال: فأردت أن أضرب عنقه، فذكرت حديثا حدثنيه أخي عمرو بن الحمق قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيما مؤمن أمن مؤمنا على دمه فقتله فأنا من القاتل بريء".

والسدي هو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كريمة السدي حسن الحديث. ومن طريقه رواه أيضا ابن حبان (5982) بدون ذكر القصة.

والمختار هو ابن أبي عبيد الثقفي الكذاب، ولد عام الهجرة وليست له صحبة ولا رؤية. ادعى أن الوحي يأتيه، وأنه يعلم الغيب، حتى قتله مصعب بن الزبير بالكوفة سنة سبع وستين.




আমর ইবনুল হামিক আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি কোনো লোককে তার প্রাণের নিরাপত্তা প্রদান করে, অতঃপর তাকে হত্যা করে, সে কিয়ামতের দিন বিশ্বাসঘাতকতার পতাকা বহন করবে।”