আল-জামি` আল-কামিল
6641 - عن خالد بن دِهقان قال: كنا في غزوة القسطنطينية بذلقية، فأقبل رجل من أهل فلسطين من أشرافهم وخيارهم، يعرفون ذلك له، يقال له هانئ بن كلثوم بن شريك الكناني، فسلم على عبد الله بن أبي زكريا وكان يعرف له حقه فقال لنا خالد: فحدثنا عبد الله بن أبي زكريا قال: سمعت أم الدرداء تقول: سمعت أبا الدرداء يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"كل ذنب عسى الله أن يغفره، إلا من مات مشركًا، أو من قتل مؤمنا متعمدًا" فقال هانئ بن كلثوم: سمعت محمود بن الربيع يحدث عن عبادة بن الصامت، أنه سمعه يحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من قتل مؤمنا فاغتبط بقتله لم يقبل الله منه صرفا ولا عدلًا" قال لنا خالد: ثم حدثني ابن أبي زكريا،
عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"لا يزال المؤمن معنقًا صالحًا ما لم يصب دمًا حرامًا، فإذا أصاب دمًا حرامًا بلّح" وحدّث هانئ بن كلثوم، عن محمود بن الربيع، عن عبادة بن الصامت، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مثله سواء.
صحيح: رواه أبو داود (4270) وصحّحه ابن حبان (5980) والحاكم (4/ 351) والبيهقي (8/ 21) وابن أبي عاصم في الديات (29) كلهم من حديث خالد بن دهقان فذكره.
واللفظ لأبي داود، واختصره البعض، وإسناده صحيح. وخالد بن دهقان القرشي مولاهم أبو المغيرة الدمشقي ثقة، وثّقه ابن معين والدارمي وأبو زرعة ودحيم وغيرهم. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.
وقوله: بلّح: أي بلح الرجل إذا انقطع من الإعياء، فلم يقدر أن يتحرك. وقد أبلحه السير فانقطع فيه، يريد به وقوعه في الهلاك بإصابة الدم الحرام.
قال خالد بن دهقان: سألت يحيى بن يحيى الغسّاني عن قوله:"فاغتبط بقتله" قال: الذين يقاتلون في الفتنة فيقتل أحدهم فيرى أنه على هدى لا يستغفر الله، يعني من ذلك.
ذكره أبو داود (4271) وقال: فاغتبط يصب دمه صبًا.
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (খালিদ ইবন দিহকান বলেন:) আমরা কন্সটান্টিনোপলের (কুসতুনতিনিয়্যা) যুদ্ধে ধালকিয়া নামক স্থানে ছিলাম। তখন ফিলিস্তিনের এক অভিজাত ও শ্রেষ্ঠ ব্যক্তি আমাদের দিকে এগিয়ে এলেন, যার নাম হানী ইবন কুলসূম ইবন শারীক আল-কিনানী। সকলেই তাঁর মর্যাদা স্বীকার করত। তিনি আব্দুল্লাহ ইবন আবী যাকারিয়ার প্রতি সালাম নিবেদন করলেন। আব্দুল্লাহ ইবন আবী যাকারিয়া তাঁর প্রাপ্য মর্যাদা জানতেন।
খালিদ (ইবন দিহকান) বলেন: অতঃপর আব্দুল্লাহ ইবন আবী যাকারিয়া আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করলেন। তিনি বলেন: আমি উম্মু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, তিনি আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "প্রত্যেক পাপই এমন যে আল্লাহ তা ক্ষমা করে দিতে পারেন, তবে যে ব্যক্তি মুশরিক অবস্থায় মৃত্যুবরণ করে অথবা যে ব্যক্তি কোনো মু'মিনকে ইচ্ছাকৃতভাবে হত্যা করে (তার ক্ষেত্রে নয়)।"
অতঃপর হানী ইবন কুলসূম বললেন: আমি মাহমুদ ইবন রাবী'কে উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন যে, তিনি বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মু'মিনকে হত্যা করে এবং তার হত্যায় আনন্দিত হয়, আল্লাহ তা'আলা তার পক্ষ থেকে কোনো 'সরফ' (নফল ইবাদত) এবং 'আদল' (ফরয ইবাদত) কিছুই কবুল করেন না।"
খালিদ (ইবন দিহকান) আমাদের কাছে বললেন: অতঃপর ইবনু আবী যাকারিয়া, উম্মু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের এই হাদীস বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: "মু'মিন ততক্ষণ পর্যন্ত উত্তম ও নেক আমলকারী থাকে, যতক্ষণ না সে অবৈধ রক্তপাত ঘটায়। আর যখন সে অবৈধ রক্তপাত ঘটায়, তখন সে হাঁপিয়ে ওঠে (বা ধ্বংসের দ্বারপ্রান্তে পৌঁছে যায়)।"
আর হানী ইবন কুলসূমও মাহমুদ ইবন রাবী'র সূত্রে উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অনুরূপ হাদীস বর্ণনা করেছেন।
6642 - عن معاوية قال: سمعت رسول الله يقول:"كل ذنب عسى الله أن يغفره إلا الرجل يقتل المؤمن متعمدًا، أو الرجل يموت كافرًا".
حسن: رواه النسائي (3984) وأحمد (16907) وابن أبي عاصم في الديات (27) وصحّحه الحاكم (4/ 351) كلهم من حديث صفوان بن عيسى، عن ثور، عن أبي عون، عن أبي إدريس، قال: سمعت معاوية يخطب - وكان قليل الحديث - قال: سمعته يخطب يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل أبي عون وهو الأنصاري الشامي الأعور فإنه حسن الحديث، فقد روى له عدد، ووثّقه ابن حبان والعجلي، وقال ابن أبي عاصم:"هذا إسناد حسن وضيء".
وقوله:"الرجل يقتل" ظاهر هذا الحديث موافق للقرآن، وبه قال غير واحد من السلف. والجمهور على أنه محمول على التغليظ لقوله تعالى: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ} [النساء: 116].
মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: আল্লাহ তাআলা সম্ভবত সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেবেন, তবে যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে কোনো মুমিনকে হত্যা করে, অথবা যে ব্যক্তি কাফির অবস্থায় মৃত্যুবরণ করে (তাদের গুনাহ ক্ষমা করবেন না)।
6643 - عن عقبة بن عامر الجهني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من لقي الله لا يشرك به شيئا، لم يتندّ بدم حرام دخل الجنة".
صحيح: رواه ابن ماجه (2618) وأحمد (17381) وصحّحه الحاكم (4/ 351 - 352) كلهم من طريق وكيع، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عبد الرحمن بن عائذ، عن عقبة بن عامر فذكره.
قال الحاكم: وقد قيل: عن إسماعيل، عن قيس بن أبي حازم، عن جرير ثم أسنده من حديث
الحسن بن سفيان، ثنا محمد بن عبد الله بن نمير، ثنا القاسم بن الوليد الهمداني، ثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن جرير بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من مات لا يشرك بالله شيئا، ولم يتند بدم حرام دخل من أي أبواب الجنة شاء".
قال الذهبي: الإسناد الأول أصح.
وقال البوصيري:"هذا إسناد صحيح إن كان عبد الرحمن بن عائذ سمع من عقبة بن عامر، وقد قيل: إن روايته عنه مرسلة".
كذا أظهر الشك مع أن عبد الرحمن بن عائذ حمصي، وعقبة بن عامر عاش في الشام وتوفي فيه عام (58 هـ) فلقاءهما ممكن، وذكر الواسطة في بعض الأحاديث بينما لا يمنع لقاءهما، ثم هو ليس بمدلس، فعنعنته تحمل على الاتصال على رأي الجمهور.
উকবাহ ইবন আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক না করে তাঁর সাক্ষাৎ করবে এবং অবৈধ রক্তপাত (হত্যার) দ্বারা যার হাত কলঙ্কিত হবে না, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
6644 - عن عبد الله بن مسعود أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"سباب المسلم فسوق وقتاله كفر".
متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (48) ومسلم في الإيمان (64) كلاهما من حديث شعبة، عن زبيد، عن أبي وائل، عن عبد الله بن مسعود فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মুসলিমকে গালি দেওয়া ফিসক (আল্লাহর অবাধ্যতা বা গুনাহ) এবং তার সাথে যুদ্ধ করা কুফর।"
6645 - عن سعد بن أبي وقاص أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قتال المسلم كفر، وسبابه فسق".
صحيح: رواه أحمد (1537) والبخاري في الأدب المفرد (429) وابن نصر في تعظيم قدر الصلاة (1099) كلهم من حديث زكريا بن أبي زائدة، عن أبي إسحاق، عن محمد بن سعد بن مالك، عن أبيه فذكره.
وإسناده صحيح. ورواه ابن ماجه (3941) من حديث شريك، عن أبي إسحاق بإسناده مثله. وشريك هو ابن عبد الله النخعي سيء الحفظ، ولكنه لا بأس به في المتابعة كما هنا.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "কোনো মুসলিমের সাথে লড়াই করা কুফর এবং তাকে গালি দেওয়া ফিসক।"
6646 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يجيء الرجل آخذًا بيد الرجل، فيقول: يا رب! هذا قتلني، فيقول الله له: لم قتلته؟ فيقول: قتلته لتكون العزة لك. فيقول: فإنها لي، ويجيء الرجل آخذًا بيد الرجل فيقول: إن هذا قتلني. فيقول الله له: لم قتلته؟ فيقول: لتكون العزة لفلان. فيقول: إنها ليست لفلان فيبوء بإثمه".
صحيح: رواه النسائي (3997) والبيهقي (8/ 191) كلاهما من حديث معتمر، عن أبيه، عن الأعمش، عن شقيق بن سلمة، عن عمرو بن شرحبيل، عن عبد الله بن مسعود فذكره. وإسناده صحيح.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এক ব্যক্তি অন্য এক ব্যক্তির হাত ধরে উপস্থিত হবে এবং বলবে, ‘হে আমার রব! এ আমাকে হত্যা করেছে।’ আল্লাহ তাকে জিজ্ঞেস করবেন, ‘তুমি কেন তাকে হত্যা করেছ?’ সে বলবে, ‘আমি তাকে হত্যা করেছি যেন মর্যাদা আপনারই হয়।’ আল্লাহ বলবেন, ‘তা তো আমারই জন্য।’ অন্য আরেক ব্যক্তি অপর এক ব্যক্তির হাত ধরে উপস্থিত হবে এবং বলবে, ‘নিশ্চয় এ আমাকে হত্যা করেছে।’ আল্লাহ তাকে জিজ্ঞেস করবেন, ‘তুমি কেন তাকে হত্যা করেছ?’ সে বলবে, ‘যেন অমুকের মর্যাদা প্রতিষ্ঠিত হয়।’ আল্লাহ বলবেন, ‘তা অমুকের জন্য নয়।’ ফলে সে তার পাপভার বহন করে ফিরে আসবে।
6647 - عن أبي عمران قال: قلت لجندب: إني قد بايعت هؤلاء - يعني ابن الزبير - وإنهم يريدون أن أخرج معهم إلى الشام. فقال: أمسك. فقلت: إنهم يأبون. فقال: افتدِ بمالك. قال: قلت: إنهم يأبون إلا أن أضرب معهم بالسيف. فقال جندب:
حدثني فلان أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يجيء المقتول بقاتله يوم القيامة. فيقول: يا رب! سلْ هذا فيم قتلني؟" قال شعبة: فأحسبه قال: فيقول: علام قتلته؟ فيقول: قتلته على ملك فلان" فقال جندب: فاتقها.
صحيح: رواه النسائي (3998) وأحمد (16600) كلاهما من حديث حجاج بن محمد المصيصي قال: حدثنا شعبة، عن أبي عمران فذكره.
واللفظ لأحمد، ولفظ النسائي مختصر إلا أنه لم يذكر شك شعبة. وقد رواه أيضا حماد بن سلمة بدون الشك عن أبي عمران وهو عبد الملك بن حبيب الأزدي الجوني، فذكره.
رواه أحمد (23165) والطبراني في الكبير (1677) وكذا رواه البيهقي (9/ 191) من وجه آخر عن أبي عمران وفيه قال جندب: حدثني رجل، والله ما كذبني أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. وإسناده صحيح.
জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু ইমরান বলেন, আমি জুনদুবকে বললাম: আমি এই লোকদের—অর্থাৎ ইবনু যুবাইরকে—বায়আত করেছি এবং তারা চায় যে আমি তাদের সাথে সিরিয়ার দিকে যাই। তিনি বললেন: বিরত থাকো। আমি বললাম: কিন্তু তারা (আমাকে বিরত থাকতে দিতে) মানতে নারাজ। তিনি বললেন: তোমার সম্পদ দিয়ে নিজেকে মুক্ত করো। আমি বললাম: তারা তরবারি নিয়ে তাদের সাথে যুদ্ধ করা ছাড়া কিছুতেই রাজি হবে না। তখন জুনদুব বললেন: অমুক ব্যক্তি আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিহত ব্যক্তি কিয়ামতের দিন তার হত্যাকারীকে নিয়ে আসবে। সে বলবে: হে আমার রব! একে জিজ্ঞেস করুন, সে কেন আমাকে হত্যা করেছে?" (বর্ণনাকারী) শু’বা বলেন, আমার মনে হয় তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তখন (আল্লাহ) বলবেন: তুমি তাকে কিসের জন্য হত্যা করলে? সে (ঘাতক) বলবে: আমি তাকে অমুক নেতার রাজত্বের জন্য হত্যা করেছি। তখন জুনদুব বললেন: সুতরাং তুমি তা থেকে বেঁচে থাকো।
6648 - عن ابن عباس أنه سئل عن رجل قتل مؤمنًا، ثم تاب، وآمن وعمل صالحًا ثم اهتدى قال: ويحك وأنى له الهدي؟ سمعت نبيكم يقول:"يجيء المقتول متعلقا بالقاتل يقول: يا رب! سلْ هذا فيم قتلني؟" والله لقد أنزلها الله على نبيكم، وما نسخها بعد إذ أنزلها. قال: ويحك، وأنى له الهدي؟
حسن: رواه ابن ماجه (2621) والنسائي (3999) وأحمد (1941) كلهم من طريق سفيان بن عيينة، عن عمار بن معاوية الدهني، عن سالم بن أبي الجعد قال: سئل ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمار بن معاوية الدهني البجلي فإنه حسن الحديث، وقد توبع أيضا فرواه ابن أبي عاصم في الديات (33) عن عمار الدهني وقرنه بيحيى الجابر، كما أن سالم بن أبي الجعد صرّح بالسماع من ابن عباس. وللحديث طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها. فقد رواه الترمذي (3029) والنسائي (4005) من وجه آخر عن ورقاء بن عمر، عن عمرو بن دينار، عن ابن عباس نحوه.
وقال الترمذي:"حديث حسن، وروى بعضهم هذا الحديث عن عمرو بن دينار عن ابن عباس ولم يرفعه".
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তাঁকে একজন লোক সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিল, যে একজন মুমিনকে হত্যা করেছে, অতঃপর সে তওবা করেছে, ঈমান এনেছে এবং নেক কাজ করেছে, অতঃপর সে হেদায়াত প্রাপ্ত হয়েছে। তিনি বললেন: তোমার জন্য আফসোস! তার জন্য হেদায়াত কোথায়? আমি তোমাদের নবীকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতে শুনেছি: "নিহত ব্যক্তি তার হত্যাকারীর সাথে ঝুলে আসা অবস্থায় আগমন করবে এবং বলবে: হে আমার প্রতিপালক! একে জিজ্ঞাসা করুন, সে আমাকে কেন হত্যা করেছে?" আল্লাহর শপথ! আল্লাহ তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর এটি নাযিল করেছেন এবং নাযিলের পর তা রহিত করেননি। তিনি (পুনরায়) বললেন: তোমার জন্য আফসোস! তার জন্য হেদায়াত কোথায়?
6649 - عن بريدة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قتل المؤمن أعظم عند الله من زوال الدنيا".
حسن: رواه النسائي (3990) عن الحسن بن إسحاق المروزي ثقة، حدثني خالد بن خداش، قال: حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن بشير بن المهاجر، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في بشير بن المهاجر الكوفي الغنوي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في الشواهد. وخالد بن خداش وحاتم بن إسماعيل أيضا حسنا الحديث وفيهما كلام خفيف.
ومن شواهده ما رُوي عن عبد الله بن عمرو:"لزوال الدنيا أهون على الله من قتل رجل مسلم" روي مرفوعا وموقوفا.
أما المرفوع فرواه الترمذي (1395) والنسائي (3987) كلاهما من حديث ابن أبي عدي، عن شعبة، عن يعلى بن عطاء، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
وأما الموقوف فرواه محمد بن جعفر، عن شعبة بإسناده ولم يرفعه. ومن طريقه رواه أيضا الترمذي (1395 م) والنسائي (3988) قال الترمذي:"وهذا أصح من حديث ابن أبي عدي (عن شعبة)". انتهينا
وللحديث إسناد آخر وهو ما رواه النسائي (3986) عن محمد بن معاوية بن مالج، قال: حدثنا محمد بن سلمة الحراني، عن ابن إسحاق، عن إبراهيم بن مهاجر، عن إسماعيل مولى عبد الله بن عمرو، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده لقتل مؤمن أعظم عند الله من زوال الدنيا".
قال النسائي:"إبراهيم بن مهاجر ليس بالقوي".
وقال ابن أبي حاتم في"علله" (2/ 423): سألت أبي وأبا زرعة عن حديث رواه الحكم بن موسى، عن محمد بن سلمة، عن ابن إسحاق، عن إبراهيم بن مهاجر، عن إسماعيل مولى عبد الله بن عمرو، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث.
فقالا:"هكذا رواه الحكم، والحرانيون يدخلون بين ابن إسحاق وبين إبراهيم بن مهاجر الحسن بن عمارة". انتهى
والحسن بن عمارة متروك الحديث.
ومن شواهده ما رُوي عن البراء بن عازب مرفوعا:"لزوال الدنيا أهون على الله من قتل مؤمن بغير حق".
رواه ابن أبي عاصم في الديات (7) وابن عدي في الكامل (3/ 1004) والبيهقي في شعب الإيمان (4/ 345) كلهم من حديث هشام بن عمار، عن الوليد بن مسلم، قال: ثنا روح بن جناح، عن أبي الجهم الجوزجاني، عن البراء بن عازب فذكره.
وروح بن جناح الأموي مولاهم مختلف فيه. فوثقه الدارمي، وضعفه النسائي وغيره. وقال ابن حبان: منكر الحديث جدًّا، وفي التقريب: ضعيف، واتهمه ابن حبان.
ووهم ابن ماجه (2619) فجعل مكانه أخاه"مروان بن جناح" وهو أحسن حالا من أخيه، ولذا حسّنه المنذري في الترغيب والترهيب (3709) وقال ابن الملقن في البدر المنير (8/ 348):"رواه ابن ماجه بإسناد صحيح". وقال البوصيري في زوائد ابن ماجه:"إسناده صحيح، رجاله ثقات" وبناء على قولهم صحّحته في أقضية رسول الله صلى الله عليه وسلم (1/ 88) فتنبه.
ورواه الأصبهاني في الترغيب والترهيب (3/ 187) بإسناد آخر عن البراء بن عازب وزاد في آخره:"ولو أن أهل السماوات وأهل أرضه اشتركوا في دم مؤمن لأدخلهم الله النار" وفيه رجال لا يعرفون.
وأما ما روي عن أبي سعيد الخدري وأبي هريرة يذكران عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لو أن أهل السماء والأرض اشتركوا في دم مؤمن لأكبهم الله في النار" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (1398) عن الحسين بن حريث قال: حدثنا الفضل بن موسى، عن الحسين بن واقد، عن يزيد الرقاشي قال: حدثنا أبو الحكم البجلي قال: سمعت أبا سعيد وأبا هريرة فذكراه.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب" أي ضعيف.
فإن فيه يزيد الرقاشي وهو ابن أبان القاص ضعيف باتفاق أهل العلم وكان زاهدا واعظا بكاءً.
وفي الباب ما رُوي بلفظ:"من أعان على قتل مسلم ولو بشطر كلمة لقي الله وهو مكتوب بين عينيه: آيس من رحمة الله" روي عن ابن عباس وأبي هريرة، وعمر بن الخطاب وكلها معلولة.
انظر تخاريجها في البدر المنير (8/
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর কাছে একজন মুমিনকে হত্যা করা দুনিয়া বিলুপ্ত হয়ে যাওয়ার চেয়েও অধিক গুরুতর।"
6650 - عن عبد الله بن مسعود، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تقتل نفس ظلمًا، إلا كان على ابن آدم الأول كفل من دمها، لأنه كان أول من سنّ القتل".
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6867) ومسلم في القسامة (27: 1677) كلاهما من طريق الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن مسروق، عن عبد الله قال فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “অন্যায়ভাবে কোনো প্রাণ হত্যা করা হলে, তার রক্তের (হত্যার) পাপের একটি অংশ আদম (আঃ)-এর প্রথম সন্তানের উপর বর্তাবে। কারণ সে-ই প্রথম হত্যার প্রচলন করেছিল।” (মুত্তাফাকুন আলাইহি)।
6651 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أول ما يُقضى بين الناس في الدماء".
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6864) ومسلم في القسامة (1678) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي وائل، عن ابن مسعود، فذكره.
وهذا لا يعارض حديث أبي هريرة مرفوعًا:"أول شيء ما يحاسب به العبد يوم القيامة صلاته المكتوبة، فإن صلحت وإلا زيد فيها من تطوعه، ثم يفعل بسائر الأعمال المفروضة كذلك".
أولا: إنه حديث مضطرب.
رواه ابن ماجه (1425) من حديث علي بن زيد، عن أنس بن حكيم الضبي قال: قال لي أبو هريرة فذكره.
ومن هذا الطريق رواه أيضا أحمد (7902) وفيه علي بن زيد وهو ابن جدعان ضعيف. وأنس بن حكيم الضبي مجهول.
ورواه الترمذي (413) والنسائي (1/ 232) من طريق الحسن البصري، عن حريث بن قبيصة، عن أبي هريرة فذكر نحوه. وحريث بن قبيصة مجهول.
وله طريق آخر رواه أحمد (9494) وأبو داود (8614) والحاكم (1/ 262) والبيهقي (2/ 382) كلهم من طريق الحسن، عن أنس بن حكيم الضبي، عن أبي هريرة فذكره. والحسن هو الإمام البصري المعروف وهو مدلس، وأنس بن حكيم مجهول كما سبق. وقد أشار الدارقطني في العلل (8/ 247 - 249) هـ إلى هذا الاختلاف وقال:"وأشبه بالصواب قول من قال: عن الحسن، عن أنس بن حكيم، عن أبي هريرة".
وثانيا: وعلى فرض صحة هذا الحديث فإنه محمول على عبادة الخالق، وحديث ابن مسعود محمول على معاملات العبد بالعبد.
আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "মানুষের মাঝে সর্বপ্রথম যে বিষয়ে ফয়সালা করা হবে তা হলো রক্তপাত (হত্যা)।"
6652 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال رجل: يا رسول الله! أي الذنب أكبر عند الله؟ قال:"أن تدعو الله ندًّا وهو خلقك" قال: ثم أي؟ قال:"ثم أن تقتل ولدك خشية أن يطعم معك" قال: ثم أي؟ قال:"ثم أن تزاني حليلة جارك" فأنزل الله تصديقها: {وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ يَلْقَ أَثَامًا} [الفرقان: 68].
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6861) ومسلم في الإيمان (142: 86) كلاهما من طريق جرير، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن عمرو بن شرحبيل، قال: قال عبد الله، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করলো: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আল্লাহর কাছে সবচেয়ে বড় গুনাহ কোনটি? তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে কাউকে অংশীদার সাব্যস্ত করা, অথচ তিনিই তোমাকে সৃষ্টি করেছেন।" লোকটি বললো: তারপর কোনটি? তিনি বললেন: "তারপর এই যে, তুমি তোমার সন্তানকে হত্যা করবে এই ভয়ে যে সে তোমার সাথে আহার করবে (তোমার রিযিকে ভাগ বসাবে)।" লোকটি বললো: তারপর কোনটি? তিনি বললেন: "তারপর এই যে, তুমি তোমার প্রতিবেশীর স্ত্রীর সাথে যেনা (ব্যভিচার) করবে।" অতঃপর আল্লাহ এর সমর্থনে এই আয়াত নাযিল করলেন: "আর যারা আল্লাহর সাথে অন্য কোনো ইলাহকে ডাকে না, আর আল্লাহ যার হত্যা নিষিদ্ধ করেছেন, যথার্থ কারণ ছাড়া তাকে হত্যা করে না, আর যেনা (ব্যভিচার) করে না। আর যে কেউ তা করবে, সে প্রতিফল ভোগ করবে।" (সূরা আল-ফুরকান: ৬৮)।
6653 - عن المغيرة بن شعبة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الله حرم عليكم: عقوق الأمهات، ووأد البنات، ومنع وهات. وكره لكم: قيل وقال، وكثرة السؤال، وإضاعة المال".
متفق عليه: رواه البخاري في الخصومات (2408)، ومسلم في الأقضية (12: 593) كلاهما من طريق جرير، عن منصور، عن الشعبي، عن وزاد مولى المغيرة بن شعبة، عن المغيرة بن شعبة، فذكره.
قوله:"وأد البنات": هو دفنهن في حياتهن، فيمتن تحت التراب.
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের জন্য হারাম করেছেন: মায়েদের অবাধ্যতা, কন্যাসন্তানকে জীবন্ত দাফন করা এবং (পাওনা) আটকে রাখা ও (অন্যের কাছে) দাবি করা। আর তিনি তোমাদের জন্য অপছন্দ করেছেন: অনর্থক কথা বলাবলি (গুজব), বেশি প্রশ্ন করা এবং সম্পদ নষ্ট করা।"
6654 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اجتنبوا السبع الموبقات. قالوا: يا رسول الله، وما هن؟ قال: الشرك بالله، والسحر، وقتل النفس التي حرم الله إلا بالحق، وأكل الربا، وأكل مال اليتيم، والتولي يوم الزحف، وقذف المحصنات المؤمنات الغافلات".
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6857)، ومسلم في الإيمان (89) كلاهما من طريق سلمان بن بلال، عن ثور بن زيد، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাতটি ধ্বংসকারী (কবীরা গুনাহ) বর্জন করো।" সাহাবীরা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! সেগুলো কী কী?" তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, যাদু করা, আল্লাহ তাআলা যাকে হত্যা করা হারাম করেছেন, ন্যায়সঙ্গত কারণ ব্যতীত তাকে হত্যা করা, সুদ খাওয়া, এতিমের সম্পদ গ্রাস করা, যুদ্ধের দিন (শত্রুর মোকাবেলার সময়) পিঠ ফিরিয়ে পালিয়ে যাওয়া এবং সতী-সাধ্বী, সরলমনা মুমিন মহিলাদের প্রতি অপবাদ দেওয়া।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)
6655 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أكبر الكبائر الإشراك بالله، وقتل النفس، وعقوق الوالدين، وقول الزور أو قال: وشهادة الزور".
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6871) ومسلم في الإيمان (88) كلاهما من طريق شعبة، أخبرنا عبيد الله بن أبي بكر، عن أنس، فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: সবচেয়ে বড় কবীরা গুনাহ হলো আল্লাহর সাথে শিরক করা, অন্যায়ভাবে মানুষ হত্যা করা, মাতা-পিতার অবাধ্য হওয়া, এবং মিথ্যা কথা বলা, অথবা তিনি বললেন: মিথ্যা সাক্ষ্য দেওয়া।
6656 - عن ابن عباس، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أبغض الناس إلى الله ثلاثة: ملحد في الحرم، ومبتغ في الإسلام سنة الجاهلية، ومطَّلِب دم امرئ بغير حق ليهريق دمه".
صحيح: رواه البخاري في الديات (6882) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن عبد الله بن أبي حسين، حدثنا نافع بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহর নিকট সবচেয়ে ঘৃণিত ব্যক্তি হলো তিনজন: (১) যে হারামের (পবিত্র এলাকার) মধ্যে ধর্মদ্রোহিতা বা নাস্তিকতা করে, (২) যে ইসলামের মধ্যে জাহিলিয়াতের প্রথা প্রতিষ্ঠা করতে চায়, এবং (৩) যে ব্যক্তি অন্যায়ভাবে কারো রক্ত ঝরানোর উদ্দেশ্যে তার রক্তের (প্রতিশোধ বা মূল্য) তালাশ করে।
6657 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"سباب المسلم فسوق، وقتاله كفر".
متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (48) ومسلم في الإيمان (64) كلاهما من حديث شعبة، عن زبيد، عن أبي وائل، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "কোন মুসলমানকে গালি দেওয়া ফাসেকী (পাপাচার) এবং তার সাথে যুদ্ধ করা কুফরি।"
6658 - عن جرير، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال له في حجة الوداع:"استنصت الناس" فقال: الا ترجعوا بعدي كفارا يضرب بعضكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في العلم (121) ومسلم في الإيمان (65) كلاهما من حديث شعبة، قال: أخبرني علي بن مدركة، عن أبي زرعة، عن جده جرير، فذكره.
জرير (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিদায় হজ্জের সময় তাঁকে বললেন: "মানুষকে চুপ থাকতে বলো/মনোযোগী হতে বলো।" অতঃপর তিনি বললেন: "সাবধান! তোমরা যেন আমার পরে এমন কাফির হয়ে ফিরে যেও না যে, তোমাদের একে অপরের ঘাড়/গলা কাটবে।"
6659 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ويلكم أو ويحكم - قال شعبة: شك هو - لا ترجعوا بعدي كفارًا، يضرب بعضكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في الأدب (6166) ومسلم في الإيمان (66) كلاهما من حديث شعبة، عن واقد بن محمد، أنه سمع أباه يحدث عن عبد الله بن عمر، فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের জন্য দুর্ভোগ (অথবা তোমাদের প্রতি ধিক্কার)! – শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: (রাবী) এ ব্যাপারে সন্দেহ করেছেন – তোমরা আমার পরে এমন কুফরি অবস্থায় ফিরে যেয়ো না যে, তোমরা একে অপরের গর্দান মারবে (অর্থাৎ হত্যা করবে)।"
6660 - عن أبي بكرة، قال: خطبنا النبي صلى الله عليه وسلم يوم النحر، فذكر الحديث وفي آخره: قال:"اللهم اشهد، فليبلغ الشاهد الغائب، فرب مبلغ أوعى من سامع، فلا ترجعوا بعدي كفارًا، يضرب بعضكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1741) ومسلم في القسامة (31: 1679) كلاهما من طريق أبي عامر عبد الملك بن عمر، حدثنا قرة بن خالد، حدثنا محمد بن سيرين، أخبرني عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبي بكرة، فذكره.
আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, কুরবানীর দিন (নাহরের দিন) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন। অতঃপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন এবং এর শেষে বললেন: "হে আল্লাহ! তুমি সাক্ষী থাকো। উপস্থিত ব্যক্তি যেন অনুপস্থিত ব্যক্তিকে (এই বার্তা) পৌঁছিয়ে দেয়। কেননা অনেক সময় যার কাছে পৌঁছানো হয় সে শ্রবণকারীর চেয়ে অধিক সংরক্ষণকারী (বা উপলব্ধিকারী) হয়। সুতরাং আমার পরে তোমরা একে অপরের ঘাড়ের উপর আঘাত করে (একে অপরকে হত্যা করে) কাফির হয়ে যেও না।"