আল-জামি` আল-কামিল
6648 - عن ابن عباس أنه سئل عن رجل قتل مؤمنًا، ثم تاب، وآمن وعمل صالحًا ثم اهتدى قال: ويحك وأنى له الهدي؟ سمعت نبيكم يقول:"يجيء المقتول متعلقا بالقاتل يقول: يا رب! سلْ هذا فيم قتلني؟" والله لقد أنزلها الله على نبيكم، وما نسخها بعد إذ أنزلها. قال: ويحك، وأنى له الهدي؟
حسن: رواه ابن ماجه (2621) والنسائي (3999) وأحمد (1941) كلهم من طريق سفيان بن عيينة، عن عمار بن معاوية الدهني، عن سالم بن أبي الجعد قال: سئل ابن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمار بن معاوية الدهني البجلي فإنه حسن الحديث، وقد توبع أيضا فرواه ابن أبي عاصم في الديات (33) عن عمار الدهني وقرنه بيحيى الجابر، كما أن سالم بن أبي الجعد صرّح بالسماع من ابن عباس. وللحديث طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها. فقد رواه الترمذي (3029) والنسائي (4005) من وجه آخر عن ورقاء بن عمر، عن عمرو بن دينار، عن ابن عباس نحوه.
وقال الترمذي:"حديث حسن، وروى بعضهم هذا الحديث عن عمرو بن دينار عن ابن عباس ولم يرفعه".
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তাঁকে একজন লোক সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিল, যে একজন মুমিনকে হত্যা করেছে, অতঃপর সে তওবা করেছে, ঈমান এনেছে এবং নেক কাজ করেছে, অতঃপর সে হেদায়াত প্রাপ্ত হয়েছে। তিনি বললেন: তোমার জন্য আফসোস! তার জন্য হেদায়াত কোথায়? আমি তোমাদের নবীকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতে শুনেছি: "নিহত ব্যক্তি তার হত্যাকারীর সাথে ঝুলে আসা অবস্থায় আগমন করবে এবং বলবে: হে আমার প্রতিপালক! একে জিজ্ঞাসা করুন, সে আমাকে কেন হত্যা করেছে?" আল্লাহর শপথ! আল্লাহ তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর এটি নাযিল করেছেন এবং নাযিলের পর তা রহিত করেননি। তিনি (পুনরায়) বললেন: তোমার জন্য আফসোস! তার জন্য হেদায়াত কোথায়?
6649 - عن بريدة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قتل المؤمن أعظم عند الله من زوال الدنيا".
حسن: رواه النسائي (3990) عن الحسن بن إسحاق المروزي ثقة، حدثني خالد بن خداش، قال: حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن بشير بن المهاجر، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في بشير بن المهاجر الكوفي الغنوي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في الشواهد. وخالد بن خداش وحاتم بن إسماعيل أيضا حسنا الحديث وفيهما كلام خفيف.
ومن شواهده ما رُوي عن عبد الله بن عمرو:"لزوال الدنيا أهون على الله من قتل رجل مسلم" روي مرفوعا وموقوفا.
أما المرفوع فرواه الترمذي (1395) والنسائي (3987) كلاهما من حديث ابن أبي عدي، عن شعبة، عن يعلى بن عطاء، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
وأما الموقوف فرواه محمد بن جعفر، عن شعبة بإسناده ولم يرفعه. ومن طريقه رواه أيضا الترمذي (1395 م) والنسائي (3988) قال الترمذي:"وهذا أصح من حديث ابن أبي عدي (عن شعبة)". انتهينا
وللحديث إسناد آخر وهو ما رواه النسائي (3986) عن محمد بن معاوية بن مالج، قال: حدثنا محمد بن سلمة الحراني، عن ابن إسحاق، عن إبراهيم بن مهاجر، عن إسماعيل مولى عبد الله بن عمرو، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده لقتل مؤمن أعظم عند الله من زوال الدنيا".
قال النسائي:"إبراهيم بن مهاجر ليس بالقوي".
وقال ابن أبي حاتم في"علله" (2/ 423): سألت أبي وأبا زرعة عن حديث رواه الحكم بن موسى، عن محمد بن سلمة، عن ابن إسحاق، عن إبراهيم بن مهاجر، عن إسماعيل مولى عبد الله بن عمرو، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث.
فقالا:"هكذا رواه الحكم، والحرانيون يدخلون بين ابن إسحاق وبين إبراهيم بن مهاجر الحسن بن عمارة". انتهى
والحسن بن عمارة متروك الحديث.
ومن شواهده ما رُوي عن البراء بن عازب مرفوعا:"لزوال الدنيا أهون على الله من قتل مؤمن بغير حق".
رواه ابن أبي عاصم في الديات (7) وابن عدي في الكامل (3/ 1004) والبيهقي في شعب الإيمان (4/ 345) كلهم من حديث هشام بن عمار، عن الوليد بن مسلم، قال: ثنا روح بن جناح، عن أبي الجهم الجوزجاني، عن البراء بن عازب فذكره.
وروح بن جناح الأموي مولاهم مختلف فيه. فوثقه الدارمي، وضعفه النسائي وغيره. وقال ابن حبان: منكر الحديث جدًّا، وفي التقريب: ضعيف، واتهمه ابن حبان.
ووهم ابن ماجه (2619) فجعل مكانه أخاه"مروان بن جناح" وهو أحسن حالا من أخيه، ولذا حسّنه المنذري في الترغيب والترهيب (3709) وقال ابن الملقن في البدر المنير (8/ 348):"رواه ابن ماجه بإسناد صحيح". وقال البوصيري في زوائد ابن ماجه:"إسناده صحيح، رجاله ثقات" وبناء على قولهم صحّحته في أقضية رسول الله صلى الله عليه وسلم (1/ 88) فتنبه.
ورواه الأصبهاني في الترغيب والترهيب (3/ 187) بإسناد آخر عن البراء بن عازب وزاد في آخره:"ولو أن أهل السماوات وأهل أرضه اشتركوا في دم مؤمن لأدخلهم الله النار" وفيه رجال لا يعرفون.
وأما ما روي عن أبي سعيد الخدري وأبي هريرة يذكران عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لو أن أهل السماء والأرض اشتركوا في دم مؤمن لأكبهم الله في النار" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (1398) عن الحسين بن حريث قال: حدثنا الفضل بن موسى، عن الحسين بن واقد، عن يزيد الرقاشي قال: حدثنا أبو الحكم البجلي قال: سمعت أبا سعيد وأبا هريرة فذكراه.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب" أي ضعيف.
فإن فيه يزيد الرقاشي وهو ابن أبان القاص ضعيف باتفاق أهل العلم وكان زاهدا واعظا بكاءً.
وفي الباب ما رُوي بلفظ:"من أعان على قتل مسلم ولو بشطر كلمة لقي الله وهو مكتوب بين عينيه: آيس من رحمة الله" روي عن ابن عباس وأبي هريرة، وعمر بن الخطاب وكلها معلولة.
انظر تخاريجها في البدر المنير (8/
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর কাছে একজন মুমিনকে হত্যা করা দুনিয়া বিলুপ্ত হয়ে যাওয়ার চেয়েও অধিক গুরুতর।"
6650 - عن عبد الله بن مسعود، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تقتل نفس ظلمًا، إلا كان على ابن آدم الأول كفل من دمها، لأنه كان أول من سنّ القتل".
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6867) ومسلم في القسامة (27: 1677) كلاهما من طريق الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن مسروق، عن عبد الله قال فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “অন্যায়ভাবে কোনো প্রাণ হত্যা করা হলে, তার রক্তের (হত্যার) পাপের একটি অংশ আদম (আঃ)-এর প্রথম সন্তানের উপর বর্তাবে। কারণ সে-ই প্রথম হত্যার প্রচলন করেছিল।” (মুত্তাফাকুন আলাইহি)।
6651 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أول ما يُقضى بين الناس في الدماء".
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6864) ومسلم في القسامة (1678) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي وائل، عن ابن مسعود، فذكره.
وهذا لا يعارض حديث أبي هريرة مرفوعًا:"أول شيء ما يحاسب به العبد يوم القيامة صلاته المكتوبة، فإن صلحت وإلا زيد فيها من تطوعه، ثم يفعل بسائر الأعمال المفروضة كذلك".
أولا: إنه حديث مضطرب.
رواه ابن ماجه (1425) من حديث علي بن زيد، عن أنس بن حكيم الضبي قال: قال لي أبو هريرة فذكره.
ومن هذا الطريق رواه أيضا أحمد (7902) وفيه علي بن زيد وهو ابن جدعان ضعيف. وأنس بن حكيم الضبي مجهول.
ورواه الترمذي (413) والنسائي (1/ 232) من طريق الحسن البصري، عن حريث بن قبيصة، عن أبي هريرة فذكر نحوه. وحريث بن قبيصة مجهول.
وله طريق آخر رواه أحمد (9494) وأبو داود (8614) والحاكم (1/ 262) والبيهقي (2/ 382) كلهم من طريق الحسن، عن أنس بن حكيم الضبي، عن أبي هريرة فذكره. والحسن هو الإمام البصري المعروف وهو مدلس، وأنس بن حكيم مجهول كما سبق. وقد أشار الدارقطني في العلل (8/ 247 - 249) هـ إلى هذا الاختلاف وقال:"وأشبه بالصواب قول من قال: عن الحسن، عن أنس بن حكيم، عن أبي هريرة".
وثانيا: وعلى فرض صحة هذا الحديث فإنه محمول على عبادة الخالق، وحديث ابن مسعود محمول على معاملات العبد بالعبد.
আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "মানুষের মাঝে সর্বপ্রথম যে বিষয়ে ফয়সালা করা হবে তা হলো রক্তপাত (হত্যা)।"
6652 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال رجل: يا رسول الله! أي الذنب أكبر عند الله؟ قال:"أن تدعو الله ندًّا وهو خلقك" قال: ثم أي؟ قال:"ثم أن تقتل ولدك خشية أن يطعم معك" قال: ثم أي؟ قال:"ثم أن تزاني حليلة جارك" فأنزل الله تصديقها: {وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ يَلْقَ أَثَامًا} [الفرقان: 68].
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6861) ومسلم في الإيمان (142: 86) كلاهما من طريق جرير، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن عمرو بن شرحبيل، قال: قال عبد الله، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করলো: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আল্লাহর কাছে সবচেয়ে বড় গুনাহ কোনটি? তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে কাউকে অংশীদার সাব্যস্ত করা, অথচ তিনিই তোমাকে সৃষ্টি করেছেন।" লোকটি বললো: তারপর কোনটি? তিনি বললেন: "তারপর এই যে, তুমি তোমার সন্তানকে হত্যা করবে এই ভয়ে যে সে তোমার সাথে আহার করবে (তোমার রিযিকে ভাগ বসাবে)।" লোকটি বললো: তারপর কোনটি? তিনি বললেন: "তারপর এই যে, তুমি তোমার প্রতিবেশীর স্ত্রীর সাথে যেনা (ব্যভিচার) করবে।" অতঃপর আল্লাহ এর সমর্থনে এই আয়াত নাযিল করলেন: "আর যারা আল্লাহর সাথে অন্য কোনো ইলাহকে ডাকে না, আর আল্লাহ যার হত্যা নিষিদ্ধ করেছেন, যথার্থ কারণ ছাড়া তাকে হত্যা করে না, আর যেনা (ব্যভিচার) করে না। আর যে কেউ তা করবে, সে প্রতিফল ভোগ করবে।" (সূরা আল-ফুরকান: ৬৮)।
6653 - عن المغيرة بن شعبة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الله حرم عليكم: عقوق الأمهات، ووأد البنات، ومنع وهات. وكره لكم: قيل وقال، وكثرة السؤال، وإضاعة المال".
متفق عليه: رواه البخاري في الخصومات (2408)، ومسلم في الأقضية (12: 593) كلاهما من طريق جرير، عن منصور، عن الشعبي، عن وزاد مولى المغيرة بن شعبة، عن المغيرة بن شعبة، فذكره.
قوله:"وأد البنات": هو دفنهن في حياتهن، فيمتن تحت التراب.
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের জন্য হারাম করেছেন: মায়েদের অবাধ্যতা, কন্যাসন্তানকে জীবন্ত দাফন করা এবং (পাওনা) আটকে রাখা ও (অন্যের কাছে) দাবি করা। আর তিনি তোমাদের জন্য অপছন্দ করেছেন: অনর্থক কথা বলাবলি (গুজব), বেশি প্রশ্ন করা এবং সম্পদ নষ্ট করা।"
6654 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اجتنبوا السبع الموبقات. قالوا: يا رسول الله، وما هن؟ قال: الشرك بالله، والسحر، وقتل النفس التي حرم الله إلا بالحق، وأكل الربا، وأكل مال اليتيم، والتولي يوم الزحف، وقذف المحصنات المؤمنات الغافلات".
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6857)، ومسلم في الإيمان (89) كلاهما من طريق سلمان بن بلال، عن ثور بن زيد، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাতটি ধ্বংসকারী (কবীরা গুনাহ) বর্জন করো।" সাহাবীরা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! সেগুলো কী কী?" তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, যাদু করা, আল্লাহ তাআলা যাকে হত্যা করা হারাম করেছেন, ন্যায়সঙ্গত কারণ ব্যতীত তাকে হত্যা করা, সুদ খাওয়া, এতিমের সম্পদ গ্রাস করা, যুদ্ধের দিন (শত্রুর মোকাবেলার সময়) পিঠ ফিরিয়ে পালিয়ে যাওয়া এবং সতী-সাধ্বী, সরলমনা মুমিন মহিলাদের প্রতি অপবাদ দেওয়া।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)
6655 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أكبر الكبائر الإشراك بالله، وقتل النفس، وعقوق الوالدين، وقول الزور أو قال: وشهادة الزور".
متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6871) ومسلم في الإيمان (88) كلاهما من طريق شعبة، أخبرنا عبيد الله بن أبي بكر، عن أنس، فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: সবচেয়ে বড় কবীরা গুনাহ হলো আল্লাহর সাথে শিরক করা, অন্যায়ভাবে মানুষ হত্যা করা, মাতা-পিতার অবাধ্য হওয়া, এবং মিথ্যা কথা বলা, অথবা তিনি বললেন: মিথ্যা সাক্ষ্য দেওয়া।
6656 - عن ابن عباس، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أبغض الناس إلى الله ثلاثة: ملحد في الحرم، ومبتغ في الإسلام سنة الجاهلية، ومطَّلِب دم امرئ بغير حق ليهريق دمه".
صحيح: رواه البخاري في الديات (6882) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن عبد الله بن أبي حسين، حدثنا نافع بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহর নিকট সবচেয়ে ঘৃণিত ব্যক্তি হলো তিনজন: (১) যে হারামের (পবিত্র এলাকার) মধ্যে ধর্মদ্রোহিতা বা নাস্তিকতা করে, (২) যে ইসলামের মধ্যে জাহিলিয়াতের প্রথা প্রতিষ্ঠা করতে চায়, এবং (৩) যে ব্যক্তি অন্যায়ভাবে কারো রক্ত ঝরানোর উদ্দেশ্যে তার রক্তের (প্রতিশোধ বা মূল্য) তালাশ করে।
6657 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"سباب المسلم فسوق، وقتاله كفر".
متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (48) ومسلم في الإيمان (64) كلاهما من حديث شعبة، عن زبيد، عن أبي وائل، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "কোন মুসলমানকে গালি দেওয়া ফাসেকী (পাপাচার) এবং তার সাথে যুদ্ধ করা কুফরি।"
6658 - عن جرير، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال له في حجة الوداع:"استنصت الناس" فقال: الا ترجعوا بعدي كفارا يضرب بعضكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في العلم (121) ومسلم في الإيمان (65) كلاهما من حديث شعبة، قال: أخبرني علي بن مدركة، عن أبي زرعة، عن جده جرير، فذكره.
জرير (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিদায় হজ্জের সময় তাঁকে বললেন: "মানুষকে চুপ থাকতে বলো/মনোযোগী হতে বলো।" অতঃপর তিনি বললেন: "সাবধান! তোমরা যেন আমার পরে এমন কাফির হয়ে ফিরে যেও না যে, তোমাদের একে অপরের ঘাড়/গলা কাটবে।"
6659 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ويلكم أو ويحكم - قال شعبة: شك هو - لا ترجعوا بعدي كفارًا، يضرب بعضكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في الأدب (6166) ومسلم في الإيمان (66) كلاهما من حديث شعبة، عن واقد بن محمد، أنه سمع أباه يحدث عن عبد الله بن عمر، فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের জন্য দুর্ভোগ (অথবা তোমাদের প্রতি ধিক্কার)! – শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: (রাবী) এ ব্যাপারে সন্দেহ করেছেন – তোমরা আমার পরে এমন কুফরি অবস্থায় ফিরে যেয়ো না যে, তোমরা একে অপরের গর্দান মারবে (অর্থাৎ হত্যা করবে)।"
6660 - عن أبي بكرة، قال: خطبنا النبي صلى الله عليه وسلم يوم النحر، فذكر الحديث وفي آخره: قال:"اللهم اشهد، فليبلغ الشاهد الغائب، فرب مبلغ أوعى من سامع، فلا ترجعوا بعدي كفارًا، يضرب بعضكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1741) ومسلم في القسامة (31: 1679) كلاهما من طريق أبي عامر عبد الملك بن عمر، حدثنا قرة بن خالد، حدثنا محمد بن سيرين، أخبرني عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبي بكرة، فذكره.
আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, কুরবানীর দিন (নাহরের দিন) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন। অতঃপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন এবং এর শেষে বললেন: "হে আল্লাহ! তুমি সাক্ষী থাকো। উপস্থিত ব্যক্তি যেন অনুপস্থিত ব্যক্তিকে (এই বার্তা) পৌঁছিয়ে দেয়। কেননা অনেক সময় যার কাছে পৌঁছানো হয় সে শ্রবণকারীর চেয়ে অধিক সংরক্ষণকারী (বা উপলব্ধিকারী) হয়। সুতরাং আমার পরে তোমরা একে অপরের ঘাড়ের উপর আঘাত করে (একে অপরকে হত্যা করে) কাফির হয়ে যেও না।"
6661 - عن ابن عباس، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطب الناس يوم النحر، فذكر الحديث وفي آخره: قال ابن عباس رضي الله عنهما: فوالذي نفسي بيده، إنها لوصيته إلى أمته:"فليبلغ الشاهد الغائب، لا ترجعوا بعدي كفارا يضرب بعضكم رقاب بعض".
صحيح: رواه البخاري (1739) عن علي بن عبد الله (هو ابن المديني) حدثني يحيى بن سعيد (هو القطان) حدثنا فضيل بن غزوان، حدثنا عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর দিন লোকদের উদ্দেশে ভাষণ দিলেন। তিনি পুরো হাদীসটি উল্লেখ করেন এবং এর শেষে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যার হাতে আমার প্রাণ, নিশ্চয় এটিই তাঁর (নবীজীর) তাঁর উম্মতের প্রতি অসিয়ত: "উপস্থিত ব্যক্তিরা যেন অনুপস্থিতদের কাছে তা পৌঁছে দেয়। তোমরা আমার পরে কাফিরদের মতো হয়ে যেও না যে, তোমরা একে অপরের গর্দান কাটবে।"
6662 - عن أبي هريرة قال: لما توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان أبو بكر رضي الله عنه، وكفر من كفر من العرب، فقال عمر رضي الله عنه: كيف تقاتل الناس؟ ! وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلا الله، فمن قالها فقد عصم منّي ماله ونفسه إلا بحقه، وحسابه على الله".
متفق عليه: رواه البخاري في الزكاة (1399) ومسلم في الإيمان (20) كلاهما من طريق الزهري، حدثنا عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، أن أبا هريرة رضي الله عنه قال فذكره. واللفظ للبخاري.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা ছিলেন, আর আরবের কিছু লোক কুফরী (মুরতাদ) হলো, তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কীভাবে (তাদের সাথে) লোকদের সাথে যুদ্ধ করবেন?! অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমি যেন লোকদের সাথে ততক্ষণ পর্যন্ত যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে। অতএব যে ব্যক্তি তা বলবে, সে আমার পক্ষ থেকে তার জান ও মালকে রক্ষা করে নিল, তবে (ইসলামের) হক্ব (কর্তব্য) ছাড়া। আর তার হিসাব আল্লাহর ওপর ন্যস্ত।"
6663 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلا الله، فمن قال: لا إله إلا الله فقد عصم مني نفسه وماله إلا بحقه وحسابه على الله".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2946) ومسلم في الإيمان (21) كلاهما من
طريق الزهري، حدثني سعيد بن المسيب، أن أبا هريرة أخبره، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমি যেন মানুষের সাথে যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে। সুতরাং যে ব্যক্তি 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে আমার পক্ষ থেকে তার জান ও মালকে রক্ষা করল, তবে ইসলামের অধিকারের (হক্বের) ভিত্তিতে (যদি প্রয়োজন হয়) ভিন্ন কথা, আর তার (ভিতরের) হিসাব আল্লাহর উপর।"
6664 - عن عبد الله بن عمر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يشهدوا أن لا إله إلا الله وأن محمدًا رسول الله، ويقيموا الصلاة، ويؤتوا الزكاة، فإذا فعلوا ذلك عصموا مني دماءهم وأموالهم إلا بحق الإسلام وحسابهم على الله".
متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (25) ومسلم في الإيمان (22) كلاهما من طريق شعبة، عن واقد بن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر قال: سمعت أبي يحدث عن ابن عمر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে, আমি যেন মানুষের সাথে যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা সাক্ষ্য দেয় যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল, আর সালাত কায়েম করে এবং যাকাত আদায় করে। যখন তারা তা করবে, তখন তারা আমার থেকে তাদের রক্ত ও সম্পদকে রক্ষা করে নেবে, ইসলামের হক (অধিকার) ব্যতিরেকে। আর তাদের হিসাব ন্যস্ত থাকবে আল্লাহর উপর।"
6665 - عن أبي مالك (الأشجعي)، عن أبيه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من قال لا إله إلا الله، وكفر بما يعبد من دون الله، حرم ماله ودمه وحسابه على الله".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (23) عن سويد بن سعيد وابن أبي عمر، قالا: حدثنا مروان الفزاري، عن أبي مالك، فذكره.
وأبو مالك اسمه: سعد بن طارق بن أشيم الأشجعي
তারিক ইবনু আশইয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলবে এবং আল্লাহ ব্যতীত অন্য কিছুর উপাসনাকে অস্বীকার করবে, তার সম্পদ ও রক্ত হারাম হয়ে যাবে এবং তার হিসাব নিকাশ আল্লাহর উপর ন্যস্ত।"
6666 - عن المقداد بن عمرو الكندي وكان حليفًا لبني زهرة، وكان ممن شهد بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: أرأيت إن لقيت رجلا من الكفار فاقتلنا، فضرب إحدى يدي بالسيف فقطعها، ثم لاذ مني بشجرة فقال: أسلمت لله، أأقتله يا رسول الله! بعد أن قالها؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تقتله" فقال: يا رسول الله، إنه قطع إحدى يدي، ثم قال ذلك بعد ما قطعها؟ ! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تقتله، فإن قتلته فإنه بمنزلتك قبل أن تقتله، وإنك بمنزلته قبل أن يقول كلمته التي قال".
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4019) وفي الديات (6865) ومسلم في الإيمان (95) من حديث ابن شهاب الزهري، عن عطاء بن يزيد، عن عبيد الله بن عدي بن الخيار، عن المقداد بن عمرو، فذكره.
وجاء عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم للمقداد:"إذا كان رجل ممن يخفي إيمانه مع قوم كفار فأظهر إيمانه فقتلته، فكذلك كنتَ أنت تُخفي إيمانك بمكة من قبل".
ذكره البخاري في الديات (6866) معلقا قال: وقال حبيب بن أبي عمرة، عن سعيد، عن ابن عباس، فذكره. ورُويَ موصولا ولا يصح وصلُه.
মিকদাদ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের মধ্যে ছিলেন এবং বনু জুহরা গোত্রের মিত্র ছিলেন—তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন, "আপনি কি মনে করেন, যদি আমি কাফিরদের মধ্য থেকে এমন একজন ব্যক্তির মুখোমুখি হই এবং আমরা পরস্পরে যুদ্ধে লিপ্ত হই, আর সে আমার একটি হাতে তলোয়ার দিয়ে আঘাত করে তা কেটে ফেলে, এরপর সে আমার থেকে একটি গাছের আড়ালে আশ্রয় নিয়ে বলে, 'আমি আল্লাহর জন্য ইসলাম গ্রহণ করলাম', তবে সে এই কথা বলার পরেও কি আমি তাকে হত্যা করব, হে আল্লাহর রাসূল?"
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি তাকে হত্যা করবে না।" তিনি (মিকদাদ) বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল, সে তো আমার একটি হাত কেটে ফেলেছে, আর সে তা কাটার পরেই এই কথা বলল?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি তাকে হত্যা করবে না। কারণ, যদি তুমি তাকে হত্যা করো, তবে সে তোমার মতো হয়ে যাবে—তোমার তাকে হত্যা করার আগের অবস্থার মতো; আর তুমি তার মতো হয়ে যাবে—তার ঐ কথা বলার আগের অবস্থার মতো, যা সে বলেছে।"
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিকদাদকে বলেছিলেন: "যদি কোনো ব্যক্তি কাফির সম্প্রদায়ের সাথে থেকে নিজের ঈমান গোপন রাখে এবং এরপর সে (যুদ্ধক্ষেত্রে) তার ঈমান প্রকাশ করে আর তুমি তাকে হত্যা করো, তবে (জেনে রাখো) তুমিও তো পূর্বে মক্কায় তোমার ঈমান একইভাবে গোপন রাখতে।"
6667 - عن أسامة بن زيد يقول: بعثنا رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الحرقة، فصبحنا القوم فهزمناهم، ولحقت أنا ورجل من الأنصار رجلًا منهم فلما غشيناه قال: لا إله إلا الله. فكف عنه الأنصاري، فطعنته برمحي حتى قتلته، فلما قدمنا بلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"يا
أسامة، أقتلته بعد ما قال: لا إله إلا الله" قلت: كان متعوذًا! فما زال يكررها حتى تمنيت أني لم أكن أسلمت قبل ذلك اليوم.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4269) ومسلم في الإيمان (159: 96) كلاهما من طريق هشيم، أخبرنا حصين، حدثنا أبو ظبيان، قال: سمعت أسامة بن زيد بن حارثة يحدث، قال فذكره.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে হুরকার দিকে (অভিযানে) পাঠান। আমরা সকালে সেই গোত্রের উপর হামলা করি এবং তাদেরকে পরাজিত করি। আমি এবং একজন আনসারী তাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তিকে ধাওয়া করলাম। যখন আমরা তাকে ধরে ফেললাম, তখন সে বলল: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)। ফলে আনসারী সাহাবী তার থেকে বিরত হলেন। কিন্তু আমি তাকে আমার বর্শা দিয়ে আঘাত করে হত্যা করে ফেললাম। যখন আমরা (মদীনায়) ফিরে আসলাম, ব্যাপারটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছল। তিনি বললেন: “হে উসামা, সে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলার পরও কি তুমি তাকে হত্যা করেছো?” আমি বললাম: সে তো কেবল (মৃত্যু থেকে) বাঁচার জন্য আশ্রয় চেয়েছিল! এরপর তিনি বারবার একই কথা বলতে থাকলেন, এমনকি আমি আকাঙ্ক্ষা করতে লাগলাম যে, যদি আমি এর আগে ইসলাম গ্রহণ না করতাম।
