হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6668)


6668 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من قتل نفسًا معاهدًا لم يرح رائحة الجنة، وإن ريحها ليوجد من مسيرة أربعين عامًا".

صحيح: رواه البخاري في الديات (6914) عن قيس بن حفص، حدثنا عبد الواحد (هو ابن زياد) حدثنا الحسن (هو ابن عمرو الفقيمي)، حدثنا مجاهد، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে হত্যা করল, সে জান্নাতের সুঘ্রাণও পাবে না, অথচ তার (জান্নাতের) সুঘ্রাণ চল্লিশ বছরের দূরত্বের পথ থেকেও পাওয়া যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6669)


6669 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ألا من قتل نفسًا معاهدة له ذمة الله، وذمة رسوله فقد أخفر بذمة الله، فلا يرح رائحة الجنة، وأن ريحها ليوجد من مسيرة سبعين خريفًا".

حسن: رواه الترمذي (1403) وابن ماجه (2687) كلاهما عن محمد بن بشار، قال: حدثنا معدي بن سليمان وهو البصري، قال: أنبأنا ابن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح" وقد رُوي من غير وجه عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في محمد بن عجلان غير أنه حسن الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "সাবধান! যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে হত্যা করলো, যার জন্য আল্লাহ্‌র জিম্মাদারী (নিরাপত্তা চুক্তি) ও তাঁর রাসূলের জিম্মাদারী রয়েছে, সে যেন আল্লাহ্‌র জিম্মাদারী ভঙ্গ করলো। সে জান্নাতের সুঘ্রাণও পাবে না। অথচ তার (জান্নাতের) সুঘ্রাণ সত্তর বছরের দূরত্বের পথ থেকেও পাওয়া যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6670)


6670 - عن أبي بكرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من قتل معاهدًا في غير كنهه حرّم الله عليه الجنة".

حسن: رواه أبو داود (2760) والنسائي (4747) وأحمد (20377) وصححه الحاكم (2/ 142) والبيهقي (9/ 231) كلهم من طرق عن عيينة بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي بكرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل عيينة بن عبد الرحمن بن جوشن الغطفاني فإنه حسن الحديث قال فيه ابن معين وأحمد:"ليس به بأس" وقال النسائي:"ثقة".

وللحديث أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.

وقوله:"في غير كنهه" أي في غير حقه.




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো চুক্তিবদ্ধ ব্যক্তিকে (মু'আহিদকে) অন্যায়ভাবে হত্যা করবে, আল্লাহ তার উপর জান্নাত হারাম করে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6671)


6671 - عن رجل، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"سيكون قوم لهم عهد، فمن قتل رجلا منهم لم يرح رائحة الجنة، وإن ريحها ليوجد من مسيرة سبعين عاما".

صحيح: رواه أحمد (16590) عن أبي النضر، حدثنا الأشجعي، عن سفيان، عن الأعمش، عن هلال بن يساف، عن رجل فذكره. وإسناده صحيح.




এক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কিছু লোক আসবে যাদের সাথে (মুসলিমদের) চুক্তি (বা নিরাপত্তা চুক্তি) থাকবে। অতঃপর তাদের মধ্যে থেকে কোনো ব্যক্তিকে যে হত্যা করবে, সে জান্নাতের সুঘ্রাণও পাবে না। অথচ তার (জান্নাতের) সুঘ্রাণ সত্তর বছরের দূরত্বের পথ থেকেও পাওয়া যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6672)


6672 - عن رفاعة بن شداد الفتياني قال: لولا كلمة سمعتُها من عمرو بن الحمِق الخزاعي لمشيت فيها بين رأس المختار وجسده، سمعته يقول:"من أمن رجلًا على دمه، فقتله فإنه يحمل لواء غدْر يوم القيامة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2688) وأحمد (21946) وأبو داود الطيالسي (1285) وابن حبان (5982) وابن أبي عاصم في الديات (318) كلهم من حديث رفاعة بن شداد فذكره. وإسناده صحيح.




রিফা'আহ ইবনু শাদ্দাদ আল-ফিতইয়ানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি যদি 'আমর ইবনু হামিক আল-খুযা'ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে শোনা একটি কথা না শুনতাম, তবে অবশ্যই আমি আল-মুখতারের মস্তক ও দেহের মাঝখানে (বিচরণ করে) বেড়াতাম। আমি তাকে (অর্থাৎ আমরকে) বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি কোনো লোককে তার প্রাণের ব্যাপারে নিরাপত্তা দেয়, অতঃপর তাকে হত্যা করে, তবে সে কিয়ামতের দিন বিশ্বাসঘাতকতার (বা প্রতারণার) পতাকা বহন করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6673)


6673 - عن أبي هريرة قال: شهدنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم خيبر فقال لرجل ممن يدعي الإسلام:"هذا من أهل النار" فلما حضر القتال قاتل الرجل قتالًا شديدًا، فأصابته جراحة. فقيل: يا رسول الله! الذي قلت: إنه من أهل النار، فإنه قد قاتل اليوم قتالًا شديدًا وقد مات؟ ! فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إلى النار" قال: فكاد بعض الناس أن يرتاب فبينما هم على ذلك إذ قيل: إنه لم يمت ولكن به جراحًا شديدًا، فلما كان من الليل لم يصبر على الجراح فقتل نفسه، فأخبر النبي صلى الله عليه وسلم بذلك فقال:"الله أكبر أشهد أني عبد الله ورسوله" ثم أمر بلالًا فنادى بالناس:"إنه لا يدخل الجنة إلا نفس مسلمة، وإن الله ليؤيد هذا الدين بالرجل الفاجر".

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (3062) ومسلم في الإيمان (111) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن ابن المسيب، عن أبي هريرة، فذكر الحديث، ولفظهما سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খায়বার যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। তখন তিনি ইসলামের দাবীদার এক ব্যক্তি সম্পর্কে বললেন: "এ ব্যক্তি জাহান্নামবাসীদের অন্তর্ভুক্ত।" এরপর যখন যুদ্ধ শুরু হলো, লোকটি প্রচণ্ড যুদ্ধ করল এবং আহত হলো। তখন বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যাকে জাহান্নামী বলেছিলেন, সে তো আজ প্রচণ্ড যুদ্ধ করেছে এবং মারাও গেছে! নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জাহান্নামের দিকে।" (আবূ হুরায়রা) বলেন, এতে কিছু লোকের মনে প্রায় সন্দেহ সৃষ্টি হচ্ছিল। তারা যখন এই অবস্থায় ছিল, তখন বলা হলো: সে মরেনি, তবে তার আঘাত গুরুতর। যখন রাত হলো, সে আঘাতের যন্ত্রণা সহ্য করতে না পেরে আত্মহত্যা করল। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে জানানো হলে তিনি বললেন: "আল্লাহু আকবার (আল্লাহ মহান)! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আমি আল্লাহর বান্দা এবং তাঁর রাসূল।" অতঃপর তিনি বেলালকে নির্দেশ দিলেন। বেলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের মধ্যে ঘোষণা করে দিলেন: "নিশ্চয়ই মুসলিম আত্মা ব্যতীত কেউ জান্নাতে প্রবেশ করবে না। আর আল্লাহ অবশ্যই পাপিষ্ঠ লোকের মাধ্যমেও এই দ্বীনকে সাহায্য করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6674)


6674 - عن ثابت بن الضحاك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من حلف بملة غير الإسلام كاذبًا فهو كما قال، ومن قتل نفسه بشيء عذّب به في نار جهنم، ولعن المؤمن كقتله، ومن رمي مؤمنا بكفر فهو كقتله".

متفق عليه: رواه البخاري في الأدب (6105) ومسلم في الإيمان (110) كلاهما من حديث أبي قلابة، عن ثابت بن الضحاك، فذكر الحديث، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم مختصرًا، ولم يذكر قوله:"ولعن المؤمن … الخ".




সাবেত ইবনুয যাহ্হাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মিথ্যা জেনেও ইসলাম ছাড়া অন্য কোনো ধর্মের নামে শপথ করল, সে তেমনই হলো যেমন সে বলল। আর যে ব্যক্তি কোনো কিছু দ্বারা আত্মহত্যা করবে, জাহান্নামের আগুনে তাকে সে বস্তু দ্বারাই শাস্তি দেওয়া হবে। আর মু'মিনকে অভিসম্পাত করা তাকে হত্যা করার সমতুল্য। আর যে ব্যক্তি কোনো মু'মিনকে কুফরের অপবাদ দিল, সেও তাকে হত্যা করার সমতুল্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (6675)


6675 - عن الحسن حدثنا جندب بن عبد الله في هذا المسجد، وما نسينا منذ حدّثنا،
وما نخشى أن يكون جندب كذب على النبي صلى الله عليه وسلم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كان فيمن كان قبلكم رجل به جرح فجزع فأخذ سكينًا فحزّ بها يده، فما رقأ الدمُ حتى مات. قال الله تعالى: بادرني عبدي بنفسه، حرمت عليه الجنة".

وفي رواية: خرج برجل خُرّاج - أي القرحة.

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3463) ومسلم في الإيمان (181: 113) كلاهما من طريق جرير قال: سمعت الحسن يقول، فذكره.

قوله:"فما رقأ الدم" أي لم ينقطع.

قوله:"بادرني بنفسه" قد استشكل لأنه يقتضي أن يكون من قُتل فقد مات قبل أجله لما يوهمه سياق الحديث من أنه لو لم يقتل نفسه كان قد تأخر عن ذلك الوقت وعاش، لكنه بادر فتقدم.

قال القاضي أبو بكر بن العربي:"قضاء الله مطلق ومقيد بصفة، فالمطلق يمضي على الوجه بلا صارف، والمفيد على الوجهين، مثاله أن يقدر لواحد أن يعيش عشرين سنة إن قتل نفسه وثلاثين سنة إن لم يقتل.

وهذا بالنسبة إلى ما يعلم به المخلوق كالموت مثلًا، وأما بالنسبة إلى علم الله فإنه لا يقع إلا ما علمه. انظر: فتح الباري (6/ 500).




জুনদুব ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের পূর্ববর্তী উম্মতদের মধ্যে এক ব্যক্তি ছিল, তার দেহে একটি আঘাত ছিল। সে এতে অস্থির হয়ে পড়ল। ফলে সে একটি ছুরি নিয়ে তা দিয়ে তার হাত কেটে ফেলল। রক্ত বন্ধ হলো না, অবশেষে সে মারা গেল। আল্লাহ তাআলা বললেন: 'আমার বান্দা আমার (নির্ধারিত ফয়সালার) পূর্বে নিজের জীবন নিয়ে তাড়াহুড়ো করল, আমি তার জন্য জান্নাত হারাম করে দিলাম।'"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: এক ব্যক্তির শরীরে ফোঁড়া (ঘা) হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (6676)


6676 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من تردّى من جبل فقتل نفسه فهو في نار جهنم يتردّى فيه خالدًا مخلدًا فيها أبدًا، ومن تحسّى سمًا فقتل نفسه فسمّه في يده يتحسّاه في نار جهنم خالدًا مخلدًا فيها أبدًا، ومن قتل نفسه بحديدة فحديدته في يده يجأ بها في بطنه في نار جهنم خالدًا مخلدًا فيها أبدًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الطب (5778) ومسلم في الإيمان (109) كلاهما من طريق خالد بن الحارث، حدثنا شعبة، عن سليمان (هو الأعمش)، قال: سمعت ذكوان يحدث عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه الترمذي (2043، 2044) من طرق عن الأعمش بإسناده مثله.

وقال: وروى محمد بن عجلان، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من قتل نفسه بسم عذّب في نار جهنم" ولم يذكر فيه"خالدًا مخلدًا فيها أبدًا" وهكذا رواه أبو الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم وقال:"وهذا أصح، لأن الروايات إنما تجيء بأن أهل التوحيد يعذّبون في النار، ثم يخرجون منها. ولم يذكر أنهم يخلّدون فيها". انتهى.

قلت: حديث أبي الزناد أخرجه البخاري (1365) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عنه، عن الأعرج، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الذي يخنق نفسه يخنقها في النار، والذي
يطعنها بطعنها في النار".

ونحوه رواه أيضا محمد بن عجلان، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة.

ومن طريقه رواه الإمام أحمد (9618) وابن حبان (5987) ورواه الطحاوي في مشكله (195) من طريق مالك بن أنس، عن أبي الزناد بإسناده.

وزادوا في حديثهم:"الذي يقتحم فيها يقتحم في النار".

أي يوقع نفسه في المهالك بأن يتردى من جبل أو يفعل نحوه.

وأما معنى قوله:"فهو في نار جهنم خالدًا مخلدًا فيها أبدًا" فقال النووي في شرح مسلم: فيها أقوال:

أحدها: أنه محمول على من فعل ذلك مستحلا مع علمه بالتحريم. فهذا كافر. وهذه عقوبته.

والثاني: أن المراد بالخلود طول المدة، والإقامة المتطاولة لا حقيقة الدوام. كما يقال: خلّد الله ملك السلطان.

والثالث: أن هذا جزاءه، ولكن تكرم الله سبحانه وتعالى فأخبر أنه لا يخلد في النار من مات مسلمًا". انتهى.

والدليل على أن قاتل النفس لا يكفر الحديث الآتي:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি (নিজেকে হত্যার উদ্দেশ্যে) পাহাড়ের উপর থেকে নীচে পড়ে যায়, সে জাহান্নামের আগুনেও চিরকাল নিচে পড়তে থাকবে এবং সে সেখানে চিরস্থায়ীভাবে থাকবে। আর যে ব্যক্তি বিষ পান করে নিজেকে হত্যা করে, তার বিষ তার হাতেই থাকবে, সে জাহান্নামের আগুনেও চিরস্থায়ীভাবে তা পান করতে থাকবে। আর যে ব্যক্তি ধারালো কোনো অস্ত্র দ্বারা নিজেকে হত্যা করে, তার অস্ত্র তার হাতেই থাকবে, সে জাহান্নামের আগুনেও চিরস্থায়ীভাবে তা দিয়ে নিজের পেটে আঘাত করতে থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6677)


6677 - عن جابر، أن الطفيل بن عمرو الدوسي أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! هل لك في حصن حصين ومنعة؟ (قال: حصن كان لدوس في الجاهلية) فأبى ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، للذي ذخر الله للأنصار. فلما هاجر النبي صلى الله عليه وسلم إلى المدينة. هاجر إليه الطفيل بن عمرو. وهاجر معه رجل من قومه. فاجتووا المدينة، فمرض، فجزع، فأخذ مشاقص له، فقطع بها براجمه، فشخبتْ يداه حتى مات. فرآه الطفيل بن عمرو في منامه. فرآه وهيئتُه حسنة، ورآه مغطيًا يديه. فقال له: ما صنع بك ربك؟ فقال: غفر لي بهجرتي إلى نبيه صلى الله عليه وسلم. فقال: ما لي أراك مغطيًا يديك؟ قال: قيل لي: لن نُصلح منك ما أفسدت. فقصها الطفيل على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللَّهم! وليديه فاغفر".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (116) من طرق عن سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن زيد، عن حجاج الصواف، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وقوله:"فاجتووا المدينة": معناه كرهوا المقام بها لضجر ونوع من السقم.

وقوله:"مشاقص": جمع مشقص، وهو سهم فيه نصل عريض.

وقوله:"براجم": براجم جمع برجمة، وهو مفاصل الإصبع.

وقوله:"شخبت يداه": أي سال دمهما بقوة.

وفيه أن من قتل نفسه ومات من غير توبة فليس بكافر، ولا يقطع له بالنار بل هو في حكم المشيئة.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তুফাইল ইবনু আমর দাওসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এসে বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি সুরক্ষিত দুর্গে এবং প্রতিরক্ষায় থাকতে ইচ্ছুক?’ (তিনি বললেন, জাহিলিয়্যাতের যুগে দাওস গোত্রের একটি দুর্গ ছিল)। কিন্তু নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তা প্রত্যাখ্যান করলেন, কেননা আল্লাহ তা‘আলা আনসারদের জন্য বিশেষ মর্যাদা রেখেছিলেন। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মদীনায় হিজরত করলেন, তখন তুফাইল ইবনু আমরও তাঁর কাছে হিজরত করলেন। তাঁর সাথে তাঁর গোত্রের এক ব্যক্তিও হিজরত করেছিল। এরপর তারা মদীনার আবহাওয়ায় অস্বস্তি বোধ করতে লাগলেন। ফলে সে (লোকটি) অসুস্থ হয়ে পড়ল এবং অস্থির হয়ে গেল। অতঃপর সে তার জন্য ধারালো তীরের ফালা নিয়ে নিজের আঙ্গুলের গাঁটসমূহ কেটে ফেলল। তার দুই হাত থেকে প্রবল বেগে রক্ত ঝরতে থাকল যতক্ষণ না সে মারা গেল। অতঃপর তুফাইল ইবনু আমর স্বপ্নে তাকে দেখলেন। তিনি দেখলেন, তার আকার সুন্দর এবং সে তার দুই হাত ঢেকে রেখেছে। তুফাইল তাকে বললেন, ‘তোমার রব তোমার সাথে কী আচরণ করেছেন?’ সে বলল, ‘তাঁর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর দিকে হিজরত করার কারণে তিনি আমাকে ক্ষমা করে দিয়েছেন।’ তিনি (তুফাইল) বললেন, ‘কী ব্যাপার, তোমাকে তোমার দুই হাত ঢেকে রাখতে দেখছি কেন?’ সে বলল, ‘আমাকে বলা হয়েছে: তুমি যা নষ্ট করেছ, আমরা তা আর ঠিক করব না।’ অতঃপর তুফাইল রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এই ঘটনা বর্ণনা করলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "হে আল্লাহ! তার দুই হাতকেও ক্ষমা করে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (6678)


6678 - عن أبي سعيد الخدري قال: لا أحدثكم إلا ما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم سمعته أذناي، ووعاه قلبي:"إن عبدًا قتل تسعة وتسعين نفسًا، ثم عرضتْ له التوبة، فسأل عن أعلم أهل الأرض، فدُلَّ على رجل، فأتاه فقال: إني قتلت تسعة وتسعين نفسًا، فهل لي من توبة؟ قال: بعد قتل تسعة وتسعين نفسًا؟ قال: فانتضي سيفَه فقتله به، فأكمل به مئة، ثم عرضتْ له التوبة، فسأل عن أعلم أهل الأرض، فدُلَّ على رجل، فأتاه فقال: إني قتلت مئة نفس، فهل لي من توبة؟ فقال: ومن يحول بينك وبين التوبة، اخرج من القرية الخبيثة التي أنت فيها إلى القرية الصالحة قرية كذا وكذا، فاعبدْ ربك فيها، قال: فخرج إلى القرية الصالحة، فعرض له أجله في الطريق قال: فاختصمت فيه ملائكة الرحمة وملائكة العذاب قال: فقال إبليس: أنا أولى به، إنه لم يعصني ساعة قط. قال: فقالت ملائكة الرحمة: إنه خرج تائبًا".

قال همام: فحدثني حميد الطويل، عن بكر بن عبد الله المزني، عن أبي رافع قال: فبعث الله عز وجل له ملكًا فاختصموا إليه" ثم رجع إلى حديث قتادة، قال: فقال:"انظروا أي القريتين كان أقرب إليه، فألحقوه بأهلها".

قال قتادة: فحدثنا الحسن قال:"لما عرف الموت احتفز بنفسه، فقرب الله عز وجل منه القرية الصالحة، وباعد منه القرية الخبيثة، فألحقوه بأهل القرية الصالحة".

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3470) ومسلم في كتاب التوبة (2766) كلاهما من حديث شعبة، عن قتادة، عن أبي الصديق الناجي، عن أبي سعيد فذكره ورواه أحمد (11154) من حديث همام بن يحيى، عن قتادة بإسناده، واللفظ له لأنه أوفى.

وقوله: عن أبي رافع فبعث الله عز وجل له ملكا … وفي صحيح مسلم:"فأتاهم ملك في صورة آدمي فجعلوه بينهم".

وقول الحسن: احتفز بنفسه … وهو في الصحيحين:"فلما كان في بعض الطريق أدركهـ الموت فنأى بصدره، ثم مات" وفيه دليل على أن العبادة بدون العلم مهلكة.

وقد رويت هذه القصة عن معاوية بن أبي سفيان نحوه.

رواه أبو يعلى (7361) عن أبي همام، حدثنا الوليد بن مسلم قال: حدثني عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، قال: حدثني ابن أبي المهاجر، أو أبو عبد رب. الوليد شك قال: سمعت معاوية بن أبي سفيان يقول: فذكره.

ورواه ابن أبي عاصم في الديات (242، 321) من وجه آخر عن الوليد بدون الشك بأنه أبو
عبد رب.

ورواه الطبراني في الكير (19/ 369) من وجهين آخرين عن الوليد بن مسلم وصدقة بن خالد كلاهما قالا: ثنا ابن جابر فذكره بإسناده إلا أن فيه:"عبيدة بن المهاجر أبو عبد رب" وهو خطأ.

وابن أبي المهاجر هو عبيدة بن أبي المهاجر لم يوثقه غير ابن حبان فهو"مجهول" ترجمه البخاري وابن أبي حاتم ولم يقولا فيه شيئًا. وكذلك أبو عبد رب فإنه لم يوثقه غير ابن حبان، وقول الهيثمي في"المجمع" (10/ 211 - 212): رواه الطبراني بإسنادين ورجال أحدهما رجال الصحيح غير أبي عبد رب.

وهو ثقة هو اعتمادا منه على توثيق ابن حبان، وابن حبان معروف في توثيقه للمجاهيل.

والحديث أبي سعيد الخدري، ولكن نسبه بعض الرواة إلى معاوية بن أبي سفيان.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তোমাদের কাছে কেবল সেটাই বর্ণনা করব যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট থেকে শুনেছি; যা আমার কান শুনেছে এবং আমার অন্তর ধারণ করেছে: "নিশ্চয়ই এক ব্যক্তি নিরানব্বই জনকে হত্যা করেছিল। এরপর তার অন্তরে তওবার আগ্রহ সৃষ্টি হল। তখন সে দুনিয়ার সবচেয়ে জ্ঞানী ব্যক্তির সন্ধান করল। তাকে এক ব্যক্তির কথা বলে দেওয়া হলো। সে তার কাছে এসে বলল: আমি নিরানব্বই জন মানুষ হত্যা করেছি। আমার কি তওবার কোনো সুযোগ আছে? লোকটি বলল: নিরানব্বই জনকে হত্যা করার পরেও? সে (শুনেই) তার তলোয়ার বের করে তাকেও হত্যা করল এবং এর মাধ্যমে একশ সংখ্যা পূর্ণ করল। এরপর পুনরায় তার অন্তরে তওবার আগ্রহ সৃষ্টি হল। তখন সে দুনিয়ার সবচেয়ে জ্ঞানী ব্যক্তির সন্ধান করল। তাকে অন্য এক ব্যক্তির কথা বলে দেওয়া হলো। সে তার কাছে এসে বলল: আমি একশ জন মানুষ হত্যা করেছি। আমার কি তওবার কোনো সুযোগ আছে? লোকটি বলল: তোমার এবং তওবার মাঝে কে বাধা সৃষ্টি করতে পারে? তুমি যে খারাপ জনপদে আছ, তা ছেড়ে অমুক অমুক ভালো জনপদের দিকে চলে যাও এবং সেখানে তোমার রবের ইবাদত কর। বর্ণনাকারী বলেন: সে ভালো জনপদের দিকে যাত্রা করল, অতঃপর পথেই তার মৃত্যু এসে গেল। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তার ব্যাপারে রহমতের ফেরেশতা এবং আযাবের ফেরেশতারা বিবাদে লিপ্ত হলেন। ইবলিস বলল: আমিই তার বেশি হকদার। কারণ সে এক মুহূর্তের জন্যও আমার অবাধ্য হয়নি। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রহমতের ফেরেশতারা বললেন: সে তো তওবাকারী হিসেবে বের হয়েছে।"

হুমাম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এরপর হুমাইদুত তাওয়ীল আমার কাছে বকর ইবনু আব্দুল্লাহ মুযানী থেকে, তিনি আবূ রাফি' থেকে বর্ণনা করেন যে, আল্লাহ তাআলা তাদের কাছে একজন ফেরেশতা প্রেরণ করলেন এবং তারা তাঁর কাছে বিচারপ্রার্থী হলেন।" এরপর কাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর হাদীসে ফিরে এসে বলেন, ফেরেশতা বললেন: "তোমরা দেখ, সে গ্রাম দু'টির মধ্যে কোনটির বেশি কাছে ছিল? অতঃপর তাকে সেখানকার অধিবাসীদের সাথে শামিল করে দাও।"

কাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমাদের কাছে হাসান (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেছেন যে, "যখন সে মৃত্যু সম্পর্কে জানতে পারল, তখন সে বুক চিতিয়ে (ভালো গ্রামের দিকে) অগ্রসর হতে চাইল। আল্লাহ তাআলা তখন ভালো গ্রামটিকে তার কাছাকাছি করে দিলেন এবং খারাপ গ্রামটিকে তার থেকে দূরে সরিয়ে দিলেন। অতঃপর তাকে ভালো গ্রামের অধিবাসীদের সাথে শামিল করা হলো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6679)


6679 - عن سلمة قال: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم إلى خيبر، فقال رجل منهم: أسمعنا يا عامر! من هنياتك، فحدا بهم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"من السائق؟" قالوا: عامر فقال: رحمه الله، فقالوا: يا رسول الله! هلا أمتَعْتَنا به؟ فأصيب صبيحة ليلته. فقال القوم: حبط عمله، قتل نفسه. فلما رجعت وهم يتحدثون أن عامرًا حبط عمله فجئت إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقلت: يا نبي الله! فداك أبي وأمي، زعموا أن عامرًا حبط عمله، فقال: كذب من قالها، إن له لأجرين اثنين، إنه لجاهدٌ مجاهدٌ، وأي قتل يزيده عليه.

متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6891) ومسلم في الجهاد والسير (1802) كلاهما من طريق يزيد بن أبي عبيد مولى سلمة بن الأكوع، عن سلمة بن الأكوع، فذكره.

واللفظ للبخاري وذكره مسلم بطوله وفيه: قال سلمة بن الأكوع! قاتل أخي قتالًا شديدًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فارتد عليه سيفه فقتله.

فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"مات جاهدًا ومجاهدًا" وقال:"فله أجره مرتين".




সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খাইবারের দিকে বের হলাম। তখন তাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বললো: হে আমির! তোমার চমত্কার সঙ্গীত (বা কবিতা) থেকে আমাদের কিছু শোনাও। অতঃপর তিনি তাদের উট হাঁকানোর সঙ্গীত শুনালেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "উট চালক কে?" তারা বললো: আমির। তিনি বললেন, "আল্লাহ তাকে রহম করুন।"

তারা বললো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি যদি তাকে আমাদের থেকে (আরও কিছুদিন) উপকৃত হতে দিতেন না? অতঃপর সে রাতেই ভোরে তিনি (আমির) আঘাতপ্রাপ্ত হলেন (এবং শহীদ হলেন)। তখন লোকেরা বললো: তার আমল বিনষ্ট হয়েছে, সে নিজেকে হত্যা করেছে।

অতঃপর আমি যখন ফিরে আসলাম এবং তারা আলোচনা করছিল যে আমিরের আমল বিনষ্ট হয়েছে, তখন আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললাম: ইয়া নাবিআল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার উপর কুরবান হোক! তারা ধারণা করছে যে আমিরের আমল বিনষ্ট হয়েছে। তিনি বললেন: যে এটি বলেছে, সে মিথ্যা বলেছে। নিশ্চয় তার জন্য রয়েছে দুটি প্রতিদান। নিশ্চয় সে ছিল কঠোর পরিশ্রমী মুজাহিদ, কঠোর পরিশ্রমী মুজাহিদ। আর এর চেয়ে উত্তম কোন্ মৃত্যু তাকে (মর্যাদায়) বৃদ্ধি করে দেবে?

[সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন:] আমার ভাই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তীব্র লড়াই করছিলেন, তখন তার নিজের তলোয়ার তার দিকে ফিরে এসে তাকে হত্যা করে ফেলেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে জিহাদকারী (জাহিদ) এবং মুজাহিদ হিসেবে মৃত্যুবরণ করেছে।" তিনি আরো বললেন: "তার জন্য তার প্রতিদান দ্বিগুণ।"









আল-জামি` আল-কামিল (6680)


6680 - عن أبي شريح قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن أعتى الناس على الله من قتل غير قاتله، ومن طلب بدم الجاهلية من أهل الإسلام، ومن بصّر عينيه في المنام ما لم تُبصر".

حسن: رواه أحمد (16378) والطبراني في الكبير (22/ 191) وابن أبي عاصم في الديات (225) والدارقطني (3/ 96) والحاكم (4/ 349) كلهم من حديث عبد الرحمن بن إسحاق، عن الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي شريح فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد إلا أن يونس بن عبد رواه عن الزهري بإسناد آخر".

قلت: إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن إسحاق بن عبد الله بن الحارث المدني فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وقد تابعه يونس بن يزيد رواه أحمد (16376) مطولا في خطبة يوم الفتح، وابن أبي عاصم في الديات (227) والحاكم (4/ 349) والبيهقي (8/ 71) كلهم من طريق يونس بن يزيد، عن الزهري، عن مسلم بن يزيد أحد بني سعد بن بكر أنه سمع أبا شريح الخزاعي فذكر الحديث مطولا ومختصرا.

وجاء فيه: أذن لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الفتح في قتال بني بكر حتى أصبنا عنهم ثأرنا وهو بمكة، ثم أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم برفع السيف. فلقي رهط منا الغد رجلًا من هُذيل في الحرم يؤم رسول الله صلى الله عليه وسلم ليُسلم. وكان قد وترهم في الجاهلية. وكانوا يطلبونه فقتلوه .... ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وإني والله لأَدِيَنَّ هذا الرجل الذي قتلتم" فوداه رسول الله صلى الله عليه وسلم. وفيه: ورجل طلب بذهل في الجاهلية.

ومسلم بن بزيد من رجال"التعجيل" (1036) وإن الحافظ ابن حجر أشار إلى هذا الحديث وفيه قال الزهري: حدثني مسلم أن أبا شريح الخزاعي أخبره.

وهذا تأكيد الزهري بأنه سمع هذا الحديث من الشيخين عطاء بن يزيد الليثي ومسلم بن يزيد.

إلا أن البخاري قال في"التاريخ الكبير" (7/ 277):"وجعل بعض الناس حديثه عن عطاء بن يزيد ولا يصح". ثم روى الحديث من طريق يونس، عن ابن شهاب، ومن طريق عبد الرحمن بن إسحاق عن الزهري. ثم قال: والأول أصح. وقد أعله البعض من أجل اختلافه على الزهري. والجمع ممكن.

وقوله: بذهل الجاهلية: الذهل هو الثأر.




আবু শুরাইহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহর নিকট সবচেয়ে বেশি উদ্ধত (বা বিদ্রোহী) মানুষ হলো সে, যে তার হত্যাকারী ছাড়া অন্য কাউকে হত্যা করে; এবং যে ইসলামের অনুসারীদের মধ্যে জাহিলিয়াতের রক্তের (বদলা বা) দাবি করে; আর যে স্বপ্নে এমন কিছু দেখে বলে যা তার চোখ দেখেনি।”









আল-জামি` আল-কামিল (6681)


6681 - عن عائشة قالت: وجد في قائم سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم كتابان:"إن من أشد الناس عتوّا رجل ضرب غير ضاربه، ورجل قتل غير قاتله، ورجل تولى غير أهل نعمته. فمن فعل ذلك فقد كفر بالله ورسوله، لا يُقبل منه صرف ولا عدل".

حسن: رواه ابن أبي عاصم في الديات (228) واللفظ له، وأبو يعلى (44757) والدارقطني (3/ 131) والحاكم (4/ 349) والبيهقي (8/ 29 - 31) كلهم من حديث عبيد الله بن عبد المجيد، نا عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، قال: سمعت مالك بن محمد بن عبد الرحمن، يحدث عن عمرة، عن عائشة فذكرته في حديث أطول منه.

وإسناده حسن من أجل مالك بن محمد بن عبد الرحمن فإنه حسن الحديث. انظر كتاب الفرائض باب أهل الملتين لا يتوارثان.




আয়শা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তলোয়ারের খাপের গোড়ায় দুটি লেখা পাওয়া গিয়েছিল: “নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে যারা সবচেয়ে বেশি সীমালঙ্ঘনকারী বা বিদ্রোহী, তারা হলো: যে ব্যক্তি তাকে আঘাত করেনি তাকে আঘাত করে, এবং যে ব্যক্তি তাকে হত্যা করেনি তাকে হত্যা করে, এবং যে ব্যক্তি তার অনুগ্রহকারীদের পরিবর্তে অন্য কারও সাথে মিত্রতা স্থাপন করে। অতএব, যে ব্যক্তি এরূপ করে, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি কুফরি করে। তার পক্ষ থেকে কোনো বিনিময় (সরফ) কিংবা কোনো মুক্তিপণ (আদল) গ্রহণ করা হবে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (6682)


6682 - عن ابن عباس قال: كان قريظة والنضير. وكان النضير أشرف من قريظة. فكان إذا قتل رجل من قريظة رجلا من النضير قتل به، وإذا قتل رجل من النضير فوُدي بمئة وسق من تمر، فلما بعث النبي صلى الله عليه وسلم قتل رجل من النضير رجلًا من قريظة. فقالوا: ادفعوه إلينا نقتله، فقالوا: بيننا وبينكم النبي، فأتوه، فنزلت: {وَإِنْ حَكَمْتَ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِ} [المائدة: 43] والقسط: النفس بالنفس، ثم نزلت: {أَفَحُكْمَ الْجَاهِلِيَّةِ يَبْغُونَ} [المائدة: 50].

حسن: رواه أبو داود (4494) والنسائي (4732) وابن الجارود (772) وصحّحه ابن حبان (5057) والحاكم (4/ 366) كلهم من حديث عبد الله بن موسى، عن علي بن صالح، عن سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وسماك بن حرب مضطرب في عكرمة ولكن تابعه داود بن الحصين عن عكرمة عن ابن عباس قال: إن الآيات التي في المائدة قوله: {فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ أَوْ أَعْرِضْ عَنْهُمْ وَإِنْ تُعْرِضْ عَنْهُمْ فَلَنْ يَضُرُّوكَ شَيْئًا وَإِنْ حَكَمْتَ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ بِالْقِسْطِ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ} [المائدة: 42] إنما نزلت في الدية في بني النضير وبني قريظة، وذلك أن قتلى بني النضير، وكان لهم شرف تُؤدى الدية كاملة، وإن قريظة كانوا يؤدون نصف الدية. فتحاكموا في ذلك إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأنزل الله ذلك فيهم. فحكم رسول الله صلى الله عليه وسلم على
الحق في ذلك. فجعل الدية في ذلك سواء.

رواه أبو داود (3591) والنسائي (4733) وأحمد (3434) كلهم من طريق محمد بن إسحاق قال: أخبرني داود بن الحصين فذكره.

ذهب كثير من أهل العلم إلى عموم هذه الآية الكريمة بأن الرجل يقتل بالمرأة، وكذا ورد في كتاب عمرو بن حزم:"أن الرجل يقتل بالمرأة" وبه قال مالك وأبو حنيفة والشافعي وأحمد في قول.

وعن أبي حنيفة: أن المسلم يقتل بالكافر الذمي، والحر بالعبد لعموم هذه الآية. وسيأتي ما يخصص هذا العموم.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কুরাইযা ও নাযীর গোত্র ছিল। নাযীর গোত্র কুরাইযা গোত্রের চেয়ে অধিক সম্মানিত ছিল। ফলে, কুরাইযা গোত্রের কোনো লোক যদি নাযীর গোত্রের কাউকে হত্যা করত, তাহলে তাকে হত্যা করা হতো। আর নাযীর গোত্রের কোনো লোক যদি কাউকে হত্যা করত, তবে তার দিয়াত (রক্তমূল্য) হিসেবে একশ ওয়াসাক খেজুর গ্রহণ করা হতো। যখন নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রেরিত হলেন, তখন নাযীর গোত্রের একজন লোক কুরাইযা গোত্রের একজনকে হত্যা করল। কুরাইযা গোত্রের লোকেরা বলল: তাকে আমাদের হাতে সোপর্দ করো, আমরা তাকে হত্যা করব। নাযীর গোত্রের লোকেরা বলল: আমাদের ও তোমাদের মাঝে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ই বিচারক। সুতরাং তারা তাঁর কাছে আসল। তখন এই আয়াত অবতীর্ণ হলো: "আর যদি তুমি ফায়সালা করো, তবে তাদের মধ্যে ন্যায়সঙ্গত ফায়সালা করো।" [সূরা আল-মায়িদা: ৪৩]। আর ন্যায়সঙ্গত ফায়সালা হলো—প্রাণের বদলে প্রাণ। এরপর নাযিল হলো: "তারা কি তবে জাহেলিয়াতের ফায়সালা চায়?" [সূরা আল-মায়িদা: ৫০]। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন, সূরা আল-মায়েদার এই আয়াতসমূহ— "তুমি যদি তাদের মাঝে ফায়সালা করো অথবা তাদের থেকে মুখ ফিরিয়ে নাও, আর যদি ফায়সালা করো তবে তাদের মধ্যে ন্যায়সঙ্গত ফায়সালা করো, নিশ্চয় আল্লাহ ইনসাফকারীদের ভালোবাসেন" [আল-মায়েদা: ৪২]— মূলত বনু নাযীর ও বনু কুরাইযা গোত্রের দিয়াত (রক্তমূল্য) সংক্রান্ত বিষয়ে অবতীর্ণ হয়েছিল। এর কারণ হলো, বনু নাযীর গোত্রের নিহতদের জন্য পূর্ণ দিয়াত প্রদান করা হতো, কারণ তারা অধিক সম্মানিত ছিল, আর বনু কুরাইযা গোত্রের নিহতদের জন্য অর্ধেক দিয়াত দেওয়া হতো। এই বিষয়ে তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বিচারপ্রার্থী হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর মধ্যে সত্যের ভিত্তিতে ফায়সালা দিলেন এবং দিয়াতকে সবার জন্য সমান করে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6683)


6683 - عن عبادة بن الصامت قال: كنا عند النبي صلى الله عليه وسلم في مجلس فقال:"بايعوني على أن لا تشركوا بالله شيئًا ولا تسرقوا ولا تزنوا وقرأ هذه الآية كلها: فمن وفى منكم فأجره على الله، ومن أصاب من ذلك شيئًا فعوقب به فهو كفارته، ومن أصاب من ذلك شيئًا فستره الله عليه إن شاء غفر له وإن شاء عذبه".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6784) ومسلم في الحدود (41: 1709) كلاهما من طريق الزهري، عن أبي إدريس الخولاني، عن عبادة بن الصامت، فذكره.

ورُوي بمعناه عن ابن خزيمة بن ثابت، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أصاب ذنبًا أُقيم عليه حد ذلك الذنب فهو كفارته" إلا أنه ضعيف.

رواه أحمد (21866)، والدارقطني (3/ 214)، والدارمي (1236)، والطبراني (4/ 101)، والحاكم (4/ 388) كلهم من حديث أسامة بن زيد الليثي، عن محمد بن المنكدر، عن ابن خزيمة بن ثابت، عن أبيه فذكره.

قال الترمذي:"سألت البخاري عن هذا الحديث فقال: هذا حديث فيه اضطراب. وضعّفه محمد جدا. العلل (2/ 602).

وابن خزيمة بن ثابت لا يعرف من هو؟ فقيل هو عمارة، وقيل: يزيد، وقيل: غير ذلك، ثم هل هو خزيمة بن ثابت أو خزيمة بن معمر الأنصاري. وكل ذلك يوهن هذا الحديث ويجعله مضطربا كما قال البخاري إلا أن الحافظ ابن حجر حسّن إسناده في الفتح (12/ 84) بعد أن عزاه إلى أحمد من حديث خزيمة بن ثابت فلعله لأجل شاهده.

تنبيه: لقد سقطت الواسطة بين محمد بن المنكدر وبين خزيمة بن ثابت وهو"ابن خزيمة" في بعض نسخ أحمد، والصحيح إثباته كما ذكره ابن حجر في الأطراف (2/ 311).




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা একটি মজলিসে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "তোমরা আমার কাছে এই মর্মে বাইয়াত (শপথ) গ্রহণ করো যে, তোমরা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না, চুরি করবে না এবং ব্যভিচার করবে না।" আর তিনি এই সম্পূর্ণ আয়াতটি পাঠ করলেন: "তোমাদের মধ্যে যে এই অঙ্গীকার পূর্ণ করবে, তার পুরস্কার আল্লাহর উপর ন্যস্ত। আর যে ব্যক্তি এর কোনো একটি কাজ করে বসবে এবং তাকে সে কারণে শাস্তি দেওয়া হবে, তবে তা তার জন্য কাফ্ফারা (গুনাহের প্রায়শ্চিত্ত) হবে। আর যে ব্যক্তি এর কোনো একটি কাজ করে ফেলবে এবং আল্লাহ তা গোপন রাখবেন, তবে তিনি চাইলে তাকে ক্ষমা করবেন, অথবা চাইলে তাকে শাস্তি দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6684)


6684 - عن ابن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يحل دم امرئ مسلم يشهد أن لا إله إلا الله وأني رسول الله إلا بإحدى ثلاث: النفس بالنفس، والثيب الزاني، والمفارق لدينه التارك للجماعة".

متفق عليه: رواه البخاري في الديات (6878)، ومسلم في القيامة (1676) كلاهما من طريق الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن مسروق، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.

وأولياء المقتول هم الورثة رجالًا ونساءً.




ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কোনো মুসলিম ব্যক্তির রক্তপাত বৈধ নয়, যে সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল—তবে তিনটি কারণের কোনো একটি হলে: জীবনের বদলে জীবন (হত্যাকারী), বিবাহিত ব্যভিচারী, এবং যে ব্যক্তি দ্বীন ত্যাগ করে জামা'আত (মুসলিম সমাজ) থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (6685)


6685 - عن وائل بن حجر قال: إني لقاعد مع النبي صلى الله عليه وسلم إذ جاء رجل يقود آخر بنسعة فقال: يا رسول الله! هذا قتل أخي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أقتلته؟" فقال: إنه لو لم يعترف أقمت عليه البينة قال: نعم قتلته. قال:"كيف قتلته؟" قال: كنت أنا وهو نختبط من شجرة، فسبّني فأغضبني، فضربته بالفأس على قرنه فقتلته. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"هل لك من شيء تؤديه عن نفسك؟" قال: ما لي مال إلا كسائي وفأسي. قال:"فترى قومك يشترونك؟" قال: أنا أهون على قومي من ذاك. فرمى إليه بنسعته وقال:"دونك صاحبك" فانطلق به الرجل. فلما ولّى قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن قتله فهو مثله" فرجع، فقال: يا رسول الله، إنه بلغني أنك قلت:"إن قتله فهو مثله"، وأخذته بأمرك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما تريد أن يبوء بإثمك وإثم صاحبك؟". قال: يا نبي
الله! لعله قال: بلى، قال:"فإن ذاك كذاك" قال: فرمى بنسعته وخلّى سبيله.

صحيح: رواه مسلم في القيامة (1680: 32) عن عبيد الله بن معاذ العنبري، حدثنا أبي، حدثنا أبو يونس، عن سماك بن حرب، عن علقمة بن وائل، حدثه، أن أباه حدثه، فذكره.




ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে উপবিষ্ট ছিলাম, এমন সময় এক ব্যক্তি অন্য একজনকে চামড়ার রশি দিয়ে টেনে নিয়ে আসলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এ ব্যক্তি আমার ভাইকে হত্যা করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি তাকে হত্যা করেছো?" লোকটি বলল: যদি সে স্বীকার না করে, তবে আমি তার বিরুদ্ধে প্রমাণ পেশ করব। (এরপর সে বলল:) হ্যাঁ, আমি তাকে হত্যা করেছি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কীভাবে হত্যা করলে?" সে বলল: আমি এবং সে একটি গাছ থেকে পাতা ঝরাচ্ছিলাম (বা ডাল কাটছিলাম)। তখন সে আমাকে গালি দিল এবং আমাকে রাগান্বিত করল। ফলে আমি তাকে কুড়াল দিয়ে তার কপালে আঘাত করলাম এবং তাকে হত্যা করে ফেললাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার কি এমন কিছু আছে যা দিয়ে তুমি নিজেকে মুক্ত করতে পারো (অর্থাৎ দিয়ত দিতে পারো)?" সে বলল: আমার কাছে আমার চাদর ও কুড়াল ছাড়া অন্য কোনো সম্পদ নেই। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার গোত্রের লোকেরা কি তোমার পক্ষ থেকে মুক্তিপণ দিয়ে তোমাকে ক্রয় করবে?" সে বলল: আমি আমার গোত্রের কাছে তার (আমার জীবনের মূল্যের) চেয়েও তুচ্ছ। তখন (নিহতের ভাই) তার চামড়ার রশিটি তার দিকে ছুঁড়ে মারলেন এবং বললেন: "তোমার সঙ্গী তোমার কাছেই রইল।" অতঃপর লোকটি তাকে নিয়ে চলে গেল। যখন লোকটি ফিরে গেল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে তাকে হত্যা করে, তবে সেও তার মতোই (পাপী হবে)।" (এ কথা শুনে) লোকটি ফিরে আসলো এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল, আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে আপনি বলেছেন: "যদি সে তাকে হত্যা করে, তবে সেও তার মতোই (পাপী হবে)," অথচ আমি আপনার নির্দেশেই তাকে ধরেছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি চাও না যে সে তোমার ও তোমার সঙ্গীর পাপের বোঝা বহন করুক?" বর্ণনাকারী বলেন: সম্ভবত লোকটি বলল: হ্যাঁ (আমি চাই)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তবে সেটাই তেমন (অর্থাৎ, দিয়ত ছাড়াই ক্ষমা করলে খুনি নিহত ব্যক্তির পাপও বহন করবে)!" বর্ণনাকারী বলেন: তখন সে চামড়ার রশিটি ছুঁড়ে ফেলে দিল এবং তাকে মুক্ত করে দিল।









আল-জামি` আল-কামিল (6686)


6686 - عن أبي هريرة قال: قتل رجل على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فرفع ذلك إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فدفعه إلى ولي المقتول، فقال القاتل: يا رسول الله! والله ما أردت قتله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم للولي:"أما إنه إن كان صادقًا، ثم قتلته دخلت النار" قال: فخلّى سبيله. قال: وكان مكتوفًا بنسعة فخرج يجر نسعته، فسُمِّي ذا النسعة.

صحيح: رواه أبو داود (4498)، والترمذي (1407) والنسائي (4722) وابن ماجه (2690) كلهم من حديث أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

قال الترمذي:"حسن صحيح". والنسعة: حبل.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তিকে হত্যা করা হয়েছিল। বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উত্থাপন করা হলো। তিনি (নবী) তাকে (ঘাতককে) নিহত ব্যক্তির অভিভাবকের কাছে সোপর্দ করলেন। তখন হত্যাকারী বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহর কসম, আমি তাকে হত্যা করতে চাইনি। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই অভিভাবককে বললেন: "যদি সে সত্যবাদী হয় এবং এরপরও তুমি তাকে হত্যা করো, তবে তুমি জাহান্নামে প্রবেশ করবে।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন সে (অভিভাবক) তার (ঘাতকের) পথ ছেড়ে দিল (তাকে ক্ষমা করে দিল)। বর্ণনাকারী বলেন, তাকে একটি চামড়ার ফিতা (নিস'আ) দিয়ে বাঁধা হয়েছিল। সে সেই ফিতা টেনে নিয়ে বেরিয়ে গেল, তাই তাকে ‘যুন্-নিস'আ’ (ফিতাধারী) নামে ডাকা হতো।









আল-জামি` আল-কামিল (6687)


6687 - عن أنس بن مالك قال: أتى رجل بقاتل وليه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"اعف" فأبى. فقال:"خذ أرشك" فأبى. قال:"اذهب فاقتله، فإنك مثله" قال: فلُحق به. فقيل له: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد قال:"اقتله فإنك مثله" فخلى سبيله. قال: فرئي يجر نسعته ذاهبا إلى أهله. قال: كأنه قد كان أوثقه.

حسن: رواه ابن ماجه (2691) والنسائي (4730) وابن أبي عاصم في الديات (101، 221) كلهم من حديث ضمرة بن ربيعة، عن ابن شوذب، عن ثابت البناني، عن أنس بن مالك فذكره.

وإسناده حسن من أجل ضمرة بن ربيعة وشيخه ابن شوذب واسمه عبد الله وهما صدوقان.

وقال ابن ماجه: قال أبو عمير في حديثه. قال ابن شوذب، عن عبد الرحمن بن القاسم: فليس لأحد بعد النبي صلى الله عليه وسلم أن يقول:"اقتله فإنك مثله" قال ابن ماجه: هذا حديث الرملين، ليس إلا عندهم. انتهى.

وقال ابن أبي عاصم: كأن معناه في قول النبي صلى الله عليه وسلم: إنك إن قتلته فأنت مثله، لأمر أطلع الله نبيه صلى الله عليه وسلم.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার অভিভাবকের (আত্মীয়ের) হত্যাকারীকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "ক্ষমা করে দাও।" কিন্তু সে অস্বীকার করল। অতঃপর তিনি বললেন: "রক্তপণ (দিয়াহ) গ্রহণ করো।" সে এতেও অস্বীকার করল। তিনি বললেন: "যাও, তাকে হত্যা করো। তবে তুমিও তার মতোই হবে।" আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তাকে (হত্যাকারীকে) পাকড়াও করা হলো। তাকে বলা হলো যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তাকে হত্যা করো, তবে তুমিও তার মতোই হবে।" তখন (হত্যাকারীর অভিভাবক) তাকে ছেড়ে দিল। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তাকে দেখা গেল যে, সে তার (মুক্তিপ্রাপ্ত) রশিটি টানতে টানতে তার পরিবারের দিকে যাচ্ছিল। যেন সে তাকে বেঁধে রেখেছিল।