হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6761)


6761 - عن عبادة بن الصامت قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في مجلس فقال:"تبايعوني على أن لا تشركوا بالله شيئا، ولا تزنوا، ولا تسرقوا، ولا تقتلوا النفس التي حرم الله إلا بالحق. فمن وفى منكم فأجره على الله، ومن أصاب شيئا من ذلك فعوقبَ به، فهو كفارة له، ومن أصاب شيئا من ذلك، فستر الله عليه فأمره إلى الله، إن شاء عفا عنه، وإن شاء عذّبه".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6784) ومسلم في الحدود (1709/ 41) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن أبي إدريس، عن عبادة بن الصامت فذكره. واللفظ لمسلم.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক মজলিসে ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "তোমরা আমার কাছে এই মর্মে বাইয়াত (শপথ) গ্রহণ করো যে, তোমরা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে অংশীদার করবে না, ব্যভিচার করবে না, চুরি করবে না এবং আল্লাহ যে আত্মাকে হত্যা করা হারাম করেছেন, ন্যায়সঙ্গত কারণ (হক) ব্যতীত তাকে হত্যা করবে না। তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি (এসব অঙ্গীকার) পূর্ণ করবে, তার প্রতিদান আল্লাহর উপর। আর যে ব্যক্তি এর কোনো একটি কাজ করে ফেলে এবং এর জন্য তাকে শাস্তি দেওয়া হয়, তবে তা তার জন্য কাফ্ফারা (গুনাহের প্রায়শ্চিত্ত) হবে। আর যে ব্যক্তি এর কোনো একটি কাজ করে ফেলে এবং আল্লাহ তার উপর তা গোপন রাখেন, তবে তার বিষয়টি আল্লাহর উপর ন্যস্ত। তিনি চাইলে তাকে ক্ষমা করবেন এবং তিনি চাইলে তাকে শাস্তি দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6762)


6762 - عن عبادة بن الصامت قال: أخذ علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم كما أخذ على النساء: أن لا نشرك بالله شيئا، ولا نسرق، ولا نزني، ولا نقتل أولادنا، ولا يعضه بعضنا بعضا."فمن وفى منكم فأجره على الله، ومن أتى منكم حدا فأقيم عليه فهو كفارته، ومن
ستره الله عليه فأمره إلى الله، إن شاء عذّبه وإن شاء غفر له".

صحيح: رواه مسلم في الحدود (1709/ 43) عن إسماعيل بن سالم، أخبرنا هشيم، أخبرنا خالد، عن أبي قلابة، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن عبادة، فذكره.

وقوله:"ولا يعضه" معناه لا يرميه بالعضيهة وهي البهتان.

هذا القيد بين المقصود من الحديث بأنه لا يشمل الشرك بالله الذي ذكر في أول الحديث لأن الله قال: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ} [النساء: 48] فإن الشرك ليس تحت المشيئة. فإذا ارتد المسلم، وصار مشركافقتل على ارتداده فهذا القتل لا يكون كفارة له، إنما هو مخصوص بالمسلم الذي أتى بالحد من الزنا والسرقة والفرية والشرب وغيرها.

قال الشافعي:"لم أسمع في هذا الباب أن الحد كفارة لأهله شيئًا أحسن من هذا الحديث. وقال: وأحب لمن أصاب ذنبا فستره الله عليه أن يستر على نفسه، ويتوب فيما بينه وبين ربه" ذكره الترمذي (1439).




উবাদাহ ইবনে সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট থেকে এমন শপথ গ্রহণ করেন যেমন তিনি মহিলাদের নিকট থেকে নিয়েছিলেন— এই মর্মে যে, আমরা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করব না, চুরি করব না, ব্যভিচার করব না, আমাদের সন্তানদেরকে হত্যা করব না এবং আমাদের কেউ কাউকে মিথ্যা অপবাদ দেব না।

তোমাদের মধ্যে যে এই অঙ্গীকার পূর্ণ করবে, তার প্রতিদান আল্লাহর দায়িত্বে। আর তোমাদের মধ্যে যে কেউ কোনো অপরাধ করবে যার জন্য শরীয়তি দণ্ড (হদ্দ) রয়েছে এবং তার উপর তা প্রয়োগ করা হবে, তবে তা তার জন্য কাফফারাস্বরূপ হবে। আর যাকে আল্লাহ গোপন রাখবেন (অর্থাৎ যার পাপ গোপন থাকবে), তার বিষয়টি আল্লাহর কাছে। তিনি ইচ্ছা করলে তাকে শাস্তি দেবেন, আর ইচ্ছা করলে তাকে ক্ষমা করে দেবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6763)


6763 - عن علي، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أصاب حدًّا فعُجّلت عقوبتُه في الدنيا، فالله أعدل من أن يثنّي على عبده العقوبة في الآخرة، ومن أصاب حدًّا فستره الله عليه، وعفا عنه فالله أكرم من أن يعود في شيء قد عفا عنه".

حسن: رواه الترمذي (2626) وابن ماجه (2604) وأحمد (775) والدارقطني (3/ 215) والطحاوي في مشكله (2181) والحاكم (2/ 445) والبيهقي (8/ 328) كلهم من حديث حجاج بن محمد، عن يونس بن أبي إسحاق، عن أبي إسحاق الهمداني، عن أبي جحيفة، عن علي فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في يونس بن أبي إسحاق في روايته عن أبيه أبي إسحاق إلا أنه حسن الحديث إذا لم يخالفه، وإن كان ابنه إسرائيل بن يونس أوثق منه في جده أبي إسحاق.

ومن خالفه فرواه عن أبي إسحاق موقوفا لا يساوي شيئًا.

ذكر الدارقطني في العلل (3/ 128 - 129) بعض هؤلاء من رووه عن أبي إسحاق عن أبي جحيفة موقوفا ثم قال:"ورفعه صحيح".

وقال الترمذي:"حسن غريب صحيح" وفي نسخة:"حسن غريب".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين". والصواب أنه حسن كما قلت.

وفي الباب ما رُوي عن خزيمة بن ثابت عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أصاب ذنبًا أقيم حدُّ ذلك الذنب فهو كفارته".

رواه أحمد (21866) والطبراني (3731) والدارقطني (3/ 214) والحاكم (4/ 388) كلهم من حديث أسامة بن زيد، عن محمد بن المنكدر، عن ابن خزيمة بن ثابت، عن أبيه فذكره.
قال الحاكم: صحيح الإسناد.

وهو كما قال من ظاهر الإسناد، ولا يضر عدم تسمية ابن خزيمة فإنه عمارة بن خزيمة وهو ثقة معروف من روايته عن أبيه، وحسن إسناده ابن حجر في الفتح (1/ 67)، (12/ 84) ولكن وقع الخلاف على أسامة بن زيد، فإنه وصف بكثير الخطأ وإن كان هو صدوقا في نفسه، فمرة روي هكذا. وأخرى كما سيأتي.

وقد سأل الترمذي البخاري كما في"العلل الكبير" (2/ 206) عن هذا الحديث فقال:"هذا حديث فيه اضطراب" وضعّفه جدًّا.

قال: وقال محمد: وقد رُوي عن أسامة بن زيد، عن رجل، عن بكير بن الأشج، عن محمد بن المنكدر، عن خزيمة بن ثابت.

ورواه المنكدر بن محمد، عن أبيه، عن خزيمة بن معمر. انتهى.

والمنكدر بن محمد مختلف فيه فقال الإمام أحمد:"ثقة" وقال ابن معين:"ليس به بأس" وضعّفه النسائي والجوزجاني والعجلي.

وقال أبو زرعة:"ليس بقوي" وقال أبو حاتم:"كان رجلًا صالحًا لا يفهم الحديث، وكان كثير الخطأ".

وأما ما روي عن الزهري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما أدري أعزير نبيًا كان أم لا، وتبع لعينا كان أم لا، والحدود كفارات لأهلها أم لا" فهذا صحيح مرسلًا.

رواه البخاري في التاريخ الكبير (1/ 152) قال: قال لي عبد الله بن محمد، حدثنا هشام قال: حدثنا معمر، عن ابن أبي ذئب، عن الزهري فذكره.

ورواه أبو داود (4674) من طريق عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن أبي ذئب، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة مرفوعًا:"ما أدري أتبع لعين هو أم لا؟ ما أدري أعزير نبي هو أم لا؟" ولم يذكر فيه:"الحدود كفارات لأهلها".

ورواه أيضا الحاكم (1/ 92) من طريق عبد الرزاق وذكر فيه:"ما أدري الحدود كفارات لأهلها أم لا".

قال البخاري:"والأول أصح، ولا يثبت هذا عن النبي صلى الله عليه وسلم لأن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الحدود كفارة" وكذا رجح الإرسال غير واحد من أهل العلم، لأن هشاما وهو ابن يوسف الصنعاني أوثق وأضبط من عبد الرزاق. سئل أبو حاتم الرازي عن هشام وعبد الرزاق ومحمد بن ثور فقال: كان هشام أكبرهم وأحفظهم وأتقن. الجرح والتعديل (9/ 71).

فكان ترجيح البخاري للإرسال من وجهين:

أحدهما: مخالفته للحديث الصحيح.

والثاني: هشام بن يوسف الصنعاني أوثق من عبد الرزاق وسيأتي مزيد من الكلام في أخبار
الماضيين. ولا يقال حديث أبي هريرة متقدم على حديث عبادة بن الصامت ليكون حديث عبادة ناسخًا لحديث أبي هريرة، لأن حديث عبادة كان بمكة ليلة العقبة لما بايع النبي صلى الله عليه وسلم الأنصار بمنى، وحديث أبي هريرة يكون متأخرًا، لأنه أسلم بعد ذلك بسبع سنين عام خيبر إلا أن الحافظ ابن حجر ينكر أن يكون حديث عبادة بمكة وعلى فرض التسليم فإنه ذكر تأويلات بعد أن صحّح حديث أبي هريرة. انظر"الفتح" (1/ 61).

وقال الهيثمي في"المجمع (6/ 265) فقال: رواه البزار - كشف الأستار - (1543) بإسنادين، رجال أحدهما رجال الصحيح غير أحمد بن منصور الرمادي وهو ثقة.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো দণ্ডনীয় অপরাধ (হুদ) সংঘটিত করার পর দুনিয়াতেই তার শাস্তি ভোগ করে নেয়, আল্লাহ এর চেয়েও ন্যায়পরায়ণ যে, তিনি তাঁর বান্দার উপর আখিরাতে পুনরায় শাস্তি চাপিয়ে দেবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো দণ্ডনীয় অপরাধ সংঘটিত করে, কিন্তু আল্লাহ তাকে গোপন রাখেন এবং তাকে ক্ষমা করে দেন, তবে আল্লাহ এর চেয়েও মহান যে, তিনি এমন বিষয়ে প্রত্যাবর্তন করবেন (অর্থাৎ পুনরায় শাস্তি দেবেন) যা তিনি ক্ষমা করে দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (6764)


6764 - عن عبادة بن الصامت قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أقيموا حدود الله في القريب والبعيد، ولا تأخذكم في الله لومة لائم".

حسن: رواه ابن ماجه (2540) عن عبد الله بن سالم المفلوج، قال: حدثنا عبيدة بن الأسود، عن القاسم بن الوليد، عن أبي صادق، عن ربيعة بن ناجد، عن عبادة بن الصامت فذكره. ومن هذا الطريق رواه عبد الله بن أحمد في زوائده (22795) مطولا، وسيأتي في كتاب الجهاد.

وفيه ربيعة بن ناجد الأزدي، ويقال الأسدي الكوفي، ذكره ابن حبان في"ثقاته" وقال العجلي: كوفي تابعي ثقة، واعتمد الحافظ ابن حجر توثيقهما فقال في التقريب:"ثقة" وهو ليس بثقة بل"مجهول" لأنه لم يرو عنه غير أبي صادق، وأما توثيق ابن حبان والعجلي فهو على قاعدتهما في توثيق من لم يعرف فيه جرح، وقد جَهَّلَه الذهبي في"المغني".

ولكن الحديث له إسناد آخر وهو ما رواه عبد الله بن أحمد (22776) عن يحيى بن عثمان أبي زكريا البصري الحربي، حدثنا إسماعيل بن عياش، عن أبي بكر بن عبد الله، عن أبي سلام، عن المقدام بن معدي كرب الكندي أنه جلس مع عبادة بن الصامت وأبي الدرداء والحارث بن معاوية الكندي. فتذاكروا الحديث فقال أبو داود لعبادة: يا عبادة! كلمات رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة كذا في شأن الأخماس. فقال عبادة: فذكر الحديث بطوله. وجاء فيه:"أقيموا حدود الله في الحضر والسفر".

ورواه الإمام أحمد (22680، 22690) عن إسحاق بن عيسى، حدثنا إسماعيل بن عياش بإسناده مختصرًا ومطولًا ومداره على أبي بكر بن عبد الله هو ابن أبي مريم الغاني الشامي ضعيف. قال ابن حبان: كان من خيار أهل الشام، لكن كان رديء الحفظ، يحدث بالشيء فيهم، فكثر ذلك منه حتى استحق الترك.

وللحديث إسناد ثالث وهو ما رواه عبد الله بن أحمد (22777) عن يحيى بن عثمان، حدثنا إسماعيل بن عياش، عن سعيد بن يوسف، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلّام نحوه.

وسعيد بن يوسف هو الرحبي، ويقال: الزرقي من صنعاء دمشق ضعيف وبمجموع هذه الطرق
يكون الحديث حسنا.

رُوي في هذا الباب عن أبي هريرة، وابن عباس، وابن عمر.

فأما حديث أبي هريرة فرواه الإمام أحمد (8738) وابن ماجه (2538) والنسائي (4904) وابن الجارود (801) وصحّحه ابن حبان (4398) كلهم من حديث عبد الله بن المبارك، عن عيسى بن يزيد، عن جرير بن يزيد، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حد يقام في الأرض خير للناس من أن يمطروا ثلاثين - أو أربعين صباحًا".

وفيه جرير بن يزيد بن عبد الله البجلي ضعيف باتفاق أهل العلم.

تنبيه: وقع سقط في نسخة ابن حبان المطبوعة بين عيسى بن يزيد وبين أبي هريرة فسقط منه"جرير بن يزيد عن أبي زرعة" ورواه ابن حبان (3497) عن ابن قتيبة، حدثنا محمد بن قدامة، حدثنا ابن علية، عن يونس بن عبيد، عن عمرو بن سعيد، عن أبي زرعة بن عمرو، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إقامة حد بأرض خير لأهلها من مطر أربعين صباحًا".

ظاهر إسناده السلامة، ولكنه معلول، فإن أصحاب ابن علية (وهو إسماعيل ابن علية) اختلفوا عليه، فرواه محمد بن قدامة وهو ابن أيمن المصيصي هكذا. قال النسائي:"لا بأس به"، وقال الدارقطني:"ثقة".

وخالفه عمرو بن زرارة فرواه عن إسماعيل ابن علية قال: حدثنا يونس بن عبيد، عن جرير بن يزيد، عن أبي زرعة قال: قال أبو هريرة فذكره موقوفا عليه.

رواه النسائي (4905) عن عمرو بن زرارة. وعمرو بن زرارة الكلابي أوثق من محمد بن قدامة. وقد خالفه في موضعين:

الأول: جعل جرير بن يزيد شيخ يونس بن عبيد. وجرير بن يزيد ضعيف كما مضى. والثاني: رواه موقوفًا على أبي هريرة. وهذا هو الصحيح، وهو الذي رجّحه أيضا الدارقطني في العلل (11/ 213).

وأما حديث ابن عباس فرواه الطبراني في الكبير (11/ 337) والبيهقي (8/ 162) كلاهما من حديث أحمد بن يونس، ثنا سعيد أبو غيلان، ثنا عفان بن جبير الطائي، عن أبي جرير أو حريز الأزدي، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: اليوم من إمام عادل أفضل من عبادة ستين سنة، وحد يقام في الأرض بحقه أزكى فيها من مطر أربعين عامًا" واللفظ للطبراني. وعند البيهقي:"أربعين يومًا" وفيه رجال لا يعرفون كما قال الهيثمي في"المجمع" (6/ 263).

قلت: وفي متنه نكارة في قوله:"أربعين عامًا" ولذا قال المنذري في الترغيب والترهيب (3582): وهو غريب بهذا اللفظ إلا أنه حسّن إسناده.

وأما حديث ابن عمر فرواه ابن ماجه (2537) ولفظه:"إقامة حد من حدود الله خير من مطر أربعين ليلة في بلاد الله عز وجل".
وفيه سعيد بن سنان الحنفي الحمصي رماه الدارقطني وغيره بالوضع.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা আল্লাহর নির্ধারিত দণ্ডসমূহ (হুদুদ) নিকটবর্তী ও দূরবর্তী সকলের উপর প্রতিষ্ঠা করো এবং আল্লাহর (বিধান পালনের) ব্যাপারে যেন কোনো নিন্দুকের নিন্দা তোমাদেরকে প্রভাবিত না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (6765)


6765 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: ما خُيّر رسول الله صلى الله عليه وسلم في أمرين قط إلا أخذ أيسرهما، ما لم يكن إثمًا، فإن كان إثمًا كان أبعد الناس منه، وما انتقم رسول الله صلى الله عليه وسلم لنفسه، إلا أن تنتهك حرمة الله، فينتقم الله بها.

متفق عليه: رواه مالك في حسن الخلق (2) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته، ورواه البخاري في المناقب (3560)، ومسلم في الفضائل (2327) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

ورواه البخاري في الحدود (6786) من طريق عقيل، عن ابن شهاب، به، نحوه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যখনই দুটি বিষয়ের মধ্যে যেকোনো একটি বেছে নিতে বলা হয়েছে, তিনি সর্বদা সহজতমটিই গ্রহণ করতেন, যতক্ষণ না তা কোনো গুনাহের কাজ হতো। আর যদি তা গুনাহের কাজ হতো, তবে তিনি ছিলেন সকল মানুষের মধ্যে তা থেকে সবচেয়ে দূরে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের জন্য কখনও প্রতিশোধ নেননি, তবে আল্লাহর পবিত্র সীমা যদি লঙ্ঘিত হতো, তবে তিনি আল্লাহর জন্যই প্রতিশোধ গ্রহণ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6766)


6766 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن قريشًا أهمهم شأن المرأة التي سرقت في عهد النبي صلى الله عليه وسلم في غزوة الفتح. فقالوا: من يكلّم فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم فكلمه فيها أسامة بن زيد. فتلوّن وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أتشفع في حد من حدود الله؟" فقال له أسامة: استغفر لي يا رسول الله، فلما كان العشي قام رسول الله صلى الله عليه وسلم فاختطب. فأثنى على الله بما هو أهله. ثم قال:"أما بعد، فإنما أهلك من كان قبلكم، أنهم كانوا إذا سرق فيهم الشريف، تركوه، وإذا سرق فيهم الضعيف، أقاموا عليه الحد. وإني، والذي نفسي بيده! لو أن فاطمة بنت محمد سرقت لقطعت يدها" ثم أمر بتلك المرأة التي سرقت فقطعت يدها.

قال يونس: قال ابن شهاب: قال عروة: قالت عائشة: فحسنت توبتها بعد، وتزوجت، وكانت تأتيني بعد ذلك فأرفع حاجتها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6788) ومسلم في الحدود (1688) كلاهما عن طريق الليث، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة.

ورواه مسلم من طريق يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، بإسناده عن عائشة، فذكرته والسياق له.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ফাত্হে মক্কা যুদ্ধের সময় এক মহিলা চুরি করলে কুরাইশদের জন্য তা দুশ্চিন্তার কারণ হয়ে দাঁড়াল। তারা বলল: কে এ ব্যাপারে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলবে? তখন উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ বিষয়ে তাঁর সাথে কথা বললেন। এতে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখমণ্ডল বিবর্ণ হয়ে গেল। তিনি বললেন: "তুমি কি আল্লাহর নির্ধারিত শাস্তি (হদ)-এর ব্যাপারে সুপারিশ করছো?" তখন উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন। অতঃপর সন্ধ্যার সময় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন। তিনি আল্লাহর যথোপযুক্ত প্রশংসা করলেন। এরপর বললেন: "শোনো! তোমাদের পূর্ববর্তীদের ধ্বংসের কারণ এই ছিল যে, তাদের মধ্যে যখন কোনো সম্ভ্রান্ত লোক চুরি করত, তখন তারা তাকে ছেড়ে দিত। আর যখন কোনো দুর্বল লোক চুরি করত, তখন তার ওপর শাস্তি কার্যকর করত। আর যার হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! যদি মুহাম্মাদের কন্যা ফাতিমাও চুরি করত, তবে আমি অবশ্যই তার হাত কেটে দিতাম।" এরপর তিনি ওই মহিলাটির ব্যাপারে নির্দেশ দিলেন, যে চুরি করেছিল, ফলে তার হাত কেটে দেওয়া হলো।

উরওয়াহ বলেন, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: এরপর ওই মহিলার তওবা সুন্দর হয়েছিল এবং সে বিয়ে করেছিল। পরবর্তী সময়ে সে আমার কাছে আসত, তখন আমি তার প্রয়োজন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তুলে ধরতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (6767)


6767 - عن بهز بن حكيم بن معاوية، عن أبيه، عن جده قال: أخذ النبي صلى الله عليه وسلم ناسًا من قومي في تهمة، فحبسهم، فجاء رجل من قومي إلى النبي صلى الله عليه وسلم وهو يخطب فقال: يا محمد، علام تحبس جيرتي؟ فصمت النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إن ناسًا ليقولون: إنك تنهى عن
الشر وتستخلي به، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ما يقول؟" قال: فجعلت أعرّض بينهما بالكلام مخافة أن يسمعها، فيدعو على قومي دعوة لا يُفلِحون بعدها أبدًا. فلم يزل النبي صلى الله عليه وسلم به حتى فهمها. فقال:"قد قالوها أو قائلها منهم؟ والله لو فعلتُ لكان عليّ وما كان عليهم، خلُّوا له عن جيرانه".

حسن: رواه أحمد (20019) عن عبد الرزاق وهو في مصفه (18891) عن معمر، عن بهز بن حكيم بإسناده.

واختصره أبو داود (3630) والترمذي (1417) والنسائي (4876) والحاكم (4/ 102) كلهم من حديث معمر، عن بهز بإسناده يقوله: إن النبي صلى الله عليه وسلم حبس رجلا في تهمة، ثم خلّى عنه.

قال الترمذي:"حديث حسن".

قلت: وهو كما قال فإن بهز بن حكيم بن معاوية القشيري مختلف فيه غير أنه حين الحديث.




মু'আবিয়া ইবন হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার গোত্রের কিছু লোককে একটি সন্দেহের (অভিযোগের) কারণে গ্রেফতার করলেন এবং তাদের আটকে রাখলেন। অতঃপর আমার গোত্রের এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, যখন তিনি খুতবা দিচ্ছিলেন। লোকটি বলল: হে মুহাম্মাদ, কেন আপনি আমার প্রতিবেশীদেরকে আটকে রেখেছেন? নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব রইলেন। তখন লোকটি বলল: কিছু লোক বলে যে, আপনি মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করেন, অথচ আপনি নিজেই তা গোপনে করেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সে কী বলছে?” বর্ণনাকারী বলেন: আমি তখন (কথাটির ভয়াবহতা আঁচ করে) তাদের দু'জনের মাঝে ঘুরিয়ে পেঁচিয়ে কথা বলতে শুরু করলাম, এই ভয়ে যে, তিনি (নবী) যেন তা শুনে না ফেলেন এবং আমার গোত্রের উপর এমন অভিশাপ না দেন, যার পরে তারা আর কখনো সফল হবে না। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার (প্রশ্নকারী লোকটির) সাথে আলোচনা চালিয়ে গেলেন যতক্ষণ না তিনি (কথাটি) বুঝে ফেললেন। অতঃপর তিনি বললেন: “তারা কি এ কথা বলেছে? অথবা তাদের কেউ কি এ কথা বলেছে? আল্লাহর শপথ, আমি যদি এমন কাজ করতাম, তবে তার ভার আমার উপরই আসতো, তাদের উপর নয়। তার প্রতিবেশীদের ছেড়ে দাও।”









আল-জামি` আল-কামিল (6768)


6768 - عن النعمان بن بشير أنه رفع إليه نفر من الكلاعيين أن حاكة سرقوا متاعًا لهم، فحبسهم أيامًا، ثم خلى سبيلهم. فأتوه فقالوا: خليت سبيل هؤلاء بلا امتحان ولا ضرب. فقال النعمان: ما شئتم، إن شئتم أضربهم فإن أخرج الله متاعكم فذاك. وإلا أخذت من ظهوركم مثله. قالوا: هذا حكمك؟ قال: هذا حكم الله عز وجل ورسوله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه النسائي (4874) وأبو داود (4382) كلاهما من حديث بقية بن الوليد، قال حدثني صفوان بن عمرو، قال: حدثني أزهر بن عبد الله الحرازي، عن النعمان بن بشير فذكره.

قال أبو داود: إنما أرهبهم بهذا القول أي لا يجب الضرب إلا بعد الاعتراف.

وإسناده حسن من أجل أزهر بن عبد الله الحرازي الحمصي. قال البخاري:"أزهر بن عبد الله وأزهر بن سعيد وأزهر بن يزيد واحد نسبوه مرة: مرادي، ومرة: هوزني، ومرة حرازي".

قال ابن حجر: ووافقه جماعة على ذلك" وأما شرح حال أزهر فلم يذكر المزي شيئا منه في الترجمتين، وقد قال ابن الجارود في كتاب الضعفاء: كان يسب عليًّا.

ثم قال: لم يتكلموا إلا في مذهبه، وقد وثّقه العجلي.

وقال في التقريب:"صدوق" وكذلك قال في أزهر بن سعيد الحرازي.

وأما بقية بن الوليد فهو مدلس، كثير التدليس عن الضعفاء، كما أنه مختلف في توثيقه وتضعيفه غير أنه حسن الحديث إذا صرّح كما هنا. وفي الباب أحاديث أخرى لا تصح.



رواه الترمذي (1424) والدارقطني (3/ 84) والحاكم (4/ 384) والبيهقي (8/ 238) كلهم من طريق يزيد بن زياد الدمشقي، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد" رده الذهبي فقال: قال النسائي:"يزيد بن زياد شامي متروك".

وقال الترمذي:"حديث عائشة لا نعرفه مرفوعًا إلا من حديث محمد بن ربيعة، عن يزيد بن زياد الدمشقي …". وقال:"رواه وكيع، عن يزيد بن زياد نحوه ولم يرفعه .. ورواية وكيع أولى". وقال: وقد رُوي نحو هذا عن غير واحد من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم أنهم قالوا: مثل ذلك."ويزيد بن زياد الدمشقي ضعيف في الحديث". انتهى قول الترمذي.

وفي معناه أيضا ما رُويَ عن أبي هريرة مرفوعًا:"ادفعوا الحدود ما وجدتم له مدفعًا".

رواه ابن ماجه (2545) عن عبد الله بن الجرّاح، قال: حدثنا وكيع، عن إبراهيم بن الفضل، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده ضعيف فإن إبراهيم بن الفضل المخزومي المدني أبو إسحاق ضعيف باتفاق أهل العلم حتى قال الدارقطني:"متروك".

وفي معناه أيضا ما رُوي عن علي مرفوعًا:"ادرؤوا الحدود بالشبهات".

رواه الدارقطني والبيهقي. قال البيهقي: في هذا الإسناد ضعف.

قلت: فيه مختار التمار وهو مختار بن نافع التميمي وأبو إسحاق التمار ضعيف باتفاق أهل العلم. وفي معناه أحاديث أخرى لا يصح منها شيء.

ولكن صحّ عن بعض الصحابة درء الحدود بالشبهات. فقد جاء عن عمر بن الخطاب أنه قال:"لأن أخطئ في الحدود بالشبهات أحب إلي من أن أقيمها بالشبهات". رواه ابن أبي شيبة بإسناد صحيح.

وكذلك روي عن ابن مسعود وغيره، ودرءُ الحدود بالشبهات من عمدة الفقهاء والقضاة للمصلحة العامة، وأحاديث الباب مع ضعفها يعضد بعضه بعضا للحفاظ على حياة الإنسان، وسلامة أعضائه.




নূ'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিলাঈ গোত্রের কিছু লোক তাঁর কাছে এসে অভিযোগ জানাল যে কয়েকজন তাঁতি তাদের জিনিসপত্র চুরি করেছে। তিনি তাদের কয়েকদিন আটক করে রাখলেন, অতঃপর তাদের ছেড়ে দিলেন। তখন তারা (অভিযোগকারীরা) তাঁর কাছে এসে বলল: আপনি তো এদের কোনো পরীক্ষা বা মারধর ছাড়াই ছেড়ে দিলেন। তখন নূ'মান বললেন: তোমরা যা চাও, তাই হবে। তোমরা যদি চাও, আমি তাদের মারধর করব। যদি আল্লাহ্ তোমাদের মাল বের করে দেন (অর্থাৎ চুরি হওয়া মাল পাওয়া যায়), তবে সেটাই ভালো। আর যদি তা না হয়, তবে আমি তোমাদের পিঠ থেকে তার অনুরূপ (শাস্তি) নেব। তারা বলল: এটা কি আপনার নিজস্ব ফায়সালা? তিনি বললেন: এটাই মহামহিম আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ফায়সালা।









আল-জামি` আল-কামিল (6769)


6769 - عن عطية القرظي يقول: عُرضنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم: يوم قريظة، فكان من أنبت قُتل، ومن لم ينبت خلّي سبيله. فكنت فيمن لم ينبت فخلّي سبيلي.

وفي رواية:"فكشفوا عانتي، فوجدوها لم يَنبُت فجعلوني في السبي".

حسن: رواه أبو داود (4404) والترمذي (1584) وابن ماجه (2541) والنسائي (4981) وصحّحه ابن حبان (4780) والحاكم (3/ 35) كلهم من طرق عن عبد الملك بن عمير، قال: سمعت عطية القُرظي يقول: فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الملك بن عمير اللخمي فإنه حسن الحديث. قال الترمذي: حسن صحيح. وقال:"العمل على هذا عند بعض أهل العلم أنهم يرون الإنبات بلوغًا إن لم يُعرف احتلامه، ولا سنُّه وهو قول أحمد وإسحاق".




আতিয়াহ আল-ক্বুরাজী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরায়যা যুদ্ধের দিন আমাদেরকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে পেশ করা হয়েছিল। (সেই সময়) যার গুপ্তস্থানে লোম গজেছিল, তাকে হত্যা করা হয় এবং যার লোম গজায়নি, তার পথ ছেড়ে দেওয়া হয় (তাকে মুক্তি দেওয়া হয়)। আমিও তাদের মধ্যে ছিলাম যাদের লোম গজায়নি, ফলে আমার পথ ছেড়ে দেওয়া হয়।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "তখন তারা আমার নিম্নাংশ পরীক্ষা করে দেখল। তারা দেখল যে সেখানে লোম গজায়নি। ফলে তারা আমাকে যুদ্ধবন্দীদের (শিশু) তালিকায় অন্তর্ভুক্ত করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (6770)


6770 - عن وعن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا ضرب أحدكم فليتق الوجه".

حسن: رواه أبو داود (4493) عن أبي كامل، حدثنا أبو عوانة، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمر بن أبي سلمة فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

ورواه أحمد (7323) عن سفيان، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة وزاد فيه:"فإن الله خلق آدم على صورته" وقد أشار مسلم (2612) إلى رواية سفيان، عن أبي الزناد، بهذا الإسناد وقال:"إذا ضرب أحدكم".

وأصل حديث أبي هريرة في الصحيحين:"إذا قاتل أحدكم أخاه فليتجنب الوجه" وهو مخرج في موضعه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ (কাউকে) প্রহার করে, তখন সে যেন মুখমণ্ডলকে পরিহার করে চলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6771)


6771 - عن * *




৬৭৭১ - থেকে বর্ণিত ...









আল-জামি` আল-কামিল (6772)


6772 - عن عبد الله بن مسعود قال: سألت النبي صلى الله عليه وسلم أي الذنب أعظم عند الله؟ قال:"أن تجعل الله ندًّا وهو خلقك" قلت: إن ذلك لعظيم. قلت: ثم أي؟ قال:"وأن تقتل ولدك تخاف أن يطعم معك" قلت: ثم أي؟ قال:"أن تزاني حليلة جارك".

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4477) ومسلم في الإيمان (86) كلاهما عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن عمرو بن شُرحبيل، عن عبد الله بن مسعود فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম, আল্লাহর কাছে কোন পাপ সবচেয়ে বড়? তিনি বললেন: "তুমি আল্লাহর সমকক্ষ দাঁড় করাবে, অথচ তিনিই তোমাকে সৃষ্টি করেছেন।" আমি বললাম: এটি তো অবশ্যই গুরুতর। আমি বললাম: এরপর কোনটি? তিনি বললেন: "তুমি তোমার সন্তানকে হত্যা করবে এই ভয়ে যে সে তোমার সাথে আহার করবে।" আমি বললাম: এরপর কোনটি? তিনি বললেন: "তুমি তোমার প্রতিবেশীর স্ত্রীর সাথে ব্যভিচার করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6773)


6773 - عن سمرة بن جندب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم مما يكثر أن يقول لأصحابه:"هل رأى أحد منكم من رؤيا؟" قال: فيقص عليه من شاء الله أن يقص، وإنه قال ذات غداة:"إنه أتاني الليلة أتيان وإنهما ابتعثاني، وإنهما قالا لي: انطلق، وإني انطلقت معهما .." فذكر الحديث بطوله.

وفيه:"فانطلقنا فأتينا على مثل التنور - قال: وأحسب أنه كان يقول: فإذا فيه لَغط وأصوات. قال: فاطلعنا فيه فإذا فيه رجال ونساء عُراة، وإذا هم يأتيهم لهب من أسفل منهم، فإذا أتاهم ذلك اللهب ضَوضَوا، قال: قلت لهما: ما هؤلاء؟ قال: قالا لي: انطلق انطلق .." ثم أخبراه بذلك فقالا:"وأما الرجال والنساء العراة الذين في مثل بناء التنور فهم الزناة والزواني".

متفق عليه: رواه البخاري في التعبير (7047) عن مؤمل بن هشام بن أبي هاشم، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم، حدثنا عوف، حدثنا أبو رجاء، حدثنا سمرة بن جندب، فذكره. ورواه مسلم في الفضائل (2275/ 23) من وجه آخر عن أبي رجاء العطاردي مختصرا.




সمرة ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে প্রায়শই বলতেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ কি কোনো স্বপ্ন দেখেছো?" বর্ণনাকারী বলেন: তখন আল্লাহ যার জন্য ইচ্ছা করতেন, সে তাঁর কাছে তা বর্ণনা করত। একদিন সকালে তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আজ রাতে দুজন আগমনকারী আমার কাছে এসেছিলেন এবং তারা আমাকে জাগিয়ে তুললেন। তারা দুজন আমাকে বললেন: চলুন। আর আমি তাদের দুজনের সঙ্গে চললাম..." এরপর তিনি দীর্ঘ হাদিসটি বর্ণনা করলেন।

এবং সেই হাদিসে রয়েছে: "...আমরা চললাম এবং একটি তনূর (রুটি সেঁকার চুলা)-এর মতো কাঠামোর কাছে আসলাম। বর্ণনাকারী বলেন: আমি ধারণা করি তিনি বলেছিলেন: তখন তার মধ্যে শোরগোল ও শব্দ হচ্ছিল। তিনি বলেন: আমরা তার মধ্যে উঁকি মেরে দেখলাম, তাতে কিছু উলঙ্গ পুরুষ ও নারী রয়েছে। তাদের নিচের দিক থেকে তাদের কাছে আগুনের লেলিহান শিখা আসছিল। যখনই সেই শিখা তাদের কাছে আসত, তারা চিৎকার করত। তিনি বলেন: আমি তাদের দুজনকে বললাম: এরা কারা? তিনি বলেন: তারা দুজন আমাকে বললেন: চলুন, চলুন..." এরপর তারা দুজন সেই বিষয়ে তাঁকে খবর দিলেন এবং বললেন: "আর যারা তনূরের মতো কাঠামোর মধ্যে উলঙ্গ পুরুষ ও নারী রয়েছে, তারা হলো ব্যভিচারী পুরুষ ও ব্যভিচারিণী নারী।"









আল-জামি` আল-কামিল (6774)


6774 - عن أبي أمامة قال: إن فتى شابًا أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، ائذن لي بالزنا، فأقبل عليه القوم فزجروه وقالوا: مه مه فقال:"ادنه" فدنا منه قريبا قال: فجلس قال:"أتحبه لأمك؟" قال: لا، والله جعلني الله فداءك قال:"ولا الناس يحبونه لأمهاتهم" قال:"أفتحبه لابنتك؟" قال: لا والله يا رسول الله، جعلني الله فداءك. قال:"ولا الناس يحبونه لبناتهم" قال:"أفتحبه لأختك؟" قال: لا والله،
جعلني الله فداءك، قال:"ولا الناس يحبونه لأخواتهم" قال:"أفتحبه لعمتك؟ ، قال: لا والله، جعلني الله فداءك، قال: ولا الناس يحبونه لعماتهم" قال:"أفتحبه لخالتك؟" قال: لا والله، جعلني الله فداءك. قال:"ولا الناس يحبونه لخالاتهم" قال: فوضع يده عليه، وقال:"اللهم اغفر لذنبه، وطهر قلبه، وحصّن فرجه" قال: فلم يكن بعد ذلك الفتى يلتفت إلى شيء.

صحيح: رواه أحمد (22211) والطبراني (7679) كلاهما من طريق حَريز بن عثمان، ثنا سليم بن عامر، عن أبي أمامة فذكر الحديث. وإسناده صحيح.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক যুবক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে যিনা করার অনুমতি দিন।’ তখন উপস্থিত লোকেরা তার দিকে এগিয়ে এসে তাকে তিরস্কার করল এবং বলল, ‘থামো, থামো!’ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘তাকে কাছে আসতে দাও।’ সে কাছে এসে বসল। তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার মায়ের জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের মায়েদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার মেয়ের জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের মেয়েদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার বোনের জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের বোনেদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার ফুফুর জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের ফুফুদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার খালার জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের খালাদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ এরপর তিনি তার (যুবকের) ওপর হাত রাখলেন এবং বললেন, ‘হে আল্লাহ! তুমি এর গুনাহ ক্ষমা করে দাও, এর অন্তরকে পবিত্র করে দাও এবং এর লজ্জাস্থানকে সংরক্ষিত করো (পবিত্র রাখো)।’ বর্ণনাকারী বলেন, এরপর সেই যুবক আর কখনও (যিনার দিকে) ফিরেও তাকায়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (6775)


6775 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"سبعة يظلهم الله يوم القيامة في ظله يوم لا ظل إلا ظله: إمام عادل، وشاب نشأ في عبادة الله، ورجل ذكر الله في خلاء ففاضت عيناه، ورجل قلبه معلق في المسجد، ورجلان تحابا في الله، ورجل دعته امرأة ذات منصب وجمال إلى نفسها فقال: إني أخاف الله، ورجل تصدق بصدقة فأخفاها حتى لا تعلم شماله ما صنعت يمينه".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6806) ومسلم في الزكاة (1031) من طريق عبيد الله بن عمر، عن خُبيب بن عبد الرحمن، عن حفص بن عاصم، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সাত প্রকারের লোককে আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিন তাঁর (আরশের) ছায়ায় আশ্রয় দেবেন—যে দিন তাঁর ছায়া ব্যতীত আর কোনো ছায়া থাকবে না: (১) ন্যায়পরায়ণ শাসক। (২) আর সেই যুবক, যে আল্লাহর ইবাদতের মধ্যে বড় হয়েছে। (৩) আর সেই ব্যক্তি যে একাকী আল্লাহকে স্মরণ করে এবং তার দু'চোখ বেয়ে পানি ঝরে। (৪) আর সেই ব্যক্তি যার অন্তর মসজিদের সাথে বাঁধা থাকে। (৫) আর সেই দু’জন ব্যক্তি যারা আল্লাহর জন্য একে অপরকে ভালোবাসে, আল্লাহর জন্যই মিলিত হয় এবং আল্লাহর জন্যই পৃথক হয়। (৬) আর সেই ব্যক্তি, যাকে কোনো সম্ভ্রান্ত ও সুন্দরী মহিলা (অবৈধ কাজের জন্য) আহ্বান করে, আর সে বলে, ‘আমি আল্লাহকে ভয় করি।’ (৭) আর সেই ব্যক্তি, যে এমন গোপনে সাদাকাহ করে যে তার ডান হাত কী দান করে, বাম হাত তা জানতে পারে না।









আল-জামি` আল-কামিল (6776)


6776 - عن عبد الله بن عمر أنه قال: جاءت اليهود إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكروا له أن رجلًا منهم وامرأة زنيا، فقال لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما تجدون في التوراة في شان الرجم؟" فقالوا: نفضحهم ويُجلدون. فقال عبد الله بن سلام: كذبتم، إن فيها الرجم. فأتوا بالتوراة فنثروها، فوضع أحدهم يده على آية الرجم، ثم قرأ ما قبلها وما بعدها، فقال عبد الله بن سلام: ارفع يدك. فرفع يده، فإذا فيها آية الرجم. فقالوا: صدق يا محمد، فيها آية الرجم، فأمر بهما رسول الله صلى الله عليه وسلم فرُجما. فقال عبد الله بن عمر: فرأيت الرجل يَحْنِي على المرأة، يَقيها الحجارة.

متفق عليه: رواه مالك في الحدود (1) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره. ورواه البخاري في الحدود (6841) من طريق مالك، به، مثله.

ورواه مسلم في الحدود (26: 1699) من طريق عبيد الله عن نافع، به، نحوه. ورواه من طريق ابن وهب، أخبرني رجال من أهل العلم منهم مالك بن أنس، أن نافعًا أخبرهم عن ابن عمر،
فذكره باختصار.

ورواه الشيخان البخاري (7543) ومسلم (27: 1699) كلاهما من حديث إسماعيل ابن علية، عن أيوب، عن نافع وفيه:

قالوا: نُسَخِّمُ وجوههما ونُخزيهما قال: {فَأْتُوا بِالتَّوْرَاةِ فَاتْلُوهَا إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ} [آل عمران: 93] فجاؤوا فقالوا لرجل ممن يرضون: يا أعور، اقرأ. فقرأ حتى انتهى إلى موضع منها فوضع يده عليه. قال:"ارفع يدك، فرفع يده فإذا فيه آية الرجم تلوح، فقال يا محمد! إن عليهما الرجم، ولكنا نكاتمه بيننا، فأمر بهما فرجما فرأيته يجانئ عليها الحجارة. هذا لفظ البخاري، وأما مسلم فلم يسق لفظه. ورواه الإمام أحمد (4498) عن إسماعيل ابن علية وفيه: وجاؤوا بقارئ لهم أعور يقال له: ابن صوريا.

وقوله: يجانئ بجيم وهمزة في آخره يكب عليها.

وقوله: نُسخّم وجوههما: من التسخيم أن نُسود.

وقوله:"نُخزيهما": من الخزي بأن يركبا على الحمار معكوسا، ويدارا في الأسواق.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়াহুদিরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলো এবং তাঁর কাছে উল্লেখ করলো যে তাদের মধ্যের একজন পুরুষ ও একজন নারী যেনা (ব্যভিচার) করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের বললেন: "রজমের (পাথর নিক্ষেপে মৃত্যুদণ্ড) ব্যাপারে তোমরা তাওরাতে কী পাও?" তারা বললো: আমরা তাদের জনসমক্ষে অপমান করি এবং বেত্রাঘাত করি। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম বললেন: তোমরা মিথ্যা বলছো, নিশ্চয় তাতে রজমের বিধান রয়েছে। অতঃপর তারা তাওরাত নিয়ে আসলো এবং তা খুলে রাখলো। তাদের একজন রজমের আয়াতের ওপর নিজের হাত রেখে দিলো, তারপর সে তার আগের ও পরের অংশ পাঠ করলো। আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম বললেন: তোমার হাত তোলো। সে হাত তুললে দেখা গেল তাতে রজমের আয়াত রয়েছে। তখন তারা বললো: হে মুহাম্মাদ! তিনি সত্য বলেছেন, তাতে রজমের আয়াত রয়েছে। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন এবং তাদের দুজনকে রজম করা হলো। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি লোকটিকে দেখতে পেলাম যে সে নারীর ওপর ঝুঁকে যাচ্ছে, যাতে পাথরগুলো থেকে তাকে রক্ষা করতে পারে।

(মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মালিক (১) তা নাফে' হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারী তা কিতাবুল হুদূদে (৬৮৪১) মালিকের সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। ইমাম মুসলিম তা কিতাবুল হুদূদে (২৬:১৬৯৯) উবাইদুল্লাহর সূত্রে নাফে' হতে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তিনি তা ইবনু ওয়াহাব-এর সূত্রেও বর্ণনা করেছেন, [যিনি বলেছেন] আমাকে জ্ঞানীদের মধ্যেকার এমন ব্যক্তিরা জানিয়েছেন যাদের মধ্যে মালিক ইবনু আনাস ছিলেন, যে নাফে' তাদের ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা সংক্ষিপ্তভাবে জানিয়েছেন।

ইমাম বুখারী (৭৫৪৩) ও ইমাম মুসলিম (২৭: ১৬৯৯) উভয়েই ইসমাঈল ইবনে উলাইয়্যাহ-এর সূত্রে আইয়ুব হতে, তিনি নাফে' হতে এটি বর্ণনা করেছেন। তাতে (বুখারীর বর্ণনায়) রয়েছে: তারা বললো: আমরা তাদের মুখ কালো করে দেই এবং লাঞ্ছিত করি। তিনি বললেন: "{তোমরা যদি সত্যবাদী হও, তবে তাওরাত নিয়ে আসো এবং তা তিলাওয়াত করো।} [সূরা আলে ইমরান: ৯৩]" অতঃপর তারা আসলো এবং তাদের পছন্দনীয় একজনকে বললো: হে কানা! পাঠ করো। সে পাঠ করতে করতে তার একটি স্থানে এসে হাত রেখে দিলো। তিনি বললেন: "তোমার হাত তোলো।" সে হাত তুললো এবং তাতে রজমের আয়াত উজ্জ্বলভাবে দেখা গেল। তখন তারা বললো: হে মুহাম্মাদ! নিশ্চয় তাদের ওপর রজম (এর বিধান) রয়েছে, কিন্তু আমরা এটিকে আমাদের মধ্যে গোপন করে রাখতাম। অতঃপর তিনি তাদের সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন এবং তাদের রজম করা হলো। আমি লোকটিকে নারীর ওপর পাথর থেকে বাঁচাতে ঝুঁকে থাকতে দেখলাম। এটি বুখারীর শব্দ। আর মুসলিম তাঁর শব্দগুলো সম্পূর্ণ উদ্ধৃত করেননি। ইমাম আহমাদও (৪৪৯৮) তা ইসমাঈল ইবনু উলাইয়্যাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং তাতে রয়েছে: তারা তাদের একজন কানা ক্বারী নিয়ে আসলো যার নাম ছিল ইবনু সুরিয়া।

আর তাঁর বক্তব্য: 'ইয়াজানিউ' (يَجَانِئُ), জিম এবং শেষে হামযা সহকারে (অন্য বর্ণনায় 'ইয়াহনিউ'— ঝুঁকে যাওয়া), অর্থ: সে তার ওপর ঝুঁকে যায়। আর তাঁর বক্তব্য: 'নূসাখখিমু উজুহাহুমা' (نُسَخِّمُ وُجُوهَهُمَا): 'তাসখিম' অর্থ মুখ কালো করা। আর তাঁর বক্তব্য: 'নুখযিহিমা' (نُخْزِيْهِمَا): 'খাযি' অর্থ লাঞ্ছিত করা— অর্থাৎ গাধার পিঠে উল্টো করে বসিয়ে বাজারে ঘোরানো।









আল-জামি` আল-কামিল (6777)


6777 - عن ابن عمر قال: أتى نفر من اليهود، فدعوا رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى القفّ فأتاهم في بيت المدراس فقالوا: يا أبا القاسم، إن رجلًا منا زنى بامرأة، فاحكم، فوضعوا لرسول الله صلى الله عليه وسلم وسادة فجلس عليها. ثم قال:"ائتوني بالتوراة" فأتي بها، فنزع الوسادة من تحته، ووضع التوراة عليها. ثم قال:"آمنت بك وبمن أنزلك" ثم قال:"ائتوني بأعلمكم" فأتي بفتى شاب. ثم ذكر قصة الرجم نحو حديث مالك، عن نافع.

حسن: رواه أبو داود (4449) عن أحمد بن سعيد الهمداني، حدثنا ابن وهب، حدثني هشام بن سعد، أن زيد بن أسلم حدثه عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن من أجل هشام بن سعد المدني أبو عباد مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.




ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদল ইহুদি এসেছিল এবং তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ‘কাফ’-এ (বিচারস্থলে) ডাকলো। তিনি তাদের কাছে ‘বাইতুল মিদরাসে’ (শিক্ষাকেন্দ্রে) আসলেন। তারা বললো, হে আবুল কাসিম! আমাদের মধ্যকার এক পুরুষ এক নারীর সাথে যেনা (ব্যভিচার) করেছে। অতএব, আপনি বিচার করুন। তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য একটি বালিশ রাখলো, অতঃপর তিনি তার উপর বসলেন। এরপর তিনি বললেন: "আমার কাছে তাওরাত নিয়ে এসো।" এরপর তা আনা হলো। তিনি তাঁর নিচ থেকে বালিশটি সরিয়ে নিলেন এবং তাওরাতকে তার উপর রাখলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আমি আপনার প্রতি এবং যিনি আপনাকে নাযিল করেছেন, তার প্রতি ঈমান এনেছি।" এরপর তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে সবচেয়ে জ্ঞানী, তাকে আমার কাছে নিয়ে এসো।" অতঃপর একজন যুবককে আনা হলো। এরপর তিনি নাফে' কর্তৃক মালিক (বর্ণিত) হাদীসের অনুরূপ রজমের (পাথর মেরে হত্যার) ঘটনা বর্ণনা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6778)


6778 - عن البراء بن عازب، قال: مرّ على النبي صلى الله عليه وسلم بيهودي مُحممًا مجلودًا. فدعاهم صلى الله عليه وسلم فقال:"هكذا تجدون حد الزاني في كتابكم؟" قالوا: نعم. فدعا رجلا من علمائهم، فقال:"أنشدُك بالله الذي أنزل التوراة على موسى! أهكذا تجدون حد الزاني في كتابكم؟" قالوا: لا. ولولا أنك نشدتني بهذا لم أخبرك. نجده الرجم. ولكنه كثر في أشرافنا. فكنا، إذا أخذنا الشريف تركناه. وإذا أخذنا الضعيف، أقمنا عليه الحد، قلنا: تعالوا فلنجتمع على شيء نقيمه على الشريف والوضيع. فجعلنا التحميم والجلد مكان الرجم. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم! إني أول من أحيا أمرك إذا أماتوه" فأمر به فرجم. فأنزل الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنْكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ} [المائدة: 41] إلى قوله: {إِنْ أُوتِيتُمْ هَذَا فَخُذُوهُ} [المائدة: 41] يقول: ائتوا
محمدًا صلى الله عليه وسلم فإن أمركم بالتحميم والجلد فخذوه. وإن أفتاكم بالرجم فاحذروا. فأنزل الله تعالى: {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ} [المائدة: 44] {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ} [المائدة: 47] في الكفار كلها.

صحيح: رواه مسلم في الحدود (1700) من طريق أبي معاوية (هو الضرير) عن الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن البراء بن عازب، فذكره.




বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে এক ইহুদিকে কালি মাখানো অবস্থায় ও বেত্রাঘাত করা অবস্থায় নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে ডাকলেন এবং বললেন, "তোমরা তোমাদের কিতাবে যেনাকারীর শাস্তি কি এটাই পেয়েছ?" তারা বলল, "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি তাদের একজন আলেমকে ডাকলেন এবং বললেন, "আমি তোমাকে সেই আল্লাহর শপথ দিচ্ছি যিনি মূসা (আঃ)-এর উপর তাওরাত নাযিল করেছেন! তোমরা কি তোমাদের কিতাবে যেনাকারীর শাস্তি এটাই পেয়েছো?" তারা বলল, "না। আপনি যদি এই শপথ না দিতেন, তবে আমরা আপনাকে জানাতাম না। আমরা তো রজম (পাথর মেরে হত্যা)-কেই পেয়েছি।" কিন্তু এটা (ব্যাভিচার) আমাদের উচ্চবিত্তদের মধ্যে বেড়ে গিয়েছিল। আমরা যখন কোনো সম্মানিত ব্যক্তিকে ধরতাম, তখন তাকে ছেড়ে দিতাম। আর যখন কোনো দুর্বলকে ধরতাম, তার উপর শাস্তি কার্যকর করতাম। তখন আমরা বললাম, 'এসো, আমরা এমন একটি বিষয়ে ঐকমত্যে পৌঁছাই যা আমরা সম্মানিত ও দুর্বল সকলের উপরই প্রয়োগ করতে পারব।' তাই আমরা রজমের পরিবর্তে কালি মাখানো ও বেত্রাঘাতকে নির্ধারণ করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আল্লাহ! তারা যখন আপনার হুকুমকে মৃত করে দিয়েছে, আমিই প্রথম ব্যক্তি যে তাকে জীবিত করলাম।" এরপর তিনি তার (ঐ ইহুদি) ব্যাপারে আদেশ দিলেন, ফলে তাকে রজম করা হলো।

এরপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "হে রাসূল! যারা কুফুরীর দিকে দ্রুত ধাবিত হয়..." [আল-মায়িদা: ৪১] থেকে শুরু করে "...যদি তোমাদেরকে এই ফয়সালা দেওয়া হয়, তবে তা গ্রহণ করো" [আল-মায়িদা: ৪১] পর্যন্ত। (এর দ্বারা উদ্দেশ্য ছিল): তোমরা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাও। যদি তিনি তোমাদেরকে কালি মাখানো ও বেত্রাঘাত করার আদেশ দেন, তবে তা গ্রহণ করো। আর যদি তিনি তোমাদেরকে রজমের ফতোয়া দেন, তবে সতর্ক হও।

তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "আর যারা আল্লাহ যা নাযিল করেছেন, সে অনুযায়ী বিচার করে না, তারাই কাফির।" [আল-মায়িদা: ৪৪] এবং "আর যারা আল্লাহ যা নাযিল করেছেন, সে অনুযায়ী বিচার করে না, তারাই ফাসিক।" [আল-মায়িদা: ৪৭] (এগুলো) সকল কাফিরদের ব্যাপারে নাযিল হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6779)


6779 - عن جابر بن عبد الله يقول: رجم النبي صلى الله عليه وسلم رجلًا من أسلم، ورجلا من اليهود وامرأته. وفي رواية: وامرأة.

صحيح: رواه مسلم في الحدود (1701) عن هارون بن عبد الله حدثنا الحجاج بن محمد، قال: قال ابن جريح، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكره.

وأما ما روي عن جابر قال: جاءت اليهود برجل وامرأة منهم زنيا فقال:"ائتوني بأعلم رجلين منكم" فأتوه بابني صوريا قال: فنشدهما كيف تجدان أمر هذين في التوراة؟ قالا: نجد في التوراة إذا شهد أربعة أنهم رأوا ذكره في فرجها مثل الميل في المكحلة رُجما. قال:"فما يمنعكما أن ترجموهما؟" قالا: ذهب سلطاننا فكرهنا القتل. فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بالشهود. فجاء أربعة فشهدوا أنهم رأوا ذكره في فرجها مثل الميل في المكحلة. فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم برجمها. فهو ضعيف.

رواه أبو داود (4452) عن يحيى بن موسى البلخي، حدثنا أبو أسامة، قال مجالد: أُخبرنا عن عامر الشعبي، عن جابر بن عبد الله فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل مجالد وهو ابن سعيد.

ورواه أيضا أبو داود (3626) من وجه آخر مرسلًا باختصار.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসলাম গোত্রের একজন ব্যক্তিকে এবং ইয়াহুদিদের একজন পুরুষ ও তার স্ত্রীকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে মৃত্যুদণ্ড) করেছেন। অপর এক বর্ণনায় এসেছে: এবং একজন নারীকে।

আর জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: ইয়াহুদিরা তাদের মধ্যকার একজন পুরুষ ও একজন নারীকে নিয়ে এলো যারা ব্যভিচার করেছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তোমাদের মধ্যে সবচেয়ে জ্ঞানী দু’জন লোককে আমার কাছে নিয়ে এসো।” অতঃপর তারা ইবনু সূরিয়ার দু’পুত্রকে নিয়ে এলো। তিনি তাদের দু’জনের কাছে জানতে চাইলেন, “তোমরা তাওরাতে এদের দু’জনের ব্যাপারে কী বিধান পাও?” তারা দু’জন বললো: আমরা তাওরাতে পাই যে, যদি চারজন সাক্ষী দেয় যে তারা পুরুষাঙ্গকে সুরমাদানির মধ্যে সুরমা শলাকার মতো তার যোনির মধ্যে প্রবেশ করতে দেখেছে, তবে তাদের রজম করা হবে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তবে কী কারণে তোমরা তাদের রজম করা থেকে বিরত থাকছো?” তারা দু’জন বললো: আমাদের কর্তৃত্ব চলে গেছে, তাই আমরা হত্যা করাকে অপছন্দ করেছি। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাক্ষীদের ডাকলেন। চারজন লোক এসে সাক্ষ্য দিল যে, তারা পুরুষাঙ্গকে সুরমাদানির মধ্যে সুরমা শলাকার মতো তার যোনির মধ্যে প্রবেশ করতে দেখেছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে রজম করার নির্দেশ দিলেন। এই বর্ণনাটি দুর্বল। (আর এই বর্ণনার সনদ দুর্বল হওয়ার কারণ হলো মুজালিদ, অর্থাৎ ইবনু সাঈদ। আবূ দাঊদ এটি অন্য সূত্রেও সংক্ষিপ্তভাবে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন।)









আল-জামি` আল-কামিল (6780)


6780 - عن جابر بن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم رجم يهوديا ويهودية.

حسن: رواه الترمذي (1437) وابن ماجه (2557) وأحمد (20856) كلهم من طريق شريك، عن سماك، عن جابر بن سمرة فذكره.

وشريك هو ابن عبد الله النخعي ضُعّف لسوء حفظه، وقد توبع. رواه أبو داود الطيالسي (812) عن حماد بن سلمة، عن سماك به. وبهذه المتابعة حسن هذا الحديث.

قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم قالوا: إذا اختصم أهل الكتاب، وترافعوا إلى حكام المسلمين حكموا بينهم بالكتاب والسنة وبأحكام المسلمين. وهو قول أحمد وإسحاق وقال بعضهم: لا يقام عليهم الحد في الزنا. والقول الأوصل أصح". انتهى.




জাবির ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন ইহুদি পুরুষ ও একজন ইহুদি নারীকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে মৃত্যুদণ্ড) করেছিলেন।

ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: অধিকাংশ আলিমের আমল এই হাদীস অনুযায়ী। তারা বলেছেন, যখন আহলে কিতাবগণ (ইহুদি ও খ্রিস্টান) মতবিরোধে লিপ্ত হয় এবং মুসলিম বিচারকদের কাছে বিচারপ্রার্থী হয়, তখন বিচারকরা তাদের মাঝে কিতাব ও সুন্নাহ এবং মুসলিম বিধিবিধান অনুযায়ী ফুকুম দেবেন। এটি ইমাম আহমাদ ও ইসহাক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মত। তবে কেউ কেউ বলেছেন: তাদের উপর ব্যভিচারের হদ (ইসলামী শাস্তি) কার্যকর করা হবে না। কিন্তু প্রথম মতটিই অধিক সহীহ।