হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6768)


6768 - عن النعمان بن بشير أنه رفع إليه نفر من الكلاعيين أن حاكة سرقوا متاعًا لهم، فحبسهم أيامًا، ثم خلى سبيلهم. فأتوه فقالوا: خليت سبيل هؤلاء بلا امتحان ولا ضرب. فقال النعمان: ما شئتم، إن شئتم أضربهم فإن أخرج الله متاعكم فذاك. وإلا أخذت من ظهوركم مثله. قالوا: هذا حكمك؟ قال: هذا حكم الله عز وجل ورسوله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه النسائي (4874) وأبو داود (4382) كلاهما من حديث بقية بن الوليد، قال حدثني صفوان بن عمرو، قال: حدثني أزهر بن عبد الله الحرازي، عن النعمان بن بشير فذكره.

قال أبو داود: إنما أرهبهم بهذا القول أي لا يجب الضرب إلا بعد الاعتراف.

وإسناده حسن من أجل أزهر بن عبد الله الحرازي الحمصي. قال البخاري:"أزهر بن عبد الله وأزهر بن سعيد وأزهر بن يزيد واحد نسبوه مرة: مرادي، ومرة: هوزني، ومرة حرازي".

قال ابن حجر: ووافقه جماعة على ذلك" وأما شرح حال أزهر فلم يذكر المزي شيئا منه في الترجمتين، وقد قال ابن الجارود في كتاب الضعفاء: كان يسب عليًّا.

ثم قال: لم يتكلموا إلا في مذهبه، وقد وثّقه العجلي.

وقال في التقريب:"صدوق" وكذلك قال في أزهر بن سعيد الحرازي.

وأما بقية بن الوليد فهو مدلس، كثير التدليس عن الضعفاء، كما أنه مختلف في توثيقه وتضعيفه غير أنه حسن الحديث إذا صرّح كما هنا. وفي الباب أحاديث أخرى لا تصح.



رواه الترمذي (1424) والدارقطني (3/ 84) والحاكم (4/ 384) والبيهقي (8/ 238) كلهم من طريق يزيد بن زياد الدمشقي، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد" رده الذهبي فقال: قال النسائي:"يزيد بن زياد شامي متروك".

وقال الترمذي:"حديث عائشة لا نعرفه مرفوعًا إلا من حديث محمد بن ربيعة، عن يزيد بن زياد الدمشقي …". وقال:"رواه وكيع، عن يزيد بن زياد نحوه ولم يرفعه .. ورواية وكيع أولى". وقال: وقد رُوي نحو هذا عن غير واحد من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم أنهم قالوا: مثل ذلك."ويزيد بن زياد الدمشقي ضعيف في الحديث". انتهى قول الترمذي.

وفي معناه أيضا ما رُويَ عن أبي هريرة مرفوعًا:"ادفعوا الحدود ما وجدتم له مدفعًا".

رواه ابن ماجه (2545) عن عبد الله بن الجرّاح، قال: حدثنا وكيع، عن إبراهيم بن الفضل، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده ضعيف فإن إبراهيم بن الفضل المخزومي المدني أبو إسحاق ضعيف باتفاق أهل العلم حتى قال الدارقطني:"متروك".

وفي معناه أيضا ما رُوي عن علي مرفوعًا:"ادرؤوا الحدود بالشبهات".

رواه الدارقطني والبيهقي. قال البيهقي: في هذا الإسناد ضعف.

قلت: فيه مختار التمار وهو مختار بن نافع التميمي وأبو إسحاق التمار ضعيف باتفاق أهل العلم. وفي معناه أحاديث أخرى لا يصح منها شيء.

ولكن صحّ عن بعض الصحابة درء الحدود بالشبهات. فقد جاء عن عمر بن الخطاب أنه قال:"لأن أخطئ في الحدود بالشبهات أحب إلي من أن أقيمها بالشبهات". رواه ابن أبي شيبة بإسناد صحيح.

وكذلك روي عن ابن مسعود وغيره، ودرءُ الحدود بالشبهات من عمدة الفقهاء والقضاة للمصلحة العامة، وأحاديث الباب مع ضعفها يعضد بعضه بعضا للحفاظ على حياة الإنسان، وسلامة أعضائه.




নূ'মান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিলাঈ গোত্রের কিছু লোক তাঁর কাছে এসে অভিযোগ জানাল যে কয়েকজন তাঁতি তাদের জিনিসপত্র চুরি করেছে। তিনি তাদের কয়েকদিন আটক করে রাখলেন, অতঃপর তাদের ছেড়ে দিলেন। তখন তারা (অভিযোগকারীরা) তাঁর কাছে এসে বলল: আপনি তো এদের কোনো পরীক্ষা বা মারধর ছাড়াই ছেড়ে দিলেন। তখন নূ'মান বললেন: তোমরা যা চাও, তাই হবে। তোমরা যদি চাও, আমি তাদের মারধর করব। যদি আল্লাহ্ তোমাদের মাল বের করে দেন (অর্থাৎ চুরি হওয়া মাল পাওয়া যায়), তবে সেটাই ভালো। আর যদি তা না হয়, তবে আমি তোমাদের পিঠ থেকে তার অনুরূপ (শাস্তি) নেব। তারা বলল: এটা কি আপনার নিজস্ব ফায়সালা? তিনি বললেন: এটাই মহামহিম আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ফায়সালা।









আল-জামি` আল-কামিল (6769)


6769 - عن عطية القرظي يقول: عُرضنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم: يوم قريظة، فكان من أنبت قُتل، ومن لم ينبت خلّي سبيله. فكنت فيمن لم ينبت فخلّي سبيلي.

وفي رواية:"فكشفوا عانتي، فوجدوها لم يَنبُت فجعلوني في السبي".

حسن: رواه أبو داود (4404) والترمذي (1584) وابن ماجه (2541) والنسائي (4981) وصحّحه ابن حبان (4780) والحاكم (3/ 35) كلهم من طرق عن عبد الملك بن عمير، قال: سمعت عطية القُرظي يقول: فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الملك بن عمير اللخمي فإنه حسن الحديث. قال الترمذي: حسن صحيح. وقال:"العمل على هذا عند بعض أهل العلم أنهم يرون الإنبات بلوغًا إن لم يُعرف احتلامه، ولا سنُّه وهو قول أحمد وإسحاق".




আতিয়াহ আল-ক্বুরাজী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরায়যা যুদ্ধের দিন আমাদেরকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে পেশ করা হয়েছিল। (সেই সময়) যার গুপ্তস্থানে লোম গজেছিল, তাকে হত্যা করা হয় এবং যার লোম গজায়নি, তার পথ ছেড়ে দেওয়া হয় (তাকে মুক্তি দেওয়া হয়)। আমিও তাদের মধ্যে ছিলাম যাদের লোম গজায়নি, ফলে আমার পথ ছেড়ে দেওয়া হয়।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "তখন তারা আমার নিম্নাংশ পরীক্ষা করে দেখল। তারা দেখল যে সেখানে লোম গজায়নি। ফলে তারা আমাকে যুদ্ধবন্দীদের (শিশু) তালিকায় অন্তর্ভুক্ত করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (6770)


6770 - عن وعن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا ضرب أحدكم فليتق الوجه".

حسن: رواه أبو داود (4493) عن أبي كامل، حدثنا أبو عوانة، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمر بن أبي سلمة فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

ورواه أحمد (7323) عن سفيان، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة وزاد فيه:"فإن الله خلق آدم على صورته" وقد أشار مسلم (2612) إلى رواية سفيان، عن أبي الزناد، بهذا الإسناد وقال:"إذا ضرب أحدكم".

وأصل حديث أبي هريرة في الصحيحين:"إذا قاتل أحدكم أخاه فليتجنب الوجه" وهو مخرج في موضعه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ (কাউকে) প্রহার করে, তখন সে যেন মুখমণ্ডলকে পরিহার করে চলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6771)


6771 - عن * *




৬৭৭১ - থেকে বর্ণিত ...









আল-জামি` আল-কামিল (6772)


6772 - عن عبد الله بن مسعود قال: سألت النبي صلى الله عليه وسلم أي الذنب أعظم عند الله؟ قال:"أن تجعل الله ندًّا وهو خلقك" قلت: إن ذلك لعظيم. قلت: ثم أي؟ قال:"وأن تقتل ولدك تخاف أن يطعم معك" قلت: ثم أي؟ قال:"أن تزاني حليلة جارك".

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4477) ومسلم في الإيمان (86) كلاهما عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن عمرو بن شُرحبيل، عن عبد الله بن مسعود فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম, আল্লাহর কাছে কোন পাপ সবচেয়ে বড়? তিনি বললেন: "তুমি আল্লাহর সমকক্ষ দাঁড় করাবে, অথচ তিনিই তোমাকে সৃষ্টি করেছেন।" আমি বললাম: এটি তো অবশ্যই গুরুতর। আমি বললাম: এরপর কোনটি? তিনি বললেন: "তুমি তোমার সন্তানকে হত্যা করবে এই ভয়ে যে সে তোমার সাথে আহার করবে।" আমি বললাম: এরপর কোনটি? তিনি বললেন: "তুমি তোমার প্রতিবেশীর স্ত্রীর সাথে ব্যভিচার করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6773)


6773 - عن سمرة بن جندب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم مما يكثر أن يقول لأصحابه:"هل رأى أحد منكم من رؤيا؟" قال: فيقص عليه من شاء الله أن يقص، وإنه قال ذات غداة:"إنه أتاني الليلة أتيان وإنهما ابتعثاني، وإنهما قالا لي: انطلق، وإني انطلقت معهما .." فذكر الحديث بطوله.

وفيه:"فانطلقنا فأتينا على مثل التنور - قال: وأحسب أنه كان يقول: فإذا فيه لَغط وأصوات. قال: فاطلعنا فيه فإذا فيه رجال ونساء عُراة، وإذا هم يأتيهم لهب من أسفل منهم، فإذا أتاهم ذلك اللهب ضَوضَوا، قال: قلت لهما: ما هؤلاء؟ قال: قالا لي: انطلق انطلق .." ثم أخبراه بذلك فقالا:"وأما الرجال والنساء العراة الذين في مثل بناء التنور فهم الزناة والزواني".

متفق عليه: رواه البخاري في التعبير (7047) عن مؤمل بن هشام بن أبي هاشم، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم، حدثنا عوف، حدثنا أبو رجاء، حدثنا سمرة بن جندب، فذكره. ورواه مسلم في الفضائل (2275/ 23) من وجه آخر عن أبي رجاء العطاردي مختصرا.




সمرة ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে প্রায়শই বলতেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ কি কোনো স্বপ্ন দেখেছো?" বর্ণনাকারী বলেন: তখন আল্লাহ যার জন্য ইচ্ছা করতেন, সে তাঁর কাছে তা বর্ণনা করত। একদিন সকালে তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আজ রাতে দুজন আগমনকারী আমার কাছে এসেছিলেন এবং তারা আমাকে জাগিয়ে তুললেন। তারা দুজন আমাকে বললেন: চলুন। আর আমি তাদের দুজনের সঙ্গে চললাম..." এরপর তিনি দীর্ঘ হাদিসটি বর্ণনা করলেন।

এবং সেই হাদিসে রয়েছে: "...আমরা চললাম এবং একটি তনূর (রুটি সেঁকার চুলা)-এর মতো কাঠামোর কাছে আসলাম। বর্ণনাকারী বলেন: আমি ধারণা করি তিনি বলেছিলেন: তখন তার মধ্যে শোরগোল ও শব্দ হচ্ছিল। তিনি বলেন: আমরা তার মধ্যে উঁকি মেরে দেখলাম, তাতে কিছু উলঙ্গ পুরুষ ও নারী রয়েছে। তাদের নিচের দিক থেকে তাদের কাছে আগুনের লেলিহান শিখা আসছিল। যখনই সেই শিখা তাদের কাছে আসত, তারা চিৎকার করত। তিনি বলেন: আমি তাদের দুজনকে বললাম: এরা কারা? তিনি বলেন: তারা দুজন আমাকে বললেন: চলুন, চলুন..." এরপর তারা দুজন সেই বিষয়ে তাঁকে খবর দিলেন এবং বললেন: "আর যারা তনূরের মতো কাঠামোর মধ্যে উলঙ্গ পুরুষ ও নারী রয়েছে, তারা হলো ব্যভিচারী পুরুষ ও ব্যভিচারিণী নারী।"









আল-জামি` আল-কামিল (6774)


6774 - عن أبي أمامة قال: إن فتى شابًا أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، ائذن لي بالزنا، فأقبل عليه القوم فزجروه وقالوا: مه مه فقال:"ادنه" فدنا منه قريبا قال: فجلس قال:"أتحبه لأمك؟" قال: لا، والله جعلني الله فداءك قال:"ولا الناس يحبونه لأمهاتهم" قال:"أفتحبه لابنتك؟" قال: لا والله يا رسول الله، جعلني الله فداءك. قال:"ولا الناس يحبونه لبناتهم" قال:"أفتحبه لأختك؟" قال: لا والله،
جعلني الله فداءك، قال:"ولا الناس يحبونه لأخواتهم" قال:"أفتحبه لعمتك؟ ، قال: لا والله، جعلني الله فداءك، قال: ولا الناس يحبونه لعماتهم" قال:"أفتحبه لخالتك؟" قال: لا والله، جعلني الله فداءك. قال:"ولا الناس يحبونه لخالاتهم" قال: فوضع يده عليه، وقال:"اللهم اغفر لذنبه، وطهر قلبه، وحصّن فرجه" قال: فلم يكن بعد ذلك الفتى يلتفت إلى شيء.

صحيح: رواه أحمد (22211) والطبراني (7679) كلاهما من طريق حَريز بن عثمان، ثنا سليم بن عامر، عن أبي أمامة فذكر الحديث. وإسناده صحيح.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক যুবক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে যিনা করার অনুমতি দিন।’ তখন উপস্থিত লোকেরা তার দিকে এগিয়ে এসে তাকে তিরস্কার করল এবং বলল, ‘থামো, থামো!’ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘তাকে কাছে আসতে দাও।’ সে কাছে এসে বসল। তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার মায়ের জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের মায়েদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার মেয়ের জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের মেয়েদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার বোনের জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের বোনেদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার ফুফুর জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের ফুফুদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ তিনি বললেন, ‘তুমি কি এটা তোমার খালার জন্য পছন্দ করো?’ সে বলল, ‘আল্লাহর কসম! না, আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন।’ তিনি বললেন, ‘তেমনি লোকেরাও তাদের খালাদের জন্য তা পছন্দ করে না।’ এরপর তিনি তার (যুবকের) ওপর হাত রাখলেন এবং বললেন, ‘হে আল্লাহ! তুমি এর গুনাহ ক্ষমা করে দাও, এর অন্তরকে পবিত্র করে দাও এবং এর লজ্জাস্থানকে সংরক্ষিত করো (পবিত্র রাখো)।’ বর্ণনাকারী বলেন, এরপর সেই যুবক আর কখনও (যিনার দিকে) ফিরেও তাকায়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (6775)


6775 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"سبعة يظلهم الله يوم القيامة في ظله يوم لا ظل إلا ظله: إمام عادل، وشاب نشأ في عبادة الله، ورجل ذكر الله في خلاء ففاضت عيناه، ورجل قلبه معلق في المسجد، ورجلان تحابا في الله، ورجل دعته امرأة ذات منصب وجمال إلى نفسها فقال: إني أخاف الله، ورجل تصدق بصدقة فأخفاها حتى لا تعلم شماله ما صنعت يمينه".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6806) ومسلم في الزكاة (1031) من طريق عبيد الله بن عمر، عن خُبيب بن عبد الرحمن، عن حفص بن عاصم، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সাত প্রকারের লোককে আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিন তাঁর (আরশের) ছায়ায় আশ্রয় দেবেন—যে দিন তাঁর ছায়া ব্যতীত আর কোনো ছায়া থাকবে না: (১) ন্যায়পরায়ণ শাসক। (২) আর সেই যুবক, যে আল্লাহর ইবাদতের মধ্যে বড় হয়েছে। (৩) আর সেই ব্যক্তি যে একাকী আল্লাহকে স্মরণ করে এবং তার দু'চোখ বেয়ে পানি ঝরে। (৪) আর সেই ব্যক্তি যার অন্তর মসজিদের সাথে বাঁধা থাকে। (৫) আর সেই দু’জন ব্যক্তি যারা আল্লাহর জন্য একে অপরকে ভালোবাসে, আল্লাহর জন্যই মিলিত হয় এবং আল্লাহর জন্যই পৃথক হয়। (৬) আর সেই ব্যক্তি, যাকে কোনো সম্ভ্রান্ত ও সুন্দরী মহিলা (অবৈধ কাজের জন্য) আহ্বান করে, আর সে বলে, ‘আমি আল্লাহকে ভয় করি।’ (৭) আর সেই ব্যক্তি, যে এমন গোপনে সাদাকাহ করে যে তার ডান হাত কী দান করে, বাম হাত তা জানতে পারে না।









আল-জামি` আল-কামিল (6776)


6776 - عن عبد الله بن عمر أنه قال: جاءت اليهود إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكروا له أن رجلًا منهم وامرأة زنيا، فقال لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما تجدون في التوراة في شان الرجم؟" فقالوا: نفضحهم ويُجلدون. فقال عبد الله بن سلام: كذبتم، إن فيها الرجم. فأتوا بالتوراة فنثروها، فوضع أحدهم يده على آية الرجم، ثم قرأ ما قبلها وما بعدها، فقال عبد الله بن سلام: ارفع يدك. فرفع يده، فإذا فيها آية الرجم. فقالوا: صدق يا محمد، فيها آية الرجم، فأمر بهما رسول الله صلى الله عليه وسلم فرُجما. فقال عبد الله بن عمر: فرأيت الرجل يَحْنِي على المرأة، يَقيها الحجارة.

متفق عليه: رواه مالك في الحدود (1) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره. ورواه البخاري في الحدود (6841) من طريق مالك، به، مثله.

ورواه مسلم في الحدود (26: 1699) من طريق عبيد الله عن نافع، به، نحوه. ورواه من طريق ابن وهب، أخبرني رجال من أهل العلم منهم مالك بن أنس، أن نافعًا أخبرهم عن ابن عمر،
فذكره باختصار.

ورواه الشيخان البخاري (7543) ومسلم (27: 1699) كلاهما من حديث إسماعيل ابن علية، عن أيوب، عن نافع وفيه:

قالوا: نُسَخِّمُ وجوههما ونُخزيهما قال: {فَأْتُوا بِالتَّوْرَاةِ فَاتْلُوهَا إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ} [آل عمران: 93] فجاؤوا فقالوا لرجل ممن يرضون: يا أعور، اقرأ. فقرأ حتى انتهى إلى موضع منها فوضع يده عليه. قال:"ارفع يدك، فرفع يده فإذا فيه آية الرجم تلوح، فقال يا محمد! إن عليهما الرجم، ولكنا نكاتمه بيننا، فأمر بهما فرجما فرأيته يجانئ عليها الحجارة. هذا لفظ البخاري، وأما مسلم فلم يسق لفظه. ورواه الإمام أحمد (4498) عن إسماعيل ابن علية وفيه: وجاؤوا بقارئ لهم أعور يقال له: ابن صوريا.

وقوله: يجانئ بجيم وهمزة في آخره يكب عليها.

وقوله: نُسخّم وجوههما: من التسخيم أن نُسود.

وقوله:"نُخزيهما": من الخزي بأن يركبا على الحمار معكوسا، ويدارا في الأسواق.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়াহুদিরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলো এবং তাঁর কাছে উল্লেখ করলো যে তাদের মধ্যের একজন পুরুষ ও একজন নারী যেনা (ব্যভিচার) করেছে। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের বললেন: "রজমের (পাথর নিক্ষেপে মৃত্যুদণ্ড) ব্যাপারে তোমরা তাওরাতে কী পাও?" তারা বললো: আমরা তাদের জনসমক্ষে অপমান করি এবং বেত্রাঘাত করি। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম বললেন: তোমরা মিথ্যা বলছো, নিশ্চয় তাতে রজমের বিধান রয়েছে। অতঃপর তারা তাওরাত নিয়ে আসলো এবং তা খুলে রাখলো। তাদের একজন রজমের আয়াতের ওপর নিজের হাত রেখে দিলো, তারপর সে তার আগের ও পরের অংশ পাঠ করলো। আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম বললেন: তোমার হাত তোলো। সে হাত তুললে দেখা গেল তাতে রজমের আয়াত রয়েছে। তখন তারা বললো: হে মুহাম্মাদ! তিনি সত্য বলেছেন, তাতে রজমের আয়াত রয়েছে। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন এবং তাদের দুজনকে রজম করা হলো। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি লোকটিকে দেখতে পেলাম যে সে নারীর ওপর ঝুঁকে যাচ্ছে, যাতে পাথরগুলো থেকে তাকে রক্ষা করতে পারে।

(মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মালিক (১) তা নাফে' হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারী তা কিতাবুল হুদূদে (৬৮৪১) মালিকের সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। ইমাম মুসলিম তা কিতাবুল হুদূদে (২৬:১৬৯৯) উবাইদুল্লাহর সূত্রে নাফে' হতে, তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তিনি তা ইবনু ওয়াহাব-এর সূত্রেও বর্ণনা করেছেন, [যিনি বলেছেন] আমাকে জ্ঞানীদের মধ্যেকার এমন ব্যক্তিরা জানিয়েছেন যাদের মধ্যে মালিক ইবনু আনাস ছিলেন, যে নাফে' তাদের ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা সংক্ষিপ্তভাবে জানিয়েছেন।

ইমাম বুখারী (৭৫৪৩) ও ইমাম মুসলিম (২৭: ১৬৯৯) উভয়েই ইসমাঈল ইবনে উলাইয়্যাহ-এর সূত্রে আইয়ুব হতে, তিনি নাফে' হতে এটি বর্ণনা করেছেন। তাতে (বুখারীর বর্ণনায়) রয়েছে: তারা বললো: আমরা তাদের মুখ কালো করে দেই এবং লাঞ্ছিত করি। তিনি বললেন: "{তোমরা যদি সত্যবাদী হও, তবে তাওরাত নিয়ে আসো এবং তা তিলাওয়াত করো।} [সূরা আলে ইমরান: ৯৩]" অতঃপর তারা আসলো এবং তাদের পছন্দনীয় একজনকে বললো: হে কানা! পাঠ করো। সে পাঠ করতে করতে তার একটি স্থানে এসে হাত রেখে দিলো। তিনি বললেন: "তোমার হাত তোলো।" সে হাত তুললো এবং তাতে রজমের আয়াত উজ্জ্বলভাবে দেখা গেল। তখন তারা বললো: হে মুহাম্মাদ! নিশ্চয় তাদের ওপর রজম (এর বিধান) রয়েছে, কিন্তু আমরা এটিকে আমাদের মধ্যে গোপন করে রাখতাম। অতঃপর তিনি তাদের সম্পর্কে নির্দেশ দিলেন এবং তাদের রজম করা হলো। আমি লোকটিকে নারীর ওপর পাথর থেকে বাঁচাতে ঝুঁকে থাকতে দেখলাম। এটি বুখারীর শব্দ। আর মুসলিম তাঁর শব্দগুলো সম্পূর্ণ উদ্ধৃত করেননি। ইমাম আহমাদও (৪৪৯৮) তা ইসমাঈল ইবনু উলাইয়্যাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং তাতে রয়েছে: তারা তাদের একজন কানা ক্বারী নিয়ে আসলো যার নাম ছিল ইবনু সুরিয়া।

আর তাঁর বক্তব্য: 'ইয়াজানিউ' (يَجَانِئُ), জিম এবং শেষে হামযা সহকারে (অন্য বর্ণনায় 'ইয়াহনিউ'— ঝুঁকে যাওয়া), অর্থ: সে তার ওপর ঝুঁকে যায়। আর তাঁর বক্তব্য: 'নূসাখখিমু উজুহাহুমা' (نُسَخِّمُ وُجُوهَهُمَا): 'তাসখিম' অর্থ মুখ কালো করা। আর তাঁর বক্তব্য: 'নুখযিহিমা' (نُخْزِيْهِمَا): 'খাযি' অর্থ লাঞ্ছিত করা— অর্থাৎ গাধার পিঠে উল্টো করে বসিয়ে বাজারে ঘোরানো।









আল-জামি` আল-কামিল (6777)


6777 - عن ابن عمر قال: أتى نفر من اليهود، فدعوا رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى القفّ فأتاهم في بيت المدراس فقالوا: يا أبا القاسم، إن رجلًا منا زنى بامرأة، فاحكم، فوضعوا لرسول الله صلى الله عليه وسلم وسادة فجلس عليها. ثم قال:"ائتوني بالتوراة" فأتي بها، فنزع الوسادة من تحته، ووضع التوراة عليها. ثم قال:"آمنت بك وبمن أنزلك" ثم قال:"ائتوني بأعلمكم" فأتي بفتى شاب. ثم ذكر قصة الرجم نحو حديث مالك، عن نافع.

حسن: رواه أبو داود (4449) عن أحمد بن سعيد الهمداني، حدثنا ابن وهب، حدثني هشام بن سعد، أن زيد بن أسلم حدثه عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن من أجل هشام بن سعد المدني أبو عباد مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.




ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদল ইহুদি এসেছিল এবং তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ‘কাফ’-এ (বিচারস্থলে) ডাকলো। তিনি তাদের কাছে ‘বাইতুল মিদরাসে’ (শিক্ষাকেন্দ্রে) আসলেন। তারা বললো, হে আবুল কাসিম! আমাদের মধ্যকার এক পুরুষ এক নারীর সাথে যেনা (ব্যভিচার) করেছে। অতএব, আপনি বিচার করুন। তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য একটি বালিশ রাখলো, অতঃপর তিনি তার উপর বসলেন। এরপর তিনি বললেন: "আমার কাছে তাওরাত নিয়ে এসো।" এরপর তা আনা হলো। তিনি তাঁর নিচ থেকে বালিশটি সরিয়ে নিলেন এবং তাওরাতকে তার উপর রাখলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আমি আপনার প্রতি এবং যিনি আপনাকে নাযিল করেছেন, তার প্রতি ঈমান এনেছি।" এরপর তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে সবচেয়ে জ্ঞানী, তাকে আমার কাছে নিয়ে এসো।" অতঃপর একজন যুবককে আনা হলো। এরপর তিনি নাফে' কর্তৃক মালিক (বর্ণিত) হাদীসের অনুরূপ রজমের (পাথর মেরে হত্যার) ঘটনা বর্ণনা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6778)


6778 - عن البراء بن عازب، قال: مرّ على النبي صلى الله عليه وسلم بيهودي مُحممًا مجلودًا. فدعاهم صلى الله عليه وسلم فقال:"هكذا تجدون حد الزاني في كتابكم؟" قالوا: نعم. فدعا رجلا من علمائهم، فقال:"أنشدُك بالله الذي أنزل التوراة على موسى! أهكذا تجدون حد الزاني في كتابكم؟" قالوا: لا. ولولا أنك نشدتني بهذا لم أخبرك. نجده الرجم. ولكنه كثر في أشرافنا. فكنا، إذا أخذنا الشريف تركناه. وإذا أخذنا الضعيف، أقمنا عليه الحد، قلنا: تعالوا فلنجتمع على شيء نقيمه على الشريف والوضيع. فجعلنا التحميم والجلد مكان الرجم. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم! إني أول من أحيا أمرك إذا أماتوه" فأمر به فرجم. فأنزل الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنْكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ} [المائدة: 41] إلى قوله: {إِنْ أُوتِيتُمْ هَذَا فَخُذُوهُ} [المائدة: 41] يقول: ائتوا
محمدًا صلى الله عليه وسلم فإن أمركم بالتحميم والجلد فخذوه. وإن أفتاكم بالرجم فاحذروا. فأنزل الله تعالى: {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْكَافِرُونَ} [المائدة: 44] {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللَّهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ} [المائدة: 47] في الكفار كلها.

صحيح: رواه مسلم في الحدود (1700) من طريق أبي معاوية (هو الضرير) عن الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن البراء بن عازب، فذكره.




বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে এক ইহুদিকে কালি মাখানো অবস্থায় ও বেত্রাঘাত করা অবস্থায় নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে ডাকলেন এবং বললেন, "তোমরা তোমাদের কিতাবে যেনাকারীর শাস্তি কি এটাই পেয়েছ?" তারা বলল, "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি তাদের একজন আলেমকে ডাকলেন এবং বললেন, "আমি তোমাকে সেই আল্লাহর শপথ দিচ্ছি যিনি মূসা (আঃ)-এর উপর তাওরাত নাযিল করেছেন! তোমরা কি তোমাদের কিতাবে যেনাকারীর শাস্তি এটাই পেয়েছো?" তারা বলল, "না। আপনি যদি এই শপথ না দিতেন, তবে আমরা আপনাকে জানাতাম না। আমরা তো রজম (পাথর মেরে হত্যা)-কেই পেয়েছি।" কিন্তু এটা (ব্যাভিচার) আমাদের উচ্চবিত্তদের মধ্যে বেড়ে গিয়েছিল। আমরা যখন কোনো সম্মানিত ব্যক্তিকে ধরতাম, তখন তাকে ছেড়ে দিতাম। আর যখন কোনো দুর্বলকে ধরতাম, তার উপর শাস্তি কার্যকর করতাম। তখন আমরা বললাম, 'এসো, আমরা এমন একটি বিষয়ে ঐকমত্যে পৌঁছাই যা আমরা সম্মানিত ও দুর্বল সকলের উপরই প্রয়োগ করতে পারব।' তাই আমরা রজমের পরিবর্তে কালি মাখানো ও বেত্রাঘাতকে নির্ধারণ করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আল্লাহ! তারা যখন আপনার হুকুমকে মৃত করে দিয়েছে, আমিই প্রথম ব্যক্তি যে তাকে জীবিত করলাম।" এরপর তিনি তার (ঐ ইহুদি) ব্যাপারে আদেশ দিলেন, ফলে তাকে রজম করা হলো।

এরপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "হে রাসূল! যারা কুফুরীর দিকে দ্রুত ধাবিত হয়..." [আল-মায়িদা: ৪১] থেকে শুরু করে "...যদি তোমাদেরকে এই ফয়সালা দেওয়া হয়, তবে তা গ্রহণ করো" [আল-মায়িদা: ৪১] পর্যন্ত। (এর দ্বারা উদ্দেশ্য ছিল): তোমরা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাও। যদি তিনি তোমাদেরকে কালি মাখানো ও বেত্রাঘাত করার আদেশ দেন, তবে তা গ্রহণ করো। আর যদি তিনি তোমাদেরকে রজমের ফতোয়া দেন, তবে সতর্ক হও।

তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "আর যারা আল্লাহ যা নাযিল করেছেন, সে অনুযায়ী বিচার করে না, তারাই কাফির।" [আল-মায়িদা: ৪৪] এবং "আর যারা আল্লাহ যা নাযিল করেছেন, সে অনুযায়ী বিচার করে না, তারাই ফাসিক।" [আল-মায়িদা: ৪৭] (এগুলো) সকল কাফিরদের ব্যাপারে নাযিল হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (6779)


6779 - عن جابر بن عبد الله يقول: رجم النبي صلى الله عليه وسلم رجلًا من أسلم، ورجلا من اليهود وامرأته. وفي رواية: وامرأة.

صحيح: رواه مسلم في الحدود (1701) عن هارون بن عبد الله حدثنا الحجاج بن محمد، قال: قال ابن جريح، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكره.

وأما ما روي عن جابر قال: جاءت اليهود برجل وامرأة منهم زنيا فقال:"ائتوني بأعلم رجلين منكم" فأتوه بابني صوريا قال: فنشدهما كيف تجدان أمر هذين في التوراة؟ قالا: نجد في التوراة إذا شهد أربعة أنهم رأوا ذكره في فرجها مثل الميل في المكحلة رُجما. قال:"فما يمنعكما أن ترجموهما؟" قالا: ذهب سلطاننا فكرهنا القتل. فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بالشهود. فجاء أربعة فشهدوا أنهم رأوا ذكره في فرجها مثل الميل في المكحلة. فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم برجمها. فهو ضعيف.

رواه أبو داود (4452) عن يحيى بن موسى البلخي، حدثنا أبو أسامة، قال مجالد: أُخبرنا عن عامر الشعبي، عن جابر بن عبد الله فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل مجالد وهو ابن سعيد.

ورواه أيضا أبو داود (3626) من وجه آخر مرسلًا باختصار.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসলাম গোত্রের একজন ব্যক্তিকে এবং ইয়াহুদিদের একজন পুরুষ ও তার স্ত্রীকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে মৃত্যুদণ্ড) করেছেন। অপর এক বর্ণনায় এসেছে: এবং একজন নারীকে।

আর জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: ইয়াহুদিরা তাদের মধ্যকার একজন পুরুষ ও একজন নারীকে নিয়ে এলো যারা ব্যভিচার করেছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তোমাদের মধ্যে সবচেয়ে জ্ঞানী দু’জন লোককে আমার কাছে নিয়ে এসো।” অতঃপর তারা ইবনু সূরিয়ার দু’পুত্রকে নিয়ে এলো। তিনি তাদের দু’জনের কাছে জানতে চাইলেন, “তোমরা তাওরাতে এদের দু’জনের ব্যাপারে কী বিধান পাও?” তারা দু’জন বললো: আমরা তাওরাতে পাই যে, যদি চারজন সাক্ষী দেয় যে তারা পুরুষাঙ্গকে সুরমাদানির মধ্যে সুরমা শলাকার মতো তার যোনির মধ্যে প্রবেশ করতে দেখেছে, তবে তাদের রজম করা হবে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তবে কী কারণে তোমরা তাদের রজম করা থেকে বিরত থাকছো?” তারা দু’জন বললো: আমাদের কর্তৃত্ব চলে গেছে, তাই আমরা হত্যা করাকে অপছন্দ করেছি। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাক্ষীদের ডাকলেন। চারজন লোক এসে সাক্ষ্য দিল যে, তারা পুরুষাঙ্গকে সুরমাদানির মধ্যে সুরমা শলাকার মতো তার যোনির মধ্যে প্রবেশ করতে দেখেছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে রজম করার নির্দেশ দিলেন। এই বর্ণনাটি দুর্বল। (আর এই বর্ণনার সনদ দুর্বল হওয়ার কারণ হলো মুজালিদ, অর্থাৎ ইবনু সাঈদ। আবূ দাঊদ এটি অন্য সূত্রেও সংক্ষিপ্তভাবে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন।)









আল-জামি` আল-কামিল (6780)


6780 - عن جابر بن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم رجم يهوديا ويهودية.

حسن: رواه الترمذي (1437) وابن ماجه (2557) وأحمد (20856) كلهم من طريق شريك، عن سماك، عن جابر بن سمرة فذكره.

وشريك هو ابن عبد الله النخعي ضُعّف لسوء حفظه، وقد توبع. رواه أبو داود الطيالسي (812) عن حماد بن سلمة، عن سماك به. وبهذه المتابعة حسن هذا الحديث.

قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم قالوا: إذا اختصم أهل الكتاب، وترافعوا إلى حكام المسلمين حكموا بينهم بالكتاب والسنة وبأحكام المسلمين. وهو قول أحمد وإسحاق وقال بعضهم: لا يقام عليهم الحد في الزنا. والقول الأوصل أصح". انتهى.




জাবির ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন ইহুদি পুরুষ ও একজন ইহুদি নারীকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে মৃত্যুদণ্ড) করেছিলেন।

ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: অধিকাংশ আলিমের আমল এই হাদীস অনুযায়ী। তারা বলেছেন, যখন আহলে কিতাবগণ (ইহুদি ও খ্রিস্টান) মতবিরোধে লিপ্ত হয় এবং মুসলিম বিচারকদের কাছে বিচারপ্রার্থী হয়, তখন বিচারকরা তাদের মাঝে কিতাব ও সুন্নাহ এবং মুসলিম বিধিবিধান অনুযায়ী ফুকুম দেবেন। এটি ইমাম আহমাদ ও ইসহাক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মত। তবে কেউ কেউ বলেছেন: তাদের উপর ব্যভিচারের হদ (ইসলামী শাস্তি) কার্যকর করা হবে না। কিন্তু প্রথম মতটিই অধিক সহীহ।









আল-জামি` আল-কামিল (6781)


6781 - عن الشيباني قال: قلت لابن أبي أوفى: رجم رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم، يهوديا ويهودية قال: قلت: بعد نزول النور أو قبلها؟ قال: لا أدري.
صحيح: رواه أحمد (19126) وابن حبان (4433) كلاهما من حديث هُشيم بن بشير، قال: قال الشيباني فذكره.

وإسناده صحيح. والشيباني هو أبو إسحاق سليمان بن أبي سليمان الكوفي. وأخرجه الشيخان كما سيأتي من وجه آخر عن أبي إسحاق الشيباني وليس فيه ذكر رجم اليهودي واليهودية.




ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আশ-শাইবানী বলেন: আমি ইবনু আবী আওফাকে জিজ্ঞাসা করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি রজম (পাথর নিক্ষেপের মাধ্যমে মৃত্যুদণ্ড) করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এক ইহুদি পুরুষ ও এক ইহুদি নারীকে। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: তা কি নূরের (সূরা নূরের) অবতরণের পরে, নাকি তার পূর্বে? তিনি বললেন: আমি জানি না।









আল-জামি` আল-কামিল (6782)


6782 - عن ابن عباس قال: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم برجم اليهودي واليهودية عند باب مسجده، فلما وجد اليهودي مس الحجارة قام على صاحبته، فجنا عليها يقيها مس الحجارة، حتى قتلا جميعا، فكان مما صنع الله عز وجل لرسوله في تحقيق الزنا منهما.

حسن: رواه الإمام أحمد (2368) عن يعقوب وسعد، قالا: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: وحدثني محمد بن طلحة بن يزيد بن ركانة، عن إسماعيل بن إبراهيم الشيباني، عن ابن عباس فذكره.

ورواه الطبراني في الكبير (10/ 403) والحاكم (4/ 365) كلاهما من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، قال حدثني محمد بن طلحة بن يزيد بن ركانة بإسناده وفيه: قد أحصنا فسألوه أن يحكم فيهما بالرجم فرجمهما في فناء المسجد.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه حسن الحديث إذا صرح بالسماع. وإسماعيل بن إبراهيم الشيباني حجازي ثقة، وثّقه أبو زرعة، وذكره ابن حبان في"الثقات" وهو من رجال"التعجيل" (47).

وليس من رجال"التهذيب" إبراهيم بن إسماعيل، ويقال: إسماعيل بن إبراهيم السلمي ويقال الشيباني حجازي فهو مجهول كما قال أبو حاتم. فقد فرق بينهما أبو حاتم الرازي وابن حبان، وجمع بينهما البخاري فتبعه المزي.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم، ولعل متوهما من غير أهل الصنعة يتوهم أن إسماعيل الشيباني هذا مجهول، وليس كذلك. فقد روى عنه عمرو بن دينار الأثرم". انتهى.

وفي الباب ما رُوي عن أبي هريرة قال: أول مرجوم رجمه رسول الله صلى الله عليه وسلم من اليهود. رواه أبو داود (4450) عن محمد بن يحيى، حدثنا عبد الرزاق وهو في مصنفه (13330) أخبرنا معمر، عن الزهري، حدثنا رجل من مزينة ممن يتبع العلم ويعيه نحن عند سعيد بن المسيب، فحدثنا عن أبي هريرة قال: زنى رجل من اليهود وامرأة، فقال بعضهم لبعض: اذهبوا بنا إلى هذا النبي، فإنه نبي بعث بالتخفيف، فإن أفتانا بفتيا دون الرجم قبلناها واحتججنا بها عند الله، قلنا: فتيا نبي من أنبيائك، قال: فأتوا النبي صلى الله عليه وسلم، وهو جالس في المسجد في أصحابه، فقالوا: يا أبا القاسم، ما ترى في رجل وامرأة زنيا؟ فلم يكلمهم كلمة حتى أتي بيت مِدْراسهم، فقام على الباب، فقال:"أنشدك بالله الذي أنزل التوراة على موسى، ما تجدون في التوراة على من زنى إذا أحصن؟" قالوا: يُحمم، ويُجبّه ويُجلد، والتجبية أن يحمل الزانيان على حمار وتقابل أقفيتُهما ويطاف بهما. قال:
وسكت شاب منهم، فلما رآه النبي صلى الله عليه وسلم سكت ألظّ به النشدة، فقال: اللهم إذ نشدتنا، فإنا نجد في التوراة الرجم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"فما أول ما ارتخصتم أمر الله؟" قال: زنى ذو قرابة من ملك من ملوكنا فأخر عنه الرجم، ثم زنى رجل في أسرة من الناس فأراد رجمه، فحال قومه دونه وقالوا: لا يرجم صاحبنا حتى تجيء بصاحبك فترجمه، فاصطلحوا على هذه العقوبة بينهم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"فإني أحكم بما في التوراة، فأمر بهما فرجما".

قال الزهري: فبلغنا أن هذه الآية نزلت فيهم: {إِنَّا أَنْزَلْنَا التَّوْرَاةَ فِيهَا هُدًى وَنُورٌ يَحْكُمُ بِهَا النَّبِيُّونَ الَّذِينَ أَسْلَمُوا} [المائدة: 44] كان النبي صلى الله عليه وسلم منهم.

ورواه الإمام أحمد (6385) عن عبد الرزاق بإسناده مختصرا، ورواه أيضا أبو داود (4451) من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، عن الزهري قال: سمعت رجلا من مزينة يحدث سعيد بن المسيب عن أبي هريرة قال: زني رجل وامرأة من اليهود، وقد أحصنا حين قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم المدينة، وقد كان الرجم مكتوبا عليهم في التوراة، فتركوه وأخذوا بالتجيية يُضرب مائة بحبل مطلي بقار، ويحمل على حمار، وجهه مما يلي دبر الحمار، فاجتمع أحبار من أحبارهم، فبعثوا قومًا آخرين إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: سلوه عن حد الزاني، وساق الحديث فقال فيه: قال: ولم يكونوا من أهل دينه فيحكم بينهم. فخيّر في ذلك قال: {فَإِنْ جَاءُوكَ فَاحْكُمْ بَيْنَهُمْ أَوْ أَعْرِضْ عَنْهُمْ} [المائدة: 47] ورواه البيهقي (8/ 247) من طريق أبي داود وفيه أيضا رجل من مزينة لم يسم.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মসজিদের দরজার কাছে ইহুদি পুরুষ ও ইহুদি নারীকে পাথর মেরে রজম (হত্যার) করার নির্দেশ দিলেন। যখন ইহুদি লোকটি পাথরের স্পর্শ পেল, সে তার সঙ্গিনীর উপর উঠে গেল এবং তাকে পাথরের আঘাত থেকে রক্ষা করতে চাইল, যতক্ষণ না তারা উভয়েই নিহত হলো। আর এটা ছিল সেই কাজ, যা আল্লাহ তাআলা তাঁর রাসূলের জন্য তাদের দুজনের ব্যভিচার (অপরাধ) প্রমাণ করার জন্য সম্পন্ন করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6783)


6783 - عن عبد الله بن عباس أنه قال: سمعت عمر بن الخطاب يقول: الرجم في كتاب الله حق على من زنى من الرجال والنساء إذا أُحصن، إذا قامت البينة، أو كان الحبل، أو الاعتراف.

متفق عليه: رواه مالك في الحدود (8) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن عبد الله بن عباس، فذكره.

وهو طرف من خطبة طويلة كانت في آخر حجة حجها عمر بن الخطاب بعد أن رجع إلى المدينة.

رواها بطولها البخاري في الحدود (6830) من طريق صالح (هو ابن كيسان) عن الزهري، به.

وروى البخاري طرفا في الحدود أيضا (6829) عن علي بن عبد الله، حدثنا سفيان (هو ابن عيينة عن الزهري، عن عبيد الله، عن ابن عباس رضي الله عنهما قال: قال عمر بن الخطاب وهو جالس على منبر رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله قد بعث محمدا صلى الله عليه وسلم بالحق، وأنزل عليه الكتاب، فكان مما أنزل عليه آية الرجم، قرأناها ووعيناها وعقلناها. فرجم رسول الله صلى الله عليه وسلم ورجمنا بعده، فأخشي إن طال بالناس زمان، أن يقول قائل: ما نجد الرجم في كتاب الله، فيضلوا بترك فريضة أنزلها الله، وإن الرجم في كتاب الله حق على من زنى إذا أحصن من الرجال والنساء، إذا قامت البينة،
أو كان الحبل أو الاعتراف". ورواه مسلم في الحدود (1691) من طريق سفيان وغيره.

قال الحافظ ابن حجر:"وقد أخرجه الإسماعيلي من رواية جعفر الفريابي، عن علي بن عبد الله شيخ البخاري (عن سفيان به) فيه، فقال بعد قوله"أو الاعتراف":"وقد قرأناها: الشيخ والشيخة إذا زنيا فارجموهما البتّة" وقد رجم رسول الله صلى الله عليه وسلم ورجمنا بعده.

فسقط من رواية البخاري من قوله:"وقرأ" إلى قوله"البتّة" ولعل البخاري هو الذي حذف ذلك عمدًا، فقد أخرجه النسائي (في الكبرى 7156) عن محمد بن منصور، عن سفيان كرواية جعفر ثم قال:"لا أعلم أحدًا ذكر في هذا الحديث، الشيخ والشيخة" غير سفيان، وينبغي أن يكون وهم في ذلك.

قال ابن حجر:"وقد أخرج الأئمة هذا الحديث من رواية مالك، ويونس، ومعمر، وصالح بن كيسان، وعقيل وغيرهم من الحفاظ عن الزهري فلم يذكروها .." ا. هـ فتح الباري (12/ 143).

ثم قال:"وقد وقعت هذه الزيادة في هذا الحديث من رواية"الموطأ" عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب قال: لما صدر عمر من الحج وقدم المدينة خطب الناس، فقال: أيها الناس، قد سُنّتْ لكم السنن، وفُرضت لكم الفرائض، وتركتم على الواضحة - ثم قال: إياكم أن تهلكوا عن آية الرجم أن يقول قائل لا نجد حدين في كتاب الله، فقد رجم رسول الله صلى الله عليه وسلم ورجمنا، والذي نفسي بيده لولا أن يقول الناس زاد عمر في كتاب الله لكتبتها بيدي:"الشيخ والشيخة إذا زنيا فارجموهما ألبتة" قال مالك: الشيخ والشيخة: الثيب والثيبة. اهـ والحديث في الموطأ في"الحدود" (10).

ويرى بعض المحققين أن قوله تعالى: {الزَّانِيَةُ وَالزَّانِي فَاجْلِدُوا كُلَّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا} [النور: 2] عام في المحصن وغيره، فنسخ في حق المحصن بالرجم لرجم رسول الله صلى الله عليه وسلم. فيكون نسخ الكتاب بالسنة القطعية الفعلية. وقالوا: هذا أولى من ادعاء كون الناسخ قوله تعالى: {والشيخ والشيخة … } لعدم القطع بثبوت كونها قرآن، ثم نسخ تلاوتها وبقاء حكمها، ولذا قال علي بن أبي طالب: جلدتهما بكتاب الله، ورجمتهما بسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم" ولم ينسبه إلى القرآن المنسوخ تلاوته. وعلى هذا فيكون الرجم حكما زائدا على كتاب الله في حق المحصن. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (7/ 214).




আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: "আল্লাহর কিতাবে রজম (পাথর মেরে মৃত্যুদণ্ড) তাদের জন্য সত্য যারা বিবাহিত হওয়া সত্ত্বেও (পুরুষ বা নারী) ব্যভিচার করে, যখন প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত হয়, অথবা গর্ভসঞ্চার হয়, অথবা স্বীকারোক্তি দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (6784)


6784 - عن عبادة بن الصامت قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خذوا عني، خذوا عني، قد جعل الله لهن سبيلًا: البكر بالبكر جلد مائة ونفي سنة، والثيب بالثيب جلد مائة والرجم".

صحيح: رواه مسلم في الحدود (12: 1690) عن يحيى بن يحيى التميمي، أخبرنا هُشيم، عن منصور، عن الحسن، عن حِطّان بن عبد الله الرقاشي، عن عبادة بن الصامت فذكره.

قوله:"قد جعل الله لهن سبيلًا": إشارة إلى قوله تعالى: {فَأَمْسِكُوهُنَّ فِي الْبُيُوتِ حَتَّى يَتَوَفَّاهُنَّ الْمَوْتُ أَوْ يَجْعَلَ اللَّهُ لَهُنَّ سَبِيلًا} [النساء: 15].
اختلف أهل العلم في المحصن هل يجلد مع الرجم أم لا؟ فذهب قوم إلى أنه يجلد مائة، ثم يرجم مستدلين بحديث عبادة. روي ذلك عن علي بن أبي طالب وعبد الله بن مسعود وأبي بن كعب. وإليه ذهب إسحاق وداود وذهب الأكثرون إلى أنه لا جلد على المحصن مع الرجم، يُروي ذلك عن أبي بكر وعمر وغيرهما من الصحابة. وإليه ذهب عامة الفقهاء. وقالوا: إن الجلد منسوخ فيمن وجب عليه الرجم، لأن النبي صلى الله عليه وسلم رجم ماعزًا، والغامدية، واليهوديين، ولم يجلد واحدًا منهم وقال لأنيس الأسلمي:"واغد يا أنيس، على المرأة، فإن اعترفت فارجمها" فهذا الحديث آخر الأمرين، لأن راويه أبو هريرة متأخر الإسلام، فيكون ناسخا لما سبق من الجمع بين الجلد والرجم.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা আমার নিকট থেকে নাও, তোমরা আমার নিকট থেকে নাও! আল্লাহ তাদের (ব্যভিচারিণীদের) জন্য একটি পথ তৈরি করে দিয়েছেন: কুমার-কুমারীর (ব্যভিচারের শাস্তি হলো) একশত দোররা এবং এক বছরের জন্য নির্বাসন, আর বিবাহিত পুরুষ-নারীর (ব্যভিচারের শাস্তি হলো) একশত দোররা ও রজম (পাথর নিক্ষেপে মৃত্যুদণ্ড)।”









আল-জামি` আল-কামিল (6785)


6785 - عن ابن عباس قال: {وَاللَّاتِي يَأْتِينَ الْفَاحِشَةَ مِنْ نِسَائِكُمْ فَاسْتَشْهِدُوا عَلَيْهِنَّ أَرْبَعَةً مِنْكُمْ فَإِنْ شَهِدُوا فَأَمْسِكُوهُنَّ فِي الْبُيُوتِ حَتَّى يَتَوَفَّاهُنَّ الْمَوْتُ أَوْ يَجْعَلَ اللَّهُ لَهُنَّ سَبِيلًا} [النساء: 15] وذكر الرجل بعد المرأة، ثم جمعهما فقال: {وَاللَّذَانِ يَأْتِيَانِهَا مِنْكُمْ فَآذُوهُمَا فَإِنْ تَابَا وَأَصْلَحَا فَأَعْرِضُوا عَنْهُمَا} [النساء: 16] نسخ ذلك بأية الجلد فقال: {الزَّانِيَةُ وَالزَّانِي فَاجْلِدُوا كُلَّ وَاحِدٍ مِنْهُمَا مِائَةَ جَلْدَةٍ وَلَا تَأْخُذْكُمْ بِهِمَا رَأْفَةٌ فِي دِينِ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَائِفَةٌ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ} [النور: 2].

حسن: رواه أبو داود (4413) ومن طريقه البيهقي (8/ 210) عن أحمد بن محمد بن ثابت المروزي، حدثني علي بن الحسين عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل علي بن الحسين وأبيه الحسين بن واقد المروزي فإنهما صدوقان.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "তোমাদের নারীদের মধ্যে যারা অশ্লীল কাজ (ব্যভিচার) করবে, তাদের বিরুদ্ধে তোমাদের মধ্য থেকে চারজনকে সাক্ষী বানাও। যদি তারা সাক্ষ্য দেয়, তবে তাদের ঘরে আবদ্ধ রাখো, যতক্ষণ না মৃত্যু তাদের তুলে নেয় অথবা আল্লাহ তাদের জন্য কোনো পথ করে দেন।" (সূরা নিসা: ১৫) আর নারীর পর পুরুষের কথা উল্লেখ করে, অতঃপর তাদের দু'জনকে একত্রিত করে তিনি (আল্লাহ) বলেন: "আর তোমাদের মধ্যে যে দু'জন এ কাজ (অশ্লীলতা) করবে, তোমরা তাদের শাস্তি দাও। অতঃপর যদি তারা তওবা করে এবং নিজেদের সংশোধন করে, তবে তাদের দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নাও।" (সূরা নিসা: ১৬) এটি (উপরের বিধান) চাবুক মারার আয়াত দ্বারা রহিত (মানসুখ) করা হয়েছে। অতঃপর তিনি (আল্লাহ) বলেন: "ব্যভিচারিণী ও ব্যভিচারী—তাদের প্রত্যেককে একশত বেত্রাঘাত করো। আল্লাহর দ্বীনের ব্যাপারে তাদের প্রতি তোমাদের মনে যেন দয়া না আসে, যদি তোমরা আল্লাহ ও আখেরাতে বিশ্বাসী হও। আর মুমিনদের একটি দল যেন তাদের শাস্তি প্রত্যক্ষ করে।" (সূরা নূর: ২)।









আল-জামি` আল-কামিল (6786)


6786 - عن أبي إسحاق الشيباني، قال: سألت عبد الله بن أبي أوفى: هل رجم رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم. قال: قلت: بعد ما أنزلت سورة النور أم قبلها؟ قال: لا أدري.

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6812) من طريق خالد (هو ابن عبد الله) ومسلم في الحدود (1702) من طريق علي بن مُسهر، كلاهما عن أبي إسحاق الشيباني، به.




আব্দুল্লাহ ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ ইসহাক আশ-শায়বানী তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি কাউকে পাথর মেরেছেন (রজম করেছেন)? তিনি বললেন, হ্যাঁ। আবূ ইসহাক বলেন, আমি (পুনরায়) জিজ্ঞেস করলাম, (এই ঘটনা কি) সূরাহ আন-নূর নাযিল হওয়ার পরে, না তার আগে? তিনি বললেন, আমি জানি না।









আল-জামি` আল-কামিল (6787)


6787 - عن علي حين رجم المرأة يوم الجمعة وقال: قد رجمتها بسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه البخاري في الحدود (6812) عن آدم، حدثنا شعبة، حدثنا سلمة بن كهيل، قال: سمعت الشعبي يحدّث عن علي صلى الله عليه وسلم فذكره.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি শুক্রবার দিন মহিলাটিকে রজম (পাথর নিক্ষেপ) করেন, তখন তিনি বললেন: "আমি তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত মোতাবেক রজম করেছি।"