হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (6808)


6808 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو كنت راجمًا أحدًا بغير بينة لرجمت فلانة. فقد ظهر منها الريبة في منطقها، وهيئتها، ومن يدخل عليها".

صحيح: رواه ابن ماجه (2559) عن العباس بن الوليد الدمشقي، قال: حدثنا زيد بن يحيى بن عبيد، قال: حدثنا الليث بن سعد، عن عبيد الله بن أبي جعفر، عن أبي الأسود، عن عروة، عن ابن عباس فذكره وإسناده صحيح.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যদি আমি প্রমাণ (শরয়ী দলিল) ছাড়া কাউকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে মৃত্যুদণ্ড) করতাম, তবে আমি অমুক মহিলাকে রজম করতাম। কেননা তার কথাবার্তা, চালচলন এবং তার কাছে যারা প্রবেশ করে, তাদের মাধ্যমে তার মধ্যে সন্দেহজনক আচরণ প্রকাশ পেয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (6809)


6809 - عن القاسم بن محمد، قال: قال عبد الله بن شداد وذُكر المتلاعنان عند ابن عباس فقال ابن شداد: أهما اللذان قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لو كنت راجمًا أحدًا بغير بينةٍ لرجمتهما!" فقال ابن عباس: لا، تلك امرأة أعلنت.

وفي رواية:"لا، تلك امرأة كانت تظهر في الإسلام السوء".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6855) ومسلم في اللعان (13: 1497) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، حدّثنا أبو الزناد، عن القاسم بن محمد، به.

والرواية الثانية لهما البخاري في الحدود (6856) ومسلم في اللعان (12: 1497) من طريق الليث، حدثنا يحيى بن سعيد، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن القاسم بن محمد فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আবদুল্লাহ ইবনু শাদ্দাদ তাঁর (ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) নিকট লি‘আনকারী দম্পতির আলোচনা উঠলে বললেন: এরা কি সেই দু’জন, যাদের সম্পর্কে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমি সাক্ষ্য (প্রমাণ) ব্যতীত কাউকে রজম করতাম, তবে অবশ্যই এদের দু’জনকেই রজম করতাম!" তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: না, এই মহিলাটি ছিল সে, যে (প্রকাশ্যে) কু-কর্ম করত।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "না, সেই মহিলাটি ছিল সে, যে ইসলামে প্রকাশ্য মন্দ কাজ করত।"









আল-জামি` আল-কামিল (6810)


6810 - عن المغيرة بن شعبة قال: قال سعد بن عبادة: لو رأيت رجلًا مع امرأتي لضربته بالسيف غير مُصفح! فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"أتعجبون من غيرة سعد؟ لأنا أغير منه، والله أغير مني".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6846) ومسلم في اللعان (17: 1499) من طريق أبي عوانة، حدثنا عبد الله بن نمير، عن ورّاد كاتب المغيرة، عن المغيرة بن شعبة، فذكره.




মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনে উবাদাহ বললেন: যদি আমি আমার স্ত্রীর সাথে কোনো পুরুষকে দেখতাম, তাহলে আমি তাকে তলোয়ারের ধারালো দিক দিয়ে আঘাত করতাম (ধারহীন দিক দিয়ে মারতাম না)! এ কথা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছাল। তখন তিনি বললেন: "তোমরা কি সা'দের আত্মমর্যাদাবোধ (গীরাত) দেখে অবাক হচ্ছো? আমি তার চেয়েও বেশি আত্মমর্যাদাবান, আর আল্লাহ আমার চেয়েও বেশি আত্মমর্যাদাবান।"









আল-জামি` আল-কামিল (6811)


6811 - عن وعن أبي هريرة قال: قال سعد بن عبادة: يا رسول الله، لو وجدت مع أهلي رجلًا لم أمسه حتى آتي بأربعة شهداء؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم" قال: كلا، والذي بعثك بالحق إن كنت لأُعاجله بالسيف قبل ذلك. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: اسمعوا إلى ما يقول سيّدكم، إنه لغيور، وأنا أغير منه، والله أغير مني".

صحيح: رواه مسلم في اللعان (16: 1498) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا خالد بن مخلد، عن سليمان بن بلال، حدثني سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সা‘দ ইবনু ‘উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি আমি আমার স্ত্রীর সাথে কোনো পুরুষকে দেখতে পাই, তবে আমি কি চারজন সাক্ষী না আনা পর্যন্ত তাকে স্পর্শ (শাস্তি) করব না? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি (সা‘দ) বললেন: কক্ষনো না! সেই সত্তার শপথ, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে প্রেরণ করেছেন, আমি তার আগেই তাকে তরবারি দিয়ে দ্রুত আঘাত করব। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা শোনো, তোমাদের নেতা কী বলছে! সে অবশ্যই আত্মমর্যাদাশীল (গাইয়ূর), আর আমি তার চেয়েও বেশি আত্মমর্যাদাশীল, আর আল্লাহ আমার চেয়েও বেশি আত্মমর্যাদাশীল।









আল-জামি` আল-কামিল (6812)


6812 - عن أبي هريرة أن سعد بن عبادة قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: أرأيت لو أني وجدت مع امرأتي رجلًا، أأمهله حتى آتي بأربعة شهود؟ فقال رسول الله:"نعم".

صحيح: رواه مالك في الحدود (7) عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه مسلم في اللعان (15: 1498) من طريق مالك، به، مثله.

وفي الباب ما روي عن سعد بن عبادة حين نزلت آية الحدود. وكان رجلًا غيورًا: أرأيت لو أنك وجدت مع امرأتك رجلًا، أي شيء كنت تصنع؟ قال: كنت ضاربهما بالسيف. أنتظر حتى أجيء بأربعة؟ إلى ما ذاك قد قضى حاجته وذهب، أو أقول: رأيت كذا وكذا، فتضربوني الحدّ ولا تقبلوا لي شهادة أبدًا. قال: فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"كفى بالسيف شاهدًا، ثم قال:"لا، إني أخاف أن يتتابع في ذلك السكران والغيران".

رواه ابن ماجه (2606) عن علي بن محمد قال: حدثنا وكيع، عن الفضل بن دلْهم، عن الحسن، عن قبيصة بن حريث، عن سلمة بن المحبّق قال: قيل لأبي ثابت سعد بن عبادة حين نزلت آية الحدود فذكره. وإسناده ضعيف لعلل:

منها: الفضل بن دلْهم الواسطي القصّاب ضعيف.

ومنها: شيخه الحسن وهو البصري مدلس وقد عنعن.

ومنها: شيخه قبيصة بن حريث الأنصاري البصري قال فيه البخاري:"في حديثه نظر".

وقال النسائي:"لا يصح حديثه".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা‘দ ইবনু ‘উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন, "আপনি বলুন তো, যদি আমি আমার স্ত্রীর সাথে কোনো পুরুষকে পাই, আমি কি তাকে সময় দেব, যতক্ষণ না আমি চারজন সাক্ষী নিয়ে আসি?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হ্যাঁ।"









আল-জামি` আল-কামিল (6813)


6813 - عن سهل بن سعد، عن النبي صلى الله عليه وسلم أن رجلًا أتاه فأمر عنده أنه أتي بامرأة سماها له، فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى المرأة. فسألها عن ذلك. فأنكرت أن تكون زنت. فجلده الحد وتركها.

حسن: رواه أبو داود (4437، 4466) عن عثمان بن أبي شيبة، ثنا طلق بن غنام، ثنا عبد السلام بن حفص، ثنا أبو حازم، عن سهل بن سعد فذكره ومن طريقه رواه البيهقي (8/ 228).
وهذا إسناد حسن من أجل عبد السلام بن حفص فإنه حسن الحديث وقد وثقه يحيى بن معين.

ورواه أحمد (22875) والدارقطني (3/ 99) والحاكم (4/ 370) كلهم من حديث مسلم بن خالد الزنجي، عن عباد بن إسحاق، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد أن رجلًا من أسلم جاء النبي صلى الله عليه وسلم فذكره. وفيه"فحده وتركها".

وفيه مسلم بن خالد الزنجي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقوله:"فحده": هذا هو الصحيح يعني حده حد الزنى وهو الرجم، لأنه كان محصنا، وأما قوله:"جلده" فهو يحتاج إلى تأويل بأن جلده أولا ثم ظهر له أنه محصن فأمر برجمه، ولم يثبت في الروايات الصحيحة أن النبي صلى الله عليه وسلم جمع بين الجلد والرجم في أحد.

وقوله:"من أسلم": وهو ماعز بن مالك الأسلمي.

وأما ما رُوي عن ابن عباس أن رجلا من بكر بن ليث أتى النبي صلى الله عليه وسلم فأقر أنه زني بامرأة أربع مرات، فجلده مائة وكان بكرًا، ثم سأله البينة على المرأة فقالت: كذب والله يا رسول الله، فجلده حد الفرية ثمانين فهو ضعيف.

رواه أبو داود (4467) والبيهقي (8/ 228) كلاهما من حديث القاسم بن فياض الأباوي، عن خلاد بن عبد الرحمن، عن ابن المسيب، عن ابن عباس فذكره واللفظ لأبي داود. ولفظ البيهقي أطول من هذا. وإسناده ضعيف من أجل القاسم بن فياض الأنباوي ضعّفه ابن معين.

قال الآجري عن أبي داود، قال هشام بن يونس لما حدثني بتلك الأحاديث اتهمته. فقلت له: هي عندك مكتوبة؟ قال: نعم، وأخرج لي قرطاسًا وأملاها علي. قلت لأبي داود: هو ثقة، قال: نعم.

وقال النسائي:"هو منكر الحديث"، وقال المديني: مجهول". ولم يرو عنه غير هشام. وذكره ابن حبان في"الثقات".

ثم ذكره في"الضعفاء" وقال: كان ينفرد بالمناكير عن المشاهير فلما كثر ذلك في روايته بطل الاحتجاج به.



كانت مسلمة أو كافرة، متزوجة أو بكرًا. وفيه خلاف سيأتي. وأما العبد فيقاس على الأمة في الحد.




সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর নিকট এক ব্যক্তি এলো এবং সে স্বীকার করল যে, সে এক মহিলার সাথে (ব্যভিচার) করেছে, যার নাম সে তাঁর (নবীজীর) নিকট উল্লেখ করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই মহিলার নিকট লোক পাঠালেন। তিনি তাকে সে সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। কিন্তু সে (মহিলা) ব্যভিচার করার কথা অস্বীকার করল। অতঃপর তিনি (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (পুরুষটিকে) নির্ধারিত শাস্তি (হদ্দ) দিলেন এবং মহিলাটিকে ছেড়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6814)


6814 - عن أبي هريرة وزيد بن خالد الجهني، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن الأمة إذا زنتْ ولم تحصن؟ فقال:"إن زنت فاجلدوها، ثم إن زنت فاجلدوها، ثم إن زنت فاجلدوها. ثم بيعوها ولو بضفير".

قال ابن شهاب:"لا أدري أبعد الثالثة أو الرابعة".

متفق عليه: رواه مالك في الحدود (14) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن أبي هريرة، وزيد بن خالد الجهني، فذكراه.

ورواه البخاري في الحدود (6838، 6837) ومسلم في الحدود (32: 1703) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

قال البيهقي (8/ 242) وكذلك رواه جماعة من الحفاظ الثقات عن الزهري في تنصيصه على جلدها إذا زنت ولم تُحصن، فيكون جلدها بعد إحصانها بالنكاح ثابنا بالكتاب، وجلدها قبل إحصانها بالنكاح ثابتا بالسنة في قول من زعم أن الإحصان المذكور فيهن المراد به النكاح.

وقال الخطابي:"أما قوله:"إذا زنت ولم تحصن" فقد اختلف الناس في هذه اللفظة".

فقال بعضهم: إنها غير محفوظة، وروي هذا الحديث من طريق غير هذا، ليس فيه ذكر الإحصان".

وقال بعضهم: إنما هو مسألة عن أمة زنت ولا زوج لها. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"تُجلد" أي كما تجلد ذوات الزوج، وإنما هو اتفاق حال في المسؤول عنه، وليس بشرط يتعلق به الحكم. فيختلف من أجل وجوده وعدمه.

وذهب عبد الله بن عباس وجماعة من التابعين أن الأمة إذا زنت، ولم تحصن فلا حد عليها، وإنما تضرب تأديبًا.

وعمدتهم المفهوم المخالف من الآية الكريمة {فَإِذَا أُحْصِنَّ} [النساء: 25].

وفي حالة عدم الإحصان لا شيء عليها.

وورد في ذلك حديث ضعيف وهو ما رواه سعيد بن منصور، عن سفيان، عن مسعر، عن عمرو بن مرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس على الأمة حد حتى تحصن - أو حتى تزوج - فإذا أحصنت بزوج فعليها نصف ما على المحصنات".

رواه ابن خزيمة وقال: رفعه خطأ، إنما هو قول ابن عباس ذكره ابن كثير.

قلت: وهو كما قال. رواه البيهقي (8/ 243) من وجه آخر عن مجاهد وعكرمة، عن ابن عباس من قوله.

وقال أكثر الفقهاء: إنها تجلد، وإن لم تتزوج، ومعنى الإحصان عندهم الإسلام. وقرأها
عاصم والأعمش وحمزة والكسائي:"أحصنّ" مفتوحة الألف بمعنى: أسلمن.




আবূ হুরায়রা ও যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এমন দাসী সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো, যে ব্যভিচার করেছে অথচ সে বিবাহিতা নয় (বা সুরক্ষিত নয়)। তিনি বললেন: "যদি সে ব্যভিচার করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো; এরপরও যদি সে ব্যভিচার করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো; এরপরও যদি সে ব্যভিচার করে, তবে তাকে বেত্রাঘাত করো। অতঃপর তাকে বিক্রি করে দাও, যদিও তা একটি দড়ি বা রশির (কম মূল্যের) বিনিময়ে হয়।"

ইবনু শিহাব (যুহরী) বলেন: "আমি জানি না, এটি তৃতীয়বারের পর (বিক্রির নির্দেশ) নাকি চতুর্থবারের পর।"









আল-জামি` আল-কামিল (6815)


6815 - عن أبي هريرة أنه سمعه يقول: قال النبي:"إذا زنت الأمة فتبين زناها فليجلدها ولا يثرّب، ثم إن زنت فليجلدها ولا يثرّب، ثم إن زنت الثالثة فليبعْها ولو بحبل من شعر".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6839) ومسلم في الحدود (30: 1703) كلاهما من طريق الليث (هو ابن سعد)، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো বাঁদী (দাসী) যেনা (ব্যভিচার) করে এবং তার যেনা প্রমাণিত হয়, তখন তার মালিক যেন তাকে বেত্রাঘাত করে এবং তাকে তিরস্কার না করে। অতঃপর যদি সে আবার যেনা করে, তখন সে যেন তাকে বেত্রাঘাত করে এবং তাকে তিরস্কার না করে। অতঃপর যদি সে তৃতীয়বার যেনা করে, তবে সে যেন তাকে বিক্রি করে দেয়, যদিও তা একটি পশমের রশির বিনিময়ে হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (6816)


6816 - عن أبي عبد الرحمن قال: خطب علي فقال: يا أيها الناس، أقيموا على أرقائكم الحد، من أحصن منهم ومن لم يُحصن، فإن أمة لرسول الله صلى الله عليه وسلم زنت، فأمرني أن أجلدها، فإذا هي حديث عهد بنفاس، فخشيت إن أنا جلدتها أن أقتلها فذكرت ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"أحسنت".

صحيح: رواه مسلم في الحدود (1706) عن محمد بن أبي بكر المقدمي حدثنا سليمان أبو داود، حدثنا زائدة، عن السدي، عن سعد بن عبيدة، عن أبي عبد الرحمن فذكره.

وفي رواية زاد:"اتركها حتى تماثل".

فقوله:"أقيموا على أرقائكم الحد" الظاهر أنه مدرج في الحديث من قول علي، وليس بمرفوع، ولكن له حكم الرفع لأنه هو الذي أنابه رسول الله صلى الله عليه وسلم في جلد الأمة الزانية.

وقد رواه أبو داود (4473) وأحمد (736) والطحاوي (3/ 136) والبيهقي (8/ 245) كلهم من طريق عبد الأعلى الثعلبي، عن أبي جميلة الطُّهري، عن علي قال: فجرتْ جارية لآل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: فذكر الحديث.

وجاء فيه مرفوعا:"وأقيموا الحدود على ما ملكت أيمانكم".

إلا أن فيه عبد الأعلى بن عامر الثعلبي ضعيف، وشيخه أبو جميلة الطّهري، لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد من تابعه.

وكذلك لا يصح ما روي عن عائشة مرفوعًا:"إذا زنت الأمة فاجلدوها، وإن زنت فاجلدوها، وإن زنت فاجلدوها، ثم بيعوها ولو بضفير" والضفير الحبل.

رواه ابن ماجه (2566) وأحمد (24361) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عمار بن أبي فروة، أن محمد بن مسلم حدثه أن عروة حدثه، أن عمرة بنت عبد الرحمن حدثته، أن عائشة حدثها فذكرته.

وعمار بن أبي فروة الأموي مولاهم المدني قال فيه البخاري:"لا يتابع على حديثه، وذكره العقيلي في الضعفاء (1340) وأخرج هذا الحديث، وبين أن غيره رووه عن الزهري، عن عبيد الله
ابن عبد الله، عن أبي هريرة وزيد بن خالد".

قلت: ولم يرو عنه إلا يزيد بن أبي حبيب، فهو مجهول أيضا مع مخالفته للرواة عن الزهري.

أخذ بهذه الأحاديث الإمام أحمد وإسحاق فقالا: للرجل أن يقيم الحد على مملوكهـ دون السلطان. وقال بعضهم: يدفع إلى السلطان، ولا يقيم الحد هو بنفسه.

قال الترمذي (1440) بعد أن نقل القولين:"والقول الأول أصح".

قلت: وقال ابن أبي الزناد، عن أبيه، عن الفقهاء الذين ينتهي إلى قولهم من أهل المدينة كانوا يقولون:"لا ينبغي لأحد أن يقيم شيئًا من الحدود دون السلطان إلا أن للرجل أن يقيم حد الزنا على عبده وأمته".

أخرجه البيهقي (8/ 245) بإسناده عن ابن أبي الزناد، عن أبيه.

وقال أبو حنيفة: ليس للسيد إقامة الحد على رقيقه دون السلطان لأن إقامة الحدود من حقوق السلطان ونائبه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি খুৎবা দিতে গিয়ে বললেন: হে লোক সকল! তোমরা তোমাদের ক্রীতদাসদের উপর দণ্ড কার্যকর করো, তাদের মধ্যে বিবাহিত হোক বা অবিবাহিত হোক। কেননা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক দাসী ব্যভিচার করেছিল। তিনি আমাকে তাকে বেত্রাঘাত করতে নির্দেশ দিলেন। কিন্তু সে ছিল সদ্য প্রসবোত্তর (নিফাস) অবস্থায়। আমি ভয় পেলাম যে, আমি যদি তাকে বেত্রাঘাত করি তবে সে মারা যেতে পারে। আমি বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট জানালাম। তিনি বললেন: "তুমি উত্তম কাজ করেছো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6817)


6817 - عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف قال: أخبرني بعض أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم من الأنصار أنه اشتكى رجل منهم حتى أُضْنيَ فعاد جلده على عظْمٍ. فدخلت جارية البعضهم، فهشّ إليها، فوقع عليها. فلما دخل عليه رجال من قومه يعودونه أخبرهم بذلك، وقال: استفتوا لي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإني قد وقعت على جارية دخلتْ عليّ. فذكروا ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: يا رسول الله! ما رأينا بأحد من الناس من الضُّر مثل الذي هو به، لو حملنا إليك لتفسّختْ عظامُه ما هو إلا جلد على عظْم. فأمرهم رسول الله صلى الله عليه وسلم بمائة شِمراخٍ، فيضربونه ضربة واحدة.

صحيح: رواه أبو داود (4472) وابن الجارود (817) كلاهما من طريقين عن يونس، عن ابن شهاب، أخبرني أبو أمامة بن سهل بن حُنيف فذكر مثله. وإسناده صحيح.

وللحديث طرق أخرى منها ما رواه أحمد (21935) وابن ماجه (2574) كلاهما من طريق محمد بن إسحاق، عن يعقوب بن عبد الله بن الأشج، عن أبي أمامة بن سهل عن سعيد بن سعد بن عبادة قال: كان بين أبياتنا إنسان مُخدج ضعيف، ثم يُرَع أهل الدار وإلا وهو على أمة من إماء الدار بخبث بها، وكان مسلما. فرفع شأنه سعد إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: فذكره نحوه.

وهذا الإسناد لا بأس به غير أن محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ومنها رواه الشافعي ومن طريقه البيهقي (8/ 230) عن سفيان، عن يحيى بن سعيد وأبي الزناد، كلاهما عن أبي أمامة بن
سهل بن حنيف أن رجلا كان عند جوار سعد فأصاب امرأة حبل فذكر نحوه.

قال البيهقي:"هذا هو المحفوظ عن سفيان مرسلًا. ورُوي عنه موصولًا بذكر أبي سعيد، وقيل: عن أبي الزناد، عن أبي أمامة، عن أبيه، وقيل عن أبي أمامة عن سعيد بن سعد بن عبادة". انتهى

قلت: رواية سفيان الموصلة رواها الدارقطني (3/ 100) من طريق عمرو بن عون، نا سفيان، عن أبي الزناد ويحيى بن سعيد، عن أبي أمامة بن سهل، عن أبي سعيد فذكره.

والخلاصة فيه أن أبا أمامة روى هذا الحديث مرسلا، وهو الذي رجحه الدراقطني في العلل (12/ 276/ 278) كما رواه أيضا عن جماعة من الصحابة موصولًا. وكلها صحيحة ومحفوظة، كما قال الحافظ ابن حجر في التلخيص (4/ 59) بعد أن سرد طرقها.

وقوله:"أضْني" أي أصابه الضّني، وهو شدة المرض، وسوء الحال حتى ينحل بدنه.

والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، فقالوا: إن المريض الذي به مرض، لا يُرجى زواله إذا وجب عليه حد الزنا وهو بكر يضرب بأثكال عليه مائة شِمراخ ضربة واحدة، بحيث تمسه الشماريخ كلها، فيسقط الحد عنه. وإليه ذهب الشافعي وأحمد، وأما المريض الذي يرجي برءه فلا خلاف بين أهل العلم في تأخير الحد حتى يبرأ لحديث علي كما سبق.

وذهب قوم إلى أن لا يضرب بالشماريخ وهو قول مالك وأصحاب الرأي.




আবূ উমামা ইবন সাহল ইবন হুনাইফ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আনসারদের মধ্য হতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর জনৈক সাহাবী আমাকে জানিয়েছেন যে, তাদের এক ব্যক্তি মারাত্মকভাবে অসুস্থ হয়ে পড়েছিল, এমনকি সে এতই দুর্বল হয়ে গেল যে তার চামড়া হাড়ে লেগে গিয়েছিল (অর্থাৎ সে হাড্ডিসার হয়ে গিয়েছিল)। তাদের কারো একজন দাসী তার নিকট প্রবেশ করল। সে তার প্রতি আকৃষ্ট হলো এবং তার সাথে সহবাসে লিপ্ত হলো। যখন তার গোত্রের লোকেরা তাকে দেখতে আসল, তখন সে তাদেরকে বিষয়টি জানাল এবং বলল: তোমরা আমার জন্য রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট ফাতওয়া জিজ্ঞাসা করো, কারণ আমার নিকট প্রবেশ করা এক দাসীর সাথে আমি সহবাস করে ফেলেছি। অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট সে কথা উল্লেখ করল এবং বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা মানুষের মধ্যে এমন অসুস্থতা কারো মধ্যে দেখিনি যা তার মধ্যে রয়েছে। যদি আমরা তাকে আপনার কাছে বহন করে নিয়ে আসি, তাহলে তার হাড়গুলো ভেঙে চূর্ণ হয়ে যাবে। সে তো কেবল চামড়ার উপর হাড়মাত্র। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাদের একশ’ শিমরাখ (খেজুর ডালের সরু শাখা) নিতে আদেশ দিলেন এবং তাদেরকে তা দিয়ে এক আঘাতেই আঘাত করতে বললেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6818)


6818 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من وجدتموه يعمل عمل قوم لوط فاقتلوا الفاعل والمفعول به".

حسن: رواه أبو داود (4462) والترمذي (1451) وابن ماجه (2561) وابن الجارود (820) وأحمد (2732) والحاكم (4/ 355) والبيهقي (8/ 232) كلهم من حديث عمرو بن أبي عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره وزاد الحاكم إتيان البهيمة كما سيأتي ذكره وقال: صحيح الإسناد.

وقال أبو داود:"رواه سليمان بن بلال، عن عمرو بن أبي عمرو مثله، ورواه عباد بن منصور، عن عكرمة، عن ابن عباس رفعه، ورواه ابن جريج، عن إبراهيم، عن داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس رفعه".
ووصل حديث عباد بن منصور، عن عكرمة، عن ابن عباس البيهقي (8/ 233) وحديث إبراهيم بن إسماعيل، عن داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس، ابن ماجه (2564) ولكنهما جعلا متن الحديث في إتيان البهيمة.

فالذي يظهر أنه وقع خلط في المتنين الذين رُوِيَا بإسناد واحد. إلا أن أحدهما تفرد به عمرو بن أبي عمرو وهو إتيان البهيمة، كما قال الترمذي، وحكم عليه البخاري بالنكارة.

وأما المتن الثاني هو قتل الفاعل والمفعول به من يعمل عمل قوم لوط فلم ينفرد به عمرو بن أبي عمرو كما قال أبو داود.

ولذا حسن هذا الحديث. وأخذ به جمهور أهل العلم

قال الترمذي: واختلف أهل العلم في حد اللوطي فرأى بعضهم أن عليه الرجم أحصن أو لم يُحصن. وهذا قول مالك والشافعي وأحمد وإسحاق.

وقال بعض أهل العلم من فقهاء التابعين، منهم: الحسن البصري وإبراهيم النخعي وعطاء بن أبي رباح وغيرهم قالوا: حد اللوطي حد الزاني، وهو قول الثوري وأهل الكوفة". انتهى

وفي الباب ما روي عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الذي يعمل عمل قوم لوط فارجموا الأعلى والأسفل. ارجموهما جميعًا".

رواه ابن ماجه (2562) والطحاوي في مشكله (3833) كلاهما من حديث عاصم بن عمر، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث في إسناده مقال، ولا نعرف أحدًا رواه عن سُهيل بن أبي صالح غير عاصم بن عمر العمري. وعاصم بن عمر يُضعف في الحديث من قبل حفظه".

وأما ما رواه الحاكم (4/ 355) عن عبد الرحمن بن عبد الله بن عمر العمري، عن سُهيل بن أبي صالح بإسناده ففيه عبد الرحمن بن عبد الله العمري ساقط كما قال الذهبي، ولذا لم يعد الأئمة هذا الإسناد شيئًا، وإن كان الحاكم جعله شاهدًا لحديث ابن عباس.

وفي الباب ما روي عن جابر بن عبد الله قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن أخوف ما أخاف على أمتي عمل قوم لوط".

رواه الترمذي (1457) وابن ماجه (2563) وأحمد (15093) كلهم من حديث القاسم بن عبد الواحد، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد الله فذكره.

والقاسم بن عبد الواحد"مقبول" كما قال الحافظ في"التقريب". ولم أجد له متابعًا، فهو لين الحديث.



رواه أبو داود (4414) والترمذي (1455) وابن ماجه (2561) وأحمد (2420) والدارقطني (3/ 126/ 127) والحاكم (4/ 355) والبيهقي (8/ 233) كلهم من حديث عمرو بن أبي سلمة، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وزاد بعضهم: قيل لابن عباس: ما شأن البهيمة؟ قال: ما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك شيئًا، ولكن أرى رسول الله صلى الله عليه وسلم كره أن يؤكل من لحمها، أو ينتفع بها، وقد عُمل بها ذلك العمل.

وفيه عمرو بن أبي عمرو مختلف فيه، فوثقه أحمد وأبو زرعة وقال أبو حاتم:"لا بأس به، وقد روى عنه مالك". وقال ابن عدي:"لا بأس به، لأن مالكًا روى عنه، ولا يروي مالك إلا عن صدوق ثقة" وقلت: ولكن تكلم أهل العلم في روايته حديث البهيمة.

فقال البخاري:"عمرو صدوق، ولكهـ روي عن عكرمة مناكير، ولم يذكر في شيء من ذلك أنه سمعتُ من عكرمة" وقال:"ليس هذا بالقوي".

ثم روى أحمد بن يونس، أن شريكًا وأبا الأحوص وأبا بكر بن عياش حدثوهم، عن عاصم، عن أبي رزين، عن ابن عباس قال:"ليس على الذي يأتي البهيمة حد". وعاصم هو ابن بهدلة.

قال أبو داود:"حديث عاصم يضعّف حديث عمرو بن أبي عمرو".

وقال الترمذي:"هذا الحديث لا نعرفه إلا من حديث عمرو بن أبي عمرو عن عكرمة، عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقد روي سفيان الثوري، عن عاصم، عن أبي رزين، عن ابن عباس أنه قال: من أتي بهيمة فلا حد عليه. وقال:"وهذا أصح من الحديث الأول".

قلت: تبين من هذا أن حديث عمرو بن أبي عمرو يُضعف من وجهين:

الأول: تفرده عن عكرمة.

الثاني: مخالفة عاصم بن بهدلة له، فإنه روي عن ابن عباس من قوله في الحد على من أتى البهيمة. فلو كان هذا الحديث عن ابن عباس لما خالفه.

ولهذا لم يأخذ أحد من الفقهاء بهذا الحديث، وخاصة منهم الأئمة الأربعة: أبو حنيفة ومالك والشافعي في أحد قوليه وأحمد. وإنما قالوا فيه بالتعزير. وروي ذلك عن عطاء، والشعبي، والنخعي، والحاكم وغيرهم.

والقول الثاني عند الشافعي: حكمه حكم الزاني.

وفي معناه أحاديث أخرى وكلها ضعيفة.

وقد نصر البيهقي قول الشافعي هذا فقال:"وقد رويناه من أوجه عن عكرمة، ولا أدري عمرو بن أبي عمرو يقصر عن عاصم بن بهدلة في الحفظ، كيف وقد تابعه على روايته جماعة، وعكرمة عند أكثر الأئمة من الثقات الأثبات". انتهى.

هكذا قال رحمه الله بأن هذا الحديث روي عن عكرمة من أوجه، ونص الترمذي بأنه لا يروي
إلا عن عمرو بن أبي عمرو، عن عكرمة، فنظرنا في الأخبار فوجدنا أن عباس بن منصور وداود بن الحصين روياه عن عكرمة نحوه.

وعباد بن منصور الناجي ضعيف باتفاق أهل العلم، لا سيما في عكرمة.

وأما داود بن الحصين فحديثه عند ابن ماجه (2564) فهو وإن كان ثقة ولكن روايته عن عكرمة فيه اضطراب.

فلا تصح هذه المتابعة. وبالله التوفيق.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যদি কাউকে লূত জাতির কাজ (সমকামিতা) করতে পাও, তবে ফاعل (যে করে) এবং মফউল (যাকে করা হয়) উভয়কেই হত্যা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6819)


6819 - عن وعن ابن عباس قال: مَرّ علي بن أبي طالب بمجنونة بني فلان قد زنت، أمر عمر برجمها، فردها علي، وقال لعمر: يا أمير المؤمنين! أترجم هذه؟ قال: نعم، قال: أو ما تذكر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"رفع القلم عن ثلاثة، عن المجنون المغلوب على عقله، وعن النائم حتى يستيقظ، وعن الصبي حتى يحتلم" قال: صدقت، فخلى عنها.

صحيح: رواه أبو داود (4401) وصححه ابن خزيمة (1003) وابن حبان (143) والحاكم (4/ 389) وعنه البيهقي (8/ 264) كلهم من حديث جرير بن حازم، عن الأعمش، عن أبي ظبيان، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح. ورواه شعبة وابن نمير عن الأعمش موقوفا والحكم لمن زاد.

وأما ما رواه الإمام أحمد (1328) وأبو داود (4402) من طريق عطاء بن السائب، عن أبي ظبيان أن عمر بن الخطاب أتي بامرأة فذكر نحوه ففيه انقطاع، فإن أبا ظبيان لم يدرك عمر بن الخطاب. والأمر الذي لا خلاف بين أهل العلم أنه لا حد على المجنون.

وقد ورد في قصة ماعز الأسلمي أن النبي صلى الله عليه وسلم سأل قومه:"أمجنون هو؟" حتى قال له أيضا:"أبك جنون؟"

ولكن هل خفي على عمر بأن الحد لا يقام على المجنون؟ أستبعد ذلك. فلعلها تُجن مرة وتُفيق أخرى. وكان زناها في حال الإفاقة، ولم يدر عمر أنها تجن مرة وتفيق أخرى. فرأى عليٌّ أن الجنون شبهة، يدرأ بها الحد على من ابتلى به، ولو كان في حال الافاقة، فقبله عمر رضي الله عنه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বনি ফূলান গোত্রের এক পাগলিনীর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে ব্যভিচার করেছিল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে রজম করার নির্দেশ দিলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ফিরিয়ে দিলেন এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি কি এর উপর রজম প্রয়োগ করবেন? তিনি (উমর) বললেন: হ্যাঁ। তিনি (আলী) বললেন: আপনি কি স্মরণ করেন না যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তিন প্রকার ব্যক্তির উপর থেকে কলম উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে (অর্থাৎ তাদের কর্মের হিসাব লেখা হয় না): জ্ঞান হারানোর কারণে যার বুদ্ধি-বিবেক বিলুপ্ত হয়েছে এমন পাগল; ঘুমন্ত ব্যক্তি যতক্ষণ না সে জাগ্রত হয়; এবং শিশু যতক্ষণ না সে প্রাপ্তবয়স্ক হয়।” তিনি (উমর) বললেন: তুমি সত্য বলেছ। অতঃপর তিনি তাকে ছেড়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6820)


6820 - عن وائل بن حجر قال: خرجت امرأة إلى الصلاة، فلقيها رجل، فتجلّلها بثيابه، فقضى حاجته منها، فصاحت، فانطلق. ومر عليها رجل فقالت: إن ذاك الرجل فعل بي كذا وكذا. ومرت بعصابة من المهاجرين. فقالت: إن ذاك الرجل فعل بي كذا وكذا. فانطلقوا فأخذوا الرجل الذي ظنّت أنه وقع عليها وأتوها. فقالت: نعم هو
هذا. فأتوا به رسول الله صلى الله عليه وسلم. فلما أمر به ليُرجم قام صاحبها الذي وقع عليها. فقال: يا رسول الله! أنا صاحبها. فقال لها:"اذهبي فقد غفر الله لك" وقال للرجل قولًا حسنًا، فقيل: يا نبي! ألا ترجمه؟ فقال:"لقد تاب توبة لو تابها أهل المدينة لقُبل منهم".

حسن: رواه أبو داود (4379) والترمذي (1454) وأحمد (27240) وابن الجارود في المنتقى (823) والبيهقي (8/ 284 - 285) كلهم من طريق سماك بن حرب، عن علقمة بن وائل، عن أبيه وائل بن حجر فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب صحيح" وعلقمة بن وائل بن حجر سمعتُ من أبيه، وهو أكبر من عبد الجبار بن وائل، وعبد الجبار لم يسمع من أبيه".

قلت: وهو كما قال. وإسناده حسن من أجل سماك بن حرب وهو حسن الحديث في غير روايته عن عكرمة، فإنه مضطرب فيه.

وقد جاء في رواية أبي داود والترمذي:"ارجموه" وهو شاذ، والصحيح أن الرجل لم يرجم.

وعند الترمذي (1453) وابن ماجه (2598) وأحمد (18872) من حديث الحجاج بن أرطاة، عن عبد الجبار بن وائل، عن أبيه، قال: استُكرهت امرأة على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم. فدرأ عنها الحدّ. وأقامه على الذي أصابها، ولم يذكر أنه جعل لها مهرًا.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب، وليس إسناده بمتصل، وقد روي هذا الحديث من غير هذا الوجه. يقول: سمعت محمدًا يقول: عبد الجبار بن وائل بن حجر لم يسمع من أبيه، ولا أدركهـ. يقال: إنه ولد بعد موت أبيه بأشهر".

وقال الترمذي:"والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، أنه ليس على المستكرهة حد". انتهى.




ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন মহিলা সালাতের উদ্দেশ্যে বের হয়েছিলেন। একজন পুরুষ তার সাথে মিলিত হলো এবং তাকে নিজ পোশাক দ্বারা ঢেকে ফেলল, অতঃপর তার সাথে কুকর্ম করে তার প্রয়োজন পূর্ণ করল। মহিলাটি চিৎকার করল, তখন সে চলে গেল। তার পাশ দিয়ে একজন পুরুষ যাচ্ছিল, তখন সে (মহিলা) বলল: ঐ পুরুষটি আমার সাথে এই এই কাজ করেছে। অতঃপর সে মুহাজিরদের একটি দলের পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। সে বলল: ঐ পুরুষটি আমার সাথে এই এই কাজ করেছে।

তারা গিয়ে সেই পুরুষটিকে ধরে আনল, যাকে সে (মহিলা) মনে করেছিল যে সে-ই তার ওপর জবরদস্তি করেছিল। তারা তাকে মহিলাটির কাছে নিয়ে এল। মহিলাটি বলল: হ্যাঁ, সে-ই এই ব্যক্তি। অতঃপর তারা তাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট উপস্থিত হলো। যখন তাকে রজম (পাথর মেরে হত্যা) করার নির্দেশ দেওয়া হলো, তখন সেই আসল পুরুষটি, যে তার ওপর জবরদস্তি করেছিল, দাঁড়িয়ে গেল। সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমিই সেই ব্যক্তি।

তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মহিলাটিকে বললেন: "যাও, আল্লাহ তোমাকে ক্ষমা করে দিয়েছেন।" আর সেই পুরুষটিকে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উত্তম কথা বললেন। বলা হলো: হে নবী! আপনি কি তাকে রজম করবেন না? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে এমন তওবা করেছে, যদি মদীনার সকল অধিবাসী সেই তওবা করত, তবে তাদের তওবাও কবুল করা হতো।"









আল-জামি` আল-কামিল (6821)


6821 - عن عائشة أن قريشا أهمتهم المرأة المخزومية التي سرقت، فقالوا: من يكلم رسول الله صلى الله عليه وسلم ومن يجترئ عليه إلا أسامة حبُّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكلم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أتشفع في حد من حدود الله؟" ثم قال فخطب، قال:"يا أيها الناس، إنما ضل من قبلكم، أنهم كانوا إذا سرق الشريف تركوه، وإذا سرق الضعيف فيهم أقاموا عليه الحد، وأيم الله، لو أن فاطمة بنت محمدٍ سرقت لقطع محمدُ يدها".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6788) ومسلم في الحدود (8: 1688) كلاهما من طريق الليث، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.

ورواه ابن أبي حمزة وابن أخي الزهري، عن الزهري، عن القاسم، عن عائشة: أن تلك المرأة المقطوعة تابت، فكانت تأتيني فأرفع حاجتها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قال الدارقطني في"العلل" (14/ 118):"وذلك صحيح عن الزهري، عن القاسم، عن عائشة".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাখযূম গোত্রের এক মহিলা চুরি করায় কুরাইশদের খুবই চিন্তিত করে তুলল। তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কে কথা বলবে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রিয়পাত্র উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছাড়া আর কার সাহস আছে? অতঃপর উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি আল্লাহর নির্ধারিত দণ্ডবিধির (হুদুদ) ব্যাপারে সুপারিশ করছ?" এরপর তিনি খুতবা দিলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! তোমাদের পূর্বের জাতিসমূহ কেবল এ কারণেই পথভ্রষ্ট হয়েছিল যে, যখন তাদের মধ্যে কোনো সম্ভ্রান্ত লোক চুরি করত, তখন তারা তাকে ছেড়ে দিত। আর যখন কোনো দুর্বল লোক চুরি করত, তখন তারা তার উপর শাস্তি প্রয়োগ করত। আল্লাহর কসম! যদি মুহাম্মাদের কন্যা ফাতিমাও চুরি করত, তবে মুহাম্মাদ তার হাত কেটে দিতেন।" সেই হাত কাটা মহিলাটি তওবা করেছিল এবং সে আমার (আয়েশা রাঃ-এর) কাছে আসত। আমি তার প্রয়োজন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তুলে ধরতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (6822)


6822 - عن عائشة قالت: كانت امرأة مخزومية تستعير المتاع وتجحده، فأمر النبي صلى الله عليه وسلم أن تُقطع يدها.

فأتى أهلها أسامة بن زيد فكلموه. فكلم رسول الله صلى الله عليه وسلم فيها، ثم ذكر نحو حديث الليث ويونس.

صحيح: رواه مسلم في الحدود (10: 1688) من طريق عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة قالت: فذكرته. هكذا جاء في رواية معمر أنها تستعير وتجحد.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মাখযুম গোত্রের একজন মহিলা জিনিসপত্র ধার নিত এবং পরে তা অস্বীকার করত (ফিরিয়ে দিত না)। তখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার হাত কাটার নির্দেশ দিলেন। এরপর তার পরিবারের লোকজন উসামা ইবনু যায়িদের কাছে এসে কথা বলল। অতঃপর তিনি (উসামা) তাদের পক্ষ থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6823)


6823 - عن ابن عمر قال: كانت مخزومية تستعير المتاع، وتجحده، فأمر النبي صلى الله عليه وسلم بقطع يدها.

صحيح: رواه أبو داود (4395) والنسائي (4887) وأحمد (6383) كلهم من طريق عبد الرزاق وهو في المصنف (10/ 202) قال: حدثنا معمر، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله:"نستعير المتاع وتجحدها بيان لحال المرأة بأنها كانت تستعير المتاع، ثم تجحد لا أن
القطع وقع من أجل الجحد، بل الصحيح إن القطع وقع من أجل السرقة كما في الأحاديث السابقة، ولذا ذهب عامة أهل العلم أن المستعير إذا جحد العارية لم يُقطع، لأن الله سبحانه وتعالى إنما أوجب القطع على السارق، وهذا خائن ليس بسارق.

وذكر الزيلعي في نصب الراية (3/ 365 - 366).

"وذكر بعض أهل العلم أن معمر بن راشد تفرد بذكر العارية في هذا الحديث من بين سائر الرواة، والليث راوي السرقة تابعه عليها جماعة منهم: يونس بن يزيد، وأيوب بن موسى، وسفيان بن عيينة وغيرهم. فرووه عن الزهري كرواية الليث. وذكر أن بعضهم وافق معمرًا في رواية العارية، لكن لا يقاوم من ذكر السرقة. فظهر أن ذكر العارية، إنما كان تعريفا لها بخاص صفتها، إذ كانت كثيرة الاستعارة حتى عرفت بذلك، كما عرفت بأنها مخزومية، واستمر بها على هذا الصنيع حتى سرقت. فأمر النبي صلى الله عليه وسلم بقطعها".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন মাখযূমী গোত্রের নারী আসবাবপত্র ধার নিত এবং পরে তা অস্বীকার করত। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার হাত কেটে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6824)


6824 - عن جابر، أن امرأة من بني مخزوم سرقتْ، فأُتي بها النبي صلى الله عليه وسلم فعادتْ بأم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"والله لو كانت فاطمة لقطعتُ يدها" فقطعت.

صحيح: رواه مسلم في الحدود (1689) عن سلمة بن شيب، حدثنا الحسن بن أعين، حدّثنا معقل، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনু মাখযূম গোত্রের এক মহিলা চুরি করেছিল। তখন তাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আনা হলো। সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাধ্যমে সুপারিশ চাইল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহর কসম, যদি ফাতিমাও হতো, তবে আমি তার হাত কেটে দিতাম।" অতঃপর তার হাত কাটা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (6825)


6825 - عن محمد بن طلحة بن رُكانة، عن أمه عائشة بنت مسعود بن الأسود، عن أبيها قال: لما سرقت المرأة تلك القطيفة من بيت رسول الله صلى الله عليه وسلم أعظمنا ذلك. وكانت امرأة من قريش. فجئنا إلى النبي صلى الله عليه وسلم نُكلمه. وقُلنا: نحن نفديها بأربعين أوقية. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تطهّر خير لها" فلما سمعنا لين قول رسول الله صلى الله عليه وسلم أتينا أسامة فقلنا: كلّم رسول الله صلى الله عليه وسلم فلما رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم ذلك قام خطيبًا فقال:"ما إكثارهم عليّ في حد من حدود الله عز وجل وقع على أمةٍ من إماء الله! والذي نفسي بيده لو كانت فاطمة ابنة رسول الله نزلت بالذي نزلت به لقطع محمد يدها".

حسن: رواه ابن ماجه (2548) والحاكم (4/ 379 - 380) ومن طريقه البيهقي (8/ 281) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، عن محمد بن طلحة بن شداد بن ركانة بإسناده مثله.

قال محمد بن إسحاق: فحدثني عبد الله بن أبي بكر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك كان يرحمها ويصلها. وهو معطوف على الإسناد السابق.

قال الحاكم: صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السياقة".

وإسناده حسن من أجل تصريح محمد بن إسحاق، وحسن إسناده أيضا الحافظ ابن حجر في"الفتح" (12/ 89).
وفي الباب ما رُوي عن عبد الله بن عمرو أن امرأة سرقت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم. فجاء بها الذين سرقتْهم. فقالوا: يا رسول الله! إن هذه المرأة سرقتا قال قومها: فنحن نفْديها. يعني أهلها - فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: اقطعوا يدها، فقالوا: نحن نفديها بخمس مائة دينار. قال:"اقطعوا يدها" قال: فقطعت يدها اليمنى. فقالت المرأة: هل من توبة يا رسول الله؟ قال:"نعم، أنت اليوم من خطيئتك كيوم ولدتك أمك، فأنزل الله عز وجل في سورة المائدة: {فَمَنْ تَابَ مِنْ بَعْدِ ظُلْمِهِ وَأَصْلَحَ} [المائدة: 39].

رواه أحمد (1657) عن حسن، حدثنا ابن لهيعة، حدثني حُيّي بن عبد الله، عن أبي عبد الرحمن الحُبْلي، حدثه عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وابن لهيعة، فيه كلام معروف، وشيخه حيي بن عبد الله المعافري مختلف فكلم فيه أحمد والبخاري والنسائي، ومشّاه ابن معين وابن عدي وذكره ابن حبان في الثقات، فيحسن حديثه إذا لم يأت ما ينكر عليه.




মাসউদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন ঐ মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘর থেকে ঐ মখমলের চাদরটি চুরি করল, তখন তা আমাদের কাছে খুবই গুরুতর মনে হলো। সে ছিল কুরাইশ বংশের এক মহিলা। তখন আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁর সাথে কথা বললাম। আমরা বললাম: আমরা চল্লিশ উকিয়ার বিনিময়ে তাকে মুক্ত করব। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "পবিত্র হয়ে যাওয়া তার জন্য উত্তম।"

যখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথার কোমলতা শুনলাম, তখন আমরা উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলাম এবং বললাম: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলুন।

যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিষয়টি দেখতে পেলেন, তিনি দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "আল্লাহ তাআলার নির্ধারিত একটি শাস্তির ব্যাপারে আল্লাহর দাসীদের মধ্য থেকে একজনের উপর তা কার্যকর হওয়ার কারণে তারা আমার উপর এত বেশি চাপ সৃষ্টি করছে কেন? যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! যদি মুহাম্মাদের কন্যা ফাতিমাও এমন কোনো কাজ করত, যা সে করেছে, তাহলে মুহাম্মাদ অবশ্যই তার হাত কেটে দিত।"









আল-জামি` আল-কামিল (6826)


6826 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لعن الله السارق يسرق البيضةَ فتقطع يده، ويسرقُ الحبلَ فتقطعُ يده".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6783) ومسلم في الحدود (1687) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.

وزاد البخاري: قال الأعمش: كانوا يرون أنه بيض الحديد، والحبل كانوا يرون أنه منهما ما يساوي دراهم.

وقول الأعمش:"بيض الحديد" يعني التي تجعل في الرأس في الحرب.

والحديث منهم من حمله على ظاهره، ومنهم من تأوّله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: আল্লাহ্‌ ঐ চোরকে অভিসম্পাত করেছেন, যে ডিম চুরি করে আর তার হাত কাটা যায়; আর যে দড়ি চুরি করে আর তার হাত কাটা যায়।

এটা মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটা আল-হুদুদ (৬৭৮৩) এবং ইমাম মুসলিম আল-হুদুদ (১৬৮৭)-এ বর্ণনা করেছেন। উভয়ই আ'মাশ, আবূ সালিহ, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।

ইমাম বুখারী অতিরিক্ত বলেছেন: আ'মাশ বলেছেন, তাঁরা মনে করতেন যে 'ডিম' অর্থ হলো লোহার ডিম [অর্থাৎ লৌহবর্ম/শিরস্ত্রাণ]। আর দড়ি সম্পর্কে তাঁরা মনে করতেন যে এর মূল্য যেন কয়েক দিরহামের সমান হয়। আ'মাশের বক্তব্য 'লোহার ডিম' মানে হলো যা যুদ্ধের সময় মাথায় পরা হয়।

এই হাদীসকে কিছু সংখ্যক আলেম বাহ্যিক অর্থে গ্রহণ করেছেন, আবার কিছু সংখ্যক আলেম এর ব্যাখ্যা করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (6827)


6827 - عن عائشة قالت: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"تُقطع اليد في رُبع دينار فصاعدًا".

وفي لفظ:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقطع السارق في ربع دينار فصاعدًا.

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6789) ومسلم في الحدود (1684) كلاهما من طريق الزهري، عن عمرة، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاري، واللفظ الثاني لمسلم.

والرواية الأخرى لمسلم أيضًا من طريق ابن شهاب، عن عروة وعمرة، عن عائشة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال فذكره.

ورواه مالك في الحدود (23) عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاري) عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: فما طال علي وما نسبت، القطع في رُبُع دينارٍ فصاعدًا".
هذا الموقوف لا يُعل المرفوع، بل يؤيده فإنها كانت تحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وتفتي به.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এক-চতুর্থাংশ দিনার বা তার চেয়ে বেশি (মূল্যের চুরির) জন্য হাত কাটা হবে।”

অন্য এক বর্ণনায় আছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক-চতুর্থাংশ দিনার বা তার চেয়ে বেশি (মূল্যের চুরির) জন্য চোরের হাত কাটতেন।