আল-জামি` আল-কামিল
6821 - عن عائشة أن قريشا أهمتهم المرأة المخزومية التي سرقت، فقالوا: من يكلم رسول الله صلى الله عليه وسلم ومن يجترئ عليه إلا أسامة حبُّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكلم رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أتشفع في حد من حدود الله؟" ثم قال فخطب، قال:"يا أيها الناس، إنما ضل من قبلكم، أنهم كانوا إذا سرق الشريف تركوه، وإذا سرق الضعيف فيهم أقاموا عليه الحد، وأيم الله، لو أن فاطمة بنت محمدٍ سرقت لقطع محمدُ يدها".
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6788) ومسلم في الحدود (8: 1688) كلاهما من طريق الليث، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
ورواه ابن أبي حمزة وابن أخي الزهري، عن الزهري، عن القاسم، عن عائشة: أن تلك المرأة المقطوعة تابت، فكانت تأتيني فأرفع حاجتها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم.
قال الدارقطني في"العلل" (14/ 118):"وذلك صحيح عن الزهري، عن القاسم، عن عائشة".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাখযূম গোত্রের এক মহিলা চুরি করায় কুরাইশদের খুবই চিন্তিত করে তুলল। তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কে কথা বলবে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রিয়পাত্র উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছাড়া আর কার সাহস আছে? অতঃপর উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি আল্লাহর নির্ধারিত দণ্ডবিধির (হুদুদ) ব্যাপারে সুপারিশ করছ?" এরপর তিনি খুতবা দিলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! তোমাদের পূর্বের জাতিসমূহ কেবল এ কারণেই পথভ্রষ্ট হয়েছিল যে, যখন তাদের মধ্যে কোনো সম্ভ্রান্ত লোক চুরি করত, তখন তারা তাকে ছেড়ে দিত। আর যখন কোনো দুর্বল লোক চুরি করত, তখন তারা তার উপর শাস্তি প্রয়োগ করত। আল্লাহর কসম! যদি মুহাম্মাদের কন্যা ফাতিমাও চুরি করত, তবে মুহাম্মাদ তার হাত কেটে দিতেন।" সেই হাত কাটা মহিলাটি তওবা করেছিল এবং সে আমার (আয়েশা রাঃ-এর) কাছে আসত। আমি তার প্রয়োজন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তুলে ধরতাম।
6822 - عن عائشة قالت: كانت امرأة مخزومية تستعير المتاع وتجحده، فأمر النبي صلى الله عليه وسلم أن تُقطع يدها.
فأتى أهلها أسامة بن زيد فكلموه. فكلم رسول الله صلى الله عليه وسلم فيها، ثم ذكر نحو حديث الليث ويونس.
صحيح: رواه مسلم في الحدود (10: 1688) من طريق عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة قالت: فذكرته. هكذا جاء في رواية معمر أنها تستعير وتجحد.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মাখযুম গোত্রের একজন মহিলা জিনিসপত্র ধার নিত এবং পরে তা অস্বীকার করত (ফিরিয়ে দিত না)। তখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার হাত কাটার নির্দেশ দিলেন। এরপর তার পরিবারের লোকজন উসামা ইবনু যায়িদের কাছে এসে কথা বলল। অতঃপর তিনি (উসামা) তাদের পক্ষ থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন।
6823 - عن ابن عمر قال: كانت مخزومية تستعير المتاع، وتجحده، فأمر النبي صلى الله عليه وسلم بقطع يدها.
صحيح: رواه أبو داود (4395) والنسائي (4887) وأحمد (6383) كلهم من طريق عبد الرزاق وهو في المصنف (10/ 202) قال: حدثنا معمر، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. وإسناده صحيح.
وقوله:"نستعير المتاع وتجحدها بيان لحال المرأة بأنها كانت تستعير المتاع، ثم تجحد لا أن
القطع وقع من أجل الجحد، بل الصحيح إن القطع وقع من أجل السرقة كما في الأحاديث السابقة، ولذا ذهب عامة أهل العلم أن المستعير إذا جحد العارية لم يُقطع، لأن الله سبحانه وتعالى إنما أوجب القطع على السارق، وهذا خائن ليس بسارق.
وذكر الزيلعي في نصب الراية (3/ 365 - 366).
"وذكر بعض أهل العلم أن معمر بن راشد تفرد بذكر العارية في هذا الحديث من بين سائر الرواة، والليث راوي السرقة تابعه عليها جماعة منهم: يونس بن يزيد، وأيوب بن موسى، وسفيان بن عيينة وغيرهم. فرووه عن الزهري كرواية الليث. وذكر أن بعضهم وافق معمرًا في رواية العارية، لكن لا يقاوم من ذكر السرقة. فظهر أن ذكر العارية، إنما كان تعريفا لها بخاص صفتها، إذ كانت كثيرة الاستعارة حتى عرفت بذلك، كما عرفت بأنها مخزومية، واستمر بها على هذا الصنيع حتى سرقت. فأمر النبي صلى الله عليه وسلم بقطعها".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন মাখযূমী গোত্রের নারী আসবাবপত্র ধার নিত এবং পরে তা অস্বীকার করত। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার হাত কেটে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন।
6824 - عن جابر، أن امرأة من بني مخزوم سرقتْ، فأُتي بها النبي صلى الله عليه وسلم فعادتْ بأم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"والله لو كانت فاطمة لقطعتُ يدها" فقطعت.
صحيح: رواه مسلم في الحدود (1689) عن سلمة بن شيب، حدثنا الحسن بن أعين، حدّثنا معقل، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনু মাখযূম গোত্রের এক মহিলা চুরি করেছিল। তখন তাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আনা হলো। সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাধ্যমে সুপারিশ চাইল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহর কসম, যদি ফাতিমাও হতো, তবে আমি তার হাত কেটে দিতাম।" অতঃপর তার হাত কাটা হলো।
6825 - عن محمد بن طلحة بن رُكانة، عن أمه عائشة بنت مسعود بن الأسود، عن أبيها قال: لما سرقت المرأة تلك القطيفة من بيت رسول الله صلى الله عليه وسلم أعظمنا ذلك. وكانت امرأة من قريش. فجئنا إلى النبي صلى الله عليه وسلم نُكلمه. وقُلنا: نحن نفديها بأربعين أوقية. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تطهّر خير لها" فلما سمعنا لين قول رسول الله صلى الله عليه وسلم أتينا أسامة فقلنا: كلّم رسول الله صلى الله عليه وسلم فلما رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم ذلك قام خطيبًا فقال:"ما إكثارهم عليّ في حد من حدود الله عز وجل وقع على أمةٍ من إماء الله! والذي نفسي بيده لو كانت فاطمة ابنة رسول الله نزلت بالذي نزلت به لقطع محمد يدها".
حسن: رواه ابن ماجه (2548) والحاكم (4/ 379 - 380) ومن طريقه البيهقي (8/ 281) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، عن محمد بن طلحة بن شداد بن ركانة بإسناده مثله.
قال محمد بن إسحاق: فحدثني عبد الله بن أبي بكر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك كان يرحمها ويصلها. وهو معطوف على الإسناد السابق.
قال الحاكم: صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السياقة".
وإسناده حسن من أجل تصريح محمد بن إسحاق، وحسن إسناده أيضا الحافظ ابن حجر في"الفتح" (12/ 89).
وفي الباب ما رُوي عن عبد الله بن عمرو أن امرأة سرقت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم. فجاء بها الذين سرقتْهم. فقالوا: يا رسول الله! إن هذه المرأة سرقتا قال قومها: فنحن نفْديها. يعني أهلها - فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: اقطعوا يدها، فقالوا: نحن نفديها بخمس مائة دينار. قال:"اقطعوا يدها" قال: فقطعت يدها اليمنى. فقالت المرأة: هل من توبة يا رسول الله؟ قال:"نعم، أنت اليوم من خطيئتك كيوم ولدتك أمك، فأنزل الله عز وجل في سورة المائدة: {فَمَنْ تَابَ مِنْ بَعْدِ ظُلْمِهِ وَأَصْلَحَ} [المائدة: 39].
رواه أحمد (1657) عن حسن، حدثنا ابن لهيعة، حدثني حُيّي بن عبد الله، عن أبي عبد الرحمن الحُبْلي، حدثه عن عبد الله بن عمرو فذكره.
وابن لهيعة، فيه كلام معروف، وشيخه حيي بن عبد الله المعافري مختلف فكلم فيه أحمد والبخاري والنسائي، ومشّاه ابن معين وابن عدي وذكره ابن حبان في الثقات، فيحسن حديثه إذا لم يأت ما ينكر عليه.
মাসউদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন ঐ মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘর থেকে ঐ মখমলের চাদরটি চুরি করল, তখন তা আমাদের কাছে খুবই গুরুতর মনে হলো। সে ছিল কুরাইশ বংশের এক মহিলা। তখন আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁর সাথে কথা বললাম। আমরা বললাম: আমরা চল্লিশ উকিয়ার বিনিময়ে তাকে মুক্ত করব। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "পবিত্র হয়ে যাওয়া তার জন্য উত্তম।"
যখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথার কোমলতা শুনলাম, তখন আমরা উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলাম এবং বললাম: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বলুন।
যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিষয়টি দেখতে পেলেন, তিনি দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "আল্লাহ তাআলার নির্ধারিত একটি শাস্তির ব্যাপারে আল্লাহর দাসীদের মধ্য থেকে একজনের উপর তা কার্যকর হওয়ার কারণে তারা আমার উপর এত বেশি চাপ সৃষ্টি করছে কেন? যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! যদি মুহাম্মাদের কন্যা ফাতিমাও এমন কোনো কাজ করত, যা সে করেছে, তাহলে মুহাম্মাদ অবশ্যই তার হাত কেটে দিত।"
6826 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لعن الله السارق يسرق البيضةَ فتقطع يده، ويسرقُ الحبلَ فتقطعُ يده".
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6783) ومسلم في الحدود (1687) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
وزاد البخاري: قال الأعمش: كانوا يرون أنه بيض الحديد، والحبل كانوا يرون أنه منهما ما يساوي دراهم.
وقول الأعمش:"بيض الحديد" يعني التي تجعل في الرأس في الحرب.
والحديث منهم من حمله على ظاهره، ومنهم من تأوّله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: আল্লাহ্ ঐ চোরকে অভিসম্পাত করেছেন, যে ডিম চুরি করে আর তার হাত কাটা যায়; আর যে দড়ি চুরি করে আর তার হাত কাটা যায়।
এটা মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটা আল-হুদুদ (৬৭৮৩) এবং ইমাম মুসলিম আল-হুদুদ (১৬৮৭)-এ বর্ণনা করেছেন। উভয়ই আ'মাশ, আবূ সালিহ, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।
ইমাম বুখারী অতিরিক্ত বলেছেন: আ'মাশ বলেছেন, তাঁরা মনে করতেন যে 'ডিম' অর্থ হলো লোহার ডিম [অর্থাৎ লৌহবর্ম/শিরস্ত্রাণ]। আর দড়ি সম্পর্কে তাঁরা মনে করতেন যে এর মূল্য যেন কয়েক দিরহামের সমান হয়। আ'মাশের বক্তব্য 'লোহার ডিম' মানে হলো যা যুদ্ধের সময় মাথায় পরা হয়।
এই হাদীসকে কিছু সংখ্যক আলেম বাহ্যিক অর্থে গ্রহণ করেছেন, আবার কিছু সংখ্যক আলেম এর ব্যাখ্যা করেছেন।
6827 - عن عائشة قالت: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"تُقطع اليد في رُبع دينار فصاعدًا".
وفي لفظ:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقطع السارق في ربع دينار فصاعدًا.
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6789) ومسلم في الحدود (1684) كلاهما من طريق الزهري، عن عمرة، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاري، واللفظ الثاني لمسلم.
والرواية الأخرى لمسلم أيضًا من طريق ابن شهاب، عن عروة وعمرة، عن عائشة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال فذكره.
ورواه مالك في الحدود (23) عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاري) عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: فما طال علي وما نسبت، القطع في رُبُع دينارٍ فصاعدًا".
هذا الموقوف لا يُعل المرفوع، بل يؤيده فإنها كانت تحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وتفتي به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এক-চতুর্থাংশ দিনার বা তার চেয়ে বেশি (মূল্যের চুরির) জন্য হাত কাটা হবে।”
অন্য এক বর্ণনায় আছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক-চতুর্থাংশ দিনার বা তার চেয়ে বেশি (মূল্যের চুরির) জন্য চোরের হাত কাটতেন।
6828 - عن عائشة قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"اقطعوا في ربع دينار، ولا تقطعوا فيما هو أدنى من ذلك". وكان ربع الدينار يومئذ ثلاثة دراهم، والدينار اثني عشر درهمًا. قال: وكانت سرقته دون ربع الدينار، فلم أقطعه.
حسن: رواه الإمام أحمد (4515) عن هاشم قال: حدثنا محمد يعني ابن راشد، عن يحيى بن يحيى الغساني، قال: قدمت المدينة. فلقيت أبا بكر بن محمد بن عمرو بن حزم وهو عامل على المدينة، قال: أتيتُ بسارقٍ، فأرسلت إليّ خالتي عمرة بنت عبد الرحمن أن لا تعجل في أمر هذا الرجل حتى آتيك، فأُخبرك ما سمعت عن عائشة في أمر السارق قال: فأتي وأخبرتني أنها سمعت عائشة تقول فذكرت الحديث.
ورواه أيضا البيهقي (8/ 255) من وجه آخر عن محمد بن راشد نحوه.
وإسناده حسن. ومحمد بن راشد هو المكحولي الخزاعي الدمشقي مختلف فيه فوثقه أحمد وابن معين والنسائي، ولكن تكلم فيه غيرهم من ناحية حفظه.
وأما يحيى بن يحيى الغساني فهو أبو عثمان الشامي ثقة وثقه ابن معين ويقعوب بن سفيان. وقال ابن حبان:"كان من فقهاء أهل الشام".
وحديث أبي بكر بن محمد، عن عمرة، عن عائشة أخرجه أيضا مسلم (4: 1684) من وجه آخر عنه ولفظه:"لا تُقطع يد السارق إلا في ربع دينار فصاعدًا".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "তোমরা এক চতুর্থাংশ দিনার বা তার বেশি পরিমাণে (চুরির অপরাধে হাত) কর্তন করো, এবং এর চেয়ে কম পরিমাণে কর্তন করো না।" আর সেদিন এক চতুর্থাংশ দিনার ছিল তিন দিরহামের সমান, এবং (এক পূর্ণ) দিনার ছিল বারো দিরহাম। (রাবী) বলেন: তার চুরিকৃত বস্তুর মূল্য ছিল এক চতুর্থাংশ দিনারের কম, তাই আমি তার হাত কর্তন করিনি।
6829 - عن عائشة قالت: لم تُقطع يد سارق في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم في أقلّ من ثمن المجنّ، حجفةٍ أو تُرْسٍ، وكلاهما ذو ثمن.
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (1794)، ومسلم في الحدود (1685) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের যুগে ঢালের (মাজিন/Majjin) মূল্যের চেয়ে কম মূল্যের কোনো বস্তুর জন্য কোনো চোরের হাত কাটা হয়নি। (ঢাল বলতে) ছোট ঢাল (হাজফা) অথবা বড় ঢাল (তুর্স) বোঝানো হয়েছে; আর উভয়েরই নির্দিষ্ট মূল্য ছিল।
6830 - عن عبد الله بن عمر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قطع في مجنّ ثمنه ثلاثة دراهم.
متفق عليه: رواه مالك في الحدود (21) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره. ورواه البخاري في الحدود (6795) ومسلم في الحدود (6: 1686) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি ঢালের (চুরির অপরাধে হাত) কেটেছিলেন যার মূল্য ছিল তিন দিরহাম।
6831 - عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قطع يد رجل سرق تُرسًا من صُفّة النساء، ثمنه ثلاثة دراهم.
صحيح: رواه أحمد (6317) عن عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، أخبرني إسماعيل بن أمية، أن نافعا مولى عبد الله حدثه فذكره. ومن هذا الطريق رواه أبو داود (4386). ورواه النسائي (4909) من وجه آخر عن ابن جريج به مثله. وإسناده صحيح. والحديث في الصحيحين دون ذكر الصّفة.
وإلى هذا ذهب جمهور أهل العلم، وجعلوا الحد فيما يجب فيه القطع ثلاثة دراهم، أو ربع
دينار، أو قيمة ثلاثة دراهم من العروض والأثمان. إلا أن الشافعي جعل قيمة العروض ربع دينار.
وأما ما رواه النسائي (4906) عن عبد الحميد بن محمد قال: ثنا مخلد، قال: ثنا حنظلة، قال: سمعت نافعًا قال: سمعت عبد الله بن عمر يقول: قطع رسول الله صلى الله عليه وسلم في مجن قيمته خمسة دراهم كذا قال.
فقال النسائي بعد أن روي من وجه آخر عن ابن وهب: حدثنا حنظلة أن نافعًا حدثهم أن عبد الله بن عمر قال: قطع رسول الله صلى الله عليه وسلم في مجن ثمنه ثلاثة دراهم قال: هذا الصواب.
أي أن ذكر خمسة دراهم وهم من بعض الرواة، والصواب هو ثلاثة دراهم كما رواه مالك وغيره.
وقال أبو حنيفة وأصحابه أن قدر النصاب هو عشرة دراهم، أو دينار، أو قيمة أحدهما من العروض.
ورُوي عن أيمن بن أم أيمن، عن أمه أم أيمن قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُقطع يد السارق إلا في حجفة، وقوّمت يومئذ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم دينارًا، أو عشرة دراهم، إلا أنه مرسل.
ورواه النسائي (4948) والطحاوي في شرحه (2/ 93) كلاهما من حديث شريك، عن منصور، عن عطاء، عن أيمن بن أم أيمن فذكره.
قال البيهقي في المعرفة (12/ 389): قوله في هذا الإسناد:"عن أم أيمن خطأ، إنما قاله شريك بن عبد الله القاضي، وخلط في إسناده، وشريك ممن لا يحتج به فيما يخالف فيه أهل الحفظ والثقة لما ظهر من سوء حفظه".
رواه الحاكم (4/ 379) من حديث سفيان، عن منصور، عن الحكم، عن مجاهد، عن أيمن قال: لم تقطع اليد على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم إلا بثمن المجن، وثمنه يومئذ دينار.
وقال: سمعت أبا العباس يقول: سمعت الربيع يقول: سمعت الشافعي يقول: أيمن هذا هو ابن امرأة كعب، وليس بابن أم أيمن، ولم يدرك النبي صلى الله عليه وسلم. ووافقه الحاكم على ذلك.
وقال ابن أبي حاتم في"المراسيل" (42): أخبرني عبد الله بن أحمد بن حنبل، فيما كتب إلي قال: وجدت في كتاب أبي بخط يده قال: حدثني محمد بن إدريس الشافعي رحمه الله قال: قال لي محمد بن الحسن: فقد روى شريك حديثا عن أيمن بن أم أيمن: أخي أسامة بن زيد لأمه. قلت:"لا علم لك بأصحابنا، أيمن أخو أسامة بن زيد قتل مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين قبل أن يولد مجاهد، ولم يبق بعد النبي صلى الله عليه وسلم، فيحدث به".
قال ابن أبي حاتم:"سألت أبي عن حديث رواه الحسن بن صالح، عن منصور، عن الحكم، عن عطاء ومجاهد، عن أيمن - وكان فقيهًا قال: يقطع السارق في ثمن المجن، وكان ثمن المجن على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم دينارًا. قال أبي: هو مرسل، وأرى أنه والد عبد الواحد بن أيمن، وليست اله صحبة". انتهى.
وكذا ذكره ابن حبان والدارقطني وغيرهم بأنه تابعي، لا صحة له.
وأما أيمن عن ابن أم أيمن فهو صحابي كما ذكر البغوي وأبو نعيم وابن منده وابن قانع وغيرهم، واستشهد مع النبي صلى الله عليه وسلم يوم حنين.
والحاصل فيه كما قال الزيلعي في نصب الراية (3/ 358):"الحديث معلول، فإن كان أيمن صحابيًّا فعطاء ومجاهد ثم يدركاه، فهو منقطع، وإن كان تابعيًا فالحديث مرسل".
ثم قال: ولكنه يتقوى بغيره من الأحاديث المرفوعة والموقوفة ثم ذكر هذه الأحاديث. منها: ما روي عن ابن عباس قال: قطع رسول الله صلى الله عليه وسلم يد رجل في مجن قيمته دينار، أو عشرة دراهم.
رواه أبو داود (4387) والنسائي (4951) كلاهما من حديث محمد بن إسحاق، عن أيوب بن موسى، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
ورواه النسائي من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، عن أيوب بن موسى، عن عطاء مرسلًا.
ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، كما أنه اضطرب فيه فمرة رواه موصولا، وأخرى مرسلًا.
وثالثة رواه عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: كان ثمن المجن على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم عشرة دراهم.
رواه النسائي (4956) عن خلاد بن أسلم، عن عبد الله بن إدريس، عن محمد بن إسحاق، عن عمرو بن شعيب بإسناده.
وكذلك رواه أيضا ابن أبي شيبة في مصنفه (28688) عن عبد الأعلى وعبد الرحيم بن سليمان، عن محمد بن إسحاق بإسناده إلا أنه لم يذكر فيه"عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم".
وأما ما نقله الزيلعي في نصب الراية (3/ 359) من طريق ابن أبي شيبة وفيه: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: لا تقطع يد السارق في دون ثمن المجن" فهو سبق النظر، فإن هذا المتن الحديث عبد الله بن عباس السابق. ولكن رواه ابن أبي شيبة (28672) عن عبد الرحيم بن سليمان، عن محمد بن إسحاق، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"القطع في ثمن المجن".
ورواه الإمام أحمد (6900) عن نصر بن باب، عن الحجاج بن أرطاة، عن عمرو بن شعيب به مرفوعا:"لا قطع فيما دون عشرة دراهم".
ونصر بن باب قال البخاري:"يرمونه بالكذب، وقال النسائي:"متروك" والحجاج بن أرطاة مدلس، ولم يسمع هذا الحديث من عمرو.
هذه الأحاديث فيها ضعف وشذوذ واضطراب تخالف الأحاديث الصحيحة التي ذكرت في أول الباب بأن ثمن المجن في عهد النبي صلى الله عليه وسلم كان ثلاثة دراهم.
وأما كونه قطع يد رجل في مجن قيمته دينار، أو عشرة دراهم، فعلى تقدير صحته فليس فيه موضع التحديد، وإنما فيه ذكر حكم التنفيذ، لأنه إذا كان السارق يقطع في ربع دينار فكونه يقطع
في دينار أولى كما قال أنس: قطع أبو بكر في مجن قيمته خمسة دراهم. أخرجه النسائي (4913) وروي مرفوعا. والصواب أنه موقوف. وقد اتفق ابن عمر وعائشة على أن ثمن المجن في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاثة دراهم، وهي تساوي ربع دينار، لأن الصرف في عهد النبي صلى الله عليه وسلم كان اثنا عشر درهما بدينار. وخالفهما في ذلك ابن عباس فيرى ثمن المجن عشرة دراهم، وكذلك عبد الله بن عمرو بن العاص.
قال الشافعي:"المجان قديمًا وحديثًا سلع يكون ثمنه عشرة ومائة ودرهمين، فإذا قطع رسول الله صلى الله عليه وسلم في ربع دينار، قطع في أكثر منه". انظر: البيهقي (8/ 259).
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন এক ব্যক্তির হাত কেটেছিলেন যে মহিলাদের আঙ্গিনা থেকে একটি ঢাল চুরি করেছিল, যার মূল্য ছিল তিন দিরহাম।
সহীহ: এটি ইমাম আহমাদ (৬৩১৭) বর্ণনা করেছেন আবদুর রাযযাক থেকে, তিনি বলেন, আমাদেরকে ইবন জুরাইজ সংবাদ দিয়েছেন, তিনি বলেন, আমাকে ইসমাঈল ইবন উমাইয়্যা সংবাদ দিয়েছেন, যে নাফি‘ মাওলা আব্দুল্লাহ তাঁর কাছে বর্ণনা করেছেন, এবং তিনি তা উল্লেখ করেছেন। এই সূত্রেই আবূ দাঊদও (৪৩৮৬) এটি বর্ণনা করেছেন। আর নাসাঈ (৪৯০৯) অন্য সূত্রে ইবন জুরাইজ থেকে একই রকম বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ। আর সহীহাইন গ্রন্থে ‘মহিলাদের আঙ্গিনা’র উল্লেখ ব্যতিরেকেই হাদীসটি রয়েছে।
অধিকাংশ আলিম এরই অনুসারী, এবং তারা হাত কাটার বিধান প্রযোজ্য হওয়ার ক্ষেত্রে ন্যূনতম পরিমাণকে তিন দিরহাম, অথবা এক-চতুর্থাংশ দীনার, অথবা তিন দিরহাম মূল্যের অন্য কোনো সম্পদ ও মুদ্রার সমমূল্য নির্ধারণ করেছেন। তবে ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) সম্পদের মূল্য এক-চতুর্থাংশ দীনার নির্ধারণ করেছেন।
আর নাসাঈ (৪৯০৬) আব্দুল হামীদ ইবন মুহাম্মাদ থেকে যা বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদের নিকট মুখাল্লাদ বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হানযালা বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি নাফি‘কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবন উমরকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন ঢালের কারণে হাত কেটেছিলেন, যার মূল্য ছিল পাঁচ দিরহাম। তিনি (আব্দুল হামীদ) এভাবেই বলেছেন।
নাসাঈ অন্য এক সূত্র থেকে ইবন ওয়াহব থেকে বর্ণনা করার পর বলেন: আমাদের নিকট হানযালা বর্ণনা করেছেন যে, নাফি‘ তাঁদের কাছে বর্ণনা করেছেন, আব্দুল্লাহ ইবন উমর বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন ঢালের কারণে হাত কেটেছিলেন, যার মূল্য ছিল তিন দিরহাম। তিনি (নাসাঈ) বলেন: এটাই সঠিক।
অর্থাৎ, পাঁচ দিরহামের উল্লেখ কোনো কোনো রাবীর ভুল, এবং সহীহ হলো তিন দিরহাম, যেমনটি মালিক এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন।
আর আবূ হানীফা এবং তাঁর সঙ্গীরা বলেছেন যে, নিসাব (ন্যূনতম পরিমাণ) হলো দশ দিরহাম, অথবা এক দীনার, কিংবা সম্পদসমূহের মধ্যে এর কোনো একটার সমমূল্য।
আইমান ইবন উম্মু আইমান থেকে তাঁর মা উম্মু আইমানের সূত্রে বর্ণিত: তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “চোরের হাত কাটা যাবে না, তবে শুধু ঢাল চুরি করলে (কাটা যাবে), আর সে সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এর মূল্য নির্ধারণ করা হয়েছিল এক দীনার, অথবা দশ দিরহাম।” তবে এটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ)।
নাসাঈ (৪৯৪৮) এবং তাহাবী তাঁর ব্যাখ্যায় (২/৯৩) উভয়ই শারীক থেকে, তিনি মানসূর থেকে, তিনি আতা থেকে, তিনি আইমান ইবন উম্মু আইমান থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।
আল-বায়হাকী ‘আল-মা'রিফাহ’ (১২/৩৮৯) গ্রন্থে বলেন: এই সনদে তাঁর উক্তি: “উম্মু আইমান থেকে” ভুল। এটি মূলত শারীক ইবন আব্দুল্লাহ আল-কাদী বলেছেন, আর তিনি এর সনদে সংমিশ্রণ ঘটিয়েছেন। আর শারীক এমন ব্যক্তি, যিনি তাঁর দুর্বল স্মৃতিশক্তির কারণে আহলুল হিফয (স্মৃতিশক্তিসম্পন্ন রাবী) ও সিকাহদের (বিশ্বাসযোগ্য রাবী) বিরোধিতা করলে তার দ্বারা প্রমাণ গ্রহণ করা যায় না।
হাকিম (৪/৩৭৯) সুফিয়ান থেকে, তিনি মানসূর থেকে, তিনি হাকাম থেকে, তিনি মুজাহিদ থেকে, তিনি আইমান থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ঢালের মূল্যের কমে হাত কাটা হয়নি, আর সে সময় তার মূল্য ছিল এক দীনার।
আর তিনি (হাকিম) বলেন: আমি আবুল আব্বাসকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন: আমি রাবী'কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন: আমি শাফিঈকে বলতে শুনেছি: এই আইমান হলেন কা'ব-এর স্ত্রীর পুত্র, তিনি উম্মু আইমানের পুত্র নন, এবং তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পাননি। হাকিমও এতে তাঁর সাথে একমত পোষণ করেন।
ইবন আবী হাতেম ‘আল-মারাসীল’ (৪২) গ্রন্থে বলেন: আব্দুল্লাহ ইবন আহমাদ ইবন হাম্বল আমাকে যা লিখে পাঠিয়েছেন, তাতে তিনি বলেন: আমি আমার পিতার কিতাবে তাঁর নিজ হাতে লেখা পেয়েছি, তিনি বলেন: মুহাম্মাদ ইবন ইদরীস আশ-শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) আমার কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: মুহাম্মাদ ইবনুল হাসান আমাকে বললেন: শারীক, আইমান ইবন উম্মু আইমান থেকে একটি হাদীস বর্ণনা করেছেন, যিনি উসামা ইবন যায়িদের বৈমাত্রেয় ভাই। আমি (শাফিঈ) বললাম: ‘আমাদের সাথীদের সম্পর্কে তোমার জ্ঞান নেই। উসামা ইবন যায়িদের ভাই আইমান হনাইনের যুদ্ধের দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে শহীদ হন, মুজাহিদ জন্মগ্রহণের পূর্বেই। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে জীবিত ছিলেন না যে, তিনি হাদীস বর্ণনা করবেন।’
ইবন আবী হাতেম বলেন: আমি আমার পিতাকে এমন হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম যা আল-হাসান ইবন সালিহ, মানসূর থেকে, তিনি হাকাম থেকে, তিনি আতা এবং মুজাহিদ থেকে, তিনি আইমান থেকে বর্ণনা করেছেন—আর তিনি ছিলেন একজন ফকীহ—তিনি বলেন: চোরের হাত কাটা হবে ঢালের মূল্যের জন্য, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ঢালের মূল্য ছিল এক দীনার। আমার পিতা বলেন: এটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন), এবং আমার ধারণা, তিনি আব্দুল ওয়াহিদ ইবন আইমানের পিতা, এবং তাঁর সহবত (সাহাবিয়াত) নেই।
এভাবেই ইবন হিব্বান, দারাকুতনী এবং অন্যান্যরা তাঁকে (আইমানকে) একজন তাবেঈ হিসেবে উল্লেখ করেছেন, তাঁর সাহাবিয়াতের কোনো সত্যতা নেই।
তবে আইমান ইবন উম্মু আইমান একজন সাহাবী, যেমনটি বাগাভী, আবূ নুআইম, ইবন মান্দাহ, ইবন কানি’ এবং অন্যান্যরা উল্লেখ করেছেন। আর তিনি হুনাইনের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে শহীদ হন।
এর সারসংক্ষেপ হলো, যেমনটি যাইলাঈ ‘নসবুর রায়াহ’ (৩/৩৫৮) গ্রন্থে বলেছেন: ‘হাদীসটি ত্রুটিপূর্ণ (মা'লুল)। যদি আইমান সাহাবী হন, তবে আতা ও মুজাহিদ তাঁকে পাননি, সুতরাং এটি মুনকাতি' (বিচ্ছিন্ন)। আর যদি তিনি তাবেঈ হন, তবে হাদীসটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন)।’
এরপর তিনি বলেন: ‘কিন্তু এটি অন্যান্য মারফূ' (নবী পর্যন্ত উত্তোলিত) ও মাউকূফ (সাহাবী পর্যন্ত থামানো) হাদীস দ্বারা শক্তি অর্জন করে।’ এরপর তিনি সেই হাদীসগুলো উল্লেখ করেন। সেগুলোর মধ্যে রয়েছে: ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন এক ব্যক্তির হাত কেটেছিলেন একটি ঢালের জন্য, যার মূল্য ছিল এক দীনার বা দশ দিরহাম।
আবূ দাঊদ (৪৩৮৭) এবং নাসাঈ (৪৯৫১) উভয়ই মুহাম্মাদ ইবন ইসহাক থেকে, তিনি আইয়ূব ইবন মূসা থেকে, তিনি আতা থেকে, তিনি ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তা বর্ণনা করেছেন।
নাসাঈ মুহাম্মাদ ইবন ইসহাক থেকে, তিনি আইয়ূব ইবন মূসা থেকে, তিনি আতা থেকে, মুরসাল হিসেবেও বর্ণনা করেছেন।
আর মুহাম্মাদ ইবন ইসহাক একজন মুদাল্লিস (যারা শায়খের নাম গোপন করেন) এবং তিনি ‘আনআনা’ (শব্দ ব্যবহার) করেছেন। তিনি এতেও অস্থিরতা দেখিয়েছেন, একবার এটিকে মাওসূল (সংযুক্ত) হিসেবে, এবং আরেকবার মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
এবং তৃতীয়বার তিনি এটিকে ‘আমর ইবন শুআইব থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ঢালের মূল্য ছিল দশ দিরহাম।
নাসাঈ (৪৯৫৬) খাল্লাদ ইবন আসলাম থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবন ইদরীস থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবন ইসহাক থেকে, তিনি ‘আমর ইবন শুআইবের সনদে বর্ণনা করেছেন।
অনুরূপভাবে ইবন আবী শাইবাও তাঁর মুসান্নাফে (২৮৬৮৮) আব্দুল আ‘লা এবং আব্দুল রহীম ইবন সুলাইমান থেকে, তাঁরা মুহাম্মাদ ইবন ইসহাক থেকে তাঁর সনদে বর্ণনা করেছেন, তবে এতে ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে’ কথাটি উল্লেখ নেই।
যাইলাঈ ‘নসবুর রায়াহ’ (৩/৩৫৯) গ্রন্থে ইবন আবী শাইবার সূত্রে যা নকল করেছেন, এবং যাতে আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘ঢালের মূল্যের কম কিছুর জন্য চোরের হাত কাটা যাবে না’—এটা দৃষ্টির ত্রুটি। কেননা এই মতনটি পূর্বোক্ত আব্দুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের। কিন্তু ইবন আবী শাইবা (২৮৬৭২) আব্দুল রহীম ইবন সুলাইমান থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবন ইসহাক থেকে, তিনি ‘আমর ইবন শুআইব থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ‘হাত কাটা হবে ঢালের মূল্যের জন্য।’
ইমাম আহমাদ (৬৯০০) নসর ইবন বাব থেকে, তিনি হাজ্জাজ ইবন আরতা’আহ থেকে, তিনি ‘আমর ইবন শুআইব থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন: ‘দশ দিরহামের কম কোনো কিছুর জন্য হাত কাটা যাবে না।’
নসর ইবন বাব সম্পর্কে ইমাম বুখারী বলেন: ‘লোকেরা তাঁকে মিথ্যাবাদী বলে অভিযুক্ত করে।’ আর নাসাঈ বলেন: ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)। আর হাজ্জাজ ইবন আরতা’আহ একজন মুদাল্লিস, এবং তিনি এই হাদীসটি ‘আমর থেকে শোনেননি।
এই হাদীসগুলোতে দুর্বলতা, শাযূয (ব্যতিক্রম) এবং ইযতিরাব (অস্থিরতা) রয়েছে, যা এই অধ্যায়ের শুরুতে উল্লিখিত সহীহ হাদীসগুলোর বিপরীত, যেখানে বলা হয়েছে যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ঢালের মূল্য ছিল তিন দিরহাম।
আর তিনি (নবী) যে এক ব্যক্তির হাত কেটেছিলেন ঢালের জন্য যার মূল্য ছিল এক দীনার বা দশ দিরহাম, তা যদি সহীহও ধরে নেওয়া হয়, তবে তাতে নিসাব নির্ধারণের কোনো স্থান নেই। বরং তাতে শুধু শাস্তির কার্যকরের উল্লেখ রয়েছে। কারণ, যদি চোরের হাত এক-চতুর্থাংশ দীনারে কাটা হয়, তখন এক দীনারে কাটা তো আরও উত্তম, যেমনটি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এমন এক ঢালের জন্য হাত কেটেছিলেন যার মূল্য ছিল পাঁচ দিরহাম। এটি নাসাঈ (৪৯১৩) বর্ণনা করেছেন। আর এটি মারফূ' হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে। তবে সহীহ হলো এটি মাউকূফ।
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একমত পোষণ করেছেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ঢালের মূল্য ছিল তিন দিরহাম, যা এক-চতুর্থাংশ দীনারের সমতুল্য। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে বিনিময়ের হার ছিল এক দীনারে বারো দিরহাম।
আর ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের বিরোধিতা করেছেন। তিনি ঢালের মূল্য দশ দিরহাম মনে করেন। অনুরূপভাবে আব্দুল্লাহ ইবন ‘আমর ইবনুল ‘আসও।
ইমাম শাফিঈ বলেন: ‘আদিকাল থেকে আধুনিক যুগ পর্যন্ত ঢাল এমন পণ্য, যার মূল্য দশ, একশ এবং দুই দিরহামও হয়ে থাকে। সুতরাং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন এক-চতুর্থাংশ দীনারের জন্য হাত কেটেছেন, তখন তিনি এর চেয়ে বেশি মূল্যের জন্যও কাটবেন।’ দেখুন: বায়হাকী (৮/২৫৯)।
6832 - عن رافع بن خديج، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا قطع في ثمر، ولا كثَرٍ".
صحيح: رواه الترمذي (1449) والنسائي (4967) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث عن يحيى بن سعيد الأنصاري، عن محمد بن يحيى بن حبّان، عن عمه واسع بن حبان، عن رافع بن خديج فذكره. قال النسائي: والكثير الجمّار.
وإسناده صحيح، ولكن اختلف على يحيى بن سعيد، فرواه عنه الليث بن سعد هكذا، وتابعه سفيان الثوري، ومن طريقه رواه النسائي (4966) وابن ماجه (2593) وابن الجارود (826) وصحّحه ابن حبان (4496) والبيهقي (8/ 263) كلهم عنه عن يحيى بن سعيد بإسناده موصولا.
وكذلك رواه سفيان بن عينة. ومن طريقه رواه الحميدي في مسنده (1/ 199) وقال الحميدي: فقيل لسفيان: ليس يقول أحد في هذا الحديث عن عمه، فقال: هكذا حفظي، قال الحميدي: فقال لي أبو زيد المدائني: حماد بن دليل أثبت عنيه. فإن شعبة كذا حدثنا عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن عمه.
هذا الكلام ذكر ابن عبد البر في"التمهيد" (23/ 305) ولم أجده في النسخة المطبوعة للحميدي ثم ساق ابن عبد البر الروايات المذكورة.
وخالفهم مالك في الحدود (35) فرواه عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبّان، أن عبدًا سرق وديا من حائط رجل، فغرسه في حائط سيده. فخرج صاحب الودي يلتمس وديّه فوجده. فاستعدى على العبد مروان بن الحكم. فسجن مروانُ العبدَ.
وأراد قطع يده. فانطلق سيد العبد إلى رافع بن خديج، فسأله عن ذلك. فأخبره أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم بقول:"لا قطع في تمر ولا كثر" والكثر الجمّار. فقال الرجل: إن مروان بن الحكم أخذ غلامًا لي وهو يريد قطعه، وأنا أحب أن تمشي معي إليه فتخبر بالذي سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم. فمشى مع رافع بن خديج إلى مروان بن الحكم. فقال: أخذت غلامًا لهذا؟ فقال: نعم. فقال: فما أنت صانع به، قال: أردت قطع يده، فقال له رافع: سمعت رسول الله
- صلى الله عليه وسلم يقول صلى الله عليه وسلم:"لا قطع في ثمر ولا كثر" فأمر مروان بالعبد فأرسل.
ومن طريقه رواه أبو داود (4388) وقال: الكثر: الجمار، ورواه من وجه آخر عن حماد، حدثنا يحيى، عن محمد بن يحيى بن حبّان بهذا الحديث قال: فجلده مروان جلدات، وخلّى سبيله. ورواه أيضا الإمام أحمد (15804) عن يزيد بن هارون، عن يحيى، عن محمد بن يحيى، عن رافع بن خديج فذكره. وهي كلها منقطعة.
وإلى هذا يشير الترمذي بعد أن رواه من طريق الليث كما سبق:"هكذا روى بعضهم عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبّان، عن عمه واسع بن حبّان، عن رافع بن خديج، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو رواية الليث بن سعد.
وروى مالك بن أنس وغير واحد هذا الحديث عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حبّان، عن رافع بن خديج، عن النبي صلى الله عليه وسلم ولم يذكروا فيه عن واسع بن حبّان".
وهو كما قال، فقد رواه جمعٌ من الرواة عن يحيى بن سعيد الأنصاري موصولًا، منهم من ذكرتهم، كما رواه جمع من الرواة عنه ولم يذكروا بين محمد بن يحيى بن حبّان وبين رافع بن خديج"واسع بن حبّان" وساق بعض هذه الأسانيد النسائي في سننه، والحكم لمن زاد.
وذهب أبو حنيفة رحمه الله تعالى إلى ظاهر هذا الحديث فلم يوجب القطع في سرقة شيء من الفواكه الرطبة. سواء كانت محرزة أو غير محرزة، وقاس عليه اللحوم والألبان والأشربة والجبون.
وقال الشافعي كما ذكره البيهقي (8/ 263): وبهذا نقول في تمر معلق، لأنه غير محرز، ولا جمار لأنه غير محرز، وهو يشبه حديث عمرو بن شعيب". وهو الآتي.
وقوله:"كثر": بفتحتين - الجُمار - وهو قلب النخل وشحمها.
وله شاهد ضعيف وهو ما رواه ابن ماجه (2594) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا سعد بن سعيد المقبري، عن أخيه، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا قطع في ثمر ولا كثَر".
وسعد بن سعيد بن أبي سعيد المقبري قال فيه ابن عدي:"رواياته عن أخيه، عن أبيه، عن أبي هريرة عامتها لا يتابعه أحد عليها". الكامل (3/ 119)، وأما أخوه فهو عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد المقبري أشد ضعفًا منه وفي"التقريب": متروك.
রাফে' ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কাঁচা ফল (খেজুর) এবং কাসার (খেজুর গাছের শাঁস) চুরির কারণে হাত কাটার বিধান নেই।"
6833 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه سئل عن الثمر المعلق فقال:"من أصاب بفيه من ذي حاجة غير متخذ خُبنة فلا شيء عليه، ومن خرج بشيء منه، فعليه غرامة مثليه والعقوية، ومن سرق منه شيئًا بعد أن يؤويه الجرين فبلغ ثمن المجن فعليه القطع".
وذكر في ضالة الإبل والغنم كما ذكره غيره.
قال: وسئل عن اللقطة فقال:"ما كان منها في طريق الميناء، أو القرية الجامعة فعرّفها سنة، فإن جاء طالبها فادفعها إليه، وإن لم يأت فهي لك. وما كان في الخراب يعني ففيها وفي الركاز الخمس".
حسن: رواه أبو داود (1710) والترمذي (1288) والنسائي (8958) وابن ماجه (2596) كلهم عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث، عن ابن عجلان، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكر الحديث. إلا ابن ماجه فرواه من وجه آخر عن الوليد بن كثير، عن عمرو بن شعيب. واللفظ لأبي داود، وعند الآخرين مختصرًا.
ورواه الحاكم (4/ 381) من وجه آخر عن عمرو بن شعيب بإسناده نحوه وقال: هذه سنة تفرد بها عمرو بن شعيب بن محمد، عن أبيه، عن جده عبد الله بن عمرو بن العاص. إذا كان الراوي عن عمرو بن شعيب ثقة فهو كأيوب عن نافع، عن ابن عمر. انتهى.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
ورواه الإمام أحمد (6683) بكماله من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. ومحمد بن إسحاق مدلس وعنعن إلا أنه توبع.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে গাছের ঝুলে থাকা ফল সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো। তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি অভাবী হওয়া সত্ত্বেও পকেট ভরার (সংগ্রহ করার) উদ্দেশ্য ব্যতীত শুধু মুখ দিয়ে খায়, তার কোনো শাস্তি নেই। আর যে ব্যক্তি তা থেকে কোনো কিছু বাইরে নিয়ে আসে, তার উপর দ্বিগুণ জরিমানা ও শাস্তি আরোপিত হবে। আর যে ব্যক্তি শস্য রাখার স্থানে (খামারে) তা রাখার পর তা থেকে ঢালের মূল্যের সমপরিমাণ কিছু চুরি করে, তবে তার হাত কর্তন করা হবে।" তিনি উট ও ছাগলের হারানো বস্তু সম্পর্কে উল্লেখ করলেন, যেমনটি অন্যরা উল্লেখ করেছে। তিনি বললেন: আর তাঁকে হারানো বস্তু সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো। তিনি বললেন: "যে বস্তু বন্দরগামী পথে বা জনবহুল গ্রামে পাওয়া যায়, তা তুমি এক বছর পর্যন্ত ঘোষণা করতে থাকো। এরপর যদি তার দাবিদার আসে, তবে তাকে তা ফিরিয়ে দাও। আর যদি না আসে, তবে তা তোমার। আর যা ধ্বংসাবশেষে (খরাব) পাওয়া যায়—অর্থাৎ, তাতে এবং রিকাজে (ধন-ভাণ্ডারে) এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রযোজ্য হবে।"
6834 - عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليس على خائن، ولا منتهب، ولا مختلس قطع".
صحيح: رواه أبو داود (4391، 4392، 4393) والترمذي (1448) وابن ماجه (2591) والنسائي (4973) وصحّحه ابن حبان (4451) والبيهقي (8/ 289) كلهم من طرق ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره. واللفظ للترمذي، ومنهم من فرق متن الحديث.
قال الترمذي:"حسن صحيح" ولكن نازعه أهل العلم في صحة هذا الحديث.
فقال عبد الرحمن بن أبي حاتم: سألت أبي وأبا زرعة عن حديث رواه ابن جريج، عن أبي الزبير .. فقالا: لم يسمع ابن جريج هذا الحديث من أبي الزبير، يقال: إنه سمعه من ياسين، أنا حدثت به ابن جريج، عن أبي الزبير. فقلت لهما: ما حال ياسين؟ فقالا: ليس بقوي". انتهى.
وقال أبو داود بعد أن فرق متنه في حديثين:"وهذان الحديثان لم يسمعهما ابن جريج، من أبي الزبير، وبلغني عن أحمد بن حنبل أنه قال: إنما سمعهما ابن جريج من ياسين الزيات، قال أبو داود: وقد رواهما المغيرة بن مسلم، عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم. انتهى.
وفيه رد على إعلال الحديث بابن جريج لمتابعة المغيرة لابن جريج.
وحديث المغيرة بن مسلم، عن أبي الزبير رواه النسائي (4975) إلا أنه قال في"الكبرى" (4/ 348):"والمغيرة بن مسلم ليس بالقوي في أبي الزبير، وعنده غير حديث منكر".
وقال أيضا:"روى هذا الحديث عن ابن جريج: عيسى بن يونس، والفضل بن موسى، وابن وهب، ومحمد بن ربيعة، ومخلد بن يزيد، وسلمة بن سعيد بصري ثقة، - قال ابن أبي صفوان:
وكان خير أهل زمانه - فلم يقل أحد منهم فيه: حدثني أبو الزبير، ولا أحبه سمعه من أبي الزبير. هكذا قال رحمه الله تعالى.
وقد رواه هو في"السنن الكبرى" فقال: أخبرنا محمد بن حاتم، قال: أنا سويد، قال: أنا عبد الله، عن ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير، عن جابر فذكر الحديث. ولكنه قال أيضا:"ما حمل شيئا، ابن جريج لم يسمعه من أبي الزبير عندنا".
ورواه عبد الرزاق (18844) عن ابن جريج قال: قال لي أبو الزبير: قال جابر بن عبد الله فذكر الحديث. وفيه تصريح من ابن جريج بالسماع من أبي الزبير.
وأما حديث ياسين بن الزيات فرواه عبد الرزاق، عنه، أنه سمع أبا الزبير، يحدث عن جابر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث. وفيه تصريح من أبي الزبير أنه سمع من جابر بن عبد الله، ورواه الدارمي (2356) عن أبي عاصم، عن ابن جريج، قال: أنبأنا أبو الزبير، قال جابر: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
ورواية أبي عاصم عن ابن جريج لم يقف عليها النسائي وفيها التصريح من ابن جريج في سماع هذا الحديث من أبي الزبير.
وخلاصة القول أنه حديث صحيح، صحّحه ابن حبان، وسكت عنه عبد الحق في أحكامه، وابن القطان بعده فهو صحيح عندهما كما قال الزيلعي (3/ 314) وقال: وتصحيح الترمذي له يدل على أنه تحقق إيصاله. ثم ذكر له شاهدين من حديث عبد الرحمن بن عوف، ومن حديث أنس الآتيان.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে গোপনে বিশ্বাসঘাতকতা করে চুরি করে, যে প্রকাশ্যে লুটপাট করে, এবং যে দ্রুত ছিনতাই করে, তাদের কারো উপর হাত কাটার শাস্তি কার্যকর হবে না।"
6835 - عن عبد الرحمن بن عوف قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ليس على المختلس قطع".
صحيح: رواه ابن ماجه (2592) عن محمد بن يحيى، قال: حدثنا محمد بن عاصم بن جعفر المصري، قال: حدثنا المفضّل بن فضالة، عن يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، عن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
وإسناده صحيح. وصحّحه أيضا الحافظ ابن حجر في"التلخيص".
আব্দুর রহমান ইবন আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ছিনতাইকারীর উপর হাত কাটার শাস্তি নেই।"
6836 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليس على منتهب، ولا مختلس، ولا خائن قطعه.
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط (مجمع البحرين 2466) حدثنا أحمد بن القاسم بن المساور، ثنا أبو معمر إسماعيل بن إبراهيم، قال: أملى عليّ عبد الله بن وهب من حفظه، عن يونس، عن الزهري، عن أنس بن مالك فذكره.
قال الطبراني: لم يرو عن الزهري إلا يونس، ولا عنه إلا ابن وهب، تفرد به أبو معمر. انتهى.
قلت: رجاله ثقات، ولا تضر تفرد بعضهم عن بعض.
وكذا قال الحافظ في الدراية (681) رجاله ثقات.
والخلسة - ما يؤخذ سلبًا ومكابرة.
والخائن: هو من يأخذ المال بالغش والخيانة، ويظهر النصح للمالك.
يقول الخطابي:"أجمع عامة أهل العلم على أن المختلس، والخائن لا يقطعان، وذلك أن الله سبحانه وتعالى إنما أوجب القطع على السارق".
وكذلك ادعى ابن عبد البر إجماع أهل العلم على أن الخلسة لا قطع فيها إلا إياس بن معاوية.
انظر: الاستذكار (24/ 236).
قلت: داود الظاهري، وأحمد في رواية أوجبا القطع في الخلسة، والخيانة، لأن فيهما الاستعلاء على مال الغير بغير الحق، فالقضية تعود إلى حكم الحاكم.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "লুণ্ঠনকারী, ছিনতাইকারী এবং খেয়ানতকারীর হাত কাটার শাস্তি নেই।"
6837 - عن صفوان بن أمية بن خلف أنه قيل له: هلك من لم يهاجر. قال: فقلت: لا أصل إلى أهلي حتى آتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فركبت راحلتي، فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقلت: يا رسول الله، زعموا أنه هلك من لم يهاجر؟ قال:"كلا أبا وهب، فارجع إلى أباطح مكة" قال: فبينما أنا راقد إذ جاء السارق، فأخذ ثوبي من تحت رأسي، فأدركته. فأتيت به النبي صلى الله عليه وسلم. فقلت: إن هذا سرق ثوبي. فأمر به صلى الله عليه وسلم أن يقطع. قال: قلت: يا رسول الله! ليس هذا أردت. هو عليه صدقة. قال: فهلا قبل أن تأتيني به؟".
صحيح: رواه مالك في الحدود (31) وأحمد (15303) واللفظ له، وأبو داود (4394) والنسائي (4881) وابن ماجه (2595) والحاكم (4/ 380) والبيهقي (8/ 265) كلهم من طرق عن صفوان بن أمية. ومنهم من رواه مرسلًا، ومنهم من رواه موصولا، والحديث صحيح، وصحّحه الحاكم.
قال الخطابي:"واحتج من رأى أن المتاع المسروق لا قطع فيه إذا ملكهـ السارق قبل أن يرفع إلى الإمام بقوله:"فهلّا كان هذا قبل أن تأتيني به" قالوا:"فقد دل هذا على أنه لو وهبه منه، أو أبرأه من ذلك قبل أن يرفعه إلى الإمام سقط عنه القطع".
وأما ما روي عن ابن عباس أن صفوان بن أمية أتى النبي صلى الله عليه وسلم برجل قد سرق حلة له، فقال: با رسول الله هبه لي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فهلا قبل أن تأتينا بها"فهو ضعيف.
رواه الدارقطني (3/ 204 - 206) والحاكم (4/ 380) كلاهما من حديث أبي عاصم الضحاك بن مخلد الشيباني، ثنا زكريا بن إسحاق، عن عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس فذكره.
وخالفه سفيان بن عيينة فرواه عن عمرو بن دينار عن طاوس، ولم يذكر ابن عباس. رواه البيهقي (8/ 265) من طريق الشافعي، عن سفيان وقال: ذكر ابن عباس فيه ليس بصحيح".
قلت: وهو كما قال، فإن سفيان بن عيينة أثبت في عمرو بن دينار.
وله طرق أخرى عند النسائي وغيره وهو أضعف من هذا.
সাফওয়ান ইবনু উমাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাকে বলা হয়েছিল যে, যে ব্যক্তি হিজরত (দেশত্যাগ) করেনি সে ধ্বংস হয়ে গেছে। তিনি বললেন: আমি (মনে মনে) বললাম, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে না যাওয়া পর্যন্ত আমার পরিবারের কাছে যাব না। অতঃপর আমি আমার সওয়ারীর পিঠে আরোহণ করে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলাম। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারা ধারণা করে যে, যে হিজরত করেনি সে ধ্বংস হয়ে গেছে। তিনি বললেন: "কখনোই না, হে আবূ ওয়াহব! বরং তুমি মক্কার প্রশস্ত উপত্যকাগুলোতে ফিরে যাও।" তিনি (সাফওয়ান) বললেন: আমি যখন ঘুমিয়ে ছিলাম, তখন একজন চোর এসে আমার মাথার নিচ থেকে আমার কাপড়টি নিয়ে গেল। আমি তাকে ধরে ফেললাম এবং তাকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। আমি বললাম: এ লোকটি আমার কাপড় চুরি করেছে। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার হাত কাটার নির্দেশ দিলেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি এটা চাইনি। তার জন্য (আমার চুরিকৃত বস্তুটি) সদকা করে দিলাম (ক্ষমা করে দিলাম)। তিনি বললেন: "তুমি তাকে আমার কাছে আনার আগেই কেন (এই সদকা) করলে না?"
6838 - عن ابن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من حالت شفاعته دون حد من حدود الله عز وجل فقد ضاد الله أمره".
صحيح: رواه أبو داود (3597) وأحمد (5385) وصحّحه الحاكم (2/ 27) والبيهقي (6/ 82) كلهم من حديث زهير بن معاوية، حدثنا عمارة بن غزية، عن يحيى بن راشد، قال: خرجنا حُجاجًا عشرة من أهل الشام، حتى أتينا مكة، فذكر الحديث. قال: فأتيناه، فخرج إلينا - يعني ابن عمر فذكر الحديث في سياق أطول منه. وإسناده صحيح.
وهذا بعد أن بلغ ذلك الإمام، فأما قبل بلوغ الإمام فإن الشفاعة فيها مستحبة حفظا للستر عليه.
قال أحمد: يُشفع في الحد ما لم يبلغ السلطان.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তির সুপারিশ আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা কর্তৃক নির্ধারিত কোনো হদ (দণ্ডবিধি) কার্যকর করার পথে বাধা সৃষ্টি করে, সে আল্লাহর নির্দেশের বিরোধিতা করল।”
6839 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: تعافوا الحدود فيما بينكم فما بلغني من حد فقد وجب".
حسن: رواه أبو داود (4376) ومن طريقه البيهقي (8/ 331) والنسائي (4886) وصحّحه الحاكم (4/ 383) كلهم من حديث ابن وهب، سمعت ابن جريج، يحدث عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث. وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد". وهذا الحديث مما سمعه ابن جريج من عمرو بن شعيب.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা নিজেদের মধ্যে হুদূদের (আল্লাহ কর্তৃক নির্ধারিত দণ্ডবিধির) বিষয়গুলো উপেক্ষা করো (বা আপোসে মিটিয়ে নাও)। কারণ, যখনই আমার কাছে কোনো হদ (শাস্তির অভিযোগ) পৌঁছে যায়, তা কার্যকর করা আবশ্যক হয়ে যায়।"
6840 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أقيلوا ذوي الهيئات عثراتهم إلا الحدود".
حسن: رواه أبو داود (4375) وأحمد (25474) والنسائي في الكبرى (7297) والبيهقي (8/ 334) كلهم من حديث عبد الملك بن زيد بن سعيد بن زيد بن عمرو بن نُفيل، عن محمد بن أبي بكر بن حزم، عن أبيه، عن عمرة، عن عائشة فذكرته. إلا أن أبا داود لم يذكر فيه"عن أبيه" والثقات الذين رووه عن عبد الملك ذكروا فيه"عن أبيه".
وإسناده حسن من أجل عبد الملك بن زيد فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وليس في حديثه ما ينكر عليه، وصحّحه أيضا ابن حبّان (94) وإنه لم يذكر فيه"عن أبيه" وفي إسناده بعض الضعفاء.
وفي معناه رُوي عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أقيلوا ذوي الهيئات زلاتهم".
رواه الطبراني في الأوسط (7558) عن محمد بن عاصم، قال: حدثنا عبد الله بن محمد بن يزيد الحنفي، قال: حدثنا أبي قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن عاصم، عن زر، عن ابن مسعود فذكره.
ورواه الخطيب في تاريخه (10/ 85) من طريق الدارقطني وغيره عن محمد بن مخلد، حدثنا عبد الله بن محمد بن يزيد الحنفي بإسناده.
قال الدارقطني:"هذا حديث غريب من حديث عاصم، عن زر، عن عبد الله، تفرد به الحنفي، عن أبيه، عن أبي بكر بن عياش عنه. ولم نكتبه إلا عن ابن مخلد.
وقال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن عاصم إلا أبو بكر بن عياش، تفرد به عبد الله بن يزيد بن محمد. ولا يروى عن ابن مسعود إلا بهذا الإسناد".
قلت: لا يضر تفرد عبد الله بن يزيد، وهو عبد الله بن محمد بن يزيد الحنفي ترجمه الخطيب في تاريخه (10/ 85) وقال: كان ثقة، مات سنة 275 هـ، وإنما البلاء من أبيه محمد بن يزيد بن محمد بن كثير العجلي الرفاعي ثم الكوفي أبو هشام فإنه ضعيف باتفاق أهل العلم. قال البخاري:"رأيتهم مجمعين على ضعفه". وفي معناه أحاديث أخرى لا تصح.
وأما معنى الحديث فقال الشافعي:"سمعت من أهل العلم من يعرف هذا الحديث ويقول: يتجافى للرجل ذي الهيئة عن عثرته ما لم يكن حدًّا".
وقال أيضا:"وذووا الهيئات الذين يُقالون عثراتهم هم الذين ليسوا يعرفون بالشر، فيزل أحدهم بالزلة".
وقال الماوردي في عثراتهم وجهان: أحدهما الصغائر، والثاني: أول المعصية زل فيها مطيع. ذكر ذلك كله الحافظ في"التلخيص" (4/ 80).
وقال البغوي في شرحه (10/ 330): وفيه دليل على جواز ترك التعزير، وأنه غير واجب، ولو كان واجبا كالحد، لاستوي فيه ذو الهيئة وغيره".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ভদ্র ও মর্যাদাবান ব্যক্তিদের স্খলন বা ভুলত্রুটি ক্ষমা করে দাও, তবে হুদূদ (শরীয়ত নির্ধারিত শাস্তি) ব্যতীত।"