আল-জামি` আল-কামিল
6841 - عن عائشة، أن النبي صلى الله عليه وسلم قطع يد امرأة، قالت عائشة: وكانت تأتي بعد ذلك فأرفع حاجتها إلى النبي صلى الله عليه وسلم فتابت وحسنت توبتها.
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6800) ومسلم في الحدود (9: 1688) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، أخبرني عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاري، وذكره مسلم في الحديث الطويل في شأن المرأة التي أهمت قريشًا، وهي المخزومية كما في بعض الروايات.
وترجم له البخاري بقوله"باب توبة السارق" وأورد فيه هذا الحديث وحديثًا آخر ثم قال:"إذا تاب السارق بعد ما قطع يده قُبلت شهادته، وكلّ محدود كذلك إذا تاب قُبلت شهادته".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক মহিলার হাত কেটেছিলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপরেও সে আসত এবং আমি তার প্রয়োজন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পেশ করতাম। অতঃপর সে তওবা করে এবং তার তওবা উত্তম হয়েছিল।
6842 - عن جنادة بن أبي أمية، قال: كنا مع بسر بن أبي أرطاة في البحر، فأتي بسارق يقال له مِصْدر، قد سرق بُختيّة. فقال: قد سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تُقطع
الأيدي في السفر" ولولا ذلك لقطعته.
صحيح: رواه أبو داود (4408) والنسائي (4979) والبيهقي (9/ 104) كلهم من حديث حيوة بن شريح، عن عياش بن عباس القِتْباني، عن شِيَيْم بن بَيْتان ويزيد بن صُبح الأصبحي، عن جنادة بن أبي أمية فذكره.
والمراد بالسفر هنا هو الغزو كما جاء في الروايات عند الترمذي (1450) وأحمد (17626) معجم ابن قانع (1/ 84) كلهم من حديث عبد الله بن لهيعة، حدثنا عباس بن عباس بإسناده عن جنادة بن أبي أمية أنه قال على المنبر برودس حين جلد الرجلين اللذين سرقا غنائم الناس. فقال: إنه لم يمنعني من قطعهما إلا أن بسر بن أرطاة وجد رجلا سرق في الغزو يقال له: مصدر. فجلده، ولم يقطع يده وقال: نهانا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن القطع في الغزو. واللفظ لأحمد ولفظ الترمذي مختصر. وقال: هذا حديث غريب. وقد رواه غير ابن لهيعة بهذا الإسناد نحو هذا. ويقال: بسر ابن أبي أرطاة أيضا".
وقال:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم منهم الأوزاعي، لا يرون أن يقام الحد في الغزو بحضرة العدو مخافة أن يلحق من يُقام عليه الحد بالعدو، فإذا خرج الإمام من أرض الحرب. ورجع إلى دار الإسلام أقام الحد على من أصابه. كذلك قال الأوزاعي". انتهى.
قلت: لعل الترمذي لم يحكم على الحديث بالصحة أو الحسن من أجل الاختلاف في صحبة بسر بن أبي أرطاة. فقد نقل ابن سعد عن الواقدي أنه قال: ولد قبل وفاة النبي صلى الله عليه وسلم بسنتين، وقبض النبي صلى الله عليه وسلم وهو صغير. وأنكر أن يكون روي عن النبي صلى الله عليه وسلم رواية أو سماعا. كذا في تهذيب الكمال.
وقال يحيى بن معين:"أهل المدينة ينكرون أن يكون سمع بسر بن أبي أرطاة من النبي، وأهل الشام يروون عنه، عن النبي صلى الله عليه وسلم".
ولكن ذهب جمهور أهل العلم منهم: البخاري، والبغوي، وابن قانع، وابن حبّان، وابن منده، وغيرهم إلى إثبات الصحبة له. قال ابن حجر في التقريب:"من صغار الصحابة". وبهذا صح إسناد هذا الحديث.
وقوله:"بُخْتِيّة" الأنثى من الجمال البخت.
وأهل العلم مختلفون في إقامة الحد في دار الحرب. فمضى قول الأوزاعي أنه لا يقام في دار الحرب للعلة التي ذكرها وأيضا أمير الجيش ليس له صلاحية في إقامة الحدود التي فيها الإتلاف، فإن هذا راجع إلى الحاكم. وأكثر الفقهاء لا يفرقون بين أرض الحرب وغيرها ويرون إقامة الحد على من ارتكبها، كما يرون وجوب الفرائض والعبادات عليهم في دار الإسلام ودار الحرب سواء.
فقُطعت رجله، ثم سرق على عهد أبي بكر حتى قُطعت قوائمه كلها، ثم سرق أيضا في الخامسة. فقال أبو بكر: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أعلم بهذا حين قال: اقتلوه، ثم دفعه إلى فتية من قريش ليقتلوه منهم: عبد الله بن الزبير، وكان يحب الإمارة. فقال: أمّروني عليكم فأمّروه عليهم فكان إذا ضرب ضربوه حتى قتلوه.
رواه النسائي (4977) والحاكم (4/ 382) كلاهما من حديث حماد بن سلمة، ثنا يوسف بن أسعد، عن الحارث بن حاطب فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد". وتعقبه الذهبي فقال:"بل منكر".
قلت: ظاهر إسناده سلامة، ولكن معناه فيه نكارة.
وفي الباب ما روي أيضا عن جابر بن عبد الله قال: جيء بسارق إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"اقتلوها قالوا: يا رسول الله، إنما سرق. فقال:"قطعوه" قال: فقطع، ثم جيء به الثانية، فقال:"اقتلوه" فقالوا: يا رسول الله، إنما سرق. فقال:"قطعوه" قال: فقطع. ثم جيء به الثالثة، فقال:"اقتلوه" فقالوا: يا رسول الله، إنما سرق. فقال:"اقطعوه" ثم جيء به الرابعة، فقال:"اقتلوه" فقالوا: يا رسول الله، إنما سرق، قال:"قطعوه" فأتي به الخامسة فقال:"اقتلوه" قال جابر: فانطلقنا به فقتلناه، ثم اجتررناه فألقيناه في بئر، ورمينا عليه الحجارة.
رواه أبو داود (4410) ومن طريقه البيهقي (8/ 272) والنسائي (4978) كلاهما عن محمد بن عبد الله بن عبيد بن عقيل قال: حدثنا جدي قال: حدثنا مصعب بن ثابت، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث منكر، ومصعب بن ثابت ليس بالقوي في الحديث"، وكذلك قال النسائي في الكبرى (7471) وقال أيضا:"وهذا الحديث ليس بصحيح، ولا أعلم في هذا الباب حديثا صحيحا عن النبي صلى الله عليه وسلم".
وكذلك قال أيضا ابن عبد البر في الاستذكار: بأن حديث القتل منكر، لا أصل له، وقد ثبت عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يحل دم امرئ مسلم إلا بإحدى ثلاث … الحديث. ولم يذكر فيها: السارق.
قلت: مصعب بن ثابت بن عبد الله بن الزبير بن العوام الأسدي ضعيف باتفاق أهل العلم. وتابعه هشام بن عروة، عن محمد بن المنكدر رواه الدارقطني (3/ 181) ولكن في طريقه إليه محمد بن يزيد بن سنان ضعيف. ضعفه النسائي والدارقطني وغيرهما.
قال الخطابي رحمه الله تعالى بعد أن ذكر حديث القتل في الخامسة:"ولا أعلم أحدًا من الفقهاء يبيح دم السارق، وإن تكررت منه السرقة مرة بعد أخرى إلا أنه قد يخرج على مذاهب بعض الفقهاء أن يباح دمه وهو أن يكون هذا من المفسدين في الأرض في أن للإمام أن يجتهد في تعزير المفسدين ويبلغ به ما رأى من العقوبة، وإن زاد على مقدار الحد، وجاوزه، وإن رأى القتل قتل
ويعزى هذا الرأي إلى مالك بن أنس وهذا الحديث إن كان له أصل فهو يؤيد هذا الرأي". معالم السنن (3/ 313 - 314).
وأما من يسرق مرارًا فلا خلاف بين أهل العلم أن السارق إذا سرق أول مرة تقطع يده اليمنى، ثم إذا سرق ثانيا تقطع رجله اليسرى، واختلفوا فيما سرق ثالثا بعد قطع يده ورجله، فذهب أكثر العلماء إلى أنه تقطع يده اليسرى، ثم إذا سرق تقطع رجله اليمنى، ثم إذا سرق يعزر ويحبس. وإليه ذهب مالك والشافعي وإسحاق وأحمد في رواية، وهو مروي عن أبي بكر الصديق رضي الله عنه.
وذهب قوم إلى أنه إذا سرق بعد ما قطعت إحدي يديه، وإحدى رجليه لم يقطع، وحب. وإليه ذهب أحمد وأبو حنيفة والأوزاعي وهو مروي عن علي رضي الله عنه. المنة الكبرى (7/ 303).
জুনাদা ইবনে আবী উমাইয়া থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা বুসর ইবনে আবী আরতাতের সাথে সমুদ্রে (জিহাদে/সফরে) ছিলাম। তখন তাঁর কাছে মিসদার নামক এক চোরকে আনা হলো, যে একটি বুখতিয়্যা (এক প্রকার উট) চুরি করেছিল। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "সফরের সময় হাত কাটা হবে না।" যদি এমনটি না হতো, তবে আমি অবশ্যই তার হাত কেটে দিতাম।
এরপর (ঐ চোরের) তার পা কাটা হলো। এরপর সে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে চুরি করল। এমনকি তার সমস্ত অঙ্গপ্রত্যঙ্গ কাটা হলো। এরপর সে পঞ্চমবারও চুরি করল। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন বলেছিলেন, "তোমরা তাকে হত্যা করো," তখন তিনি এ বিষয়ে অধিক অবগত ছিলেন। এরপর তিনি তাকে কুরাইশ গোত্রের কিছু যুবকের হাতে তুলে দিলেন, যারা তাকে হত্যা করবে। তাদের মধ্যে আব্দুল্লাহ ইবন যুবাইরও (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন, যিনি নেতৃত্ব পছন্দ করতেন। তিনি বললেন: তোমরা আমাকে তোমাদের নেতা বানাও। তখন তারা তাঁকে তাদের নেতা বানাল। ফলে তিনি যখন তাকে আঘাত করতেন, তখন তারাও তাকে আঘাত করত, এভাবে তারা তাকে হত্যা করল।
জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক চোরকে নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে আনা হলো। তিনি বললেন: "তাকে হত্যা করো।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সে তো কেবল চুরি করেছে। তখন তিনি বললেন: "তার হাত কেটে দাও।" বর্ণনাকারী বলেন: ফলে তার হাত কাটা হলো। এরপর তাকে দ্বিতীয়বার আনা হলো। তিনি বললেন: "তাকে হত্যা করো।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সে তো কেবল চুরি করেছে। তখন তিনি বললেন: "তার হাত কেটে দাও।" বর্ণনাকারী বলেন: ফলে তার হাত কাটা হলো। এরপর তাকে তৃতীয়বার আনা হলো। তিনি বললেন: "তাকে হত্যা করো।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সে তো কেবল চুরি করেছে। তিনি বললেন: "তার হাত কেটে দাও।" এরপর তাকে চতুর্থবার আনা হলো। তিনি বললেন: "তাকে হত্যা করো।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সে তো কেবল চুরি করেছে। তিনি বললেন: "তার হাত কেটে দাও।" এরপর তাকে পঞ্চমবার আনা হলো। তিনি বললেন: "তাকে হত্যা করো।" জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা তাকে নিয়ে গেলাম এবং তাকে হত্যা করলাম। এরপর আমরা তাকে টেনেহিঁচড়ে একটি কূপে ফেলে দিলাম এবং তার উপর পাথর নিক্ষেপ করলাম।
6843 - عن أبي ذر قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كيف أنت إذا أصاب الناس موت، يكون البيت فيه بالوصيف؟" يعني القبر. قلت: الله ورسوله أعلم، أو ما خار الله ورسوله. قال:"عليك بالصبر، أو قال:"تصبر".
صحيح: أخرجه أبو داود (4261، 4409) والحاكم (4/ 434) والبيهقي (8/ 191) كلهم من طريق حماد بن زيد، عن أبي عمران الجوني، عن المشعب بن طريف، عن عبد الله بن الصامت، عن أبي ذر فذكر الحديث مطولا. وسيأتي في كتاب الفتن.
قال أبو داود:"لم يذكر المشغب في هذا الحديث غير حماد بن زيد.
قلت: المشعّب بن طريف هذا"مقبول" عند الحافظ ابن حجر يعني عند المتابعة. ولم أجد له متابعا. ولكن رواه الثقات عن أبي عمران الجوني ولم يذكروا بين أبي عمران وبين عبد الله بن الصامت"المشعّب بن طريف".
ومن هؤلاء شعبة عند البيهقي، ومرحوم بن عبد العزيز العطار عند أحمد (21325) وابن حبّان (6685) ومعمر عند عبد الرزاق (20729) وحماد بن سلمة عند الحاكم كل هؤلاء وغيرهم عن أبي عمران الجوني، عن عبد الله بن الصامت عن أبي ذر فذكروه. وهؤلاء أولى من حماد بن زيد، وأكد البيهقي وغيره بأن حماد بن زيد وهم فيه فزاد بين أبي عمران وعبد الله بن الصامت"المشعّب ابن طريف".
وقول الحاكم: حماد بن زيد أثبت من حماد بن سلمة هذا إذا اختلفا، ولم يكن لأحدهما ما يرجح، أما إذا وجد من يرجح أحدهما الآخر فيقدم من معه المرجع كما هنا.
والبيت هنا: القبر. والوصيف: الخادم.
يريد أن الناس يُشغلون عن دفن موتاهم حتى لا يوجد فيهم من يحفر قبرا لميت، ويدفنه إلا أن يُعطي وصيفا، أو قيمته. قاله الخطابي. استدل أبو داود في سننه فقال:"باب قطع النباش".
ووجه استدلاله من الحديث أنه سمى القبر بيتًا.
والبيت حرز، والسارق من الحرز مقطوع إذا بلغت سرقته مبلغ ما تقطع فيه اليد. وبهذا قال جمهور أهل العلم منهم: مالك والشافعي وأحمد وإسحاق، وأبو يوسف صاحب أبي حنيفة.
وروي عن ابن الزبير أنه قطع نبّاشًا. قال البخاري في التاريخ الكبير (4/ 104): قال هشيم، ثنا سهيل قال: شهدت ابن الزبير قطع نباشا. ذكره البيهقي (8/ 270)، وقال عمر بن عبد العزيز: إن سارق الأموات يعاقب بما يعاقب به سارق الأحياء.
وخالفهم أبو حنيفة فقال: لا قطع فيه لشبهة في تسمية القبر بيتا. ولو سمي القبر بيتا فهذا البيت ليس بحرز؛ لأن الحرز ما يوضع فيه المتاع للحفظ، والكفن لا يوضع في القبر لذلك.
وفي مصنف ابن أبي شيبة (29205) عن عيسى بن يونس، عن معمر، عن الزهري، قال: أتي مروان بن الحكم بقوم يختفون القبور، يعني ينبشون، فضربهم ونفاهم، وأصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم متوافرون.
والاختفاء: نبش القبر واستخراج كفنه.
وفيه أيضا (29206) عن حفص، عن أشعث، عن الزهري، قال: أخذ نباش في زمان
معاوية، زمان كان مروان على المدينة، فسأل من كان بحضرته من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم بالمدينة والفقهاء. فلم يجدوا أحدا قطعه، قال: فأجمع رأيهم على أن يضربه، ويطاف به.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: “যখন মানুষ মৃত্যুতে আক্রান্ত হবে, তখন তোমার কী অবস্থা হবে? (এমন মৃত্যু) যাতে একটি কবরের মূল্য হবে একজন খাদেমের (মূল্যের) সমান?”
আমি বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন, অথবা (আমি বললাম:) আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল যা ভালো মনে করেন।
তিনি বললেন: “তোমাকে অবশ্যই ধৈর্য ধারণ করতে হবে,” অথবা তিনি বললেন: “তুমি ধৈর্য ধরবে।”
6844 - عن رُوي عن أبي أمية المخزومي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أتي بلص فاعترف اعترافا، ولم يوجد معه المتاع. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما إخالك سرقت؟" قال: بلى، ثم قال:"ما إخالك سرقت" قال: بلى. فأمر فقطع. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"قل: أستغفر الله وأتوب إليه" قال: أستغفر الله وأتوب إليه، قال:"اللَّهم تب عليه" مرتين.
رواه أبو داود (4380) والنسائي (4881) وابن ماجه (2597) وأحمد (22508) والبيهقي (8/ 276) كلهم من حديث إسحاق بن أبي طلحة قال: سمعت أبا المنذر مولى أبي ذر، يذكر أن أبا أمية حدثه فذكر الحديث.
وأبو المنذر مجهول. لم يرو عنه غير إسحاق بن أبي طلحة، ولم يوثقه أحد.
تنبيه: لم أتنبه إلى جهالة هذا الراوي في"المنة الكبرى" (7/ 312) فقلت: صحيح. والصواب أنه ضعيف.
وأما تلقين السارق عن رجوعه من اعترافه فأحبه جماعة من أهل العلم من الصحابة والتابعين والأئمة المجتهدين لما فيه درء الحدود. والنبي صلى الله عليه وسلم كان يحب درء الحدود بالشبهات.
وقد أتي عمر بن الخطاب برجل فسأله أسرفت؟ قل: لا. قال: فقال: لا، فتركه ولم يقطعه. ورُوي مثل هذا عن عدد من الصحابة.
يعقوب بن إبراهيم عنه بذكر أبي هريرة. وأرسله عنه علي بن المديني. ذكره البيهقي.
والصواب أنه مرسل، وإن كان ذهب بعض أهل العلم إلى تصحيح الموصول لما فيه من زيادة علم، انظر"التلخيص" (4/ 16).
وإن ابن الزبير أتي بسارق فقطعه، فقال له أبان بن عثمان: احسمه. فقال: إنك به رحيم. قال: لا، ولكنه من السنة. رواه ابن أبي شيبة (29197) عن وكيع، عن سفيان، عن عمرو بن أبي سفيان أن ابن الزبير أتي بسارق فذكره.
وكذلك كان علي بن أبي طالب إذا قطع اللصوص يحسم ويحبسهم ويداويهم. رواه أيضا ابن أبي شيبة (29
আবূ উমাইয়্যাহ আল-মাখযূমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একজন চোরকে আনা হলো। সে স্বীকারোক্তি দিল, যদিও তার সাথে চুরি করা মালপত্র পাওয়া যায়নি। তখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার মনে হয় না তুমি চুরি করেছ?" সে বলল: "হ্যাঁ (আমি করেছি)।" অতঃপর তিনি পুনরায় বললেন: "আমার মনে হয় না তুমি চুরি করেছ?" সে বলল: "হ্যাঁ (আমি করেছি)।" এরপর তিনি (হাত) কাটার নির্দেশ দিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি বলো: 'আস্তাগফিরুল্লাহা ওয়া আতূবু ইলাইহি' (আমি আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাইছি এবং তাঁর দিকে তাওবা করছি)।" সে বলল: "আস্তাগফিরুল্লাহা ওয়া আতূবু ইলাইহি।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'বার বললেন: "হে আল্লাহ! তুমি তার তাওবা কবুল করে নাও।"
6845 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا سرق العبد فبيعوه ولو بنش".
حسن: رواه أبو داود (4412) والنسائي (4980) وابن ماجه (2589) والبخاري في الأدب المفرد (165) كلهم من حديث أبي عوانة، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
قال النسائي:"عمر بن أبي سلمة ليس بالقوي في الحديث".
قلت: ولكن قال البخاري:"صدوق" وقال أبو حاتم:"هو عندي صالح صدوق في الأصل"، وقال أحمد:"هو صالح ثقة إن شاء الله" وذكره البرقي في باب من احتمل حديثه من المعروفين قال: وأكثر أهل العلم بالحديث يثبتونه، وقال الدوري:"سألت ابن معين عن حديث من حديثه فقال: صحيح، وسألته عن آخر فاستحسنه" وقال ابن عدي:"حسن الحديث لا بأس به" فمثله يحسن حديثه إلا إذا خالف الثقات.
وقوله: نشُّ: هو نصف كل شيء ولو بنصف القيمة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো গোলাম চুরি করে, তখন তোমরা তাকে বিক্রি করে দাও, যদিও তা এক 'নাশ'-এর বিনিময়েও (অর্ধেক মূল্য বা সামান্য মূল্যে) হয়।"
6846 - عن عبد الله بن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع:"ألا أي شهر تعلمونه أعظم حرمة؟" قالوا: ألا شهرنا هذا قال:"ألا أي بلد تعلمونه أعظم حرمة؟" قالوا: ألا بلدنا هذا. قال:"ألا أي يوم تعلمونه أعظم حرمة؟" قالوا: ألا يومنا هذا. قال:"فإن الله تبارك وتعالى قد حرّم عليكم دماءَكم وأموالَكم وأعراضَكم إلا بحقها كحرمة يومكم هذا، في بلدكم هذا، في شهركم هذا، ألا هل بلغت؟" (ثلاثا) كل ذلك يجيبونه: ألا نعم. قال: ويحكم - أو ويلكم - لا ترجعنَّ كفارًا بعدي، يضرب بعضكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6785)، ومسلم في الإيمان (66) كلاهما من طريق واقد بن محمد، عن أبيه، عن ابن عمر، فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم مختصر.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বিদায় হজ্জে বললেন: "তোমরা কি জানো, কোন মাসটি মর্যাদার দিক থেকে সবচেয়ে মহান?" তারা বললেন: "আমাদের এই মাসটি।" তিনি বললেন: "তোমরা কি জানো, কোন শহরটি মর্যাদার দিক থেকে সবচেয়ে মহান?" তারা বললেন: "আমাদের এই শহরটি।" তিনি বললেন: "তোমরা কি জানো, কোন দিনটি মর্যাদার দিক থেকে সবচেয়ে মহান?" তারা বললেন: "আমাদের এই দিনটি।" তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা‘আলা তোমাদের রক্ত, তোমাদের সম্পদ এবং তোমাদের মান-সম্মান তোমাদের জন্য হারাম করে দিয়েছেন—তবে ন্যায়সঙ্গত কারণ ছাড়া—যেমন হারাম তোমাদের এই দিনের, তোমাদের এই শহরের এবং তোমাদের এই মাসের মর্যাদা। সাবধান! আমি কি পৌঁছাতে পেরেছি?" (তিনি তিনবার এ কথা বললেন) প্রতিবারই তারা উত্তর দিলেন: "হ্যাঁ, অবশ্যই।" তিনি বললেন: "তোমাদের জন্য আফসোস—অথবা তিনি বললেন: তোমাদের জন্য ধ্বংস—আমার পরে তোমরা কুফরীতে ফিরে যেও না, যখন তোমরা একে অপরের গর্দান কাটো।"
6847 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اجتنبوا السّبع الموبقات" قالوا: يا رسول الله! وما هنّ؟ قال: الشرك بالله، والسحر، وقتل النفس التي حرم الله إلا بالحق، وأكل الربا، وأكل مال اليتيم، والتولي يوم الزحف، وقذف المحصنات المؤمنات الغافلات".
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6857) ومسلم في الإيمان (89) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، عن ثور بن زيد، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাতটি ধ্বংসকারী বিষয় থেকে বেঁচে থাকো।" তারা বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! সেগুলো কী কী?" তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, যাদু করা, আর অন্যায়ভাবে এমন প্রাণ হত্যা করা—যাকে আল্লাহ হারাম করেছেন, সূদ (রিবা) ভক্ষণ করা, ইয়াতীমের সম্পদ ভক্ষণ করা, যুদ্ধক্ষেত্রের সম্মুখীন হওয়ার সময় পিঠ দেখানো (পলায়ন করা), এবং সতী-সাধ্বী, মু’মিনা, সরলমনা মহিলাদের প্রতি অপবাদ আরোপ করা।"
6848 - عن ابن عباس: أن هلال بن أمية قذف امرأته عند النبي صلى الله عليه وسلم بشريك بن سحماء، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"البيّنة أو حدّ في ظهرك" فقال: يا رسول الله، إذا رأى أحدنا على
امرأته رجلًا، ينطلق يلتمس البينة؟ ! فجعل يقول:"البيّنة وإلا حدّ في ظهرك" فذكر حديث اللعان.
صحيح: رواه البخاري في الشهادات (2671) عن محمد بن بشار، حدثنا ابن أبي عدي، عن هشام، حدثنا عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে হিলাল ইবনু উমাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট তাঁর স্ত্রী সম্পর্কে শারীক ইবনু সাহমা-এর সাথে ব্যভিচারের অপবাদ দিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "প্রমাণ উপস্থিত করো, না হয় তোমার পিঠে হদ (শাস্তি) কার্যকর করা হবে।" তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! যখন আমাদের কেউ তার স্ত্রীর উপর কোনো পুরুষকে (অবৈধ কাজে) দেখে, তখন কি সে প্রমাণ খুঁজতে যাবে?! তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারবার বলছিলেন: "প্রমাণ উপস্থিত করো, অন্যথায় তোমার পিঠে হদ (শাস্তি) কার্যকর করা হবে।" এরপর তিনি (ইবনু আব্বাস) লি'আনের হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
6849 - عن عائشة قالت: لما نزل عُذْري قام رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنبر فذكر ذلك وتلا القرآن. فلما نزل أمر برجلين وامرأة فضربوا حدّهم.
حسن: رواه أبو داود (4474) والترمذي (3181) وابن ماجه (2567) وأحمد (24066) كلهم من حديث ابن أبي عدي (وهو محمد بن إبراهيم بن أبي عدي) عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر، عن عمرة، عن عائشة فذكرته. وإسناده حسن فإن محمد بن إسحاق وإن كان مدلسا فقد صرح بالتحديث عند البيهقي في دلائله (4/ 74).
قال الترمذي:"حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث محمد بن إسحاق".
قلت: وهو كما قال، إلا أنه رواه مرة موصولا، وأخرى مرسلا.
في سنن أبي داود (4475) عن النفيلي، حدثنا محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق بهذا الإسناد. لم يذكر عائشة. قال: فأمر رجلين وامرأة ممن تكلم بالفاحشة: حسان بن ثابت ومسطح بن أُثاثة.
قال النفيلي:"ويقولون: المرأة: حمنة بنت جحش".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমার নির্দোষিতার আয়াত (আমার পবিত্রতা) নাযিল হলো, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে দাঁড়ালেন এবং সে সম্পর্কে উল্লেখ করলেন ও কুরআন তিলাওয়াত করলেন। অতঃপর যখন তিনি (মিম্বর থেকে) নামলেন, তখন দুইজন পুরুষ ও একজন নারীকে নির্দেশ দিলেন, ফলে তাদের উপর তাদের শাস্তি (হদ) কার্যকর করা হলো।
6850 - عن عبد الله بن عمر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من شرب الخمر في الدنيا ثم لم يتب منها حُرِمَها في الآخرة".
متفق عليه: رواه مالك في الأشربة (11) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره. ورواه البخاري في الأشربة (5575)، ومسلم في الأشربة (2003/ 76) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি দুনিয়াতে মদ পান করবে, অতঃপর সে তা থেকে তওবা করবে না, সে আখিরাতে তা (জান্নাতের পানীয়) থেকে বঞ্চিত হবে।"
6851 - عن جابر، أن رجلًا قدم من جيشان (وجيشان من اليمن) فسأل النبي صلى الله عليه وسلم عن شراب يشربونه بأرضهم من الذرة يقال له المزر؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم"أو مسكر هو؟" قال: نعم. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كل مسكر حرام، إن على الله عز وجل عهدا لمن يشرب المسكر أن يسقيه من طينة الخبال" قالوا: يا رسول الله، وما طينة الخبال؟ قال"عرق أهل النار أو عصارة أهل النار".
صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2002) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا عبد العزيز الدراوردي، عن عمارة بن غزية، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, এক ব্যক্তি জাইশান (জাইশান হলো ইয়ামানের একটি স্থান) থেকে আগমন করল এবং সে তার দেশে ভুট্টা থেকে তৈরি এক প্রকার পানীয় সম্পর্কে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করল, যার নাম 'আল-মিযর'। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এটা কি নেশা সৃষ্টিকারী?" সে বলল, "হ্যাঁ।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সকল নেশা সৃষ্টিকারী বস্তুই হারাম। যে ব্যক্তি নেশা সৃষ্টিকারী বস্তু পান করে, আল্লাহ তাআলা তার উপর প্রতিশ্রুতিবদ্ধ যে, তিনি তাকে 'তীনাতুল খাবাল' পান করাবেন।" সাহাবাগণ বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! 'তীনাতুল খাবাল' কী?" তিনি বললেন, "জাহান্নামীদের ঘাম অথবা জাহান্নামীদের পুঁজ-রক্ত।"
6852 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من شرب الخمر وسكر لم تقبل له صلاة أربعين صباحا، وإن مات دخل النار، فإن تاب تاب الله عليه، وإن عاد فشرب فسكر لم تقبل له صلاة أربعين صباحا، فإن مات دخل النار، فإن تاب تاب الله عليه. وإن عاد فشرب فسكر لم تقبل له صلاة أربعين صباحا، فإن مات دخل النار، فإن تاب تاب الله عليه. وإن عاد كان حقا على الله أن يسقيه من ردغة الخيال يوم القيامة" قالوا: يا رسول الله، وما ردغة الخبال؟ قال:"عصارة أهل النار".
صحيح: رواه ابن ماجه (4377) وصححه ابن حبان (5357) من طريق الوليد بن مسلم، ثنا الأوزاعي، عن ربيعة بن يزيد، عن عبد الله بن الديلمي، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.
والوليد بن مسلم مدلس، ولكنه صرح بالتحديث.
وللحديث أسانيد أخرى، ذكرتها في كتاب الأشربة.
ومن الترهيب الذي في شرب الخمر حديث ابن عباس مرفوعا: الخمر أم الفواحش وأكبر
الكبائر، من شربها وقع على أمه وخالته وعمته" إلا أنه لا يصح. رواه الطبراني في الكبير (11/ 164) عن أبي الزنباع روح بن الفرح، حدثنا يحيى بن بكير، ثنا رشدين بن سعد، عن أبي صخر، عن عبد الكريم أبي أمية، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، فذكره.
ورشدين بن سعد وعبد الكريم أبو أمية ضعيفان.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মদ পান করে নেশাগ্রস্ত হয়, তার চল্লিশ দিনের সালাত (নামাজ) কবুল হয় না। যদি সে এ অবস্থায় মারা যায়, তবে সে জাহান্নামে প্রবেশ করবে। তবে যদি সে তওবা করে, আল্লাহ তার তওবা কবুল করবেন। যদি সে আবার পান করে নেশাগ্রস্ত হয়, তবে তার চল্লিশ দিনের সালাত কবুল হয় না। যদি সে এ অবস্থায় মারা যায়, তবে সে জাহান্নামে প্রবেশ করবে। তবে যদি সে তওবা করে, আল্লাহ তার তওবা কবুল করবেন। যদি সে আবার পান করে নেশাগ্রস্ত হয়, তবে তার চল্লিশ দিনের সালাত কবুল হয় না। যদি সে এ অবস্থায় মারা যায়, তবে সে জাহান্নামে প্রবেশ করবে। তবে যদি সে তওবা করে, আল্লাহ তার তওবা কবুল করবেন। আর যদি সে (চতুর্থবারের মতো) আবার পান করে, তবে কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাআলার জন্য এটা ন্যায্য হবে যে তিনি তাকে 'রাদগাতুল খাবাল' থেকে পান করাবেন।" সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন, "হে আল্লাহর রাসূল, 'রাদগাতুল খাবাল' কী?" তিনি বললেন: "জাহান্নামবাসীদের দেহ থেকে নিংড়ানো পুঁজ।"
6853 - عن أنس بن مالك، أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي برجل قد شرب الخمر، فجلده بجريدتين نحو أربعين. قال: وفعله أبو بكر، فلما كان عمر استشار الناس. فقال عبد الرحمن: أخفّ الحدود ثمانين، فأمر به عمر.
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6773) ومسلم في الحدود (35: 1706) كلاهما من طريق شعبة، قال: سمعتُ قتادة يحدّث عن أنس بن مالك، فذكره، واللفظ لمسلم.
ولم يذكر البخاري مشورة عمر، ولا فتوى عبد الرحمن بن عوف. ولفظه:"أن النبي صلى الله عليه وسلم ضرب في الخمر بالجريد والنعال، وجلد أبو بكر أربعين".
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এমন একজন লোককে আনা হলো, যে মদ পান করেছিল। তখন তিনি তাকে দুটি খেজুরের ডাল (জারীদাহ) দ্বারা প্রায় চল্লিশটি বেত্রাঘাত করেন। তিনি (আনাস) বলেন: আবূ বকরও অনুরূপ করেছেন। যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের সময় এলো, তখন তিনি লোকদের সাথে পরামর্শ করলেন। তখন আব্দুর রহমান (ইবনে আওফ) বললেন: 'হদ্দ' (শাস্তিগুলোর) মধ্যে সবচেয়ে হালকা হলো আশিটি (বেত্রাঘাত)। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই (আশির) আদেশ দিলেন।
6854 - عن عروة بن الزبير أن عبيد الله بن عدي بن الخيار أخبره أن المسور بن مخرمة وعبد الرحمن بن الأسود بن عبد يغوث قالا له: ما يمنعك أن تكلم خالك عثمان في أخيه الوليد بن عقبة، وكان أكثر الناس فيما فعل به، قال عبيد الله: فانتصبت لعثمان حين خرج إلى الصلاة فقلت له: إن لي إليك حاجة وهي نصيحة فقال: أيها المرء أعوذ بالله منك فانصرفت، فلما قضيت الصلاة، جلست إلى المسور وإلى ابن عبد يغوث فحدثتهما بالذي قلت لعثمان وقال لي، فقالا: قد قضيت الذي كان عليك فبينما أنا جالس معهما إذ جاءني رسول عثمان، فقالا لي: قد ابتلاك الله. فانطلقتُ حتى دخلت عليه فقال: ما نصيحتك التي ذكرت آنفا. قال: فتشهدت ثم قلت: إن الله بعث محمدا صلى الله عليه وسلم وأنزل عليه الكتاب، وكنت ممن استجاب الله ورسوله صلى الله عليه وسلم وآمنت به وهاجرت الهجرتين الأوليين وصحبت رسول الله صلى الله عليه وسلم، ورأيت هديه وقد أكثر الناس في شأن الوليد بن عقبة، فحق عليك أن تقيم عليه الحد. فقال لي: يا ابن أخي، آدركت رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: قلت: لا ولكن قد خلص إلي من علمه ما خلص إلى العذراء في سترها. قال: فتشهد عثمان فقال: إن الله قد بعث محمدا صلى الله عليه وسلم بالحق وأنزل عليه الكتاب وكنتُ ممن استجاب الله ورسوله صلى الله عليه وسلم وآمنتُ بما بُعث به محمدٌ صلى الله عليه وسلم، وهاجرت الهجرتين الأوليين كما قلتَ، وصحبتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وبايعته، والله ما
عصيته، ولا غششته حتى توفاه الله ثم استخلف الله أبا بكر، فوالله ما عصيته ولا غششته، ثم استخلف عمر فوالله ما عصيته ولا غششته، ثم استخلفت، أفليس لي عليكم مثل الذي كان لهم علي؟ قال: بلى قال: فما هذه الأحاديث التي تبلغني عنكم؟ فأما ما ذكرت من شأن الوليد بن عقبة فستأخذ فيه إن شاء الله بالحق. قال: فجلد الوليدَ أربعين جلدةً، وأمر عليا أن يجلده، وكان هو يجلده.
صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3872) عن عبد الله بن محمد الجعفي، حدّثنا هشام، أخبرنا معمر، عن الزهري، حدثنا عروة بن الزبير، فذكره.
ورواه في فضائل الصحابة (3696) عن أحمد بن شبيب بن سعيد، حدثني أبي، عن يونس، عن ابن شهاب، به، نحوه إلا أنه قال:"ثم دعا عليًّا فأمره أن يجلد، فجلده ثمانين".
মিসওয়ার ইবনু মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরওয়া ইবনু যুবায়র (রাহিমাহুল্লাহ)-কে উবায়দুল্লাহ ইবনু আদী ইবনুল খিয়ার (রাহিমাহুল্লাহ) জানিয়েছেন যে, মিসওয়ার ইবনু মাখরামা ও আব্দুর রহমান ইবনুল আসওয়াদ ইবনু আবদ ইয়াগূস (রাহিমাহুল্লাহ) উভয়ে তাঁকে (উবায়দুল্লাহকে) বললেন: তোমার মামা উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তাঁর ভাই ওয়ালীদ ইবনু উক্ববাহ সম্পর্কে কথা বলতে তোমাকে কিসে বারণ করছে? কারণ ওয়ালীদ যা করেছিল, সে বিষয়ে লোকেরা খুব বেশি কথা বলছিল।
উবায়দুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: অতঃপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন সালাতের জন্য বের হলেন, তখন আমি তাঁর কাছে দাঁড়িয়ে বললাম: আপনার কাছে আমার একটি প্রয়োজন আছে আর তা হলো নসীহত। তিনি বললেন: হে ব্যক্তি! আমি তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই। ফলে আমি ফিরে গেলাম। যখন সালাত শেষ হলো, আমি মিসওয়ার ও ইবনু আবদ ইয়াগূসের কাছে বসলাম এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যা বলেছিলাম আর তিনি আমাকে যা বলেছিলেন, তা তাঁদের বললাম। তাঁরা উভয়ে বললেন: তোমার যা কর্তব্য ছিল, তুমি তা পালন করেছ।
আমি যখন তাঁদের দুজনের সঙ্গে বসেছিলাম, তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দূত আমার কাছে আসলেন। তাঁরা দুজন আমাকে বললেন: আল্লাহ তোমাকে পরীক্ষা করছেন। অতঃপর আমি গেলাম এবং তাঁর (উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি বললেন: তুমি এইমাত্র যে নসীহতের কথা বলেছিলে, তা কী? উবায়দুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: অতঃপর আমি তাশাহহুদ পাঠ করলাম এবং বললাম: নিশ্চয় আল্লাহ মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রেরণ করেছেন এবং তাঁর ওপর কিতাব নাযিল করেছেন। আপনি তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ডাকে সাড়া দিয়েছিলেন, তাঁর প্রতি ঈমান এনেছিলেন, প্রথম দুই হিজরত করেছিলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য গ্রহণ করেছিলেন ও তাঁর আদর্শ দেখেছেন। আর লোকেরা ওয়ালীদ ইবনু উক্ববাহর ব্যাপারে খুব বেশি আলোচনা করছে, তাই আপনার ওপর আবশ্যক যে, আপনি তার ওপর শরীয়তের নির্ধারিত শাস্তি (হদ্দ) কায়েম করুন।
তিনি আমাকে বললেন: হে ভাতিজা! তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পেয়েছ? আমি বললাম: না। কিন্তু তাঁর ইলম আমার কাছে এমনভাবে পৌঁছেছে, যেমন কোনো কুমারী মেয়ের পর্দার অন্তরালে পৌঁছে।
উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অতঃপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাশাহহুদ পাঠ করলেন এবং বললেন: নিশ্চয় আল্লাহ মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন এবং তাঁর ওপর কিতাব নাযিল করেছেন। আমি তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ডাকে সাড়া দিয়েছিলেন এবং মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা নিয়ে প্রেরিত হয়েছেন তার প্রতি ঈমান এনেছিলাম, তুমি যেমন বলেছ, আমি প্রথম দুই হিজরত করেছি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য গ্রহণ করেছি ও তাঁর কাছে বায়‘আত করেছি। আল্লাহর কসম, আল্লাহ তাঁর রূহ কব্জ করার পূর্ব পর্যন্ত আমি তাঁর অবাধ্যতা করিনি এবং তাঁর সাথে খেয়ানতও করিনি। অতঃপর আল্লাহ আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খলীফা বানালেন। আল্লাহর কসম, আমি তাঁরও অবাধ্যতা করিনি এবং তাঁর সাথে খেয়ানতও করিনি। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খলীফা বানানো হলো। আল্লাহর কসম, আমি তাঁরও অবাধ্যতা করিনি এবং তাঁর সাথে খেয়ানতও করিনি। অতঃপর আমাকে খলীফা বানানো হয়েছে। আমার কি তোমাদের ওপর সেই অধিকার নেই, যা তাঁদের (পূর্ববর্তী খলীফাদের) আমার ওপর ছিল?
উবায়দুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: হ্যাঁ, আছে। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তবে তোমাদের সম্পর্কে আমার কাছে এই যে সব কথাবার্তা পৌঁছানো হচ্ছে, এ কী? আর ওয়ালীদ ইবনু উক্ববাহর ব্যাপারে তুমি যা উল্লেখ করলে, ইনশাআল্লাহ আমি তার মধ্যে অবশ্যই সত্য দ্বারা ফায়সালা করব।
অতঃপর তিনি ওয়ালীদকে চল্লিশটি বেত্রাঘাত করলেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাকে বেত্রাঘাত করতে নির্দেশ দিলেন। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বেত্রাঘাত করলেন।
6855 - عن حصين بن المنذر أبي ساسان قال: شهدت عثمان بن عفان وأُتي بالوليد، قد صلّى الصّبح ركعتين. ثم قال: أزيدكم؟ فشهد عليه رجلان: أحدهما حُمران أنه شرب الخمر. وشهد آخر أنه رآه يتقيّأ. فقال عثمان: إنه لم يتقيّأ حتى شربها. فقال: يا علي، قمْ فاجْلده، فقال علي: قم يا حسن؛ فاجلده، فقال الحسن: ولّ حارّها من تولّي قارّها فكأنه وجد عليه فقال: يا عبد الله بن جعفر، قم فاجلده، فجلده وعليّ يعدّ، حتى بلغ أربعين. فقال: أمسك. ثم قال: جلد النبي صلى الله عليه وسلم أربعين، وجلد أبو بكر أربعين، وعمر ثمانين. كل سنة وهذا أحب إليّ.
صحيح: رواه مسلم في الحدود (1707) من طرق عن إسماعيل ابن عليّة، عن ابن أبي عروبة، عن عبد الله الدّاناج.
وعن إسحاق بن إبراهيم الحنظلي (هو ابن راهويه) واللفظ له أخبرنا يحيى بن حماد، حدثنا عبد العزيز بن المختار، حدثنا عبد الله بن فيروز مولى ابن عامر الداناج، حدثنا حصين بن المنذر أبو ساسان (فذكره).
وقوله:"ولّ حارها من تولى قارها" مثل أي ولّ العقوبة والضرب من توليه العمل والنفع. والقار: البارد. وقال الأصمعي: ولّ حارها من تولّى قارها: ولّ شديدها من تولى هيّنها. ذكره أبو داود (4480).
হুসাইন ইবনুল মুনযির আবু সাসান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম। ওয়ালীদকে তাঁর কাছে আনা হলো। সে তখন ফযরের সালাত দুই রাকাআত আদায় করে বলেছিল, 'আমি কি আরও বাড়িয়ে দেবো?' তখন দুজন লোক তার বিরুদ্ধে সাক্ষ্য দেয়। তাদের মধ্যে একজন ছিল হুমরান। সে সাক্ষ্য দেয় যে, ওয়ালীদ মদ পান করেছে। আরেকজন সাক্ষ্য দেয় যে, সে ওয়ালীদকে বমি করতে দেখেছে। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে তো মদ পান না করা পর্যন্ত বমি করেনি। অতঃপর তিনি (উসমান) বললেন: হে আলী, ওঠো এবং তাকে বেত্রাঘাত করো। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে হাসান, ওঠো এবং তাকে বেত্রাঘাত করো। হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'যে এর ঠাণ্ডা অংশ গ্রহণ করেছে, সে এর গরম অংশও গ্রহণ করুক' (অর্থাৎ, যিনি শান্তির সময় কর্তৃত্ব গ্রহণ করেন, তিনি শাস্তির কঠোরতাও গ্রহণ করুন)। এতে মনে হলো যেন তিনি (আলী) মনোক্ষুণ্ণ হলেন। অতঃপর তিনি বললেন: হে আব্দুল্লাহ ইবনু জা‘ফার, ওঠো এবং তাকে বেত্রাঘাত করো। আব্দুল্লাহ ইবনু জা‘ফার তাকে বেত্রাঘাত করতে লাগলেন, আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা গণনা করছিলেন। যখন চল্লিশে পৌঁছল, তখন তিনি (আলী) বললেন: ক্ষান্ত হও। অতঃপর তিনি বললেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম চল্লিশ ঘা মেরেছিলেন, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চল্লিশ ঘা মেরেছিলেন এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আশি ঘা মেরেছিলেন। (তবে) এই চল্লিশের প্রত্যেকটিই সুন্নত। আর এটিই আমার কাছে অধিক প্রিয়।
6856 - عن علي بن أبي طالب قال: ما كنت لأقيم حدًّا على أحد فيموت فأجد في نفسي، إلا صاحب الخمر فإنه لو مات وديتُه، وذلك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يسُنْه.
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6778) ومسلم في الحدود (39: 1707) كلاهما من طريق سفيان الثوري، حدثنا أبو حصين، سمعت عمير بن سعيد النخعي قال: سمعت علي بن أبي
طالب قال فذكره. قوله:"لأن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يسنّه" أي لم يقدر فيه حدًّا مقدرًا.
قال النووي:"واختلف العلماء في قدر حدّ الخمر، فقال الشافعي وأبو ثور وداود وأهل الظاهر وآخرون: حده أربعون ....
ونقل القاضي (يعني عياضًا) عن الجمهور من السلف والفقهاء منهم: مالك وأبو حنيفة والأوزاعي والثوري وأحمد وإسحاق أنهم قالوا: حدّه ثمانون.
واحتجوا بأنه الذي استقر عليه إجماع الصحابة، وأن فعل النبي صلى الله عليه وسلم لم يكن للتحديد، ولهذا قال في الرواية الأولى:"نحو أربعين".
وحجة الشافعي وموافقيه أن النبي صلى الله عليه وسلم إنما جلد أربعين، كما صرح به في الرواية الثانية.
وأما زيادة عمر فهي تعزيرات، والتعزير إلى رأي الإمام إن شاء فعله وإن شاء تركهـ بحسب المصلحة في فعله وتركهـ .." اهـ شرح النووي (11/ 216).
وهو الذي اختاره شيخ الإسلام ابن تيمية. فقال في"منهاج السنة النبوية" (6/ 83): وقد تنازع علماء المسلمين في الزائد عن الأربعين إلى الثمانين هل هو حد يجب إقامته أو تعزير يختلف باختلاف الأحوال على قولين مشهورين هما روايتان عن أحمد أحدهما: أنه حد لأن أقل الحدود ثمانون وهو حد القذف، وادعى أصحاب هذا القول أن الصحابة أجمعت على ذلك، وأن ما نقل من الضرب أربعين كان بسوط له طرفان فكانت الأربعون قائمة مقام الثمانين وهذا مذهب أبي حنيفة ومالك وغيرهما.
والثاني: أن الزائد على الأربعين جائز فليس بحد واجب وهو قول الشافعي واختاره أبو بكر وأبو محمد وغيرهما وهذا القول أقوى. ثم استدل لذلك بحديث علي في صحيح مسلم، وحديث أنس في الصحيحين" انتهى.
আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি কারো উপর হদ্দ (শরীয়তের নির্ধারিত শাস্তি) কার্যকর করলে যদি সে মারা যেত, তবে আমি আমার মনে কোনো (অনুশোচনা বা দায়িত্ববোধ) অনুভব করতাম না, তবে মদ্যপায়ীর বিষয়টি ভিন্ন। সে যদি মারা যেত, তাহলে আমি তার রক্তমূল্য (দিয়াত) দিতাম। কেননা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর (শাস্তির পরিমাণ) নির্ধারণ করে দেননি।
6857 - عن عبد الرحمن بن أزهر قال: أتي النبي صلى الله عليه وسلم بشارب وهو بحنين، فحثا وجهه في التراب، ثم أمر أصحابه فضربوه بالنعال، وما كان في أيديهم. حتى قال لهم:"ارفعوا" فرفعوا. فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم جلد أبو بكر في الخمر أربعين، ثم جلد عمر أربعين صدرًا من إمارته، ثم جلد عثمان ثمانين في آخر خلافته، ثم جلد عثمان الحدين كليهما: ثمانين وأربعين. ثم أثبت معاوية الحد ثمانين.
حسن: رواه أبو داود (4488) عن ابن السرح (وهو أحمد بن عمرو بن السرح) قال: وجدت في كتاب خالي عبد الرحمن بن عبد الحميد، عن عقيل أن ابن شهاب أخبره، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أزهر، أخبره عن أبيه فذكر الحديث.
ومن هذا الوجه رواه أيضا النسائي في الكبرى (5283) إلى قوله:"فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم وتلك سنة".
وعبد الله بن عبد الرحمن بن أزهر، لم يوثقه غير ابن حبان. ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول"
أي عند المتابعة، وقد توبع.
رواه أبو داود (4487) من وجه آخر عن أسامة بن زيد، عن ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن أزهر قال: فذكره. وكذلك رواه النسائي في"الكبرى" من أوجه كثيرة عن عبد الرحمن بن أزهر فذكره مختصرًا.
قال أبو داود:"أدخل عقيل بن خالد بين الزهري وبين الأزهر في هذا الحديث: عبد الله بن عبد الرحمن بن الأزهر عن أبيه".
وفي الباب ما روي عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يَقِتْ في الخمر حدًا. وقال ابن عباس:"شرب رجل فسكر فلقي يميل في الضجّ" فانطُلق به إلى النبي صلى الله عليه وسلم فلما حاذى بدار العباس انفلت. فدخل على العباس فالتزمه، وذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فضحك وقال:"أفعلها؟" ولم يأمر فيه بشيء.
رواه أبو داود (4476) عن الحسن بن علي ومحمد بن المثنى قالا: حدثنا أبو عاصم، عن ابن جريج، عن محمد بن علي بن ركانة، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
قال أبو داود: هذا مما انفرد به أهل المدينة. حديث الحسن بن علي هذا.
ومحمد بن علي بن ركانة هو محمد بن علي بن يزيد بن ركانة روى عنه اثنان، ولم يوثقه أحد غير ابن حبان فهو مقبول عند المتابعة. ولم أجد له متابعا.
আব্দুর রহমান ইবনু আযহার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হুনায়নের যুদ্ধে অবস্থানকালে এক মদ্যপায়ীকে আনা হলো। তিনি তার মুখে মাটি নিক্ষেপ করলেন। এরপর তাঁর সাহাবীগণকে নির্দেশ দিলেন, তখন তারা জুতা এবং তাদের হাতে যা কিছু ছিল, তা দিয়ে তাকে প্রহার করতে লাগল। এমনকি যখন তিনি তাদেরকে বললেন: "থামো," তখন তারা থেমে গেল।
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইন্তেকাল হলো। অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মদ্যপানের জন্য চল্লিশটি বেত্রাঘাত করলেন। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর খেলাফতের প্রথম দিকে চল্লিশটি বেত্রাঘাত করলেন। এরপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর খেলাফতের শেষ দিকে আশিটি বেত্রাঘাত করলেন। অতঃপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উভয় শাস্তিই প্রয়োগ করলেন: আশি এবং চল্লিশ। এরপর মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাস্তি আশিটিতেই স্থায়ী করলেন।
6858 - عن أبي هريرة قال: أتي النبي صلى الله عليه وسلم برجل قد شرب، قال: اضربوه. قال أبو هريرة: فمنا الضارب بيده، والضارب بنعله، والضارب بثوبه. فلما انصرف قال بعض القوم: أخزاك الله. قال: لا تقولوا هكذا، لا تعينوا عليه الشيطان.
صحيح: رواه البخاري في الحدود (6777) عن قتيبة، حدثنا أبو ضمرة أنس، عن يزيد بن النهار، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এক ব্যক্তিকে আনা হলো যে মদ পান করেছিল। তিনি বললেন: তোমরা তাকে প্রহার করো। আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমাদের মধ্যে কেউ হাত দিয়ে মারছিল, কেউ তার জুতো দিয়ে মারছিল, আবার কেউ তার কাপড় দিয়ে মারছিল। যখন লোকটি চলে গেল, তখন উপস্থিত লোকদের মধ্যে কেউ কেউ বলল: আল্লাহ তোমাকে লাঞ্ছিত করুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা এভাবে বলো না। তোমরা শয়তানকে তার উপর সহায়তা করো না।
6859 - عن السائب بن يزيد قال: كنا نؤتى بالشارب على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وإمرة أبي بكر، وصدرًا من خلافة عمر، فنقوم إليه بأيدينا ونعالنا وأرْديتنا، حتى كان آخر إمرة عمر فجلد أربعين حتى إذا عتوا وفسقوا جلد ثمانين.
صحيح: رواه البخاري في الحدود (6779) عن مكي بن إبراهيم، عن الجعيد، عن يزيد بن خُصيفة، عن السائب بن يزيد، فذكره.
সা'ইব ইবনে ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের প্রথম ভাগে আমাদের কাছে মদ্যপকে আনা হতো, তখন আমরা তাকে আমাদের হাত, জুতো এবং চাদর দিয়ে প্রহার করতাম। অবশেষে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলের শেষ দিকে তিনি (মদ্যপকে) চল্লিশটি বেত্রাঘাত করতেন। কিন্তু যখন তারা সীমালঙ্ঘন ও পাপাচারে লিপ্ত হতে থাকল, তখন তিনি আশিটি বেত্রাঘাত করলেন।
6860 - عن عمر بن الخطاب أن رجلًا كان على عهد النبي صلى الله عليه وسلم كان اسمه عبد الله، وكان يلقّب حمارًا، وكان يُضحِكُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان النبي صلى الله عليه وسلم قد جلده في الشراب، فأُتي به يومًا فأمر به فجلد، فقال رجل من القوم: اللَّهم الْعنْه، ما أكثر ما يُؤتي به! فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تلْعنوه، فوالله ما علمتُ إلا أنه يحبّ الله ورسوله".
صحيح: رواه البخاري في الحدود (6780) عن يحيى بن بكُير، حدّثني الليث، قال حدثني خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عمر بن الخطاب، فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে একজন লোক ছিল, যার নাম ছিল আব্দুল্লাহ এবং তাকে 'হিমার' (গাধা) উপাধি দেওয়া হয়েছিল। সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে হাসাতো। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে মদ্যপানের কারণে বেত্রাঘাত করেছিলেন। একদিন তাকে (মদ্যপানের অভিযোগে) আনা হলো। তিনি (নবী) আদেশ দিলেন এবং তাকে বেত্রাঘাত করা হলো। তখন উপস্থিত লোকদের মধ্যে এক ব্যক্তি বলল: "হে আল্লাহ! তাকে অভিশাপ দিন, কত বেশিই না তাকে (এ অপরাধে) আনা হয়!" তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমরা তাকে অভিশাপ দিও না। আল্লাহর কসম! আমি তো শুধু এতটুকুই জানি যে, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসে।"